Saturday, May 25, 2013

वक़्त बजता है...

दिन बीतते हैं.. समय, दिन बीतने की गति में कभी कभी बहुत धीमा सुनाई पड़ता है। फिर एक वक़्त आता है जो कभी कटता नहीं है... समय कान में बजता है। अगले ही पल लगता है कि कुछ दिन यूं ही सोते हुए बीत गए हैं.. आज की तारीख़ देखने पर अचरज होता है, हिसाब लगाने बैठो तो पुराने दिन धुंध में ढूबे हुए लगते हैं.. कुछ पकड़ में आता है कुछ छूटा रहता है हमेशा के लिए..। क्या सच में कुछ छूट जाता है हमेशा के लिए.? क्या इस जनम में उससे फिर वास्ता नहीं पड़ेगा? इन सबके बीच में हृदय अपनी एक धड़कन खो देता है.... चलते-चलते हाथ माथा सहलाने लगता है... अगर रुके हो तो चल देने का मन करता है... चल रहे हो तो वहीं बैठ जाने की इच्छा सताती है... गहरी सांसा लेने से आँखों के किनारे पानी नज़र आता है... ऎसा तब होता है जब कभी तुम्हारा नाम कहीं दबे हुए के बीच में से छूट जाता है... मेरी कविता...। अपनी कहानीयों और नाटकों के बीच कहीं मैंने तुम्हें भीतर दबा रखा है... छुपाया नहीं है। आहट है.. दरवाज़े पर अचानक खट होती है.. मुझे मेरे पुराने दरवाज़े याद हो आते हैं... वह तुम्हारा खूबसूरत चहरा हर आहट पर...। मैं तुम्हें अब नहीं लिख सकता... तुम्हारे साथ खरीदे मेरे जूते अब मुझे काटते हैं.. उनमें रहकर बहुत दूर चला नहीं जाता..। यह जूते तब भी काटते थे मुझे... पर लगता था वह जूता ही क्या जो हर चाल में अपनी उपस्थिति दर्ज ना कराए...। अब अनुपस्थित है मेरा पुराना घर.. इस नए घर में...। हम किस तरह जीना सीख़ रहे होते हैं??? किसी की कमी की टीस जब भी होती है हम उसे अपनी जीने की आदत में शुमार कर लेना चाहते हैं...। इस वक़्त भी लिखते हुआ तीव्र इच्छा हो रही है कि अभी पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों को उठाऊं और एक कविता लिख डालूं... मैं उसे महसूस कर सकता... सूंघ सकता हूँ... मुझे पता है दरवाज़े के दूसरी तरफ कोई है... बिना आहट के वह सिरझुकाए वह मेरे कोरे पन्ने की तरफ बढ़ने का इंतज़ार कर रही है....। कविता से बिछड़ने के आखरी दिन मुझे याद हैं..। वह लंबी शामें.. गहरी रातें... नीरस दौपहरें.... मैंने उन कोरे पन्नों के सामने बिताई हैं...। कितनी क्रूरता थी... जब अचानक उसने आना बंद कर दिया था...। दूसरे जब कविता सुनाते थे तो मुझॆ लगता था कि यह मेरी ही कविता है जो उसके साथ रहने लगी है। मैं अपने पुराने लिखे में उसके होने को सहता था। अब फिर से उस कोरे पन्ने के पास जाने की इच्छा मैं दबा देना चाहता हूँ। कुचलना चाहता हूँ उसे क्योंकि मुझे पता है कि वह फिर चली जाएगी... और शायद इस बार मैं उसका जाना बर्दाश्त नहीं कर सकता...। मैं अपनी कहानियों में.... अपने नाटकों में उसे पा लेता हूँ... हम कुछ देर बैठकर बातें करते हैं... साथ चाय पीते हैं... और मैं उसे कुछ देर में चले जाने के लिए कहता हूँ..। वह बुरा नहीं मानती है और मुझे बहुत दुख नहीं होता है...। वह जानती है कि पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों में अभी भी उसकी जगह है... पर वह अपनी जगह खोजती नहीं है... मैं उन कोरे पन्नों का ख़ालीपन उस सामने आने नहीं देता। कोई सीढ़ीयां चढ रहा है...। हल्के कदमों की आहट सुनाई दे रही है... वह दरवाज़े के बाहर खड़ी है... मैं उसकी सांसे महसूस कर सकता हूँ...। मैं जानता हूँ वह दरवाज़ा नहीं खटखटाएगी... पर वह है वहीं...। मेरी भी चाय पीने की इच्छा है... मैं भी दो बातें सुनना चाहता हूँ...। मैं दरवाज़ा खोलने जाता हूँ......।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल