मौन में बात...

www.manavaranya.blogspot.com (मेरी कविताएं) www.manavplays.blogspot.com (मेरे नाटक)

Sunday, June 6, 2010

शंख और सीपियां...

›
शंख और सीपियां... 24th,may, 2010 अतृप्त, बैचेन, छल, नींद, समझ..... और फिर हम सुखी रहने लगे। कहते थे कि हम किसी भी तरह से गुज़र जाएगें, धीरे-...
9 comments:
Thursday, June 3, 2010

‘तोमाय गान शोनाबो...’

›
‘तोमाय गान शोनाबो...’ ’मैं थक चुकी हूँ... सुनो... नहीं... मैं सच में बहुत थक चुकी हूँ, समीर प्लीज़... मुझे सोने दो।’ समीर कुछ बचपने की हरकत...
14 comments:
Sunday, May 23, 2010

निर्मल और मैं....

›
23rd May 23, 2010 निर्मल- जब हम कहानी लिखते हैं-या उपन्यास- तो एक फिल्म चलने लगती है- इस फिल्म में छूटे हुए मकान हैं और मरे हुए मित्र, बदलत...
2 comments:
Thursday, May 20, 2010

‘अभी-अभी’ से ’कभी-का’ तक....

›
‘अभी-अभी’ से ’कभी-का’ तक.... सू रज ने कहा कि ’देर रात की बात थी। हम सब घबरा गए थे। कुछ समझ में नहीं आया क्या करें। तू समझ रहा है ना?’ मैं नह...
6 comments:
Tuesday, May 18, 2010

म्मताज़ भाई पतंगवाले.....

›
म्मताज़ भाई पतंगवाले..... 15th feb, 2010… एक काश मैं आनंद को मना कर देता। कैसे बचपन की बेवकूफियों पर मैं अचानक भावनाओं में बह गया? ....छुट्...
6 comments:
‹
›
Home
View web version

परिचय

My photo
मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
View my complete profile
Powered by Blogger.