मौन में बात...

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Wednesday, October 22, 2008

Father

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’तबीयत खराब है भाई।’ आज ही सुबह मेरे भाई का फोन आया... वह मुझे भारत के जीतने पर ( क्रिकेट..) बधाई देना चाह रहा था। मेरी तबियत की बात सुनते ह...
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Saturday, October 18, 2008

थकान...

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फिर सामने एक कोरा पन्ना पड़ा हुआ है.... अपनी सारी अपेक्क्षाओं के साथ..। क्या भरुं इसमें? शब्दों के वह कौन से चित्र बनाऊँ जिन्हें बनाते ही मैं...
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Thursday, October 16, 2008

निर्मल वर्मा..

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काफ़ी समय से अपने आप को एक कोस रहा हूँ कि मैं बहुत ही ज़्यादा समय बरबाद करता हूँ.... भीतर समय बीतते जाने का ज्वर सा भरा रहता है।और अधिक्तर यह ...
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Sunday, October 12, 2008

शुद्ध कला...

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कला को बाज़ार ही चलाता है, शायद यह ही कला की त्रासदी है.... कला को सामान्य जीवन के बाहर के शौक के रुप में हमेशा रखा गया है। शुद्ध कला की जगह ...
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Saturday, October 11, 2008

प्रकृति हमें अच्छी लगती है...

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'प्रकृति हमें अच्छी लगती है'- का एक पक्षी, हमने अपने घर के पिंजरें में बंद कर रखा है। और एक फूल ग़मले में उगा रखा है। 'हमें सुखी ...
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Thursday, October 9, 2008

डरपोक़....

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काफ़ी समय से चाय पीता हुआ मैं... इन छोटे-छोटे आश्चर्यों को देख रहा था जो मेरी आँखों के सामने घट रहे थे.... मैं पहाड़ के एक गाँव में बैठा, चाय ...
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Sunday, October 5, 2008

लेखक...

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यह काफ़ी अजीब है कि मैं अपनी पूरी ईमान्दारी से जब भी किसी बहुत गहरे अनुभव/एहसास को जी रहा होता हूँ, चाहे वह दुख हो सुख हो.... या अकेलापन हो.....
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परिचय

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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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