दोस्त विमल,
तुम्हारा कमेन्ट पढ़ा, चूकि पहले मैं भी कुछ ऎसा ही सोचता था सो वो बातें बहुत कुछ अपनी सी लगी, परंतु मेरे विचार इस संदर्भ में कुछ बदले हैं... जिन्हें बस मैं कह देना चाहता हूँ। यू हबीब साहब,रतन थियम जैसे लोगों की वजह से भारतीय रंगमंच को अलग तरह की भाषा मिली हैं ये सभी जानते हैं..।मैं काफ़ी व्यक्तिगत तौर पर बात करना चाहता हूँ। हबीब साहब के साथ मैं भी शोषण शब्द का प्रयोग कर चुका हूँ,पर अब मेरा मानना है कि जितना भी हबीब साहब ने अभी तक काम किया है, और जितना उसके बदले उन्हें मिला है वो इससे कहीं ज़्यादा पाने का हक़ रखते हैं।इस हिसाब से तो इस देश में उनके साथ भी शोषण ही हुआ है, तो शोषण बहुत बड़ा शब्द है। जैसे मेरा मानना है कि ’विनोद कुमार शुक्ल’ जैसे लेखक को इस देश को सिर आखों पे बिठाना चाहिए पर ऎसा नहीं है।निर्मल वर्मा को उनकी मृत्यू के पहले तक उनके सारे लेखन का राजकमल उन्हें 5000/ रु हर माह... मात्र देता था...तो अब इस सब में हम क्या कहें कि महत्वपूर्ण क्या है, निर्मल वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल का काम या वो शोषण जिसके असल में ज़िम्मेदार हम सब हैं। इन सब में जहाँ तक दीपक, या रामचंद्र जैसे अभिनेताओं का सवाल है वो बहुत ही वयक्तिगत प्रश्न है, राम अगर बाहर अभिनय नहीं कर पा रहा तो इसका कारण खुद राम है उसके ऊपर पारिवारिक ज़िम्मेदारीया कहीं ज़्यादा है उसके चार बच्चे हैं।जहाँ तक दीपक की बात है तो वो हबीब साहब को छोड़कर चला गया था फिर उसने अपना एक रंगमंच खोला और लगभग नया थियेटर का ही पुराना काम दोहराता रहा..नशे की लत की वजह से उसे पहला अटेक आया था फिर दूसरा...।इसके ज़िम्मेदार हबीब साहब नहीं हैं।हबीब साहब ने एक सोच का रंगमंच किया है उनकी बदोलत हमें बहुत ही उम्दा रंगमंच देखने को मिला है, ये सोच है, आविष्कार है... इसमें दीपक महत्वपूर्ण नहीं है, अभिनेता उस पूरे आविष्कार उस सोच का एक पुर्ज़ा मात्र है... आविष्कार नहीं...।दीपक के नहीं रहने पर भी वो सारे नाटक अभी भी चल रहे हैं।उस वक्त भी अगर दीपक नहीं होता तो कोई और होता.. पर अगर हबीब तनवीर या रतन थियाम नहीं होते तो हम एक अलग सोच, एक अलग तरह के रंग मंच से ही वंचित रह जाते।रतन थियाम के नाटक देखने के बाद हमें कितने अभिनेता याद रह जाते है? हमें अगर कुछ याद रह जाता है तो वो केनवास जिसपर रतन थियाम रंग भर रहे थे...और एक से बढ़कर एक दृश्य हमारे सामने आते जा रहे थे, और ये हम सबकी जानकारी की कमी हैं असल में हबीब साहब को पैसा शोहरत सब बहुत बाद में मिला है.. बहुत समय तक वो खुद पाई-पाई जमा करके रंगमंच किया है। और ये हमारे देश की हमारी त्रासदी है कि हमने हबीब साहब जैसे लोगों को उनका ढियू नहीं दिया है।
और जहाँ तक दूसरों का भविष्य बनाने का सवाल हैं वो एक बहुत छोटी बात है.... मेरा भविष्य कोई बनाएगा की आशा में अगर मैं जीना शुरु करु तो... माफ करना मैं मज़दूर हो जाना ज़्यादा पसंद करुगां।अ़च्छा रंगमंच करने वाले,अच्छे साहित्यकार यू भी समाज की परिधी पर जीते है तो इसे हम यूं नहीं आंक सकते कि मैंने फला कंपनी को इतने साल दिये पर उसने उसके बदले कुछ भी नहीं दिया।यूं मैं भी दुबेजी को काफी गरियाता रहता हूँ पर मैं ये कभी भी नहीं भूल सकता कि वो थे इसीलिए आज हम हैं... उनका भाषा का रंगमंच था... जो हमारे रंगमंच हैं।
उनके ऊपर लगे आरोप और सवाल उनके काम के सामने बहुत छोटे हैं..।
आशा है आप मेरी बात समझ रहे होगें...।
Sunday, June 22, 2008
Saturday, June 21, 2008
हबीब साहब...

जब हम उनके घर पहुचे तो वो सो रहे थे.. हम सब शांत उनके घर में चुपचाप अपनी-अपनी जगह खोजने लगे,मानो गुरु के घर में बहुत से छोटे बच्चे आ गये हो। राम और धन्नू (जो सालों से उनके साथ काम कर रहे हैं।) हमारे साथ थे। दोनों रास्ते भर उनके गुरु की डाँट, फटकार के किस्से सुनाते आ रहे थे।दिन में भारत भवन में हम रवि लाल सांगड़े(रवि काका) से भी मिले थे... वो दो महीनों से हबीब साहब से खफा है क्योंकि उन्होनें, उन्हें किसी बात पर फिर से डाँट दिया था। ये उन दोनों का अजीब संबंध है जो सालों से चल रहा है, रवि काका बता रहे थे मैं तब से उनकी डाँट खा रहा हूँ जब से मैं उनकी गाड़ी एक रुपये में धोता था।खैर हम उनका इंतज़ार कर रहे थे, वो भीतर के कमरे में लेटे हुए थे, हमें दीख रहे थे... अचानक उनकी आवाज़ आई... ’कौन आया है?’
हम सब सकपका गए... हमने अपना परिचय दिया.. वो कहने लगे-’मैं सो नहीं रहा हूँ, बस थोड़ी कमर सीधी कर रहा हूँ आता हूँ...।
हम सब चुपचाप बैठे रहे.. थोड़ी देर बाद अपने कुछ छोटे-छोटे रिचुअल्स को खत्म करके वो हमारे सामने बैठे थे। हम सब शांत थे..उन्होने तुरंत अपना पाईप जलाया और एक सुनहरी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा-’और दसो तुसी?’।
और हम सब मुस्कुराने लगे.. सारा असहज धेरा एक मुस्कान में धराशाही हो गया था।फिर हम इधर उधर की बातें करने लगे.. कुछ दीपक (उनके नया थियेटर का अभिनेता जो काफी पहले उनसे अलग हो गया था।) की चिंता की बात चली..(उसे पेरेलेसिस का दूसरा अटेक आ गया है।)पर अधिकतर वो अपनी आत्मकथा की ही बात करते रहे... जिसको लेकर वो बहुत उत्सुक हैं।पेग्विंन इसे दो खंडों में छाप रहा है।फिर उन्होने कहा कि-
’मैं उसका कुछ अंश तुम्हें सुनाता हूँ जो मैंने अभी-अभी पूरा किया है।’
हम सब खुश हो गये। वो उर्दु में लिखे कुछ पन्ने लाए और अपना चश्मा अंदर से मंगवाया हम सब उनके पास खिसक आए।
वो अंश ’मौत’ पे था (१९३० के करीब..)। उस अंश के मध्य में कहीं उन्होंने एक वाक्य पड़ा-’ अम्मी (उनकी माँ) नमाज़ पड़ते वक्त जब भी वज़ू के लिए अपना सिर झुकाती तो वो सफेद छोटा सा तखत उनके लिए बिलकुल पूरा पड़ता।’ अचानक वो इस वाक्य के बाद रुक गये, उन्होने सीधा धन्नू से पूछा अरे वो मेरी अम्मा का सफेद तखत कहां चला गया।’हम सब ज़ोर से हंस दिये लगा कि जो बचपन का किस्सा वो सुना रहे थे वो किस्सा अभी तक चल रहा है... वो अतीत नहीं है... वो वर्तमान है..। धन्नू जवाब दे उससे पहले ही वो हमसे मुख़ातिफ होकर कहने लगे कि असल में मैं वो तखत अपने साथ ही ले आया था। मेरे से भी पुराना है वो, फिर वो धन्नू की तरफ देखने लगे धन्नू ने बताया कि वो आपके बगल में ही रखा है अपने बस उसे रंगवा लिया है।उन्हें याद ही नहीं था कि उन्होने उसे रंग्वा दिया था। फिर उसे नपवाया गया- कहने लगे कि वो उसे पूरे नाप के साथ लिखना चाहते हैं।
फिर उन्होने मौत का ही दूसरा अंश सुनाया... वो एक सिपाही की मौत पे था जिसे इनके आंगन मे धुलाया गया था... उसकी तस्वीर, वो बताते हैं कि आज भी उनके ज़हन में काफ़ी साफ है।
हबीब साहब फिर कहने लगे कि बचपन जो गांव में जिया जाता है वो कितना rich होता है उसकी कितनी सारी अलग-अलग तस्वीरें होती हैं।फिर वो आज कल के बच्चों की चिंता करने लगे, इसी बीच मैंने मेरी एक दोस्त ने उन्हें मेरे नाटक ’पीले स्कूटर वाले आदमी’ की याद दिलाई, उनसे कहां कि इस बार के रंग प्रसंग में है प्लीज़ पढ़े.. तो मुझे आश्चर्य हुआ कि उन्होने वो नाटक देखा था। ’मुझे बहुत पसंद आया था।’ उन्होने कहा। फिर उन्होने रंग प्रसंग निकलवाई,उसे अपने बिस्तर के किनारे रखवा दिया और कहा कि मैं इसे पढ़्ना भी चाहता हूँ..।
जब वो अपनी आत्मकथा सुना रहे थे.. तो अचानक मैं राम के बारे में सोचने लगा.. वो भी उसे बड़े ध्यान से सुन रहा था...। क्या वो अपने बचपन के किस्से नहीं सुना सकता है? उसके क्या कोई किस्से ही नहीं होगें? फिर मुझे अचानक लगा कि हबीब साहब की आत्मकथा कैसी होनी चाहीए?... पता नहीं। जितना मैंने सुना-वो बस कुछ किस्से थे... पढ़ते वक्त वो उतने अच्छे नहीं लग रहे थे..पर. जब हबीब साहब खुद उन किस्सों के बारे में बात करते थे तो वो किस्से ज़्यादा मतलब और अनुभव फैंकते थे। शायद मैं ज़्यादा अपेक्षा कर रहा हूँ... पर ये मेरा मानना है कि लेखक अपनी आत्मकथा से कहीं ज़्यादा सच्चा अपनी बाक़ी कृतियों में होता है।
बाद में हबीब साहब अपने फिल्मों के आफर्स के बारे में बात करके फूले नहीं समा रहे थे।’मैं ही एक एक्टर होऊगाँ जो बुढ़ापे में लांच हो रहा है’ - इसे कहते हुए हबीब साहब खुद बहुत खुश हुए।
जब हम हबीब साहब के घर से निकले तो सभी चुप थे... राम और धन्नू हमारे साथ ही चले, रास्ते में चलते हुए मेरी एक दोस्त ने राम से पूछा कि-’तो अब क्या करोगे आगे कुछ सोचा है।’ राम चुप रहा फिर कहने लगा कि जाऊगाँ बम्बई जाकर स्ट्रगल करुगाँ... अगर कुछ नहीं हुआ तो गांव जाकर खेती करने लगूगाँ...। मुझे याद है मैंने राम को ’मुद्राराक्षस’ नाम के नाटक में देखा था... उसकी ’चाणक्य’ की भूमिका अभी तक मैं भूला नहीं हूँ। वो इतने सालों से लगातार रंगमंच कर रहा है... पंद्रह साल से हबीब साहब के साथ जुड़ा हुआ है.. वो सब कुछ छोड़कर खेती करेगा...। राम के चार बच्चे हैं... वो बम्बई में स्ट्रगल करेगा की बात पता नहीं मैं... कुछ कह नहीं पाया...। मैंने पूछा-’ और "नया थियेटर" उसका क्या होगा?’ तो धन्नु ने कहा कि हबीब साहब एक दिन खुद कह रहे थे कि-’क्या कहते हो.. बंद कर दे इसे..?’
मेरे पास इन सारे सवालों के बहुत ज़्यादा जवाब नहीं थे.. मैं चुपचाप राम को ही देखता रहा... वो थोड़ी देर बाद मुझे देखकर मुस्कुराया.. और मुझे अच्छा लगा...। मैं अभी भी उसे राम नहीं मानता हूँ,मेरे लिए वो एक अजीब सी परिस्थिति से धिरा हुआ राम नहीं है... मैं उसे वहीं चाणक्य के रुप में देखता हूँ... जिसे मैंने अपने थियेटर के शुरुआती दिनों में देखा था..।उस चाणक्य को इस परिस्थिति में मैं नहीं देख सकता हूँ...।
हबीब साहब की आत्मकथा जल्द ही बाज़ार में मिलने लगेगी.. हम सबको उसका इंतज़ार रहेगा।
Thursday, June 19, 2008
Tuesday, June 10, 2008
writing...

देर से वही... वैसी ही सांसे ले रहा था।एक पैर सांसों की गति से हिल रहा था।आँखें दीवार पर टिकी थी। बचे रह गए चरित्रों में कहानियाँ ढूंढ रहा था।नींद में सने पात्र, सपनों से लग रहे थे।कुछ दृश्य घर से शुरु होके... समुद्र में चले जाते थे,तो कुछ पात्र, नदी में तैरते-तैरते गांव में गुम हो जाते थे।अचानक मैं अपने आपको कोसने लगा... क्या है ये? बस भर पाया मैं इन रतजगों से। तभी मुझे एलियट की बात याद आई।
-There is always a separation between the man who suffers and the artist who creates; and the greater the artist the greater the separation.
एक मुस्कान नाम की लड़की कहानी के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ गई।देर तक एलियट के शब्दों के बीच खुद को ढूंढ़ता रहा। मैं इन शब्दों में बहुत मुझे मिला नहीं... पर मैं आस पास ही कहीं छुपा हूँ का ख्याल सुख देता रहा।
अबाबील नाम की नई कहानी के बारे में मैंने सोचना शुरु किया, बहुत पहले इसे पहाड़ो पे लिखना शुरु किया था। एक बार उसे वापिस पढ़ा फिर बंद कर के रख दिया।सोचा उपन्यास भी काफी समय से उसी सड़क पे खड़ा मेरा इंतज़ार कर रहा है जहां उसे छोड़ा था।फिर नया नाटक भी है जिसके दो scene लिखकर मैं चुप बैठा हूँ।ये सब कुछ दूर चलकर चुपचाप बैठे हैं, मैंने इन सारे नाटक, कहानी और उपन्यास में एक मुसकान नाम की लड़की का पात्र बढ़ा दिया।:-)
"writing doesn't come from contentment and champagne.That's not where a novel comes from.writers lock them selves in there rooms, they treavel, they vanish and some times lives fall apart."- kiran desai.
-There is always a separation between the man who suffers and the artist who creates; and the greater the artist the greater the separation.
एक मुस्कान नाम की लड़की कहानी के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ गई।देर तक एलियट के शब्दों के बीच खुद को ढूंढ़ता रहा। मैं इन शब्दों में बहुत मुझे मिला नहीं... पर मैं आस पास ही कहीं छुपा हूँ का ख्याल सुख देता रहा।
अबाबील नाम की नई कहानी के बारे में मैंने सोचना शुरु किया, बहुत पहले इसे पहाड़ो पे लिखना शुरु किया था। एक बार उसे वापिस पढ़ा फिर बंद कर के रख दिया।सोचा उपन्यास भी काफी समय से उसी सड़क पे खड़ा मेरा इंतज़ार कर रहा है जहां उसे छोड़ा था।फिर नया नाटक भी है जिसके दो scene लिखकर मैं चुप बैठा हूँ।ये सब कुछ दूर चलकर चुपचाप बैठे हैं, मैंने इन सारे नाटक, कहानी और उपन्यास में एक मुसकान नाम की लड़की का पात्र बढ़ा दिया।:-)
"writing doesn't come from contentment and champagne.That's not where a novel comes from.writers lock them selves in there rooms, they treavel, they vanish and some times lives fall apart."- kiran desai.
writing...
देर से वही... वैसी ही सांसे ले रहा था।एक पैर सांसों की गति से हिल रहा था।आँखें दीवार पर टिकी थी। बचे रह गए चरित्रों में कहानियाँ ढूंढ रहा था।नींद में सने पात्र, सपनों से लग रहे थे।कुछ दृश्य घर से शुरु होके... समुद्र में चले जाते थे,तो कुछ पात्र, नदी में तैरते-तैरते गांव में गुम हो जाते थे।अचानक मैं अपने आपको कोसने लगा... क्या है ये? बस भर पाया मैं इन रतजगों से। तभी मुझे एलियट की बात याद आई।
-There is always a separation between the man who suffers and the artist who creates; and the greater the artist the greater the separation.
एक मुस्कान नाम की लड़की कहानी के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ गई।देर तक एलियट के शब्दों के बीच खुद को ढूंढ़ता रहा। मैं इन शब्दों में बहुत मुझे मिला नहीं... पर मैं आस पास ही कहीं छुपा हूँ का ख्याल सुख देता रहा।
अबाबील नाम की नई कहानी के बारे में मैंने सोचना शुरु किया, बहुत पहले इसे पहाड़ो पे लिखना शुरु किया था। एक बार उसे वापिस पढ़ा फिर बंद कर के रख दिया।सोचा उपन्यास भी काफी समय से उसी सड़क पे खड़ा मेरा इंतज़ार कर रहा है जहां उसे छोड़ा था।फिर नया नाटक भी है जिसके दो scene लिखकर मैं चुप बैठा हूँ।ये सब कुछ दूर चलकर चुपचाप बैठे हैं, मैंने इन सारे नाटक, कहानी और उपन्यास में एक मुसकान नाम की लड़की का पात्र बढ़ा दिया।:-)
"writing doesn't come from contentment and champagne.That's not where a novel comes from.writers lock them selves in there rooms, they treavel, they vanish and some times lives fall apart."- kiran desai.
Friday, May 16, 2008
पं. सत्यदेव दुबे जी....

कुछ बातें जो दुबेजी के बारे में मुझे इस वक्त याद आती है, वो मैं लिख रहा हूँ।त्रुटियों की माफी।
मैं दुबेजी के साथ 1998 जुड़ा हूँ, एक बार हम लोग पूना गए थे 'इंशा अल्लाह' का शो करने वहाँ पर मुझॆ एक किताब मिली थी, धर्मवीर भारती की 'कुछ चहरे, कुछ चिन्तंन'.... उसमें भारती जी ने दुबेजी के बारे में एक chapter लिखा हैं।उसे पढ़्कर मुझे दुबेजी और इंशा अल्लाह दोनों थोड़े ज़्यादा समझ में आए।
मैं दुबेजी के साथ जब जुड़ा था तब तक वो (जैसा कि मैंने सुना हैं,और जैसा लोग कहते हैं।)अपना सारा बहतर काम कर चुके थे, फिर भी इशां अल्लाह मुझे उनका काफ़ी अच्छा काम लगता है।
उनकी अभिनय को लेकर समझ बहुत ही strong है, वो हर बार actor को उसके झूठे अभिनय से बचाते रहे हैं।हर actor को उन्होनें सबसे पहले उसकी ज़मीन पर ठीक से खड़े रहना सिखाया है, अगर वो ऎसा नहीं कर पाया है तो दुबेजी ने उसे डाट कर, गाली देकर... उसे ज़मीन पे लाकर खड़ा कर दिया है।
-- साफ बोलो।
-- वाक्य के अंत तक जाओ।
-- हर वाक्य के बाद सांस लो।
ये उनके अभिनय के तीन मूल मंत्र हैं।जो काफ़ी सटीक और सही हैं।
मैंने भोपाल में थियेटर करने के दौरांन दुबेजी का नाम सुन रखा था।इच्छा थी कि बंबई में इन्हीं के साथ काम करना है। पर दुबेजी के डरावने किससे, उनसे कहीं ज़्यादा पूरे थियेटर की दुनियाँ में मशहूर हैं, वो सारे किस्से मैं भी सुन रखे थे। पर मैं तय कर चुका था कि जब भी मैं दुबेजी से मिलूगाँ तो सीधा पैर छूकर कहूँगा कि आपके ही साथ काम करना है।सो एक दिन मैं prithvi theatre में दुबेजी को ढूढ ही रहा था कि एक आदमी की आवाज़ आई.. चिल्लाने की... मैंने देखा दुबेजी एक लड़के को बुरी तरह ड़ाट रहे हैं-"अबे... पेर पड़ लेने से तू actor नहीं हो जाएगा".,.." सारे मध्य प्रदेश का ज़िम्मा मैंने थोड़ी उठा रखा है।" वगैराह वगैराह।
मैंने दुबेजी को काफी समय तक नहीं बताया था कि मैं मध्य प्रदेश का हूँ... वो मुझे कश्मीरी समझते थे। सो मैं कई सालो तक 'बंसी कौल' के हिस्से की डाँट खाता रहा, जिनसे मेरा कोई सम्बंध नहीं है।
जिस वक्त दुबेजी एक के बाद एक बेहतरीन नाटक कर रहे थे, उस वक्त उनके साथ प्रो. वसंत देव, भारती जी, भवानीप्रसाद मिश्र जैसे लेखको का उठना बैठना था। भवानी भाई यूं भी एक आधुनिक कवि थे, वो नई तरह की कविताऎ लिख रहे थे।भारती जी का धर्मयुग उस वक्त देश की एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका थी। मेरे ख्याल से इसी वजह से दुबेजी की भाषा या आधुनिक हिन्दी पे पकड़ बहुत मज़बूत है जो उनके भाषा के रंगमंच में झलकती है।अब चूकि रंगमंच भाषा प्रधान है तो बाक़ी सारी चीज़े नगण्य हो जाती है। जब भी दुबेजी ने अपने नाटको में सेट लगाने की कोशिश की है, वो हर बार बचकाने लगे हैं।
दुबेजी ने अपने नाटक ईंशा अल्लाह में खुद कहा है कि मैं लेखक नहीं हूँ, वो थियेटर के amizing निर्देशक हैं।जिस तरह वो text को approch करते है उसे समझते है,और जिस तरह वो उसे actor के माध्यम से कहलवात हैं, वो काबिले तारीफ है।भारती जी ने एक जगह कहा है कि-' मैंने खुद अपने पात्रों को इस तरह नहीं समझा था जिस तरह दुबे ने उन्हें किया।'(लगभग ऎसा कुछ...)।
बतौर लेखक मैंने कभी दुबेजी को पसंद नहीं किया।एक लेखक का धैर्य उनके अंदर नहीं है।
दुबेजी यूं पूरी ज़िदगीं अकेले रहे हैं, पर मुझे लगता है कि वो कभी अकेले रहना सीख नहीं पाए।
दुबेजी के मूँह से 70's,80's के थियेटर के किस्से सुनना मुझे आज भी अच्छा लगता है। मैं उन्हें घंटो सुन सकता है। वो दुबेजी के जिये हुए अदभुत दिन थे।मुझे दुबेजी थियेटर की ‘नानी’ जैसे कुछ लगते हैं, जो कभी भी किसी भी बात पर आपको डाँटने का हक रखती है, जिसके पास किस्से हैं… कहानियाँ है और जो आज भी मीलों चलने का दम रखती है।
मैं दुबेजी के साथ 1998 जुड़ा हूँ, एक बार हम लोग पूना गए थे 'इंशा अल्लाह' का शो करने वहाँ पर मुझॆ एक किताब मिली थी, धर्मवीर भारती की 'कुछ चहरे, कुछ चिन्तंन'.... उसमें भारती जी ने दुबेजी के बारे में एक chapter लिखा हैं।उसे पढ़्कर मुझे दुबेजी और इंशा अल्लाह दोनों थोड़े ज़्यादा समझ में आए।
मैं दुबेजी के साथ जब जुड़ा था तब तक वो (जैसा कि मैंने सुना हैं,और जैसा लोग कहते हैं।)अपना सारा बहतर काम कर चुके थे, फिर भी इशां अल्लाह मुझे उनका काफ़ी अच्छा काम लगता है।
उनकी अभिनय को लेकर समझ बहुत ही strong है, वो हर बार actor को उसके झूठे अभिनय से बचाते रहे हैं।हर actor को उन्होनें सबसे पहले उसकी ज़मीन पर ठीक से खड़े रहना सिखाया है, अगर वो ऎसा नहीं कर पाया है तो दुबेजी ने उसे डाट कर, गाली देकर... उसे ज़मीन पे लाकर खड़ा कर दिया है।
-- साफ बोलो।
-- वाक्य के अंत तक जाओ।
-- हर वाक्य के बाद सांस लो।
ये उनके अभिनय के तीन मूल मंत्र हैं।जो काफ़ी सटीक और सही हैं।
मैंने भोपाल में थियेटर करने के दौरांन दुबेजी का नाम सुन रखा था।इच्छा थी कि बंबई में इन्हीं के साथ काम करना है। पर दुबेजी के डरावने किससे, उनसे कहीं ज़्यादा पूरे थियेटर की दुनियाँ में मशहूर हैं, वो सारे किस्से मैं भी सुन रखे थे। पर मैं तय कर चुका था कि जब भी मैं दुबेजी से मिलूगाँ तो सीधा पैर छूकर कहूँगा कि आपके ही साथ काम करना है।सो एक दिन मैं prithvi theatre में दुबेजी को ढूढ ही रहा था कि एक आदमी की आवाज़ आई.. चिल्लाने की... मैंने देखा दुबेजी एक लड़के को बुरी तरह ड़ाट रहे हैं-"अबे... पेर पड़ लेने से तू actor नहीं हो जाएगा".,.." सारे मध्य प्रदेश का ज़िम्मा मैंने थोड़ी उठा रखा है।" वगैराह वगैराह।
मैंने दुबेजी को काफी समय तक नहीं बताया था कि मैं मध्य प्रदेश का हूँ... वो मुझे कश्मीरी समझते थे। सो मैं कई सालो तक 'बंसी कौल' के हिस्से की डाँट खाता रहा, जिनसे मेरा कोई सम्बंध नहीं है।
जिस वक्त दुबेजी एक के बाद एक बेहतरीन नाटक कर रहे थे, उस वक्त उनके साथ प्रो. वसंत देव, भारती जी, भवानीप्रसाद मिश्र जैसे लेखको का उठना बैठना था। भवानी भाई यूं भी एक आधुनिक कवि थे, वो नई तरह की कविताऎ लिख रहे थे।भारती जी का धर्मयुग उस वक्त देश की एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका थी। मेरे ख्याल से इसी वजह से दुबेजी की भाषा या आधुनिक हिन्दी पे पकड़ बहुत मज़बूत है जो उनके भाषा के रंगमंच में झलकती है।अब चूकि रंगमंच भाषा प्रधान है तो बाक़ी सारी चीज़े नगण्य हो जाती है। जब भी दुबेजी ने अपने नाटको में सेट लगाने की कोशिश की है, वो हर बार बचकाने लगे हैं।
दुबेजी ने अपने नाटक ईंशा अल्लाह में खुद कहा है कि मैं लेखक नहीं हूँ, वो थियेटर के amizing निर्देशक हैं।जिस तरह वो text को approch करते है उसे समझते है,और जिस तरह वो उसे actor के माध्यम से कहलवात हैं, वो काबिले तारीफ है।भारती जी ने एक जगह कहा है कि-' मैंने खुद अपने पात्रों को इस तरह नहीं समझा था जिस तरह दुबे ने उन्हें किया।'(लगभग ऎसा कुछ...)।
बतौर लेखक मैंने कभी दुबेजी को पसंद नहीं किया।एक लेखक का धैर्य उनके अंदर नहीं है।
दुबेजी यूं पूरी ज़िदगीं अकेले रहे हैं, पर मुझे लगता है कि वो कभी अकेले रहना सीख नहीं पाए।
दुबेजी के मूँह से 70's,80's के थियेटर के किस्से सुनना मुझे आज भी अच्छा लगता है। मैं उन्हें घंटो सुन सकता है। वो दुबेजी के जिये हुए अदभुत दिन थे।मुझे दुबेजी थियेटर की ‘नानी’ जैसे कुछ लगते हैं, जो कभी भी किसी भी बात पर आपको डाँटने का हक रखती है, जिसके पास किस्से हैं… कहानियाँ है और जो आज भी मीलों चलने का दम रखती है।
Wednesday, May 14, 2008
टूटा फूटा कुछ...

वो कौन सा ऎसा भीतर का एक जानवर होता है जिसकी वजह से एक इंसान दूसरे इंसान को मार देता है। मेरे लिए सारी वजह सोचने के बाद भी, सारी वजह कम पड़ जाती है। हमारा इस कदर हिसंक होना हमें क्या दिला देता है अंत में…
Nathuram godse…ने गांधी को मारने की वजह को justify करते हुए अपने अंतिम भाषण में कहा था- (‘his main provocation was the mahatma’s constant and consistent pandering to the muslims.’)- ‘culminating in his last pro-muslim fast which at last goaded me to the conclusion that the existence of Gandhi should be brought to an end immediately.’- guha’s ‘india after Gandhi’
इसके पहले भी गांधी पे एक पंजाबी refugee ‘मदन लाल’ ने bomb फैका था।
मैंने कभी एसी कोई धटना (एक आदमी के, आदमी को मारने वाली) अपनी आंखो से नहीं देखी हैं न ही मैं देखना चाहता हूँ, मैंने ये सब फिल्मों में देखा है-‘कि मैं तुझे जान से मार दूगाँ।‘ और बाद में सच में जान से मार दिया जाना।
इस दुनियाँ की सबसे बड़ी मूर्खता मुझे लगती है जब कोई धर्म के लिए लड़ता है, इतिहास लगभग सारे ऎसे उदाहरणों से भरा पड़ा है।मेरी एक बात समझ में नहीं आई मेरा धर्म हिन्दू हैं…और अगर मैं अपने धर्म का पालन करना चाहता हूँ तो मेरा धर्म मेरे लिए कभी मर ही नहीं सकता है,… किसी और के धर्म की वजह से मेरा धर्म खतरे में कैसे पड़ सकता है?
दूसरा धर्म की श्रेष्ठा का प्रश्न, ये वैसा ही है जैसा ये प्रश्न कि- ‘मेरी माँ तेरी माँ से कहीं ज़्यादा वात्सल्य से भरी है।‘
मैं जानता हूँ ये प्रश्न इतना सरल नहीं है, पर अगर हम बेसिक बातों पे आना चाहें, तो हमें सच में कुछ इसी तरह के तर्क सामने नज़र आते हैं।
ओशो अमेरिका जाता है वहाँ से उसे भगा दिया जाता है कि क्रिश्चेनिटी को खतरा है (और भी बहुत सारी जगह से), जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग की और बनाया कि हिन्दुस्तान एक हिन्दु द्वारा चलाया जा रहा, हिन्दुओं के लिए राष्ट्र है.... यहां इस्लाम को खतरा है। हिन्दु डरे रहते हैं कि मुस्लमानों की आबादी बढ़ती जा रही है, वो बांग्लादेश से भी बड़ी तादाद में आ रहे हैं.. हिन्दु धर्म को खतरा है।अरे भाई आप सबके बचाने के चक्कर में सारे धर्म की खूबसूरती ही खत्म हो गई, अब सभी एक कुरुप धर्म को अपने कंधे पर उठाए भागे जा रहे हैं।
मैं खुद एक धार्मिक शहर से आया हूँ, भजन सुनते हुए रोज़ मेरी आँखे खुलती थी, खासकर हरिओम शरण के भजन।सारा संगीत किसी न किसी धर्म से ही उपजा है। नुसरत साहब जब गाते थे तो लगता था कि सीधे अल्लाह से बातें कर रहे हैं। बिस्मिल्लाह खाँ साहब शहनाई सुनते हैं तो हम किसी दूसरी दुनियाँ में पहुच जाते हैं।ये धर्म की शक्ति है,चीखना चिल्लाना नहीं।
–‘लोगों का उनके मरने के बाद भी ज़िन्दा रहने की इच्छा रखना।‘ ये भी बहुत सी समस्याओं का एक मूलभूत कारण है, शायद इसी भावना का एक छोटा सा उद्दाहरण हमें मंदिरो में देखने को मिलता है जब लोग मंदिरो की सीड़ियों पे अपना नाम खुदवा लेते हैं।
मैं मेक्लाड़्गंज में एक लामा से बात कर रहा था, उसने बताया कि दलाई लामा कभी भी अपना खुद का धर्म छोड़ने की सलाह नहीं देते वो कहते है कि बुद्धिज़म (तिब्बत का) को समझो पर अपना मदर रिलिज़न मत छोड़ो।
धर्म इंसान देखे... और इंसान सारे धर्म समझे।
हम एक बात कभी मानने को तैयार नहीं है कि ये सारे धर्म ग्रंथ किसी एक इन्सान ने बैठके लिखे थे।इससे काफ़ी चीज़े दिमाग़ से झड़ जाएगी जो बैकार में अभी लोगो के दिमाग़ में आतंक मचाए पड़ी हैं।
ये शायद मैं पहले भी कर चुका हूँ, गुजरात के दंगो के बाद मैं काफ़ी परेशान था तब मैंने एक कविता लिखी थी('दंगों के हम...' के नाम से जिसे आप मेरे कविताओं के ब्लाग में पढ़ सकते हैं, उसका लिंक दिया हुआ है।), अभी जयपुर धमाको के बाद, मेरे दिमाग में जो भी कुछ टूटा फूटा चल रहा था मैंने लिख दिया। मैं बस इतना ही कर सकता हूँ, लिख सकता हूँ और कुछ नहीं।
Nathuram godse…ने गांधी को मारने की वजह को justify करते हुए अपने अंतिम भाषण में कहा था- (‘his main provocation was the mahatma’s constant and consistent pandering to the muslims.’)- ‘culminating in his last pro-muslim fast which at last goaded me to the conclusion that the existence of Gandhi should be brought to an end immediately.’- guha’s ‘india after Gandhi’
इसके पहले भी गांधी पे एक पंजाबी refugee ‘मदन लाल’ ने bomb फैका था।
मैंने कभी एसी कोई धटना (एक आदमी के, आदमी को मारने वाली) अपनी आंखो से नहीं देखी हैं न ही मैं देखना चाहता हूँ, मैंने ये सब फिल्मों में देखा है-‘कि मैं तुझे जान से मार दूगाँ।‘ और बाद में सच में जान से मार दिया जाना।
इस दुनियाँ की सबसे बड़ी मूर्खता मुझे लगती है जब कोई धर्म के लिए लड़ता है, इतिहास लगभग सारे ऎसे उदाहरणों से भरा पड़ा है।मेरी एक बात समझ में नहीं आई मेरा धर्म हिन्दू हैं…और अगर मैं अपने धर्म का पालन करना चाहता हूँ तो मेरा धर्म मेरे लिए कभी मर ही नहीं सकता है,… किसी और के धर्म की वजह से मेरा धर्म खतरे में कैसे पड़ सकता है?
दूसरा धर्म की श्रेष्ठा का प्रश्न, ये वैसा ही है जैसा ये प्रश्न कि- ‘मेरी माँ तेरी माँ से कहीं ज़्यादा वात्सल्य से भरी है।‘
मैं जानता हूँ ये प्रश्न इतना सरल नहीं है, पर अगर हम बेसिक बातों पे आना चाहें, तो हमें सच में कुछ इसी तरह के तर्क सामने नज़र आते हैं।
ओशो अमेरिका जाता है वहाँ से उसे भगा दिया जाता है कि क्रिश्चेनिटी को खतरा है (और भी बहुत सारी जगह से), जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग की और बनाया कि हिन्दुस्तान एक हिन्दु द्वारा चलाया जा रहा, हिन्दुओं के लिए राष्ट्र है.... यहां इस्लाम को खतरा है। हिन्दु डरे रहते हैं कि मुस्लमानों की आबादी बढ़ती जा रही है, वो बांग्लादेश से भी बड़ी तादाद में आ रहे हैं.. हिन्दु धर्म को खतरा है।अरे भाई आप सबके बचाने के चक्कर में सारे धर्म की खूबसूरती ही खत्म हो गई, अब सभी एक कुरुप धर्म को अपने कंधे पर उठाए भागे जा रहे हैं।
मैं खुद एक धार्मिक शहर से आया हूँ, भजन सुनते हुए रोज़ मेरी आँखे खुलती थी, खासकर हरिओम शरण के भजन।सारा संगीत किसी न किसी धर्म से ही उपजा है। नुसरत साहब जब गाते थे तो लगता था कि सीधे अल्लाह से बातें कर रहे हैं। बिस्मिल्लाह खाँ साहब शहनाई सुनते हैं तो हम किसी दूसरी दुनियाँ में पहुच जाते हैं।ये धर्म की शक्ति है,चीखना चिल्लाना नहीं।
–‘लोगों का उनके मरने के बाद भी ज़िन्दा रहने की इच्छा रखना।‘ ये भी बहुत सी समस्याओं का एक मूलभूत कारण है, शायद इसी भावना का एक छोटा सा उद्दाहरण हमें मंदिरो में देखने को मिलता है जब लोग मंदिरो की सीड़ियों पे अपना नाम खुदवा लेते हैं।
मैं मेक्लाड़्गंज में एक लामा से बात कर रहा था, उसने बताया कि दलाई लामा कभी भी अपना खुद का धर्म छोड़ने की सलाह नहीं देते वो कहते है कि बुद्धिज़म (तिब्बत का) को समझो पर अपना मदर रिलिज़न मत छोड़ो।
धर्म इंसान देखे... और इंसान सारे धर्म समझे।
हम एक बात कभी मानने को तैयार नहीं है कि ये सारे धर्म ग्रंथ किसी एक इन्सान ने बैठके लिखे थे।इससे काफ़ी चीज़े दिमाग़ से झड़ जाएगी जो बैकार में अभी लोगो के दिमाग़ में आतंक मचाए पड़ी हैं।
ये शायद मैं पहले भी कर चुका हूँ, गुजरात के दंगो के बाद मैं काफ़ी परेशान था तब मैंने एक कविता लिखी थी('दंगों के हम...' के नाम से जिसे आप मेरे कविताओं के ब्लाग में पढ़ सकते हैं, उसका लिंक दिया हुआ है।), अभी जयपुर धमाको के बाद, मेरे दिमाग में जो भी कुछ टूटा फूटा चल रहा था मैंने लिख दिया। मैं बस इतना ही कर सकता हूँ, लिख सकता हूँ और कुछ नहीं।
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मानव
परिचय
- मानव
- मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल



