मौन में बात...

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Tuesday, January 29, 2008

अन्तिमा

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मैं चाहता हूँ कि मैं अपने उपन्यास ( अंतिमा ) की यात्रा के दौरांन उसके अनुभवो को यहाँ लिखता चलूं....उसकी कहाँनी को बताए बिना... ...
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Tuesday, January 22, 2008

abhi jeena baaki hai..

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सब कुछ हो रहा है, हर शाम एक टीस का उठना, सब कुछ होने मैं शामिल रहता है। किस्म -किस्म की कहानिया, आखो के सामने चलती रहती है। कुछ पड़ता हूँ ....
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क्या हमारा जीना,लगातार चमत्कारों का सामान्य होता जाना नही है.
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परिचय

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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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