मौन में बात...

www.manavaranya.blogspot.com (मेरी कविताएं) www.manavplays.blogspot.com (मेरे नाटक)

Sunday, June 22, 2008

विमल को खत..

›
दोस्त विमल, तुम्हारा कमेन्ट पढ़ा, चूकि पहले मैं भी कुछ ऎसा ही सोचता था सो वो बातें बहुत कुछ अपनी सी लगी, परंतु मेरे विचार इस संदर्भ में कुछ ब...
2 comments:
Saturday, June 21, 2008

हबीब साहब...

›
जब हम उनके घर पहुचे तो वो सो रहे थे.. हम सब शांत उनके घर में चुपचाप अपनी-अपनी जगह खोजने लगे,मानो गुरु के घर में बहुत से छोटे बच्चे आ गये हो।...
3 comments:
Thursday, June 19, 2008

चिड़ीखो....

›
चिड़ीखों भोपाल के पास एक बहुत सुंदर जगह... भोपाल से करीब दो धंटे की दूरी पर...(ब्यावरा रोड़)
4 comments:
Tuesday, June 10, 2008

writing...

›
देर से वही... वैसी ही सांसे ले रहा था।एक पैर सांसों की गति से हिल रहा था।आँखें दीवार पर टिकी थी। बचे रह गए चरित्रों में कहानियाँ ढूंढ रहा था...
2 comments:

writing...

›
देर से वही... वैसी ही सांसे ले रहा था।एक पैर सांसों की गति से हिल रहा था।आँखें दीवार पर टिकी थी। बचे रह गए चरित्रों में कहानियाँ ढूंढ रहा था...
Friday, May 16, 2008

पं. सत्यदेव दुबे जी....

›
कुछ बातें जो दुबेजी के बारे में मुझे इस वक्त याद आती है, वो मैं लिख रहा हूँ।त्रुटियों की माफी। मैं दुबेजी के साथ 1998 जुड़ा हूँ, एक बार हम लो...
2 comments:
Wednesday, May 14, 2008

टूटा फूटा कुछ...

›
वो कौन सा ऎसा भीतर का एक जानवर होता है जिसकी वजह से एक इंसान दूसरे इंसान को मार देता है। मेरे लिए सारी वजह सोचने के बाद भी, सारी वजह कम पड़ ज...
3 comments:
‹
›
Home
View web version

परिचय

My photo
मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
View my complete profile
Powered by Blogger.