मौन में बात...

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Friday, February 20, 2009

सूअर...

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एक सूअर लटकटा-मटकता अपना पेट भरने के बाद एक गाँव की एक गली से गुज़र रहा था। गली के दूसरे छोर पर कांग्रेस का एक बहुबली युवा कार्यकर्ता एक बड़ा ...
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Saturday, February 7, 2009

बगुले...

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.... सामने, कुछ ही दूरी पर चलते रहने से समुद्र आ जाएगा...। बहुत सारा पानी...। मैं पेड़ के सामने बैठा हूँ....। खुरदुरापन है मानो कोई भीतर रगड़त...
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Wednesday, February 4, 2009

"मैं आलू...!!!"

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कुछ दिनों से नए नाटक ’मैं आलू...’ के सिलसिले में, लोगों से मिल रहा हूँ.....। एक दिन मैं एक साथ काफी लोगों से मिला...(लगभग सभी यूवा...) सभी अ...
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"मैं आलू...!!!"

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कुछ दिनों से नए नाटक ’मैं आलू...’ के सिलसिले में, लोगों से मिल रहा हूँ.....। एक दिन मैं एक साथ काफी लोगों से मिला...(लगभग सभी यूवा...) सभी अ...
Saturday, December 6, 2008

ईकोपा...

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आज शायद आख़िरी बार मैं ईकोपा (मेरा घर....) के साथ बैठा हूँ...। दरारें........ कुछ छोटे चहबच्चों से जाले, कुछ बड़े भी... पीठ और सिर के निशानों ...
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Wednesday, October 22, 2008

Father

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’तबीयत खराब है भाई।’ आज ही सुबह मेरे भाई का फोन आया... वह मुझे भारत के जीतने पर ( क्रिकेट..) बधाई देना चाह रहा था। मेरी तबियत की बात सुनते ह...
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Saturday, October 18, 2008

थकान...

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फिर सामने एक कोरा पन्ना पड़ा हुआ है.... अपनी सारी अपेक्क्षाओं के साथ..। क्या भरुं इसमें? शब्दों के वह कौन से चित्र बनाऊँ जिन्हें बनाते ही मैं...
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परिचय

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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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