<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175</id><updated>2012-01-23T18:07:52.522+05:30</updated><category term='नाटकों की दुनियाँ...'/><category term='नाटक...'/><category term='a thought...'/><category term='हार की चाह...'/><category term='सलाम ज़िन्दगी....'/><category term='ख़त...'/><category term='अपने से...'/><category term='मज़ाक...'/><category term='अरण्य...'/><category term='बात-चीत...'/><category term='दिल्ली रंगमंच...'/><category term='किस्सा...'/><category term='कविता...'/><category term='कहानी....'/><category term='Jeanette Winterson...'/><category term='बिखराव...'/><category term='एक कहानी...'/><category term='अपने से..'/><category term='रात'/><category term='यात्राओं की सुबह...'/><category term='कहानी...'/><category term='एक विचार...'/><category term='जयपुर धमाको के बाद'/><category term='बहस...'/><category term='गुरु जी...'/><category term='एक प्रयोग...'/><category term='मानव..'/><category term='उपन्यास...'/><category term='अपने जीवन के कुछ पन्ने...'/><category term='मेरी कहानियाँ...'/><category term='travel...'/><category term='कविता क्या है?'/><category term='यात्रा....'/><category term='अपने से....'/><category term='बात चीत...'/><category term='बात चीत'/><title type='text'>मौन में बात...</title><subtitle type='html'>मानव...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/'/><link rel='hub' 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{parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-jzJTQ_G2JNw/TxY5Y-zPOqI/AAAAAAAAAvo/nmF9u1DX5Yc/s1600/Photo0180.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-jzJTQ_G2JNw/TxY5Y-zPOqI/AAAAAAAAAvo/nmF9u1DX5Yc/s400/Photo0180.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5698805479821490850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(DUBEYJI TRIBUTE "DHAMAAL" 8th Jan.. 2012)&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“मैं दुबेजी को सबसे ज़्यादा जानता हूँ... मैं उनके सबसे करीब था... मेरे और उनके संबंध बहुत निजी थे।“ यह वाक़्य सबसे मन में था... सारे लोग जो धमाल (दुबेजी की याद में आयोजित किया गया सेलिब्रेशन...) में बतौर अभिनेता हिस्सा ले रहे थे और जो दर्शकों में बैठे हुए थे.. सभी। ’पंडित सत्य देव दुबे...’ जिन्होंने ना जाने कितने लोगों को निजी तौर पर छुआ है। दुबेजी से सभी के मतभेद उतने ही थे जितना सभी उनसे प्रेम करते थे। पिछले चालीस सालों जाने कितने हिंदी, मराठी, गुजराती और अंग्रेज़ी नाटक वालों के ऊपर दुबेजी का असर रहा है... और सभी के पास उनके असंख्य किससे है। इसलिए यह बात सुनील शानबाग़ ने धमाल शुरु होते ही कही कि हम दुबेजी का जश्न मनाना चाहते हैं... जैसा कि दुबेजी भी पसंद करते.. सो कोई भी अपने निजी संस्मरण ना सुनाए (क्योंकि उसके लिए कुछ दिन भी कम पड़ जाते...)। सभी को लगभग पांच मिनिट दिये गए थे.. और सबने खूब जम कर उसे भोगा। इस थियेटर के जश्न में... सभी कुछ हुआ.. कविताए पढ़ी गई... नाटक के दृश्य मंचित किये गए... गाने गाए गए... नृत्य हुआ... याने नाटक की विद्या से जुड़ी लगभग सभी चीज़ देखने को मिली। &lt;br /&gt;पर हम सब एक ख़ालीपन में थे...। हम सभी के भीतर दुबेजी के ना होने की एक ख़ाली जगह थी... इस ख़ाली जगह को देखने के बाद पता चलता है कि असल में दुबेजी कितनी जगह घेरे हुए बैठे थे... हम सबके भीतर उन्होंने अपनी एक जगह बनाई हुई थी। मुंबई थियॆटर को यह जगह भरने में पता नहीं कितना वक़्त लगेगा। &lt;br /&gt;मैंने ’सुख का दुख..’ भवानी प्रसाद मिश्र की कविता सुनाई थी.. और मुझे लगा कि मैं कोई ऎसी बात कह रहा हूँ जो सारे दर्शकों ने रट रखी है...। मैं ही नहीं लगभग सारी प्रस्तुती में यह भाव था कि वह सबको रटा हुआ है... क्योंकि सभी दुबेजी के रिफरेंस में चीज़े सुन रहे थे... कह रहे थे.. जो उस थियेटर में बैठे हर व्यक्ति को व्यक्तिगत तौर पर छू रही थी। हर प्रफार्मेंस में लोग खुलकर हंसते... तालीयाँ बजाते... कभी चुप शांति छा जाती... मेरे ख्याल उस दिन बहुत खूबसूरत नाटक हुआ था... वह नाटक जिसका सभी हिस्सा थे...। नसीर ने कहा कि दुबेजी ने अपने जीवन में इतना काम किया है कि उन्हें एक नींद की ज़रुरत थी जो उन्होंने अपनी मृत्यु के पहले ली... तीन महीने वह सोते रहे... ऊपर बड़े नाटक में हिस्सा लेने से पहले शायद यह उनकी तैयारी थी। हमें जिस तरह दुबेजी को याद करना चाहिए यह धमाल उसका एक बैहतरीन उदाहरण था...। दुबेजी कहते थे (सुनील शानबाग़) कि अगर थियेटर को बचाना है तो हमें दो छोटे थियेटर और चाहिए इस शहर में... जिसमें 200 रुपये से ज़्यादा का टिकिट ना हो... थियेटर खुद बच जाएगा। अभी यह बात हम सबके दिमाग़ में है कि काश हमें प्रयोग करने की एक और जगह मिल जाये...। &lt;br /&gt;वह बहुत अच्छे टीचर थे... डांट कर, चिल्लाकर, प्रेम से वह आपके भीतर से वह उस इंसान को बाहन निकालने में कामियाब हो जाते थे जो बरसों बरस डरा हुआ भीतर बैठा था... यह अलग बात है कि हम अपने डर को जीत जाते थे लेकिन दुबेजी से डरना शुरु कर देते थे। डर के बाद का बदलाव दोस्ती का होता था... हम सब उनके दोस्त हो गए थे। इसलिए शायद उनकी बातों पर जो कभी कभी बचकानी लगती थी, उनकी मृत्यु के बाद भी, उन बातों पर इतनी ज़ोर से हंस सकते थे। वह एक तरीके से कुम्हार थे... जिन्होंने हम सबकी गीली मिट्टी से एक मूर्ति बनने की यात्रा में अपने समझ के हाथ का साथ दिया था। &lt;br /&gt;धमाल में उनकी पसंदीदा चीज़ो को प्रस्तुत किया गया था.. और आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे कि किस कदर की अलग-अलग चीज़े उन्हें पसंद थी.... स्वानंद किरकिरे ने ’बावरा मन...’ गाना सुनाया, कुमुद ने ’सुदामा के चावल..’ (उनका निर्देशित नाटक) का अंश प्रस्तुत किया, पूर्वा नरेश ने अपने नाटक अफसाने का एक नृत्य प्रस्तुत किया, नीना कुल्कर्णी ने ‘Educating Rita..’, नमित और शुब्रो ने कुछ उनके पसंदीदा फिल्मी गाने गाए, नसीर ने फैज़ की एक नज़्म पढ़ी... और इसी तरह लोगों ने उत्सव मनाया... उनके हमारे बीच होने का। मुझे पता नहीं क्यों चेतन दातार की बहुत याद आई...चेतन ने एक बार दुबेजी के ऊपर एक छोटा सा नाटक प्रस्तुत किया था बहुत पहले पृथ्वी थियेटर में... मैं उसे कभी भी नहीं भूल पाता हूँ...। मैने चेतन से कहा था कि दुबे पर ऎसा नाटक आप ही लिख सकते हो... मुझे उस वक़्त चेतन से बहुत ईर्ष्या हुई थी। &lt;br /&gt;धमाल का अंत फिल्मी गाने से हुआ.. ’ज़रा हट के, ज़रा बच के यह है बाम्बे मेरी जान...’। सारे लोगों ने एक साथ मिलकर उस गाने को गाया...। जब धमाल खत्म होकर हम सब बाहर आए... तो एक अजीब से किस्सों का सिलसिला शुरु हो गया... हर आदमी के पास बहुत कुछ था कहने को... सभी लोग अपने अनुभव एक दूसरे को सुनाना चाहते थे। मैंने अलग-अलग गुटों में खड़े होकर करीब बीस नए किस्से सुने..... कुछ देर में मुझे लगा कि दुबेजी बहुत जल्द ’विचित्र किंतु सत्य...’ जैसे कोई व्यक्तित्व हो जाएंगे... जिन्हें हमें उनके किस्सों में पकड़ना पड़ेगा। फिर मैं किस्सों से थोड़ा थक कर अकेला खड़ा हो गया... सिग्रेट मुंह को लगाई थी कि.... तभी मुझे एक रिक्शा आता हुआ दिखा... मुझे लगा अभी इस रिक्शे से दुबेजी उतरेगें और पूछेगें... ’क्या मानव, क्या हो रहा है यहां?’ तब मुझे अचानक यह बात बहुत ही डरावनी जान पड़ी कि अब दुबेजी कभी भी यहां नहीं आएंगें...। तब शायद मैंने पहली बार उनका ना होना महसूस किया था... मैंने एक गहरी सांस भीतर ली....  मेरे दिमाग़ में एवम्‍ इंद्रजीत नाटक धूमने लगा.. फिर इंशा अल्लाह के कुछ दृश्य... फिर मुझे धर्मवीर भारती की बात याद हो आई... ’ईर्ष्या कुछ नहीं मुझे यद्यपि मैं ही वसंत का अग्रदूत- निराला।’ उनके हिसाब से दुबेजी पर यह पंक्ति पूरी तरह लागू होती थी। फिर मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की वह कविता याद हो आई जो मैंने कुछ महिनों पहले दुबेजी को सुनाई थी... “आराम से भाई ज़िदग़ी ज़रा आराम से... तेज़ी तुम्हारे प्यार की बर्दाश्त नहीं होती अब...” दुबेजी को यह कविता बहुत पसंद आई थी... उन्होंने कहा था कि ’यह मुझे लिख कर दे दो...।’ मैं उन्हें यह कविता दे नहीं पाया था। फिर अकेले खड़े रहने की हिम्मत नहीं हुई... मैं वापिस सारे लोगों के बीच शामिल हो गया.... जो अभी भी दुबेजी के किस्से में जी रहे थे... जो सभी उनके दोस्त थे।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-7998860350849257512?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/7998860350849257512/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=7998860350849257512&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/7998860350849257512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/7998860350849257512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2012/01/blog-post_18.html' title='दुबेजी...'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-jzJTQ_G2JNw/TxY5Y-zPOqI/AAAAAAAAAvo/nmF9u1DX5Yc/s72-c/Photo0180.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-6422181120204933616</id><published>2012-01-18T08:37:00.001+05:30</published><updated>2012-01-18T08:40:03.782+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>PLAYWRIGHT...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-yvt7ziAdcd4/TxY3_GvkGXI/AAAAAAAAAvc/ltZs9wFm4E8/s1600/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 346px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-yvt7ziAdcd4/TxY3_GvkGXI/AAAAAAAAAvc/ltZs9wFm4E8/s400/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5698803935765338482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;If someone came up to me wanting to know what it takes to be a playwright ….I’m almost sure of finding  myself with very little to say. Before anything else, I’ll ask myself why it is that I write? Is it my love for theatre, my passion ,the madness….?  All but a farce…..because after so many years perhaps all this should have begun to lose its shine. My reasons lie elsewhere.  The truth is , that writing a play or writing itself, for that matter, is seamlessly woven into the fabric of my being. There is never the need for any effort towards wanting to write…. I find myself thinking about writing almost all day…in gatherings…around friends….anywhere , it lingers in my thoughts like a lover.  Kafka eloquently phrased that , ‘To write I need death like silence’. Now that brings me to my very next question, which is, how important is it to write for me?  To answer which I quote Rilke , who once said to a young poet that  ‘Ask yourself in the quietest hour of the night, is writing a primary necessity?  The answer  must be a ‘yes’ if you’re living all alone and apart from yourself, can turn to no one.’ &lt;br /&gt;The journey of a writer, having lived all this silence and solitude, begins not with his first play…but with his second. Because that is where, comes in the dilution of the expectations of his audience. The juncture where he finds himself having to walk the line between what it is that he wants to write vis-à-vis that which he should.  &lt;br /&gt;In my limited experience, I have seen that a writer who tends to create anything with his audience in mind is more often than not lost. He ends up in a space where whatever he churns out is projected outwards rather than inward. The real graph or the complete circle of the life of a writer comes alive only when he can’t and doesn’t repeat his work irrespective of the consequences. And in that circle what matters most is how entertained he remains with the constant surprise element in his work for him. &lt;br /&gt;Does a play change the world, a society, a country ? No. It’s a momentary form of art that caters to a niche audience lasting not more than a couple of hours. Its like life itself , where what you experience for that time in space is nothing more than a memory right after its lived. Which is what brings so much beauty to theatre and to the eyes that witness it. “Literature doesn’t give one water , all it gives is a realisaion of an unquenchable thirst. When in a dream you drink water, on waking you realise how thirsty you actually were. “  I find that Nirmal Verma’s words beautifully sum up the taste of living around theatre for me.  &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-6422181120204933616?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/6422181120204933616/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=6422181120204933616&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/6422181120204933616'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/6422181120204933616'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2012/01/playwright.html' title='PLAYWRIGHT...'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-yvt7ziAdcd4/TxY3_GvkGXI/AAAAAAAAAvc/ltZs9wFm4E8/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-3679447065805011135</id><published>2012-01-03T20:48:00.001+05:30</published><updated>2012-01-03T20:50:43.715+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>खिड़्कियाँ....</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-6mrRJlSXx0Y/TwMco8G8x1I/AAAAAAAAAvQ/SuOZQx3Svhk/s1600/Photo-0016.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-6mrRJlSXx0Y/TwMco8G8x1I/AAAAAAAAAvQ/SuOZQx3Svhk/s400/Photo-0016.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5693425843582060370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इस तरह की अकेली दौपहरें... ना जाने कितनी खिड़कियों के साथ मैंने काटी हैं..। मेरा सबसे सुंदर वक़्त इन खिड़कियों से झांकते हुए ही बीता है...।   &lt;br /&gt;एक खिड़की मुझे याद आती है... शायद जीवन की पहली खिड़की... बारामुला, खोजाबाग़ (कश्मीर...)... जहाँ से मुझे अपने आंगन में उगे हुए पौधीना के पौधे दिखते थे...उनकी खुश्बू...। बर्फ गिरने पर बुखारी की गर्मी में रजाई में लिपटा हुआ मैं खिड़की से उन बर्फ के गोलों को देखता जिन्हें मेरे और मेरे भाई ने मिलकर बनाए थे..। एक बार वहां से मैंने अपने आंगन की दीवार पर से एक चोर को भी भागते हुए देखा था...। वह चोर दौपहर में बाहर सूख रहे कपड़े चोरी करता था। एक दिवार से दूसरी दीवार पर छलांग मारते वक़्त वह लड़खड़ा गया था... और तब उसने मेरी तरफ देखा था। मैं अपनी खिड़की में बैठा था... हम दोनों की आंखे कुछ देर के लिए फसी थी.. फिर वह भाग गया था। बरसों तक मैं उस चोर की शक्ल नहीं भूल पाया था...। वह भागते हुए बहुत बेचारा दिख रहा था... मुझे उस वक़्त तक पता था कि चोर खूंखार होते हैं.. पर वह बहुत बैचारा था.. दयनीय.. भूखा..। बाद में पता चला कि वह पकड़ा गया है...। मुझे उसके पकड़े जाने पर बहुत पचतावा हुआ था...। उस खिड़की से कुछ दूरी पर पहाड़ भी दिखता था... मैंने बड़े सपने देखे थे कि एक दिन उन पहाड़ों पर जाऊंगा पर हमें खोजाबाग़ छोड़ना पड़ा...। वहां के कौए मुझे बहुत याद आते हैं... एक कौओं का परिवार था... पापा कहते थे कि यह मेरे जासूस कौए हैं.. यह मुझे सारी रिपोर्ट देते हैं तुम्हारे बारे में...। आज भी कौओं को देखकर मैं सचेत हो जाता हूँ।&lt;br /&gt;दूसरी खिड़की..... श्रीनगर की खड़की दूसरी मंज़िल पर थी... मैंने वहाँ से चीलों को देखा है...। कई लम्बीं दौपहरों में जब मैं शहतूत के पेड़ पर नहीं छुपा होता था तो मैं खिड़की से चीलों को देखा करता था। कुछ चींलो को मैं पहचानने भी लगा था। उसमें एक बूढ़ी चील थी... जिसके परों को झड़ते हुए मैंने देखा था... (मैं उस देयनीय चोर के बार में कभी नहीं लिख पाया.. पर बूढ़ी चील को मैं लिख चुका हूँ)। मैं वह दिन कभी भी भूल नहीं पाया हूँ.... आज भी जब कभी मैं चीलों को देखता हूँ तो मुझे श्रीनगर की वह खिड़की याद आती है..।... और याद आता है सुंदर नीला आकाश... सफेद रुई जैसे बादलों से सजा हुआ। चील की उड़ान में..उसके किसी पेड़ पर आकर बैठने में संगीत है.. मैं चील को देखते हुए कभी बोर नहीं हो सकता हूँ।&lt;br /&gt;फिर चहल पहल से भरी हुई खिड़की जीवन में आई... होशंगाबाद की खिड़की...। यही वह जगह थीं जहां मुझे पहली बार चीलों-पहाड़ों से अलग... लोगों के मैले में मज़ा आने लगा...। मेरे घर की खिड़की से एक कुंआ दिखता था, जिसमें मेरी जाने कितनी गेंदें गुम चुकी हैं...। उस कुंए के ठीक बग़ल में मुझे मोहन का टप दिखता था... आह!!... गोली बिस्किट... खटाई, पोंगापंड़ित.. और जाने क्या-क्या उसकी छोटी सी दुकान में होता था। मैं अपने पैसे अपने जेब में नहीं.. बल्कि मुंह में लिए हुए घूमता था... एक दौपहर... दौपहर महत्वपूर्ण है क्योंकि दौपहर में ही उसकी दुकान पर बहुत कम लोग होते थे... सो एक दौपहर मैं उसकी दुकान में गटागट लेने गया.... जब मैंने उसे अपने मुंह से पैसे निकालकर दिये तो उसने मुझे गटागट की गोली देने से इंकार कर दिया... मैंने वह पचास पैसे का सिक्का उसके सामने अपनी शर्ट से साफ किया... पर ना!!! बाजू के नल से उसे धोया-सुखाया... पर वही.. ना!!! इतनी बड़ी बेईज़ती उस छोटी सी उम्र में मेरे बर्दाश्त के बाहर थी...। सो मैंने कसम खाई कि मैं कभी इसकी दुकान से कुछ भी नहीं खरीदूंगा.. और इसे बर्बाद करके दम लूंगा। बर्बाद कैसे किया जाता है.. उसका कोई भी सिर-पैर मुझे नहीं पता था... बस गुस्सा बहुत था...। अब आप ही बताओ कि... गटागट के लिए मुंह पानी से भरा था, जेब में पैसे थे.. पर गटागट नहीं मिली... ऊफ!!! कोई भी इस तक़लीफ को अब कैसे समझ सकता है? खैर मोहन को बर्बाद करना है इस बंदोबस्त में मैं लग गया.... सो मैं उसका पीछा करने लगा...। पीछा करते-करते मैंने जान लिया कि वह अपना सामान कहां से लाता है... सो एक दिन मैं उस थोक की दुकान पर गया... और पूरे तीस रुपये का माल वहां से उठा लिया... (मुझे आज तक नहीं पता कि वह तीस रुपये मेरे पास कहां से आए...।) अब मेरी खिड़की... जिसके ठीक सामने मोहन की दुकान थी... उसी खड़्की में मैंने मोहन के विरुद्ध गोली-बिस्कुट की दुकान खोल ली थी...। मैंने लगभग छ: महीने वह दुकान चलाई... मुझे याद नहीं कि मैंने कभी अपनी दुकान में गटागट खाई थी..। मैंने शायद उसके बाद कभी भी गटागट की गोली नहीं खाई...। अपनी दुकान चलाने की व्यस्तता में... मोहन से बदला लेने वाली बात भी मैं भूल गया..। उन छ: महिनों में मेरा पूरा मोह गोली-बिस्कुट से उठ चुका था.. मैं उन छ: महिने में बड़ा हो गया था.. शायद। &lt;br /&gt;यह उस खिड़की की कहानी थी...। इसके अलावा मैने उस खिड़की से... अजीब-अजीब लोगों को देखा.. मृत्यु देखी.. जीवन देखा... और जो सबसे खूबसूरत चीज़ देखी.. जिसके प्रेम में मैं आज तक हूँ.. वह थी बारिश...। बादलों का धीरे-धीरे नमी भरे माहौल में आना.. तेज़ हवाओं का चलना.. और झर-झर... बारिश.. मिट्टी की खुश्बू... आह!!! पहली बारिश में भीगना अच्छा होता है.... (पता नहीं कहां यह बात सुनी थी।) हर पहली बारिश में मैं ज़ार-ज़ार भीगा हूँ...। मैंने देर रात भी बारिश देखी है... बल्ब की रोशनी खिड़की के आकार में बाहर पड़ जाती थी... उसमें मेरे होने की परछाई के अलावा... बाक़ी जगह में पानी का बहना देखना.. मुझे जादुई लगता था। मेरी बहुत इच्छा होती कि इस बहते पानी के पीछे-पीछे मैं उसके अंत तक जाऊं... उसका अंत देखूं... कहां जाकर यह पानी ठहर जाता है..? &lt;br /&gt;मेरे बचपन की यह तीन खिड़कियां... मुझे सपनों के बायस्कोप जैसी लगती हैं..। पहली खिड़की से मैंने बर्फ देखी.. दूसरी से कश्मीर का नीला आसमान... तीसरी खिड़की से बरसात। इस उम्र तक आते-आते मैंने जाने कितने घर बदले हैं.. पर हर घर में घुसते ही मैं सबसे पहले उस घर की खिड़की देखता हूँ...। अगर वह एक नए मौसम की तरफ खुलती है तो मैं झट से उस घर में रहने लगता हूँ। इन्हीं खिड़कियों के कारण मुझे अकेली लंबी दौपहरे बहुत पसंद है...  और मैं कभी इनसे बोर नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-3679447065805011135?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/3679447065805011135/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=3679447065805011135&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/3679447065805011135'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/3679447065805011135'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2012/01/blog-post_03.html' title='खिड़्कियाँ....'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-6mrRJlSXx0Y/TwMco8G8x1I/AAAAAAAAAvQ/SuOZQx3Svhk/s72-c/Photo-0016.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-4902855811811710346</id><published>2012-01-01T21:08:00.003+05:30</published><updated>2012-01-02T09:03:58.386+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>आजकल मैं लड़ रहा हूँ....</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-urcE56PUPdI/TwB-rAa0F1I/AAAAAAAAAvE/Hikm12y2KhE/s1600/00090036.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 265px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-urcE56PUPdI/TwB-rAa0F1I/AAAAAAAAAvE/Hikm12y2KhE/s400/00090036.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5692689206308247378" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(एक नाटक लिखने के ठीक पहले.....)&lt;br /&gt;’आजकल मैं लड़ रहा हूँ.... मैं अभी भी लड़ रहा हूँ... पिछले कई दिनों से मैं लड़ रहा हूँ...’&lt;br /&gt;एक झटके में सन्नाटा छा जाता है... चुप... दूर कहीं कुछ खोजता सा एक आदमी दिखता है...। क्या पूर्ण है? किसे जी लेने से शांति मिल जाएगी? कौन से शब्द इस हड़बड़ी को चुप कर देंगें? वह शब्दों की तलाश में हर कोने कुछ देर रह लेना चाहता है...। रह लेने दें... ऎसे कोने अब घर में नहीं बचे है.. हर कोना अपनी बैचेनी लिए कब से उसका इंतज़ार कर रहा था। वह उस अटपटेपन में फिर घर में गोल-गोल चक्कर काटने लगता है। बहुत सारा कुछ कह लेने की कुलबुलाहट से वह एक खाली पन्ना तलाशता है... ख़ाली कोरे पन्ने बहुत ज़िम्मेदारी लिए आते हैं..। हर शब्द.. हर वाक़्य एक कहानी का दरवाज़ा खोल देता है... कोई एक बैचेनी जिसे कह कर उस बैचेनी को छूट जाना होता है...। हर बैचेनी अपने किस्से के साथ उसकी कलम की नोक पर बैठ जाती है। कलम की नोक़ के भारीपन में वह अपनी कलम में काली सियाही भर लेता है। पहली बात लिखने के पहले ही उसके कोरे पन्ने पर बहुत से चहरे घूमने लगते हैं.... किसे लिख कर आज़ाद कर दे? पर उसकी खुद की आज़ादी का क्या? वह कब आज़ाद होगा? उसकी अपनी तड़प कब शांत होगी...? उसने सोचा कि कुछ ऎसा लिख दूं कि हर कोने की बैचेनी ख़ाली हो जाए...। उसने लिखा ’आजकल मैं लड़ रहा हूँ.... मैं अभी भी लड़ रहा हूँ... पिछले कई दिनों से मैं लड़ रहा हूँ...’ वह यह लिखकर चुप दीवारों को ताक़ता रहा... कहीं कोई भी हलचल नहीं थी...। उसने कुछ कोनों की तरफ नज़र दौड़ाई... वहां बस एक चुप अजनबीपन था.. बैचेनी से चिपका हुआ। यह क्या लिख दिया? इसका क्या संबंध है उस किसी भी तड़प से जिससे वह छुटकारा पाना चाहता है? उसे हंसी आ गई... यह लेखक का कमीनापन है... जब कोई एक बात अपनी पूरी छटपटाहट पर होती है तो वह ठीक उसके उलट बात लिखना शुरु कर देता है... इस तरह वह बदला लेता है... पर किससे? क्या उन छोटी बातों से जो कभी किसी सन्नाटे में उसने ही पैदा की थीं... जिन्हें वह घर के किसी कोने में रख कर भूल गया था? पर वह अचानक बहुत हल्का महसूस करने लगा था। यह बदला उसने घर के हर कोने की बैचेनी से लिया था... उसकी क़लम हल्की हो गई...। कोरे कागज़ पर उभरे सारे चहरों पर से उनके नाम पिघल कर टपकने लगे। वह आदमी इस सुख को छिपा ना सका... उसकी हंसी में बदला था... अपने ही, बीच में छूटे हुए, अनकहे सत्य से बदला..। एक फांस गड़ने की तकलीफ को कम करने के लिए दूसरी बड़ी फांस को अपने भीतर गड़ा लेना... वह खुश था..। उसे भी पता था कि इस पीड़ा से हास्य उभरेगा... वह हास्य लिखेगा...। &lt;br /&gt;यह कई साल पुरानी बात है...। आज वह नाटक कई जगह खेला जा रहा है... पर आज भी जब कभी वह अपने नाटक के कुछ वाक़्य सुनता है तो उसे उस सघन शांम की याद हो आती है.. जब एक झटके में सन्नाटा छा गया था। ऎसे दिनों में जब भी वह घर वापिस जाता है तो घर में घुसते ही वह एक छोटा लाल रंग का लेंप जलाता है...। पूरे घर में बिखरा उजाला उससे सहन नहीं होता...। वह घर के कोनों को अंधेरे में ही रहने देता है..। उन कोनों की बैचेनी अभी भी उसका उसी शिद्दत से इंतज़ार कर रही हैं.... पर वह बदला लेने जैसे वाक्य के बिना किसी भी खाली पन्ने के करीब नहीं जाना चाहता है...। उसकी व्यस्तता उसका हथियार है... दिन में सूरज की रोशनी में जब सब कुछ साफ दिखता है तब वह बहुत से कामों का सिलसिला अपने आस पास उगाए रखता है...। वह सारे कामों के सिलसिले शाम तक पेड़ बन जाते हैं जिनमें कोई भी फल नहीं उगता...। बस उसकी समस्या शाम से शुरु होती है.. जब बिना फल के पेड़ उसकी भूख को चिढ़ाने लगते हैं...। तब ऎसे कई क्षणों में वह अपने लिखे हुए हास्य पर बात करने लगता है...बिना रुके.. बड़बड़ाता हुआ सा... तेज़ गवार हसी हंसता हुआ...।  &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-4902855811811710346?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/4902855811811710346/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=4902855811811710346&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/4902855811811710346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/4902855811811710346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='आजकल मैं लड़ रहा हूँ....'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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src="http://3.bp.blogspot.com/-Wie0F0XCRD0/TumYQ9-sGwI/AAAAAAAAAu4/JEERgVOCSf8/s400/bitrdyhands.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5686243421814790914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बहुत पहले मैं एक लड़की को जानता था जो चिड़िया हो जाने का सपना देखा करती थी। &lt;br /&gt;हम अकसर एक दूसरे से अपने सपनों की बात करते थे... बात हम सीधी करते थे पर मुझे वह सारी बातें सपनों सी लगती थीं। मैं उससे जब भी कहता कि मुझे मेरे सपने कभी याद नहीं रहते... तो वह हंस देती थी...। वह कहती थी कि यह कोई रटने वाली चीज़ थोड़ी है जिसे याद रखना होता है!!! उसे सब याद था...। उसके सपनों का दायरा बहुत बड़ा था... वह बचपन की घटनाए भी सपनों की तरह सुनाती थी। &lt;br /&gt;एक चिड़िया का घोंसला उसके घर के ऊपर था... जब भी वह टूटे हुए अंड़ों को देखती तो उदास हो जाती... कभी-कभी उसे चिड़िया के छोटे बच्चे भी नीचे पड़े हुए दिखते जिन्हें वह बिना हाथ लगाए वापिस धोंसलों तक पहुंचा देती। उसके बचपन की कई दोपहरे चिड़िया के धोंसले की पहरेदारी में बीतती थी। एक दिन उसने सपना देखा था कि वह एक चिड़िया के धोंसले में पड़ी हुई है...दूसरे चिड़िया के बच्चों के साथ। वह अपने परों को निकलता हुआ देख सकती थी...। धीरे-धीरे उसकी उम्र के बच्चे.. अपने परों को झटके के साथ खोलकर धोंसले से कूदने लगे थे.... और ऊपर आसमान में उड़ने लगे... वह अकेली रह गई थी.. डरी हुई। अब उसकी बारी थी। उसने उड़ने की तैयारी की.. अपने परों को झाड़ा... फैलाया..। वह धोंसले के कोने तक आई.... और ऊपर आसमान को देखने लगी...। वह कूदने ही वाली थी कि उसे नीचे एक भूखी बिल्ली दिखी जो उसका इंतज़ार कर रही थी...। उसने एक गहरी सांस भीतर खींची और अपने परों को चौड़ा करके धोंसले से कूद गई.... कूदते वक़्त उसने अपनी आंखें बहुत कस कर बंद कर ली थीं। तभी उसकी नींद खुल गई..। &lt;br /&gt;हम लोग नदी किनारे धूम रहे थे जब उसने मुझे यह सपना सुनाया था। उसके सपने हमेशा बीच में कहीं खत्म हो जाते थे... हमेशा अंत होने के पहले उसकी आँखें खुल जाती थी। ’फिर क्या हुआ?’ जैसे प्रश्नों की मैं झड़ी लगा देता... जवाब में वह सिर्फ यही कहती की ’बस मैंने इतना ही देखा था।’ वह कहती थी कि हमें हमेशा अधूरे सपने याद रहते हैं... बीच की ख़ाली जगह... आधे कहे हुए संवाद... चुप्पी...। मुझे सपने याद नहीं रहते थे... मेरे सपने अपना अंत लेकर आते थे शायद... मुझे यूं भी अंत की हमेशा चिंता रहती थी...। किसी भी कहानी को पढ़ते हुए मैं उसके अंत का बोझ अपने कंधे पर लिए हुए उसे पढ़ता... अगर अंत अच्छा होता तो मुझे कहानी पसंद आती वरना मैं चिढ़ जाता। एक दिन उसने मुझसे कहा कि ’तुम पहले कहानी का अंत पढ़ लिया करो... फिर तुम कम से कम कहानी का मज़ा तो ले पाओगे।’ मैं उसकी बात समझता था... पर मैं उसके जैसा नहीं सोच सकता था... मैंने अपना पूरा जीवन भविष्य को देखते हुए जीया था... पर वह कभी भी भविष्य के बारे में बात नहीं करती थी। हम दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर सपनों का ही था। उसे अधूरेपन की आदत थी... और मैं अपने देखे हर सपने को उसकी नीयती तक पहुंचाना चाहता था। &lt;br /&gt;मुझे वह अभी भी याद है। क्योंकि वह बीच में ही वापिस मुड़ गई थी... जबकि मैं आगे चलता रहा। मुझे लगा वह किसी अगले मौड़ पर मुझसे ज़रुर टकराएगी और हम वापिस साथ चलना शुरु कर देंगें... पर ऎसा नहीं हुआ..। वह जिस दिन मुड़ी थी तब से मुझे सपने याद रहने लगे। उसके अधूरे सपनों का अंत मैं अपने सपनों में देखने लगा... उसके जाने के बाद। &lt;br /&gt;काम की तलाश वाली उम्र में मैं उससे मिला था। मुझे लगता था कि यह उन लड़्कियों जैसी है जो सपनों में जीती है। मैं उसे बार-बार खींचकर यथार्थ पर लाता था पर वह हर बार मुझसे छूटकर कहीं चली जाती थी। वह कहती थी कि ”मैं जल्दी से पैंतिस की होना चाहती हूँ.. मुझे यह उम्र बहुत बकवास लगती है। मैं बस पैंतिस होने तक का समय काट रही हूँ।’ वह मेरे हद के बाहर की लड़की थी.. वह जो कहती थी वही जीती थी.. शायद इसीलिए मैं उसकी तरफ इतना आकर्षित हुआ था। मैं उससे अकसर पूछा करता था कि ’हम दोनों एक साथ क्या कर रहे हैं?’ तो वह तपाक से जवाब देती कि ’हम दोनों एक साथ नहीं है..।’ मैंने उसके साथ अपने भविष्य के सपने देखने लगा था... भविष्य के सपने देखना मेरा स्वभाव था... मैं ऎसा ही था... मुझे दुकानों-दुकानों धूमना अच्छा लगता था। हर दुकान के सामने मैं बहुत देर तक खड़ा रहता था... और सपने देखता था.. जब मेरा घर होगा तो मैं यह रंग के पर्दे लगाऊंगा.. इस तरीक़े का फर्नीचर होगा..। मेरे सपने वहीं पर खत्म नहीं होते थे.. मैं उन्हें अपनी डायरी में नोट भी कर लेता था.. उनके दाम के साथ... फिर उसे ज़बर्दस्ति उन दुकानों पर ले जाता और उसकी राय पूछता..। उसे मेरी यह आदत बहुत बचकानी लगती थी.. पर वह हर बार मेरे साथ हो लेती... मुझपर हंसने के लिए.. और मुझे उसका हंसना बहुत सुंदर लगता। मैं हर बार उसे हंसाना चाहता था.. इसलिए अपनी बचकानी आदतों को उसके सामने दौहराता रहता। &lt;br /&gt;एक दिन मैंने उसे एक झूठा सपना सुनाया...। मुझे ऎसा कोई सपना नहीं आया था पर मैंने उससे झूठ कहा कि मैंने कल रात तुम्हारा सपना देखा था कि तुम मेरे साथ पहाड़ों में धूम रही हो..। हमारी शादी हो चुकी है और तुम उड रही हो... मैंने तुम्हें अपने सपने में उड़ते हुए देखा था। इस सपने का उसपर बहुत गहरा असर हुआ था... मैं जानता था वह चिड़िया हो जाने का सपना देखती है। उसने मेरे झूठे सपने में अपनी आँखें बंद कर ली.. और मैं अपने झूठे सपने की उड़ान को रोक नहीं पाया..। मुझे उस झूठ के असर को देखकर चुप हो जाना चाहिए था पर मैं चुप नहीं हुआ... मैं अपने सपने गढ़ने लगा..। हर कुछ दिनों में मैं उसे एक सपना सुना देता... और वह हर बार अपनी आँखें बंद कर लेती। मैंने कभी उसे अपने इतना करीब महसूस नहीं किया था... वह मेरे पास थी... बहुत पास। इन्हीं सपनों के बीच कहीं हमने साथ रहने का फैसला कर लिए...। यह उसका फैसला नहीं था... जब उसकी आँखें बंद थी मैं उसे अपने घर ले जा चुका था। वह मेरे झूठे सपने में थी और मैं उसे सच में अपना बना चुका था। उसने मुझसे शादी नहीं की थी... पर हम साथ रहने लगे थे। मैंने अपने घर को अपने सारे बचकाने सपनों से सजा दिया था... वही पर्दे.. वही फर्नीचर जिसे देखकर वह खूब हंसी थी..। अब वह उन सबके बीच में रहने लगी थी। मुझे लगा था कि वह बहुत हंसेगी पर वह चुप होती गई थी। &lt;br /&gt;उसकी एक आदत थी जिससे मैं बहुत चिढ़ता था... वह अपना हर जॉब कुछ ही महीनों में छोड़ देती थी। वह अपने भविष्य की कुछ भी संभावना देखते ही बिदक जाती थी... तुरंत छोड़ देती... प्रमोशन के लेटर पर वह अपना इस्तिफ़ा कंपनी में दे आती..। मैंने अपनी काम तलाशने की उम्र से जो जॉब पकड़ा था मैं आज भी उसी ऑफिस में था... मैं बार-बार उसे अपना उदाहरण देता कि देखो आज मैं कितना सफल हूँ। वह कभी बहस में नहीं पड़ती थी.. ऎसी बातों में वह हर बार पहाड़ों पर चलने की बात कहती और मैं हर बार बात टाल जाता। &lt;br /&gt;मैंने उसे अपने साथ लगातार धरेलू होते देखा था..। मैं जब भी उसे अपने घर में काम करता हुआ देखता था तो मुझे अजीब सी जीत का अहसाह होता था। जैसे मैंने कोई जंगली जानवर को पालतू बना दिया हो। जैसे...हाथी का दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करना हमें बहुत अच्छा लगता है... शेर हंटर की टाप पर कुर्सी पर बैठ जाए तो हम ताली बजा देते हैं... आसमान में उड़ते हुए पक्षी हो अपने घर के पिंजरे में अपना नाम पुकारते हुए सुनना कितना सुख देता है... मैं उसी सुख में था। &lt;br /&gt;फिर वह दिन आ गया..... &lt;br /&gt;वह रविवार का दिन था। छुट्टी थी... और वह किचिन में आटा गूंद रही थी। मैंने पूछा &lt;br /&gt;’क्या कर रही हो”&lt;br /&gt;तो वह कहने लगी कि.. &lt;br /&gt;’मैं पूरियां बना रही हूँ।’&lt;br /&gt;’पूरियां क्यों? आज कोई त्यौहार है क्या?’&lt;br /&gt;’ना... इस महीने मैं पैंतिस की हो जाऊंगी।’&lt;br /&gt;’इस महीने मतलब... तुम्हारा जन्म दिन कब है?’&lt;br /&gt;’जन्म दिन का पता नहीं है... पर इसी महीने कभी है। मैं खुद को पैंतिस महसूस कर रही हूँ...। मैं अपने परों को बड़ा होते देख सकती हूँ।’&lt;br /&gt;’मैं पैंतिस की हो जाऊगीं...’ के बाद मुझे नहीं पता कि वह क्या कह रही थी..। मैं बार-बार उसका उड़ना सुन रहा था... मैं डर गया। मुझे उसका सपना याद था.. वह चिड़िया होना चाहती थी हमेशा से...। वह बस पैंतिस होने का इंतज़ार कर रही थी। &lt;br /&gt;’तो अब तुम क्या करने वाली हो?’&lt;br /&gt;’पूरियां बनाऊगीं और पतली आलू टमाटर की सब्ज़ी।’&lt;br /&gt;’नहीं मेरा मतलब है.. पैंतिस होते ही क्या करोगी?’&lt;br /&gt;’उड़ जाऊंगी।’&lt;br /&gt;वह अपनी बातों में एकदम सहज थी..। मैं डर गया..। इस बार मैंने उससे कहा..&lt;br /&gt;’सुनों मैं एक हफ्ते की छुट्टी ले रहा हूँ ऑफिस से... चलो कहीं पहाड़ों पर चलते हैं।’&lt;br /&gt;’ना... मेरी इच्छा नहीं है..।’&lt;br /&gt;’अरे तुम ही कहा करती थीं... पहाड़ों पर जाना है.. अब क्या हुआ?’&lt;br /&gt;’बस... इच्छा नहीं है...।’&lt;br /&gt;वह बहुत खुश दिख रही थी..। उसकी आँखों में जंगलीपन वापिस दिखने लगा था..। वह मेरे साथ रहकर.. या मुझे सहकर सिर्फ पैंतिस होने तक का वक़्त काट रही थी। वह पैंतिस होते ही उड़ जाएगी...। मुझे लगा मैं किसी पिंजरे में बंद शेर के पास खड़ा हूँ.... जिसे पता है कि वह जब चाहे तब पिंजरा तौड़कर भाग सकता है.. इसलिए वह उस पिंजरे में खुश है... शांत है.. पूरियां बना रहा है। मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मै क्या करुं.. इसे पालतु बनाना मेरा भ्रम था.. यह कभी भी मेरा बनाया हुआ पिंजरा तोड़कर चली जाएगी। मेरे सपने... उनका क्या..? झूठे ही सही... पर मैंने उन्हें अपनी पूरी शिद्दत से देखा था... उन्हें मैं उनकी नीयती तक पहुंचाना चाहता था। मुझे कुछ हो रहा था.. मैं ऊपर से नीचे तक कांपने लगा।&lt;br /&gt;’सुनों मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।’&lt;br /&gt;मैंने कुछ ऎसे कहा मानों मैं कह रहा हूँ कि मैं तुम्हें उड़ने नहीं दूंगा। &lt;br /&gt;’क्या कह रहे हो तुम?’&lt;br /&gt;’मैं तुम्हें उड़ने नहीं दूंगा।’&lt;br /&gt;इस बार मेरे मुँह से उड़ना ही निकला.. पर मैं रोक नहीं पाया...। मैंने उसे बहुत कसकर पकड़ लिया...।&lt;br /&gt;’अरे क्या कर रहे हो तुम... तेल गर्म है... जाओ यहाँ से...। अरे मुझे लग रही है। तुम... दूर रहो..।’&lt;br /&gt;उसने मुझे धक्का दिया मैं फर्श पर आकर गिर गया। मुझे सब कुछ छूटता हुआ दिख रहा था.. मेरा सपना.. मेरा भविष्य...। मेरी आँखों में अजीब सी जलन हो रही थी जिसकी वजह से मेरी आँखों से लगातार पानी आ गिर रहा था। वह डर रही थी... वह डर के मारे सोफे के ऊपर चढ़ गई.. मैं अभी भी फर्श पर था। मुझे लगा कि वह सोफे के ऊपर से छलांग लगाएगी और उड़ जाएगी... मैं भूख़ी बिल्ली की तरह बस उसके फर्श पर गिर जाने का इंतज़ार करुंगा..। मैं अपनी पूरी ताकत से उठा और उसकी और झपट्टा मारा..। मैं उसे रोकना चाहता था। वह कुछ बड़बड़ाए जा रही थी पर मुझे बार-बार उसके उड़ जाने का डर था.. सो मैं बस उसके परों को ज़ख़्मी कर देना चाहता था। वह इस तरह मुझे छोड़कर नहीं जा सकती थी। कुछ देर की हथापाई में मैंने अपने सिर पर किसी कठोर चीज़ का प्रहार सा महसूस किया... शायद वह कुकर था... या कढ़ाई.... पता नहीं पर मैं बेहोश हो चुका था।&lt;br /&gt;जब नींद खुली तो मैं अपने घर में अकेला था... वह कहीं भी नहीं थी। मैंने उसे बहुत ढ़ूढ़ने की कोशिश की पर वह उसके बाद मुझे कभी नहीं मिली...। मैंने अपने झूठे सपनों में उसे कुछ सालों तक फसाए रखा था... बस... या शायद वह मेरे झूठे सपनों के बारे में जानती थी पर उसे पैंतिस होने तक का वक़्त काटना था... सो वह मेरे झूठ के साथ बनी रही। मैं हमेशा भ्रम में ही था... कि वह मेरे प्रेम में धरेलू हो चुकी है... वह अपने सपनों से बाहर आ चुकी है.. और मेरे यथार्थ में जीने लगी है...। पर ऎसा नहीं था... वह हमेशा सपने में ही थी..। उसने एक बार कहा था कि ... ’जो सपना देखता है... वह कभी भी उड सकता है...।’ वह उड़ चुकी थी..।&lt;br /&gt;यह बहुत पुरानी बात है..। आज रात सच में मैंने उसका सपना देखा था कि वह पहाड़ों में देवदार के एक वृक्ष पर बैठी मुझे देख रही है... जब तक मैं उसका नाम पुकारता वह उड़ चुकी थी... दूर पहाड़ों की ओर...।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-5622156933364386569?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/5622156933364386569/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=5622156933364386569&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/5622156933364386569'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/5622156933364386569'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='सपना....'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-Wie0F0XCRD0/TumYQ9-sGwI/AAAAAAAAAu4/JEERgVOCSf8/s72-c/bitrdyhands.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-738808974078737846</id><published>2011-10-23T09:51:00.001+05:30</published><updated>2011-10-23T09:52:34.670+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>जूते.. चप्पल...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-jKHcJrubQBo/TqOWfj4mzsI/AAAAAAAAAuc/LvyVLKIIHOE/s1600/12.-The-Tiny-Left-Foot-Sleeper-2003-by-Danny-C.-Sillada-Ballpoint-on-Paper-11-X-10.5-inches.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-jKHcJrubQBo/TqOWfj4mzsI/AAAAAAAAAuc/LvyVLKIIHOE/s400/12.-The-Tiny-Left-Foot-Sleeper-2003-by-Danny-C.-Sillada-Ballpoint-on-Paper-11-X-10.5-inches.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5666538225114992322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कितना सारा काम है..? जिसे निभाने की कसमों के बीच एक अदना छिछला आदमी है जो आदमी के रुप सा ना होकर...जानवर सा दीख पड़ रहा है। धीमे कदमों से हंसता हुआ आतंक सीड़ीयां चढ़ रहा है...। वह सीड़ीयां उतर रहा है की सोच मन में लिए मैं उसका इंतज़ार नहीं कर रहा हूँ...। वह फिर भी चला आ रहा है....। मैंने अपने कुछ जूते खड़की की सलाखों से बांधकर बाहर की तरफ टांगे हुए हूँ..। वह कभी मेरे काम आएगें... जब मैं बाहर निकल चुका होऊंगा और जल्दी में जूते पहन्ना भूल चुका होऊंगा..। जूता कितना मेरा साथ दे देगा...? मैं कितनी देर तक उसका साथ दे पाऊंगा यह प्रश्न मैं हमेशा खुद से करने से डरता हूँ। जूता चलना चाहता है... मैं उसे अपने कमरों में मुझे ताकते हुए देखता हूँ.... हर बार की उन प्रश्नवाचक जूताई निगाहों से बचने के लिए मैंने उन्हें एक दिन अपनी खिड़की की सलाखों से बाहर की तरफ लटका दिया था। सो जब भी बाहर निकलता हूँ तो एक बेपरवाही होती है। बहुत लंबे कही नहीं जाता हूँ... कुछ दूर जाकर लौट आता हूँ... चप्पल पर ज़्यादा दूर जाया नहीं जा सकता है..। जूता लंबी यात्रा की याद दिलाता है... जूता उपन्यास जैसा है जिसे मैं कभी भी लिख नहीं पाया... चप्पल छोटी कहानियों जैसी है जिसे पहनकर मैं यहाँ वहाँ टहल आता हूँ...। इन सब में नाटक नंगे पैर चलने सा है....।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-738808974078737846?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/738808974078737846/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=738808974078737846&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/738808974078737846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/738808974078737846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='जूते.. चप्पल...'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-jKHcJrubQBo/TqOWfj4mzsI/AAAAAAAAAuc/LvyVLKIIHOE/s72-c/12.-The-Tiny-Left-Foot-Sleeper-2003-by-Danny-C.-Sillada-Ballpoint-on-Paper-11-X-10.5-inches.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-6529008494541962843</id><published>2011-09-23T07:24:00.002+05:30</published><updated>2011-09-23T07:27:00.311+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>Toji.... (land...)</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-Fosgns1OmKo/TnvnWPYCWGI/AAAAAAAAAuU/uGQ2V1vgZOA/s1600/DSCF2617.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-Fosgns1OmKo/TnvnWPYCWGI/AAAAAAAAAuU/uGQ2V1vgZOA/s400/DSCF2617.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5655368126364276834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रार्थना की सी शांति है यहाँ...। अपने आपको कभी इतने अकेले में देखा नहीं था... जिया नहीं था.. ख़ासकर जब भाषा, ख़ाना, लोग सब कुछ अलग हों....। मैंने अकेलेपन की कल्पना की थी.... पर यह शायद उस कल्पना का और सुलझा रुप है। यहाँ Toji, Korea में शांति अपने पूरे सन्नाटे में है...  यहाँ कभी कभी लगता है कि आप किसी कटीली तारों के बीच फसे हो.. अगर ज़्यादा तड़पोंगे तो खुद ही ज़ख़्मी होगे... इससे छुटकारा नहीं है... यूं छुटकारे की इच्छा भी नहीं है..। यहाँ हर दिन नया है... कभी एकदम नए विचारों की लहर है तो कभी पुराने बीते दिनों की ठंड़ी हवा... पर कभी एक दिन दूसरे दिन जैसा नहीं गुज़रा...। &lt;br /&gt;एक चीज़ रोज़ तय है .... रात के खाने के बाद सबके साथ एक लम्बी walk  पर जाना...। हर walk पर मैं खुद को थोड़ा ज़्यादा बूढ़ा महसूस करता हूँ। इस सारे लेखकों के बीच में मैं सबसे young हूँ.. बाक़ी सबकी उम्र लगभग पैंतालीस पार कर चुकी है...। औरते ज़्यादा हैं.... और चूकि कोरियन संस्कृति भारतीय संस्कृति से बहुत मेल ख़ाती है तो कहना चाहिए कि मेरे पास करीब छ: माँए है.... सभी मेरा इतना ज़्यादा ख़्याल रखती हैं कि कभी-कभी मैं खुद को बहुत बच्चा सा महसूस करता हूँ। हर रोज़ टहलते हुए वह सब चिल्लाते-चहकते हुए बात करते हैं.... मैं चुप्प उस भाषा का संगीत सुनता हुआ चलता हूँ। यदा-कदा कोई टूटा फूटा अंग्रेज़ी का शब्द कहकर मुझे भी बात-चीत में शामिल रखना चाहता है.. पर मेरे जवाब के साथ वह कोशिश भी वहीं खत्म हो जाती है। पहले एक हफ्ते तो सभी मुझसे झेंप रहे थे.... उसका कारण अंग्रेज़ी भाषा था जो मुझे बाद में समझ में आया। पर एक बहुत ही विचित्र बात है.. कि बिना भाषा जाने.. बिना बहुत बात किये मेरा सब लोगों से एक नए तरीक़े का आत्मीय संबंध बन चुका है। &lt;br /&gt;एक poet हैं... MOON-YOUNG HOON जो पिछले पच्चीस सालों से पेरिस में रहते हैं.. वह फ्रेंच और कोरियन में कविताए लिखते हैं। मैंने अपने जीवन में इतना शांत और मुस्कुराता हुआ चहरा कभी नहीं देखा... उनकी शांति और आँखों की उनकी मुस्कान से रंज होता है...। बीच में जब मैं कुछ परेशान था तब एक वह ही थे जो मुझे कुछ इस तरह देखते थे मानों सब समझते हो.. सब जानते हों...। मैं उन्हें बहुत पसंद करने लगा हूँ.... पर बात चीत नामुमकिन है... मैं सिर्फ उनसे दिन और रात के खाने पर ही मिलता हूँ...(वह हमारे साथ लंबी walk पर कभी नहीं आते...) पर उनसे आत्मीयता कुछ इतनी बढ़ गई है कि जब कोई उनकी जगह बैठता है तो मैं मना कर देता हूँ.. ’कि वह उन poet की जगह है...’, जब वह कभी खाने नहीं आते तो मैं थोड़ा विचलित हो जाता हूँ। &lt;br /&gt;यहाँ बहुत से लेखक हैं, कम्पोज़र है और पेंटर... जिनमें से चार महिलाएं सिर्फ बच्चों के उपन्यास लिखती हैं...। उसमें से एक हैं... BAEK-SUNG NAM जिन्होंने एक किताब मुझे gift की जिसका नाम KING OF WOLF  है... अब किताब कोरियन भाषा में है... पर वह इतनी ज़्यादा उत्साहित थी मुझे किताब देने में मानों मैं अभी पूरा उपन्यास पढ़ लूंगा... मैंने उनको बहुत बहुत धन्यवाद कहा... (ख़नसा हम निदा...) पर मैंने उनसे विनती की कि कृप्या करके वह इसकी कहानी मुझे बता दें...(किताब सचित्र थी..) जैसे-तैसे अपना पूरा समय लेते हुए.. टूटी फूटी अंग्रेज़ी में कुछ वह बता पाई.. कुछ कहानी मैंने गढ़ ली..। फिर मैंने लगभग सभी किताबों की कहानिया सब से सुनी..  और बहुत सुंदर बात यह लगी कि... बच्चों की कहानियों में मृत्यु थी... परिवार का बिख़रना था... शोक था... खुशी थी....। एक महिला तो बच्चों की संजीदा कहानियाँ ही लिखती हैं....उनका नाम KANG-SOOK TN है... उनके पैर में कुछ समस्या है... अभी-अभी पिछले दो हफ्तों से वह मेरे साथ अंग्रेज़ी में कुछ शब्द.. कुछ छोटे वाक़्य कहने लगी हैं... पर उन्हें पता नहीं क्यों अग्रेज़ी बोलना चुटकुले सुनाने जैसा लगता है... वह एक शब्द भी बोलती है तो बच्चों सी हंसती हैं... एक पूरे वाक़्य में तो मुझे भी हंसी आने लगती है। &lt;br /&gt;इन सारी यात्राओं की बस एक ही त्रासदी है कि जो आत्मीय संबंध आपका यहाँ कुछ लोगों से बन गया है... आप पता नहीं इसके बाद कभी उनसे मिलेगें भी या नहीं....। शायद कभी किसी से भी मिलना ना हो...। यह संबंध यहीं तक है... बस इतना ही...। यह सोचते ही लगता है कि दुनियाँ इतनी दूर-दूर क्यों है..? क्या हम ख़िसकर कुछ और पास नहीं आ सकते...? &lt;br /&gt;लिखने आया था पर संतोषजनक लेखन नहीं हो पाया है...। बहुत सारा लिखना बचा है... पर इस प्रवास में मैं खुद अपने कुछ करीब खिसक आया हूँ... अपने साथ चलते रहने के कुछ मौन इस बार थकान लिए हुए नहीं थे..। मैं इस बार थका नहीं... मैं इस बार चलता रहा...। &lt;br /&gt;इस प्रवास में सबसे अच्छा काम शायद  Red Pencil का लिखा जाना है। यह बच्चों का उपन्यास Soo-Hyeon ने लिखा है.. उससे प्रभावित होकर मैं नाटक लिख रहा हूँ। आशा है मैं इसे जाने से पहले पूरा कर लूंगा..। SOO-HYEON  की उम्र करीब 42 वर्ष होगी...। उनसे बात करते समय लगता है कि किसी बौद्ध भिक्षु से बात कर रहे हो... उनके भीतर बहुत प्रेम है दूसरों के लिए.. वह लगभग सबकी सहायता यहाँ कुछ इस तरह करती है मानों हम उनके घर में रहने आए हैं। मैं उनके लिए एक lost child जैसा कुछ हूँ... जिसे पता नहीं कि वह कहाँ जा रहा है.. क्या कर रहा है। मैं खुद कभी इसका जवाब नहीं दे पाया कि मैं lost child हूँ कि नहीं हूँ... सो मैं जो भी भूमिका मुझे यहाँ मिलती है मैं बिल्कुल वैसा ही जीने लगता हूँ। &lt;br /&gt;मुझे लगता है कि आप असल में क्या सोचते हैं... अगर उसको हमेशा बता देने का उत्साह अगर हम थोड़ा शांत कर ले.... तो हम बहुत से लोगों को बहुत सारी जगह दे पाएंगे..... अपने पास आने की....। &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-6529008494541962843?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/6529008494541962843/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=6529008494541962843&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/6529008494541962843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/6529008494541962843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/09/toji-land.html' title='Toji.... (land...)'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-Fosgns1OmKo/TnvnWPYCWGI/AAAAAAAAAuU/uGQ2V1vgZOA/s72-c/DSCF2617.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-3084425149485076497</id><published>2011-09-14T02:18:00.001+05:30</published><updated>2011-09-14T02:25:33.648+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी कहानियाँ...'/><title type='text'>टीस...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-zKuKmCJYX8Q/Tm_DJc0yjNI/AAAAAAAAAuM/UaXVd-h333w/s1600/Footprints.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-zKuKmCJYX8Q/Tm_DJc0yjNI/AAAAAAAAAuM/UaXVd-h333w/s400/Footprints.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5651950624497110226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुबह बहुत सामान्य थी, जब तक उसकी निग़ाह घड़ी पर नहीं गई... उसके मुँह से आह! निकली.. और वह भागा........&lt;br /&gt;वह भाग रहा था... जूतों के लेस खुल चुके थे... पर उसे गिरने का कोई डर नहीं था। वह बीच में धीमा हुआ... सिर्फ कुछ सांस बटोरने के लिए... एक ..दो... तीन... वह फिर भागने लगा। कहीं वह चले ना गए हो? यह बात उसके दिमाग़ में धूम रही थी। उसे उनके चहरे की झुर्रीयाँ दिख रही थी.... वह उसी को देख रहे थे... अचानक वह उनके चहरे की झुर्रीयाँ गिनने लगा। उसने अपने सिर को एक झटका दिया और सब ग़ायब हो गया... मानों सब कुछ ड्स्ट बिन में चला गया हो। दिमाग़ में एक ड्स्ट बिन होता है जिसे आप सिर के एक झटके से भर सकते हैं... पर अगर ड्स्ट बिन भर गया तो उसे कैसे झटका देते हैं?... दिमाग़ के ड्स्ट बिन को कहाँ ख़ाली करते हैं? उसने फिर दिमाग़ को एक झटका दिया... और भागता रहा.... &lt;br /&gt;वह दरवाज़े के सामने काफी देर से खड़ा था...। उसका माथा दरवाज़े से सटा हुआ था। वह बीच में एक गहरी सांस छोड़ते हुए अपना माथा धीरे से दरवाज़े पर पटकता और एक ठ्क की आवाज़ आती। उसने अपना दाहिना हाथ घंटी पर रख रखा था। उसके दो माथे की ठ्क के बीच में घंटी की आवाज़ सुनाई दे जाती...यह एक तरह की रिद्यम में यह चलने लगा था, पर बहुत ही धीरे, इतना धीरे कि अगली ठ्क की आवाज़ शायद ना आए...। उसकी आँखें दरवाज़े पर लगे ताले पर थी... काला पड़ चुका ताला...। घंटी की आवाज़ और ठ्क के बीच अचानक एक वाक़्य भी बजने लगा था... “मैं सुबह चला जाऊगाँ...।“ कुछ देर में वह बैठ गया... सोचा स्टेशन जाऊगाँ पर कोई फायदा नहीं है। वह कहाँ से जाएगें इसका कोई पता नहीं था... या शायद वह गए भी नहीं हो.. वह अभी भी यहीं हो आस पास ही कहीं। छुपकर उसका इस तरह पछताना देख रहे हों। वह खड़ा रहा। उसने दरवाज़े पर एक लात मारी और सीड़ीयों से नीचे उतर गया। अचानक वह पलटा और उसने जिस जगह लात मारी थी वहाँ हाथ से दरवाज़ा पोछ दिया... कहीं वह सच में छुपकर देख रहे हो तो? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यह यही तक है... इसकी इतनी ही कहानी है...। कौन छुपकर देख रहा है? कौन दरवाज़े पर है? इसका कोई सिर पैर नहीं है। इसके बाद उसने क्या किया, वह सोची समझी कहानी की तरह मेरे दिमाग़ में चलने लगा... मैं कहानी जीना चाहता हूँ... पहले से ही पता है- वाली कहानी मैं नहीं लिखना चाहता। मैंने लिखना बंद कर दिया। आप चाहे तो पढ़ना बंद कर सकते हैं। अभी यही रुक जाईये। क्योंकि अगर आप कहानी ढ़ूढ़ रहे है तो वह आपके हाथ नहीं आने वाली....। मैं कहानी नहीं कहना चाहता हूँ... ख़ासकर वह कहानी जिसका अंत मुझे पहले से ही पता हो..। मैं उस स्थिति से नहीं गुज़रना चाहता जिसमें मुझे एक अच्छी कहानी कहने का बोझ ढ़ोना पड़े। यहाँ जो भी हो रहा है या होगा... वह कुछ भी नहीं है... ऎसा जो शायद मैं पढ़ना चाह रहा था। शायद मुझे इसे लिखना और आपको इसे पढ़ना बंद कर देना चाहिए....मैं अभी भी आपको थोड़ा वक़्त देता हूँ... और खुद को भी....................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................।&lt;br /&gt;अब हम दोनों ही एक ही स्थिति में है... आप रुके नहीं... आप अभी भी इसे पढ़ रहे हैं.. और मैंने भी लिखना बंद नहीं किया। अब आगे जो भी होगा उसके ज़िम्मेदार हम दोनों हैं। ठीक इस वक़्त आपको भी नहीं पता कि आगे क्या होगा.. और मुझे तो यह अंदाज़ा भी नहीं है कि अगला शब्द क्या होगा...। सो चलते हैं......&lt;br /&gt; राही... मैं हमेशा सोचा करता था कि जब भी मेरी कोई लड़की होगी मैं उसका नाम राही रखुगाँ। राही को मेरे साथ धूमेगी... मेरे साथ रहेगी... मेरी सबसे अच्छी दोस्त बनकर...। वह खुद सब चुने और करे। उसे जानने सीखने की ओछी दुनियाँ से दूर ही रखुगाँ। मुझे जानने सीखने और आगे बढ़ने जैसे शब्दों से सख्त नफरत है। खैर ऎसा होना इस जनम में मुझे संभव अब लगता नहीं है... वह उम्र मेरी निकल चुकी है जिसमें इस तरह के सपनों की जगह था।&lt;br /&gt;अभी इस वक़्त आप भी और मैं भी बार-बार उस आदमी के बारे में सोच रहे हैं जो दरवाज़े पर था.. हे ना...? वह दरवाज़ा पोछने के बाद कहाँ गया होगा..? उसका नाम क्या है...? उसका नाम... अली है। अली नाम अच्छा है मुझे हमेशा छोटे नाम अच्छे लगते है... टाईप करने में आसानी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अली का कमरा था और राही उसके साथ थी.........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अली- मेरे पास आओ।&lt;br /&gt;राही- अली नहीं।&lt;br /&gt;अली- राही.. मेरे पास आओ।&lt;br /&gt;राही- अली मैं तुम्हारी मुँह बोली बहन हूँ।&lt;br /&gt;अली- मुझे पता है, याद दिलाने की तुम्हें ज़रुरत नही हैं।&lt;br /&gt;राही- हाथ छोड़ो।&lt;br /&gt;अली- मुँह बोली हो ना... तो मैं अपने मुँह से बोलता हूँ.. आज से तुम मेरी बहन नहीं हो।&lt;br /&gt;राही- बचपना बंद करो।&lt;br /&gt;अली- प्लीज़।&lt;br /&gt;राही- अली... अली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; राही सलवार सूट पहने थी..। वह बार बार अली के हाथों को अपने शरीर पर से हटा रहे थी। अली ने उसका चहरा अपने हाथों में पकड़ लिया... और शांत खड़ा हो गया। राही ने उसके हाथों को चहरे से नहीं हटाया... दोनों चुप खड़े रहे।&lt;br /&gt;राही- छोड़ो अली।&lt;br /&gt; राही ने बहुत धीरे से कहाँ... अली ने उसकी आखों को चूम लिया। शायद आखों को चूमना सीमा पार करना नहीं था.. सो राही ने उसे रोका नहीं। वह आखों को चूमते हुए उसके गालों को चूमने लगा... गालों से सरकता हुआ होटों के किनारों तक आया... पर होटों को नहीं छुआ। राही का शरीर थोड़ा ढीला पड़ने लगा था... उसने अपनी आखें बंद कर ली थी। गालों पर से अली का एक हाथ हट गया था और वह राही के सूट के भीतर जाने का छोर ढ़ूढ़ने लगा। राही हलके हलके उसके हाथ को रोकती रही... इस जद्दोजहद में दोनों लड़खड़ाए और बिस्तर पर लेट गए। अली का हाथ राही के सूट के भीतर उसकी ब्रा खोलने में लग गया...। वह अभी भी होठों के किनारों को ही चूम रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राही- अली देखो यह ठीक नहीं है... मैं इसीलिए तुमसे दूर रहती हूँ...। तुम पगला रहे हो... अली मेरी बात सुनो। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; अली ने ब्रा खोल दी थी....उसके हाथ राही के वक्ष के इर्द गिर्द घूमने लगे। राही चुप हो गई। राही, अली को चूमने लगी...पर अली राही को होठों पे चूमने के पहले ही अपना चहरा हटा लेता। अली के दोनों हाथ राही के वक्ष के पास थे... पर वह उसके nipples को नहीं छू रहे थे...। राही, अली के हाथों को खीचकर उसके वक्षों पर ले जाती पर अली उसके nipples को नहीं छूता। अली ने धीरे से राही को बिठाया और उसका सूट... एक ही झटके में खींच के उतार दिया। सूट के साथ ब्रा को भी उसने कुर्सी पर रख दिया...। राही... अली से चिपक गई। अली उसे हटाता रह... वह उसके चेहरे को उसके वक्षों के साथ देखना चाहता था...  पर राही उससे दूर नहीं हो रही थी। अली ने एक झटके से राही को लिटाया और उसके दोनों हाथों को ज़बरदस्ती उसके सिर के पीछे ख़ीचकर ले गया। राही कुछ देर तक विरोध करती रही, फिर उसने अपना सिर एक तरफ घुमा लिया और अपनी आँखे बंद कर ली। अली उसके वक्ष को उसके चहरे के साथ पहली बार देख रहा था। उसने राही के दोनों हाथों को एक हाथ से जकड़ लिया और दूसरा हाथ उसकी शलवार की तरफ बढ़ाया। राही विरोध में पूरे शरीर को मरोड़ती रही पर अली की पकड़ मज़बूत थी वह उससे छूट नहीं पाई। अली शलवार के नाड़ का ओर-छोर ढूढ़ने लगा। छोर अचानक उसके हाथ में आ गया। राही के मुँह से चीख निकली.... अली ने नाड़े का छोर खींच लिया। तभी दरवाज़े पर एक खट हुई और आली की पकड़ ढीली पड़ गई।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर संबंध एक छोर पर आकर आत्महत्या की जगह खोज रहा होता है। वह आत्महत्या करे या ना करे की उहापोह में वह संबंध ज़िदा रहता है.... किसी भी तरह का नर्णय उस संबंध की हत्या है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर दरवाज़े पर खट की आवाज़ किसकी थी यह कहना मुश्किल था...। उसे लगा नरेद्र होगा... वह राही और राही उसको बहुत पसंद करते थे। शायद नरेद्र को पता हो कि आज राही अली से मिलने आ रही है? .. पता नहीं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी सी संरचना जो मुझे अभी दिख रही है........&lt;br /&gt;जिस बूढ़े आदमी से मिलने अली भाग रहा था और अंत में उसने दरवाज़े पर ताला पाया....। उस बूढ़े आदमी का नाम..... हम्म्म्म्म.... कमल है...। हाँ.. कमल.... पूरी ज़िदगी लिखा... ढ़लती उम्र में शादी की... करीब पचपन-साठ के बीच में बीबी अपने बच्चे के साथ उन्हें छोड़कर चली गई। उनका बेटा (आयुश) और अली दोस्त थे..। नशे की बुरी आदत पड़ गई थी...  बेटे के सामने अच्छे बाप की भूमिका निभाने के चक्कर में हमेशा गड़बड़ हो जाती... बेटा बाप से नाराज़ रहता...। पुराने लिखे की जो भी रॉयल्टी आती थी उससे उनका घर चलता था। उनके बेटे... आयुश के साथ अली कई बार कमल से मिला था... अपने कॉलेज के दिनों में...। आयुश वह आदमी कमल में नहीं देख पाया जो अली ने देख लिया.... सो अली अदतन उनसे मिलने लगा...। अली खुद कुछ नहीं करता था.. उसे लगता था कि वह लेखक है.. पर लिखते ही.. उसे पेंटिग करने की इच्छा होती.. उसे धूमना पसंद था... सो वह उसकी जुगाड़ में हमेशा लगा रहता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन पहले की रात... अलि और कमल... कमल के घर....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमल सामने थे। उसकी आखें कहीं अनंत को छूने में दूर कुछ टटोल रही थी। खिड़की से हल्की सी रोशनी भीतर आ रही थी। बाक़ी कमरे में अंधेरा था। ’लाईट मत आन करो…’ अली के भीतर आते ही उनका यह पहला वाक्य था उसके बाद से अभी तक सब चुप था। अली उनके करीब जाकर बैठ गया.. सस्ती शराब की बदबू उनके मुँह से आ रही थी। अली कई घंटे.. ऎसे ही उनके सामने बैठ सकता था… स्थिर.. शायद इसीलिए अली अभी तक उनके जीवन का हिस्सा है… अली के अलावा उनसे कोई दूसरा मिलने नहीं आता था। अयुश कभी-कभी आता था... कमल अयुश का इंतज़ार करते थे.. पर उससे मिलना पसंद नहीं करते थे। कमल कभी-कभी किसी से मिलने जाते थे… पर किससे यह किसी को पता नहीं था...। अगर अली कभी पूछता तो कहते कि-’दोस्त के यहाँ जा रहा हूँ…’ किस दोस्त के यहाँ? यह पूछने की हिम्मत अली में नहीं थी।  अली पिछले कुछ महीनों से बाहर था... कुछ विदेशी लोगों को लेकर एक ग्लेशियर के ट्रिप पर... सो कमल से नहीं मिल पाया था... कमल ऎसे वक़्त हमेशा नाराज़ हो जाते..… ’कहाँ थे..??? कोई ख़बर नहीं है, कम से कम बताया तो करो कि तुम नहीं आ रहे हो?’ अली ऎसे कुछ क्षणों में खुद को उनके करीब महसूस करता.. पर अगर अली बताता कि मैं एक महिने के लिए बाहर जा रहा हूँ... तो भी कमल नाराज़ हो जाते... ’तो मैं क्या करुं... जाओ.. तुम्हारी उम्र है.. धूमों.. मुझ बूढ़े के साथ तो बस तुम अपना समय बरबाद कर रहे हो...।’ सो अली कभी बताता कभी नहीं बताता... &lt;br /&gt;अली बिना ज़्यादा आवाज़ किये उठा…. टटोलते-टटोलते पानी का मटका की तरफ बढ़ा… मटका नहीं मिला… ’कहीं मटका भी तो नहीं फेंक दिया’ अली ने सोचा.... फिर एक बुरी आवाज़ हुई… मटके के ऊपर रखा पानी का गिलास गिर पड़ा अली से गिर पड़ा... अली वहीं ठिठक कर खड़ा रहा… धीरे से पलटकर उनकी तरफ देखा तो वह अभी भी खिड़की के बाहर कुछ तलाश रहे थे। वह झुका और गिलास टटोलने लगा.. गिलास हाथ में आते ही उसने पानी निकालना चाहा… ’खड़र.र्र.. खड़र..र्र..’ आवाज़ हुई… मटका खाली था। वह खिड़की की रोशनी के सहारे वापिस आकर अपनी जगह बैठ गया…। वह गिलास को वापिस रखना भूल गया.. गिलास उसके हाथ में ही था…। तभी पहली बार कमल उसकी तरफ मुड़े.. फिर उनकी निग़ाह गिलास पर गई।&lt;br /&gt;’पानी नहीं है….....’ &lt;br /&gt;अली बस इतना ही कहना चाह रहा था… पर वाक्य कुछ इस तरह निकला कि पूरा नहीं हो पाया… लगा इसके  आगे भी कुछ कह सकने की गुंजाईश है… अली झटके से चुप हो गया।&lt;br /&gt;’यहाँ पानी नहीं है… यहाँ क्यों आते हो???’ कमल ने कहा...&lt;br /&gt;घर में सस्ती दारु की महक थी। खिड़की का पर्दा शायद कमल के एकटक बाहर देखने की वजह से एकदम स्थिर था... । कमरे में गर्मी थी....  उनके भीतर के कमरे से संगीत की आवाज़ आ रही थी.. piano …&lt;br /&gt;’बहुत प्यास नहीं है मुझे...’ अली ने कहा...&lt;br /&gt;फिर उसने गिलास को नीचे रख दिया...। &lt;br /&gt;’सिगरेट है...?’ कमल ने पूछा..&lt;br /&gt;अली ने अपनी जेब से सिगरेट निकालकर दी... पहले कश के साथ ही कमल ने फिर वही वाक्य दौहराया..&lt;br /&gt;’यहाँ क्यों आते हो...?’&lt;br /&gt;’अच्छा लगता है..।’ &lt;br /&gt;अली की सिगरेट पीने की इच्छा थी पर उसने जल्दबाज़ी में पेकट अपनी जेब में रख लिया.. फिर वापिस निकालना उसे ठीक नहीं लगा सो उसने उसे वहीं पड़ा रहने दिया... &lt;br /&gt;’आज मैने बहुत दिनों बाद कुछ लिखा....’ कमल ने कहा..&lt;br /&gt;’अरे वाह...’&lt;br /&gt;’तुम्हारे बारे में....’&lt;br /&gt;’मेरे बारे में...?’&lt;br /&gt;’तुम्हे बुरा तो नहीं लगेगा कि मैं तुम्हें कहानी के एक पात्र की तरह देख रहा हूँ....’&lt;br /&gt;’नहीं... बल्कि....’&lt;br /&gt;’मेरे सारे निजी संबंधों की झलक मेरी कहानियों में है.. और उन्हें यह बात कभी अच्छी नहीं लगी....।’&lt;br /&gt;’मुझे कोई तक़लीफ नहीं है....।’ अली ने अपनी बात साफ-साफ कह दी...&lt;br /&gt;’यह तुम्हारे और राही के बारे में है....।’&lt;br /&gt;’राही????’&lt;br /&gt;अली को यह कुछ अजीब लगा....। अली ने अगर अपने जीवन में कमल से कुछ भी नहीं छुपाया था... ख़ासकर उसके गहन निजी संबंध... वह सब कुछ खोलकर बता देता था.. और कमल चुप सब कुछ सुन लेते थे.. कभी किसी निर्णय पर नहीं पहुंचते थे.. उसे जज नहीं करते थे..। पर राही के बार में लिखना... उसे अजीब लग...&lt;br /&gt;’क्यों तुम्हें ठीक नहीं लगा...?’&lt;br /&gt;’क्या मैं पढ़ सकता हूँ....?’ &lt;br /&gt;’क्यों नहीं..’&lt;br /&gt;कमल उठे और उन्होंने कुछ पन्ने लाकर अली के हाथ में थमा दिये...।&lt;br /&gt;’दारु पियोगे...?’&lt;br /&gt;’ना....’&lt;br /&gt;’शायद इसे पढ़ने के बाद अपने विचार बदल दो....!!!’&lt;br /&gt;यह कहकर कमल किचिन में चले गए...। अली पढ़ने लगा.. पर बहुत अंधेरा है...&lt;br /&gt;’मैं लाईट आन कर लूं...?’&lt;br /&gt;’नहीं खिड़की के करीब चले जाओ... पढ़ पाओगे।’&lt;br /&gt;अली अपनी कुर्सी खिड़की से आती हुई रोशनी की तरफ खिसका लेता है। कुछ वाक्य पढ़्ने पर ही वह सिगरेट निकालकर जला लेता है....। वह पूरा नहीं पढ़ पाया... बाक़ी सारे पन्ने उठाकर वह पलंग पर पटक देता है..। बाथरुम से फ्लश की आवाज़ आती है.... बाथरुम का दरवाज़ा खुलता है.. बल्ब की रोशनी पूरे कमरे में फैल जाती है....। उस ज़रा से उजाले की घड़ी में अली कमरे में चारों तरफ निग़ाह डालता है.. कमरा एकदम खाली है.. जैसे वहाँ अब कोई नहीं रहता हो... बस एक सूटकेस दिखता है... और उसके बगल में एक बेग़...। बाथरुम का दरवाज़ा बंद होती ही फिर अंधेरा हो जाता है.. पर इस बार पहले से थोड़ा गाढ़ा अंधेरा। कमल किचिन में ही खड़े थे... अली ने किचिन की तरफ देखा...&lt;br /&gt;’मेरे लिए एक पग पना दीजिए...’&lt;br /&gt;कुछ देर में कमल और अली अपने-अपने पेग के साथ आमने-सामने बैठे थे।&lt;br /&gt;’यह ठीक नहीं है... आप... राही को इसमें मत लिखिए..।’&lt;br /&gt;’क्यों..? यह fiction है।’&lt;br /&gt;’पर आपने तो नाम भी नहीं बदले...।’&lt;br /&gt;’उससे कितना फर्क पड़ जाएगा...?’&lt;br /&gt;’मुझे नहीं पता... आप बस नाम बदल दीजिए..।’&lt;br /&gt;’देखो मैंने इतने सालों से नहीं लिखा है... उसकी वजह है... हर कहानी कुछ समय में नाटकीय लगने लगती है। पात्रों से ज़्यादा वह लोग दिखने लगते हैं जो इसे पढ़ेगें...। एक पूरा झूठा संसार... जिसमें छिछला मनोरंजन.. एक ससपेंस भरा अंत... गढ़ने के लिए... दिन रात एक कर दो.. ना मैं नहीं लिख सकता यह सब...।’&lt;br /&gt;’तो यह जो लिखा है वह क्या है...? एक erotic B-Grade साहित्य...जिसका मुख्य पात्र मैं हूँ।’&lt;br /&gt;’यह तुम नहीं हो...?’&lt;br /&gt;’यह मैं नहीं हूँ?... तो यह कौन है?’&lt;br /&gt;’अगर तुम इस कहानी के अली होते तो मेरी बात का जवाब सही देते?’&lt;br /&gt;’कौन सी बात का....?’&lt;br /&gt;’जो मैंने तुमसे पूछा था।’&lt;br /&gt;’क्या पूछा था?’&lt;br /&gt;’जब पानी नहीं है तो यहाँ क्यों आत्ते हो?’&lt;br /&gt;’यह सब क्या है.... यह.... सब.....।’&lt;br /&gt;’मैं कहानी के इसी वाक़्य पर अटका हूँ.. कि अली इस बात का क्या जवाब देगा?’&lt;br /&gt;’enough!!!’&lt;br /&gt;अली एक झटके में पूरा ड्रिंक खत्म कर देता है। कमल उसका गिलास उठाते हैं और एक किनारे रख देते हैं... फिर वह पानी वाला गिलास भी मटके में जाकर रख देते हैं। अली अपनी कुर्सी से उठता है और लाईट बोर्ड की तरफ बढ़ता है.... &lt;br /&gt;’मैं लाईट आन कर रहा हूँ।’&lt;br /&gt;’लाईट आन मत करो....’&lt;br /&gt;’मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है... मुझे अजीब लग रहा है.. मैं लाईट आन करता हूँ....।’&lt;br /&gt;’नहीं... कहानी में भी इस वक़्त अंधेरा है... सिर्फ रोशनी खिड़की से आ रही है.... बस... लाईट आन नहीं होगी।’&lt;br /&gt;अली वापिस आकर बैठ जाता है।&lt;br /&gt;’मुझे एक पेग और चाहिए.... ’&lt;br /&gt;कमल मटके के पास खड़े हैं..जवाब नहीं देते...। &lt;br /&gt;’मिलेगा?’&lt;br /&gt;’मैं दे दूंगा... देशी है... आगे जो होगा उसके ज़िम्मेदार तुम खुद होगे...?’&lt;br /&gt;’अब आगे और क्या होने वाला है..!!!’&lt;br /&gt;’कुछ नहीं...’&lt;br /&gt;कमल अंदर जाते हैं.. और एक पेग बनाकर अली के लिए लाते हैं... पर खुद नहीं पीते..।&lt;br /&gt;’आप नहीं लेंगे...।’&lt;br /&gt;’अभी नहीं.....’&lt;br /&gt;अली एक बार में आधा पेग खत्म कर देता है। गिलास नीचे रखता है। मुँह पोछता है... उसे ज़ोर का एक ठसका का जाता है.. कुछ देर खांसता है...। &lt;br /&gt;’पानी नहीं है.....’&lt;br /&gt;’मुझे नहीं चाहिए पानी....’&lt;br /&gt;खांसी कुछ देर में बंद हो जाती है...। अली कुछ देर शांत रहता है...। फिर पलंग से बाक़ी पन्ने उठाता है.... उन्हें अपने पास रखता है...।&lt;br /&gt;’राही सच में मेरी मुँह बोली बहन है....। मैंने आपसे यह सब एक अच्छे दोस्त की हेसियत से कहा था...’&lt;br /&gt;’पर दोस्त लेखक निकला...’&lt;br /&gt;’यह बेईमानी है...’&lt;br /&gt;’बेईमानी है झूठा लिखना... यह ईमानदारी है.. ’&lt;br /&gt;’ईमानदारी कैसे हुई.. ऎसा कुछ कभी हुआ ही नहीं था...’&lt;br /&gt;’मैं तुम्हारी आत्मकथा नहीं लिख रहा हूँ... यह काल्पनिक कहानी है... बस’&lt;br /&gt;अली को सवालों के बहुत से उबाल आ रहे थे.... पर वह चुप हो गया.। उसने अपन सिर पन्नों में गड़ा दिया...।&lt;br /&gt;’आप सामने से हटेगें...?’&lt;br /&gt;अली कमल से कहता है.. कमल समझ नहीं पाते हैं...।&lt;br /&gt;’एक मात्र रोशनी जो खड़की से आ रही है आप उसे भी रोक रहे हैं...।’&lt;br /&gt;कमल धीरे से उठकर पलंग पर बैठ जाते हैं...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह अजीब सा नाटकीय दृश्य खत्म होता है। ओह!.... आप कहानी पढ़ रहे हैं... जबकि आप कहानी नुमा कुछ पढ़ रहे हैं... मैं कहानी नहीं लिखना चाहता हूँ... पर कहानी जैसी ही कोई चीज़ सुनाई दे रही है। ओह!!! क्या यह वैसा ही नहीं है जैसे हम अपने बाथरुम में बैठते थे.. तो गीली दीवारों में हमें चहरे दिखाई देते थे.. जबकि वहाँ कोई चहरा नहीं होता था... पर हम चहरा देख लेते थे। हमें कोई एक घांस का तिनका भी देगा तो उसमें भी हमे सीता की कहानी याद है रावण के खिलाफ लड़ाई की...। हमने इतनी कहानिया पढ़ी और सुनी है कि हमने कोई भी चीज़ ऎसी नहीं छोड़ी है जिसकी कोई कहानी नहीं हो...। पर आप कहानी नहीं पढ़ रहे हैं... और मैं कहानी नहीं लिख रहा हूँ... हम यह बात याद रखेंगें.... अब आगे बढ़ते हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे नरेन्द्र दिखा दरवाज़ा खटखटाता हुआ....। नरेन्द्र अली का दोस्त है... और उसका संबंध राही से है..। उसे लगता है कि अली में कुछ बात है.. वह या तो लेखक बनेगा या बड़ा पेंटर... सो वह अली का दोस्त होते हुए उसका सम्मान भी करता है। उसे लगता है कि वह अली का दोस्त है.. और उसकी मदद कर रहा है। नरेन्द्र बड़ी कंपनी में काम करता है.. हंसे-मज़ाक से भरपूर आदमी है.. राही उसे बहुत पसंद करती है। दोनों की जोड़ी अली को भी पसंद है.... जब तीनों साथ होते हैं तो अली अच्छे दोस्त, और अच्छे भाई की भूमिका में दोनों ट्रीट करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राही ने तुरंत नाड़ा बांधा और अपनी ब्रा की तरफ लपकी...।&lt;br /&gt;’कौन?’&lt;br /&gt;’अरे अली मैं नरेन्द्र...’&lt;br /&gt;अली ने एक बार राही की तरफ देखा...। राही ने अपना कुर्ता पहन लिया था पर ब्रा नहीं पहन पाई थी.. सो उसने अपनी ब्रा बिस्तर के नीचे छिपा दी और चुनरी ओढ़ ली.....। अली ने दरवाज़ा खोला...&lt;br /&gt;’अबे फिर सो रहा था.. इतनी देर लग गई दरवाज़ा खोलने में......?’&lt;br /&gt;नरेन्द्र शक्कर और अंड़े लाया था। वह सीधा किचिन में जाना चाह रहा था तभी उसकी निग़ाह राही पर पड़ी। वह बीच में ही रुक गया।&lt;br /&gt;’अरे तुम यहा हो...?’&lt;br /&gt;राही उठकर खड़ी हो गई...। &lt;br /&gt;’ऎसे ही... मैं इसे कुछ पढ़कर सुना रहा था।’&lt;br /&gt;अली ने कहा...। नरेन्द्र ने राही को ऊपर से नीचे तक देखा...राही के बाल बिख़रे हुए थे। राही को कुछ समझ में नहीं आया... तो वह नरेन्द्र से अंड़े और शक्कर लेकर किचिन में चली गई।&lt;br /&gt;’मुझे बहुत भूख लग रही है... थेक्यु तुम यह सब ले आए... अली तो मुझे भूखा मार देता...।’&lt;br /&gt;नरेन्द्र पहले बिस्तर की तरफ गया.. फिर वह कुर्सी पर जाकर बैठ गया। &lt;br /&gt;’तो क्या सुना रहा था...तेरी डायरी तो है नहीं यहा?’&lt;br /&gt;नरेन्द्र ने कहा...&lt;br /&gt;’नहीं एक आईडिया सुना रहा था.. नई कहानी का....’&lt;br /&gt;’तुम्हें यह नया आईडिया पसंद आया राही?’&lt;br /&gt;नरेन्द्र ने ऊंची आवाज़ में राही से पूछा....। &lt;br /&gt;’ठीक है...’&lt;br /&gt;अली पलंग पर बैठ गया....। दोनों चुप रहे...&lt;br /&gt;’तुम कुछ खाओगे नरेन्द्र?’&lt;br /&gt;राही ने पूछा..&lt;br /&gt;’नहीं.. मैं तो इस कुत्ते के लिए लाया था।’&lt;br /&gt;कुत्ता कहन में इतना ज़्यादा कड़वापन था... कि अली असहज हो गया। वह उठकर बाथरुम चला गया। राही अपने लिए आमलेट और चाय बनाकर लाई और नरेन्द्र के पास आकर बैठ गई। राही भूखी नहीं थी... उसे आमलेट खाने की इच्छा भी नहीं थी..। वह हर आमलेट का कोर चाय के साथ निगल रही थी।&lt;br /&gt;’तुम्हें खाने की ज़रुरत नहीं है अगर तुम्हें भूख नहीं लग रही है..।’ नरेन्द्र ने कहा..&lt;br /&gt;’अरे मैं भूखी हूँ।’ राही ने जवाब दिया..&lt;br /&gt;’मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था.. हे ना?’&lt;br /&gt;’अरे ऎसा क्यों बोल रहे हो?’&lt;br /&gt;’खेर मुझे कहीं जाना है... शाम को मिलते हैं...।’&lt;br /&gt;’अरे .. तुम ऎसे कैसे जा रहे हो... रुको मैं भी चलती हूँ तुम्हारे साथ...।’&lt;br /&gt;’नहीं.. तुम रुको... मैं जाता हूँ।’&lt;br /&gt;राही ने नरेन्द्र को रोकने की कोशिश की पर वह नहीं रुका। राही ने बचे हुए आमलेट को वापिस किचिन में रख दिया। अली बाथरुम से बाहर निकला उसे नरेन्द्र नहीं दिखा..&lt;br /&gt;’अरे कहाँ गया....?’&lt;br /&gt;’उसे शक़ हो गया है?’&lt;br /&gt;’अरे... ऎसा कुछ नहीं है..।’&lt;br /&gt;’नहीं उसे शक हो गया है।’&lt;br /&gt;’उसने कुछ कहा तुमसे?’&lt;br /&gt;’नहीं पर मैं उसे जानती हूँ...।’&lt;br /&gt;अली ने जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया...। वापिस आकर उसने राही को पकड़ लिया...। &lt;br /&gt;’अली नहीं... रुको.. यह ठीक नहीं है...।’&lt;br /&gt;पर अली नहीं रुका... उसने राही का कुर्ता उतार दिया..। राही बहुत देर तक उसे मना करती रही... पर वह नहीं माना..। अली ने राही की शलवार के अंदर हाथ डाल दिया... राही... अली को चूमने लगी..। अली ने राही की शलवार उतार दी.... पर राही ने पूरी तरह नग्न होने से मना कर दिया..। वह इसके आगे नहीं जाना चाहती थी। अली बहुत कोशिश करता रहा.. पर राही नहीं मानी...। अंत में अली ने राही को अलग कर दिया...। दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे... फिर राही ने अली को गले लगा लिया...। &lt;br /&gt;’तुम मुझसे प्रेम नहीं करते हो... तुम किसी से बदला ले रहे हो और उसके लिए तुम मेरा इस्तेमाल करना चाहते हो।’&lt;br /&gt;’नहीं ऎसा नहीं है...।’&lt;br /&gt;’मैं तुम्हें जानती हूँ अली... तुम बहुत कमज़ोर हो...। और यह तुम्हारी कमज़ोरी से उपजा गुस्सा है जो तुम मुझपर निकाल रहे हो।’&lt;br /&gt;’नहीं... मैं हरामी हूँ... बस... उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं...’&lt;br /&gt;’ऎसा मत कहो.... मैं तुम्हारे साथ यह नहीं करना चाहती... उसका कारण नरेन्द्र है.. मैं उसके साथ यह नहीं कर सकते.. अली.. और शायद तुम भी ऎसा कुछ नहीं करना चाहते हो।’&lt;br /&gt;’हाँ... मैं भी नहीं चाहता... पर जब सब कुछ हाथ से छूट रहा होता है तो लगता है कि कुछ पकड़ लो.. चाहे वह कितना भी गलत क्यों ना हो... उसे पकड़कर ....’&lt;br /&gt;फिर अली कुछ नहीं बोल पाया...। राही उठी और उसने अपने कपड़े पहन लिये..। दोनों चुप चाप बैठे रहे... फिर अली राही के पास गया.. और उसे चूम लिया... राही ने कुछ नहीं कहा.. । वह उसे चूमता गया...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह किससा यहीं तमाम हुअ.....&lt;br /&gt;तो बात चलते-चलते यहाँ तक पहुंच गई है। नहीं.. इसमें कोई भी सोची समझी चाल नहीं है...। यह शब्द.. अली.. राही.. और नरेन्द्र जैसा देखते गए.. मैं लिखता गया...। अब मैं भी नहीं यह खुद अपनी बात कह रहें है.. जैसा हम कहते है कि इंसान क्या है बस परिस्थियों से बना हुआ पुतला। मैं इसे अभी भी कहानी मानने से इनकार करता हूँ... क्योंकि अगर यह कहानी होती तो मैं लिखना और आप पढ़ना बंद कर चुके होते... हम दोनों ही यह नहीं चाहते कि यह कहानी हो... तो मैं यक़ीन दिलाता हूँ आपको कि यह कहानी नहीं है। अब यह ताना बाना जो बुना हुआ है.. यह परिस्थितिवश है...। क्योंकि इन बातों का अंत मैं पहले ही लिख चुका हूँ... जिसमें कमल जा चुके हैं.. अपने घर में ताला लगाकर...।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अली अभी भी उस अंधेरे कमरे में कमल के साथ बैठा हुआ है। ’अली राही को चूमता है...’ उसके बाद उसने कहानी पढ़ना बंद कर दिया...। पर कहानी के पन्ने अभी भी उसके हाथ में है।&lt;br /&gt;’क्या हुआ?’ कमल ने पूछा...&lt;br /&gt;’सिगरेट पीना है..।&lt;br /&gt;अली जेब से सिगरेट निकालता है..। एक सिगरेट कमल को देता है और दूसरी अपने मुँह में लगा देता है... कमल माचिस निकालकर दोनों की सिगरेट जलाता है। अली एक कश के साथ अपना बचा हुआ ड्रिंक पी जाता है... और गिलास कमल की तरफ बढ़ा देता है...&lt;br /&gt;’एक और.......’&lt;br /&gt;कमल कुछ नहीं कहते.. वह गिलास लेकर भीतर चले जाते हैं....।&lt;br /&gt;’इसलिए आपको आपकी बीवी छोड़कर चली गई.. हे ना?’&lt;br /&gt;कमल अंदर पेग बना रहे हैं और इसका कोई जवाब नहीं देते। &lt;br /&gt;’आपको आपके बेटे आयुष में कोई कहानी नहीं दिखती?’&lt;br /&gt;कमल उसका पेग लाकर उसे दे देते हैं...। अली फिर एक झटके में आधा पेग खत्म कर देता है... और गिलास नीचे रख देता है। इस बार उसे ठसका नहीं लगता।&lt;br /&gt;’क्योंकि वह मेरी तरह चूतिया नहीं है ना.. वह आपके पास आकर अपने जीवन की पर्सल बातें आपको नहीं बताता है...।’&lt;br /&gt;’कुछ ही पन्ने बचे हैं... उसे पढ़ लो फिर बात करेगें...।’&lt;br /&gt;अली नहीं पढ़ता है। वह कमल को देखता रहता है। &lt;br /&gt;’तुम तो पेंटर भी हो... तुम्हें कोई भी पेंटिग क्यॊं अच्छी लगती है...?’&lt;br /&gt;’क्योंकि वह अच्छी होती है... बस..’&lt;br /&gt;’नहीं... क्योंकि उसमें तुम खुद का अंश देख लेते हो.. उसके रंग तुम्हारे जीए हुए रंग से मेल खा लेते है.. कभी तुम्हारी मन:स्थिति से... कुछ क्रूरता मेल खा जाती है.. और तुम्हें वह अच्छा लगता है। ऎसे ही कहानी भी... तुम खुद का एक अंश उन संवादों में महसूस करते हो...।’&lt;br /&gt;’तो...?’&lt;br /&gt;’तो कुल मिलाकर हम हर जगह खुद को ही तलाश रहे होते है... और जब-जब हमें अपना अंश इस संसार में दिखता हैं.. हमें जीने में एक sence मिलता है। इस हिसाब से तो तुम्हें यह बहुत अच्छी कहानी लगनी चाहिए... हे ना..’&lt;br /&gt;’यह सब बहुत पर्सनल है...।’&lt;br /&gt;’मैं जानता हूँ... लेकिन यह तुम्हारी बात नहीं है...।’&lt;br /&gt;’मैंने यह सारे संवाद आपसे किये थे... कि मैं कमज़ोर हूँ.. मुझे लगता है कि मैं बदला ले रहा हूँ....’&lt;br /&gt;’मैंने कहा ना यह fiction है...’&lt;br /&gt;’और मैंने राही को बस चूमा था.. उससे ज़्यादा...’&lt;br /&gt;’इसी बाद का तो तुम्हें दुख है कि तुमने उसे सिर्फ चूमा था... और यहाँ तुम बहुत आगे बढ़ गए हो...।’&lt;br /&gt;’नहीं....’&lt;br /&gt;’तुम यह बात मानों या ना मानों.. पर यही सही है...’&lt;br /&gt;’यह झूठ है.. यह झूठ है..यह......’&lt;br /&gt;अली अपने गुससे पर काबू नहीं रख पाता... और वह कमल की तरफ बढ़ता है.. पर रुक जाता है। वापिस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है। कुछ देर चुप्पी बनी रहती है.. फिर अली कहता है...&lt;br /&gt;’sorry…..’&lt;br /&gt;‘तुम्हें पता है तुमने पूछा था कि मैं किससे मिलने जाता हूँ..? तब मैंने कहा था कि मैं अपने दोस्त से मिलने जाता हूँ.... तुम्हें पता है असल में मैं किससे मिलने जाता था...?’&lt;br /&gt;’किससे...?’&lt;br /&gt;’अपनी बीवी से...’&lt;br /&gt;’अयुश जानता है यह बात...?’&lt;br /&gt;’ना.... हम दोनों पार्क में, कॉफी शॉप में मिलते हैं...। अजीब है मैं उससे बस एक बार मिलना चाहता था कि माफी मांग सकूं... उन बहुत छोटी चीज़ों की जो वह मुझसे चाहती थी और मैं उसे दे नहीं पाया...। पर मिलना इतना सुंदर लगा कि... हम मिलते रहे...। मैंने अभी तक उससे माफी नहीं मांगी है..।&lt;br /&gt;’आप यह सब मुझे क्यों बता रहे हैं?’&lt;br /&gt;’पता नहीं... मैं इसके अलावा एक और आदमी से भी मिलने जाता था..।’&lt;br /&gt;’किससे....?’&lt;br /&gt;’नरेन्द्र से.....’&lt;br /&gt;’क्या?’&lt;br /&gt;’हाँ... मुझॆ उसका पक्ष भी जानना था...’&lt;br /&gt;’अरे ... आप....’&lt;br /&gt;’वैसे.. नरेन्द्र अच्छा लड़का है...।’&lt;br /&gt;’हाँ मैं जानता हूँ....।’&lt;br /&gt;’तुमने मेरी एक कहानी राही को यह कहकर सुनाई थी कि वह तुमने लिखी है...?’&lt;br /&gt;’आपको कैसे पता यह बात.. यह तो बहुत पुरानी बात है.. और मैंने राही को बता भी दिया था बाद में कि वह आपने लिखी है।’&lt;br /&gt;’यह नहीं पता था मुझॆ...’&lt;br /&gt;’पर यह बात राही के अलावा और किसी को नहीं पता थी....।’&lt;br /&gt;’नरेन्द्र ने मुझे बताया....।’&lt;br /&gt;’क्या आप राही से भी मिले हैं...?’&lt;br /&gt;’नहीं उसे सिर्फ दूर से देखा है.. सुंदर है वह...।’&lt;br /&gt;’आप कब से यह कर रहे हैं...?’&lt;br /&gt;’मैं लेखक हूँ... जब से होश संभाला है तब से लिख रहा हूँ...।’&lt;br /&gt;’आपको नहीं लगता कि आपने सबको इस्तेमाल किया है?’&lt;br /&gt;’हम सब एक दूसरे का इस्तेमाल करते हैं.. इस बात को हम चाहे माने या न माने...।’&lt;br /&gt;’नहीं..... ऎसा नहीं है..।’&lt;br /&gt;’क्यों तुमने राही का use नहीं किया अपने लिए... तुमने नरेन्द्र का इस्तेमाल किया...।’&lt;br /&gt;’वह गलती थी मेरी...।’&lt;br /&gt;’अगर दौबारा मौक़ा मिलेगा तुम वह ग़लती दौबारा दौहराओगे..।’&lt;br /&gt;’नहीं.. कभी नहीं...।’&lt;br /&gt;कमल वहाँ से उठकर चले जाते हैं....। अली भीतर सी आती कुछ आवज़े सुनता है चीज़ो के उठाने रखने की...। वह खिड़्की से आती रोशनी में फिर उन पन्नों को लाता है और पढ़ना शुरु करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे इस वक़्त अजीब सी घबराहट हो रही है। मुझे इन पात्रों से संवाद ठीक नहीं लग रहे हैं। हाँ इन पात्र से मेरे संवाद.... । जब-जब बीच में मैं लिखना बंद करता हूँ... पात्र मुझसे .. या आपस में बात करने लगते हैं..। मैं उनको मेरी बुराई करते सुन सकता हूँ। हम जब भी उनके चरित्र के खिलाफ एक भी वाक्य लिखते हैं वह पात्र हमें माफ नहीं करते...। कमल मुझसे नाराज़ है.... वह अपनी बीबी से नहीं मिलना चाह रहा था...। हाँ उसकी अपने चरित्र को लेकर अपनी आज़ादी है... पर मुझे कमल से उसकी आज़ादी छींननी पड़ी... इसलिए कमल खफ़ा है..। अगर कमल मुझे एक मोची के रुप में दिखता .. बस कंड़क्टर के रुप में.. तो शायद वह इस बात पर नाराज़ नहीं होता.. पर तब उसकी दूसरी समस्या होती...। पात्रों से बहस कई बार कहानी रोक देती है.. अगर मैं कहानी लिख रहा होता तो !!! यहाँ कमल और मेरी बहस में कहानी रुक गई होती... पर यह कहानी नहीं हैं..। मैं कहानी नहीं लिख रहा हूँ.. इस बात में आज़ादी है.. मैं यह बात यहीं खत्म कर सकता हूँ और कह सकता हूँ कि बस... यह यहीं तक है..। आप कहेंगे यह तो अधूरी है... इसे पूरा तो कीजिए...!!! मुझे अपने जीवन में सारी अधूरी छूटी हुई चीज़े याद है.. पूरी तरह.... बहुत से संबंध.. किस्से.. बातें... जो बीच में ही कहीं छूट गए थे... एक टीस की तरह.. जो टीस हमेशा याद रहती है। कहानी नहीं लिख रहा हूँ इस बात की सबसे बड़ी आज़ादी यही है कि... मैं कभी भी इसे किसी भी टीस पर खत्म कर सकता हूँ.....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अली, राही से मिलने उसके घर पर गया है। राही उसे अपने कमरे में बुलाती है...। अली, राही से और नरेन्द्र से बहुत दिनों से नहीं मिला है....।&lt;br /&gt;’तुम आखरी बार नरेन्द्र से कब मिले थे?’ राही ने पूछा&lt;br /&gt;’क्यों? सब ठीक है...?’ अली थोड़ा डर गया..&lt;br /&gt;’तुम बताओ..  कब मिले थे...?’&lt;br /&gt;’उसी दिन.... जब वह अंडे और शक्कर लेकर आया था।’&lt;br /&gt;’उसके बाद क्यों नहीं मिले तुम?’&lt;br /&gt;’पता नहीं... वह व्यस्त था.. मैंने एक दो बार फोन किया... पर उसने मेरा फोन नहीं उठाया.. वापिस फोन भी नहीं किया तो नहीं मिले...।’&lt;br /&gt;’तुम मुझसे भी नहीं मिले...।’&lt;br /&gt;’हाँ.. तुमसे जान बूझकर नहीं मिला.... मैं तुमसे नहीं मिलना चाहता था...।’&lt;br /&gt;राही इस बात पर अली के सामने से उठ गई...। बहुत से धुले हुए कपड़े पलंग पर पड़े थे.... वह उन्हें घड़ी करने लगी...। सलीके से.. धीरे-धीरे.. तह करके वह सारे कपड़ों को रखने लगी...।&lt;br /&gt;’बस यही पूछने के लिए तुमने मुझे बुलाया था?’ अली ने पूछा...&lt;br /&gt;’नहीं...’&lt;br /&gt;’तो क्या बात है बोलो?’&lt;br /&gt;’मैं चाहती हूँ तुम जाकर नरेन्द्र से मिल लो...।’&lt;br /&gt;’नहीं मैं नहीं मिलूगां।’&lt;br /&gt;राही ने कपड़े तह करना बंद कर दिया...। वह अली की तरफ देखने लगी... &lt;br /&gt;’मेरी ख़ातिर... एक बार...।’&lt;br /&gt;’ठीक है...। मैं कल मिल लूंगा उससे...।’&lt;br /&gt;’नहीं कल नहीं.. आज रात... वह बहुत पीने लगा है...। तुम्हारा उससे मिलना बहुत ज़रुरी है...।’&lt;br /&gt;’ठीक है..।’&lt;br /&gt;’उसे फोन मत करना.. वह तुम्हारा फोन नहीं उठाएगा...। सीधे रात उसके घर चले जाना...।’&lt;br /&gt;’ठीक है...।’&lt;br /&gt;अली वहाँ से चला जाता है...। वह अपने कमरे में नहीं जाता... उसे लगता है कि अगर वह अपने कमरे में गया तो नरेन्द्र से नहीं मिलने के कारण ढूढ़ लेगा.. सो वह एक कॉफी हाऊस में जाकर बैठ जाता है। तभी एक बुज़ुर्ग से व्यक्ति उसके सामने आकर बैठ जते हैं.. वह उसे अपना नाम कमल बताते हैं। &lt;br /&gt;’जी ....?’ अली पूछता है..&lt;br /&gt;’मैंने कहा मेरा नाम कमल है...।’ कमल जवाब देते हैं...&lt;br /&gt;अली चुप रहता है.. वह अपना नाम नहीं बताता...। कमल एक काग़ज़ और पेन बाहर निकाल लेते हैं.. और अली का स्केच सा बनाने लगते हैं..।&lt;br /&gt;’अरे! आप यह क्या कर रहे हैं...?’&lt;br /&gt;’जिस तरीक़े से तुम काफी देर से यहाँ बैठे हो... मुझे वह तरीक़ा बहुत अच्छा लग रहा है। मैं भूल न जाऊं उससे पहले स्केच कर लेना चाहता हूँ।’&lt;br /&gt;’अरे!.. पर...’&lt;br /&gt;’अगर आपको दिक्कत है तो....’&lt;br /&gt;’नहीं पर आप यह...’&lt;br /&gt;’मैं एक लेखक हूँ.. और जिस तरह आप बैठें है.. बुरा मत मनियेगा.. जिस पीड़ा से आप बैठे है और कॉफी पे कॉफी पीये जा रहे हैं.. मुझे आपमें एक कहानी दिख रही है...।’&lt;br /&gt;’कहानी...?’&lt;br /&gt;’मैं कतई कहानी नहीं लिखना चाहता हूँ.. मुझे कहानिया बोर करती है.. मैं बस तुम्हारा इस पीड़ा से बैठा लिखना चाहता हूँ...।’&lt;br /&gt;’मुझे कोई इच्छा नहीं यह जानने की कि आप क्या और क्यों लिखना चाहते हैं... मैं अकेले बैठना चाहता हूँ।’&lt;br /&gt;’इसलिए तो मैं आपकी तरफ आकर्षित हुआ...। मुझे पता है आप आकेले बैठना चाहते हैं... बस मैं कुछ देर में चला जाऊंगा..।’&lt;br /&gt;अली की कुछ समझ में नहीं आता कि वह क्या करे...। वह वापिस अपनी कॉफी पीने लगता है। कमल उसका स्केच बनाने लगते हैं। कुछ देर में वह अपना कागज़ और पेन वापिस जेब में डाल लेते हैं... पर वहाँ से उठते नहीं है...। कमल अली की तरफ देखकर मुस्कुराते हैं... पर अली उनकी तरफ नहीं देखता...&lt;br /&gt;’इस उम्र में ही इतनी गहरी समस्या होती है। मेरी उम्र में आते-आते या तो सब सुलझ जाता है या समस्याएं असर करना बंद कर देती है।’&lt;br /&gt;अली चुप रहता है।&lt;br /&gt;’शायद मैं आज रात में ही आपकी कहानी लिख दूं..... सच में मैंने बहुत समय से कुछ भी नहीं लिखा है। आपको देखकर लगता है कि मैं आज रात मे ही यह कहानी लिख दूंगा...। क्योंकि कल मैं यह शहर छोड़कर जा रहा हूँ... बहुत समय से सोच रहा था पर अब... मैंने मन बना लिया है.. सारा सामन भी बांध लिया है...।’&lt;br /&gt;अली चुप रहता है....। कमल वापिस अपनी जेब से कागज़ और पेन निकालते हैं.. और अपने घर का पता लिखते हैं...। &lt;br /&gt;’देखिए..मुझे पता है आपको कोई इन्टरेस्ट नहीं है... पर अगर आपको अपनी कहानी सुननी है तो आपको मेरे घर सुबह छ: बजे के पहले आना पड़ेगा... वरना मैं निकल जाऊंगा...। यह रहा मेरा पता...।’&lt;br /&gt;अली वह कागज़ नहीं लेता....। कमल उसकी टेबल के पास वह कागज़ रख देते हैं। और अपना पेन वापिस शर्ट की जेब में फसाते हैं और चल देते है। कुछ देर अली उस कागज़ को देखता है फिर उसे बिना वजह अपनी जेब में डाल लेता है...। वह एक कॉफी और पीता है... फिर नरेन्द्र के घर की और चल देता है....।&lt;br /&gt;अली नरेन्द्र के दरवाज़े पर खड़ा है... एक गहरी सांस लेकर वह दरवाज़ा खटखटाता है...। पर वहा से कोई आहट नहीं सुनाई देती.. वह फिर खटखटाता है... फिर चुप्पी...। वह थोड़ा सा दरवाज़ा धकेलता है... वह खुल जाता है...। वह आवाज़ लगाता है..&lt;br /&gt;’नरेन्द्र... नरेन्द्र....’&lt;br /&gt;’हा.. अली...’&lt;br /&gt;कमरे में अंधेरा है...। &lt;br /&gt;’मैं दरवाज़ा खटखटा रहा था...पर..’&lt;br /&gt;अली चुप हो जाता है.. उसे अपना बोलना व्यर्थ लगने लगता है। पूरा कमरा सस्ती दारु से महक रहा था....। वह टटोलते हुए लाईट जलाने की कोशिश करता है.. तभी नरेन्द्र की आवाज़ आती है..&lt;br /&gt;’लाईट बंद रहने दो... लाईट चालू मत करो....।’&lt;br /&gt;अली हाथ वापिस खींच लेता है....। धीरे-धीरे... वह नरेन्द्र की तरफ बढ़ता है...। पूरे कमरे में अधेरा है.. सिर्फ खिड़की से रोशनी आ रही है..। नरेन्द्र खिड़की के पास बैठा है...। अली नरेन्द्र के सामने बैठ जाता है।&lt;br /&gt;’दारु पियेगा..?’ नरेन्द्र पूछता है..&lt;br /&gt;’नहीं.... नहीं’&lt;br /&gt;’पी ले...’&lt;br /&gt;’नहीं.. मैं पानी पीयुंगा....’&lt;br /&gt;और अली मटके की तरफ बढ़ता है...।&lt;br /&gt;’यहाँ पानी नहें है.... तो यहाँ क्यों आया है?’&lt;br /&gt;अली बात कहा से शुरु करे..? पुरानी दोस्ती से...? अभी की समस्या से..? या सीधे राही की बात पर आ जाए? अली खामोश है और नरेन्द्र अली के लिए एक ड्रिंक बनाता है।&lt;br /&gt;अली और कमल... कमल के घर रात...&lt;br /&gt;कमल ने कहानी यहीं तक लिखी थी। अली अधूरेपन की टीस महसूस करता है। कमल भीतर से निकलकर बाहर आते हैं...।&lt;br /&gt;’तो पढ़ ली..?’ कमल ने पूछा..&lt;br /&gt;’हाँ.... पर नरेन्द्र से क्या बात हुई...।’&lt;br /&gt;’वहीं पर तो मामला रुका हुआ है...।’&lt;br /&gt;’क्या आप सच में कल सुबह जा रहे हैं।’&lt;br /&gt;’तुम कहानी को और रियेलिटी को मिक्स कर रहे हो!!!’&lt;br /&gt;’आप जा रहे हैं...।’&lt;br /&gt;’मुझे आज कैसे भी यह कहानी पूरी करना है। तो बताओ क्या बात होनी चाहिए नरेन्द्र और तुम्हारे बीच...?’&lt;br /&gt;’यह आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? आप तो उससे मिले हैं ना... अब लिखिए।’&lt;br /&gt;’यही तो गलती कर दी मैंने... जब आपको एक पक्ष की बात ज़्यादा ठीक से पता हो तो.. आप चीज़े आसानी से लिख लेते हो..। देखों दुनिया में लोगों ने एक पक्ष पर लिख लिखकर किताबें भर दी है।’&lt;br /&gt;’मुझे लगता है दोनों बैठकर पीते हैं और बस.. दोस्ती वापिस शुरु हो जाती है.. उस बारे में कोई बात नहीं करता..।’&lt;br /&gt;’हम्म.. यह हो सकता है.. पर मैं कुछ और देख रहा हूँ...। मैं कभी तुम्हें रोता हुआ देखता हूँ तो कभी नरेन्र्आ को.. पर फैसला नहीं कर पा रहा हूँ कि किसको रुलाऊं...।’&lt;br /&gt;’अब मेरी इच्छा है इसका अंत जानने की... और तब मैं आपसे बात करुंगा...।’&lt;br /&gt;’तो ठीक है.. अंत जानना है तो कल सुबह.. छ: बजे के पहले...।’&lt;br /&gt;और कमल यह कहकर हसने लगते हैं। कुछ देर में अली वहाँ से चला जाता है। कमल कहानी के पन्नों को लेकर अपनी डेस्क पर चले जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात कितनी सीधी हुई है अब तक...। आपको भी चीज़े साफ-साफ दिखने लगी और मुझे भी...। इसके बाद इसके कई अंत हो सकते हैं। जैसे Woyzeck नाटक जो Georg Buchner पूरा नहीं लिख पाए थे। अंत खुला था... जो चाहे जैसा अंत वैसा लिख ले.. वह नाटक सबसे ज़्यादा खेले गए नाटको में से एक है। जैसे कहानी नहीं लिखने में एक आज़ादी है वैसे ही अधूरेपन में भी आज़ादी है... हर आदमी खुद अपना हिस्सा उसमें मिला सकता है और उसे पूरा कर सकता है।&lt;br /&gt;यह बात शायद उस हिस्से की है जो मैं शुरुआत में लिख चुके था....। मुझे एक लड़का भागता हुआ दिखा.. और बात वहाँ से यहाँ तक पहुंच गई...। और अब हम वापिस वहीं पहुंच गए.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह बहुत सामान्य थी जब तक उसकी निग़ाह घड़ी पर नहीं गई... उसके मुँह से आह! निकली.. और वह भागा........&lt;br /&gt;वह भाग रहा था... जूतों के लेस खुल चुके थे... पर उसे गिरने का कोई डर नहीं था। वह बीच में धीमा हुआ... सिर्फ कुछ सांस बटोरने के लिए... एक ..दो... तीन... वह फिर भागने लगा। कहीं वह चले ना गए हो? यह बात उसके दिमाग़ में धूम रही थी। उसे उनके चहरे की झुर्रीयाँ दिख रही थी.... वह उसी को देख रहे थे... अचानक वह उनके चहरे की झुर्रीयाँ गिनने लगा। उसने अपने सिर को एक झटका दिया और सब ग़ायब हो गया... मानों सब कुछ ड्स्ट बिन में चला गया हो। दिमाग़ में एक ड्स्ट बिन होता है जिसे आप सिर के एक झटके से भर सकते हैं... पर अगर ड्स्ट बिन भर गया तो उसे कैसे झटका देते हैं?... दिमाग़ के ड्स्ट बिन को कहाँ ख़ाली करते हैं? उसने फिर दिमाग़ को एक झटका दिया... और भागता रहा.... &lt;br /&gt;वह दरवाज़े के सामने काफी देर से खड़ा था...। उसका माथा दरवाज़े से सटा हुआ था। वह बीच में एक गहरी सांस छोड़ते हुए अपना माथा धीरे से दरवाज़े पर पटकता और एक ठ्क की आवाज़ आती। उसने अपना दाहिना हाथ घंटी पर रख रखा था। उसके दो माथे की ठ्क के बीच में घंटी की आवाज़ सुनाई दे जाती...यह एक तरह की रिद्यम में यह चलने लगा था, पर बहुत ही धीरे, इतना धीरे कि अगली ठ्क की आवाज़ शायद ना आए...। उसकी आँखें दरवाज़े पर लगे ताले पर थी... काला पड़ चुका ताला...। घंटी की आवाज़ और ठ्क के बीच अचानक एक वाक़्य भी बजने लगा था... “मैं सुबह चला जाऊगाँ...।“ कुछ देर में वह बैठ गया... सोचा स्टेशन जाऊगाँ पर कोई फायदा नहीं है। वह कहाँ से जाएगें इसका कोई पता नहीं था... या शायद वह गए भी नहीं हो.. वह अभी भी यहीं हो आस पास ही कहीं। छुपकर उसका इस तरह पछताना देख रहे हों। वह खड़ा रहा। उसने दरवाज़े पर एक लात मारी और सीड़ीयों से नीचे उतर गया। अचानक वह पलटा और उसने जिस जगह लात मारी थी वहाँ हाथ से दरवाज़ा पोछ दिया... कहीं वह सच में छुपकर देख रहे हो तो? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अंत लिखते ही मुझे लगा इस कहानी का नाम... ’टीस...’ होना चाहिए.. क्या कहते हैं आप????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-3084425149485076497?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/3084425149485076497/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=3084425149485076497&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/3084425149485076497'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/3084425149485076497'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/09/blog-post_14.html' title='टीस...'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-zKuKmCJYX8Q/Tm_DJc0yjNI/AAAAAAAAAuM/UaXVd-h333w/s72-c/Footprints.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-1020459887352048723</id><published>2011-09-09T13:09:00.001+05:30</published><updated>2011-09-09T13:12:56.166+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>secret island....</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-wPS51XItg5c/TmnDbBanB0I/AAAAAAAAAuE/Do0-3GABlKA/s1600/IMG_2418.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-wPS51XItg5c/TmnDbBanB0I/AAAAAAAAAuE/Do0-3GABlKA/s400/IMG_2418.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5650262076516927298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;कल कुछ कोरियन आर्टिस्ट के साथ बैठा था। मेरा एक सवाल जिसपर कुछ बातचीत शुरु हुई थी वह था ’why we create? Or why we write?’  मेरे ज़हन में यह सवाल बहुत समय से चल रहा है कि मैं लिखता क्यों हूँ। मेरे पास इसके बहुत ही छिछले और रटेरटाए जवाब थे....। कुछ देर खामोशी छाई रही.... हम कुछ चार लोग बैठे थे.. janghae (composer), sook (painter), soo-hyeon (children novelist- red pencil)| खमोशी दो कारणों से थी पहला तो सवाल थोड़ा सीधा था.. और दूसरा उनका अंग्रेज़ी में हाथ तंग होना..। soo-hyeon ने पहले जवाब दिया कि ’उसे लगता है कि हम सबके भीतर एक टापू है... secrete island. उसकी अपनी सुंदर दुनिया है... हम जब भी उस टापू के बारे में बात करने लगते हैं तो कहानिया निकलती है.. उस कहानी को मैं लिखना पसंद करती हूँ... बनिसपत किसी से कहना।’  फिर अचानक बात उस खाली जगह के बारे में होने लगी जिसमें हम जब भी कुछ रखते हैं वह multiply होने लगता है... जैसे एक घांस का टुकड़ा अगर वहाँ छोड़ दिया जाए तो वह कुछ देर में जंगल का रुप ले लेता है.. और हम जंगल की एक कहानी लिख देते है... उसमें संगीत ढ़ूढ़ लेते हैं.. नहीं तो उसे paint कर लेते हैं। &lt;br /&gt;मैंने sook की पेंटिग्स देखीं थीं। वह हर emotions के particles पेंट करती है... मतलब उन्होंने जो अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में जो बताया और जितना मैं समझ पाया। इस सारी बातचीत में janghae बहुत गंभीर बनी रही। जबकि वह एक बहुत उर्जा वाली महिला हैं। कुछ देर में वह कोरियन में बातचीत करने लगे और मुझे समय-समय पर sorry बोलते रहे... मैं janghae के बारे में सोचने लगा।&lt;br /&gt;Janghae  48 साल की थीं पर उतनी उम्र की लगती नहीं थी... वह Switzerland में रहती हैं पिछले बीस सालों से... अकेले।  मेरी उनसे दोस्ती बहुत जल्द हो गई थी..। क्योंकि वह ही थीं जो सबसे सही अंग्रेज़ी बोल लेती थी... और बहुत ही उत्साही थीं.... हम दोनों बहुत से पहाड़-जंगल साथ भटके थे।  इस बीच मुझसे एक ग़लती हो गई... एक दिन जब हम घूमने गए थे.. मैंने मस्ती में उनसे कह दिया कि मैं हाथ पढ़ सकता हूँ...मुझे नहीं पता था कि यहाँ fortune telling  एक बिज़नस है... लोगों का गहरा विश्वास है उसपर...। मेरा मज़ाक मुझपर ही भारी पड़ गया... janghae ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और बहुत संजीदगी से मुझे देखने लगी। मुझे कुछ भी नहीं आता था.. पर मैंने अपने दोस्तो को बहुत ही संजीदगी से यह सब करते हुए देखा था सो मैं उन्हें कुछ सतही चीज़े बताने लगा... पर मेरी हर बात को वह कुछ इस तरह भीतर जज़्ब कर रहीं थी मानों वह पूर्ण सत्य हो...। सो मुझे लगा कि कुछ अच्छी बात कर लेनी चाहिए... मैंने उन्हें बताया कि आपकी luck line बहुत बढ़िया है.... आप बहुत lucky हैं.. वह चुप रहीं... मैंने कहा कि आपका जल्दी विश्वास नहीं करती लोगों पर... ऎसा उनसे बात करते हुए मुझे पता चला था। मैंने कहा आपके पास जल्दी ही बहुत काम आने वाला है.... क्योंकि वह इस बात को लेकर बहुत परेशान थी कि उनके पास आजकल कोई काम नहीं है...। वह मेरी एक बात पर बहुत मायूस हो गईं कि उनकी luck line बहुत अच्छी है.. वह कहने लगी कि ’मैं बिल्कुल भी lucky नहीं हूँ... मैंने बहुत संघर्ष किया है.. अब इस उम्र में मैं अकेली हूँ.. कोई आगे-पीछे नहीं है.. अपना कोई घर भी नहीं.... बहुत ज़्यादा महत करती हूँ तो एक कमिश्न मिल जाता है संगीत बनाने का.... हर महीने अपना किराया देने के लिए उठा-पटक करनी पड़ती है....” मैं स्तब्ध रह गया। मैंने उनसे कहा कि मैं एक fraud palm reader  हूँ... पर वह अपनी गंभीरता पर बने रही,,,। उन्होंने कहा कि ’एक अर्टिस्ट का retirement  कितना दुखद होता है... वह retire होना चाहे तो कहाँ जाए????’ मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था..। हम उसके बाद चुप रहे...।&lt;br /&gt;अचानक अगली sorry पर सब लोग मुझसे मुखातिफ हुए....। मैं Janghae के बारे में सोच रहा था सो मेरे मुँह से एक प्रश्न और निकला कि ’हम अपने अकेलेपन का क्या करें जब वह हमें नहीं चाहिए होता है?’ मैंने कुछ समझाते हुए कहा कि यहाँ toji  में सारे युवा कलाकार हैं... सभी अपने-अपने अकेलेपन में रहते हैं.. उन्हें इसकी सुंदर जगह दी गई है कि वह अपना काम पूरी तल्लीनता के साथ करें.... इस तरह का अकेलापन उम्र के साथ-साथ किसी भी कलाकार के जीवन में बढ़ता रहता है। वह जब अपना लिखा खत्म करके अपनी डेस्क से उठता है तो उसे आस-पास कोई भी दिखाई नहीं देता.. वह एक ऎसी अवस्था में पहुच जाता है जिसमें या तो वह सृजन करे अथवा अकेलेपन के जंगल में भटकता रहे। मेरी बात Janghae  समझ गई थीं... वह कुछ कहने के लिए आगे आई पर उनके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला...। उन्होंने मुझसे कहा कि ’जैसे बिना भूखा रहे भूख लिखना झूठ है ठीक वैसे ही उस अकेलेपन में घुसे बिना उसकी बात करना भी.... ।’ सभी उन्हें देखते रहे... वह थोड़ा सहम गई... फिर बिना कुछ कहे उठकर अपने कमरे में चली गई। &lt;br /&gt;कुछ देर में हम सब अपने-अपने कमरों में अकेले थे...। मैं उनकी बात बहुत अच्छी तरह समझता था.. मेरे पास भी इसके कोई जवाब नहीं थे.. पर हम दोष किसे दें... उस उम्र को जिसमें हमने कलाकार बनना चुना था? या उस आदमी को जो कभी हमारे जीवन में नहीं आया जो आकर हमारी कलम हमारे हाथ से लेकर तोड़ देता?&lt;br /&gt;’तुम अभी नहीं समझोगे... बाद में पचताओगे !!!’ वाली बातें मैं बहुत सालों से सुनता आया हूँ। मैने उस ’बाद...’ का भी कई बार इंतज़ार किया है जो कभी आएगा और मैं पश्चाताप करना शुरु कर दूंगा... पर फिल्हाल वह कभी दिखा नहीं....। हाँ पर.. मुझे दुख ज़रुर होता है.... जब मैं उन लोगों से मिलता हूँ... या कभी-कभी जब मैं खुद को ऎसी स्थिति में पाता हूँ... जब हमारा खालीपन एक तरह की अनंत स्पेस हमारे सामने खोल देता है और लगता है कि इससे कोई छुटकारा नहीं है...। उस वक़्त अगल बगल मेंकोई भी खड़ा नहीं दिखता..... इस अकेलेपन और खालीपन से खुद ही निपटना पड़ता है। &lt;br /&gt;मैंने soo-hyeon  से यह सवाल पूछा था कि ’वह अपने अकेलेपन को कैसे handle करती हैं?’ तो उसने कहा था कि... ’उसके सबसे अच्छे दोस्त वह पात्र हैं जिन्हें वह लिख रही होती है.. वह उनके साथ रहती है... उनसे बातें करती है.. उनका बहुत ख्याल रखती है...। उसे अपने secret island  में घूमना बहुत अच्छा लगता है।’ &lt;br /&gt;मुझे उसकी बात बहुत अच्छी लगी...। हमारे अकेलेपन का मुआवज़ा क्या है? शायद वह सारे पात्र...जिन्हें हमने किसी बीहड़ में.. या घने जंगल में कहीं हमारे साथ लुका-छुपी खेलते हुए देखा था और वह उस दिन के बाद से हमारे साथ हो लिए...।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-1020459887352048723?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/1020459887352048723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=1020459887352048723&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1020459887352048723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1020459887352048723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/09/secret-island.html' title='secret island....'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-wPS51XItg5c/TmnDbBanB0I/AAAAAAAAAuE/Do0-3GABlKA/s72-c/IMG_2418.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-1081717938100990049</id><published>2011-09-09T09:45:00.002+05:30</published><updated>2011-09-09T09:55:39.172+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी कहानियाँ...'/><title type='text'>माँ.....</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-JoO5aXhK7vk/TmmU7ZL6DPI/AAAAAAAAAt8/sUtH_AB6Wn8/s1600/mother-nature-tree.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-JoO5aXhK7vk/TmmU7ZL6DPI/AAAAAAAAAt8/sUtH_AB6Wn8/s400/mother-nature-tree.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5650210955607018738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;मेरा नाम कोंपल है। बहुत समय तक मुझे इसके मानी नहीं पता थे। एक दिन मेरी माँ मुझे एक पेड़ के पास ले गई... और उसमें अभी-अभी आए नए कोमल पत्तों को छूने को कहा। बहुत छोटे-छोटे, हरे रंग में बहुत सा पीला रंग लिए वह अत्यधिक कोमल पत्ते कोंपल कहलाते हैं....। मैंने उससे कोमल चीज़ आज तक नहीं छुई थी। माँ ने कहा कि यह तू है। मैंने कहा यह तो बहुत कमज़ोर लगते हैं... उन्होंने कहा कि यह कमज़ोर नहीं है..कोमल है.. जो तू है। मैंने उन कोपलों को छूते हुए माँ से कहा था कि अगर यह कोमल से पत्ते मैं हूँ तो यह पेड़ आप हैं। मैं इस बात को बहुत पहले भूल चुका था। &lt;br /&gt;कल गांव से सोनी जी का फोन आया था कि ‘तुम्हारी माँ कल रात अचानक चल बसी हैं। कल अंतिम क्रियाकरम करना पड़ेगा... तुम तुरंत पहुंच जाओ।’ मैं अपने ऑफिस में बहुत बुरी तरह व्यस्त था... बहुत से काम मुझे निपटाने थे। मैंने सोनी जी के फोन को ’ठीक है’ कहकर रख दिया। बहुत देर तक मैं अपने ऑफिस के काम में उलझा रहा..। तभी काम करते-करते मुझे कुछ खाली-खाली सा लगने लगा... मैं बहुत देर तक अपनी डेस्क को देखता रहा.. फिर कुछ चीज़ें ढ़ूढ़ना शुरु कर दिया। मेरे दोस्त ने मुझे देखा और पूछा ’क्या खोज रहा हूँ?’ मैंने अपने कंधे उचका दिये..और फिर खोजने में जुट गया..। अचानक मुझॆ पसीना आने लगा... असामान्य तरीक़े से..बहुत पसीना....मैंने अपने एक दोस्त से पूछा कि देख मुझे कहीं बुखार तो नहीं है? उसने मेरा माथा छुआ और कहा ’नहीं...” मैंने उससे कहा कि यार मेरी माँ नहीं रही और तब उसकी आँखों में मैंने वह देखा... जिसे मैं खोज रहा था..। फिर मुझसे खड़े रहते नहीं बना... मैं बैठना चाहता था.. लेटना चाहता था.. मैं बहुत सारे तकिये चाहता था.. रजाईयाँ... जिसमें गुत्थम-गुत्था होकर मैं सो जाऊं.. छिप जाऊं.. मैं माँ की कोख़ जैसी सुरक्षा ढूंढ़ रहा था.......।&lt;br /&gt;कुछ देर में मैंने ऑफिस से अपना सामान उठाया और सीधा अपने घर आ गया।&lt;br /&gt;मैं सुबह चार बजे से उठा हुआ हूँ। सुबह कितनी धीमी गति से होती है इसका अंदाज़ा मुझे आज तक नहीं चला...। मैं नहा चुका था.. शेव कर चुका था.. पूरा सामान बांध चुका था पर सुबह होने का नाम ही नहीं ले रही थी। अपनी रेक पर रखी किताबों में मेरी निग़ाह गोर्की की मदर पर पड़ी...। अपनी बहुत जवानी के दिनों में मैंने वह किताब पढ़ी थी.... किताब खत्म करते ही मेरे भीतर एक बहुत ही रिरयाती हुई इच्छा जागी कि काश मेरी माँ भी पलाग्या निलोवना की तरह महान माँ होती। मैंने कई दिनों तक अपनी माँ से ठीक से बात नहीं की थी... मुझे लगा था कि उन्होंने मुझे धोखा दिया है... उन्हें महान होना चाहिए था... वह हो सकती थी... फिर क्यों नहीं हुई? आज लगता है कि पेलाग्या निलोवना से कहीं महान वह माँए है जो बिना किसी ’आह’ के एक घर में काम करते हुए पूरी ज़िदगी गुज़ार देती हैं। उनकी कोई कहानियाँ हमने नहीं पढ़ी.. उन्हें किसी ने कहीं भी दर्ज़ नहीं किया। वह अपने पति के जर-जर होने और बच्चों से आती ख़बरों के बीच कहीं अदृश्य सी बूढ़ी होती रहीं... यह हमारी माँए है जिनका ज़िक्र कहीं नहीं है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरी माँ पढ़ी लिखी थी… हमेशा से लिखना चाहती थी। मैं लिखने पढ़ने से कतराता था। माँ ज़बर्दस्ति कुछ किताबें मेरे सिरहाने रख दिया करती थी... जिन्हें मैं महज़ नींद आने के लिए पढ़ता था। नींद में आधी पढ़ी हुई कहानी अपने बहुत ही अलग विरले अंत खोजने लगती। मेरे सपने उन कहानीयों के अंत की कल्पना बन जाते। सुबह माँ को कहानी के बारे में बताता तो आधी कहानी सही होती और आधी मेरे सपने की बात होती। माँ को हमेशा से लगता था कि मैं पढ़ने से बचने के लिए मनगढ़ंत कहानी बनाता हूँ, पर उन्होंने यह बात कभी मुझसे नहीं कही।&lt;br /&gt;मैंने लिखना शुरुकर दिया... उन कहानियों के काल्पनिक अंत को जिसकी आदत माँ को लग गई थी.। फिर धीरे-धीरे वह पढ़ी हुई कहानिया छूट गईं.. और मैं पूरी एक कहानी की काल्पना करने लगा..। माँ हमेशा मेरे लिखने से खुश रहती...। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;मैंने घड़ी देखी छ: बज चुके थे... मैंने अपना सामान उठाया और एयरपोर्ट के लिए रिक्षा पकड़ लिया। बारिश बहुत हो रही थी सुबह का समय था मैं अपने समय से बहुत पहले ही एयरपोर्ट पहुंच गया। एक कॉफी लिए मैं एक कोने में जाकर बैठ गया। एक बहुत बूढ़ी औरत दिखी...जो कुछ ढूंढ़ रही थी। मैं बहुत देर तक सोचता रहा कि मैं उठकर उसकी मदद करुं पर मैं उठा नहीं... एक औरत उसके पास गई.. उस औरत ने उसे इशारे से बताया कि बाथरुम वहाँ है। वह बूढ़ी औरत जब धीरे-धीरे चलती हुई बाथरुम की तरफ जा रही थी तो मुझे अपनी माँ दिखीं... नहीं वह कभी भी इतने बूढ़ी नहीं थी.. पर वह दिखीं। मैंने अपनी कॉफी छोड़ी और उस बूढ़ी औरत की तरफ लपका..। मैं जैसे ही उनके पास पहुंचा वह मुझे देखकर मुस्कुराने लगी... मैंने उनसे कहा... ’माँ... ’ वह बूढ़ी औरत रुक गई और मुझे आश्चर्य से देखने लगी। मैं फिर ठंड़ा पड़ चुका था.. चुप...। वह बूढ़ी औरत कुछ डर गई...। जल्दी से मुड़ी और बाथरुम की तरफ जाने लगी... कुछ देर मैंने उन्हें जाते हुए देखा... और मैं फिर उनके पीछे हो लिया..। ठीक बाथरुम के पास मैंने उन्हें रोक लिया... ’माँ...।’ वह बूढ़ी औरत कांप रही थी.. बहुत डर चुकी थी..। अचानक वह मुझे डांटने लगी.. मुझे पागल कहकर संबोधित करने लगी.... कुछ लोग हमारे पास आ गए...। मुझसे कुछ भी कहते नहीं बना.. मैं वहीं ठंडा खड़ा रहा...। बहुत से लोगों ने मुझे धक्का देखर वहाँ से अलग कर दिया। मैं उस बूढ़ी औरत से क्या कहना चाहता था...? मुझे नहीं पता.. मैं शायद माँ से संवाद चाहता था जो बहुत पहले बंद हो चुके थे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;माँ पिताजी के बारे में ऎसे बात करती थी मानो वह कोई सैनिक हो जिसका काम उनपर पहरा देना हो। पिताजी जब तक जीवित थे उन्होंने माँ पर पहरा दिया। शादी के बाद पिताजी हमेशा घर में ताला लगाकर जाते थे। माँ लिखना चाहती थी इसलिए घर में पिताजी को जहाँ कहीं भी पेन दिखता वह तोड़ देते। तभी मैं पैदा हुआ और माँ ने पहली बार कोमलता देखी और उन्होंने मेरा नाम कोंपल रख दिया। मुझे हमेशा से लगता रहा है कि माँ के दो जीवन हैं... एक पिताजी से पहले और एक पिताजी के बाद...। पिताजी से पहले का जीवन माँ हमेशा भूल जाना चाहती थी इसलिए वह उन्हें सबसे ज़्यादा याद रहता था। पिताजी के बाद का जीवन वह अभी तक जी रही थीं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;हवाईजहाज़ में बैठते ही मुझे पहली बार अपने वह दिन याद आ गए जब मैं अपने घर की खिड़की से कभी-कभी कोई हवाईजहाज़ देख लेता था... माँ इसे अच्छा शगुन मानती थी। वह तुरंत मुझे एक रुपये का नोट देती और कहती कि जा जाकर पेड़े ले आ, आज रात प्रसाद में पेड़े खाएगें। हम बहुत पेड़े नहीं खा पाते थे... शायद हवाई जहाज़ के लिए पेड़े भी इसलिए थे कि वह बहुत कम ही हमारे गांव से गुज़रते थे... अगर ज़्यादा गुज़रते तो हम पेड़े से बताशे पर उतर आते इसका मुझे पूरा यक़ीन था। मेरे बड़े होते-होते हमारे गांव से कभी-कभी एक दिन में दो हवाई जहाज़ गुज़र जाते ... दूसरे हवाई जहाज़ का ज़िक्र ना तो माँ मुझसे करती और ना मैं माँ से...। दूसरे हवाई जहाज़ पर हम दोनों मौन हो जाते.. और खुद को इधर-उधर के कामों में व्यस्त कर लेते जैसे हम कुछ सुन ही नहीं पा रहे हो।&lt;br /&gt;हम ज़मीन से बहुत ऊपर उड़ रहे थे। तभी मेरे सामने एयर होस्टेस ने खाना रखा... मैंने उसे धन्यवाद कहा...। मैंने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था... बहुत भूख लगी थी...। मैंने जल्दी में खाना खाने की कोशिश की पर कुछ भी मेरे मुँह में नहीं गया। मेरे बगल में एक सज्जन बैठे थे जो बड़ी तल्लीनता के साथ खा रहे थे... वह मुझे खाता ना देखकर रुक गए। उन्हें लगा खाने में कुछ खराबी है...। मैंने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया.. और खड़की के बाहर देखने लगा...। छोटे-छोटे कुछ गांव मुझे दिखाई दिये... मैं बहुत ध्यान से एक-एक घर को देख रहा था.. मुझे लगा शायद खिड़िकी में बैठा हुआ मैं खुद को दिख जाऊंगा...। मैं उन पेड़ों का स्वाद अपने मुँह में महसूस कर सकता था। मुझे अचानक सब कुछ धुंधला दिखने लगा... मेरी आँखों में पानी भर आया था...। मैं झेंप गया। बगल में बैठे सज्जन खाना खाते हुए मुझे देख रहे थे..। मैंने खाने में से टिशु उठाया और अपनी आँखे पोंछ ली...। किस बात पर मैं रो दिया था? मुझे समझ में नहीं आया... मैं कब आखरी बार रोया था? मुझे याद नहीं.... नहीं इसे रोना नहीं कहते... मैं रोया नहीं था.. बस किसी कमज़ोर क्षण में मेरी आँखें छलक गई थी और कुछ भी नहीं... नहीं मैं रो नहीं सकता हूँ। &lt;br /&gt;मैंने अपनी कुर्सी पीछे की और अपनी आँखें बंद कर ली...। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कितने मासूम दिन थे वह। माँ मेन बोर्ड स्कूल से रोज़ शाम को लाल रंग की प्लास्टिक की टोकरी लेकर आती थी... मैं अकेला घर में उनका इंतज़ार किया करता था..। रोज़ उनकी लाल रंग की प्लास्टिक की टोकरी में कुछ चॉक के टुकड़े पड़े होते। वह दिन भर अकेले रहने के इनाम के तौर पर मुझे दे देती। चॉक के टुकड़े इनाम थे... मेरे अकेलेपन के...। एक भगवान का आला था जिसमें भगवान रहते, इस बात पर मैं उस वक़्त ऎसे विश्वास करता था जैसे इस बात पर कि समुद्र में इतना पानी होता है कि उसका दूसरा किनारा नहीं दिखता... मैं भगवान को भी चित्रों में देखा था और समुद्र को भी....। उस भगवान के आले में बिछे लाल कपड़े के नीचे माँ के हर महीने के साठ रुपये होते। हर महीने साठ रुपये का हमारा खेल था... कभी साठ रुपये पच्चीस तारीख़ को खत्म हो जाते तो कभी इक्कीस तरीख़ को ही दम तोड़ देते...। पर वह महीने जिनमें हम छब्बीस या सत्ताईस तारीख़ तक पहुंच जाते वह महिने स्वर्ग के महीने कहलाते..। मेरे बड़े होते-होते माँ की तनख़्वा एक सो सत्तर रुपये तक पहुंच गई थी... मैं इन दिनों कुछ पैसे भगवान के आले से चुराना भी सीख गया था। पैसे चुरा तो लेता पर उनका क्या करना है यह कभी सोचा नहीं था। चोरी किये हुए पैसे मेरी स्कूल की गणित की किताब में जमा होते गए... पर घबराहट इतनी ज़्यादा बढ़ती चली गई कि गणित में मैं फेल होता गया...। गणित की कापी जब भी खोलता उसमें चोरी के पैसे दिख जाते.. और मैं वहीं उसे उसी वक़्त बंद कर देता। फिर एक दिन मैं पंजाब नेशनल बैंक चला गया उन्हें जमा करने... पर मेरा सिर उस बैंक के काऊंटर तक ही पहुंचता था.. सो हाथ से इशारा करके मैंने एक औरत से कहा कि ’सुनिये मेरे पास पैसे हैं.. मुझे इसे बैंक में जमा करना है...। बड़े होने पर मैं आपसे ले लूंगा...।’ उस औरत ने मुझे पहचान लिया और पैसे समेत मेरी पेशी माँ के सामने करा दी... पर माँ ने उस औरत से कहा कि ’मैंने ही इसे पैसे दिये थे.. बैंक में जमा करने के लिए...’ वह औरत मेरी माँ की मूर्खता पर बहुत हंसी थी.... मैं उस वक़्त भीतर रोया था.. और शायद वह ही दिन था जिस दिन से मैंने बड़ा होना शुरु किया था....। बड़े होते रहने के अपने दुख थे... जिसमें बूंद-बूंद अपनी संवेदनशीलता को कठोर होते देखना... और कुछ ना कर पाना.. एक ग्लानी थी। इन सारे दिनों की काईं जैसी भीतर जमा होती गई थी... ग्लानी जिसको कहा जा सकता है। अपने ही बिताए खूबसूरत मासूम दिनों की ग्लानी...। &lt;br /&gt;मैंने लिखना कब छोड़ा था..? बहुत गर्मी के दिन थे तब...। मुझे पसीना बहुत अच्छी तरह याद है... गर्दन के पीछे, रीड़ की हड्डी से सरकता पसीना...। मेरे हाथ में मेरी एक मात्र छपी हुई कहानियों की किताब थी...। इस संकलन का नाम था “अनकहा...”। ठीक इस वक़्त से कुछ समय पहले मैंने अपना एक अधूरा उपन्यास, और बहुत सी बिखरी हुई कविताएँ जलाई थीं...। गर्मी उसी की थी... पसीने की बूंदे जो मेरे गर्दन से नीचे की तरफ सफर कर रही थीं.. उनका संबंध उस आग से भी था जिसकी आंच अभी भी बाल्टी में धधक रही थी।  मैंने ऎसा क्यों किया था...? उस दिन मेरी कहानियों की किताब ’अनकहा’ का पहला पृष्ठ मेरी गोद में खुला हुआ था... और मैं उसमें लिखा हुआ वाक्य पढ़ रहा था..“माँ के लिए...”। &lt;br /&gt;गाँव में रहते हुए मुझे एक स्वन ने एक दिन घेर लिया था। उस सपने में मुझे एक आदमी दिखा जिसकी शक़्ल मेरे बाप से मिलती हुई थी। मैंने मेरे बाप की बहुत सी तस्वीर देखीं है..... उन सारी तस्वीरों में वह बहुत जवान दिखते थे... पर मेरे स्वप्न में वह वृद्ध थे.. पहाड़ी वृद्ध..। उनके चहरे पर खिंची आड़ी-तिरछी लक़ीरों में मुझे पीला द्रव्य बहता हुआ दिखता..। फिर उन सपनों का तारतम्य बनने लगा... वह धीरे-धीरे अपनी कहानी को आगे बढ़ाने लगे...। मेरा वृद्ध पहाड़ी बाप मुझसे गुज़ारिश करने लगे कि... कृप्या मेरे चहरे से यह पीलापन हटा दो...। मैं उनके चहरे को छूने से डरता...। बहुत करीब जाकर देखा तो उनके चहरे की लक़ीरों में मुझे पीला द्रव्य बहता हुआ नज़र आया.... मैंने एक लकड़ी उठाई.. और उस द्रव्य को उस लकड़ी से रगड़-रगड़ कर निकालना शुरु किया...। पीछे एक पीपल का पेड़ था.. उसके पत्ते झड़कर अगल-बगल गिर रहे थे...। बहुत मद्धिम हवा का पत्तों से रखड़ाना मैं साफ सुन सकता था। इस सरसराहट के बीच मेरे पहाड़ी बाप की कराह भी थी और उस कराह के पीछे छिपे हुए कुछ शब्द थे... जो बहुत जल्द वाक्यों में बदलते जा रहे थे...। &lt;br /&gt;’बेटा... इस पीले द्रव्य का मूल खोज..’&lt;br /&gt;’ऊपरी सफाई घोखा है।’&lt;br /&gt;’पीड़ा तेरे होने की नहीं है.. पीड़ा मेरे ना होने की है।’&lt;br /&gt;’इस जगह से कहीं निकल जा.. वरना अंत में वह बन जाएगा जिसके सपने तुझे डराते हैं।’&lt;br /&gt;यह सपने मुझे कुछ साल भर आते रहे...। इसकी शुरुआत सिर्फ पीपल का पेड़ था और अंत यह आखरी वाक्य।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;प्लेन समय पर उतरा। मेरा गांव करीब यहाँ से नब्बे किलोमीटर दूर था। मैंने एक टेक्सी की... और गांव की तरफ चल दिया। मैं यहाँ आखरी बार दो साल पहले आया था। वह मेरी माँ से आखरी मुलाकात थी.. जो बहुत ही डरावनी थी। आज भी याद करता हूँ तो सिहर जाता हूँ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;धीरे-धीरे, कदम-कदम हमने बिख़री हुई सी कुछ चीज़ों को एकत्रित किया था और उसे घर कहना शुरु किया था। बहुत छोटी-छोटी चीज़ों को लेकर हम खुश हो जाते और बिना वजह एक दूसरे से चिड़ने लगते। तभी वह कुछ लोग घर आने लगे जिन्हें लेकर पहली बार मैंने भय महसूस किया..। वह लोग दिन के उजले में घर आते और माँ से हंस-हंस कर बातें करते.. और रात के अंधेरों में खो जाते..। यह वह ही समय था जब मुझे बार-बार चाय बनानी पड़ती थी...। तभी पहली बार मुझे ऎहसाह हुआ था कि मेरी माँ बहुत खूबसूरत हैं... उनके काले घने लंबे बाल हैं... उनका ताबंई रंग...उनका लंबा पतला शरीर..। माँ ऎसी नहीं होती है... बाक़ी सबकी माँए बूढ़ी होने की सीडियाँ चढ़ती हुई थकी सी दिखती थीं पर मेरी माँ एक उम्र पर रुकी हुई थीं। मेरे बड़े होने के दुखों में यह दुख अपना वज़न लगातार बढ़ाए जा रहा था। मैं माँ को बूढ़ा चाहता था। &lt;br /&gt;एक रात सोते वक़्त मैंने माँ से कहा था...&lt;br /&gt;’माँ आप बहुत खूबसूरत हो...?’&lt;br /&gt;मैं अपनी बात कहना चाहता था पर यह सवाल के रुप में मेरे मुँह से निकला.... माँ कुछ देर चुप रही फिर उन्होंने कहा...&lt;br /&gt;’बेटा क्या मुझे शादी करनी चाहिए...?’&lt;br /&gt;मैं दंग रह गया...। अचानक मुझे घबराहट होने लगी... मैं कुछ देर में पसीने-पसीने हो गया.. मैं ज़ोर-ज़ोर से सांसे लेने लगा...। माँ मेरे करीब आई और उन्होंने मुझे अपनी और खींचना चाहा... मैंने उन्हें झटका देकर अलग कर दिया...। गुस्से में मैं उठकर बाथरुम गया...।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कितनी इच्छा होती है कि गांव वैसा ही रहे... हमारी स्मृतियों में वह जैसा गुदा हुआ है। वहाँ कभी लोग बूढ़े ना हो.. कभी हमारी जी हुई पगड़ंडियों पर हमारे ना होने की डामर ना बिछ जाए। जैसे ही मेरी टेक्सी गांव की सरहद में घुसी मुझे मेरा शरीर भारी लगने लगा... मैंने अपनी शर्ट के कुछ बटन खोल दिये..&lt;br /&gt;“यार सुनों ज़रा ए सी चालू कर दो...”&lt;br /&gt;“साहब वह चालू है...।“&lt;br /&gt;मुझे बहुत गर्मी लग रही थी। टेक्सी मेरे मौहल्ले की तरफ बढ़ रही थी। मुझे कुछ सूरते पहचानी हुई लग रही थी पर मुझे लगा सब लोग धूप में जले हुए हैं। तभी मैंने परायापन महसूस किया... अब मेरा इस गांव से कोई संबंध नहीं है.. कुछ भी नहीं...। दो साल पहले जब मैं यहाँ आया था तो एक गुस्सा था इस गांव को लेकर... अब वह भी नहीं है। मैंने कहीं भी अपनी टेक्सी नहीं रोकी...। मैं सीधा अपने घर की तरफ बढ़ा...।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ और मेरे संबंध में मेरा लिखा हुआ एक रक्त की तरह काम करता था जिसका संचार बहुत समय तक लगातार बना रहा। मैं शहर आ गया था... माँ से बहुत कहा कि चलो यहाँ क्या रखा है मेरे साथ रहना... पर वह नहीं मानी... कहने लगी ’मेरी सारी उम्र यहीं कटी है.. तू आता रहना और मैं भी आती रहूंगी.. फिर तेरा लिखा पढ़ूगीं तो तू पास ही रहेगा।’ माँ मेरे साथ नहीं आई.. कई साल बीत गए... बीच-बीच में वह आती रहती फिर उन्हें गाव वापिस जाने की जल्दी लग जाती.... मेरा जाना बहुत कम होता था। इसी बीच मेरा पहला कहानी संकलन ’अनकहा’ छपा... उस समय माँ मेरे साथ थी... बहुत खुशी थी उन्हें उस बात की... हम दोनों उस रात बाहर खाने गए थे.. खाने के बीच में ही उन्होंने कहा...&lt;br /&gt;’तुझसे एक बात कहनी है...?’&lt;br /&gt;’बोलो माँ....’&lt;br /&gt;’तुम सोनी जी को जानते हो ना...?’&lt;br /&gt;’हाँ... वह वकील थे ना....’&lt;br /&gt;सोनी जी वक़ील थे..। सब्ज़ी बाज़ार के पास कहीं रहते थे... अब मुझे ठीक से याद नहीं है.. । उनका एक लड़का था... जो मेरे से बड़ा था.. उससे मेरी कभी नहीं बनी... हम हमेशा आपस में लड़ लेते थे... उसके कारण मैं सोनी जी को भी बहुत पसंद नहीं करता था। &lt;br /&gt;’हाँ वही वकील...’ यह कहते ही माँ चुप हो गई...&lt;br /&gt;’क्या हुआ उन्हें....?’&lt;br /&gt;’नहीं उन्हें कुछ भी नहीं हुआ है... वह मेरे साथ रहना चाहते हैं..।’&lt;br /&gt;’क्या मतलब...? उनका तो अपना घर है... वह तो.... ।’&lt;br /&gt;मैं कुछ आगे बोल पाता इससे पहले मैंने माँ का चहरा पढ़ लिया.... जिसपर उस रात की छाया थी जब उन्होंने कहा था कि ’बेटा क्या मुझे शादी करनी चाहिए?’ मैं डर गया... कहीं यह वही बात तो नहीं है..। माँ बूढ़ी हो चुकी हैं.. वह मेरी माँ है.. पिताजी मेरे सपने में आते हैं... भले ही मैंने उन्हें कभी देखा नहीं है.. पर मैं जानता हूँ मेरी माँ कौन है और मेरे पिताजी कौन है...। पता नहीं क्या-क्या मेरे दिमाग में उबलने लगा... फिर मुझसे कुछ भी नहीं हुआ.. मैं पसीने-पसीने था। माँ बहुत देर तक मुझे कुछ-कुछ समझाती रहीं... पर मैं कुछ भी सुन नहीं पा रहा था...। &lt;br /&gt;अगले दिन माँ वापिस गांव चली गई। उस रात मैंने बाथरुम से लोहे की बाल्टी उठाई और उसमें अपने सारे लिखे को जला दिया... उस दिन की गर्मी मुझे अभी तक याद है...। हाथ में बस वह कहानी संग्रह था ’अनकहा...’ जिसके पहले पृष्ठ पर लिखा था.. ’माँ के लिए....’। बहुत दिनों तक मुझे मेरे पिताजी के सपने आते रहे... मैं उनके बूढ़े चहरे से पीलापन निकालता रहा... मैं उस पीलेपन की जड़ भी खोजना चाहता था.. पर जड़ें कहाँ थी? इसका उत्तर मैं कभी भी नहीं खोज पाया....। खुद को बहुत समझाने पर भी मैं “माँ”’ शब्द के भीतर ’आज का समझदार आदमी’ नहीं घुसा पाया...। मैं माँ का अकेलापन भी समझता था.. उनकी सारी बातें सहीं थी पर मैं अलग ही इतिहास को जानता था.. जिसमें माँ... माँ की तरह होती है। मैंने उसके बाद कभी भी यह नहीं जानना चाहा कि वह कैसी हैं.. मैं कभी-कभी उनसे बात कर लिया करता था.. बस.. वह कैसे रह रही हैं..? क्या हो रहा है..? मैं अपने संवादों को वहां तक जाने ही नहीं देता था। &lt;br /&gt;मैंने चश्मा पहन लिया था जिसमें जैसा और जितना मैं देखना चाहता था मुझे उतना ही दिखता था। चीज़ों के पीछे के सत्य में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी...। इस चश्में का असर मेरे लिखने पर बहुत हुआ.. मेरा लिखना लगभग छूट चुका था... जब भी कोशिश करता... चश्मा कहीं गायब हो जाता और उस चश्में के बिना जो भी दिखता वह मेरी सांस की नली में कहीं फस जाता.. मैं पसीने-पसीने हो जाता.... घबरा कर घर से बाहर चला जाता... वापिस दोस्तों के बीच अपना चश्मा पहन लेता। काम बहुत अच्छा चलने लगा था.. मैं अपने ऑफिस में बुरी तरह व्यस्त हो चुका था...। लिखन में दिलचस्पी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी....।&lt;br /&gt;कुछ ही समय बीता था कि जीवन एक ढलान पर तेज़ी से आगे बढ़ने लगा था। एक घर खरीद लिया था.. ऑफिस में ही एक लड़की थी जिससे घर सजाने की बातें होने लगी थीं...। मैंने कभी कोई निर्णय नहीं किये...। अधूरी पढ़ी कहानियों के चक्कर में कब लिखना शुरु कर दिया पता नहीं चला.. शहर आया तो किसी ने कहा कि लिखते रहना पहले यह अच्छा काम मिल रहा है उसे क्यों ठोकर मारते हो... मैंने काम कर लिया और लिखना कबका पीछे रह गया...। माँ की सारी समस्या को मैंने बहुत पीछे अपनी सारी व्यस्तताओं में दबा के रख दिया था...।&lt;br /&gt;तभी गांव से मेरे कुछ दोस्तों के फोन आने लगे..। वह मुझसे सीधी बात नहीं करते थे.. वह इधर-उधर घुमाकर मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछते...। मैं बहुत समय तक बात समझा नहीं...। फिर एक दिन मैंने अपने दोस्त सुधीर को मैंने फोन लगाया.. सुधीर मेरा एक मात्र दोस्त रह गया था गांव में... उसने मुझसे कहा कि तेरी माँ और सोनी जी साथ रहने लगे हैं...। यह गांव के लिए बड़ी बात है.. पहले सब खुसफुसाहट में बात करते थे पर अब लोग सीधा बोलने लगे हैं..  और भी बहुत सी बाते उसने कहीं जिसपर मैंने फोन काट दिया...। &lt;br /&gt;मुझे लगता है हम लोग इस बड़े महाकाव्य में व्यक्ति ना होकर महज़ शब्द हैं...। वह मेरे लिए एक शब्द है ’माँ..’ जिसकी परिभाषा मेरे खून में है... उस परिभाषा से अलग अगर वह व्यक्ति व्यवहार करता है तो वह व्यक्ति अपने शब्द की परिभाषा लांघ रहा है.. जिसे कैसे सहन करना है मुझे कभी नहीं सिखाया गया..। मैं भी एक शब्द हूँ ’कोंपल..’। मैंने भी अपनी परिभाषा लांघी है... मैं कठोर रहा हूँ.. ’माँ...’ शब्द के लिए.. जबकि यह नाम उन्होंने ही मुझे दिया था। मेरा गांव से कोई संबंध नहीं था... पर माँ का वहाँ उन लोगों के बीच इस तरह रहना बहुत कठिन था। मैं अब अपनी व्यस्तता के पीछे छिपकर नहीं बैठ सकता था.. मुझे इसे सुलझाना ही था किसी भी कीमत पर.. बहुत सोचने पर मैं एक नतीजे पर पहुंचा.. कि माँ को यहाँ ले आऊंगा.. चाहे वह कुछ भी समझे.. उन्हें अपने साथ रखूंगा। मैं पहली फ्लाईट से अपने गांव पहुंचा......&lt;br /&gt;गांव में घुसने से पहले मैंने सुधीर को गांव के बाहर वाले एक ढ़ाबे पर बुला लिया..। उससे कुछ देर बात करने पर पता चला कि माँ बहुत कम ही घर से निकलती हैं.... सिर्फ सोनी जी बाज़ार में कभी कभार किसी को दिख जाते हैं..। लोगों के लिए मसाला है... सबके पास कहने के लिए बहुत कुछ है...। मैं चुप चाप सब सुनता रहा... फिर मैंने उसे बताया कि मैं माँ को अपने साथ ले जाने आया हूँ। उसने कहा यह ही सही है। कुछ देर की बात के बाद मैं सीधा अपने घर पहुंचा....। दरवाज़ा सोनी जी ने खोला। &lt;br /&gt;’अरे वाह!!! तुम आ रहे हो तुमने बताया भी नहीं... सुनिये!! देखिए कौन आया है आपका ’कोंपल..’।”&lt;br /&gt;मैं सीधा भीतर चला गया.. सोनी जी की तरफ बिना ध्यान दिये..। माँ पूजा वाले कमरे में लेटी हुई थीं। मैं सीधा उनके पास गया.. उनके पैर छुए... बड़ी मुश्किल से वह अपने पलंग से उठ पाईं...।&lt;br /&gt;’क्या हुआ माँ?’&lt;br /&gt;वह बहुत दुबली हो चुकी थीं... जर-जर काया... शरीर बहुत गर्म था। मैं उनके बगल में बैठ गया..।&lt;br /&gt;’रहने दीजिए, उठने की क्या ज़रुरत है... क्या हुआ है माँ?’&lt;br /&gt;तभी मुझे सोनी जी की आवाज़ आई.. वह दरवाज़े पर खड़े थे....&lt;br /&gt;’कई महिनों से इनकी ऎसी ही हालत है...। डॉक्टर ने पूरी तरह बेड-रेस्ट बोला है... पर यह मानती कहाँ है...? मैंने कहा था कि तुम्हें बता दें... या मैं तुम्हारे पास छोड़ आता हूँ... पर इन्होंने मना कर दिया..। चाय पियोगे?’&lt;br /&gt;कुछ देर चुप्पी बनी रही.. मैं सोनी जी की आवाज़ अपने भीतर चबा रहा था.. ’’यह कौन होते है मुझे बताने वाले कि मेरी माँ कैसी है कैसी नहीं है!!” किचिन में कुछ बर्तनों की खट-पट सुनाई दे रही थी..। भगवान के कमरे की खुशबू बिलकुल वैसी ही थी... उन्हीं दिनों की...। घर बहुत साफ दिख रहा था। मैं कब से माँ से नही मिला हूँ? बहुत समय हो गया.. उनसे बात किये भी काफी समय बीत चुका था। माँ मुझे देख नहीं रही थीं.. वह मुझे निहार रही थीं...।&lt;br /&gt;’कुछ लिखना शुरु किया...?’&lt;br /&gt;’नहीं....।’&lt;br /&gt;मैं भीतर नारज़गी लेकर आया था जो कुछ माँ की हालत को देखकर पिघली थी.. पर कड़वाहट बहुत सी थी... जिसकी वजह से जवाब तुरंत मुँह से निकल गया।&lt;br /&gt;’तुम बाहर बैठो.. मैं हाथ मुँह धोकर आती हूँ।’&lt;br /&gt;माँ ने यह मुस्कुराते हुए कहा था पर मैं समझ गया कि उन्होंने कुछ सूंघ लिया था। वह मेरी माँ थीं... मेरे माथे के बल से समझ जाती है कि भीतर क्या चल रहा है। मैं बाहर के कमरे में जाकर बैठ गया.... सोनी जी मेरे लिए चाय ले आए.. और मेरे सामने आकर बैठ गए। उनसे संवाद मुश्किल थे.. सो मैं उनकी तरफ देख भी नहीं रहा था। अपने ही घर में मैं महमान की तरह बैठा था। कुछ देर में माँ बाहिर आई.। अभी भी वह वैसी ही खूबसूरत थीं... लंबी, ताबंई रंग..। सोनी जी ने उठकर उन्हें सहारा देना चाहा पर माँ ने मना कर दिया, वह मेरे बगल में आकर बैठ गई।&lt;br /&gt;’मुझे बाज़ार में कुछ काम है.. मैं आता हूँ...!!!’&lt;br /&gt;सोनी जी स्थिति समझ चुके थे..। वह जाने लगे...&lt;br /&gt;’नहीं.. रहने दीजिए.. कोंपल आया है... बाज़ार बाद में चले जाईयेगा।’&lt;br /&gt;सोनी जी कुछ समझ नहीं पाए...। वह वापिस आकर बैठ गए।&lt;br /&gt;’रुकोगे कुछ दिन...?’ माँ ने पूछा...&lt;br /&gt;मैं सोनी जी के सामने संवाद नहीं करना चाहता था... मैंने उनकी तरफ एक बार देखा..। वह सहमें से मेरे सामने बैठे रहे..।&lt;br /&gt;’यह घर के ही आदमी हैं...।’ माँ ने कहा...&lt;br /&gt;माँ सीधी बात पर आना चाहती थीं....। मेरे पास कोई चारा नहीं था....&lt;br /&gt;’माँ मैं आपको लेने आया हूँ... हम आज शामको साथ चल रहे हैं..। मैंने फ्लाईट टिकिट भी बुक कर ली है आपके लिए...।’&lt;br /&gt;’देखा अपने कितना प्यार करता है मुझसे यह...।’&lt;br /&gt;उन्होंने यह बात सोनी जी से कही...। सोनी जी आधा लजाए, आधा मुस्कुरा दिये..। &lt;br /&gt;’माँ मैं टिकिट भी बुक कर चुका हूँ। आपको मेरे साथ चलना ही पड़ेगा...।’&lt;br /&gt;’कहाँ ले जाएगा मुझे??? रख पाएगा अपने साथ?’&lt;br /&gt;’आप मेरी माँ हो..!! क्यों नहीं रखूगां?’&lt;br /&gt;’माँ जिससे शर्मिदगी हो रही है... तभी तू भागा हुआ आया ना...?’&lt;br /&gt;’देखो माँ... मैं यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकता.... कि...’&lt;br /&gt;’देख तुझसे तो बोला भी नहीं जा रहा है...।’&lt;br /&gt;बात बिगड़ गई थी... मैं कुछ देर चुप रहा..। सोनी जी अपनी बगले झांक रहे थे... माँ सीधा मुझे ही देख रही थीं। माँ ने फिर पूछा...&lt;br /&gt;’क्या बर्दाश्त नहीं कर सकता?’&lt;br /&gt;’माँ आपको पता है यहा लोग आपके बारे में क्या-क्या बोल रहे हैं? इस उम्र में यह सब ठीक लगता है क्या? मैं बस और कुछ नहीं सुनना चाहता... मैं चाहता हूँ आप मेरे साथ रहो बस...।’&lt;br /&gt;’बहुत पहले मैंने एक दुकान खोली थी... जिसमें बहुत सारी चीज़े बिकती थी। तब उस वक़्त लगा कि देखो मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ... लोग मुझसे वह खरीदने आते हैं जो मैं बेचती हूँ। फिर उम्र के साथ-साथ दूसरा ख्याल घर कर गया कि नहीं मैं असल में महज़ एक ज़रिया हूँ.. कोई है जो थोक में चीज़े बनाता है.. मैं बस उसे फुटकर में लोगों तक पहुंचाती हूँ। मैं असल में वही बेच रही हूँ जो लोग खरीदना चाहते हैं... तो मैं क्या चाहती हूँ....? इसका उत्तर मेरे पास नहीं था। एक दिन मैंने यह दुकान बंद कर दी.... बस..। लोगों को अब मैं कुछ भी नहीं बेच रही हूँ... और तुम्हें भी...।’&lt;br /&gt;मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। मैंने इस तरह की बातों की कभी कल्पना भी नहीं की थी। मैं चुप हो गया..। कुछ देर मैं घर में बिताना चाहता था पर वह मुमकिन नहीं था। माँ अपने कमरे में वापिस चली गई। पता नहीं क्यों मेरी इच्छा हुई कि मैं सोनी जी से बात करुं... पर मैं उनसे कुछ कह नहीं पाया.... मैंने अपना सामान उठाया और जाने लगा... सोनी जी मुझे बाहर तक छोड़ने आए...&lt;br /&gt;’बीमारी के कारण थोड़ी चिड़चिड़ा गई हैं... वैसे हमेशा तुम्हारे बारे में बातें करती हैं...।’&lt;br /&gt;सोनी जी ने कहा, मैने जाते वक्त उन्हें उन्हें प्रणाम किया..। यह दो साल पहले मेरी माँ से आखरी मुलाकात थी... जिसे सोचकर आज भी मैं सिहर जाता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;मैंने टेस्की वाले को अपने घर की गली के बाहर ही रोक दिया। मैं अपने घर चलकर जाना चाहता था। घर के सामने सुधीर दिखा...। हम एक दूसरे के सामने मूक खड़े रहे.. फिर उसने कहा की ’अंदर चले जाओ.... कुछ सामान रह गया है मैं उसे लेकर आता हूँ।’ मैं भीतर गया तो सब जगह चुप्पी थी... भगवान के कमरे से कुछ धुंआ निकल रहा था। मैं भगवान के कमरे में गया.. वहाँ माँ का शव रखा हुआ था.. सोनी जी बगल में बैठे हुए थे.. एक थाली में राख रखी हुई थी... और बहुत सी दूब जल रही थी। मैं माँ के शव के बग़ल में बैठ गया। सोनी जी ने मुझे देखा... उनकी आँखे लाल थी... मैं उनसे दूर बैठा था... वह खिसकर मेरे पास आ गए..। मेरे कंधे पर हाथ रखा... फिर कुछ देर में अपना सिर मेरे कंधे पर रख लिया...। मैंरा पूरा शरीर कड़क हो गया... वह रो रहे थे... सुबक-सुबक कर .. बच्चों की तरह...। मैंने अपने कंधे को हल्का सा झटका दिया... वह अलग हो गए... फिर कुछ समय में उठकर बाहर चले गए....। &lt;br /&gt;कैसे ऎसा होता है कि आज के बाद वह हमारे जिए में नहीं होगीं...। किसी की मृत्यु पर सबसे ज़्यादा दुख हमें किस बात का होता है? शायद उस ख़ाली जगह का जो उसके जाने के बाद छूट गई है... नहीं हमारे भीतर नहीं... हमारे भीतर की ख़ाली जगह भरने के हमारे पास बहुत गुण हैं। ख़ाली जगह वह छूट जाती है जहाँ वह हमेशा से थीं.. जैसे इस घर और मेरे बीच के संबंध... मेरे और इस गांव के संबंध के बीच की ख़ाली जगह... मेरे और मेरे कोंपल होने के बीच की जगह... मेरे और मेरे माँ शब्द के बीच की जगह... और पता नहीं क्या-क्या? उनके चले जाने पर महसूस होता है कि असल में वह हर जगह कहीं न कहीं मौजूद थीं...। उन जगहों पर अब मेरी ही आवाज़ लौटकर मेरे पास आएगी... मेरा हर हरकत गूंजेगी मेरे ही कानों में....। हमें सालों इतज़ार करना होता है.. तब कहीं इस ख़ाली जगह में... हल्की सी घांस नज़र आने लगती है.. फिर हम एक रात की किसी कमज़ोर घड़ी में वहाँ पेड़ लगा आएगें... और वह बहुत समय बाद एक हरा भरा घांस का मैदान हो जाएगा... तब शायद हम कह सकेगें कि वह अब जा चुकीं हैं...।&lt;br /&gt;मुझे लग रहा था कि माँ बहुत गहरी नींद में हैं... अभी आँखें खोलेगीं और मुझसे पूछेगीं कि ’कुछ नया लिखा?’ वह अभी भी माऒ जैसी माँ नहीं थीं... वह अभी भी खूबसूरत लग रहीं थीं। मैं खिसकर उनके चहरे के पास आ गया... उनके गालों हो हल्के से छुआ...। गाल बहुत ठंड़े थे...। मैंने उनके चहरे पर हाथ फैरा.. और लगा कि वहाँ कुछ नहीं है... कोई हरकत नहीं...। मैं उनके माथे और आखोंको हल्का सहलाने लगा... और मुझे वहाँ इंतज़ार दिखा... लंबा इंतज़ार.. जिसकी रेखाएं हल्की पीली पड़ चुकी थीं....। मैंने एक कपड़ा लिया और उसे पानी में भिगोकर उस पीलेपन को हल्के-हल्के मिटाने लगा...। तभी सोनी जी की बच्चों सी सुबक सुनाई दी... वह दरवाज़े पर खड़े रो रहे थे...। मेरी इच्छा हुई कि मैं उनसे माफ़ी मांग लूं... मेरे ना होने की और इस वक़्त मेरे यहां होने की... सब- सारी बातों की माफी...।&lt;br /&gt;कुछ देर में सुधीर अर्थी का सामान ले आया....। उसके साथ कुछ लोग ओर थे। सभी उसके हम उम्र थे.. उसके दोस्त होगें जो माँ को जानते भी नहीं है शायद..। माँ की शव यात्र में सिर्फ हम तीन ही लोग होगें इस बात से शायद सुधीर घबरा गया होगा..। अब हम तीन नहीं थे हम पांच थे..। मुझे अच्छा लगा...। माँ ने बहुत पहले एक लेखक की डायरी से पढ़कर एक वाक़्य सुनाया था..जो मुझे याद आ गया... “जीवन में अकेलेपन की पीड़ा भोगने का क्या लाभ यदि हम अकेले में मरने का अधिकार अर्जित न कर सकें? किन्तु ऎसे भी लोग हैं जो जीवन-भर दूसरों के साथ रहने का कष्ट भोगते हैं, ताकि अन्त में आकेले न मरना पड़े।“ &lt;br /&gt;शमशान में माँ को सूखी लकड़ीयों के बीच लेटा हुआ देखा तो इच्छा हुई कि उनसे कह दूं कि मैं कोंपल नहीं हूँ...। मेरी कोमलता बहुत पहले ख़त्म हो गई थी... मैं सूखा हुआ पत्ता हूँ जो बहुत पहले अपने पेड़ से अलग हो गया था। सुधीर अग्नि लेकर मेरे पास आया.. माँ को अग्नि देने की मेरी हिम्मत नहीं हुई..। मैं अग्नि देने का अधिकार नहीं रखता था.. मैंने लकड़ी सोनी जी को पकड़ा दी.. और उनसे कहा कि वह अग्नि दें... वह इस का अधिकार रखते हैं.. मैं नहीं..। &lt;br /&gt;मुझे लगा मैं किसी घने हरे पेड़ को जलते हुए देख रहा हूँ...। माँ को जलता हुए देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई मैं नदी की तरफ मुड़ गया....। कुछ देर बाद सोनी जी आए और मैं उनके साथ अपने घर चला गया।&lt;br /&gt;अगले दिन सुबह हम माँ की अस्थियां बटोरने गए.... सुबह की राख में माँ को टटोलना..। जो कहानी कल तक मुझे असह रुप से लंबी लग रही थी वह अभी इस राख में खत्म हो चुकी थी..। इस राख में मैं माँ को ढ़ूढ रहा था... कभी वह मुझे अपने घर के बाहर खड़ी दिखती को कभी लाल डलिया लिये में मेरे लिए चॉक लाती हुई... पर पकड़ में कुछ भी नहीं आता.. सिर्फ राख...। तब पहली बार मैं सोनी जी के गले लगकर रोया था.. बहुत रोया.।&lt;br /&gt;क्या हम कुछ भी नहीं बदल सकते जो बीत गया है? क्या वह समय वापिस नहीं आ सकता जब पेड़ पर मैं कोंपल था? वह दिन जिस दिन सुबह के वक़्त माँ ने मुझे पहली बार कोंपल दिखाई थी...? वह दोपहर जब हम कभी-कभी बिना वजह पेड़े खा लिया करते...? या कम से कम वह दो साल पहले का दिन जब मैं माँ से नाराज़ होकर चला गया था !!! काश मैं रुक जाता.... सोनी जी से बात कर लेता.. माँ किसी को अब कुछ नहीं बेच रहीं हैं... वाली बात समझ सकता....। मैं प्लेन में बैठे-बैठे सोच रहा था कि काश ऎसा कोई प्लेन होता जिसमें बैठकर हम अपने अतीत में जाते और कुछ चीज़े ठीक कर लेते... कुछ लोगों को प्यार दे देते.. किसी के साथ थोड़ा ज़्यादा बैठ लेते... किसी को सुनते और समझते.. कहीं किसी के गले लग जाते और जी भरकर रो लेते..। &lt;br /&gt;प्लेन शहर में उतने वाला था... मैंने अपनी कुर्सी सीधी कर ली थी... खिड़्की खोल दी थी.. और कमर में पेटी बांध ली थी। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-1081717938100990049?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/1081717938100990049/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=1081717938100990049&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1081717938100990049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1081717938100990049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/09/blog-post_09.html' title='माँ.....'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-JoO5aXhK7vk/TmmU7ZL6DPI/AAAAAAAAAt8/sUtH_AB6Wn8/s72-c/mother-nature-tree.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-4651119846257959328</id><published>2011-09-07T18:45:00.004+05:30</published><updated>2011-09-07T18:48:42.404+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>प्यास...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-wLcT5xoG7K4/TmduzaZt2MI/AAAAAAAAAt0/64uALwAA09Q/s1600/IMG_2391.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-wLcT5xoG7K4/TmduzaZt2MI/AAAAAAAAAt0/64uALwAA09Q/s400/IMG_2391.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5649606087099144386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या इतना सब कुछ लिख सकता हूँ मैं जिस सहजता से आँखे देख लेती है और शरीर अपनी सिहरन में नए अनुभव ठूंस लेता है। आज बुद्ध के एक मंदिर में गया था... (मै पूरी तरह नास्तिक हूँ...)। घने जंगल में के बीच मंदिर का नाम कछुए और ड्रेंगन था। सुंदर घना जंगल पार करके जैसे ही हम उस मंदिर में पहुंचे... उसके रंग ... उस जगह की शांति को मैं अपने भीतर आने से रोक नहीं सका...। हम जो पूरे रस्ते अपने घिसे पिटे अनुभवों को हंस-हंस कर एक दूसरे को बता रहे थें... अचानक शांत हो गए... जो भी बीच में बात करता लगता कि यह आवाज़ यहा की नहीं है... यह आवाज़ यहां नहीं होनी चाहिए... सब चुप थे..। बुद्ध की मूर्ती जहाँ रखी हुई थी मैं वहाँ जाने से पहले थोड़ा हिचक रहा था... सो बाहर ही खड़ा रहा..। जब सब भी तरह हो आए तो सू (एक कोरियन दोस्त...) ने बड़े अपने पन से मुझे भीतर जाने को कहा.. मैंने अपने जूते उतारे और भीतर चला गया। जैसा कि सब लोग.. बुद्ध की मूर्ति के सामने करते हैं मैंने भी वैसा ही सब कुछ दौहराया... पर बीच में ही कहीं... कुछ टूट गया...। कुछ अनकहा... कोई एक गांठ... कुछ बहुत गहरे में दबा हुआ ऊपर को आ गया...। मैं अचानक मुस्कुराने लगा... और दूसरे ही क्षण मेरा गला भर आया...। मेरी आँखें छलकने लगी। कोई मुझे देख रहा है... बहुत करीब से...इसका अहसास मुझे हुआ.. मैंने अपनी आँखें बंद कर ली...। तभी मुझे लगा कि कुछ सुनहरा... जिसकी शक्ल भी थी.... (नहीं बुद्ध नहीं...) बहुत लंबे-लटके हुए सुनहरे कपड़ों समेत मेरे करीब उड़ता हुआ आ रहा था...। मैं पूरी तरह stiff  हो गया...। फिर मुझे लगा उस सुनहरी चीज़ ने मुझे अपने गले लगा लिया.... अपने भीतर भीच लिया.... मैं अपने गालों पर उसके नर्म कपड़ों को महसूस कर सकता था..। मुझे लगा यह सब मैं एक कहानी की तरह गढ़ रहा हूँ..... फिर मैं अपने गाल रगड़े उस सुनहरी चीज़ में....। फिर सब कुछ छूटने लगा.... मेरी उंग्लियाँ... ढ़ीली पड़ गई..... मेरे कंधे लटक गए...। मैंने मेरी गर्दन पर एक थाप महसूस की.. फिर कुछ खिचकर अलग होने लगा... बहुत हल्के से...। &lt;br /&gt;मैंने अपनी आँखें खोल दी...। इधर-उधर देखा... सू मेरी तरफ देख रही थी... मुझे लगा शायद उसने सब कुछ देखा है... मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया...। वह चुप मेरी तरफ देखती रही.... मैं उठ गया...।&lt;br /&gt;जब मैं उस मंदिर से निकल रहे थे.. तो मैं बार-बार पलटकर उस मंदिर की तरफ देख रहा था। क्या हुआ था? मैं मुस्कुरा रहा था... लगा किसी बहुत अपने के जी भरकर गले लग कर आया हूँ.....। बाहर जाते हुए मैं सू को यह बताना चाहता था... पर वह अंग्रेज़ी नहीं समझती है.. सो मैं चुप रहा। मैंने बस सू को इशारे से कहा कि प्यास लगी है.. बहुत प्यास... उसने पानी की तरफ इशारा कर दिया... और मैं अपनी प्यास बुझाने उस ओर चल दिया...।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-4651119846257959328?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/4651119846257959328/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=4651119846257959328&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/4651119846257959328'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/4651119846257959328'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/09/blog-post_07.html' title='प्यास...'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-wLcT5xoG7K4/TmduzaZt2MI/AAAAAAAAAt0/64uALwAA09Q/s72-c/IMG_2391.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-486899497502025009</id><published>2011-09-05T18:17:00.001+05:30</published><updated>2011-09-05T18:18:44.139+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>I AM NATURE.. AS YOU ARE…</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-9gBRHtRv6G4/TmTFD0U1GRI/AAAAAAAAAts/uvXQWQgTC6Y/s1600/DSCF2423.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-9gBRHtRv6G4/TmTFD0U1GRI/AAAAAAAAAts/uvXQWQgTC6Y/s400/DSCF2423.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5648856502005733650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;बाहर घांस काटने की आवाज़ आ रही थी। एक चिड़िया तार पर बैठकर बहुत देर तक पूंछ हिला-हिलाकर किसी को बुला रही थी। दूर किसी के कपड़े धोने की आवाज़ थी। बीच-बीच में हवा का झोंका तेज़ी से आता और खिड़की के पर्दे उड़ जाते। मेरे बगल में पी हुई कॉफीयों के ख़ाली कप पड़े हुए थे, एक एशट्रे, लाईटर, कुछ आधी-अधूरी पढ़ी हुई किताबें... टेबिल लेंप.. और कुछ कोरे कागज़...। बहुत बुलाने पर भी उस पूंछ हिलाने वाली चिड़िया के पास कोई नहीं आया सो वह उड़ गई....मेरे खिड़की से बाहर देखने के एक मात्र कारण को लेकर...। मैं वापिस अपनी डेस्क पर आ गया। बहुत देर डेस्क की बिखरी हुई चीज़ों को देखा तो थकान से भर गया... फिर मेरी निग़ाह उस पेंटिंग पर गई जो मेरे कमरे में लगी हुई है। कोरे से केनवास पर एक आदमी (काली श्याही से आदमी का आकार) सिर झुकाए सात घांस के टुकड़ों को देख रहा है....और उसपर कुछ कोरियन भाषा में लिखा हुआ है। कल मेरी एक कोरियन मित्र ने मुझे बताया कि उसपर लिखा हुआ है... I AM NATURE…. AS YOU ARE…  मुझे यह बात बहुत सुंदर लगी..। तब से जब भी इस पेंटिंग पर निग़ाह जाती है मेरे भीतर कुछ सुलझ जाता है..। मुझे विश्वास करने की इच्छा होती है सब पर... अपने डरे हुए कोनों में दिया जलाकर टहलने की इच्छा होती है। उन जगहों की याद हो आती है जिन जगहों पर जाना मैंने सालों से टाल रखा था। फिर अपने खालीपन में एक घांस का तिनका गिरा पड़ा मिलता है... और तब एक बोझ महसूस होता है...। उस तिनके को अपने जीए हुए लेंडस्केप में फसाने की कोशिश करता हूँ...। वह अपनी अलग कहानी लेकर आया हुआ लगता है...। उसे छूने पर लगता है कि यह सुख है... पर इस सुख को कहां टिकाकर रखूं का कोना कहीं दिखता नहीं है। &lt;br /&gt;अभी रात है... देर रात अपनी बाल्कनी के कोने में खड़े रहने पर लगता है कि अंधकार कुछ खींच रहा है...। कहीं से कुछ रिसने लगता है.. मैं छूटता जाता हूँ... I AM NATURE.. AS YOU ARE….   वाली बात दिमाग़ में एक तिनके की तरह बैठी रहती है... वह सुख है.. पर उसे अपने भीतर टिकाकर रखने का कोना अभी भी खाली नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-486899497502025009?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/486899497502025009/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=486899497502025009&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/486899497502025009'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/486899497502025009'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/09/i-am-nature-as-you-are.html' title='I AM NATURE.. AS YOU ARE…'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-9gBRHtRv6G4/TmTFD0U1GRI/AAAAAAAAAts/uvXQWQgTC6Y/s72-c/DSCF2423.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-7590839004629314163</id><published>2011-09-02T10:39:00.000+05:30</published><updated>2011-09-02T10:40:37.890+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>खुश......</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-BcbdIHmYOQY/TmBlFfWt8VI/AAAAAAAAAtk/dK0UkyI-oW4/s1600/DSCF2362.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-BcbdIHmYOQY/TmBlFfWt8VI/AAAAAAAAAtk/dK0UkyI-oW4/s400/DSCF2362.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5647625077713138002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हड़बड़ाकर उठा तो देखा मैं एक खाली से कमरे में था... मैं अपने घर पर नहीं हूँ.. मैं कोरिया,(तोजी) वानजू  नाम के एक गांव में हूँ....यहाँ मैं एक महिने के लिए बतौर लेखक आया हूँ।  सफर की थकान ने सब भुला दिया था.. कुछ देर में मैं यथार्थ को ताकने लगा। कुछ किताबें.. मेरा लेपटाप.. एक डायरी... सिगरेट के पेकेट... फिर लगने लगा कि यह मुझे ताक रहे हैं... उनके ताकने में इंतज़ार था। टेबल पर घड़ी रखी हुई थी। रेंगते हुए समय देखा.. शाम के छे बजने वाले थे। बालकनी का दरवाज़ा खोला तो सामने पहाड़ दिखाई दिये... गहरे हरे रंग से पुते हुए। मेरा पहाड़ों से बहुत अच्छा संबंध रहा है.. पर यह पहाड़ मुझसे बहुत दूर थे... मैं शायद अभी इनमें भटका नहीं था। कुछ देर में खाने का बुलावा आने वाला था। मेरे अलावा यहाँ सभी कोरियन हैं... किसी को भी कोरियन के अलावा कोई भी भाषा नहीं आती है... । मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर खाने के लिए मेस में निकल पड़ा.... सिर्फ आँखे और मूक अभिवादन पहचान के थे... उसके बाद हम सब अपनी-अपनी थालीयों में सिर घुसाए खाते रहे..। कोरियन बहुत शर्मीले स्वभाव के होते हैं... वह आपस में भी बहुत कम बात कर रहे थे..। खाने के बाद मैं टहलने के लिए मैं गांव की तरफ निकल आया... बहुत साफ सुथरा गांव है... बहुत कम लोग दिखाई देते है...। घर हैं लेकिन घर के बाहर कोई चहलकदमी नहीं दिखती... लगता है कि लोगों के यहाँ पर वीकएंड बंगले है... वह लोग रहते कहीं और हैं.. पर ऎसा नहीं था..। चारों तरफ खेती है... और उन खेतों को गहरे हरे रंग के पहाड़ों ने चारों तरफ से घेर रखा है..। कुछ लोग सड़क पर दिखे... मैंने अभिवादन में सिर झुकाया पर वह बस मुस्कुरा दिये..। किसी अजनबी देश के अजनबी गांव में आपको लोगों की आँखें अजीब सी लगती हैं.. लगता है वह लोग एक खूबसूरत संसार में हैं.... जिसकी प्रदर्शनी किसी आर्ट गैलरी में लगी है.. और मैं किसी गंदे पर्यटक की तरह उन्हें निहार रहा हूँ, उनकी तस्वीरें लेना चाहता हूँ... जिसे वह बिलकुल भी पसंद नहीं करते। मैं चलते-चलते अपने में खो गया। उनके संसार को घूर-घूर कर देखने की बजाए चुपचाप उनके संसार में सांस लेने लगा।  इस पूरे इलाके में अजीब सी चुप्पी है.. हर कुछ देर में कोई गाड़ी सड़क पर से गुज़र जाती है तो उस चुप्पी का एहसाह होता है जो स्थिर है... जो चारों तरफ फैली हुई है। मैं एक पत्थर पर बैठ गया...  इस गहरी चुप्पी में कुछ बुदबुदाने लगा... फिर मुझे याद आया मैं असल में दो दिनों से चुप हूँ... मैंने अभिवादन और धन्यवाद जैसे शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं बोला है..। मैं खुद से बातें करने लगा कुछ ऎसे जैसे खुद से नहीं किसी ओर से बोल रहा हूँ। फिर अपनी ही बातों से चिढ़ होने लगी... खुद से मैं कितने झूठे सुर में बोलता हूँ.. इससे तो चुप्पी ही बहतर है..। मैंने सिगरेट जलाई और कुछ आगे की ओर चल दिया...। तभी सामने से आती हुई एक वृद्ध महिला दिखी... मैं उन्हें पहचान गया.. क्योंकि वह हमेशा एक अजीब सी चौड़ी टोपी लगाए रहती हैं.. वह पेंटर हैं...। वह मेरी तरफ ही चली आ रही थी... मैं उन्हें देखकर मुस्कुरा दिया... पर भीतर एक डर था कि उनसे बात क्या होगी...। उन्होंने आते ही.. कोरियन भाषा में बोलना चालू किया... मैं उनका दिल नहीं तोड़ना चाहता था सो कुछ यूं सिर हिलाता गया कि मुझे कुछ-कुछ बातें समझ में आ रही हैं..। सब लोगों के सामने वह अभिवादन करने में भी झेंप रही थीं.. पर अकेले में वह लगातार बोले जा रही थीं...। फिर बीच में वह बोलते-बोलते हंसने लगी..। मेरे लिए सब कुछ संगीत था सो मैं बस सुरों के उतार चढ़ाव समझ रहा था। हंसने के बाद वह कुछ देर चुप रहीं... इधर-उधर देखने लगी.. फिर एक छोटे से घर की तरफ इशारा किया.. और कुछ धीमी आवाज़ में बोलने लगी...। जब वह मेरी तरफ मुड़ी तो उनकी आँखें भीगी हुई थी...। मैं यह सुर पहचानता था... असल में मैं सारे सुर पहचानता था... पर सुनने में भी मैं अभी तक दूर थी... पर्यटक जैसा... तस्वीरे लेता हुआ...। मुझे खुद से बहुत घृणा सी होने लगी.... मैंने अपनी आखें नीचे कल ली...। उनके सुर टूट गए.. वह अचानक नीचे सुर में गाते-गाते रुक गई.... मुझे पता था कि उन्होंने पूरा राग नहीं गाया है... मेरी आँखे नीचे कर लेने में वह टूट गया बीच में कहीं। उन्होंने कुछ कदम मेरी तरफ बढ़ाए... मेरे कंधों को छुआ... सहलाया। मेरे भीतर एक चोर था... एक झूठ से भरा हुआ थेला लिए चोर... जो मेरे सारे जीने को, उनके अनुभवों को अपने झूठ के थेले में भर लेता...। जब भी मैं अपने अनुभवों, अपने जीए हुए के बारे में कुछ कहता, लिखता... सब कुछ झूठा दिखता..। वह मेरे कंधे को सहलाती हुई कितनी पवित्र थीं... मैं उनका सामना नहीं कर सकता था। मुझे पता था जैसे ही मैं उनकी तरफ देखूंगा, वह मेरे भीतर का चोर उनकी सारी पवित्रता को झूठ में बदल देगा...। फिर मुझे लगने लगा कि पहली बार मुझे किसीने पकड़ा है.... असल में पहली बार मैंने खुद को पकड़ा है... अपने समूचे झूठ को, अपनी पूरी कायरता में...। उन्होंने मेरे बालों पर हाथ फेरा और दूसरी ओर चल दी... मैं जड़ था। &lt;br /&gt;भाषा कितना छोटा कर के रख देती है हर स्वाद को...। मैं अपनी इस बात को भी लिखने में असमर्थ हूँ.... भाषा घुसते ही नमक हो जाती है और हमको सब कुछ ठीक लगने लगता है... स्वादिष्ट। &lt;br /&gt;मैं जड़ था.. और इसमें कोई स्वाद नहीं था... मैं कुछ भी देखना सुनना नहीं चाहता था...। मैं अभी भी उनका स्पर्ष अपने कंधे पर महसूस कर सकता था। मैं बार-बार अपने कंधे को छु रहा था... उनके बूढ़े कोमल हाथ... मैं उन्हें चूम लेना चाहता था... उन हाथों में अपना अनकहा पढना चाहता था। &lt;br /&gt;मैं अकेला वहीं खड़ा था। रात हो चुकी थी... सब कुछ चुप था.. सिवाए रात की आवाज़ों के। मैं अपने कमरे की तरफ मुड़ गया...।&lt;br /&gt;अपना लेपटाप खोलकर मैं बहुत देर कोरेपन को ताकता रहा....। मुझे वह सारे कमरे याद आ गए जिनमें मैं रहा था... वह सारी दीवारें, जिनपर मेरे शरीर के निशान रह गए थे...। वह अकेली वीरान रातें जिन्हें मैं भूल चुका था। तभी दरवाज़े पर ’खट..’ हुई...। मैंने दरवाज़ा खोला वह सामने खड़ी थी... उनके हाथ में एक बीयर की केन थी... और दूसरे हाथ में एक चिप्स का पेकेट... उन्होंने मुझे दिया... और वह जाने लगी.. मानों वह अपने इस बर्ताव से बहुत शर्मिंदा हों....। मैंने उन्हें रोका.... और धन्यवाद कहा... वह घबराई हुई जाने लगी...। मैंने उन्हें अपना नाम बताया... उन्होंने जवाब में कहा.... ’खुश....’। यह उनका नाम था... ’खुश..’। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-7590839004629314163?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/7590839004629314163/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=7590839004629314163&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/7590839004629314163'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/7590839004629314163'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='खुश......'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-BcbdIHmYOQY/TmBlFfWt8VI/AAAAAAAAAtk/dK0UkyI-oW4/s72-c/DSCF2362.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-9170536368417093665</id><published>2011-08-12T19:08:00.003+05:30</published><updated>2011-08-12T19:15:23.115+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>घोंसला...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-CKEHaf_bz2E/TkUtagKyIwI/AAAAAAAAAtc/rmbQA-U5eKw/s1600/bird-in-the-night_charcoal__by-d-adams_9-07.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 209px; height: 299px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-CKEHaf_bz2E/TkUtagKyIwI/AAAAAAAAAtc/rmbQA-U5eKw/s400/bird-in-the-night_charcoal__by-d-adams_9-07.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5639964041686426370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जब भी कभी तेज़ हवा चलती है या तेज़ बारिश होने लगती है तो मैं चिंता करने लगता हूँ। मुझे आजकल तीन घोंसलों की बड़ी चिंता होती है। मेरी बाल्कनी से एक पेड़ दिखता है जिसपर एक छोटी चिड़िया (क्योंकि मैं हमेशा एक बार में एक ही चिड़िया देख पाता हूँ।) ने तीन घोंसले बनाए हैं। यह मेरे सामने ही बनना शुरु हुए... और अब एक सुंदर स्वरुप इख़्तियार कर चुके हैं। गर्मियों के दिनों में मेरी चिंता किंग्फिशर को लेकर थी.. वह रोज़ दोपहर के वक़्त मेरी तरफ मुँह करके बैठ जाती और देर तक अपना सिर हिलाती रहती। कभी-कभी लगता वह मुझसे कुछ पूछ रही है... धीर-धीरे मैं उससे बातें करने लगा.. यह बात मैंने कभी किसी को नहीं बताई। जब वह कुछ दिन नहीं आई तो मेरी चिंता बढ़ जाती... फिर दिखती तो मेरे सवाल और उसके सिर हिला-हिला के जवाब शुरु हो जाते। अभी बरसात में वह नहीं आती है.. उसके बदले यह छोटी चिड़िया आती है जिसने सुंदर तीन घोंसले बनाए हैं...। &lt;br /&gt;कल रात बहुत बारिश हुई.. बुख़ार के पसीने में लथपथ मैं बार-बार अपनी बाल्कनी पर चला जाता। अंधेरा इतना ज़्यादा था कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने टार्च से भी देखने की कोशिश की पर कुछ नज़र नहीं आया। कुछ देर में मैं वापिस अपने बिसतरे पर था... इतनी बारिश में बेचारी क्या कर रही होगी? मैं बार बार उस चिड़िया के बारे में सोचने लगता। फिर लगने लगा कि शायद वह भी मेरे बारे में सोच रही होगी कि इतनी रात गए इसके घर की लाईट क्यों जल रहे है? शायद वह मेरी चिंता में सो ना पा रही हो? सो मैंने झट से उठक लाईट बंद कर दी। पर नींद से संबंध बहुत समय से ख़राब चल रहा है सो करवटों ने मुझे भीतर से छील सा दिया... उस छिलने की जलन से बार-बार मैं उठ बैठता..। खिड़की से निग़ाह बाहर जाती.. तो अंधेरे में लटके तीन घोंसले बहुत अकेले से दिखते..। फिर ख़्याल आया कि चिड़िया इंसान तो होती नहीं कि रात में उन्हें लाईट की ज़रुरत पड़े.. वह तो मेरी करवटों और हरकतों से ही जान गई होगी कि मैं सो नहीं पा रहा हूँ। मैंने वापिस जाकर लाईट जलाई और बाल्कनी में आकर खड़ा हो गया। कुछ देर अंधेरे में ताकते रहने से कुछ चीज़े साफ दिखाई देने लग गई... जैसे बहुत देर तक चुप शांत पड़े रहने से अपना ही जीवन साफ सुनाई देने लगता है... पर अपना जीवन सहन नहीं होता इसलिए हम तुरंत बोलना शुरु कर देते हैं... जबकि अंधेरा मुझे अपनी तरफ हमेशा से आकर्षित करता रहा है। अंधेरे में लटके हुए तीन घोंसले मुझे साफ दिखाई देने लगे। भीगे हुए... कुछ झूल से गए थे.. कल शाम को वह तीनों कितने सुंदर लग रहे थे... अभी रात के भीगेपन में वह खंडहर जैसे दिख रहे थे। मैं समझ गया कि चिड़िया वहा नहीं हो सकती.... उसकी इतने दिनों की पूरी महनत बेक़ार गई। अगर मैं चिड़िया की जगह होता तो अभी तक झल्ला गया होता.. चीख़ने चिल्लाने लगता.. गालिया दे देता पेड़ को, बारिश को.. सब को.. पर मुझे पता है कि सुबह होते ही चिड़िया आएगी और रात को खंड़हर हो चुके अपने घोंसलों पर काम करना शुरु कर देगी।&lt;br /&gt;कुछ देर में मैं चाय बना रहा था...। देर रात को चाय पीने की मेरी पुरानी आदत है। चाय बनते ही मैं एक ऎसी क्रिया में व्यस्त हो जाता हूँ जो संगीत के जैसी है। चाय बनाना (ख़ास कर देर रात का चाय बनाना...) एक तरह का नृत्य है मेरे लिए जो मुझे हर झुंझलाहट से क्षणिक शांति प्रदान करता है। मैं चाय बहुत धीरे और एक लय में पीता हूँ..। मेरी मन: स्थिति चाय पीने की लय तय करती है। इस वक्त मैं झल्ला रहा था सो चाय पीने की लय कुछ तेज़ थी। मैं सोचने लगा काश यह चिड़िया चाय पीती.. इस बारिश में भीगने के बाद मैं उसे चाय बनाकर देता.. तो..  इस बात पर मुझे हंसी आने लगी... मेरी झल्लाहट थोड़ी कम हुई.. और मैं वापिस कुछ कोरे पन्नों को गूदने में व्यस्त हो गया।&lt;br /&gt;समय बहुत तेज़ी से निकल गया.. मुझे चिड़ियों की आवज़े आने लगी...। पौ फट चुकी थी। मैं घबरा गया..। पौ फटते ही वह चिड़िया... अपने घर को खंडहर की शकल में देखेगी और कितना दुख होगा उसे.... मुझे पता है उसे कोई दुख नहीं होगा.. पर मेरी पीड़ा थी कि वापिस उसे उन घोंसलों पर काम करते देखना... । उसने तिनका-तिनका इक्कट्ठा करके यह घोंसले बनाए थे.. अब वापिस पूरा काम फिर से....। मैं यह सब नहीं देख सकता था....। मैंने चादर तानी और अपनी आँखें बंद कर दी........ चिड़ियों की आवाज़े बढ़ती गईं.. और उस सुंदर संगीत में मुझे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला..........।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-9170536368417093665?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/9170536368417093665/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=9170536368417093665&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/9170536368417093665'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/9170536368417093665'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/08/blog-post_12.html' title='घोंसला...'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-CKEHaf_bz2E/TkUtagKyIwI/AAAAAAAAAtc/rmbQA-U5eKw/s72-c/bird-in-the-night_charcoal__by-d-adams_9-07.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-1705224486890573599</id><published>2011-08-08T09:39:00.001+05:30</published><updated>2011-08-08T09:46:17.661+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी कहानियाँ...'/><title type='text'>आस-पास कहीं...।</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-dejQi7xd1U8/Tj9i3rIT7dI/AAAAAAAAAtU/4C5yxHHuqw8/s1600/wcF-Leaving-Autumn.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 263px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-dejQi7xd1U8/Tj9i3rIT7dI/AAAAAAAAAtU/4C5yxHHuqw8/s400/wcF-Leaving-Autumn.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5638333967101062610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कल रात एक सपना देखा... मैं अपने शरीर के भीतर कैद हो गया हूँ.. मेरा शरीर सो रहा है। मैं उसे भीतर से ठोकरे मार-मारकर जगाने की कोशिश कर रहा हूँ। शरीर सोया पड़ा है और मैं अपने ही शरीर के भीतर तड़प रहा हूँ.. सांस की नली के आस-पास कहीं...।&lt;br /&gt;पिताजी ने कहा था कि ’जब बड़ा होगा तो मैं तुझसे कुछ भी नहीं कहूंगा... तब जो मर्ज़ी आए वह करना।’ मैंने सोचा था बस एक बार बड़ा हो जाऊं फिर देखना दिन भर खेलता रहूंगा, पतंग उड़ाता रहूँगा... कोई पढ़ाई की बात भी करेगा तो उसे एक लात मारुंगा... कूल्हे के आस-पास कहीं।&lt;br /&gt;माँ बहुत देर तक नीलकंठ को खोजती रहती थी। सुबह उठते ही पेड़-पेड़ खोजती रहती... नीलकंठ दिखते ही उस पेड़ के चक्कर काटती... और बुदबुदाती जाती-’नीलकंठ तुम नीले रहियो, मेरी बात राम से कहियो, राम सोए हो तो जगाकर कहियो...।’ कभी नीलकंठ बीच बात में उड़ जाता तो कभी वह देर तक माँ को ताकता रहता...। कुछ दिन पेड़-पेड़ नीलकंठ खोजने मैं भी माँ के साथ गया हूँ...। मैंने माँ से एक बार कहाँ कि ’आपकी कौन सी बात है जो आप राम से कहना चाहती हो...।’ माँ ने एक ज़ोर का चपत लगाया मुझे.... कान और गाल के आस-पास कहीं।&lt;br /&gt;मैं अगर नीलकंठ होता तो क्या करता...? माँ की बात सुनकर मैं राम के पास जाता और कहता कि ’एक बूढ़ी औरत जो लगातार बूढ़ी होती जा रही है... वह एक बात मुझसे कहती है कि मैं आपको आकर कह दूं... पर हर बार वह बात मुझे नहीं बताती कि मैं उसकी क्या बात आपसे आकर कह दूं...।’ मैं नीलकंठ होता तो पेड़ पर नहीं बैठता.. पेड़ पर बैठने से बार-बार राम के पास जाने की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती। मैं मकानों पर बैठता... काया के मकान के आस-पास कहीं।&lt;br /&gt;काया के मकान की छत से बाज़ार दिखता होगा... क्योंकि मैं जब बाज़ार में घूमता हूँ तो मुझे बाज़ार से काया के मकान की छत दिखती है। काया का मकान बहुत सारे मकानों से घिरा है.. जैसे काया बहुत सारे लोगों से घिरी रहती है। काया के मकान तक पहुंचने में बहुत से बाज़ारों-घरों से होकर गुज़रना पड़ता है... तब भी वह मकान कभी अकेला नहीं मिलता है.. वह बहुत मकानों से घिरा मकान है.. जैसे काया...। काया बहुत से लोगों के किले में बंद है... उस तक पहुंचना असंभव है...। मुझे पीपल का पेड़ बहुत अच्छा लगता है जो नदी के किनारे किले के ऊपर उगा हुआ है। मैंने कई बार सपना देखा है कि मैं पीपल का पेड़ हूँ और काया मेरी छाया के भीतर कहीं बैठी हुई है...। और जब वह मेरे पेड़ की छाया तले सो जाएगी तब मैं उसके घर में घुसूगां और हमेशा हमेशा के लिए छुप जाऊंगा... उसके बिस्तर के आस-पास कहीं।&lt;br /&gt;दिन में बाज़ार घूमते हुए अचानक जीवन दिखा। जीवन यायावर है। जीवन अपना घर बहुत पहले छोड़ चुका है, उसकी कमीज़ से पसीने की बदबू आती है। वह जब भी दिखता है मुझपर थोड़ा हस लेता है। मैं कई बार बीच सड़क को छोड़कर गलियों में छिप जाता हूँ... जीवन का सामना करने से मैं घबराता हूँ। जीवन की उम्र मेरी उम्र के आस-पास ही कहीं है। वह हमेशा अचानक मुझसे टकरा जाता है, कहता है कि ’चलो बैठकर बात करते हैं...’ मैं उसके साथ कभी नहीं बैठता हूँ। मैं उससे खड़े-खड़े बात करता हूँ... खड़े-खड़े बात करने में एक चलतापन होता है जिसपर मैं हमेशा सहज बना रहता हूँ... बैठकर बात करने में ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। बैठकर बात लंबी चलती है... फिर खड़े होने की गलियाँ खोजनी पड़ती हैं। बैठकर बात करने में बहुत देर खड़े होकर भी बात होती रहती है...। बैठे-बैठे आप सीधे जा नहीं सकते.. जबकि खड़े-खड़े बात करने में आप सीधे कहीं जा सकते हैं। जीवन बिठाकर बात करना चाहता है और मैं खड़े-खड़े चल देना। जीवन ने मिलते ही सीधे संवाद शुरु किये...&lt;br /&gt;’चलो बैठकर बात करते हैं।’&lt;br /&gt;मैं खड़ा रहा। कुछ देर में, नहीं बैठूंगा की ज़िद्द समझकर जीवन खड़े-खड़े बात करने की कोशिश करने लगा। खड़े-खड़े बात करने में वह हकलाने लगता था। &lt;br /&gt;’तो जीवन कैसा चल रहा है?’ उसने पूछा&lt;br /&gt;’कट रहा है।’ मैंने कहा&lt;br /&gt;’तुम कहीं जाने वाले थे?’&lt;br /&gt;’हाँ, मन बदल गया।’&lt;br /&gt;’शरीर में मन ठीक-ठीक कहाँ होता है जानते हो?’&lt;br /&gt;’दिल के आस-पास कहीं...!!!’&lt;br /&gt;’ना...’&lt;br /&gt;’फिर कहाँ होता है मन?’ &lt;br /&gt;’जिस जगह से रोंगटे खड़े होना शुरु होते हैं उसके आस-पास कहीं।’&lt;br /&gt;मैं चकित उसे देखता रहा। किसी काम से कहीं जल्दी पहुंचना है- के बहाने मैं खोजने लगा। फिर अचानक एक सवाल याद हो आया।&lt;br /&gt;’और रोंगटे खड़े होने की जगह कहाँ है शरीर में?’ मैंने पूछा&lt;br /&gt;’जिस जगह से शरीर में सिहरन शुरु होती है उसके आस-पास कहीं।’&lt;br /&gt;मैं चुप हो गया। मैं जानता था कि इस तरह की बातों का कोई अंत नहीं होता है। जीवन मेरे हाथों को देख रहा था। मैंने अपने हाथों को जेब में डाल दिया। मैं सच में सिहरन महसूस कर रहा था अपनी पीठ के आस-पास कहीं...। फिर मैं सोचने लगा कि सच में यह शरीर के ठीक-ठीक किस भाग से उठ रही है?&lt;br /&gt;’तुमने मुझसे झूठ क्यों कहा?’ जीवन बोला&lt;br /&gt;’किस बारे में? मैंने पूछा&lt;br /&gt;’कि तुम कहीं जाने वाले हो?’&lt;br /&gt;’मैं हमेशा से कहीं चला जाना चाहता हूँ।’ इस बार मैं सच बोलने पर आमादा था।&lt;br /&gt;’तो?’&lt;br /&gt;’तो क्या?’&lt;br /&gt;’तो गए क्यों नहीं?’&lt;br /&gt;’शरीर ने साथ नहीं दिया।’&lt;br /&gt;’तुम तो कह रहे थे कि मन बदल गया?’&lt;br /&gt;’मन शरीर है।’&lt;br /&gt;’अभी भी कहीं जाना चाहते हो?’&lt;br /&gt;’हाँ, अभी ठीक इसी वक़्त मैं कहीं चले जाना चाहता हूँ।’&lt;br /&gt;’कहाँ?’&lt;br /&gt;मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। इस बार मुझे कोई बहाना नहीं बनाना पड़ा, जीवन मेरे सामने से मुस्कुराकर चल दिया। मैं बाज़ार में अकेला खड़ा रहा.. जीवन जा चुका था। कहाँ जाऊंगा का जवाब मैं नहीं दे पाया। मैं आगे, बिना किसी दिशा के चलने लगा। कहाँ जाना चाहता हूँ मैं... मैं इस वक़्त कहाँ जा रहा हूँ मुझे यह भी नहीं पता। बाज़ार पीछे छूट चुका था। मैंने अपने आपको किले के पास, पीपल के पेड़ के नीचे पाया। नीचे नदी बह रही थी। तभी मुझे उत्तर मिल गया, मैं जाना चाहता हूँ... नदी के उदगम के आस-पास कहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ सुबह-सुबह नीलकंठ की खोज में चली जाती। पिताजी घर की दीवार के पीछे मूतने...। मुझे उनको सहारा देना होता था... सो मैं नीलकंठ की सालों की खोज में कभी-कभी माँ का साथ नहीं दे पाता था। पिताजी मूतते हुए जर्जर और देयनीय लगते थे सो मैं उनकी तरफ कम ही देखता था। मैं उस वक़्त आसाम ताकता था जहाँ सुबह होने का उत्सव होता था। पिताजी कहते ’ऊपर क्या देखता रहता है... ज़मीन पर से निग़ाह कभी नहीं हटाना वर्ना कब ठोकर खाकर गिरोगे पता भी नहीं चलेगा।’ पिताजी के सारे उपदेश ऎसे होते जैसे हम जी नहीं रहे हैं कोई जंग लड़ रहे हैं। हारे तो मौत...। पिताजी बहुत डरे हुए रहते थे। वह घर में आए हर आदमी को दुश्मन का आदमी मानते थे। कुछ लोग जब घर के सामने से तेज़-तेज़ बाते करते हुए जाते तो पिताजी सतर्क हो जाते.. उन्हें लगता कि उन लोगों की बातों में कोई कोड छिपा है, वह घर में दीवार पर कान लगाकर सुनते। दूर से देखते हुए लगता कि पिताजी दीवार से कान खुजला रहे हैं। वह बहुत चालाक है- यह वह किसी भी नए आगंतुक को, अपने दूसरे या तीसरे वाक़्य में ही बता देते थे। नया आगंतुक अधिक्तर मेरा कोई दोस्त होता जो मुझे ताकता रहता। इकलौता होना कई बार बहुत भारी पड़ जाता था... पिताजी मुझे चालाक बनाना चाहते थे और माँ नीलकंठ... माँ-बाप दोनों की अपेक्षाओं का बोझ उठाने के लिए हमेशा कंधे कमज़ोर पड़ जाते। जब भी कंधों को सीधा करने की इच्छा होती मैं चल देता काया के घर के आस-पास कहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन काया अकेली बाज़ार में दिखी। मैं बहुत देर उसके अगल बगल खोजता रहा कि वह किसी के साथ तो होगी। अकेली काया... मैंने इसकी हमेशा कल्पना की थी। मुझे पीपल का पेड़ याद हो आया और याद आया काया का उसके नीचे सो जाना। मैं उसके पीछे हो लिया। वह सलवार सूट की दुकान में घुस गई। मैं बाहर उसका इंतज़ार करने लगा। तभी पीछे से मुझे जीवन की आवाज़ आई। &lt;br /&gt;’अरे! तुम यहाँ.... चलो बैठकर बातें करते हैं।’&lt;br /&gt;मैंने जीवन को गुस्से से देखा। जीवन कुछ देर मेरा गुस्सा मेरी आँखों में पढ़ता रहा। अंत में मैंने ही आँखें हटा ली। काया को देखा वह अभी भी बहुत से सलवार सूट में अपनी पसंद खोज रही थी। तभी मुझे मेरे कान के पास किसी के सांस लेने की आवाज़ आई। मैंने कनखियों से देखा जीवन मेरे बगल में खड़ा है और खुसर-पुसर करके मुझसे कुछ कह रहा है...&lt;br /&gt;’तुम एक पत्थर छोड़ते हो तो दूसरा पत्थर उठा लेते हो। भारी पत्थरों को ढ़ोते रहना तुम्हारी आदत है जिससे तुम बाज़ नहीं आते हो। हल्के रहो... छोड़ो पत्थर।’&lt;br /&gt;जीवन कहता जा रहा था....&lt;br /&gt;’तुम वह बच्चे हो जो अंत में अपनी माँ को बचा लेना चाहते हो। अपनी कब्र में लेटे रहने के स्वप्न देखते हो पर इधर-उधर के गढ़्ढों से बचते फिरते हो।’&lt;br /&gt;तभी काया उस दुकान से बाहर निकली। मैं जीवन को छोड़कर अलग खड़ा हो गया मानों मैं उसे जानता ही ना हूँ। काया दो कदम दुकान से नीचे उतरी थी कि उसकी निग़ाह मुझपर पड़ी। वह थम गई। वह एकटक मुझे देखे जा रही थी जैसे मुझे बहुत पहले से जानती हो... तभी मुझे उसके पीछे अभी-अभी उगा पीपल का पेड़ दिखा। वह अचानक झेंप गई और निग़ाहें नीची किये बाज़ार की गलियों में घुस गई। मैंने पीछे पलटकर देखा तो जीवन गायब था। मैं बिना वक़्त गवाएं काया के पीछे हो लिया। काया कुछ देर में बाज़ार से अलग हो गई और एक सुनसान गली में प्रवेश कर गई। मैं अभी तक काया के बहुत पीछे था। मैंने अपनी गति बढ़ाई। उस सुनसान गली के मोड़ पर काया रुक गई। मैं रुकते-रुकते उसके करीब कहीं रुक गया। काया पलटी..&lt;br /&gt;’क्या है?’ काया ने पूछा।&lt;br /&gt;’तुम्हारा नाम काया है ना?’ मैंने पूछा&lt;br /&gt;’नहीं...।’ और वह हसने लगी। फिल्मों में जैसे नायिका की सहेलियाँ हसती हैं ठीक वैसे।&lt;br /&gt;’मुझसे दोस्ती करोगी?’&lt;br /&gt;’नहीं मेरे पास वक़्त नहीं है... परिक्षा सिर पर है.. बहुत पढ़ना पड़ता है।’&lt;br /&gt;’ठीक है।’ मैं तुरंत मान गया।&lt;br /&gt;’तुम्हारा नाम क्या है?’ उसने पूछा।&lt;br /&gt;’जीवन...।’ मैंने जीवन क्यों कहा... मेरा नाम जीवन नहीं है.. ओह! ओह! ओह!&lt;br /&gt;’जीवन.. अच्छा नाम है।’ &lt;br /&gt;यह कहकर वह चल दी...। मैंने सोचा बस यही है अपने प्यार से पहली मुलाकात..? बस इतनी ही...? नहीं.. कुछ ओर भी है इसमें..। मैं काया के पीछे भाग लिया। &lt;br /&gt;कुछ गलियों तक काया मुझे पीछे पलटकर देखती रही। फिर वह एक बाज़ार में निकल आई। मैं बाज़ार में काया के बहुत करीब आ गया... और भीड़ की आड़ में मैं उसका हाथ छूने की कोशिश करने लगा। काया मेरे हर स्पर्ष पर फिल्म में नायिकाओं की सहेलियों की तरह हंसने लगती। इस छूअन-छिलाई में मैं बहुत देर तक उस भाव को खोजता रहा जिसे प्रेम कहते हैं.. पर उसे प्रेम नामक भाव का शरीर में कहीं भी संचार नहीं हो रहा था। इतने में पता नहीं कब काया अपने घर के करीब पहुंच गई। तभी उसने अपनी चाल की गति बढ़ाई और दो हट्टे कट्टे नौजवानों को ’भाई.. भाई’ कहकर संबोधित किया। मैं अपनी डरपोक सतर्कता पर स्तब्ध बना रहा। काया की पीठ मेरी तरफ याने बाज़ार की तरफ थी... पर उसके दोनों भाईयों की आँखें भीड़ में किसी को टटोल रही थीं। मैं शुरु से ही भय सूंघ लेता था। काया पलटी और उसने सीधे मुझे देखा... और एक क्रूर मुस्कुराहट उसके होठों पर आ गई। काया ने हाथ के इशारे से अपने भाईयों को बाज़ार की भीड़ की तरफ धकेल दिया...। काया ने ठीक मेरी तरफ इशारा नहीं किया था... उसके भाई भीड़ को चीरते हुए घुसे और जो भी जवान सा लड़का दिखा उसे चपतियाने लगे। दो-तीन चपत मुझमें भी पड़े। दोनों भाई ’जीवन कौन है?’ नाम की रट लगा रहे थे..। मेरे कान और गाल सुन्न थे। दिमाग़ के भीतर कोई ’सुन्न..सुन्न’ शब्द का जाप कर रहा था। कुछ समय बाद मैंने खुद को अपने बिस्तर में पस्त पाया। काया, काया नहीं माया निकली। इन सबमें प्रेम कहाँ था। आकर्षण था.. हाँ आकर्षण.. जब काया बहुत क्रूरता मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी तब मैं सबसे ज़्यादा उसके प्रति आकर्षण अनुभव कर रहा था। तभी... ठीक उसी वक़्त मैंने पहली बार हलचल महसूस की अपने दोनों झांघों के बीच में कहीं....। &lt;br /&gt;मेरे पिताजी ने कई बार पिशाब जाने के लिए घंटी बजाई और हर बार मैं ही उन्हें पिशाब कराने पीछे ले गया। बाथरुम में वह एक बार गिर चुके थे जिसकी वजह से उनके कूल्हे की हड़्ड़ी चटक गई थी। इस वजह से वह बाथरुम में पिशाब करन से घबराते थे..। हर घंटी पर मेरे दर्शन उनकी आदत में शुमार नहीं थे। चौथी बार जब वह पिशाब कर रहे थे और मैं बिना बादल के आसमान में काया को तलाश रहा था तो उन्होंने पूछ लिया..&lt;br /&gt;’जवानी में बाप की इतनी सेवा खतरनाक है।’ उन्होने कहा&lt;br /&gt;’किसके लिए?’ मैंने पूछा&lt;br /&gt;’किसके लिए मतलब?’&lt;br /&gt;’किसके लिए मतलब... मेरे लिए या आपके लिए?’&lt;br /&gt;पिताजी गुर्राए... उनके मुंह से झाग निकलने लगा। वह जब भी गुस्से में होते थे तो उनके मुंह से झाग निकलने लगता था। मैंने उनके जेब से रुमाल निकाला और झाग साफ किया। उनका गुस्सा उनसे बहुत कुछ बुलवाना चाहता था पर उम्र के कई मौड़ मुड़ने के बाद वह अब एक सीध में चलना भूल चुके थे, एक बात पर बहुत देर बने रहना भी। वह कभी-कभी मुझसे कहते थे.. ’बेटा बहुत कठिन जीवन था.. आज सोचता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.....’ फिर मेरे चहरे पर कोई भी भाव ना पाकर मुझपर बरस पड़़ते। आज मैं सोचता हूँ तो मेरे पास कितने हज़ारों किस्से हैं जो लोग बहुत गरीबी और बेकारी का जीवन जी रहे थे। नंदू का बाप पहले ठेला लगाता था आज उसकी दुकान है... चीरु का बाप मिल मज़दूर था आज वह थोक का बड़ा व्यापारी है... रामू का बाप रामू काका हमारे घर में नौकर था आज रामू हमारे घर में नौकर है। यह संधर्ष थोड़ा अलग है... और इस संधर्ष का चश्मदीद गवाह मैं खुद हूँ....। रामू (याने रामू काका का बेटा) दोनों आवाज़ो पर प्रगट होता है.. अगर आप रामू चिल्लाओ तब भी और अगर... रामू काका चिल्लाओं तब भी। घर वालों को रामू काका बुलाने की आदत है... रामू उस आदत को समझता है.. अपने को खुद के नाम से पुकारे जाने की ज़िद्द नहीं करता है। असल में रामू काका का नाम बलविंदर सिंह था पर नौकरों के उस समय के पाप्युलर नाम में रामू सबसे ऊंचे पायदान पर था सो बलविंदर रामू हो गया..। रामू काका को शायद आजकल के नौकरों के नाम पसंद नहीं आते थे.. सो उन्होंने अपने बेटे के पैदा होते ही उसका नाम रामू रख दिया। रामू की उम्र मेरी उम्र लगभग बराबर है... पिताजी को मुझसे ज़्यादा रामू की शादी की चिंता खाए जाती है... वह चाहते है कि वह गाव की एक ऎसी औरत ढूढ़कर लाए जो रामू का दिमाग़ ना ख़राब कर दे... और रामू अपना बच्चा होने पर उसका नाम रामू ही रखे...। बचपन में रामू घर का सारा काम निपटाकर शाम को मेरे साथ खेलने के लिए थोड़ा सा समय निकाल लेता था। वह मेरे साथ खेलता भी किसी काम की तरह था। अगर थक जाता तो रुकता नहीं था... खेलता रहता.. गलती से अगर जीत जाता तो माफी मांग लेता। एक बार रामू और मैं ’बड़े होकर क्या बनेगें का सपना’ का सपना वाला खेल खेल रहे थे... मैंने उस वक़्त के सारे पाप्युलर सपने रामू को गिना दिए...  और रामू ने कहा कि वह ट्रेन चलाना चाहता है...। मैं चुप बना रहा.. बस उसका यही सपना था...। वह सपना सुनाते वक़्त उसकी आँखों में एक गहरी चमक थी जिससे मुझे आज तक जलन महसूस होती है....। मैंने उसके बाद उसके साथ खेलना बंद कर दिया...। मैं आज तक अपने सपने जैसा कुछ भी नहीं बन पाया... फिर भी मैंने रामू को हरा दिया। पर आज भी जब कभी मैं ट्रेन देखता हूँ तो भीतर कहीं कोई चीख़ता है... और मैं सोचता हूँ कि यहाँ से कहीं चला जाऊं दूर... जहाँ ट्रन ना चलती हो... और जहाँ रामू कभी ना दिखे। गहरे अपने आपसे यह मैं कहता भी इसलिए हूँ कि रामू से बड़ा महसूस कर सकूं...। रामू चुप रहता है.. उसका मौन चुभता है... आँखों और कानों के बीच में कहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जीवन से भाग रहा था क्योंकि जीवन को काया के दोनों भाईयों ने मिलकर बहुत मारा था। जीवन ने मुझे काया को ताकते देखा था। जीवन गुणा भाग के बाद, पिटने की वजह में मेरे हाथ होने के निर्णय तक पहुंच चुका था। बाहर जीवन था.. और मैं घर में क़ैद था। जीवन की एक आँख काली हो चुकी थी। एक गहरी चोट लगी थी... कोहनी और कंधे के बीच में कहीं।&lt;br /&gt;मैं दोनों ही जीवन से भाग रहा था... एक जो यायावर फटेहाल मेरा दोस्त था और दूसरा मेरा जीवन जो यायावर फटेहाल मेरा जीवन था। मेरे खुद के डरों ने मेरा मेरे ही जीवन से संबंध कुछ इस तरह का बना दिया है कि मैं अपने होने में क़ैद हूँ और मेरा जीवन बाहर मेरी प्रतीक्षा में है। भीतर मैं भी एक प्रतिक्षा में हूँ... किसी अनहोनी की... कुछ ऎसा हो जाए, चाहे दुखद ही सही.. जो जीवन की इस गति को बदल दे..। मैं अपने जीवन की इस गति का आदी हो चुका हूँ। इतनी सहजता से यह जीवन अपनी ज़िम्मेदारीयाँ मुझ पर लादता गया कि मैं हर दिन एक व्यस्त दिन की तरह जीता गया। फिर एक दिन पिताजी ने पूछा ’क्या करना चाहते हो जीवन में.. कुछ सोचा है?’ मैं प्रश्न के मानी नहीं समझ पाया.. क्या किया जा सकता है जीवन में? मैंने कहा ’मेरे पास समय ही कहाँ है?’ समय मेरे पास उस वक़्त नहीं था पर अब मैं जीवन के डर की वजह से घर में क़ैद हूँ सो समय है... बहुत समय..। घर के बाहर वाले सारे काम रामू काका का बेटा रामू करने लगा था। सो अब जीवन में क्या करना है सोचा जा सकता था। मैंने हर बार कहीं चले जाने के बारे में सोचा था। कहीं चला जाना या तो किसी चमत्कार के कारण हो सकता है.. या किसी अनहोनी के कारण... मैं दोनों के इंतज़ार में बरसों से था। चमत्कार होता हुआ कहीं नज़र नहीं आता था और अनहोनी होने को है जैसा एक कुत्ता घर के बग़ल की गली में चक्कर लगाता रहता.. कभी देर रात रोने लगता तो कभी भौंक-भौंक कर दिन खा जाता। मैं महसूस कर सकता था कि मेरा जीवन अनहोनी और चमत्कार के आस पास ही कहीं था।&lt;br /&gt;एक दिन माँ नीलकंठ की खोज से वापिस आई तो सीधे किचिन में घुस गई। उनके दैनिक जीवन में नीलकंठ के बाद पिताजी थे फिर रामू काका.. फिर रामू और बाद में मैं था। वह नीलकंठ की खोज के बाद इसी गति से सभी से पूरे-पूरे संवाद निपटालेने के बाद घर के कभी ना खत्म होने वाले कामों में खुद को खपा देती थी। लेकिन आज वह नीलकंठ की खोज के बाद वह सीधा किचिन में घुस गई। मैं बहुत देर तक उनके बाहर आने का इंतज़ार करता रहा। पर वह बाहर नहीं आई। मैं किचिन के दरवाज़े के पास तक पहुंचा तो माँ के सुबकने की आवाज़ आने लगी। मैं भीतर किचिन में गया तो देखा वह गेस की टंकी के पास बैठी रो रही थी। मैं चुपचाप उनके बगल में बैठ गया बिना उनको छुए हुए। मैंने पानी का गिलास उन्हें पकड़ा दिया था जिसे वह एक सांस में पूरा का पूरा गटक गई थी। पर उनका रोना फिर भी जारी था। आँसू नहीं टपक रहे थी पर उनका सुबकना जारी था। मैं समझ गया अगर मैं किचिन में नहीं आता तो अब तक माँ अपना रोना बंद करके घर के कामों में मसरुफ हो चुकी होती... पर चूंकि अब उन्हें एक दर्शक मिल गया है.. सो वह अब अपने रोने को ज़ाया नहीं होने देंगी। अंत में मुझे सारी मनऊवल करनी पड़ी.. काफी देर के बाद उन्होंने कहा कि... नीलकंठ ने उन्हें सालों धोखा दिया है...। मुझे धोखे जैसी बातें सुनना हमेशा से अच्छा लगता रहा है.. चाहे वह धोखा खुद मैं ही क्यों ना खा रहा हूँ। &lt;br /&gt;’उसने कभी भी मेरी बातें प्रभु राम से नहीं कहीं...’ माँ ने कहा..&lt;br /&gt;’आपको कैसे पता..’ मैंने पूछा...&lt;br /&gt;’पिछले कुछ दिनों से मुजे रोज़ नील कंठ दिख जाया करता... मैं उस पेड़ के नीचे जाती, जिस पेड़ पर वह बैठा होता, जैसा कि तुझे पता ही है ऎसा ही तो करना होता है....’&lt;br /&gt;मैं हाँ में हाँ मिलाई... माँ ने आगे कहा...&lt;br /&gt;’मैं रोज़ उससे अपनी बात कहती.. और इंतज़ार करती कि वह उड़ जाए.. पर वह मुआ टस-से-मस होने का नाम ही नहीं लेता... मुझे लगा नाराज़ है.. कुछ देर में उड़ जाएगा.. पर कहाँ.. थक्कर मुझे ही घर वापिस आना पड़ता..। आज फिर वह मुझे वहीं दिख गया.. मैं समझ गई इसने मेरी कोई भी बात प्रभु राम तक नहीं पहुँचाई... मैंने फिर अपनी बात कही.. पेड़ के तीन चक्कर लगाते हुए। पर वह वहीं बैठा रहा.. मैंने पत्थर उठाए और लगी मारने नीलकंठ को... वह उड़कर बगल वाले पेड़ पर बैठ गया.. मैंने फिर पत्थर मारा.. वह उड़ा और कुछ दूर जाकर फिर एक पेड़ पर बैठ गया..। मैं समझ गई यह ना जाने वाला प्रभु राम के पास.. मै उसके करीब गई... उससे हाथ जोड़कर विनती की.. कि हे नीलकंठ उड़ कर चले जाओ प्रभु राम के पास.. तब उसने.. उस मुए नीलकंठ ने मेरे ऊपर टट्टी कर दी...।’&lt;br /&gt;यह सुनते ही मेरे भीतर एक हंसी का गुबार फूटा.. पर अगर इस वक्त हंसना ठीक नहीं था सो मैं हंसी दबा गया।&lt;br /&gt;’इतना बड़ा अपश्गुन... अब मैं कभी उस नीलकंठ की ओर नहीं जा सकती.. अब कभी प्रभु राम तक मेरी बात नहीं पहुंचेगी।’&lt;br /&gt;इस बात पर मेरे बहुत सवाल थे मेरी माँ से... पर मुझे पता है कि मेरे सारे सवालों के जवाब एक झिड़क ’तुझे क्या पता?’ पर खत्म कर दिये जाएगें... सो मैं किचिन से उठा और बाहर चला आया। माँ शाम तक अपने राम को भूल चुकी थी.. वह दैनिक दिनचर्या के खेल में पूरी तरह व्यस्त थी। उनकी व्यस्तता को देखकर मैं खुद की व्यस्तता के बारे में सोचने लगा..। मैं व्यस्त हूँ... पर अपनी पिछली व्यस्तताओं के बारे में यदि कोई मुझसे सवाल करे कि ’तुम ठीक-ठीक किस काम में व्यस्त हो?’ तो मैं उसका जवाब नहीं दे सकता हूँ। मैं अपने सब्ज़ी लाने को अपने जीवन में व्यस्त हूँ के कारण में नहीं रख सकता हूँ...। तो मैं कहा हूँ क्या कर रहा हूँ.... अचानक मैंने अपने जीवन को अपने घर की चाहरदीवारी के आस पास कहीं रेंगता हुआ पाया।&lt;br /&gt;काया के घर के बगल से गुज़रते ही हृदय गति तेज़ हो जाती। बहुत दिनों से वह दिखी नहीं थी... पर फिर दिखेगी की कार्यवाही में मैं व्यस्त था। तभी मुझे मेरी छिछली व्यस्तताओं से घृणा होने लगी। मुझे लगा कि मैं रेंगता हुआ एक घिनौना जीव हूँ जिसके होने पर उस जीव को खुद ऊबकाई आती है। मैं तेज़ी से चलता हुआ चौक़ की तरफ पहुंचा.. मुझे वहाँ काया के दोनों जवान भाई दिखे.. मैं उनके सामने गया.. और उनसे कहा कि...&lt;br /&gt;”मैंने उस दिन तुम्हारी बहन को छेड़ा था जीवन के नाम से.. बोलो क्या कर लोगे मेरा।“&lt;br /&gt;वह दोनों पान की दुकान पर मुँह बाए मुझे देखते रहे। फिर एक भाई ने मेरे कंधे पर धक्का दिया.. और कहा..&lt;br /&gt;’चल जा निकल ले वरना बहुत पिटेगा... चल निकल..।’&lt;br /&gt;मैं वही खड़ा रहा..। दोनों भाई वापिस पान खाने में व्यस्त हो गए। मैं पिटना चाहता था बुरी तरह.. एक अनहोनी.. एक आश्चर्य की तलाश में..। मैंने दूसरे भाई को कंधे से पलटाया और एक तमाचा उसके गाल पर दे मारा....।&lt;br /&gt;उसके बाद सब कुछ संगीत में बदल गया..। बहुत से धूंसे... बहुत सी लातें... चांटे...  मैं पिटता हुआ सड़के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचा जा रहा था.. एक तरह का नृत्य था.. जिसे मैं लोट-पोट होकर किये जा रहा था। अचानक सब कुछ बहुत धीमी गति से चलने लगा। मैं दोनों भाईयों के सारे वार बहुत ही सहजता से देखे जा रहा था.. वह मुझपर वार नहीं कर रहे थे, यह तो मैं था शायद जो जैसा चाह रहा था वैसा वार खा रहा था। मुझे धीमी गति से अपनी तरफ आते हुए मुक्के दिखे.. लात धूल उड़ाती हुई मेरे कूल्हे के आस-पास कहीं चिपक गई। उन दोनों भईयों के चहरे राम और लक्ष्मण की तरह चमक रहे थे। उनके मुँह से फुफ्कारे निकल रही थी। यह सुख था.. नहीं सुख नहीं आनंद.. आनंद की चरम अनुभूति। फिर एक करारी लात जो मेरे सीने पर चिपकी मैं घिसटता हुआ सड़क के किनारे तक पहुंच गया...। वह दोनों सड़क के बीचों-बीच रुक गए, दोनों थकान चुके थे.. संगीत बीच में ही बंद हो गया। मैं लड़खड़ाता हुआ उठा. रेंगता हुआ उनके पास गया और एक भाई को फिर ज़ोर का चपत जड़ दिया.. फिर संगीत शुरु हो गया। मैं इतना प्रसन्न बहुत कम हुआ हूँ ज़िन्दगी में.. मैं चाह रहा था यह संगीत कभी बंद ना हो.. मैं पिटता जाऊं.. पिटता जाऊ...। &lt;br /&gt;पिताजी के लाख पूछने पर भी मैंने किसी को नहीं बताया कि किसने मुझे मारा। माँ चुप थी। मुझे स्वस्थ होने में बहुत समय लगा। मैं बहुत ही हल्का महसूस कर रहा था। चीज़े मुझे साफ दिख रही थी। जब मैं स्वस्थ महसूस करने लगा तो एक दिन मैं पिताजी के कमरे में गया.. उनके पैर छुए... वह घबरा गए।&lt;br /&gt;’क्या हुआ?’ उन्होंने पूछा&lt;br /&gt;’मैं जा रहा हूँ।’ मैंने कहा...&lt;br /&gt;’ठीक है...’ &lt;br /&gt;वह मुझे आश्चर्य से देख रहे थे...। उन्हें लगा कि शायद मैं बाज़ार कुछ खरीदने जा रहा हूँ पर उसके लिए पैर पड़ने की क्या ज़रुरत थी? जब तक मैं उन्हें दिखता रहा वह मुझे देखते रहे। फिर मैं माँ से मिला... रामू से और अपने घर से...। कुछ छूट रहा था... एक ऎसा संसार जो मेरे होने के कारण मुझमें व्यस्त था। कुछ दिनों से मैं अपनी इस संसार में नहीं होने के बारे में सोच रहा था तो लगा कि इस संसार में मैं नहीं हूँ की तरह यह संसार नहीं चलेगा... यह संसार चलेगा कि मैं हुआ करता था। ’था’ में मुझे मेरे घर वाले याद करेगें.. और मैं कहीं ओर होऊंगा। मैं कहा होऊंगा में आश्चर्य और चमत्कार था.. सो वह मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मै इस बार उस आकर्षण का सपना नहीं देख रहा था.. मैं उस ओर बढ़ चला था।&lt;br /&gt;जीवन मुझे स्टेशन तक छोड़ने आया था। मेरे पिटने पर वह चुप था जैसे उसके पिटने पर मैं। स्टेशन छोड़ते वक़्त उसने कहा...&lt;br /&gt;’कहा जाओगे?’&lt;br /&gt;’शहर...।’ मैंने कहा&lt;br /&gt;जीवन के लिए इतना जानना काफ़ी था। फिर उसने कहा..&lt;br /&gt;’मुझे खुशी है।’&lt;br /&gt;’मैं जानता हूँ।’ मैंने कहा&lt;br /&gt;’एक वक़्त होता है जब तुम जा सकते हो.... मैं जिस दिन जा सकता था उस दिन मैं व्यस्त था।’&lt;br /&gt;’मैं भी अभी तक व्यस्त था।’&lt;br /&gt;’जब तुम वहाँ पहुच जाओगे तो वहाँ भी व्यस्तता होगी.. पर बहुत व्यस्त मत हो जाना।’&lt;br /&gt;’क्यों?’&lt;br /&gt;’छोटी-छोटी व्यस्तताएं आदमी को काकरोच बना देती है.. फिर उसे लगता है कि वह कभी भी नहीं मरेगा।’&lt;br /&gt;जीवन थोड़ा उग्र हो गया था। ट्रेन आने में अभी वक्त था..। मैं स्टेशन के बाहर जीवन के साथ खड़ा था। वह स्टेशन के भीतर नहीं जाएगा मुझे मालूम था। मैं भीतर जाने को हुआ...&lt;br /&gt;’कुछ देर रुक जाओ... अभी तुम्हारी ट्रेन आने में समय है।’&lt;br /&gt;मैंने अपना सूटकेस वापिस रख दिया...।&lt;br /&gt;’चाय पियोगे?’&lt;br /&gt;’ना...’&lt;br /&gt;’कुछ खाओगे?’&lt;br /&gt;’भूख नहीं है।’&lt;br /&gt;जीवन के भीतर पता नहीं क्या चल रहा था। मेरी इच्छा हुई कि उससे सीधा पूछ लू कि क्या बात है? पर मैं उसके सामने शांत खड़ा रहा। मैं सच में शांत था। जीवन अशांत था जो छूटने वाला था। &lt;br /&gt;मैंने सूटकेस उठाया और स्टेशन की ओर चलने लगा। जीवन मुझे देख रहा था। वह कुछ देर के लिए ही सही मुझे रोक लेना चाहता था पर मैं रुका नहीं.... मैंने उसे आखरी बार पलटकर देखा.. वह वहीं खड़ा था.. मुझे देखता हुआ...। मुझे उसकी काकरोच वाली बात याद आई और मैं पलट गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं स्टेशन पर अपना छोटा सा सूटकेस लिए बैठ था। ट्रेन दाहिनी तरफ से आएगी.. और बाए तरफ को मुझे ले जाएगी। ट्रेन देर से नहीं चल रही थी... और इस बार मैं सही समय के आस पास कहीं था।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-1705224486890573599?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/1705224486890573599/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=1705224486890573599&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1705224486890573599'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1705224486890573599'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='आस-पास कहीं...।'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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बहुत सुंदर है। यह बात लिख लेना होता है। पर उसे अपने लिखे में मैं दर्ज करना भूल गया था। आज दर्ज कर रहा हूँ। जिसकी वजह एक बूढ़ा ब्रिटिश आदमी है... जो मुझे न्युयार्क की मेट्रो ट्रेन में मिला था। उसके हाथ में डायरी थी, वह कुछ लिख रहा था। मैं हर बार की तरह अपना रास्ता भटक गया था और किसी गलत मेट्रों में चढ़ चुका था। जाना कहीं ओर था और कहीं ओर ही चल पड़ा था। उस बूढ़े ब्रिटीशर ने अपना लिखना बंद करके मुझे विस्तार से समझाया कि कहाँ उतरना और कौन सी मेट्रो किस स्टेशन से पकड़ना। बाद में उसने जोड़ा कि "फिर तुम उस रास्ते पर चलने लगोगे जहाँ तुम्हें जाना है” मैंने हस कर उसकी इस बात का स्वागत किया... उसे धन्यवाद दिया और उसके लेखन में बाधा पहुंचाने के लिए माफी मांगी। मैं उसके बगल में बैठ गया। गलत रास्ते पर चलने की असहजता पूरे शरीर में थी सो मैं ठीक से बैठ नहीं पा रहा था। उसने धीरे से पूछा क्या करते हो? यूं मैं लेखक हूँ कहने से कतराता हूँ पर चूंकि वह कुछ लिख रहा था इस बात से मुझे बल मिला और मैं बड़े अभिमान से कहा कि मै लेखक हूँ। फिर उसने पूछा कि ’How is life?’ मैं बिना झिझक जवाब दिया कि ’life is good.. very good.’  मेरी बात पर वह खुश हो गया और उसने कहा कि क्या मैंने यह बात लिखी है? मैंने पूछा कौन सी बात? उसने कहा कि ’life is good’ वाली बात। मैंने ना में सिर हिला दिया। वह कहने लगा कि... ”मैं जब भी अपनी पुरानी डायरीज़ पढ़ता हूँ तो मुझे सिर्फ पीड़ा, अवसाद और ग्लानी के पन्नों से भरी हुई वह दिखतीं हैं। फिर मुझे याद आया कि जब भी जीवन में मैं किसी भी प्रकार के डिप्रेशन से गुज़र रहा होता था तो मुझे अपनी डायरी याद आती थी और मैं उसके पन्ने के पन्ने गूद डालता था। अब इस उम्र में आकर जब अपनी डायरी पढ़ता हूँ तो लगता कि कितना पीड़ित जीवन जीया है मैंने... जबकि यह सही नहीं है.. मैं उन क्षणों को दर्ज़ करना ही भूल गया था जब मैं कहा था कि ’life is good.’ इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि इस बात को अभी इसी वक़्त लिख डालों...।” &lt;br /&gt;Life is good…  मैंने मेट्रो से उतरा और, उसके कहे अनुसार, दूसरी वाली मेट्रो में बैठ गया जो मुझे वहाँ ले जा रही थी जहाँ मुझे जाना था। कितने ही तरह के लोगों से घिरा हुआ था मैं... सभी अपनी किताबों, अपने संगीत और अपनी निजता में व्यस्त थे। कोई सीधे किसी से भी आँखें नहीं मिलाना चाहता था। मैंने अपनी डायरी निकाली और लिखा.. life is good… पर उस पर भी मुझे उस वाक़्य की संपूर्णता का एहसास नहीं हुआ... मैंने कुछ बड़े अक्षरों में लिखा .... LIFE IS GOOD… तब भी कुछ अधूरापन था। तभी मैंने धीरे से, खुद से, खुद के लिए फुसफुसाया life is good… और मुझे अच्छा लगा। जब मेरा स्टेशन आने वाला था। मैंने अपनी डायरी को वापिस बेंग़ में रखा... और खड़े होकर एक अंग्ड़ाई लेकर चिल्ला दिया.. LIFE IS GOOD.  अगल बगल बैठे सभी लोग अपनी निजता से निकलकर मेरी तरफ देखने लगे... मैं हल्की झेंप के साथ मुस्कुरा दिया... सभी मुझे देखकर मुस्कुराने लगे।  &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-7314589869394384121?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/7314589869394384121/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=7314589869394384121&amp;isPopup=true' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/7314589869394384121'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/7314589869394384121'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/07/life-is-good.html' title='life is good....'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-S6zannyGM1E/TjCwGC2m9zI/AAAAAAAAAtM/6JBY6ugcb_o/s72-c/oldmanjoe.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-5599442641662505242</id><published>2011-05-19T21:46:00.000+05:30</published><updated>2011-05-19T21:48:41.264+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी कहानियाँ...'/><title type='text'>"मौन में बात..."</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-BrfgpOpTmJc/TdVCmHGxA4I/AAAAAAAAAtA/dk9dR_Kmess/s1600/9_by_yaxahk.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-BrfgpOpTmJc/TdVCmHGxA4I/AAAAAAAAAtA/dk9dR_Kmess/s400/9_by_yaxahk.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5608462133469709186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ आहट हुई.. मेरी आँख खुल गई। हड़बड़ाहट-घबराहट। पहले झटके के बाद, मैं ’कोई है!’ के विचार पर मैं स्तब्ध था। बिना हिले-डुले मैं एक टिड्डे सा रुका रहा... लगा मेरे हिलने से वह आहट कहीं दब ना जाए। ’कोई है!’... ’कोई है!’.....”कोई है!”..... कुछ देर बाद मैंने हथियार डाल दिये...कोई नहीं है। मैं वापिस बिस्तर पर पसर गया। चादर खींच कर मुँह पर डाल दी। क्या मैं वापिस सो चुका था? मानों बीच में कुछ हुआ ही ना हो... कोई आहट ना हो, मेरे ’कोई है!’ का इंतज़ार सब झूठा हो।&lt;br /&gt;एक सन्नाटा है मेरे अगल-बगल... इस सन्नाटे के ढ़ेरों शोर हैं... मैं अपने अकेलेपन में अलग-अलग शोर चुनता हूँ.. सुनता हूँ। पर मेरे अकेलेपन में एक आहट है जो हमेशा बनी रहती है कि बाहर कोई है.... कोई आने वाला है। मुझे असल में हमेशा किसी-न-किसी का इंतज़ार रहता... ना..ना..ना... किसी-न-किसी का नहीं... किसी का। कोई है जिसे मैं नहीं जानता हूँ... या जानता हूँ.. पर मिला नहीं हूँ। या मिलना चाहता हूँ बेसब्री से.. ऎसा कोई आने ही वाला है। अचानक दरवाज़े पर आहट होगी और मेरे दरवाज़ा खोलते ही मुझे वह दिख जाएगा... वह जिसका मैं सालों से... या शायद जबसे मुझे याद है तब से, इंतज़ार करता आ रहा हूँ। मुझे हमेशा से लगता था कि मैं अकेला रह रहा हूँ... जबकि मैं कतई अकेला नहीं रह रहा हूँ। मैं हमेशा इंतज़ार में हूँ उस एक के जो बस आने को है... इसका मतलब मैं हमेशा से उस एक के साथ रह रहा हूँ... और रहता रहूँगा जो कभी भी नहीं आएगा !!!!!!!&lt;br /&gt;“सिमोन से मिलने जाना है।“&lt;br /&gt;ओफ !!! अब सोया नहीं जाएगा। मैंने आँखों से चादर हटा ली...। टकटकी बांधे दीवार को देखता रहा। बहुत पहले... किसी चुप रात में मैंने उस दीवार पर पेन से, लेटे हुए... एक रोता हुआ चहरा बनाया था। हमेशा ऎसे कुछ हज़ार क्षणों में मैं कसम खाता हूँ कि उठते ही इसे मिटा दूंगा। पर कभी मिटा नहीं पाया... उठते ही भूल जाता हूँ। मैंने करवट बदल ली, उस रोते हुए चहरे की बजाए मैंने चलते हुए पंखें को देखना ज़्यादा बहतर समझा। कम से कम वह दीवार से तो बहतर ही है... वह चल रहा है... कहीं पहुच नहीं रहा है यह अलग बात है मगर कुछ कर्म में तो लीन है ना..। उसका कर्म है हवा देना... वह चल रहा है सालों से लगातार और हवा फेंकता आ रहा है। &lt;br /&gt;मुझे खुद पे, कुछ बातों को लेकर अटूट विश्वास है। जैसे सालों से मुझे पूरा विश्वास है कि मैं रोज़ उठूगां और उठते ही भूल जाऊंगा कि मुझे दीवार पर बने उस रोते हुए चहरे को मिटा देना है.. हमेशा के लिए.. मैं उसे कभी भी नहीं मिटा पाऊंगा... और अभी, ठीक इसी वक़्त मैं सो नहीं सकता, मैं अभी कुछ ही देर में उठुंगा और एक बार दरवाज़ा खोलकर ज़रुर देखूंगा कि शायद पंद्रह मिनिट पहले जो मुझे लगा था कि आहट है.. वह अगर सच में आहट है तो वह अभी भी उस आहट के बाद वहीं, दरवाज़े के बाहर प्रतिक्षा में खड़ा होगा। अभी जितनी भी देर मैं बिस्तर में उलट-पलट रहा हूँ यह सब...दरवाज़ा ना खोलने के विरुद्ध मेरी कार्यवाही हैं... और कुछ भी नहीं। &lt;br /&gt;तभी दरवाज़े पर आहट हुई। मैं सकबका गया... ओह! तो सच में कोई बाहर खड़ा है। मैं दरवाज़े की तरफ लपका। दरवाज़ा खोलते ही सामने मुझे एक आदमी खड़ा दिखा... &lt;br /&gt;’बिल...?’&lt;br /&gt;’हें...!’&lt;br /&gt;’अखबार का बिल...?’&lt;br /&gt;’हाँ...’ &lt;br /&gt;मैंने उसके हाथ से पर्ची ली और भीतर आ गया। मुझे लगा उसने मुझे पकड़ लिया है। उसे पता चल गया है कि मैं... ओह!!! &lt;br /&gt;मैंने सरसरी निग़ाह से बिल देखा। कुछ देर अपना पर्स तलाशा... जब मिला तो उसमें मात्र बत्तिस रुपये थे। अख़बार वाला किसी बुरी ख़बर की तरह काफी देर से बाहर खड़ा था। मैं उसके पास गया।&lt;br /&gt;’दोस्त, अभी पैसे तो.. नहीं हैं।’&lt;br /&gt;’ठीक है कल आता हूँ।’ &lt;br /&gt;वह बड़बड़ाता हुआ चला गया। मेरे पास कभी भी पूरे पैसे नहीं रहते... नहीं मैं कभी भी थोड़े से नहीं चूकता हूँ। मेरे पास थोड़े होते हैं... और बहुत सारा, उस वक़्त की ज़रुरत का पैसा, मेरे पास कभी भी नहीं होता। &lt;br /&gt;उसके चले जाने के बाद मैंने दरवाज़ा बंद किया... और उसके बिल की ओर घूरकर देखने लगा। एक सौ बावन रुपये...। अरे!!! यह तो मुझे ठग रहा है। इसने बीच में करीब दस दिन मुझे अख़बार नहीं दिया था। उसके पैसे इसने काटे ही नहीं जबकि मैंने इससे कहा था। वह मुझे ठग रहा है... वह मुझे ठग रहा है... और इस बात से मुझे खुशी हुई। मुझे असल में मेरा ठगा जाना हमेशा से अच्छा लगता आया है। जब मेरा कोई दोस्त मुझसे पैसे उधार लेता है और समय रहते लौटाता नहीं है तो मुझे उसके बाद से हमेशा उससे मिलने में खुशी मिलती है...। मैं कभी उससे पैसों का ज़िक्र नहीं करता... वह खुद कभी भी बात नहीं उठाता... पर मैं खुश हो रहा होता हूँ। मुझे मेरा लगातार ठगे जाना खुशी देता है। &lt;br /&gt;कभी-कभी मैं इसके विरुद्ध खड़ा होना चाहता हूँ... चिल्लाना चाहता हूँ कि बस अब से मैं कसम खाता हूँ कि मैं कभी भी ठगा नहीं जाऊंगा। इस कसम के खत्म होते ही पता चलता है कि संधर्ष कितना बड़ा है... वह संधर्ष आलू-प्याज़ से लेकर पूरे बज़ार में, और पूरे बाज़ार से लेकर खुद मुझ तक फैला हुआ है...। मैं भी लगातार खुद को ठगता रहता हूँ.... अब इस ठगने में... कौन ठग है और कौन ठगा जा रहा है??? &lt;br /&gt;यूं जब दस दिन अख़बार नहीं आया था तो मुझे एक तरह की खुशी हुई थी। रोज़ सुबह ख़बर का एक जत्त्था मेरे घर में ’धम्म..’ से गिर जाता है। जब तक मैं उसे पुराने अख़बारों के ढ़ेर के ऊपर नहीं फैंक देता मुझे लगता है कि एक ज़िम्मेदारी है, ’यह पूरा अख़बार पढ़ने की...’ जिसे मैं रोज़ सिर्फ चित्र देखकर पूरी कर लेता हूँ। मुझे ज़िम्मेदारीयों से बहुत कोफ़्त होती है। किसी भी किस्म की ज़िम्मेदारी। मुझॆ ख़बरों से भी बहुत कोफ़्त होती है। मैं क्या कर लूंगा बहुत सारी समस्याओं को सुनकर सुबह-सुबह? &lt;br /&gt;“सिमोन से मिलने जाना है।“&lt;br /&gt;मैं आजकल अपने पुराने पड़ गए, छूटे हुए कपड़ों को पहनता हूँ। मैं कई सालों से बदला नहीं हूँ सो सालों पुरानी चीज़े वैसी-की-वैसी मुझसे चिपक जाती हैं मानों मैं बस उन्हें छोड़कर शाम को धूमने निकला था... अब मैं घर वापिस आ गया हूँ। यह पुरानी चीज़े मुझसे कोई शिक़ायत नहीं करती हैं... क्योंकि यह सालों से मेरे साथ है... इन्होंने धीरे-धीरे मुझसे अपनी सारी अपेक्षाओं को घिस डाला है। मेरी पुरानी चीज़े मुझे कोई ज़िम्मेदारी नहीं देती। लंबी उपेक्षाओं के बाद कोई सवाल नहीं करतीं। चुप मेरे शरीर से वह चिपक जाती हैं। सफेद शर्ट, जिसपर किसी लाल टी-शर्ट का रंग छूटा हुआ है और फटा-पुराना नीला जींस... उसे पहनकर मैं आईने के सामने खड़ा हुआ... उफ!! शेव कर लेता हूँ... सो मैंने झट-पट शेव कर डाली। हाँ.. अभी ठीक था।&lt;br /&gt;’सिमोन से मिलने जाना है।’.....’सिमोन से मिलने जाना है।’..... ’सिमोन से मिलने जाना है।’ &lt;br /&gt;खुद को आईने में देखता हुआ मैं ’सिमोन से मिलने जाना है’ की रट लगाए था....। सिमोन के कई बार फोन करने पर भी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई। वह बुलाती रहीं पर मेरे जाने का साहस ही नहीं हुआ। मैं उनसे मिलने के लिए घर से निकला था... कई बार... पर जब भी घर के बाहर कदम रखा... एकटक भागती-दौड़ती गाड़ियों को.. लोगों को ताकता रहा...। मुझे पता था सिमोन कुछ परेशान हैं.. मेरा उनके पास इस वक़्त जाना भी बहुत ज़रुरी था... पर मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। हाँ... हिम्मत चाहिए दूसरी तरफ जाने में...। मेरा इतनी देर तक खुद को आईने में ताकते रहना एक तरह से हिम्मत बटोरना ही है। सिमोन मेरे जीवन में का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं...। करीब-करीब दस बारह साल से हम एक दूसरे को जानते हैं.... पिछली बार मैं उनसे उनके बयालीसवे जन्मदिन पर मिला था...। हम दोनों ही थे बस उनके घर पर... हमने केक काटा... Wine पी... और देर तक लंबी चुप्पी में... अपने-अपने एकांत में बैठे रहे। सिमोन confession box है मेरे लिए... जहाँ जाकर मुझे बस कुछ देर बैठना होता है... कुछ भी confess करने की ज़रुरत नहीं होती...।&lt;br /&gt;मैंने झटपर घर में ताला लगाया और अपनी शर्ट के तीसरे बटन को देखता हुआ... दूसरी तरफ कूद गया। कुछ देर में मैं सिमोन के घर में.. सिमोन के सामने बैठा था।&lt;br /&gt;उनके बालों के किनारे सफेद हो चले थे। आँखों के नीचे हल्का काला रंग बह निकला था... उसे काला नहीं कत्थई कहा जा सकता है। लंबी गर्दन... तीख़ी नाक़... आँखे किताबों के पन्नों में कुछ अर्थ टटोलती सी...। घर की सूती सफेद साड़ी पहने हुए थी...जिसमें बेंगनी रंग के छोटे फूल बने हुए थे। &lt;br /&gt;’कुछ लिख रहे हो आजकल...?’&lt;br /&gt;किताबों में कुछ टटोलते हुए उन्होंने पूछा।&lt;br /&gt;’नहीं... घर में ही था..।’&lt;br /&gt;’कोई महिला मित्र...?’&lt;br /&gt;मैं खिसिया दिया... &lt;br /&gt;’नहीं.... ना महिला, ना ही मित्र।’&lt;br /&gt;’बहुत समय लगा दिया आने में....’&lt;br /&gt;मैं चुप रहा... उन्होंने भी आगे कुछ नहीं कहा...। मैं क्या कहता कि “पता नहीं किससे डरा हुआ घर में दुबका बैठा हूँ.... कुछ देर के लिए बाहर निकलता हूँ तो घबरा जाता हूँ। लोगों के बीच बैठे हुए उनकी बातें मुझे जिबरिश लगती हैं... एक दूसरे का मनोरंजन करने की थकाने वाली कोशिश.. मुझे बाहर सांस लेने में दिक्कत होती है सो घर में बैठा हूँ... चुप्पी साधे..” क्या मतलब निकलता इन बातों का.. सो मैं चुप ही रहा। &lt;br /&gt;’क्या हम लोग एक दूसरे को इतना भी नहीं जानते कि एक दूसरे के दुख सूंघ सके?” &lt;br /&gt;यह कहकर वह भीतर चली गई। सामने खाली कुर्सी थी... जिसकी लकड़ी पर उनके सालों बैठे रहने के पीले निशान पड़ चुके थे। मुझे उन निशानों को छूना बहुत पसंद था... मैं हल्के से अपनी उंगलिया उस कुर्सी की चिकनी देह पर फेर लेता... और लगता कि किसी की सालों की तपस्या का मैं भी एक छोटा हिस्सा हूँ। सामने टेबल पर तीन किताबें पड़ी हुई थीं... जो आधी पढ़ी हुई, ओंधी पड़ी थी... एक अंग्रेज़ी की और दो हिंदी की। वह कभी भी एक बार में एक किताब नहीं पढ़ती थी। उनमें एक बात को एक बार में ही खत्म करने की धीरता नहीं थी। उनका घर उनकी मन:स्थिति की गवाही दे रहा था। चीज़े बिख़री हुई पड़ी थी। कल रात के खाने के निशान भी टेबल पर मौजूद थे... झाडू कुछ दिनों से नहीं लगी थी।  &lt;br /&gt;वह भीतर अपनी कही हुई बात को दफ़्न करने गई हैं...। जब वह उसे पूरी तरह दफ़्न कर देंगी तो एक मुस्कुराहट के साथ बाहर आ जाएगीं... जैसे वह मुझसे अभी-अभी मिली हों। वह मुझसे बहुत नाराज़ थी, पिछले कुछ हफ्तों की व्यस्तता के चलते मैं उनसे बिलकुल भी नहीं मिल पाया था। &lt;br /&gt;’सिमोन... सिमोन...”&lt;br /&gt;मैने उन्हें आवाज़ दी पर भीतर से कोई जवाब नहीं आया। मैं कुछ देर में उठकर टहलने लगा... वह अपना पूरा समय लेगीं मैं जानता हूँ। सुबह, सूरज की रोशनी खिड़की से सीधे उनकी दीवर पर पड़ती थी, फिर धीरे-धीरे रेंगते हुए एक उजले प्रेत की तरह घर छोड़कर चली जाती। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि ’क्या मैं इस रोशनी को अपने घर में रोक सकती हूँ...? घर का दरवाज़ा खिड़की सब बंद करके इसे क़ैद कर लूं? जैसे अपने घर में मैं क़ैद हूँ।’ उनके घर में घुसते ही लगता है कि आप उनके भीतर चले आए हैं। मैं उन्हें उनके घर से अलग करके कभी भी देख नहीं पाता। जब हम कभी बाहर घूमने निकलते थे तो वह एक छोटी बच्ची सी हरकते करने लगती थी... जो अपने माँ-बाप की छत्र-छाया से बहुत दिनों बाद भाग निकला हो। वह बिना अपने घर के नग्न सी जान पड़ती थी। मैंने कभी उन्हें नग्न दिखने वाली बात नहीं बताई...।&lt;br /&gt;’यह देखो आज दार्जलिंग वाली चाय तुम्हारे लिए। मुझे पता था आज तुम ज़रुर आओगे.. सो मैंने कल शाम को तुम्हारे लिए यह चाय लेकर आई।’&lt;br /&gt;इसके पहले मानों कुछ हुआ ही ना हो। हमारी बहस, मेरी लाचारी में झुकी हुई आँखें, उनका गुस्सा... सब कुछ जैसे कई महिनों पुरानी बात हो जिसे हम दोनों ने दफ़्न कर दिया हो। वह दफ़्न करके आ चुकी थी पर मैं अभी भी जल रहा था।&lt;br /&gt;उन्होंने चाय के दोनों कप टेबल पर रखे और खुद अपनी कुर्सी पर बैठ गई... मैं अभी भी टहल रहा था।&lt;br /&gt;’तुम बिस्कुट भी लोगे?’&lt;br /&gt;’ना...।’&lt;br /&gt;मैंने अपना कप उठाया और वापिस टहलने लगा। उन्हें पता था कि मेरे लिए कुछ भी दफ़्न करना इतना आसान नहीं है...। सिमोन अपनी चाय पर सहजता से बैठी रहीं... मेरा टहलना मुझे ही खटकने लगा।&lt;br /&gt;’हमें ऎसा क्यों लगता है कि जो खेल हम खेल नहीं पाए... उसे अगर हम खेल लेते तो आज जीत चुके होते?’&lt;br /&gt;पता नहीं यह बात मेरे मुंह से क्यों निकली...। शायद मैं उनके भीतर टहल रहा था... उनकी गोद में कहीं मेरे पांव पड़ रहे थे.. उनकी बाहों में मेरी ऎड़ियाँ गड़ रही थी सो मैं यह कह गया...। उन्हें यह ना लगे कि उनके गुस्से की वजह से मैं परेशान हूँ। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मैं परेशान हूँ... अपने व्यक्तिगत कारणों की वजह से...। वह अपनी चाय पर बनी रही। मैं कितना भी झूठ क्यों ना कहना चाहू.. पर सिमोन के सामने मेरे मुँह से हमेशा मेरे बहुत निजी सत्य ही निकल रहे होते हैं....। मैं सच में, गए कुछ समय से जीवन के उन खेलों के बारे में सोचता रहा हूँ जिनमें से मैंने बीच में ही कहीं exit ले ली। दुख यह भी है कि वह खेल अभी भी, मेरी गैरमौजूदगी में भी चल रहे हैं.. कहीं....। &lt;br /&gt;’अगर उन खेलों के बारे में ज़्यादा सोचोगे तो मेरे तरह के लेखक बन जाओगे।’&lt;br /&gt;यह कहते ही सिमोन हसने लगी। ज़ोर-ज़ोर से....। मैं अपना टहलना बंद करके उनके सामने आकर बैठ गया। उस हंसी में कमरे की हवा बहुत हल्की हो गई थी। यह सिमोन का घर था, इस घर में सांस लेने के लिए हवा कितनी ठोस हो यह सिमोन ही तय कर सकती थी। इतने सालों के हमारे संबंध में मैं आज भी उंगली रखकर नहीं बता सकता कि यह असली सिमोन है... वह हमेशा अलग होती है। जब मैं शुरु-शुरु के दिनों में सिमोन से मिलने आता था तो ’सिमोन जी’ कहकर उन्हें संबोधित करता था। मुलाकातों की शुरु की जिझक खत्म होते ही उन्होंने मुझे झिड़क दिया... ’जी’ हट गया और हम एक दूसरे के गहरे दोस्त हो गए। ’गहरा’ शब्द भी मैं सिर्फ अपने लिए ही इस्तेमाल कर सकता हूँ...। मेरे एकांत में वह गहरे बैठी है... और उनका एकांत मेरे लिए वह जगह है जहाँ मैं कभी ज़्यादा ठहर नहीं पाया।&lt;br /&gt;’तुम्हें मनोज याद है?’&lt;br /&gt;’हाँ जो मुझे बहुत पसंद नहीं करता था।’&lt;br /&gt;’हाँ वही.... उसका ख़त आया था... पहले मैं इस ख़त को लेकर बहुत हंसी थी फिर मुझे तकलीफ होने लगी...।’&lt;br /&gt;यह कहते ही उन्हेंने एक किताब अपने हाथों में रख ली। उसके कुछ पन्ने पलटे... और एक किसी पन्ने पर आकर वह रुक गई। जैसे कोई बच्चा अपना रटा-रटाया पाठ भूल जाता हो और फिर आगे की बात किताब में टटोलने लगता हो। &lt;br /&gt;’यह कहानीया शायद तुम्हें याद हो...?’&lt;br /&gt;’कौन सी...?’&lt;br /&gt;’जो अभी अभी छपी हैं... जिसपर हमारी बहस हुई थी...।’&lt;br /&gt;’हाँ मैंने कहा था कि यह प्रेम कहानीया है.... और आपने इसे ’मौंन में बात’ जैसा टाईटल दिया था।’&lt;br /&gt;उन्होंने वह किताब मेरे हाथों में थमा दी..। टेबिल-क्लाथ के नीचे से एक ख़त निकाला और मुस्कुराने लगी। &lt;br /&gt;’हम कितना fiction में जीते है? जीना बहुत क्षणिक होता है... कभी-कभी हम किसी आश्चर्य को जी लेते है...। उसके पहले और बाद में हम fiction में ही रहते हैं। तुम मुझे इस वक़्त सुन रहे हो... तुम्हारे हाथों में मेरी कहानियों की किताब है और मेरे हाथों में मनोज का ख़त... यह बात शायद तुम्हारी गढ़ी हुई कहानी हो...इसका मुझसे कोई संबंध ना हो? कई सालों बाद क्या यह घटना तुम्हारे जीए हुए के हिस्से में शामिल हो सकती है?’&lt;br /&gt;यह सवाल नहीं था, मैंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। सिमोन का अंगूठा ख़त के कोने से खेल रहा था। वह कुछ ओर कहना चाहती थीं पर उस बात का दरवाज़ा उन्हें नहीं मिल रहा था... वह इस वक़्त दीवारे टटोल रही थीं। &lt;br /&gt;’मैंने बहुत सघन प्रेम महसूस किया था जब मनोज मेरे साथ रह रहा था। तुम्हें आश्चर्य होगा पर मैं मनोज के साथ बहुत कम रही हूँ। मैंने कहानी गढ़ना शुरु कर दिया था... वह कोई ओर मनोज था जो मेरे साथ रह रहा था। कभी-कभी उस मनोज की शक़्ल इस मनोज से मिल जाया करती थी... आवाज़ भी एक सी थी... पर दोनों की सांस एकदम जुदा। मैं मनोज के होठों के ठीक पास... बहुत देर तक रुकी रहती थी... उसकी आँखें, उसकी गालों की उभरी हड़्डिया ताकती सी... मैं वहाँ रुककर उसकी सांसे चबा रही होती थी।’&lt;br /&gt;उन्होंने ख़त को हलका मरोड़ा..&lt;br /&gt;’...और यह मनोज इन कहानियों को पढ़कर वह मुझसे वापिस मिलना चाहता है। इस ख़त में यही लिखा है। पहले मुझे हंसी आई फिर तकलीफ होने लगी।’&lt;br /&gt;’तकलीफ किस बात की...?’&lt;br /&gt;’हमारे पास शब्द ही तो हैं... शब्दों को एक तरीके से जमाने पर कुछ भाव उत्पन्न होते हैं...। वह भाव किसके हैं? जिसने शब्द कहे है उसके यह जो वह शब्द सुन रहा है उसके?’ &lt;br /&gt;यह मेरी बात का जवाब नहीं था। मैं जवाब चाहता भी नहीं था। सिमोन ने धीरे से ख़त फाड़ दिया। ख़त के फटते ही मेरी ख़त में दिलचस्पी बढ़ गई... ठीक-ठीक क्या लिखा होगा उसमें... कौन सी बातें? ख़त फाड़कर उन्होंने उसे अपनी मुठठी में जकड़ लिया... उस ख़त के शब्द अभी भी उनके भीतर रिस रहे थे। मेरी इच्छा हुई कि मैं उस फटे हुए ख़त को उनके हाथों से छीन लूं.. फिर उसका कतरा-कतरा बड़ी तरतीब से जमाऊं....उसका एक-एक शब्द चबा लूं...और फिर वापिस सिमोन के सामने बैठकर यह दृश्य फिर से जीना शुरु कर दूं।&lt;br /&gt;’यह एक बहुत बड़ी प्रदर्शनी है। मेरी बाल्कनी में वही कपड़े सूख रहे हैं जैसा लोग मुझे देखना-सुनना चाहते हैं। मैं भी लगातार उन्हीं कपड़ों को धोती-सुखाती हूँ... जिन कपड़ों में लोग मुझे देखना चाहते हैं। तुम्हें पता है यह हिंसा है... हमारी खुद पर। और इसीलिए शायद हम उन खेलों के बारे में बार-बार सोचते है... जिन्हें खेलना हमने बहुत पहले छोड़ दिया था... जिन्हें अगर खेल लेते तो शायद हम आज जीत जाते।’&lt;br /&gt;सिमोन कुछ देर में उठी और डस्टबिन तलाशती हुई भीतर चली गईं। ख़त डस्टबिन में डालकर वापिस आई और घर की सफाई में लग गई। वह अपने एकांत में जा चुकी थी... मेरी मौजूदगी अब उनके लिए कोई माने नहीं रखती थी... पर मैं वहाँ मौजूद रहा..। इतने दिनों तक ना आ पाने का गिल्ट मेरे बीतर था। मैं उन्हें पूरा वक़्त देना चाहता था कि वह वापिस अपनी कुर्सी पर आ सकें और एक लय में अपनी बात कह सकें...। पर वह नहीं आई...।&lt;br /&gt;कुछ देर मैं एक पेड़ के नीचे रिक्शे का इंतज़ार करता रहा। फिर पैदल घर की ओर चल पड़ा। मैं बहुत जल्दी किसी चीज़ को दफ़्न नहीं कर पाता हूँ... इस मामले में शायद मैं हिंदू हूँ। मैं चीज़ो को जलाना पसंद करता हूँ... पूरे संस्कारों के साथ, उन्हें कंधे पर कई दिनों तक ढ़ोता हूँ.... जलने के बाद उनकी गर्म राख से कई दिनों तक अपने हाथ सेकता रहता हूँ... फिर राख से जली हुई हड़्डीयों को बीनकर उन्हें नदी में सिराने जाता हूँ.. इस सब में कई बार सालों लग जाते हैं। &lt;br /&gt;अधूरी बातों संख्या उम्र के साथ-साथ बढ़ती रहती है। मैं कितनी भी कोशिश क्यों ना करुं बात पूरी तरह पूरी करने की तब भी कहने को बहुत कुछ हमेशा बचा रह जाता है। फिर लगने लगता है कि यह बचा हुआ... कल्पना के संवाद जैसा है.. इस दुनिया के जिए हुए दृश्यों में यह संवाद हो ही नहीं सकते है। इन संवादो की फिर जगह कहाँ है? क्या यह वह सच हैं जिनकी बुनियाद पर हम बाक़ी बातें करते फिरते हैं.... या यह बिल्कुल झूठी बातें है... जिनका संबंध उस दूसरी दुनिया से है जो इस दुनिया का प्रतिबिंब है.. जिसे हम जी रहे हैं... या बात बिलकुल उल्टी है... यह दुनिया प्रतिबिंब है उस दुनिया का जिसकी बातें हम बार-बार कहने से चूक जाते हैं। &lt;br /&gt;मैं किसी रिक्शे के आने का इंतज़ार नहीं कर रहा था...। मैं चल रहा था...। यह सड़क जानी पहचानी थी... हाँ मेरे जीवन का बहुत सा समय यहीं गुज़रा था... मैं अपने घर के सामने खड़ा था... नहीं वह घर नहीं जिसमें मैं रहता हूँ... वह कमरा है...। घर आपका हमेशा वहीं होता है जहाँ आप बड़े होते हैं। यह वह जगह है जिसे मैं अपना घर कहता हूँ... जहाँ अब सिर्फ मेरा बाप अकेले रहता है। मैं कब से इस तरफ नहीं आया। नीला दरवाज़ा सफेद दीवारें....  &lt;br /&gt;मुझे मेरे बाप और मेरे देश में बड़ी समानता लगती है। मेरा पूरा बचपन मेरे बाप की महानता में गुज़रा था। वह मेरे पेदा होने के पहले भी था, उसकी किससे कहानियाँ लोरी की तरह सुनते हुए मेरा बचपन बीता.... वह मेरा हीरो था। वह मेरे सारे सवालों का जवाब था। फिर जैसे-जैसे मैंने होश संभाला मुझे लगने लगा कि इस देश ने मेरे साथ धोखा किया है... यह कमज़ोर है... इसका भी पहले कोई बाप था... इसकी भी अपनी बहुत सी कमियाँ हैं। मुझे मेरे देश पर दया आने लगी। जब तक मैं मेरे धोखे की बात लेकर बाप के पास जाता... वह मुझे लेकर चुप हो चुका था। मैं वह नहीं हो पाया जिसका उन्होंने सपना देखा था... मैं वास्तविकता से भागने जैसा कोई आदमी हो चुका था.. जो अपने बाप जैसा दिखता था। वह अभी भी मुझमें अपना सपना ढ़ूढ़ते थे। मेरे जवाबों में जब उन्हें निराशा हाथ लगती तो वह चुप हो जाते। मेरा बाप मेरे देश की तरह था... जो मेरे सारे संवादों पर चुप्पी मारे बैठा था। माँ जब ज़िंदा थी तो हमारे बीच खूब लड़ाईया होती थी... माँ के बहाने से हम आपस में बात भी कर लिया करते थे। पर माँ के चले जाने के बाद अपने बाप के साथ रहना असहनीय हो गया था। सो मैंने उनको अकेला छोड़ दिया। एक किराय का कमरा लेकर रहने लगा। &lt;br /&gt;कुछ देर सांकल बजाने के बाद भीतर से आवाज़ आई। &lt;br /&gt;’अरे भाई कुछ नहीं चाहिए...।’&lt;br /&gt;’पापा मैं हूँ...।’&lt;br /&gt;कुछ देर की शांति के बाद दरवाज़ा खुल गया। बाप बहुत देर मुझे आश्चर्य से देखता रहा। फिर भीतर किचिन की तरफ चला गया। मैं घर में टहलने लगा। घर की एक सुंदर ठंडक है.. जिसकी कमी मैं अपने कमरे में सबसे ज़्यादा महसूस करता हूँ... मंदिरों-चर्च जैसी ठंड़क। शायद घर में बहुत सारा मृत दीवार से चिपके हुए तैरता रहता है... पुराना जीया, बीते हुए लोग और बहुत से रहस्य... जिसका सत्य अब घर अपनी दरारों में छुपाए खड़ा है। मैं पहले अपने कमरे में गया... वह अभी तक वैसा ही जमा हुआ था मानों मैं अभी भी यहाँ रह रहा हूँ। तभी मेरी निग़ाह उस शेल्फ पर पड़ी जिसके पीछे मैं, अपने बाप की मार के डर से, छिप जाया करता था। उस शल्फ के कोने से मैं सबको देख सकता था लेकिम मुझे कोई भी देख नहीं पाता था। एक अजीब सी इच्छा भीतर जाग गई उस शेल्फ के पीछे छिपने की... मैंने अपना बेग़ नीचे रखा और शेल्फ के पीछे घुसने की कोशिश की... मैं अब बड़ा हो गया था। मेरा वहाँ घुसना नामुमकिन था फिर भी मैं कोशिश करता रहा... मैं खीजने सा लगा... और एक अजीब आवाज़ के साथ मेरे आंसू गिरने लगे। मैं अपने आपको अपने बचपन में ज़बरदस्ती घुसाना चाह रहा था। &lt;br /&gt;’क्या कर रहे हो?’&lt;br /&gt;मेरा बाप दरवाज़े पर चाय का प्याला लिए खड़ा था। मैं बाहर निकला। बाप ने चाय के प्याले को टेबल पर रखा और मेरे कपड़े झाड़ने लगा, जिसपर चूना लग गया था। मैं उनसे मना करता रहा पर वह नहीं माने... शायद इससे पहले उन्होंने मुझे मेरी माँ की मृत्यु पर रोते देखा था। मेरा रोना रुक नहीं रहा था सो मैं कुछ देर के लिए बाथरुम चला गया।&lt;br /&gt;हम दोनों चाय की टेबल पर आमने सामने बैठे थे। &lt;br /&gt;’आप चाय नहीं पीएगें?’&lt;br /&gt;’डॉक्टर ने मना किया है।’&lt;br /&gt;’अरे! क्या हुआ है आपको?’&lt;br /&gt;’बुढ़ापा है बिमारियाँ तो अब लगी रहेगीं।’&lt;br /&gt;’बिमारी?’&lt;br /&gt;’शुगर है... जिसकी वजह से परहेज़ करना पड़ रहा है।’&lt;br /&gt;देश की व्यवस्था संभालने वाला एक सरकारी मुलाज़िम मेरा बाप था। सारी व्यवस्था में बेईमानी के बावजूद मेरे बाप को लगता था कि देश चंद ईमानदार लोगों की वजह से चल रहा है, जिसमें वह भी एक है। मेरे लिए देश भागा करता था क्योंकि मुझे लगता था कि मेरा बाप देश का बहुत सारा बोझ अपने कंधो पर लिए भाग रहा है। मेरा देश मेरे सामने बैठा था... बीमार... और मैं कुछ भी नहीं कर सकता था।&lt;br /&gt;तभी मेरी निग़ाह मेरे पिताजी के हाथों पर पड़ी....। वह कितने बूढ़े हो चुके हैं। उनकी चमड़ी लटक गई है। कंधे झुके हुए हैं। वह कोई ओर था जिसे मैं अपना बाप माने बैठा था... मेरा बाप तो मेरे सामने बैठ है जिसे शायद मैं पहली बार देख रहा हूँ। अचानक मुझे उनकी उम्र बहुत ज़्यादा लगने लगी। उनके हाथों के ऊपर उगे हुए बाल भी सफेद हो चुके थे। क्या उम्र होगी इनकी.... मुझे मेरे बाप की उम्र नहीं पता है।&lt;br /&gt;’आपकी उम्र क्या होगी?’&lt;br /&gt;’क्या?’&lt;br /&gt;’कुछ नहीं।’&lt;br /&gt;फिर मैंने कुछ नहीं पूछा। हम दोनों को ही अब मेरी चाय खत्म होने का इंतज़ार था। उनकी निग़ाहे कुछ देर मुझपर रुकी थी जब हम बात कर रहे थे... अब वह दीवारों पर टंगी तस्वीरों को टटोल रही थीं।&lt;br /&gt;’सिमोन कैसी है?’&lt;br /&gt;जैसे किसी तस्वीर को देखकर उनको यह बात याद आई हो।&lt;br /&gt;’ठीक है।’&lt;br /&gt;’अभी भी मिलते हो उससे?’&lt;br /&gt;’उन्हीं के घर से चला आ रहा हूँ।’&lt;br /&gt;इस बात पर मेरा बाप उठकर अपने कमरे में चला गया। मैंने चाय का कप उठा और उसे किचिन में रख दिया। किचिन काफी बिखरा पड़ा था। सो मैं उसे साफ करने लगा। कुछ सुबह के बर्तन पड़े थे वह मांज दिये। जाने से पहले कुछ देर पिताजे के कमरे के बाहर खड़ा रहा.... वह अखबार में अपना सिर गडाए बैठे थे। मैंने सालों से पिताजी के कमरे की चौखट नहीं लांगीं...। मैं जाने को हुआ... तभी उनकी आवाज़ आई...&lt;br /&gt;’मैं अगले महीने बहत्तर का हो जाऊंगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिक्शा, भीड़, पसीना, डर... &lt;br /&gt;अंत में मैं अपने कमरे में पहुँचा। एक रजिस्टर्ड लेटर पैरों में पड़ा मिला... मेरी स्कालरशिप स्वीकार कर ली गई। तीन साल की रिसर्च पर मुझे विदेश जाने का मौका मिला है, जिसका मैं बहुत लंबे समय से इंतज़ार कर रहा था। तभी दरवाज़े पर आहट हुई... मैंने लेटर को फ्रिज के ऊपर रखा और दरवाज़ा खोला.... सामने सिमोन खड़ी थी।&lt;br /&gt;’तुमसे बात पूरी नहीं हुई तो सोचा तुम्हारे घर आ जाती हूँ, इसी बहाने तुम्हारा घर भी देख लूंगी।’&lt;br /&gt;’आईये... अंदर आ जाईये।’&lt;br /&gt;घर में कोई कुर्सी नहीं थी और ना ही कुर्सी जैसी कोई जगह....। कुछ देर सिमोन बैठने की जगह खोजती रही, फिर कुछ हिचकिचाहट के बाद वह पलंग पर बैठ गईं। यह बहुत अजीब था... मैं जब सिमोन के यहाँ जाता हूँ तो जैसा मेरी उपस्थिति में सिमोन अपने घर में व्यवहार करती है.... मैं उसी व्यवहार की नकल, अपने घर में उसके सामने कर रहा था। मैंने अपने आपको घर के छोटे-छिछले कामों में व्यस्त कर लिया था। वह मेरे शेल्फ में रखी किताबें टटोलने लगी। लगभग किताबें उन्हीं ने मुझे दी थी। &lt;br /&gt;‘कुछ दिनों पहले मैं तुम्हारे पिताजी से मिलने उनके घर गई थी।’&lt;br /&gt;यह बात सुनते ही मेरे सारे छोटे-छिछले काम हाथ से छूट गए। मैं सीधे उन्हें देख रहा था और वह मेरी ओर......। &lt;br /&gt;’मुझे पता था तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा... पर मैंने यह अपनी ख़ातिर किया है। शायद बहुत समय बाद मैंने कुछ अपनी ख़ातिर किया है।’&lt;br /&gt;’पिताजी आपके बारे में अच्छी राय नहीं रखते हैं... उन्हें लगता है कि मेरे घर छोड़ने का कारण आप हैं।’&lt;br /&gt;’उनसे मिलने के बाद मुझे भी लगने  लगा कि शायद मैं ही हूँ वह कारण।’&lt;br /&gt;’नहीं कतई नहीं... ।’&lt;br /&gt;वह अपने हाथ में रखी किताब के पन्ने पलटने लगी....&lt;br /&gt;’यह बहुत अच्छी किताब है...।’&lt;br /&gt;’यह तीन साल पहले आप ही ने मुझे दी थी.... सॉरी मैं लौटा नहीं पाया...।’&lt;br /&gt;’इतने सालों में मुझे नहीं लगता है कि तुमने कोई भी किताब मुझे लौटाई है।’&lt;br /&gt;’पर मेरी नीयत थी....’&lt;br /&gt;वह कामू के The Outsider के पन्ने पलट रहीं थीं। किसी एक पन्ने पर देर तक रुकी रहीं.... फिर किताब बंद करके वापिस शेल्फ में रख दी। मुझे उनकी दी हुई किताबें पढ़ने में बहुत मज़ा आता था... क्योंकि उनकी किताबों में उनके पढ़े हुए के निशान, नोट्स हर तरफ गुदे हुए होते थे। मुझे लगता है कि मैंने सिमोन को... किताबों में लगे पेंसिल के निशानों में कहीं पहचाना है। व्यक्तिगत तौर पर हमारे संवाद  ABSURD रहे हैं। &lt;br /&gt;’तुम्हारे पिताजी ने मुझसे एक अजीब बात कही थी...’&lt;br /&gt;’क्या?’&lt;br /&gt;’उन्होंने कहा था कि तुमने मेरे जवान बेटे को अपने चंगुल में फसा रखा है।’&lt;br /&gt;’आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए था।’&lt;br /&gt;’मैंने उन्हें कहा कि मैं एक शादि-शुदा औरत हूँ। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कहा कि पर रहती तो अकेली ही होना ना।’&lt;br /&gt;’आपको लेकर मेरे और मेरे बाप के बीच कई बार कहा-सुनी हुई है...’&lt;br /&gt;तभी सिमोन पलंग से उठी और मेरी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। मैं कमरे में ही बना रहा। मुझे सिमोन के ऎसे मौन की आदत है जो बीच संवाद में अचानक चले आते हैं। मुझे हमेशा लगता है कि सिमोन, जिन्हें मैं जानता हूँ वह इन मौन में है.... हमारी बातचीत महज़ वह पगड़्ड़ी है जिसपर चलकर वह उस मौन में बार-बार चली जाती है। उनकी दी हुई किताबों में मैं उन हिस्सों को बार-बार पढ़ता हूँ जिन्हें वह पेंसिल से मार्क करके रखती हैं... वह हिस्से बिलकुल इन मौन जैसे हैं... जो अभी मैं महसूस कर रहा हूँ। मैंने कभी सिमोन को नहीं कहा कि मैं उन पेंसिल से गुदे हुए हिस्सों को उस किताब का मौन कहता हूँ।&lt;br /&gt;’अरे देखो... सामने पेड़ पर किंफिशर आई है।’&lt;br /&gt;बालकनी से सिमोन की आवाज़ आई।&lt;br /&gt;’हाँ वह इस वक़्त रोज़ आती है। मैंने उसका नाम भी रखा है।’&lt;br /&gt;’क्या नाम है?’&lt;br /&gt;’शुभचिंतक...’&lt;br /&gt;सिमोन हंस दी... फिर उसने कई बार उस किंगफिशर को शुभचिंतक नाम से पुकारा....। शुभचिंतक कुछ देर में गर्दन इधर-उधर घुमाकर उड़ गया। हम दोनों बालकनी में खड़े शुभचिंतक का काफी देर तक इंतज़ार करते रहे पर वह नहीं आया।&lt;br /&gt;’मैं सोचती हूँ कि मनोज के पास चली जाऊं।’&lt;br /&gt;’मनोज के पास... बेंग्लौर?...’&lt;br /&gt;’हाँ....’&lt;br /&gt;’यूं... आचानक !!’&lt;br /&gt;’हाँ अचानक, मुझे लगा यही ठीक रहेगा।’&lt;br /&gt;’पर आपने तो उसका ख़त फाड़ दिया था, और आप....’&lt;br /&gt;’मुझे जाना चाहिए. और शायद यह सही भी है।’&lt;br /&gt;’आप कबसे सही काम करने लगी... और सही किसके लिए है?’&lt;br /&gt;’तुम्हारे लिए... मेरे लिए... तुम्हारे पिताजी के लिए... मनोज के लिए...।’&lt;br /&gt;मेरे पिताजी ने एक बार तुनक-कर मुझसे कहा था कि ’उस औरत के चक्कर में रहोगे तो बर्बाद हो जाओगे।’ यूं उनकी कही हुई बातें मुझपर ज़्यादा असर नहीं करती थीं... पर पता नहीं इस वाक़्य में किस अजीब तरीके का सम्मोहन था कि मेरी बहुत कोशिशों के बाद भी मैं इस बर्बाद हो जाने वाले हिस्से को भूल नहीं पाया। यह उस दिन के बाद से कुछ ऎसा मेरे शरीर से चिपका कि मैं इसे अलग नहीं कर पाया। मैं बर्बाद होना चाहता था। मैं चाहता था कि मैं सड़कों पर आ जाऊं... भीख़ मांगता हुआ अपने बाप को दिखूं...। मैंने अपना जॉब छोड़ दिया.. घर से बिना पैसे लिए पूरा शहर पैदल छानता रहता... जब सबकुछ बहुत असह हो जाता तो सिमोन के मौन में छुपकर बैठ जाता। सिमोन खाना खिला देती, मैं चुपचाप बिना किसी प्रतिक्रिया के उनका लिखा हुआ सुनता रहता। मेरे लिखे की प्रतिलिपी मैं सिमोन की टेबल पर जाने से पहले रख देता... बहुत समय बाद वह किसी एक कहानी का ज़िक्र करके कहती की वह बहुत अच्छी थी...। मैं घर जाता और उस कहानी को फाड़ देता। जिन कहानियों का ज़िक्र सिमोन ने कभी नहीं किया वह कहानिया अभी भी मेरी मेज़ की दराज़ में दुबकी पड़ी हैं। इसी बीच कहीं सिमोन ने मेरी कुछ कहानियों का एक संकलन छपवा दिया....। ’मौन में बात’ उसका उसने शीर्षक रखा.... हम बहुत समय तक इस बात पर हंसते रहे कि इस शीर्षक के साथ कौन इन कहानियों को पढ़ने की कोशिश करेगा। पर सिमोन का कहना था कि इससे बहतर उसे कुछ भी नहीं सूझा...। मुझे नहीं पता मैं इन कहानियों के छपने से खुश था या नाखुश...। इन कहानियों में कहानी जैसा कुछ भी नहीं था... ’मौन में बात’ सही शीर्षक था... सारी कहानियां अपनी चुप्पी लिए हुए थी...। अधिकतर कहानिया मेरे और मेरे बाप के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती-फिरती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो रजिस्टर्ड लेटर मैंने फ्रिज पर रखा था वह मैंने उठाकर सिमोन को दे दिया...। सिमोन ने उसे पढ़ा और मुझे गले लगा लिया, मानो मैं नहीं वह बरसों से इस लेटर का इंतज़ार कर रही हो।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी एक समय में बहुत सघनता से महसूस किये गए संबंध का स्वाद अचानक फीक़ा पड़ गया। सिमोन के संबंध में ऎसा ही हुआ। अचानक सब-कुछ फीक़ा सा लगने लगा। उस स्पेस में मुझे लगा मेरी ज़रुरत नहीं है। मैंने बहुत अभिनय की कोशिश की कि उस सघनता को मैं वापिस महसूस करने लगूं पर ऎसा हुआ नहीं। मैं सिमोन के साथ रहते हुए अपने आपको बहुत असहज महसूस करने लगा। सिमोन मनोज के पास नहीं गई और मैं अभी भी विदेश जाने के बारे में सोच ही रहा था। अब जो संबंध अपनी पहले जैसी सघनता लिए हुए था वह था मेरे और मेरे बाप के बीच का संबंध...। मैंने जब अपने बाप को वह लेटर दिखाया तो वह खुश नहीं हुए... ना ही कोई दुख उनके माथे पर उभरा। उन्होंने पूरा लेटर बड़ी तल्लीनता के साथ पड़ा... उसे बड़े ऎतियात के साथ वापिस लिफाफे में रखा और मुझे स-सम्मान वापिस लौटा दिया। ना तो मैंने उनसे कोई प्रश्न किया, ना ही उन्होंने कोई भी प्रतिक्रिया दिखाई। कुछ देर में वह उठकर अपने कमरे में चले गए। शायद इतने सालों में पहली बार मुझे उनपर दया आई थी। वह इस बात से खुश थे कि चलों मैंने कुछ करने के लिए कोई कदम तो उठाया... पर वह मेरे तीन सालों के लिए चले जाने पर बहुत उदास थे...। इतने सालों के हमारे शीत युद्ध के कारण मैं अपने बाप को इतना तो जान गया था कि वह कब धीरे से उठकर अपने कमरे में चले जाते हैं। &lt;br /&gt;कुछ देर में मैं किचिन में गया... वह बहुत ही बिखरा पड़ा था, सिंक बर्तनों से भरा पड़ा था... शायद काम वाली बाई आ नहीं रही होगी.. या मेरे बाप ही उनसे लड़ गया होगा। मैंने पूरा किचिन साफ किया... हम दोनों के लिए चाय बनाई... उनकी चाय में शुगर फ्री डाली और उनके कमरे के दरवाज़े पर, दोनों कप लिए खड़ा हो गया। वह अपनी आराम कुर्सी पर बैठे हुए किसी किताब के पन्ने पलट रह थे। मैंने दरवाज़ा खट-खटाया... उन्होंने तुरंत किताब कोने में रख दी... मैंने (कई सालों बाद..) अपने बाप के कमरे में प्रवेश किया....&lt;br /&gt;’अरे मुझे लगा तुम चले गए हो। चलो बाहर ही बैठते हैं...’ &lt;br /&gt;तब तक मैं चाय की ट्रे खिड़की के पास रख चुका था...। वह खड़े हुए और वापिस बैठ गए। हम दोनों अपनी-अपनी चाय पर थे। कुछ देर में उन्होंने वह किताब उठाकर मुझे दी जो वह पढ़ रहे थे। ’मौन में बात’ मैंने शीर्षक पढ़ा... सिमोन ने उन्हें यह किताब दी होगी...। किताब के बीच में कहीं बुकमार्क झांक रहा था...। पहली बार मैंने खुद को अपने बाप के सामने नग्न पाया। मैंने किताब किनारे रख दी। हम दोनों खिड़की से बाहर एक बच्ची को देख रहे थे जिसके पैरों में एक बड़ा सा कागज़ चिपक गया था... वह उसे निकालती तो दूसरे पांव पर चिपक जाता... फिर उसने हाथ से भी निकालने की कोशिश की, वह कागज़ पैर से निकलकर उस बच्ची के हाथ में चिपक गया...। उसे देखते हुए पहले मेरे और मेरे बाप के चहरे पर एक मुस्कुराहट सी आई पर बाद में वह मुस्कुराहट झुंझलाहट में बदल गई। वह कागज़ उस लड़की के शरीर से निकल ही नहीं रहा था.. तो गुस्से में आकर उस लड़की ने उस कागज़ को फाडना शुरु किया... कुछ टुकड़े छूट गए पर कुछ दूसरी जगह चिपक गए... वह उन्हें छुड़ाते-छुड़ाते ख़ीज चुकी थी फिर वह खीज रोने में तबदील हो गई। जब उसने रोना शुरु किया तो वह हार चुकी थी... वह रोते हुए अपने घर की ओर चली गई।&lt;br /&gt;’यह बहुत अच्छा चांस तुम्हें मिला... अच्छा होगा कि तुम विदेश चले जाओ।’&lt;br /&gt;मैं चुप-चाप अपने बाप को देखता रहा जो दूर उस बच्ची के चले जाने के बाद की खाली जगह में कुछ ढूंढ रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे घर में पंखा अपनी रफतार पर था। मैं निढ़ाल सा अपने बिस्तर पर पसरा पड़ा था। मेरी छाती पर वह लेटर था जिसमें मेरा भविष्य छिपा हुआ था। मैंने करवट बदली तो मेरी निग़ाह उस रोते हुए चहरे पर पड़ी जिसे मिटाना मैं फिर भूल चुका था। मैं जल्दी से उठा, एक कपड़े में हल्का सा साबुन लगाकर लाया और उस चहरे को ऊपर घिसने लगा। कुछ ही देर में वह चहरा गायब हो चुका था। पर वहाँ मेरी झल्लाहट का एक निशान रह गया था.. जो बहुत ही भद्दा लग रहा था। &lt;br /&gt;जब शुरु-शुरु में मैं सिमोन से मिला था तो प्रेम में पड़ चुका था। पैंतिस साल उस वक़्त उन्होंने अपनी उम्र बताई थी। उनका कहानी संग्रह पढ़ने के बाद मैंने उनसे मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी। जीवन को जिस सहजता से अकेले रहकर जीना उन्हें आता है वह शायद मैं कभी भी नहीं हासिल कर पाऊंगा...। मनोज उन दिनों उनके घर कुछ-कुछ दिनों के लिए आया करता था। वह मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था। क्योंकि उन दिनो सिमोन और मैं काफी समय एक साथ बिताया करते थे। किस कदर मैं उनको छू लेना चाहता था...। जब कभी किताब, चाय का प्याला, पेन देते-लेते वक़्त उनकी उंग्लियों छू जाया करती थीं तो मैं किसी दूसरी दुनिया में पहुच जाया करता था... जहाँ मैं अपनी सारी तकलीफ लिए सिमोन के सिरहाने बैठा हुआ होता और वह अपने जीवन के छोटे बड़े किस्से मुझे सुनाती... पीला और लाल रंग चारो तरफ बिखरा होता... हरे रंग के कुछ छीटे दीवारो-चादरों पर दिखाई देते... कहीं से पानी बहने की आवाज़ आती... हम दोनों ही ठंड में ठिठुर रहे होते पर शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं होता... हल्के पीले रंग वह ओढ़े होती और हल्का लाल रंग मेरे शरीर से बाहर कहीं पड़ा होता।&lt;br /&gt;मनोज के उनके जीवन से चले जाने के काफी समय के बाद तक मेरी इच्छा होती रही कि कभी मैं उन्हें अपने मन की बात बताऊंगा... पर हिम्मत नहीं होती। उन्होंने सही पहचाना था... लगभग मेरी किये हुए सारे कामों में उन्हें इंप्रेस कर देना ही मेरा लक्ष्य हुआ करता था। फिर अचानक क्या हुआ कि संबंध एक अलग ही दिशा में चला गया। मैं बस उस अवस्था में बहता रहा... मैं कभी उनके मौन का हिस्सा था और वह कभी-कभी मेरे मौन में टहल के निकल जाता करती थीं। लाल, पीला और हरा रंग धीरे-धीरे धुंधला पड़ चुका था... कुछ कत्थाई और नीले रंग का संबंध अब बचा हुआ था... जिसे मैं बचाए रखना चाहता था। &lt;br /&gt;कुछ देर में मैंने वह लेटर जिसमें मेरा भविष्य पड़ा हुआ था वह फाड़ दिया....। इसकी वजह सिमोन नहीं थी .. इसकी वजह मेरा बाप था... तीन साल, इस उम्र में उनसे तीन साल दूर रहने की मुझमे हिम्मत नहीं थी। कुछ देर में मैंने काग़ज़ और पेन उठाया और एक कहानी लिखने बैठ गया... शीर्षक दिया.... “सिमोन....”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-5599442641662505242?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/5599442641662505242/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=5599442641662505242&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/5599442641662505242'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/5599442641662505242'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='&quot;मौन में बात...&quot;'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-BrfgpOpTmJc/TdVCmHGxA4I/AAAAAAAAAtA/dk9dR_Kmess/s72-c/9_by_yaxahk.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-6880727964473559432</id><published>2011-04-08T18:23:00.001+05:30</published><updated>2011-04-08T18:35:20.799+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>निर्मल और मैं....</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-HEHm52Yjacc/TZ8G0_dwQMI/AAAAAAAAAs4/6c1Kw7bvM1w/s1600/nv.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 339px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-HEHm52Yjacc/TZ8G0_dwQMI/AAAAAAAAAs4/6c1Kw7bvM1w/s400/nv.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593196769676640450" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मैं पहले घर से निकलकर दूसरे घर में आया हूँ।&lt;br /&gt;पर दूसरे घर में जाता हूँ तो खुद को पहले घर के कमरों में बैठा पाता हूँ। पहला घर, जहाँ से मैं आया हूँ....पीछा नहीं छोड़ता है। आँखें जल्दी-जल्दी झपकाता हूँ, सिर को एक दो झटके देता हूँ तो दूसरे घर के रंग नज़र आने लगते हैं। कमरे में तीन खिड़कियाँ है... गहरे रंग के पर्दे हैं। सामने चाय पड़ी हुई है जिसे मैं पहले घर में बैठा हुआ पी रहा था। मैं तुरंत कप उठा लेता हूँ। अभी मैं वापिस दूसरे घर में आ चुका हूँ। चाय का स्वाद जाना पहचाना है। चाय शब्द के दिमाग़ में जाते ही शायद मेरी स्वादेन्द्री... अपने चाय के स्वाद के खजाने से कुछ स्वादों को बाहर निकाल लेती है। चाय का एक घूंट लेते ही मुझे किसी एक स्वाद को चुन लेना होता है। मैंने अपने जीवन में इतने किस्मों की चाय पी है कि मुझमें चाय पीने का अंतर खत्म हो गया है। शायद इस चाय का स्वाद अलग हो लेकिन मैं उस स्वाद को कभी पता ही नहीं कर पाऊंगा..। चाय के स्वाद को लेकर मेरी स्वादेन्द्री सिर्फ कुछ ही option मुझे देती है जिसमें से मुझे किसी एक को चुनना पड़ता है.... और मुझे पता लग जाता है कि मैं चाय पी रहा हूँ। ठीक-ठीक स्वाद मुझे कभी पता नहीं चलेगा। &lt;br /&gt;निर्मल मेरे सामने बैठें हैं। मैं इन्हें सालों से जानता हूँ। मेरी उम्र और इनकी उम्र में बहुत अंतर है। जब जीवन में बहुत सी उठापटक हो जाती है, और वह मेरे संभाले नहीं संभलती तो मैं इनके पास चला आता हूँ। इनके घर की बालकनी को मैं अपना confession box  कहता हूँ। अधिक्तर मैंनें अपनी सारी ग्लानी, पीड़ा इन्हें वही कह दी है। जब मैं अपनी पूरी बात कह देता हूँ... तो एक लंबे सन्नाटे के बाद निर्मल कहते हैं...’चलो चाय पीते हैं।’ और मैं ठीक महसूस करने लगता हूँ।&lt;br /&gt;आज वातावरण कुछ दूसरा है। हवा उल्टी बह रही है। आज निर्मल का फोन मुझे आया और बड़ी हिचकिचाई-भर्राई आवाज़ में उन्होने कहा... अगर व्यस्त नहीं हो तो आ जाओ। और मैं आ गया। &lt;br /&gt;मैं- जी कहें..?&lt;br /&gt;निर्मल- क्यों चाय ठीक नहीं है क्या?&lt;br /&gt;मैं- अरे! अच्छी है। मैं पूछ रहा था... सब ठीक तो है ना?&lt;br /&gt;निर्मल- हाँ।&lt;br /&gt;मैं- फोन पर आपकी आवाज़ कुछ ठीक नहीं लग रही थी।&lt;br /&gt;निर्मल- हाँ... मैं सोच रहा था कुछ बदल दूं।&lt;br /&gt;मैं- क्या बदलना चाहते हैं?&lt;br /&gt;निर्मल- बदलने की शुरुआत करना चाह रहा था। बहुत समय से सब कुछ वैसा का वैसा ही लग रहा था।&lt;br /&gt;मैं- तो?&lt;br /&gt;निर्मल- तो क्या?&lt;br /&gt;मैं- तो कुछ बदला?&lt;br /&gt;निर्मल- हाँ शुरुआत घर से की...।&lt;br /&gt;मैं- घर से..?&lt;br /&gt;निर्मल- हाँ... तुम्हें कुछ बदला हुआ नहीं लग रहा है?&lt;br /&gt;मैं- मुझे बहुत बदलाव नज़र तो नहीं आ रहा।&lt;br /&gt;निर्मल- तुम बहुत दिनों बाद आए हो इसीलिए... देखों तुम पहले इस तरफ बैठते थे... वह दीवान यहाँ रखा हुआ था। कुर्सीयाँ सारी मैंने भीतर के कमरे में रख दी हैं। &lt;br /&gt;मैं- हाँ यह कमरा काफी खाली लग रहा है। पर कुर्सीयाँ तो ठीक थीं...।&lt;br /&gt;निर्मल- बहुत सी खाली कुर्सीयाँ दिन भर आँखों के सामने पड़े-पड़े खालीपन को बढ़ा देती हैं। ख़ाली कुर्सीयाँ नहीं होगी तो कोई आएगा की प्रतिक्षा भी मर जाएगी।&lt;br /&gt;मैं- आप किसी का इंतज़ार कर रहे थे क्या?&lt;br /&gt;निर्मल- हम सब किसी ना किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं... हमेशा। &lt;br /&gt;मैं- इस बदलाव के बाद कैसा लग रहा है?&lt;br /&gt;निर्मल- बाहरी बदलाव बहुत ज़रुरी है। बाहरी चीज़ों की परछाईयाँ ही भीतर के अंधेरे में काम करती है। &lt;br /&gt;मैं- उस हिसाब से तो यह बहुत छोटा बदलाव है।&lt;br /&gt;निर्मल- शुरुआत कहीं से करना था। &lt;br /&gt;मैं- तो अभी कैसा लग रहा है।&lt;br /&gt;निर्मल- तुम्हारे आने के पहले तक ठीक लग रहा था।&lt;br /&gt;मैं- अरे!.. मैंने क्या किया?&lt;br /&gt;निर्मल- सोचा था इस बदलाव का तुम्हारे ऊपर भी कुछ असर होगा.. पर तुम्हारे सारे सवाल वहीं है... भले ही दीवान यहाँ होता.. या वहाँ.. चाहे कुर्सीयाँ यहाँ होती या भीतर... तुमपर कुछ असर नहीं होता।&lt;br /&gt;मैं- आप तो नाराज़ हो गए!!!&lt;br /&gt;निर्मल- नाराज़ नहीं... अगर कुर्सीयाँ यहाँ होती तो मैं नाराज़ होता.. पर कुर्सीयाँ भीतर है... इस बात की मुझे खुशी है...। अब भीतर जाना भी अच्छा लगता है.. और यहाँ बैठना भी। तुमने चाय ख़त्म कर ली।&lt;br /&gt;मैं- जी।&lt;br /&gt;निर्मल- चलो मेरे भीतर जाने का समय हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैं वहाँ से चला आया। फिर पहले घर की तरफ... जो मेरा अपना है... जिसे में दूसरे घरों में अपने साथ लिये घूमता हूँ। पहले घर की तरफ चलते-चलते ’बदलाव’ शब्द बुरी तरह भीतर हरकत कर रहा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-6880727964473559432?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/6880727964473559432/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=6880727964473559432&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/6880727964473559432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/6880727964473559432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='निर्मल और मैं....'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-HEHm52Yjacc/TZ8G0_dwQMI/AAAAAAAAAs4/6c1Kw7bvM1w/s72-c/nv.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-566628223572120615</id><published>2011-02-23T22:06:00.001+05:30</published><updated>2011-02-23T22:34:21.520+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने से...'/><title type='text'>ख़त जैसा कुछ...</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;किससे कहूं अपने डरों और अंधेरे कोनों की बातें.. इसलिए तुम्हारे पास वापिस आया हूँ, बहुत दिनों के बाद। डरों और अंधेरे कोनों में ‘मुझे कुछ भी नहीं आता’ जैसी बातें छिपि है... कुछ समर्पण हैं... और बहुत से confessions....। इन सारी चीज़ों की एक टीस है जो हर कुछ समय में भीतर उठती रहती है।&lt;br /&gt;अपनी बहुत सी बचकानी इच्छाओं को जबसे थोड़ा गंभीरता से देखना शुरु किया है तो लगता है, ग़लती कर दी... यह वह जगह नहीं है, या यह वह समय नहीं है... यहां इन बातों की किसी को ज़रुरत नहीं है, यह एक तरह से रेगिस्तान में नांव खींचने जैसी बात है। फिर कुछ ही पलों में खुद को खपा देने का.. या... खो जाने का भय नहीं.... मन करता है। दिन में बहुत देर तक अपनी बालकनी से आकाश ताकता रहता हूँ... वहीं कहीं कुछ छुपा है यह रात में लेटे-लेटे सोचता हूँ। सपने, डर नहीं रहस्य लिए हुए आते हैं... सुबह उठकर कभी उस रहस्य में कुछ खोज लेता हूँ या कभी कुछ खो देता हूँ। सुबह चाय बनाना सपने के रहस्य का ही हिस्सा लगता है... लगभग पूरी सुबह रात का स्पर्ष लिए हुए होती है। दिन का रंगीन जाल बहुत देर बाद अपना असर दिखाना शुरु करता है। किताबें देर रात की करवटों की तरह दिन में काम करती हैं। एक किताब पर बहुत देर तक रहा नहीं जाता। फिर बहुत करवटों के बाद किस किताब के किस पन्ने पर बहुत सुंदर नींद आ जाती है पता नहीं चलता। थका हूँ.... घिसट-घिसटकर कहीं पहुंच जाऊं कि वह दिखें... और मैं अपना सारा लिखा बहा सकूं.... और मुक्त हो जाऊं.... चुप-शांति की अग्नि के बगल में स्नान कर सकूं देर तक...। सिर घुटा लूं... कि तिलांजली देकर अपने सरल-सहज पद्चिन्हों को फिर से ढूंढ़ सकूं.... उन पर चल सकूं..। अपनी बचकानी इच्छाओं को गंभीरता से ना देखूं... उनसे उन्हीं की भाषा में खेल सकूं.....।&lt;br /&gt;अ&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-566628223572120615?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/566628223572120615/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=566628223572120615&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/566628223572120615'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/566628223572120615'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aranyamanav.blogspot.com/2011/02/blog-post_23.html' title='ख़त जैसा कुछ...'/><author><name>मानव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11993743283195892659</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/SY3WQAwYcdI/AAAAAAAAAeI/orTedhoFDOo/s1600-R/ok2.JPG'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3695385750362885175.post-1702314840236644914</id><published>2011-02-06T15:40:00.000+05:30</published><updated>2011-02-06T15:49:32.542+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी कहानियाँ...'/><title type='text'>शब्द और उनके चित्र....</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/TU51amvgXsI/AAAAAAAAAsY/Nz7vndv4mUg/s1600/19.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_UMgzNErAxp8/TU51amvgXsI/AAAAAAAAAsY/Nz7vndv4mUg/s400/19.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5570518889040731842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;मैं तुम्हारा नाम लिखना चाहता था पर मैंने लिखा ’आशा’... फिर तुम्हें ढ़ूढना शुरु किया...। तुम्हारा चित्र ’आशा’ के भीतर ही कहीं था। ’आशा’ मैंने धीरे से कहा..कहा नहीं, अपना लिखा हुआ पढ़ा....’आशा’&lt;br /&gt;दूर कथई रंग के कपड़ो में मुझे तुम आती हुई दिखाई दी...। पास आते-आते उस कथई कपड़े में सूरजमुखी के बड़े-बड़े फूल उग आए थे... कुछ मुर्झाए कुछ खिले हुए। पूरा लेंडस्केप भी पीलापन लिए था। तुम्हारा आना किसी चीज़ का उड़ जाना सा लग रहा था... तुम चल नहीं रही थी.. तुम भाग रही थी। वह उड़ना चाहती है पर ज़मीन में कहीं फंसी हुई है। मैंने फिर एक शब्द कहा..”तितली” और तुम मेरे करीब आ गई।&lt;br /&gt;’कहा गई थी?’ मैंने पूछा&lt;br /&gt;’पानी खोजने।’ तुमने पसीना पोंछते हुए जवाब दिया...&lt;br /&gt;’पानी?’&lt;br /&gt;’हाँ... पानी।’&lt;br /&gt;’तो कहाँ है पानी?’&lt;br /&gt;’मैंने पी लिया।’ तुमने सहजता से कहा और आगे बढ़ गई।&lt;br /&gt;मैं नहीं जानता कि उसे पता है कि नहीं... कि मैं उसका इंतज़ार कर रहा था? मैं पीछे हो लिया। कुछ देर चलने के बाद मैंने फिर एक शब्द कहा..’निर्मल’ और वह रुक गई। मैं भी प्यासा हूँ यह कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। सो मैंने पूछा...&lt;br /&gt;’कहाँ जा रही हो?’&lt;br /&gt;’सामने पहाड़ों की तरफ...’&lt;br /&gt;और मुझे रेगिस्तान का छोर दिखने लगा। रेगिस्तान के छोर से पहाड़ों का विस्तार फैला हुआ था। &lt;br /&gt;’तो पानी ढूढ़ने तुम इस तरफ क्यों नहीं चली आई?’&lt;br /&gt;’यह दिशा अलग है।’&lt;br /&gt;’हाँ पर जब तुम्हें यहाँ आना ही था तो इस तरफ ही चलतीं....।’&lt;br /&gt;’यह दिशा अलग है।’&lt;br /&gt;मैंने दिशा कभी भी नहीं बदली थी। मेरे लिए बस एक दिशा थी जिसमें चलना था... उसी चाल में जो भी आता गया मैं बटोरता रहा। प्यास और पानी की अलग-अलग दिशाएं कैसे हो सकती हैं? क्यों हो? मेरी कभी समझ में नहीं आया। प्यास की दिशा का रेगिस्तान से क्या संबंध है?&lt;br /&gt;तुम चुप मेरे सामने खड़ी थी। तुम शायद पढ़ रही थी मेरा द्वंद...। मैं प्यासा था... मेरा कंठ सूख चुका था... मेरे सवाल नुकीले थे.. मैं चुप रहा। उसकी आँखों में किसी एक शब्द की अपेक्षा थी। प्रश्नवाचक चिन्ह लिए कोई भी शब्द का निकलना असंभव था सो मैंने एक शब्द कहा...’पहाड़’ और हम मुक्तेश्वर के आस-पास कहीं पहुंच गए। वह किसी की तलाश में पहाड़ के पहाड़ चढ़े जा रही थी। मैं पीछे रह गया था। जब मेरे हाफ़ने की आवाज़ पहाड़ों की शांति भंग करने लगी तो वह किसी देवदार के नीचे बैठ गई....। मैं रेंगता हुआ जैसे-तैसे उस तक पहुंचा और पसर गया। वह हंसी। नहीं, यह उसकी हंसी नहीं थी, यह पहाड़ों की हंसी थी... शायद यह देवदार हंस रहा था। मैंने पलटकर उसे देखा... उसके होठों से हंसी गायब थी... पर हंसी मैं अभी भी सुन सकता था। मेरे आश्चर्य पर उसने कहाँ ’पहाड़ो में आवाज़ गूंजती है... आपका कहा.. बार-बार पलटकर आपके पास आता है।’ मैंने देखा उसने क़ाजल लगाया हुआ है... क़ाजल के अंधेरे में हंसी के छोटे-छोटे टुकड़े खेल रहे थे। मैंने फिर एक शब्द कहा....’चंचल’...&lt;br /&gt;तभी उसे कुछ याद आया...। उसने बताया कि यहीं इन्हीं पहाड़ों के आस-पास उसका स्कूल था। स्कूल में एक बार वृक्षा-रोपण का कार्यक्रम हुआ। सभी बच्चों को पेड़ लगाने थे... जब तक उसका मौंका आया सारे पेड़ खत्म हो चुके थे। बहुत देर ख़ोजने के बाद उसे कोने में पड़ा एक देवदार का छोटा पौधा दिखा। वह देवदार को लिए जगह तलाशती रही... जगह कहीं नहीं बची थी। स्कूल के प्रांगण की सारी जगह छोटे-छोटे पेड़ों ने ले ली थी। टीचर ने उसे बताया कि देवदार बहुत धीरे उगता है... पंद्रह-बीस सालों में वह तुम्हारे जितना बड़ा होगा। उसने कहा कि उसे यही बात देवदार की बहुत सुंदर लगती है कि वह अपना पूरा समय लेता है। जब जहग नहीं मिली तो वह देवदार को लिए अपने घर की ओर चल दी। बीच जंगल में पहाड़ों के एक छोर पर उसे एक जगह दिखी... अगल-बगल कोई पेड़ नहीं था। उसने वह देवदार वहाँ लगा दिया। &lt;br /&gt;वह शायद अपना देवदार खोजने आई थी।&lt;br /&gt;उसने कहा...&lt;br /&gt;’मुझे देवदार पिता जैसे लगते हैं... उनके पास बैठकर मैं वापिस बच्ची हो जाती हूँ। कोई भी शिक़ायत मन में नहीं रहती।’&lt;br /&gt;’हाँ तुमने यह बात मुझे बताई थी।’&lt;br /&gt;’कब?’&lt;br /&gt;’जब हम तुम्हारी नीली खिड़की पर बैठे चाय पी रहे थे। उस खिड़की में पीले रंग के पर्दे बार-बार बाहर की तरफ उड़ जाया करते थे।’&lt;br /&gt;’मुझे बिलकुल याद नहीं है।’&lt;br /&gt;वह सच कह रही है.. उसे बिलकुल याद नहीं है। क्योंकि ऎसा हुआ ही नहीं था....हमने कभी उस नीली खिड़की और पीले पर्दों के बीच चाय नहीं पी थी। नीली खिड़की और पीले पर्दों के बीच मैं हमेशा से उसके साथ बैठना चाहता था... लंबे समय तक... निढ़ाल सा। मेरा देवदार नीला था... पीले पत्ते लिए.. जिसके नीचे बैठकर मैं वापिस बच्चा हो सकता था.. बिना किसी भी शिक़ायत के...।  &lt;br /&gt;हम दोनॊं अब कुछ भी खोज नहीं रहे थे। जिस देवदार के नीचे हम बैठे थे, उसे उसने उसका और मैंने अपना देवदार मान लिया था। वह वहाँ बैठे हुए सारा कुछ बीता हुआ चुग रही थी। हाँ वह चुग रही थी...  हर कुछ समय में वह अपनी चोंच से मेरी पीठ पर वार कर रही थी। मैं उन कच्चे रंगों के बारे में सोच रहा था जिन्हें बटोरना अब मेरा शौक़ था। बने-बनाए पके हुए रंग मुजे बोर करते थे। मैं उससे सटा हुआ बैठा था फिर भी हमारे बीच कुछ जगह खाली थी। उसके चोंच के वार और अपने कच्चे रंगों के बारे में सोचते हुए, उस खाली जगह में मैंने पहली बार ईश्वर को महसूस किया।&lt;br /&gt;’तुम्हारी पीठ में एक छेद है।’&lt;br /&gt;अपनी चोंच से एक ओर वार करते हुए उसने कहा...। ’घोंसले बनाने का संसकार मेरे खून में है।’ मैंने उससे नहीं कहा...। वह अपने अगले वार ले लिए तैयार थी तभी मैंने एक शब्द कहा ’ईश्वर’.....&lt;br /&gt;और हम एक यात्रा पर निकल लिए। &lt;br /&gt;बहुत सारी भीड़ के जनरल कम्पार्टमेंट में हम ट्रेन के दरवाज़े  पर खड़े थे। जब भी लोग बाथरुम जाते पिशाब की बदबू का एक भपका वहाँ से पूरी गाड़ी में भर जाता। वह अपना मुँह सिकोड़ लेती, नाक पर रुमाल रख लेती। वह धीरे से मेरे करीब आ गई... कमर से उसने मेरे स्वेटर को पकड़ा हुआ था। मैं बाहर भागते हुए दृश्य को देख लेता। वह शायद खड़े-खड़े थक चुकी थी... &lt;br /&gt;’कितनी दूर है अब?’&lt;br /&gt;’अभी समय है।’&lt;br /&gt;अभी बहुत समय था.... कुछ लोगों ने उसे बैठने की जगह दी पर उसने मना कर दिया। एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी...। हम लगभग हर स्टेशन पर उतर जाते थे। वह स्टेशन पर उतरते ही किसी बेंच पर बैठ जाती। थकान उसके पूरे शरीर से बह रही थी। ट्रेन अपने समय से कुछ ज़्यादा देर तक यहाँ खड़ी रही। &lt;br /&gt;’कौन सा स्टेशन है।’&lt;br /&gt;उसने कुछ विस्मय से पूछा।&lt;br /&gt;’बुधनी लिखा है। तुम कभी यहाँ आई हो?’&lt;br /&gt;’ना, मैंने तो पहली बार यह नाम सुना है।.. तुम...’&lt;br /&gt;’मैने नाम सुना है...। यहाँ जंगल है... शायद सतपुड़ा के जंगल.. जिसपर भवानी भाई ने कविता भी लिखी है।’&lt;br /&gt;’भवानी भाई को तुम जानते हो?’&lt;br /&gt;’वह कवी हैं। मैंने उन्हें पढ़ा है। सो जानता ही हूँ।’&lt;br /&gt;’तुमने ’भाई’ तो उनके आगे ऎसे लगाया जैसे तुम सालों उनके साथ रहे हो...।’&lt;br /&gt;’तुम्हें बुधनी नाम कैसा लगा?’&lt;br /&gt;’कैसा लगेगा? अजीब है।’&lt;br /&gt;’तुम्हें इस नाम में रहस्य नहीं लगता?’&lt;br /&gt;’शायद जंगल के पास है इसीलिए।’&lt;br /&gt;’तुम्हें लगता है कि तुम यहाँ कभी आओगी?’&lt;br /&gt;’पता नहीं, ऎसी बहुत सी जगह है जहाँ शायद मैं कभी भी जा नहीं पाऊंगी...।’&lt;br /&gt;’कुछ देर में ट्रेन चल देगी.. हम बुधनी को बहुत पीछे छोड़ देगें... शायद मैं सोचूगां कि उस रहस्य में कूदा जा सकता था.. हम उस रहस्य में एक साथ कूद सकते थे?’&lt;br /&gt;तभी उसने एक शब्द कहा... ’काश...’&lt;br /&gt;और हम दोनों, बुधनी के... तेंदुपत्ते के जंगल में पैदल भटक लगे। दूर ऊपर पहाड़ पर एक मंदिर दिख रहा था। हम दोनों उस ओर चलने लगे।&lt;br /&gt;’तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला?’&lt;br /&gt;उसने पूछा।&lt;br /&gt;’किस बारे में..?’&lt;br /&gt;मैं चलते-चलते सचेत हो गया।&lt;br /&gt;’नीली खिड़की और पीले पर्दों के बारे में...?’&lt;br /&gt;’अच्छा वो... नीली खिड़की और पीले पर्दे ’काश...’ शब्द के चित्र हैं।’&lt;br /&gt;’उनके बीच मैं भी ’काश...’ थी?’&lt;br /&gt;’नहीं... तुम उनके बीच नहीं थीं।’&lt;br /&gt;’तब मैं कहाँ थी?’&lt;br /&gt;’तुम भीतर कमरे में थीं... और मैं भी वहाँ नहीं था... मैं नीचे सड़क पर खड़े हुए... तीसरे माले की तुम्हारी खिड़की को देख रहा था। जो नीले रंग की थी और उसमें पीले पर्दे उड़ रहे थे.. बाहर की ओर...।’&lt;br /&gt;’यह कब की बात है?’&lt;br /&gt;’यह भविष्य है.. जिसकी मैंने कल्पना की थी।’&lt;br /&gt;’उसमें क्या होता है?’&lt;br /&gt;’वह हमारी आखिरी मुलाकात की कल्पना है.... रुको मैं एक कहानी की तरह सुनाता हूँ.. शुरु से....’&lt;br /&gt;हम दोनों चलते-चलते पहाड़ पर पहुँच चुके थे...। एक छोटा सा मंदिर था जिसे हमने नीचे से देखा था। मंदिर में कोई भी नहीं था...। एक छोटी सी शिव की मूर्ती रखी हुई थी। उसने चुनरी अपने सिर पर ओढ़ी और प्रणाम किया... मैं मंदिर की दीवार से टिक्कर बैठ गया...। कुछ देर में वह भी मेरे बग़ल में आकर बैठ गई। &lt;br /&gt;’हाँ सुनाओ...?’&lt;br /&gt;और तब मैंने एक शब्द कहा... ’पीड़ा’.... और वह पीड़ा सुनने लगी..... मैंने किस्सा शुरु से शुरु किया, मानों मैं किस्सा पढ़ रहा हूँ-कह नहीं रहा.....&lt;br /&gt;बहुत भीड़ भरे बाज़ार से जब भी वह गुज़रता था तो शांत हो जाता था। ऎसे क्षणों में वह हमेशा प्रेम के बारे में सोचा करता था। संबंधों के बारे में... लड़कियों से। ख़ासकर उन लड़कियों के बारे में सोचता था जिन लड़कियों से ’संबंध बचाया जा सकता था’ का दर्द भी अब मिट चुका है। अब सिर्फ धुंधले चहरे बचे है, और बची है झुरझुरी उनके साथ बिताए कुछ खूबसूरत पलों की। इन संबंधों के बारे में सोचकर वह हमेशा मुस्कुरा दिया करता था.. ठीक मुस्कुराहट के बाद एक टीस उठती थी.. पुराने संबंधों में अब सब कुछ इतना धुंधला पड़ चुका था कि वहाँ पर टीस अपने मानी खो चुकी थी...पर यह टीस उन संबंधों की थी जो अभी पूरी तरह बुझे नहीं थे। वह रुक जाता और उसकी चाय पीने की इच्छा करती।&lt;br /&gt;चाय के साथ उसका अजीब संबंध था। जब वह पैदा हुआ था तो  बहुत गोरा था। घर में सबको लगा कि यह बहुत विशेष चीज़ हमारे घर आई है। सो उस विशेष चीज़, याने उसका बहुत ख़्याल रखा जाता। चाय पीने की आदत उसे बचपन से ही थी... उसकी वजह थी चाय का ना मिलना। उसका बाप चाय का शौक़ीन आदमी था। कई दिनों रोने गिड़्गिडाने के बाद बाप ने उसके लिए हर रोज़ चार बजे एक कप चाय मुक्कर्र कर दी। सुबह उठते ही वह चार बजे का इंतज़ार करना शुरु कर देता। ठीक चार बजे उसे चाय मिलती। चाय की आखिरी चुस्की लेते ही वह अगले दिन की चाय इंतज़ार शुरु कर देता। &lt;br /&gt;वह चाय की टपरी में जाकर बैठ गया। &lt;br /&gt;’एक कट चाय देना।’&lt;br /&gt;उसे यह पूरा रिचुअल बहुत पसंद था, चाय की फर्माइश करने के बाद से चाय का उसके सामने आ जाने तक का। यह प्रक्रिया उसे चाय पीने से भी ज़्यादा पसंद थी।&lt;br /&gt;’किसी का आपको प्रेम करना...’ being loved कितनी सुंदर अवस्था होती है। चाहे वह कुछ क्षणों के लिये ही क्यों ना हो। वह ऎसे समय मूर्छित सा पड़ा रहता... अपनी पीड़ाओं के बारे में सोचता हुआ सा। उन क्षणों में वह गिड़गिड़ाना चाहता कि मैं कभी भी विशेष नहीं था। &lt;br /&gt;भीड़ एक अजीब सा चित्र ख़ीचती है जिसमें वह खुद को इस तरह से सहज महसूस करता था मानों वीराने में टहल रहा हो। तभी उसे उसका ख़्याल हो आया जिसके साथ उसने बहुत से वीराने जीये थे। यह वह लड़की थी जिसके साथ ’संबंध बचाया जा सकता है’ की गरमाहट अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई थी।&lt;br /&gt;वह चाय की दुकान से घर की ओर चलने लगा। कुछ ही दूरी पर उसने अपना घर का रास्ता छोड़ दिया और दाए मुड गया। दाए मुड़ जाना उसे बहुत देर से भीतर छील रहा था...। चाय की दुकान में भी दाए मुड़ जाने के ख्याल- उबाल मार रहे थे। दाए क्या है? दाए कुछ बचा नहीं है, बस हल्की गरमाहट थी ओर कुछ भी नहीं... घाव भी अब भर चुके हैं... पर उस सूखे से खुरदुरे में हल्की खुजली हमेशा बनी रहती है। बहुत दिनों से उसने उस घाव को खुजलाया नहीं था... आज वह खुजलाने दांए मुड़ गया। &lt;br /&gt;कुछ दूर चलने पर उस लड़की का घर आ गया। वह तीसरी मंज़िल पर रहती थी। हरी खिड़की पर पीले पर्दे, बाहर सूखा गमला। वह घर को बहुत सुंदर रखती थी, फिर यह गमला कैसे सूख गया? वह बिल्डिंग के भीतर घुसा पर सीड़ियों पर रुक गया.... उसके पास उसके घर जाने का कोई कारण नहीं था। बहुत देर की खोज के बाद वह सीड़ी चढ़ने लगा। इससे पहले कि उसके विचार उसे वापिस जाने के लिए मजबूर कर दें उसने जल्दी-जल्दी सीड़ियां चढ़कर घंटी बजा दी। दरवाज़ा उसकी बाई ने खोला। बाई शायद खाना बना रही थी, उसके हाथ में कड़ची थी। &lt;br /&gt;’रुको मैं बेबी को पूछती हूँ?’&lt;br /&gt;पहले बाई उसका स्वागत कर देती थी पर अब उसे बाहर ही इंतज़ार करना होगा। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था और वह बाहर खड़ा था। उसने सोचा कि जूते उतार दूं पर उसे यक़ीन नहीं था कि वह क्या कहेगी। वह फिर कारणों को टटोलने लगा। बहुत देर तक ना तो बाई दिखी न वह बाहर आई। वह दरवाज़े से टिककर खड़ा हो गया जिससे दरवाज़ा थोड़ा ज़्यादा खुल गया... पर कहीं अटक गया... शायद दरवाज़े के पीछे बहुत से जूते-चप्पल रखे होगें। &lt;br /&gt;तभी वह बाहर आई। &lt;br /&gt;उसने बालों को पेंसिल से फसा रखा था, सफेद आदमीयों की बुशर्ट पहने हुए थी। नीचे पेजामा जैसा कुछ था लाल रंग का। शर्ट बहुत ही बेतरतीबी से जल्दबाज़ी में पहनी हुई लग रही थी। पैरों में अंगूठी नुमा बिछिये पहने हुए थे। एक पैर में दो और दूसरे पैर में एक, और वह एक पैर को दूसरे के ऊपर चढ़ाए हुए खड़ी थी। दाहिने हाथ को पीछे रखे हुए थी जिससे शायद वह अपने पीछे की दीवार पकड़े हुए थी।&lt;br /&gt;वह उसे चूमना चाहता था। उसे इस बेपरवाही-बेतरतीबी से प्रेम था। शायद दाए मुड़ जाने का बड़ा कारण यही था। &lt;br /&gt;’क्यों आए हो?’&lt;br /&gt;इसका कोई जवाब नहीं था उसके पास...। कारणों की फेहरिस्त इस बेपरवाही के सामने बचकानी थी। वह चुप ही रहा।&lt;br /&gt;’क्यों आए हो?’&lt;br /&gt;‘तुम्हारे साथ एक चाय पीने की इच्छा थी।’&lt;br /&gt;बेपरवाही के अभिनय में उसने जवाब दिया। &lt;br /&gt;’मेरी इच्छा नहीं है.....’&lt;br /&gt;कुछ खामोशी के बाद उसने आगे जोड़ा...&lt;br /&gt;’”तुम्हारे” साथ चाय पीने की...’&lt;br /&gt; वह दो टूक बात करके चुप हो गई। अब इसकी बारी थी जो बारी से हमेशा बचता रहा था। ऎसा नहीं था कि ’बारी’ से बचना उसने बड़े होने पर सीख़ा था। ज़िम्मेदारीयों से बचना वह बचपन से जानता था। लुका-छिपी के खेल में वह कभी अकेले जगह ढ़ूढ़कर नहीं छुपता था वह किसी अच्छे छुपने वाले के पीछे छुप जाता था जिससे कभी वह अच्छा छुपने वाला लड़का पकड़ा भी जाए तो पहले वह पकड़ाए। दाम उसपर न आए। वह बच जाए। उसे बचना पता था। वह अभी तक बचता आया था। बचपन के खेल महज़ खेल नहीं होते हैं... आपकी बचपन के खेलों में भागीदारी, जीवन में आपकी भागीदारी तय करती है। &lt;br /&gt;’अगर कुछ कहने को नहीं है तो तुम जा सकते हो।’&lt;br /&gt;आखिर लड़की ने ही शांति भंग की।&lt;br /&gt;’मैं कुछ कहने ही आया था...’&lt;br /&gt;पर वह कुछ भी कहने नहीं आया था।&lt;br /&gt;‘तो बोलो?’&lt;br /&gt;कुछ शांति के बाद उसे पता नहीं क्या हुआ और उसके मुँह से निकल गया।&lt;br /&gt;’मैं जो हूँ उसकी भूमिका बचपन में हैं.... जो मैंने नहीं लिखी..। वह जैसी मुझे मिली मैंने उसे उसकी पूरी इंमानदारी से जीता गया।’&lt;br /&gt;एक बोझ की तरह उसने इस वाक्य को अपने भीतर से जाने दिया। पर यह किसी अपने की मृत्यु की बात नहीं थी... जिसे कह देने से आप हल्का महसूस करें...। शायद यह वासना थी जो वह उस लड़की के प्रति अभी महसूस कर रहा था जिसकी वजह से वह यह कह पाया।&lt;br /&gt;’बहुत देर हो चुकी है तुम्हें यह सब कहने की अब कोई ज़रुरत नहीं है...।’ &lt;br /&gt;उसके पास और कुछ भी कहने को नहीं था। उसने कुछ देर बातचीत के सिरे को हवा में पकड़ने की कोशिश की... पर वह इतनी ठंड़ी-सीधी बातों पर थी कि वह एक सिरे से दूसरे सिरे को मिलाने में छिछलापन महसूस करने लगा। उस लड़की का कुछ बोलने का इरादा नहीं दिख रहा था। यह आखिरी वाक्य कह चुका था, जिस वाक्य के कारण वह खुद आश्चर्य में था, इसके बाद कुछ भी कहने की गुंजाईश नहीं थी। वह पलट गया और सीड़ियाँ उतरने लगा... दूसरे मंज़िल की सीड़ियों पर पहुचते ही उसे दरवाज़ा बंद करने की आवाज़ आई। ठीक इस वक़्त से उसे वह पीड़ा भीतर महसूस होने लगी जिसके लिए वह तीन मंज़िल सीड़ी चढ़ा था। किसी के हमेशा के लिए छूट जाने की पीड़ा… अब संबंध को ना बचाए जा सकने की पीड़ा… बहुत तेज़ी से भीतर रिस रही थी। &lt;br /&gt;वह तेज़ कदमों से चलता हुआ उस बिल्डिंग के बाहर निकला… गली के कोने पर, मुड़ने से ठीक पहले उसने पलटकर देखा... वह अपनी खिड़की पर नहीं खड़ी थी। हरी खिड़की से पीला पर्दा बाहर की ओर उड़ रहा था… नीचे सूखा हुआ गमला उसे बहुत सुंदर जान पड़ा और वह मुड़ गया।&lt;br /&gt;ज़िदा हूँ -के प्रमाण की तरह वह पीड़ा थी... यह नशा था... नशे की पुनर्रावृत्ति जीवित हूँ के रहस्यों का ताना-बाना बुनती है। जिसमें कुछ भी ठोस टिकता नहीं है। उस ताने-बाने में अकेलेपन का एक जाल बिछा होता है... पीड़ा के छोटे-छोटे कीड़ों को अपने में फसाए हुए। अकेलेपन का जाल पिंजरे की तरह काम करता था, जिसमें पीड़ा के कीड़े पल रहे होते हैं। &lt;br /&gt;उसे मकड़ीयों से बहुत डर लगता था। अपने कमरे में घुसने के पहले उसकी सारी सतर्कता मड़की से बचने का भय होती। अगर मकड़ी दिख जाती तो चीख़ता हुआ अपनी बहन के पास जाता...। बहन झाड़ू से मकड़ी को मार देती। उसकी बहन उस मकड़ी की लाश उसे दिखाती तब जाकर वह अपने कमरे में प्रवेश करता। &lt;br /&gt;इस बार उसने मकड़ी के बारे में नहीं सोचा। उसने एक मार्कर पेन निकाला और सफेद फ्रिज के ऊपर लिख दिया....&lt;br /&gt;“मैं जो हूँ उसकी भूमिका बचपन में हैं.... जो मैंने नहीं लिखी..।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’बस... बस... ’&lt;br /&gt;उसने मुझे चुप करा दिया.... वह खड़ी हो गई...। मैं वहीं बैठा रहा, मंदिर के पास... वह बुधनी के तेंदुपत्ते के जंगलों में कुछ देर अकेली टहलने लगी। मैं उसे यहाँ से देख सकता था। कथई रंग, पेड़ों के बीच कभी छुपता कभी दिख जाता... सुरजमुखी के लगभग सारे फूल यहाँ से मुर्झाए हुए लग रहे थे। मैं उससे प्रेम करता था.. इतना कि उसे छोड़ना चाहता था। उससे दूर रहकर उससे प्रेम की आंच अपने भीतर महसूस करना चाहता था। अभी सब कुछ बाहर था.. वह बाहर थी, मेरा प्रेम सूरजमुखी के फूल की तरह कभी मुर्झाया तो कभी खिला हुआ उससे चिपका दिखता था। मैं इन सबको अपने भीतर कहीं, नाभी के पास, बो देना चाहता था।&lt;br /&gt;कुछ देर में वह वापिस आई... मेरे सामने खड़े होकर उसने एक शब्द कहा... ’वापसी...’&lt;br /&gt;वह अपनी बालकनी में खड़ी थी। शाम का समय बगुलों के वापिस आने का समय होता था। सामने के पेड़ पर बगुलों का घर था। यह समय, शाम होने के ठीक पहले का समय था जो नीरस समय था... उसे पता था सामने दिखने वाला पेड़ कुछ ही देर में सफेद बल्ब जैसे बगुलों से भर जाएगा। यह शायद उसका समय था। समय के इस हिस्से का वह उत्सव मनाती थी जिसमें किसी दूसरे की शिरकत की गुंजाईश नहीं थी। तभी दरवाज़े की घंटी बजी और मैं अपनी पूरी थकान के साथ उसके सामने खड़ा था। उसने मुझे अंदर आने को नहीं कहा, ना ही उसने दरवाज़ा बंद किया। वह मुझे देखते ही पलट गई मानों मुझे जानती ही ना हो, या इतना ज़्यादा जानती हो कि अब कुछ भी फर्क नहीं पड़ता।&lt;br /&gt;उसके और मेरे बीच एक पूरी व्यवस्था थी। हम दोनों ने संबंध के शुरुआती दौर में कुछ अलिखित नियम से बनाए थे। उन नियमों की वजह से, संबंध में रहते हुए भी, हमारी व्यक्तिगत जगह में हम अकेले थे। इस अकेलेपन की वजह के दो टापू उग आए थे... हम दोनों का ज़्यादतर समय अपने-अपने बनाए हुए टापूओं पर ही गुज़रता था। अब संबंध को सिर्फ दूर से ही देखा जा सकता था। &lt;br /&gt;वह बालकनी पर खड़ी थी, अपने टापू पर...। मैं पीछे, तैरता हुआ उसके टापू पर पहुंचना चाह रहा था जो हमारे बनाए नियमों के बिलकुल खिलाफ था। &lt;br /&gt;’तुम खाना खा लो भीतर रखा है तुम्हारे लिए।’ &lt;br /&gt;उसने बिना मेरी तरफ देखे यह बात कहीं...। मैं वापिस अपने टापू पर आ चुका था, मेरा सारा तैरना व्यर्थ गया। मैं फिर पानी में कूदा....&lt;br /&gt;’नहीं मुझे भूख नहीं है।“&lt;br /&gt;कहकर मैं भी बालकनी में उसके बगल में आकर खड़ा हो गया। नहीं यह उसका टापू नहीं था। मैं उससे बहुत दूर था। मुझे लगा मैं तैरते-तैरते उससे दूर ही जाता जा रहा हूँ। वह अपनी शांति में बगुले गिन रही थी। लगभग पेड़ बगुलों से भर चुका था। तभी मेरी निग़ाह नीचे सड़क पर पड़ी और मैंने खुद को सड़क पर खड़ा पाया...। मैं सड़क पर खड़े हुए उसकी तरफ बालकनी में देख रहा था। मैं तुरंत भीतर कमरे में आ गया।&lt;br /&gt;कुछ देर में वह भीतर आई... और उसने मेरे पास आकर एक शब्द कहा.... ’अंत...।’&lt;br /&gt;और मुझे इस कहानी की शुरुआत दिखाई देने लगी।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3695385750362885175-1702314840236644914?l=aranyamanav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aranyamanav.blogspot.com/feeds/1702314840236644914/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3695385750362885175&amp;postID=1702314840236644914&amp;isPopup=true' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1702314840236644914'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3695385750362885175/posts/default/1702314840236644914'/><link rel='alternate' type='text/html' 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