मौन में बात...

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Wednesday, September 15, 2010

निर्मल और मैं....

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निर्मल और मैं... निर्मल- देखो इस बार मैं खुद ही चला आया बिना तुम्हारे बुलाए। मैं- आपका इंतज़ार था मुझे। निर्मल- तो इन दिनों क्या चल रहा है। ...
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Sunday, September 12, 2010

मेरे प्रिय दोस्त... (माफी नामा)

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मेरे प्रिय दोस्त, एक माफी नामे के साथ इस ख़त की शुरुआत करना ठीक होगा। पीछे कुछ दिनों सन्नाटे से वाक़िफ हुआ... मौन में बात कहना सीख चुका था.....
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Saturday, August 21, 2010

मेरे प्रिय दोस्त... (3..)

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प्रिय दोस्त, देर रात तुम्हें यह ख़त लिख रहा हूँ...। मैं हमेशा ऎसी अंधेरी घनी रातों में मौन हो जाता हूँ... या किताबों का सहारा ले लेता हूँ, प...
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Tuesday, August 17, 2010

मेरे प्रिय दोस्त... (दो..)

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प्रिय दोस्त, हर कुछ समय में हम सब एक ऎसी स्थिति में पहुंच जाते है कि हमें दुनियाँ का अर्थ बूझे नहीं बूझता है। सारे जवाब GOOGLE भगवान के पास...
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Monday, August 16, 2010

मेरे प्रिय दोस्त...

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प्रिय दोस्त, आज सुबह एक अजीब बोझ लिए उठा...। उठते ही कुछ हल्का होने के लिए मैं Ruskin Bond पढ़ने लगा। अजीब था कि Ruskin bond के बगल में van...
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Thursday, August 5, 2010

New york, New york...

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न्युयार्क के महीने भर के मेरे प्रवास की जितनी बातें मुझे अभी याद हैं उसका ब्यौरा कुछ इस प्रकार है। मैं जब न्युयार्क से वापिस लौटा और पहली बा...
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Sunday, June 6, 2010

शंख और सीपियां...

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शंख और सीपियां... 24th,may, 2010 अतृप्त, बैचेन, छल, नींद, समझ..... और फिर हम सुखी रहने लगे। कहते थे कि हम किसी भी तरह से गुज़र जाएगें, धीरे-...
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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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