मौन में बात...

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Friday, August 28, 2009

अलस्य सुबह... (डायरी....)

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5 th August 2009.. अलस्य सुबह सब झूठ था। मैं झूठ , व्यवहार झूठ , लिखा झूठ , अगल - बगल रचा संसार झूठ , मन झूठ , आत्मा झूठ ......

अलस्य सुबह... (डायरी....)

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2 nd August 2009... sona pani...        अलस्य सुबह , बंदरों का एक झुंड़ नास्पाती खाने आया , मैं नास्पाती के पेड़ के नीचे बैठ...
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परिचय

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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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