मौन में बात...

www.manavaranya.blogspot.com (मेरी कविताएं) www.manavplays.blogspot.com (मेरे नाटक)

Sunday, December 16, 2012

किंगफिशर....

›
क्या मैं बता सकता हूँ कि आज किंगफिशर आया था। खोज रहा था कुछ... बीच झाड़ी में पहली बार उसकी अस्थिरता देखी..। वह फिर चला जाता और बहुद देर बाद ...
6 comments:
Thursday, December 13, 2012

ब्लू रेनकोट.....

›
बहुत देर से सोने के बाद भी सुबह बहुत सुबह हो गई.. यह सुबह धुंध लिए हुए थी.. पौ फटने को थी... सुबह इतनी खूबसूरत थी कि चुभ रही थी। मैंने सिगरे...
2 comments:
Wednesday, September 5, 2012

तीसरा आदमी...

›
शायद शब्द लिखना आसान हो... मैं लिख देता हूँ..। हिचकिचाहट भरी हुई है... कि उस शब्द के मानी मैं जानता हूँ क्या? ’रचना...’ लो लिख दिया। मैं रच...
6 comments:
Tuesday, September 4, 2012

coffee and cigarettes

›
खाली तीन कुर्सी सामने थी। एक गंदगी सी केफे के टेबल पर थी। वेटर एक शुगर फ्री ले आया था। कहने लगा कि तीन कॉफी पीने पर यह फ्री है आप इसे घर ले ...
3 comments:

›
खाली तीन कुर्सी सामने थी। एक गंदगी सी केफे के टेबल पर थी। वेटर एक शुगर फ्री ले आया था। कहने लगा कि तीन कॉफी पीने पर यह फ्री है आप इसे घर ले ...
Saturday, July 28, 2012

त्रासदी... कहानी का भाग तीन.. "रोशनी..."

›
रोशनी... उसने आँखें खोली तो देखा उसके बगल में रोशनी बैठी हुई है। कमरा नम्बर एक सौ तीन की लड़की। उसे कुछ देर विश्वास नहीं हुआ... उसने अपने ...
1 comment:
Thursday, July 26, 2012

धुंध..

›
Sona pani.. फिर पहाड़ों पर... बहुत थका हुआ काठगोदाम से एक गाड़ी लेकर पहाड़ों पर निकल गया। ड्रायवर शांत था... मैं अपने सपनों से बाहर निकलकर ह...
2 comments:
‹
›
Home
View web version

परिचय

My photo
मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
View my complete profile
Powered by Blogger.