Sunday, February 19, 2017

पिता और पुत्र....

पिता और पुत्र....


जवाब चाहिए। अगर जवाब मिलते रहें...! तो उन जवाबों के जो सवाल हैं वह भीतर रेंगते हुए पकड़े जाते हैं। सवाल बनाना आसान है.......। शायद उन जवाबों के पहले भी वह सवाल रेंग रहे होगें भीतर कहीं...  पर हल्का-सा खुजा लेने से वह सवाल गायब हो जाते होगें।
बहुत सुबह का वक़्त है... बाहर बारिश हो रही है। पूरा अस्पताल ख़ाली सा मालूम होता होता है। मकखीयाँ भिनभिना रही हैं। वह एक बेंच पर बैठे उंघ रहा है। एक नर्स की टाप सुनाई देती है।
’तबियत थोड़ी संभल रही है।’  नर्स कहती  है।
’जी?’ वह पूरी आँख नहीं खोल पा रहा था।
’आपके पिताजी है ना?’
’हाँ, क्या हुआ?’
’उनकी तबियत थोड़ी संभल रही है।’
’कौन संभाल रहा है?’
नर्स इस सवाल पर कुछ देर चुप उसे देखती रहती है... फिर वह आगे के कमरे में ओझल हो जाती है। वह अपने हाथों को देखता है। दाहिने हाथ पर अपना बांया हाथ रखता है.... थपथपाता है। ’क्या हम ख़ुद को सांत्वना दे सकते हैं? क्या हमारे एक हाथ से दूसरे हाथ को सहलाकर हम ठीक महसूस कर सकते हैं?’
’अरे आप अभी तक यहीं बैठे हैं?’ नर्स की आवाज़ आती है...। वह एक कमरे से निकलकर दूसरे कमरे में जाते हुए के बीच रुकी हुई उसे दिखती है।
’जाईये अपने पिताजी को देख लीजिए...।’ यह कहकर वह फिर ओझल हो जाती है।
वह कमरा नंबर 301 के सामने ख्ड़ा है। हरे रंग के पर्दे के बीच से उसे पिताजी के पैरों की तरफ का हिस्सा दिख रहा है। तीसरा माला... कमरा नंबर 301... उसके लगभग सारे किराय के घर तीसरे माले के थे। वह हमेशा कोशिश करता अपना माला बदल लेने की पर नहीं। उसने लगभग जीवन तीसरे पायदान पर खड़े होकर जिया है। हरे पर्दों से होता हुआ वह पिताजी के बग़ल में पड़े पलंग पर बैठ गया। पिताजी पहाड़ी थे.. चहरे पर जिए हुए के, सहे हुए के, खुशी के, उल्लास के निशान मानों किसी ने खुरच-खुरचकर बनाए हों। ठीक-ठीक क्या हुआ है डॉक्टर बता नहीं पाए.. बस शरीर फूलने लगता था जो अब थोड़ा सामान्य सा दिख रहा है। पिताजी की आँखें बंद थी... सांस बहुत धीमी चल रही थी। उसने देखा पिताजी की भौ बार बार तन जा रही है। वह उनके करीब गया और धीरे से कहा..
’पापा... आप कैसे हैं? पापा?’
सब कुछ शांत था। बाहर बारिश की आवाज़ बहुत तेज़ सुनाई दे रही थी। उसने देखा पलंग के नीचे उनकी चप्पलें एक के ऊपर एक चढ़ी हुई हैं... उसने उन चप्पलों को तरतीब से जमा दिया। कुछ देर में देखा पिताजी की भौं का तनना बंद हो गया है।
अभी करीब एक हफ्ता हुआ है यहां आए हुए। पिताजी से आखरी बार बात दस दिन पहले हुई थी.. वह उसे शादी करने के लिए कह रहे थे। वह अपने कामों में बहुत व्यस्त था सो बहुत सी पिताजी की बातों को वह नज़र अंदाज़ कर दिया करता था। पिताजी भी यह बात जानते थे तो वह अपनी बात को दो से तीन बार दौहराते थे। इस बात से वह हमेशा चिढ़ जाता था। आखरी बार उसने कहा था कि ’अभी व्यस्त हूँ पापा, कल सुबह फोन करता हूँ।’ वह भूल गया था और एक हफ़्ते पहले पड़ोसी फिरोज़ का फोन आया कि ’मैं तुम्हारे पिताजी को लेकर अस्पताल जा रहा हूँ... तुम जितनी जल्दी हो सके आ जाओ।’  उसने फिरोज़ से तुरंत पूछा ’कितनी ख़राब है तबियत...?’ फिरोज़ ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसने कहा ’ठीक है आता हूँ।’ दो दिन की छुट्टी की अर्ज़ी लगाकर वह यहाँ चला आया। अभी एक हफ़्ता हो चला है और पिताजी ने अभी तक आँखें नहीं खोली हैं। फिरोज़ पड़ोसी है।  वह और उसकी पत्नी उसके पिता के बहुत क़रीब हैं... इतने कि उसे कई बार लगता है कि वह पड़ोसी है... और फिरोज़ उनका बेटा। फिरोज़ की टेलर की दुकान है, उसकी पत्नी हुमा ग़रीब बच्चों को फ्री में पढ़ाती है। उसके आने के बाद फिरोज़ सुबह शाम पिताजी को देखने आता है... और हुमा नाश्ता ख़ाना लेकर। वह एक हफ़्ते से अस्पताल में ही सो रहा था। उसके पास उतने कपड़े भी नहीं थे.. सो कुछ कपड़े फिरोज़ ने अपनी दुकान से लाकर दे दिये। शहर से उसके दोस्तों के फोन आते रहते हैं... पर उतने नहीं जितने की वह अपेक्षा रखता है... उसे लगने लगा कि उसके यहाँ आते ही बाक़ी सब अपनी दुनियाँ में व्यस्त हो चले हैं... उसका होना ना होना बहुत मानी नहीं रखता है। कुछ दोस्तों से वह फोन पर झगड़ भी लिया सो उनके फोन भी आना कम हो गए। उनके मेसेज आते हैं जिनके जवाब देने से वह कतराने लगा है। अभी-अभी उसके जीवन में निशा का प्रवेश हुआ था... पर वह इतना अभी-अभी था कि वह उसे ज़्यादा फोन या मेसेज करने से झेंपता था। अगर निशा कुछ पूछती तो वह बड़ी आत्मीयता से उसका जवाब देता। उसे यूं ज़रुर पता लगाने लगा था कि वह जितना ख़ुद को दुखी दिखाता, निशा उसके कुछ कदम ओर नज़दीक आ जाती। वह कितना दुखी है इसका अंदाज़ा उसे नहीं था... वह अपने पिता की मृत्यु की इतनी बार कल्पना कर चुका था कि उसे लगने लगा था कि यह उसके साथ कई बार हो चुका है... पर उसने इस तरह अस्पताल में इंतज़ार करने के बारे में कभी नहीं सोचा था। इस वक़्त वह क्या करे....? दुखी रहे... या ... हंस बोल सकता है?

अगले दिन वह बाहर  गांधी पार्क में जाकर बैठ गया। आज धूप निकली हुई थी। उसने फोन में निशा का नंबर निकाला पर फोन नही किया... बहुत देर तक वह निशा का नाम अपने फोन पर देखता रहा। काश निशा उसकी चिंता में यहाँ आ जाए... और उसके साथ प्रेम से वह इस अस्पताल में रहने लगे, उसका सारा ख़ालीपन उसकी सारी चुप्पी को वह मसल कर अस्पताल के बाहर फेंक दे... इस विचार पर उसे हंसी आ गई। वह वापिस उस नीरस अस्पताल में नहीं जाना चाहता था। उसने फोन वापिस अपनी जेब में रख लिया। वह गांधी पार्क से अस्पताल की सीलन भरी इमारत देख सकता था। अस्पताल को देखते ही वह थक जाता। पार्क में बारिश के बाद की धूप से सारी हरी घांस धुल गई थी... चारों तरफ चिड़ियाओं के चहचहाने का कलरव था। सामने की बेंच पर एक लड़की बैठी थी... उसके कान में हेडफोन थे.. और वह अपना टिफिन गोदी में रखे दो रोटी और अचार को देख रही थी। वह नीला जींस और कत्थई कुर्ता पहने हुए थी। कुछ देर निहारने के बाद उसने टिफिन को वापिस बंद कर दिया। वह ऎसा कभी नहीं करता था पर उसकी आँखें उस लड़की पर जैसे फंस के रह गई थीं... वह चाह रहा था कि अपनी निग़ाह हटा ले.. या उठ कर चला जाए... पर पहली बार उसे लगा कि उसपर उसका कोई बस नहीं था। उस लड़की ने टिफिन से सीधा उसकी तरफ देखा। वह झेंप गया पर वह अपनी निग़ाह नहीं हटा पाया... वह लड़की उठकर पार्क से बाहर चली गई। यह उसको क्या हो गया था? वह ऎसा नहीं था... उसे लगा उसे  उस लड़की से माफी मांगना चाहिए... वह सड़क की तरफ उसे ख़ोजता हुआ पार्क से बाहर निकला तभी फिरोज़ उसे अस्पताल से बाहर आता हुआ दिखा।
’अरे मिंया तुम भीतर नहीं थे..? यहाँ क्या कर रहे हो?’ फिरोज़ आज थोड़ा खुश था।
’बाहर धूप सेकने आया था।’
’अरे अंकल को इस तरह अकेला मत छोड़ो... मुझे फोन कर दिया होता मैं आ जाता।’
इस बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपने बाप का कितना ख़्याल रखे यह उसे फिरोज़ से नहीं सुनना था।
’मैंने डॉक्टर से पूछा.. कह रहे थे तबियत थोड़ी सभल रही है..। अंकल सही हो जांए बस...।’
तभी उसे वह लड़की वापिस पार्क में जाती हुई दिखी। फिरोज़ ने देखा लिया कि वह उस लड़की को देख रहा हूँ..।
’क्या हुआ? तुम जानते हो उसे?’
’हाँ.. मैं जानता हूँ। तुम पापा के पास जाओ मैं अभी आता हूँ।’
यह कहकर वह वापिस पार्क की तरफ लपका। फिरोज़ उसे पार्क में जाता हुआ देखता रहा फिर पलटकर अस्पताल की ओर चला गया।
उसने देखा कि वह लड़की अब उस बेंच पर बैठी है जिसपर वह बैठा था...। धूप तेज़ हो चली थी और जिस बेंच पर वह पहले बैठा था अब वहाँ छाया आ गई है। वह सीधा उस लड़की की तरफ गया। वह लड़की अपना टिफिन खोलकर खा रही थी... अब रोटी और अचार के साथ उसके पास कुछ सेंव भी थे। वह उस लड़की के सामने नहीं बग़ल में जाकर खड़ा हुआ।  
’जी नमस्ते.. मैं यहाँ बैठा था और आप सामने..।’ उसने हिचकिचाते हुए अपनी बात शुरु की..
’मैं आपको देख रहा था.. पर उस नज़र से नहीं .. मैं तो बस नज़र नहीं हटा पाया था...’
तभी लड़की ने उसकी तरफ देखा और चौंक गई...। अभी भी उस लड़की ने हेडफोन पहने हुए थे... वह उसकी कोई भी बात नहीं सुन रही थी। उस लड़की ने हेडफोन निकाले...।
sorry.. मुझे लगा आप मुझे सुन रही हैं।’ वह झेंप गया।
’क्या हुआ? आप कुछ कह रहे थे?’
’हाँ.. मैं कह रहा था कि.... मैं असल में वैसा आदमी नहीं हूँ।’
’कैसे आदमी?’
’मैं आपको देख रहा था।’
’हाँ...’
’मैं असल में आपको देखे जा रहा था... तो.. मैं बस
sorry कहना चाहता था।’
उस लड़की को कुछ समझ में नहीं आता कि वह क्या कह रहा है... वह उसे ताकती रहती है। वह अपनी बात कह चुका था.. । खिसियानी मुस्कुराहट के बाद वह वापिस अस्पताल की तरफ चल दिया।
फिरोज़ पिताजी के की पास रखे पलंग पर लेटा हुआ था। उसकी आँख लग गई थी। अचानक उसे फिरोज़ का पिताजी के करीब होना इतना स्नेह पूर्ण लगा कि वह कुछ देर दरवाज़े के पास खड़ा होकर दोनों को देखता रहा। तभी नर्स भीतर आई, उसने एक पर्ची उसके हाथ में थमा दी कि यह दवाईयाँ ले आईयेगा शाम तक, यह कहकर वह चली गई। नर्स की करकश अवाज़ से फिरोज़ की नींद खुल गई।
’तुम कब आए।’ फिरोज़ अपने सोने पर शरमा रहा था... ’नींद लग गई अचानक...’
’तुम आराम करो मैं दवाईयाँ ले आता हूँ।’
’अरे .. मैं भी साथ चलता हूँ... वहीं से मैं निकल जाऊँगा... दुकान पर बहुत काम है।’  
दोनों साथ दवाई लेने चल दिए। किसी ने एक दूसरे से कोई शब्द नहीं कहा। दुकान पर दवाईयाँ लेने के बाद फिरोज़ ने उससे कहा...
’सुनो.. मैंने डॉक्टर से पूछा था कितना वक़्त लगेगा...? मतलब अभी क्या स्थिति है? वह ठीक-ठीक कुछ कह नहीं पा रहे हैं... बहुत वक़्त भी लग सकता है... तुम चाहो तो वापिस शहर जा सकते हो.. अगर कुछ होगा तो मैं तुम्हें ख़बर कर दूंगा। तुम्हारा बहुत काम अटका पड़ा होगा।’
वह फिरोज़ को देखता रहा। मन में एक रिरयाती सी इच्छा जागी कि काश मैं फिरोज़ होता।
’नहीं.. ऎसा कुछ काम नहीं है।’ उसने झेंपते हुए कहा।
’देख लो .. फिर हम हैं ही यहाँ।’ यह कहकर फिरोज़ चल दिया। उसने पीछे से फिरोज़ को आवाज़ दी.. फिरोज़ मुड़ा और उसने कहा ’थेंक यू फिरोज़... ।’ फिरोज़ मुस्कुराया और भीड़ में गायब हो गया।
वह वापिस अस्पताल आ गया पर  कमरा नंबर 301 के भीतर में जाने की हिम्मत नहीं हुई.. वह बाहर की बेंच पर निढ़ाल पसर गया। दवाईयाँ उसने अपने बगल में रख दीं। ’कितना वक़्त लगेगा?... बहुत वक़्त भी लग सकता है....’ यह वाक़्य उसके दिमाग़ में घूम रहे थे... ’वक़्त किसमें?’ वह सोचने लगा कि क्या उसके शरीर से इंतज़ार की बू आ रही है। क्या उसको देखकर यह लग रहा है कि पिताजी जल्दी से चले जाएं और वह वापिस शहर की अपनी दुनियाँ के अप-डाऊन में व्यस्त हो जाए...। उसे खुद से ख़ीज होने लगी, वह सोचने लगा कि चले जाए से क्या मतलब है...?  वह ’पिताजी मर जाएं’ कहने में क्यों हिचकिचा रहा है???  
एक थड़ से कॉरिडोर का आख़री दरवाज़ा खुला और वही पार्क वाली लड़की... बाहर निकलकर कुछ तलाश रही थी। तभी उसके फोन में मैसेज की छोटी टिंग हुई। उसने देखा निशा का मैसेज है ’कैसे हो?’ उसने फोन को वापिस जेब में रख दिया। तब तक वह लड़की उसके पास तक आई...
’डॉक्टर कितने बजे तक आते हैं?’
’वह सुबह और शाम को आते हैं... ।’ उसने तपाक से उत्तर दिया।
वह लड़की एक थकी हुई मुस्कान देकर वापिस कॉरिडोर के अंतिम कमरे की तरफ चलने लगी।
’कोई परेशानी हो तो... मैं कोई मदद कर सकता हूँ?’
वह लड़की रुक गई।
’आप एक बार आकर दीदी को देख लेंगें...?’
’जी बिल्कुल।’  वह तुरंत उठकर उसके साथ चलने लगा।
 ’दीदी अजीब सी सांसे लेने लगी हैं।’
वह दोनों कुछ तेज़ी से चलने लगे। जैसे ही वह कमरे के भीतर पहुचा उसे लगा कि वह 301 नंबर कमरे में है.. बिल्कुल हू ब हू वैसा का वैसा कमरा.. फिर उसे लगा शायद अस्पताल के कमरे सारे एक जैसे ही होते हैं..। सबसे पहले उसकी निग़ाह ख़ाली बिस्तर पर गई.. जहाँ वह लड़की सोती होगी। वह सोचने लगा क्या वह भी वैसे ही दीवारें ताकती होगी रात भर जैसे वह ताकता रहता है।
’अरे.. अभी तो ठीक है.. मैं बैकार में घबरा गई थी।’  उसकी दीदी गहरी नींद में थी।
’कोई नहीं.. होता है ऎसा..’
वह उसकी दीदी के बिस्तर के पास गया... उसकी दीदी की उम्र उस लड़की से बहुत ज़्यादा लग रही थी...। उसने देखा उसकी दीदी की एक आँख के पास कुछ गहरे चोट के निशान हैं... फिर उसकी निग़ाह हाथों पर भी गई.. वहाँ भी कत्थई दाग़ थे।
’मेरा नाम अतुल है।’ उसने उससे कहा...।
’मैं गरिमा...।’

गरिमा ने चद्दर से दीदी का हाथ ढ़ाक दिया।

अतुल कमरा नंबर 301 की दीवारें ताक रहा था। तभी पिताजी को ख़ासी आई... वह चमक कर उठ बैठा। ख़ास लेने के बाद पिताजी वापिस शांत थे।उसे याद ही नहीं रहा कि बगल के बिस्तर में पिताजी पड़े हुए हैं। उसे हमेशा ख़ुद को याद दिलाना पड़ता है कि पिताजी हैं.... वह हर बार भूल जाता है। जब वह नहीं रहेगें तब भी उसे लगेगा कि वह शायद हैं अभी भी.... तो दुख़ कैसे होगा? या किस तरीक़े का होगा दुख़? वह पिताजी के बहुत करीब जाकर खड़ा हो गया। उनके एक हाथ को अपने हाथ में लिया और कस कर दबाया... जितना कस कर वह दबा सकता था। एक गुस्सा था...ख़ीज...। काश वह डांट देते... उसके बड़े होने में उसके पिताजी लगातार बदलते जा रहे थे... वह उतने नहीं, जितने उनके उससे होने वाले संवाद.. वह एक समय तक हक़ से डांटते थे.. फिर वह अपनी बात नरम सुर में कहने लगे... फिर मनऊव्वल जैसा कुछ सुर शुरु हुआ था .... और बाद में उनके लगभग हर वाक़्य की शुरुआत होती कि ’बेटा एक बात कहूँ तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा......’ और वह बड़ा हो गया था। बाप हमेशा बाप क्यों नहीं बना रहता... काश वह अपने बाप के लिए कुछ ओर जगह ख़ाली रखता... ऎसी जगह जिसमें वह जब मन चाहे... जितनी भी देर रह सकते थे।
रात के एक बज रहे होंगे। वह कमरा नंबर 301 के बाहर की बेंच  पर बैठा था। उससे भीतर रहा नहीं गया। उसने फोन निकाला और निशा को मैसेज किया ’मैं ठीक हूँ।’ फिर बहुत देर तक अपने भेजे मैसेज को ताकता रहा.....।
’आप सोए नहीं?’ गरिमा कब आई उसे पता भी नहीं चला। उसने अपना फोन जेब में रखा... और बेंच के एक कोने में खिसक गया। गरिमा कुछ झिझक के बाद उसके बग़ल में  बैठ गई।
’भीतर नींद नहीं आती है... सो बाहर आ जाता हूँ... बाहर आते ही लगता है कि यहाँ क्यों आ गया? भीतर कमरे में पड़े रहने में कोई अंतर नहीं है.... वहाँ वक़्त का रैंगना सुनाई देता है... और यहाँ वक़्त फैला पड़ा है और दिखाई देता है। भीतर दीवारे ताकता हूँ और यहाँ ज़मीन पर पड़े रोशने के टुकड़ो को।’
गरिमा इसका कोई जवाब नहीं देती। अतुल अपनी ही कही बात से असहज होने लगता है...।
’मुझे तो यहाँ आकर अजीब सी राहत मिली है... जैसे मैं ऎसा कुछ चाहती थी।’ गरिमा अचानक अतुल के स्वर में बोलने लगती है।
’मैं समझा नहीं...’ अतुल उसे देखता है।
’मैंने बहुत सुरक्षित जीवन जिया है... छोटी हूँ तो बहुत प्रेम मिला सबका.. जो भी करना चाहती थी सब की छूट... पर भीतर मैं हमेशा किसी त्रासदी का इंतज़ार करती रहती थी। कुछ ऎसा जो मुझे झंझोड़ कर रख दे...।’
तभी एक नर्स हाथ में ट्रे लेकर निकली, जब तक वह ओझल नहीं हो गई दोनों अजनबीयों की तरह चुप बैठे रहते हैं।
’आपको भी नींद नहीं आ रही थी?’ अतुल ने पूछा..
’नहीं मैं सो सिगरेट पीने निकली थी। आपको देखा तो रुक गई। आप पीते हैं?’
’नहीं...। पर मैं आपके साथ चल सकता हूँ।’
अतुल जाने के पहले एक बार कमरे में झांककर देखता है। सब कुछ वैसा का वैसा ही है। झांकते ही उसे लगा कि वह कितना छिछला है... वह क्यों गरिमा को देखाना चाहता है कि मैं कितना कैयरिंग हूँ।
दोनों बाहर लॉन में टहलने लगते हैं। कुछ देर में गरिमा को लॉन की छोटी मुडेर दिखती है और वह उसपर बैठ जाती है।
’मैं चलत-चलते सिगरेट नहीं पी सकती हूँ.. मुझॆ बैठना होता है।’
अतुल बैठता नहीं है... वह उसके सामने खड़ा रहता है। रात में बाहर बहुत कम लोग थे। पीछे एक चाय की दुकान पर कुछ लोगों की बातचीत सुनाई दे रही थी। गरिमा ने जैसे ही सिगरेट जलाई.. अतुल पहरेदार की तरह इधर उधार देखने लगा कि कोई आ तो नहीं रहा है इस तरफ।
’किसी को कोई फर्क़ नहीं पड़ता है।’ गरिमा ने पहले कश का धुंआ छोड़ते हुए कहा। अतुल  मुस्कुरा दिया...।
’क्या हुआ है आपकी दीदी को..?’
’सास बहु और साज़िश... मेरे घर में, माँ पिताजी को पता चलेगा तो बहुत मुश्किल हो जाएगी.. सो दीदी के साथ सिर्फ मैं हूँ।’
’अरे पर यह बहुत... आपने पुलिस में कंप्लेन नहीं की..।’
’हमने अस्पताल में कहा कि दीदी सीढी से गिर गई थीं। पता नहीं मैंने आपको यह क्यों बताया।’
अतुल सोचने लगा कि अगर गरिमा उसके पिताजी के बारे में पूछेगी तो वह क्या कहेगा। उसे बिल्कुल  भी नहीं पता था कि असल में पिताजी क्या किया करते थे... बस कुछ महीने पहले वह बाथरुम में गिर गए थे... इस घटना के अलावा फिरोज़ ने भी उसे ज़्यादा कुछ नहीं बताया है.. ना ही अतुल ने जनने की कोशिश की।
’मुझे यूं लगता है जैसे कुछ रह गया था जो मैं कर नहीं पाया... अस्पताल में दीवारें ताकते हुए मैं अकसर उस एक चीज़ को खोजता रहता हूँ। कुछ रह गया है ख़ासकर पिताजी के साथ... पर क्या? मैं ख़ोज नहीं पाया हूँ।’ अतुल बुदबुदाता  हुआ बोल गया। गरिमा सिगरेट के कश के बीच उसे ताकती रही।
’आप क्या काम करते हैं?’ गरिमा ने बात पलटते हुए बोला... सब कुछ सहज, सामान्य करने की इच्छा से...। अतुल बहुत देर चुप रहा.... गरिमा ने हिचकते हुए फिर पूछा... ’आप क्या काम...?’
’मैं तुम्हारे लिए अतुल हूँ जो अपने बाप के मरने का इंतज़ार कर रहा है.... और तुम मेरे लिए गरिमा हो जो किसी त्रासदी के इंतज़ार में थी जो शायद अब उसके साथ हो रही है...। हमें इसके आगे कुछ जनने की ज़रुरत है?’
गरिमा चुप आँखों से उसे देख रही थी। उसकी सिगरेट ख़त्म हो चुकी थी। वह खड़ी हुई.. दोनों अपने-अपने एकांत में अस्पताल के भीतर घुसे और ओझल हो गए।
सुबह उठा तो निधी के तीन मिस्ड कॉल थे। उसने वापिस कॉल नहीं किया... यह अजीब टुच्चा सुख है.. किसी को छोटी तकलीफ देने में बड़ा सुख मिलता है.. नहीं सुख नहीं तसल्ली...। कोई बात करना चाह रहा है और आप नहीं कर रहे हैं...। वह फोन कर सकता था.. पर उसने नहीं किया। वह जब शहर में रहता था... तब वह अपने पिताजी को फोन कर सकता था.. पर नहीं किया.. उस नहीं किये का उसके पास कारण भी नहीं है... उस नहीं फोन करने में को तसल्ली भी नहीं है... फिर क्यों? अतुल अपने पिताजी के बिस्तर पर बैठे उनके हाथों को देख रहा था... उनकी हथेली में गुदी रेखाएँ... मोटी-मोटी उंगलियाँ। हल्की हल्की टपकती सी पीड़ा रिस रही थी। इन्हीं मोटी उंगलियों को पकड़कर वह स्कूल जाता था... सालों इन्हीं हाथों से खाना खाया करता था.. उंगलियाँ चाटा करता था। उसने अपने पिताजी की उंगलियों को अपने मुँह में रख लिया... ठंडी, बेस्वाद उंगलियाँ। कुछ भी पूरा नहीं है.. हर चीज़ अधूरी है.. पीड़ा भी इतनी नहीं है कि आँसू टपक पड़े.. तकलीफ भी इतनी नहीं कि सांस लेना मुश्किल हो... हर चीज़ छिछली सी अधूरी है। शायद इसका कारण है कि वह हमेशा से बचते हुए जीया है... वह बचना बहुत पहले सीख चुका था। उम्मीदों से... अपनों से... हार से और जीत से भी... बहुत दुख से बचते-बचते बहुत सुख भी चख़ नहीं पाया। अभी पिताजी की उंगलियाँ मुँह मे है.. पर पराई सी हैं... सारा अपनापन बह चुका है।
उस सुबह के बाद पिताजी की तबियत गिरती गई। डॉक्टर की सलाह पर पिताजी को सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया था। कमरे में कुछ मशीने कम हो गई थीं । फिरोज़ लगभग अपना वक़्त अस्पताल में ही गुज़ारने लगा था। गरिम रात को अपने कमरे से, 301 नंबर रुम के सामने रखी बेंच को देखती पर वहाँ कोई नहीं बैठा होता।
’अंकल की जब तबियत बिगड़ने लगी थी... अस्पताल आने के कुछ दिन पहले, मैंने कहा अतुल को बुला लेते हैं... पर अंकल ने कहा कि नहीं उसको मत बताना बेकार परेशान होगा।’ हुमा ने अतुल के सामने टिफिन खोलते हुए कहा...।
’मैंने फिर भी आने में देर कर दी....।’
’देखों अल्ला ने चाहा तो सब ठीक होगा।’ हुमा खाना परस कर टिफिन धोने बाथरुम में चली गई। फिरोज़ सामने चुपचाप खा रहा था। पिताजी की सांसो की आवाज़ कमरे में हर तरफ सुनाई दे रही थी।
’फिरोज़ तुमसे एक बात कहूँ....?’ अतुल ने कहा
’हाँ मियां.. बोलो..।’
’तुम ... ’
’क्या?’
’फिरोज़ तुम बहुत अच्छे आदमी हो...।’
’अरे मियां... हम सब अच्छे हैं।’
’तुम्हारा पिताजी पर मुझसे भी कहीं ज़्यादा हक़ है।’
उस रात बहुत ज़्यादा बरिश हुई थी। वह पिताजी के बगल वाले बेड पर  लेटे हुए सोच रहा था कि असल में वह फिरोज़ से क्या कहना चाहता था। वह असल में कहना चाहता था कि फिरोज़ तुम पिताजी को अग्नि देना.... उसी का हक़ बनता है... वह सच में यह चाहता था.. पर यह उसने फिरोज़ से कहा नहीं क्योंकि अगर वह फिरोज़ की जगह होता तो उसे चांटा मार देता... ’साला एहसान उतारना चाहता है।’ उसने गहरी सांस ली और उठकर बैठ गया। अपना फोन निकाला तो देखा रात के एक बज रहे हैं। उसने निशा को फोन लगाया। कुछ घंटी के बाद उसने काट दिया फिर खुद को कोसता रहा कि क्यों फोन लगाया.. उसके पास कुछ भी कहने को नहीं था। निशा का फोन वापिस आया...
’हेलो...’ उसने तुरंत उठाया..।
’अतुल... सब ठीक है... तुम ठीक हो?’
’हाँ.. सॉरी.. फोन लगाने के बाद टाईम देखा... सॉरी।’
’अरे कोई नहीं... ।’ निशा ने कहा....  अतुल की निग़ाह पिताजी के बेड पर गई, उसे लगा कि पिताजी उसे देख रहे हैं... । वह चोंक गया..  उसने डर से अपनी आखें बंद कर ली... फिर देखा... तो पिताजी वैसे के वैसे पड़े हुए हैं। अतुल का सिर उसके कंधो पर झूल गया।
’हेलो... अतुल ... आर यू देयर?’
’निशा.. ?’
’हाँ अतुल... ?’
’मैंने टाईम पहले देखा था... मुझे पता था कि एक बज रहे हैं... फिर भी मैंने तुम्हें फोन किया..। मैं झूठ बोल रहा था।’
’अतुल.. ठीक है.. इट्स ओके..।’
’मैंने तुमसे ओर भी कई झूठ बोले हैं...।’
’अतुल जाने दो अभी... हम यह सब बातें बाद में कर लेंगें।’
’नहीं.. सुन लो... कुछ दिन पहले तुम्हारा मैसेज आया था कि कैसे हो? मैं उसी वक़्त उसका जवाब दे सकता था। मैं ठीक था.. पर मैं चाहता था कि तुम समझो कि मैं पीड़ा में हूँ..। मैं अभी भी ठीक ही हूँ... मुझे नहीं पता इस वक़्त मुझे क्या महसूस करना चाहिए...? या जब पिताजी नहीं रहेगें तो मुझे कैसे बिहेव करना चाहिए..? मुझपर कुछ भी असर नहीं होता है। शायद मेरा स्वाद छिन गया है... मुझे सारे कुछ में एक जैसी नीरसता दिखती है। जिस घर में तुम आई थी वह किराय का घर है... जिस गाड़ी में मैं तुम्हें घुमाता हूँ वह मेरे दोस्त की है....मैंने तुमसे बहुत सारा झूठ कहा है.. मैं एक टुच्चा सेल्फसेंटर्ड आदमी हूँ जो सिर्फ खुद के बारे में सोचता है। अभी पिताजी मेरे बगल में पड़ा हैं.. इस पर भी मैं अपने बारे में ही सोच रहा हूँ... मैंने अपने दोस्तों के कहा कि तुम मेरे पीछे पड़ी हो... तुम्हारे साथ रहते हुए मैं दूसरी लड़कीयों से मिलता रहा हूँ....तुमने मेरे साथ सिर्फ झूठ जिया है।’
जब अतुल चुप हुआ तो सन्नाटा था। निशा ने कुछ नहीं कहा। कुछ इंतज़ार के बाद निशा ने फोन काट दिया। वह अपने पिताजी के बिस्तर पर गया... उनकी चादर हटाई और उनसे  लिपटकर रोने लगा... ।
रात कब बारिश बंद हुई उसे पता नहीं चला... कब वह पिताजी के बेड से अपने बेड पर आया उसे कुछ याद नहीं था। सुबह नर्स आई और उसने उसे झंझॊड़कर उठा दिया। नर्स के साथ कुछ दूसरे लोग भी कमरे में थे.. पिताजी का सिर चादर से ढ़का हुआ था। नर्स ने अतुल को खड़ा किया और पिताजी के पास ले गई। उसे समझ में आया कि पिताजी जा चुके हैं। नर्स ने बताया कि वह सोते हुए नींद में.... करीब चार बजे के आस पास चले गए थे। उसके बाद अतुल ने जो भी कुछ भी किया वह बहुत ही मेकेनिकल था... फिरोज़ को फोन करना.. कुछ  रिश्तेदारों को फोन पर इत्तला देना.. और अब जो बाक़ी रह गया था वह था इंतज़ार। फिरोज़ ने उससे कहा कि ’मैंने सारी व्यवस्था कर दी है... करीब एक घंटे में हम इन्हें घर ले जाएगें।’ अतुल कुछ देर एक कोने में बैठा रहा.. फिर उठकर बाहर निकल गया।
धूप बहुत भीनी-भीनी थी। बाज़ार रोज़ जैसा व्यस्त था। हर आदमी अपने संधर्ष में व्यस्त। रोड़ के दूसरी तरफ कुछ बच्चे समोसे ख़ाते हुए मस्ता रहे थे... उन्हीं के बगल में चाय की दुकान पर कुछ बूढ़े शांत बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। दवाईयों की दुकानों पर हमेशा की तरह भीड़ थी। दुकान में काम करने वाले हर आदमी को हर दवाई पता थी.. पर्ची देखते ही वह मक्खी की तरह भुनभुनाते हुए अपनी दवाई को ख़ोज लेते। कुछ लड़कियाँ साईकल पर स्कूल जा रही थीं। पेड़ो पर पक्षी चहचहाने रहे थे। ऊपर नीले आसमन में एक चील मंडरा रही थी... एक आदमी पीला स्कूटर चलाता हुआ सामने से गुज़र गया। सब कुछ सामान्य था। पैदा होने और मरने की बीच जीवन था और उसकी छोटी छोटी व्यस्तताएं थीं।
अतुल गांधी पार्क की बेंच पर बैठा था। अगल-बगल जो हो रहा था उसे बहुत कम सुनाई दे रहा था.. दृश्य आऊट ओफ़ फ़ोकस थे...।
’कैसे हैं आप?’ गरिमा बग़ल में खड़ी थी। अतुल रिरयाता हुआ मुस्कुरा दिया। उसकी आँखें सूख़ी हुई थी।
’आप ठीक हैं?’ गरिमा ने पूछा....अतुल ने सिर हाँ में हिलाया। गरिमा बग़ल में  बैठ गई।
’मैं आपको तलाशती रही.. पर आप मुझे दिखे ही नहीं। फिर मैं आपके कमरे में भी दो बार आई थी पर आप  सो रहे थे।’
’मुझॆ हमेशा से लगता था कि एक तैयारी चल रही है... जीने की रिहर्सल जैसा कुछ... जब तैयारी पूरी होगी तो हम जीना शुरु करेंगें..। अभी थोड़ी... मतलब अभे कहाँ...? मैंने तो अभी अभी पिताजी की उंगलियाँ छोड़कर चलना शुरु किया था। खुद अकेल जीना...? नहीं... मैं अभी तैयार नहीं हूँ।’
’अतुल ... ।’
’सॉरी... ।’
’तुम्हारे पिताजी को क्या हुआ है?’
’वह नहीं रहे...।’
’अरे... कब?’
’आज सुबह..।’
’तुम यहाँ.....?’
’वहाँ बैठा नहीं जा रहा था।’
दोनों शांत थे। गरिमा ने अपना हाथ उसके हाथों पर रखा..। उसके हाथ बहुत गर्म थे।
’मेरे पिताजी बचपन में ही चल बसे थे.. हमें तो कोई अंदाज़ा ही नहीं है। यह सांत्वना के लिए नहीं कह रही हूँ।’
’मैं समझता हूँ।’ अतुल ने कहते ही एक गहरी सांस भीतर ली..
’मैं उस रात तुमसे एक बात नहीं कह पाई थी... पर अब लगता है कि यह ठीक वक़्त नहीं है।’
’क्या बात?’
’जाने दो..’
’कह दो.. क्यों कि इसके बाद कोई ऎसा वक़्त शायद नहीं आए कि हम यूं साथ बैठें हों।’
’मैं बिलकुल खुश नहीं हूँ अपनी दीदी को ऎसा देखकर... जबकि बचपन, कॉलेज के वक़्त.. मैं हमेशा उससे बहतर होना चाहती थी...। मैं उसे चॉकलेट.. मिठाईया खूब खिलाती कि वह मोटी हो जाए और लोग मुझे ज़्यादा सुंदर कहें... मैंने क्रूर से क्रूर हरकत की हैं... अभी तो मैं बता भी नहीं सकती..। मुझे हमेशा लोगों ने ज़्यादा पसंद किया... हमेशा.. वह हारती रही.. पर उसे इस बात का बिल्कुल पता नहीं था कि मैं उसे हराना चाहती हूँ ...कैसे भी। वह अस्पताल में ऎसी स्थिति में भी मुझसे इतना प्रेम करती है कि यह देखकर मुजे बहुत ग्लानी होती है।’
गरिमा चुप हो गई। अतुल ने अपना दूसरा हाथ गरिमा के हाथों पर रख दिया। गरिमा अतुल को देख रही थी।
’अजीब यह है कि इस अस्पताल से निकलते ही हम फिर वैसे ही हो जाएंगें..।और ग्लानी... बहुत सी रोज़ मर्रा की उहापोह के नीचे गुम चुकी होगी... अगली किसी त्रासदी के इंतज़ार में।’
अतुल उठता... और जाने को होता है।
’अब तुम कहाँ जाओगे?’
’अस्पताल...।’
’नहीं यह सब ख़त्म होने के बाद....।’
’मन तो कहता है कि सबकुछ छोड़कर कहीं ओर चला जाऊं...। सारा पुराना साफ करके एक नया... खुला हुआ जीवन जीना शुरु करुं.... पर मैं जानता हूँ कि मैं ऎसा कुछ नहीं करुंगा..। मैं कायर हूँ..... ।’
अतुल पार्क से निकल जाता है। गरिमा उसे देर तक जाता हुआ देखती रही।





2 comments:

iBlogger said...

बहुत शानदार रचना है।

Kishan said...

विचित्र । मन्त्रमुग्ध कर देने वाली रचना ।

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मानव

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल