मौन में बात...

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Sunday, May 23, 2010

निर्मल और मैं....

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23rd May 23, 2010 निर्मल- जब हम कहानी लिखते हैं-या उपन्यास- तो एक फिल्म चलने लगती है- इस फिल्म में छूटे हुए मकान हैं और मरे हुए मित्र, बदलत...
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Thursday, May 20, 2010

‘अभी-अभी’ से ’कभी-का’ तक....

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‘अभी-अभी’ से ’कभी-का’ तक.... सू रज ने कहा कि ’देर रात की बात थी। हम सब घबरा गए थे। कुछ समझ में नहीं आया क्या करें। तू समझ रहा है ना?’ मैं नह...
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Tuesday, May 18, 2010

म्मताज़ भाई पतंगवाले.....

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म्मताज़ भाई पतंगवाले..... 15th feb, 2010… एक काश मैं आनंद को मना कर देता। कैसे बचपन की बेवकूफियों पर मैं अचानक भावनाओं में बह गया? ....छुट्...
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Friday, May 7, 2010

निर्मल और मैं....

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मैं- इतनी रात गए.. खामोश बैठे हैं? निर्मल- कितना बज रहा होगा? मैं- करीब एक...। निर्मल- कितने रतजगों की कालिख आँखों के नीचे फैली पड़ी है... ह...
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Sunday, May 2, 2010

इति और उदय..

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इति और उदय... वह फिर वहीं बैठी थी... उसी पार्क की उसी बेंच पे। उसका हाथ उदय के हाथ में था। होंठ कभी तन जाते, तो कभी ढ़ीले पड़ जाते। आँखों क...
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Thursday, April 29, 2010

फ्रिज में रखा हुआ सुख...

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किसी कविता का फिर से पढ़ा जाना जो सुख की गुदगुदी पैदा करता है वह उसका पहली बार पढ़ा जाना नहीं करता है। पहली बार का आश्चर्य होता है। दूसरी बा...
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Sunday, April 25, 2010

निर्मल और मैं....

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निर्मल- क्या भाई अकेले-अकेले ही चाय पी लोगे... एक मेरे लिए भी बना दो? मैं- वाह! बड़े दिनों बाद... बैठिये मैं चाय चढ़ाता हूँ। निर्मल- तुम जगह...
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परिचय

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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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