Thursday, October 19, 2017

happy diwali.. 19-10-17


आज दिवाली है। मैंने लगभग हर दिवाली पर अपने लिखने का सिलसिला बनाए रखा है। पहले दिवाली पर अकेले रहना अपनी इच्छा से नहीं था... मैं चाहता था कि कोई आए। पर हर बार दीवाली लगभग अकेले ही मनानी पड़ी। अब कुछ दोस्त आ सकते हैं... मैं कहीं जा सकता हूँ... पर मैंने तय किया है कि नहीं अकेले ही रहता हूँ। यह चुनना सब बदल देता है... चुनने से उदासी ख़त्म हो जाती है... चुनने में संगीत प्रवेश करता है और सारा कुछ बहुत सादग़ी लिए हुए होता है। शायद यह उम्र का भी तकाज़ा है... पर आज का दिन मैं बड़े आनंद में हूँ।

दीवाली पहले कितनी महत्वपूर्ण होती थी... स्कूल की लगभग दो महीने की छुट्टी होती थी, कश्मीर में पिताजी बहुत सारे पटाख़े लाते थे.. पड़े पटाखों की आवाज़ से मैं रो रहा होता था। मुझे फुलझड़ी, अनार और साँप बड़े सही लगते थे। बहुत दिनों तक अपने पटाख़े बचाए रखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। फिर होशंगाबाद की राम लीला... हम खुद अपनी राम लीला खेलते थे मोहल्ले में.. दोपहर में.... कोई देखने वाला नहीं होता था। बस हम कुछ चार पांच दोस्त.. राजू और छोटू हमारे पड़ोसी थे.. पंडित.. उन्हें पूरी रामलीला ज़बानी रटी थी तो ज़ाहिर है राम और लक्षमण वही दोनों बनते थे.. मेरा बड़ा भाई भरत और मुझे हमेशा शत्रुघन बना देते थे...। शत्रुघन की कोई भूमिका नहीं होती थी...  मैं बस धनुष बांड लिए... कभी राम के तो कभी भारत के आगे पीछे घूम रहा होता था। फिर हम ग्राऊंड पर कुभकरण वध, रावण वध देखने जाते थे। मुझे सबसे मज़ा आता था अपने दोस्तों को राम की सेना या रावण की वानर सेना में पहचाना। सारे काले बच्चे रावण की सेना में और सारे गोरे बच्चे राम की सेना में होते थे....। उस वक़्त यह बात कभी अख़रती नहीं थी... अभी यह लिखते हुए भी अजीब लग रहा है। अजीब है कि राम की सेना बंदरों की होती थी... गोरे बंदर... जबकि बंदर तो काले भी हो सकते थे। और रावण तो प्रगाड़ पंडित था ... उसकी सेना में गोरे बच्चे ज़्यादा सही लगते... पर बुरा आदमी गोरा कैसे हो सकता है। अजीब था यह सब। मैं कुछ दोस्तों को पहचान लेता तो नाम से चिल्लाता और वह सब अपना मुंह छुपाते फिरते....। रावण की सेना के बच्चों को पूरे साल चिढ़ाया जाता... राम के बंदरों को कोई कुछ नहीं कहता था।

आज कभी-कभी सोचता हूँ वह हेमंत, निखिल, हेमराज, पटवा, राजू, मीनेष, बंटी, विक्की कहाँ होगें... जीवन की किस जद्दोजहद में व्यस्त होंगे? आज सभी दीवली पर नए कपड़ों में होंगे... खुश होंगे।

मुझे अब बहुत ही तकलीफ होती है जब लोग पटाख़े छोड़ते हैं... हमारी संवेदनशीलता कितनी ज़्यादा ख़त्म हुई पड़ी है कि जिन प्राणियों के साथ हम यह धरती पर रहना बांट रहे होते हैं हम उनकी कतई फिक्र नहीं करते हैं। कैसे हम ऎसे हैं... मुझे सच में यक़ीन नहीं होता... सारे पक्षी... जानवर.. उस सबके कान कितने सेंसटिव होते हैं हर एक आवाज़ को सुनने के लिए और हम उनके बग़ल में बम फोड़ देते हैं। मैं इन त्यौहारों से भर पाया। बचपन, बचपन था... अब यह सब उबा देता है... उबा नहीं तक़लीफ से भर देता है।

अभी अभी पूरी बनाई थी.... खूब इच्छा हो रही थी पूरी ख़ाने की...। अब गोल पूरिया नहीं बनती है.. और बहुत दिनों बाद बनाई थी सो वो फूली भी नहीं। पर स्वाद ठीक था। चाय और पूरी... आह!!!

दीवाली पर लिखने का सिलसिला कुछ शुरु हुआ लगता है... आशा है यह चलता रहेगा।

Sunday, February 19, 2017

पिता और पुत्र....

पिता और पुत्र....


जवाब चाहिए। अगर जवाब मिलते रहें...! तो उन जवाबों के जो सवाल हैं वह भीतर रेंगते हुए पकड़े जाते हैं। सवाल बनाना आसान है.......। शायद उन जवाबों के पहले भी वह सवाल रेंग रहे होगें भीतर कहीं...  पर हल्का-सा खुजा लेने से वह सवाल गायब हो जाते होगें।
बहुत सुबह का वक़्त है... बाहर बारिश हो रही है। पूरा अस्पताल ख़ाली सा मालूम होता होता है। मकखीयाँ भिनभिना रही हैं। वह एक बेंच पर बैठे उंघ रहा है। एक नर्स की टाप सुनाई देती है।
’तबियत थोड़ी संभल रही है।’  नर्स कहती  है।
’जी?’ वह पूरी आँख नहीं खोल पा रहा था।
’आपके पिताजी है ना?’
’हाँ, क्या हुआ?’
’उनकी तबियत थोड़ी संभल रही है।’
’कौन संभाल रहा है?’
नर्स इस सवाल पर कुछ देर चुप उसे देखती रहती है... फिर वह आगे के कमरे में ओझल हो जाती है। वह अपने हाथों को देखता है। दाहिने हाथ पर अपना बांया हाथ रखता है.... थपथपाता है। ’क्या हम ख़ुद को सांत्वना दे सकते हैं? क्या हमारे एक हाथ से दूसरे हाथ को सहलाकर हम ठीक महसूस कर सकते हैं?’
’अरे आप अभी तक यहीं बैठे हैं?’ नर्स की आवाज़ आती है...। वह एक कमरे से निकलकर दूसरे कमरे में जाते हुए के बीच रुकी हुई उसे दिखती है।
’जाईये अपने पिताजी को देख लीजिए...।’ यह कहकर वह फिर ओझल हो जाती है।
वह कमरा नंबर 301 के सामने ख्ड़ा है। हरे रंग के पर्दे के बीच से उसे पिताजी के पैरों की तरफ का हिस्सा दिख रहा है। तीसरा माला... कमरा नंबर 301... उसके लगभग सारे किराय के घर तीसरे माले के थे। वह हमेशा कोशिश करता अपना माला बदल लेने की पर नहीं। उसने लगभग जीवन तीसरे पायदान पर खड़े होकर जिया है। हरे पर्दों से होता हुआ वह पिताजी के बग़ल में पड़े पलंग पर बैठ गया। पिताजी पहाड़ी थे.. चहरे पर जिए हुए के, सहे हुए के, खुशी के, उल्लास के निशान मानों किसी ने खुरच-खुरचकर बनाए हों। ठीक-ठीक क्या हुआ है डॉक्टर बता नहीं पाए.. बस शरीर फूलने लगता था जो अब थोड़ा सामान्य सा दिख रहा है। पिताजी की आँखें बंद थी... सांस बहुत धीमी चल रही थी। उसने देखा पिताजी की भौ बार बार तन जा रही है। वह उनके करीब गया और धीरे से कहा..
’पापा... आप कैसे हैं? पापा?’
सब कुछ शांत था। बाहर बारिश की आवाज़ बहुत तेज़ सुनाई दे रही थी। उसने देखा पलंग के नीचे उनकी चप्पलें एक के ऊपर एक चढ़ी हुई हैं... उसने उन चप्पलों को तरतीब से जमा दिया। कुछ देर में देखा पिताजी की भौं का तनना बंद हो गया है।
अभी करीब एक हफ्ता हुआ है यहां आए हुए। पिताजी से आखरी बार बात दस दिन पहले हुई थी.. वह उसे शादी करने के लिए कह रहे थे। वह अपने कामों में बहुत व्यस्त था सो बहुत सी पिताजी की बातों को वह नज़र अंदाज़ कर दिया करता था। पिताजी भी यह बात जानते थे तो वह अपनी बात को दो से तीन बार दौहराते थे। इस बात से वह हमेशा चिढ़ जाता था। आखरी बार उसने कहा था कि ’अभी व्यस्त हूँ पापा, कल सुबह फोन करता हूँ।’ वह भूल गया था और एक हफ़्ते पहले पड़ोसी फिरोज़ का फोन आया कि ’मैं तुम्हारे पिताजी को लेकर अस्पताल जा रहा हूँ... तुम जितनी जल्दी हो सके आ जाओ।’  उसने फिरोज़ से तुरंत पूछा ’कितनी ख़राब है तबियत...?’ फिरोज़ ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसने कहा ’ठीक है आता हूँ।’ दो दिन की छुट्टी की अर्ज़ी लगाकर वह यहाँ चला आया। अभी एक हफ़्ता हो चला है और पिताजी ने अभी तक आँखें नहीं खोली हैं। फिरोज़ पड़ोसी है।  वह और उसकी पत्नी उसके पिता के बहुत क़रीब हैं... इतने कि उसे कई बार लगता है कि वह पड़ोसी है... और फिरोज़ उनका बेटा। फिरोज़ की टेलर की दुकान है, उसकी पत्नी हुमा ग़रीब बच्चों को फ्री में पढ़ाती है। उसके आने के बाद फिरोज़ सुबह शाम पिताजी को देखने आता है... और हुमा नाश्ता ख़ाना लेकर। वह एक हफ़्ते से अस्पताल में ही सो रहा था। उसके पास उतने कपड़े भी नहीं थे.. सो कुछ कपड़े फिरोज़ ने अपनी दुकान से लाकर दे दिये। शहर से उसके दोस्तों के फोन आते रहते हैं... पर उतने नहीं जितने की वह अपेक्षा रखता है... उसे लगने लगा कि उसके यहाँ आते ही बाक़ी सब अपनी दुनियाँ में व्यस्त हो चले हैं... उसका होना ना होना बहुत मानी नहीं रखता है। कुछ दोस्तों से वह फोन पर झगड़ भी लिया सो उनके फोन भी आना कम हो गए। उनके मेसेज आते हैं जिनके जवाब देने से वह कतराने लगा है। अभी-अभी उसके जीवन में निशा का प्रवेश हुआ था... पर वह इतना अभी-अभी था कि वह उसे ज़्यादा फोन या मेसेज करने से झेंपता था। अगर निशा कुछ पूछती तो वह बड़ी आत्मीयता से उसका जवाब देता। उसे यूं ज़रुर पता लगाने लगा था कि वह जितना ख़ुद को दुखी दिखाता, निशा उसके कुछ कदम ओर नज़दीक आ जाती। वह कितना दुखी है इसका अंदाज़ा उसे नहीं था... वह अपने पिता की मृत्यु की इतनी बार कल्पना कर चुका था कि उसे लगने लगा था कि यह उसके साथ कई बार हो चुका है... पर उसने इस तरह अस्पताल में इंतज़ार करने के बारे में कभी नहीं सोचा था। इस वक़्त वह क्या करे....? दुखी रहे... या ... हंस बोल सकता है?

अगले दिन वह बाहर  गांधी पार्क में जाकर बैठ गया। आज धूप निकली हुई थी। उसने फोन में निशा का नंबर निकाला पर फोन नही किया... बहुत देर तक वह निशा का नाम अपने फोन पर देखता रहा। काश निशा उसकी चिंता में यहाँ आ जाए... और उसके साथ प्रेम से वह इस अस्पताल में रहने लगे, उसका सारा ख़ालीपन उसकी सारी चुप्पी को वह मसल कर अस्पताल के बाहर फेंक दे... इस विचार पर उसे हंसी आ गई। वह वापिस उस नीरस अस्पताल में नहीं जाना चाहता था। उसने फोन वापिस अपनी जेब में रख लिया। वह गांधी पार्क से अस्पताल की सीलन भरी इमारत देख सकता था। अस्पताल को देखते ही वह थक जाता। पार्क में बारिश के बाद की धूप से सारी हरी घांस धुल गई थी... चारों तरफ चिड़ियाओं के चहचहाने का कलरव था। सामने की बेंच पर एक लड़की बैठी थी... उसके कान में हेडफोन थे.. और वह अपना टिफिन गोदी में रखे दो रोटी और अचार को देख रही थी। वह नीला जींस और कत्थई कुर्ता पहने हुए थी। कुछ देर निहारने के बाद उसने टिफिन को वापिस बंद कर दिया। वह ऎसा कभी नहीं करता था पर उसकी आँखें उस लड़की पर जैसे फंस के रह गई थीं... वह चाह रहा था कि अपनी निग़ाह हटा ले.. या उठ कर चला जाए... पर पहली बार उसे लगा कि उसपर उसका कोई बस नहीं था। उस लड़की ने टिफिन से सीधा उसकी तरफ देखा। वह झेंप गया पर वह अपनी निग़ाह नहीं हटा पाया... वह लड़की उठकर पार्क से बाहर चली गई। यह उसको क्या हो गया था? वह ऎसा नहीं था... उसे लगा उसे  उस लड़की से माफी मांगना चाहिए... वह सड़क की तरफ उसे ख़ोजता हुआ पार्क से बाहर निकला तभी फिरोज़ उसे अस्पताल से बाहर आता हुआ दिखा।
’अरे मिंया तुम भीतर नहीं थे..? यहाँ क्या कर रहे हो?’ फिरोज़ आज थोड़ा खुश था।
’बाहर धूप सेकने आया था।’
’अरे अंकल को इस तरह अकेला मत छोड़ो... मुझे फोन कर दिया होता मैं आ जाता।’
इस बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपने बाप का कितना ख़्याल रखे यह उसे फिरोज़ से नहीं सुनना था।
’मैंने डॉक्टर से पूछा.. कह रहे थे तबियत थोड़ी सभल रही है..। अंकल सही हो जांए बस...।’
तभी उसे वह लड़की वापिस पार्क में जाती हुई दिखी। फिरोज़ ने देखा लिया कि वह उस लड़की को देख रहा हूँ..।
’क्या हुआ? तुम जानते हो उसे?’
’हाँ.. मैं जानता हूँ। तुम पापा के पास जाओ मैं अभी आता हूँ।’
यह कहकर वह वापिस पार्क की तरफ लपका। फिरोज़ उसे पार्क में जाता हुआ देखता रहा फिर पलटकर अस्पताल की ओर चला गया।
उसने देखा कि वह लड़की अब उस बेंच पर बैठी है जिसपर वह बैठा था...। धूप तेज़ हो चली थी और जिस बेंच पर वह पहले बैठा था अब वहाँ छाया आ गई है। वह सीधा उस लड़की की तरफ गया। वह लड़की अपना टिफिन खोलकर खा रही थी... अब रोटी और अचार के साथ उसके पास कुछ सेंव भी थे। वह उस लड़की के सामने नहीं बग़ल में जाकर खड़ा हुआ।  
’जी नमस्ते.. मैं यहाँ बैठा था और आप सामने..।’ उसने हिचकिचाते हुए अपनी बात शुरु की..
’मैं आपको देख रहा था.. पर उस नज़र से नहीं .. मैं तो बस नज़र नहीं हटा पाया था...’
तभी लड़की ने उसकी तरफ देखा और चौंक गई...। अभी भी उस लड़की ने हेडफोन पहने हुए थे... वह उसकी कोई भी बात नहीं सुन रही थी। उस लड़की ने हेडफोन निकाले...।
sorry.. मुझे लगा आप मुझे सुन रही हैं।’ वह झेंप गया।
’क्या हुआ? आप कुछ कह रहे थे?’
’हाँ.. मैं कह रहा था कि.... मैं असल में वैसा आदमी नहीं हूँ।’
’कैसे आदमी?’
’मैं आपको देख रहा था।’
’हाँ...’
’मैं असल में आपको देखे जा रहा था... तो.. मैं बस
sorry कहना चाहता था।’
उस लड़की को कुछ समझ में नहीं आता कि वह क्या कह रहा है... वह उसे ताकती रहती है। वह अपनी बात कह चुका था.. । खिसियानी मुस्कुराहट के बाद वह वापिस अस्पताल की तरफ चल दिया।
फिरोज़ पिताजी के की पास रखे पलंग पर लेटा हुआ था। उसकी आँख लग गई थी। अचानक उसे फिरोज़ का पिताजी के करीब होना इतना स्नेह पूर्ण लगा कि वह कुछ देर दरवाज़े के पास खड़ा होकर दोनों को देखता रहा। तभी नर्स भीतर आई, उसने एक पर्ची उसके हाथ में थमा दी कि यह दवाईयाँ ले आईयेगा शाम तक, यह कहकर वह चली गई। नर्स की करकश अवाज़ से फिरोज़ की नींद खुल गई।
’तुम कब आए।’ फिरोज़ अपने सोने पर शरमा रहा था... ’नींद लग गई अचानक...’
’तुम आराम करो मैं दवाईयाँ ले आता हूँ।’
’अरे .. मैं भी साथ चलता हूँ... वहीं से मैं निकल जाऊँगा... दुकान पर बहुत काम है।’  
दोनों साथ दवाई लेने चल दिए। किसी ने एक दूसरे से कोई शब्द नहीं कहा। दुकान पर दवाईयाँ लेने के बाद फिरोज़ ने उससे कहा...
’सुनो.. मैंने डॉक्टर से पूछा था कितना वक़्त लगेगा...? मतलब अभी क्या स्थिति है? वह ठीक-ठीक कुछ कह नहीं पा रहे हैं... बहुत वक़्त भी लग सकता है... तुम चाहो तो वापिस शहर जा सकते हो.. अगर कुछ होगा तो मैं तुम्हें ख़बर कर दूंगा। तुम्हारा बहुत काम अटका पड़ा होगा।’
वह फिरोज़ को देखता रहा। मन में एक रिरयाती सी इच्छा जागी कि काश मैं फिरोज़ होता।
’नहीं.. ऎसा कुछ काम नहीं है।’ उसने झेंपते हुए कहा।
’देख लो .. फिर हम हैं ही यहाँ।’ यह कहकर फिरोज़ चल दिया। उसने पीछे से फिरोज़ को आवाज़ दी.. फिरोज़ मुड़ा और उसने कहा ’थेंक यू फिरोज़... ।’ फिरोज़ मुस्कुराया और भीड़ में गायब हो गया।
वह वापिस अस्पताल आ गया पर  कमरा नंबर 301 के भीतर में जाने की हिम्मत नहीं हुई.. वह बाहर की बेंच पर निढ़ाल पसर गया। दवाईयाँ उसने अपने बगल में रख दीं। ’कितना वक़्त लगेगा?... बहुत वक़्त भी लग सकता है....’ यह वाक़्य उसके दिमाग़ में घूम रहे थे... ’वक़्त किसमें?’ वह सोचने लगा कि क्या उसके शरीर से इंतज़ार की बू आ रही है। क्या उसको देखकर यह लग रहा है कि पिताजी जल्दी से चले जाएं और वह वापिस शहर की अपनी दुनियाँ के अप-डाऊन में व्यस्त हो जाए...। उसे खुद से ख़ीज होने लगी, वह सोचने लगा कि चले जाए से क्या मतलब है...?  वह ’पिताजी मर जाएं’ कहने में क्यों हिचकिचा रहा है???  
एक थड़ से कॉरिडोर का आख़री दरवाज़ा खुला और वही पार्क वाली लड़की... बाहर निकलकर कुछ तलाश रही थी। तभी उसके फोन में मैसेज की छोटी टिंग हुई। उसने देखा निशा का मैसेज है ’कैसे हो?’ उसने फोन को वापिस जेब में रख दिया। तब तक वह लड़की उसके पास तक आई...
’डॉक्टर कितने बजे तक आते हैं?’
’वह सुबह और शाम को आते हैं... ।’ उसने तपाक से उत्तर दिया।
वह लड़की एक थकी हुई मुस्कान देकर वापिस कॉरिडोर के अंतिम कमरे की तरफ चलने लगी।
’कोई परेशानी हो तो... मैं कोई मदद कर सकता हूँ?’
वह लड़की रुक गई।
’आप एक बार आकर दीदी को देख लेंगें...?’
’जी बिल्कुल।’  वह तुरंत उठकर उसके साथ चलने लगा।
 ’दीदी अजीब सी सांसे लेने लगी हैं।’
वह दोनों कुछ तेज़ी से चलने लगे। जैसे ही वह कमरे के भीतर पहुचा उसे लगा कि वह 301 नंबर कमरे में है.. बिल्कुल हू ब हू वैसा का वैसा कमरा.. फिर उसे लगा शायद अस्पताल के कमरे सारे एक जैसे ही होते हैं..। सबसे पहले उसकी निग़ाह ख़ाली बिस्तर पर गई.. जहाँ वह लड़की सोती होगी। वह सोचने लगा क्या वह भी वैसे ही दीवारें ताकती होगी रात भर जैसे वह ताकता रहता है।
’अरे.. अभी तो ठीक है.. मैं बैकार में घबरा गई थी।’  उसकी दीदी गहरी नींद में थी।
’कोई नहीं.. होता है ऎसा..’
वह उसकी दीदी के बिस्तर के पास गया... उसकी दीदी की उम्र उस लड़की से बहुत ज़्यादा लग रही थी...। उसने देखा उसकी दीदी की एक आँख के पास कुछ गहरे चोट के निशान हैं... फिर उसकी निग़ाह हाथों पर भी गई.. वहाँ भी कत्थई दाग़ थे।
’मेरा नाम अतुल है।’ उसने उससे कहा...।
’मैं गरिमा...।’

गरिमा ने चद्दर से दीदी का हाथ ढ़ाक दिया।

अतुल कमरा नंबर 301 की दीवारें ताक रहा था। तभी पिताजी को ख़ासी आई... वह चमक कर उठ बैठा। ख़ास लेने के बाद पिताजी वापिस शांत थे।उसे याद ही नहीं रहा कि बगल के बिस्तर में पिताजी पड़े हुए हैं। उसे हमेशा ख़ुद को याद दिलाना पड़ता है कि पिताजी हैं.... वह हर बार भूल जाता है। जब वह नहीं रहेगें तब भी उसे लगेगा कि वह शायद हैं अभी भी.... तो दुख़ कैसे होगा? या किस तरीक़े का होगा दुख़? वह पिताजी के बहुत करीब जाकर खड़ा हो गया। उनके एक हाथ को अपने हाथ में लिया और कस कर दबाया... जितना कस कर वह दबा सकता था। एक गुस्सा था...ख़ीज...। काश वह डांट देते... उसके बड़े होने में उसके पिताजी लगातार बदलते जा रहे थे... वह उतने नहीं, जितने उनके उससे होने वाले संवाद.. वह एक समय तक हक़ से डांटते थे.. फिर वह अपनी बात नरम सुर में कहने लगे... फिर मनऊव्वल जैसा कुछ सुर शुरु हुआ था .... और बाद में उनके लगभग हर वाक़्य की शुरुआत होती कि ’बेटा एक बात कहूँ तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा......’ और वह बड़ा हो गया था। बाप हमेशा बाप क्यों नहीं बना रहता... काश वह अपने बाप के लिए कुछ ओर जगह ख़ाली रखता... ऎसी जगह जिसमें वह जब मन चाहे... जितनी भी देर रह सकते थे।
रात के एक बज रहे होंगे। वह कमरा नंबर 301 के बाहर की बेंच  पर बैठा था। उससे भीतर रहा नहीं गया। उसने फोन निकाला और निशा को मैसेज किया ’मैं ठीक हूँ।’ फिर बहुत देर तक अपने भेजे मैसेज को ताकता रहा.....।
’आप सोए नहीं?’ गरिमा कब आई उसे पता भी नहीं चला। उसने अपना फोन जेब में रखा... और बेंच के एक कोने में खिसक गया। गरिमा कुछ झिझक के बाद उसके बग़ल में  बैठ गई।
’भीतर नींद नहीं आती है... सो बाहर आ जाता हूँ... बाहर आते ही लगता है कि यहाँ क्यों आ गया? भीतर कमरे में पड़े रहने में कोई अंतर नहीं है.... वहाँ वक़्त का रैंगना सुनाई देता है... और यहाँ वक़्त फैला पड़ा है और दिखाई देता है। भीतर दीवारे ताकता हूँ और यहाँ ज़मीन पर पड़े रोशने के टुकड़ो को।’
गरिमा इसका कोई जवाब नहीं देती। अतुल अपनी ही कही बात से असहज होने लगता है...।
’मुझे तो यहाँ आकर अजीब सी राहत मिली है... जैसे मैं ऎसा कुछ चाहती थी।’ गरिमा अचानक अतुल के स्वर में बोलने लगती है।
’मैं समझा नहीं...’ अतुल उसे देखता है।
’मैंने बहुत सुरक्षित जीवन जिया है... छोटी हूँ तो बहुत प्रेम मिला सबका.. जो भी करना चाहती थी सब की छूट... पर भीतर मैं हमेशा किसी त्रासदी का इंतज़ार करती रहती थी। कुछ ऎसा जो मुझे झंझोड़ कर रख दे...।’
तभी एक नर्स हाथ में ट्रे लेकर निकली, जब तक वह ओझल नहीं हो गई दोनों अजनबीयों की तरह चुप बैठे रहते हैं।
’आपको भी नींद नहीं आ रही थी?’ अतुल ने पूछा..
’नहीं मैं सो सिगरेट पीने निकली थी। आपको देखा तो रुक गई। आप पीते हैं?’
’नहीं...। पर मैं आपके साथ चल सकता हूँ।’
अतुल जाने के पहले एक बार कमरे में झांककर देखता है। सब कुछ वैसा का वैसा ही है। झांकते ही उसे लगा कि वह कितना छिछला है... वह क्यों गरिमा को देखाना चाहता है कि मैं कितना कैयरिंग हूँ।
दोनों बाहर लॉन में टहलने लगते हैं। कुछ देर में गरिमा को लॉन की छोटी मुडेर दिखती है और वह उसपर बैठ जाती है।
’मैं चलत-चलते सिगरेट नहीं पी सकती हूँ.. मुझॆ बैठना होता है।’
अतुल बैठता नहीं है... वह उसके सामने खड़ा रहता है। रात में बाहर बहुत कम लोग थे। पीछे एक चाय की दुकान पर कुछ लोगों की बातचीत सुनाई दे रही थी। गरिमा ने जैसे ही सिगरेट जलाई.. अतुल पहरेदार की तरह इधर उधार देखने लगा कि कोई आ तो नहीं रहा है इस तरफ।
’किसी को कोई फर्क़ नहीं पड़ता है।’ गरिमा ने पहले कश का धुंआ छोड़ते हुए कहा। अतुल  मुस्कुरा दिया...।
’क्या हुआ है आपकी दीदी को..?’
’सास बहु और साज़िश... मेरे घर में, माँ पिताजी को पता चलेगा तो बहुत मुश्किल हो जाएगी.. सो दीदी के साथ सिर्फ मैं हूँ।’
’अरे पर यह बहुत... आपने पुलिस में कंप्लेन नहीं की..।’
’हमने अस्पताल में कहा कि दीदी सीढी से गिर गई थीं। पता नहीं मैंने आपको यह क्यों बताया।’
अतुल सोचने लगा कि अगर गरिमा उसके पिताजी के बारे में पूछेगी तो वह क्या कहेगा। उसे बिल्कुल  भी नहीं पता था कि असल में पिताजी क्या किया करते थे... बस कुछ महीने पहले वह बाथरुम में गिर गए थे... इस घटना के अलावा फिरोज़ ने भी उसे ज़्यादा कुछ नहीं बताया है.. ना ही अतुल ने जनने की कोशिश की।
’मुझे यूं लगता है जैसे कुछ रह गया था जो मैं कर नहीं पाया... अस्पताल में दीवारें ताकते हुए मैं अकसर उस एक चीज़ को खोजता रहता हूँ। कुछ रह गया है ख़ासकर पिताजी के साथ... पर क्या? मैं ख़ोज नहीं पाया हूँ।’ अतुल बुदबुदाता  हुआ बोल गया। गरिमा सिगरेट के कश के बीच उसे ताकती रही।
’आप क्या काम करते हैं?’ गरिमा ने बात पलटते हुए बोला... सब कुछ सहज, सामान्य करने की इच्छा से...। अतुल बहुत देर चुप रहा.... गरिमा ने हिचकते हुए फिर पूछा... ’आप क्या काम...?’
’मैं तुम्हारे लिए अतुल हूँ जो अपने बाप के मरने का इंतज़ार कर रहा है.... और तुम मेरे लिए गरिमा हो जो किसी त्रासदी के इंतज़ार में थी जो शायद अब उसके साथ हो रही है...। हमें इसके आगे कुछ जनने की ज़रुरत है?’
गरिमा चुप आँखों से उसे देख रही थी। उसकी सिगरेट ख़त्म हो चुकी थी। वह खड़ी हुई.. दोनों अपने-अपने एकांत में अस्पताल के भीतर घुसे और ओझल हो गए।
सुबह उठा तो निधी के तीन मिस्ड कॉल थे। उसने वापिस कॉल नहीं किया... यह अजीब टुच्चा सुख है.. किसी को छोटी तकलीफ देने में बड़ा सुख मिलता है.. नहीं सुख नहीं तसल्ली...। कोई बात करना चाह रहा है और आप नहीं कर रहे हैं...। वह फोन कर सकता था.. पर उसने नहीं किया। वह जब शहर में रहता था... तब वह अपने पिताजी को फोन कर सकता था.. पर नहीं किया.. उस नहीं किये का उसके पास कारण भी नहीं है... उस नहीं फोन करने में को तसल्ली भी नहीं है... फिर क्यों? अतुल अपने पिताजी के बिस्तर पर बैठे उनके हाथों को देख रहा था... उनकी हथेली में गुदी रेखाएँ... मोटी-मोटी उंगलियाँ। हल्की हल्की टपकती सी पीड़ा रिस रही थी। इन्हीं मोटी उंगलियों को पकड़कर वह स्कूल जाता था... सालों इन्हीं हाथों से खाना खाया करता था.. उंगलियाँ चाटा करता था। उसने अपने पिताजी की उंगलियों को अपने मुँह में रख लिया... ठंडी, बेस्वाद उंगलियाँ। कुछ भी पूरा नहीं है.. हर चीज़ अधूरी है.. पीड़ा भी इतनी नहीं है कि आँसू टपक पड़े.. तकलीफ भी इतनी नहीं कि सांस लेना मुश्किल हो... हर चीज़ छिछली सी अधूरी है। शायद इसका कारण है कि वह हमेशा से बचते हुए जीया है... वह बचना बहुत पहले सीख चुका था। उम्मीदों से... अपनों से... हार से और जीत से भी... बहुत दुख से बचते-बचते बहुत सुख भी चख़ नहीं पाया। अभी पिताजी की उंगलियाँ मुँह मे है.. पर पराई सी हैं... सारा अपनापन बह चुका है।
उस सुबह के बाद पिताजी की तबियत गिरती गई। डॉक्टर की सलाह पर पिताजी को सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया था। कमरे में कुछ मशीने कम हो गई थीं । फिरोज़ लगभग अपना वक़्त अस्पताल में ही गुज़ारने लगा था। गरिम रात को अपने कमरे से, 301 नंबर रुम के सामने रखी बेंच को देखती पर वहाँ कोई नहीं बैठा होता।
’अंकल की जब तबियत बिगड़ने लगी थी... अस्पताल आने के कुछ दिन पहले, मैंने कहा अतुल को बुला लेते हैं... पर अंकल ने कहा कि नहीं उसको मत बताना बेकार परेशान होगा।’ हुमा ने अतुल के सामने टिफिन खोलते हुए कहा...।
’मैंने फिर भी आने में देर कर दी....।’
’देखों अल्ला ने चाहा तो सब ठीक होगा।’ हुमा खाना परस कर टिफिन धोने बाथरुम में चली गई। फिरोज़ सामने चुपचाप खा रहा था। पिताजी की सांसो की आवाज़ कमरे में हर तरफ सुनाई दे रही थी।
’फिरोज़ तुमसे एक बात कहूँ....?’ अतुल ने कहा
’हाँ मियां.. बोलो..।’
’तुम ... ’
’क्या?’
’फिरोज़ तुम बहुत अच्छे आदमी हो...।’
’अरे मियां... हम सब अच्छे हैं।’
’तुम्हारा पिताजी पर मुझसे भी कहीं ज़्यादा हक़ है।’
उस रात बहुत ज़्यादा बरिश हुई थी। वह पिताजी के बगल वाले बेड पर  लेटे हुए सोच रहा था कि असल में वह फिरोज़ से क्या कहना चाहता था। वह असल में कहना चाहता था कि फिरोज़ तुम पिताजी को अग्नि देना.... उसी का हक़ बनता है... वह सच में यह चाहता था.. पर यह उसने फिरोज़ से कहा नहीं क्योंकि अगर वह फिरोज़ की जगह होता तो उसे चांटा मार देता... ’साला एहसान उतारना चाहता है।’ उसने गहरी सांस ली और उठकर बैठ गया। अपना फोन निकाला तो देखा रात के एक बज रहे हैं। उसने निशा को फोन लगाया। कुछ घंटी के बाद उसने काट दिया फिर खुद को कोसता रहा कि क्यों फोन लगाया.. उसके पास कुछ भी कहने को नहीं था। निशा का फोन वापिस आया...
’हेलो...’ उसने तुरंत उठाया..।
’अतुल... सब ठीक है... तुम ठीक हो?’
’हाँ.. सॉरी.. फोन लगाने के बाद टाईम देखा... सॉरी।’
’अरे कोई नहीं... ।’ निशा ने कहा....  अतुल की निग़ाह पिताजी के बेड पर गई, उसे लगा कि पिताजी उसे देख रहे हैं... । वह चोंक गया..  उसने डर से अपनी आखें बंद कर ली... फिर देखा... तो पिताजी वैसे के वैसे पड़े हुए हैं। अतुल का सिर उसके कंधो पर झूल गया।
’हेलो... अतुल ... आर यू देयर?’
’निशा.. ?’
’हाँ अतुल... ?’
’मैंने टाईम पहले देखा था... मुझे पता था कि एक बज रहे हैं... फिर भी मैंने तुम्हें फोन किया..। मैं झूठ बोल रहा था।’
’अतुल.. ठीक है.. इट्स ओके..।’
’मैंने तुमसे ओर भी कई झूठ बोले हैं...।’
’अतुल जाने दो अभी... हम यह सब बातें बाद में कर लेंगें।’
’नहीं.. सुन लो... कुछ दिन पहले तुम्हारा मैसेज आया था कि कैसे हो? मैं उसी वक़्त उसका जवाब दे सकता था। मैं ठीक था.. पर मैं चाहता था कि तुम समझो कि मैं पीड़ा में हूँ..। मैं अभी भी ठीक ही हूँ... मुझे नहीं पता इस वक़्त मुझे क्या महसूस करना चाहिए...? या जब पिताजी नहीं रहेगें तो मुझे कैसे बिहेव करना चाहिए..? मुझपर कुछ भी असर नहीं होता है। शायद मेरा स्वाद छिन गया है... मुझे सारे कुछ में एक जैसी नीरसता दिखती है। जिस घर में तुम आई थी वह किराय का घर है... जिस गाड़ी में मैं तुम्हें घुमाता हूँ वह मेरे दोस्त की है....मैंने तुमसे बहुत सारा झूठ कहा है.. मैं एक टुच्चा सेल्फसेंटर्ड आदमी हूँ जो सिर्फ खुद के बारे में सोचता है। अभी पिताजी मेरे बगल में पड़ा हैं.. इस पर भी मैं अपने बारे में ही सोच रहा हूँ... मैंने अपने दोस्तों के कहा कि तुम मेरे पीछे पड़ी हो... तुम्हारे साथ रहते हुए मैं दूसरी लड़कीयों से मिलता रहा हूँ....तुमने मेरे साथ सिर्फ झूठ जिया है।’
जब अतुल चुप हुआ तो सन्नाटा था। निशा ने कुछ नहीं कहा। कुछ इंतज़ार के बाद निशा ने फोन काट दिया। वह अपने पिताजी के बिस्तर पर गया... उनकी चादर हटाई और उनसे  लिपटकर रोने लगा... ।
रात कब बारिश बंद हुई उसे पता नहीं चला... कब वह पिताजी के बेड से अपने बेड पर आया उसे कुछ याद नहीं था। सुबह नर्स आई और उसने उसे झंझॊड़कर उठा दिया। नर्स के साथ कुछ दूसरे लोग भी कमरे में थे.. पिताजी का सिर चादर से ढ़का हुआ था। नर्स ने अतुल को खड़ा किया और पिताजी के पास ले गई। उसे समझ में आया कि पिताजी जा चुके हैं। नर्स ने बताया कि वह सोते हुए नींद में.... करीब चार बजे के आस पास चले गए थे। उसके बाद अतुल ने जो भी कुछ भी किया वह बहुत ही मेकेनिकल था... फिरोज़ को फोन करना.. कुछ  रिश्तेदारों को फोन पर इत्तला देना.. और अब जो बाक़ी रह गया था वह था इंतज़ार। फिरोज़ ने उससे कहा कि ’मैंने सारी व्यवस्था कर दी है... करीब एक घंटे में हम इन्हें घर ले जाएगें।’ अतुल कुछ देर एक कोने में बैठा रहा.. फिर उठकर बाहर निकल गया।
धूप बहुत भीनी-भीनी थी। बाज़ार रोज़ जैसा व्यस्त था। हर आदमी अपने संधर्ष में व्यस्त। रोड़ के दूसरी तरफ कुछ बच्चे समोसे ख़ाते हुए मस्ता रहे थे... उन्हीं के बगल में चाय की दुकान पर कुछ बूढ़े शांत बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। दवाईयों की दुकानों पर हमेशा की तरह भीड़ थी। दुकान में काम करने वाले हर आदमी को हर दवाई पता थी.. पर्ची देखते ही वह मक्खी की तरह भुनभुनाते हुए अपनी दवाई को ख़ोज लेते। कुछ लड़कियाँ साईकल पर स्कूल जा रही थीं। पेड़ो पर पक्षी चहचहाने रहे थे। ऊपर नीले आसमन में एक चील मंडरा रही थी... एक आदमी पीला स्कूटर चलाता हुआ सामने से गुज़र गया। सब कुछ सामान्य था। पैदा होने और मरने की बीच जीवन था और उसकी छोटी छोटी व्यस्तताएं थीं।
अतुल गांधी पार्क की बेंच पर बैठा था। अगल-बगल जो हो रहा था उसे बहुत कम सुनाई दे रहा था.. दृश्य आऊट ओफ़ फ़ोकस थे...।
’कैसे हैं आप?’ गरिमा बग़ल में खड़ी थी। अतुल रिरयाता हुआ मुस्कुरा दिया। उसकी आँखें सूख़ी हुई थी।
’आप ठीक हैं?’ गरिमा ने पूछा....अतुल ने सिर हाँ में हिलाया। गरिमा बग़ल में  बैठ गई।
’मैं आपको तलाशती रही.. पर आप मुझे दिखे ही नहीं। फिर मैं आपके कमरे में भी दो बार आई थी पर आप  सो रहे थे।’
’मुझॆ हमेशा से लगता था कि एक तैयारी चल रही है... जीने की रिहर्सल जैसा कुछ... जब तैयारी पूरी होगी तो हम जीना शुरु करेंगें..। अभी थोड़ी... मतलब अभे कहाँ...? मैंने तो अभी अभी पिताजी की उंगलियाँ छोड़कर चलना शुरु किया था। खुद अकेल जीना...? नहीं... मैं अभी तैयार नहीं हूँ।’
’अतुल ... ।’
’सॉरी... ।’
’तुम्हारे पिताजी को क्या हुआ है?’
’वह नहीं रहे...।’
’अरे... कब?’
’आज सुबह..।’
’तुम यहाँ.....?’
’वहाँ बैठा नहीं जा रहा था।’
दोनों शांत थे। गरिमा ने अपना हाथ उसके हाथों पर रखा..। उसके हाथ बहुत गर्म थे।
’मेरे पिताजी बचपन में ही चल बसे थे.. हमें तो कोई अंदाज़ा ही नहीं है। यह सांत्वना के लिए नहीं कह रही हूँ।’
’मैं समझता हूँ।’ अतुल ने कहते ही एक गहरी सांस भीतर ली..
’मैं उस रात तुमसे एक बात नहीं कह पाई थी... पर अब लगता है कि यह ठीक वक़्त नहीं है।’
’क्या बात?’
’जाने दो..’
’कह दो.. क्यों कि इसके बाद कोई ऎसा वक़्त शायद नहीं आए कि हम यूं साथ बैठें हों।’
’मैं बिलकुल खुश नहीं हूँ अपनी दीदी को ऎसा देखकर... जबकि बचपन, कॉलेज के वक़्त.. मैं हमेशा उससे बहतर होना चाहती थी...। मैं उसे चॉकलेट.. मिठाईया खूब खिलाती कि वह मोटी हो जाए और लोग मुझे ज़्यादा सुंदर कहें... मैंने क्रूर से क्रूर हरकत की हैं... अभी तो मैं बता भी नहीं सकती..। मुझे हमेशा लोगों ने ज़्यादा पसंद किया... हमेशा.. वह हारती रही.. पर उसे इस बात का बिल्कुल पता नहीं था कि मैं उसे हराना चाहती हूँ ...कैसे भी। वह अस्पताल में ऎसी स्थिति में भी मुझसे इतना प्रेम करती है कि यह देखकर मुजे बहुत ग्लानी होती है।’
गरिमा चुप हो गई। अतुल ने अपना दूसरा हाथ गरिमा के हाथों पर रख दिया। गरिमा अतुल को देख रही थी।
’अजीब यह है कि इस अस्पताल से निकलते ही हम फिर वैसे ही हो जाएंगें..।और ग्लानी... बहुत सी रोज़ मर्रा की उहापोह के नीचे गुम चुकी होगी... अगली किसी त्रासदी के इंतज़ार में।’
अतुल उठता... और जाने को होता है।
’अब तुम कहाँ जाओगे?’
’अस्पताल...।’
’नहीं यह सब ख़त्म होने के बाद....।’
’मन तो कहता है कि सबकुछ छोड़कर कहीं ओर चला जाऊं...। सारा पुराना साफ करके एक नया... खुला हुआ जीवन जीना शुरु करुं.... पर मैं जानता हूँ कि मैं ऎसा कुछ नहीं करुंगा..। मैं कायर हूँ..... ।’
अतुल पार्क से निकल जाता है। गरिमा उसे देर तक जाता हुआ देखती रही।





Tuesday, February 7, 2017

चलता फिरता प्रेत... (वेताल.. विलाप)


A man will be imprisoned in a room with a door that’s unlocked and opens inwards; as long as it does not occur to him to pull rather than push.

-Ludwig Wittgenstein



कक्षा आठवीं की परिक्षा अभी-अभी ख़त्म हुई थी। करीब रात के दस बज रहे होंगे... उसे नींद नहीं आ रही थी। सुबह पाँच बजे उसके पिताजी आने वाले थे। वह झेलम एक़्सप्रेस के बारे में देर तक सोच रहा था... उसे लगता कि उसके पिताजी असल में वेताल हैं और झेलम उनका सफेद घोड़ा है जिसपर सवार होकर वह सारे जंगल पार करते हुए उस तक पहुँचेंगे। फिर वह अपने पिताजी के चौड़े कंधो के बारे में सोचने लगा... कैसे वह उनके दोनों कंधों पर चढ़ जाएगा.. और फिर गहरी सांसों से उनके पास से आती हुई खुशबू को ख़ीचेगा भीतर... बहुत भीतर, जब तक कि उसका पेट ना भर जाए..... उसके पेट में कीड़े पड़ गए थे.. जिस वजह से वह हमेशा भूख़ा रहता था।  उसे लगता कि वह खुशबू सिर्फ उसे ही आती है और सिर्फ वह ही इसे सूंध सकता था। उसकी निग़ाह घड़ी पर गई... ग्यारह बजने को थे...   उसका बड़ा भाई गहरी नींद में था, माँ भीतर घर ठीक करने में व्यस्त थी।  जब भी उसके पिताजी आते उसे लगता कि थोड़ी ठंड बढ़ गई है... वह शायद हर बार अपने साथ अपना कश्मीर लेके आते थे। कश्मीर... नीला आसमान, सफेद बादल... उसे अचानक लगा कि असल में पिताजी के पास से कश्मीर की खुशबू आती है... हाँ... कश्मीर!!  उसने करवट बदली तो लगा पेशाब आ रही है... वह नहीं चाहता था कि पिताजी आए और वह बाथरुम में हो... सो वह तुरंत उठने को हुआ... पर वह हिल नहीं पाया... उसने फिर कोशिश की कि पेशाब करने चला जाए पर वह महज़ करवट बदल पाया.. उसने पूरा ज़ोर लगाया... एक चीख़ निकली और सब शांत हो गया।

अचानक उसकी नींद खुल गई... दोपहर का वक़्त था.. वह सीधा बाथरुम चला गया। बाथरुम की खिड़की से दोपहर की तपिश महसूस हो रही थी। वह आईने के सामने खड़ा हो गया... उसके सिर पर बाल नहीं थे... छोटी सी चोटी थी.. उसने अपने बाल दिये थे.. मृत्यु पर।  मृत्यु... ?  वह बाहर आया तो देखा वह पहाड़ो पर था... पूरा जंगल सूख़ा पड़ा था। उसने नज़रे घुमाई तो वह कश्मीर था... वीरान उजड़ा हुआ कश्मीर... आसमान नमी में ढूबा हुआ था.. वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता उसके पैरों के नीचे सूख़े पत्ते चर्मराने लगते।  उसने अपने दूसरी तरफ देखा... वह डल झील के किनारे-किनारे चल रहा था... डल में पानी बहुत कम था और वह काला पड़ चुका था। चार चिनार में चिनार के पेड़ सूख़े पड़े थे। अचानक उसे आवाज़ आई, यह तो उसके पिताजी की आवाज़ थी... वह उसे बुला रहे हैं...। आवाज़ मुगल गार्डन से आ रही थी... वह भागकर मु्गल गार्डन पहुँचा.... देखा पिताजी गार्डन के पानी में खड़े हैं... और उससे कह रहे हैं कि जल्दी आओ... मेरे कंधे पर चढ़ जाओ तस्वीर ख़िचानी है। वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था... पिताजी चिल्लाने लगे कहने लगे कि पानी इतना ठंडा है... मेरे पैर सुन्न हो रहे हैं जल्दी आओ। वह भागकर पानी में कूद गया। उसकी चीख़ निकल आई ... पानी सच में बहुत ठंडा था। वह भागकर अपने पिताजी से चिपक गया। चिपकते ही वह उन्हें सूंघने लगा.. वही खुशबू.... बिल्कुल वही कश्मीर की खुशबू... वह कश्मीर में ही था पर कश्मीर की खुशबू उसे अपने पिता से आ रही थी... तो क्या यह कश्मीर की खुशबू है जो पिताजी से आ रही है या यह पिताजी की खुशबू है जो पूरे कश्मीर में फैली हुई है? उन्होने लाल रंग का क्रोकोडायल की कंपनी का स्वेटर पहना था... सफेद पैजामा, पानी में घुटने-घुटने खड़े रहने के कारण, ऊपर चढ़ा हुआ था। ’चलो जल्दी... चढ़ जाओ कंधे पर मैं ज़्यादा देर रुक नहीं पाऊंगा... चलो...’  पिताजी ने उससे कहा...। उसने देखा सामने उसका भाई हाट-शाट का केमरा लिए खड़ा है... और उससे कह रहा है...’जल्दी कर ना.. देख पिताजी कितनी तकलीफ में हैं।’  वह जल्दी से पिताजी  के कंधे पर चढ़ गया...। तभी उसके भाई ने कहा कि ’अपना स्वेटर ठीक कर ले..’ उसने देखा पिताजी नहीं असल में वह लाल रंग का स्वेटर पहने हुए था... उसने अपने पिताजी को देखा वह सफेद बनियान पहने हुए थे.. और उनका चहरा सूजा हुआ था... होठ काले पड रहे थे..। उसकी निग़ाह पिताजी के पेट पर गई वह फूल चुका था... और कड़क हो रहा था... उनकी टांगे मुड़ने लगी थी... तभी पिताजी ने कहा कि ’जल्दी ख़ीच... जल्दी..’  भाई ने पिताजी के गिरने के ठीक पहले तस्वीर ख़ीची... बहुत तेज़ रोशनी उसकी आँखों के सामने चमकी... और सब गहरा काला हो गया।

उसकी आँखे जलने लगी थी... वह बहुत देर आँखें बंद नहीं रख पाया... उसने आँखे खोली तो वह एक छोटे से कमरे में था। उसके आधे बाल पक चुके थे.. दाढ़ी बढ़ी हुई थी...।  माँ बाल्कनी में सफेद साड़ी पहने हुए खड़ी थीं... और फोन की घंटी लगातार बज रही थी। ’माँ फोन उठाओ..’ उसने कहा.. ’तेरे लिए है...’ माँ ने कहा। उसने फोन उठाया दूसरी तरफ से पिताजी की आवाज़ आई....

’हाऊ आर यू माय सन... तूने फोन ही नहीं किया.. आए वाज़ वेटिंग.. कल मेच था.. बधाई हो इंडिया जीत गई.. धोनी ने सब के छक्के छुड़ा दिए।’ उसके पिताजी एक सांस में सब बोल गए। उसने कहा ’अच्छा...’ । पिताजी कुछ देर चुप रहे... उसने भी कुछ नहीं बोला..।

’अख़बार पढ़ रहा था...’ वह बोले.. ’आज कश्मीर में बर्फ पड़ी है... बहुत से जवान फस गए हैं...’

फिर कुछ देर की चुप्पी रही... पिताजी ने कहा.. ’मैं ठीक हो जाऊं फिर चलेंगें कश्मीर... मैं ले चलूंगा तुम्हें...। और कब आ रहे हो तुम....मैंने सोचा है....’ बीच बात चीत में उसने फोन काट दिया। माँ उसके लिए चाय बनाने लगी। चाय देते हुए माँ ने कहा... ’उनसे बात कर ले अच्छा लगेगा उन्हें वह तेरे फोन का इंतज़ार करते रहते हैं..।’ ’ठीक है कर लूंगा...’ उसने माँ को इगनोर करते हुए बोला...

’कब...?’ माँ ने कहा...।
’जब फ्री हो जाऊंगा..’
’अभी क्या कर रहा है?’
’चाय पी रहा हूँ।’

माँ कुछ देर चुप रही...। चाय ख़त्म होने के बाद माँ बोली...

’अब कर ले...।’
’कर लूंगा।’
माँ उसे देखती रहीं... वह उन्हें देखता रहा... फिर उसने कहा...
’बिज़ी हूँ...’

बिज़ी हूँ कहकर वह बाल्कनी में जाकर ख़ड़ा हो गया। बहुत देर तक बाहर देखता रहा। दो काले कव्वे सामने के पेड़ पर आकर बैठ गए... वह कव्वे पूरे काले थे..। उनके पीछे दो और कव्वे आ गए.. वह भी पूरे के पूरे काले... चारों उसकी तरफ देख रहे थे। उसे यह बहुत अजीब लगा।  तभी पीछे से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई... उसने कहा.. ’माँ देखो कोई है दरवाज़े पर...’। माँ ने कोई जवाब नहीं दिया... दरवाज़ा ख़टखटाने की आवाज़ फिर आई.... वह मुड़ा तो देखा माँ सो रही है...। वह ख़ुद दरवाज़ा खोलने के लिए चला तो पैरों तले चिनार के सूख़े पत्तों के चर्मराने की आवाज़ आ रही थी। उसने उस आवाज़ को अनसुना किया और चलने लगा..। दरवाज़ा इस बार कुछ ज़ोर से ख़टखटाया जा रहा था.... कमरा बहुत छोटा था पर वह दरवाज़े तक नहीं पहुच पा रहा था...। वह भागने लगा... तेज़.. और तेज़... पर दरवाज़ा फिर भी कुछ कदम दूरी पर ही बना रहा...।

तभी उसकी नींद खुली... उसने देखा भाई और माँ दोनों सो रहे हैं और कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है..। उसकी निग़ाह घड़ी पर गई.. सुबह के पाँच बज रहे थे... उसके मुँह से पापा निकला... और वह दरवाज़े की और लपका...। दरवाज़ा खोलते ही उसने देखा कि सामने चलता-फिरता-प्रेत... याने वेताल ख़ड़ा था.. उसके पीछे उसका सफेद घोड़ा झेलम और शेरु कुत्ता बग़ल में थे...। उसने वेताल के पैर पड़े... और झट से गले लग गया। वेताल के पास से कश्मीर की खुशबू आ रही थी... वह उस खुशबू को खाने लगा। वेताल अपने दो बड़े सूटकेस लेकर अंदर आया। वह माँ को उठाने गया पर वेताल ने मना कर दिया।

’दरवाज़ा बंद कर दो.....’ वेताल ने कहा...

वह दरवाज़ा बंद करने गया तो वहाँ झेलम और शेरु कुत्ता नहीं था। पौ फटने को थी। वह उम्र ही कुछ ऎसी थी जिसमें किसी भी चमत्कार पर सवाल नहीं उठाए जाते थे.. सारे चमत्कार उनके होने में हतप्रभ के बुलबुले बनाते.... और वह बुलबुले कुछ ही क्षणों में ख़त्म हो जाते। जब वह मुड़ा तो उसके पिताजी सूटकेस खोले बैठे थे, उनके बगल में माँ बैठी थी.. और भाई उनके कंधो पर झूल रहा था। पिताजी ने उसे एक केटबरी चाकलेट दी, वह उसे लेकर बाहर निकल गया। जैसे ही बाहर निकला एक ठंड़ी हवा का झोंका आया और उसने अपनी आँखें बंद कर दी।

जब उसने आँखे खोली तो वह कश्मीर की एक सरकारी कालोनी में था। चारो तरफ बर्फ थी... पूरी कालोनी खंडहर हो चुकी थी..... वह गली के आख़री मकान की तरफ ख़िचा चला जा रहा था। आख़री मकान के बरामदे में पिताजी बर्फ़ के गोले बना रहे थे... तीन गोले बना चुके थे... चौथे गोले को धकेलते हुए, बाक़ी तीनों के पास रख रहे थे। वह बरामदे की मुडेर पर बैठ गया और अपने पिताजी की थकान देख रहा था। अब चारों गोले एक लाईन में आ चुके थे। उन्होंने जेब से कंचे निकाले सबकी आँखे बनाई।

’कैसा लग रहा है।’ उन्होंने बिना उसकी तरफ देखे उससे पूछा।
’आप मुझसे पूछ रहे है?’ हिचकिचाते हुए उसने कहा।
’और कौन दिख रहा है तुम्हें यहाँ?’
’अच्छा लग रहा है।’

तभी आख़री गोला जो सबसे बड़ा था वह बिख़र गया। उससे यह देखा नहीं गया... वह भाग कर उस गोले की बर्फ़ को वापिस समेटने लगा... वह जितना समेटता उतना ही वह गोला बिख़रता जाता। उसने देखा पिताजी मुड़ेर पर बैठे हैं जहाँ वह बैठा था। उनके बग़ल में चार कव्वे बैठे हैं एकदम काले। अब सिर्फ तीन गोले थे.... जिनमें कंचों से आँखें बनी हुई थी। उस बिख़री हुई बर्फ़ में वह दो कंचे ढ़ूढ़ने लगा...।

’तुमने मुंडन क्यों करा लिया?’

पीछे से पिताजी की आवाज़ आई पर वह बदहवास सा कंचे ढ़ूढ़ रहा था।

’मेरी आँखें खोज रहे हो?’ पिताजी ने पूछा।

और वह रुक गया। उसने पिताजी की तरफ देखा तो वह मुड़ेर पर एक फोन लिये बैठे थे... और नंबर डॉयल कर रहे थे। कुछ देर में घंटी बजी....। जिस फोन की घंटी बज रही थी वह फोन उनके बगल में ही पड़ा था.... वह भागकर मुड़ेर पर अपने पिताजी के बगल में बैठा और उसने फोन उठाया... दूसरी तरफ से उसके पिताजी की आवाज़ आई।

’हेलो....।’
’पापा... गोले तो चार होने चाहिए ना... यह एक गोला बिख़र क्यों गया?... अभी तो नहीं बिख़ना था.. अभी तो बर्फ़ है चारों तरफ... अभी-अभी तो हम सबको तेज़ गर्मी से राहत मिली थी... अभी-अभी तो हम सब एक साथ ख़ुश हुए थे... अभी तो नहीं बिख़रना था।’

वह यह कहकर अपने बग़ल में बैठे पिता को देख रहा था..

’पापा... मैं बीमार हूँ।’

यह सुनते ही पिताजी उसकी तरफ देखने लगे...  दोनों ने फोन कान पर लगाए हुए थे। पिताजी ने फोन काट दिया.. और उससे बोले....

’तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो?’

उसने देखा कि वह बंबई में पीले स्कूटर पर बहुत तेज़ी से चला जा रहा है। उसके आधे बाल पक़ चुके हैं... दाढ़ी बढ़ी हुई है। वह पिताजी को लेने स्टेशन जा रहा था। सुबह का वक़्त है... उसे एक चाय की दुकान दिखती है... वह अपना स्कूटर रोक लेता है। चायवाला उससे बिना पूछे उसके हाथ में चाय  पकड़ा देता है। वह चाय के साथ सिगरेट सुलगाने ही वाला होता है कि चाय वाला उससे कहता है..

’आपको देर तो नहीं हो रही है?’
’नहीं... क्यों? किस बात की देर?’ वह पूछता है।
’आज इक्कतीस जनवरी है... ।’
’हाँ तो....?’
’तो देख लो... मुझे लगा पूछ लेता हूँ कि कहीं देर तो नहीं हो रही है।’

वह आराम से चाय पीता है... पर देर हो जाने की बात उसके दिमाग़ में रह जाती है। वह घड़ी देखता है पर उसने घड़ी नहीं पहन रखी है। वह अपना मोबाईल जेब में टटोलता है... वह भी उसके पास नहीं है। वह चायवाले से पूछता है..

’कितना वक़्त हुआ है?’
’वक़्त बहुत नहीं बचा है..।’

वह चाय रखता है.. जलती हुई सिगरेट फैंक देता है... और बिना चाय वाले को पैसे दिये स्कूटर में किक मारता है। स्कूटर स्टार्ट नहीं होता... वह चाय वाले की तरफ देखता है, उसे याद आता है कि उसने उसे पैसे नहीं दिये। वह पैसे देता है और पीला स्कूटर स्टार्ट हो जाता है।  वह बहुत तेज़ी से स्टेशन की तरफ चल देता है। उसका स्कूटर बहुत तेज़ चलने लगता है.... सड़क पर सुबह की धुंध बढ़ती जाती है... धीरे-धीरे आस-पास का सब कुछ ग़ायब होने लगता है... उसे घने कोहरे में ठंड़ लगने लगती है। तभी रेल की सीटी सुनाई देती है। वह अपने आस-पास कश्मीर सूंधता है। सामने के धुंधलके में एक स्टेशन उभरता है, उस स्टेशन का नाम कश्मीर है। वह अपना स्कूटर खड़ा करता है और स्टेशन के भीतर भागता है। इक्कत्तेस जनवरी की सुबह स्टेशन पर ट्रेन आ नहीं जा रही थी... जा रही थी। उसने पिताजी को लेने में नहीं छोड़ने में देर कर दी। ट्रेन स्टेशन से जा रही थी... उसे ट्रेन की एक ख़िड़की से पिताजी का हाथ दिख़ा... वह उस हाथ में ओम का निशान देख सकता था... वह उससे आख़री बार हाथ हिलाकर विदा ले रहे थे।

तभी पूरा स्टेशन धुंध में गायब हो गया और उसने देखा कि वह बर्फ़ से ढ़के चिनार के जंगल में खड़ा है। उसके हाथ में सिगरेट है और वह धुंध में कुछ तलाश रहा है। तभी एक चिनार के दरख़त के पीछे उसे पिताजी दिखे।

’आप इस तरफ कैसे?’ उसने पूछा...
’अपनी ज़मीन तलाश रहा था... सब तरफ बर्फ़ है... कुछ समझ नहीं आ रहा है।’ पिताजी बोले
’आपकी ज़मीन तो बहुत पहले चली गई थी। अब अगर आप अपनी ज़मीन पर भी खड़े होंगे तो भी अपको पता नहीं चलेगा कि यह आपकी ज़मीन है।’
’मुझे पता चल जाएगा।’
’यहाँ सब बदल गया है।’
’पर मैं नहीं बदला।’

पिताजी बोले और वह अपनी ज़मीन तलाशने लगे। बात करते हुए दोनों के मुँह से धुंआ निकल रहा था। वह पिताजी के करीब आया।

’पापा, आप बहुत जल्दी चले गए। अभी तो बहुत कुछ बाक़ी था।’
’क्या बाक़ी था?’
’आपके हिस्से की कहानी तो मुझे पता ही नहीं है?’

पिताजी मुस्कुरा दिये।

’तुम मेरे हिस्से की कहानी में ही खड़े हो...।’

तभी उसे घोड़े की टाप सुनाई दी। झेलम किसी धुंध में से आकर पिताजे के पास खड़ा हो गया। पिताजी जैसी ही उछलकर झेलम पर बैठे... वह वेताल हो चुके थे... चलता-फिरता-प्रेत।

झेलम की टाप... ट्रेन की आवाज़ सी कहीं दूर से जा चुकी थी। उसने अपना फोन उठाया और अपने पिताजी को फोन मिलाया। बहुत देर तक घंटी बजती रही.. पर दूसरी तरफ कोई नहीं था।

                                                                                                                                  

Monday, November 23, 2015

वह क्षण....

कल शाम ज़ोरों की भूख लगी। मैंने फ्रिज से अंड़े, कुछ बचा हुआ चावल निकाला, एक प्याज़ हरी मिर्च काटी और egg fried rice सा कुछ बनाने लगा। Thailand से कुछ प्रिमिक्स कॉफी लाया था सो बगल में एक कप पानी भी रख दिया। तभी, इस व्यस्तता के बीच वह हुआ... किचिन की खिड़की से सूरज की रोशनी भीतर आ रही थी... सामने के पेड़ पर गिलहरी टकटकी बांधे इसी तरफ देख रही थी.. ऊपर से एक प्लेन जाने की ज़ोर की आवाज़ हुई और सब कुछ अचानक से आनंदमय हो गया... लगा कि यह सब कितना खूबसूरत है। यह अकेली ख़ाली दौपहरें... पीछे रफ़ी के नग़में... दूर से आती हुई बहुत सारी चिड़ियाओं की आवाज़े। अकेले रहने के बड़े सुख हैं... यह बहुत कुछ वैसा ही है जैसे कोई बच्चा जब अपनी शुरु-शुरु की संगीत की कक्षा में वायलन या सितार पर कोई बहुत कठिन राग़ शुरु करता है... अधिकतर सब कुछ असाघ्य और कठिन लगता है.. सारे सुर भी छितरे-छितरे चीख़ते दिखते हैं... पर उन्हीं दिनों में एक दिन वह क्षण अचानक आता है जब एक सटीक सुर लगता है.. और उस बच्चे को वह सुनाई देता है... पहली बार.. वह धुन.. धुंध से उठती हुई सी। वह उसके शरीर के भीतर से ही कहीं उठ रही थी... उसे आश्चर्य होता है कि वह उसके भीतर ही कहीं छुपी बैठी थी... उंगलियां उसके बस में नहीं होती.. उसकी फटी हुई आँखें, सामने तेज़ी से गुज़रे हुए सुर पकड़ रही होती हैं। इस क्षण की मुस्कुराहट सुबह की चाय तक क़ायम है। मुझे लगा इसे लिख लेना चाहिए.. कभी जब फिर सुर भटक रहे होंगे.. जीवन कठिन लम्हों में दिखेगा.. तब इन दौपहरों को फिर से पढ़ लेंगें। फिर एक गहरी सांस लेंगें... फिर प्रयास करेंगें.. सुर भीतर ही है.. वह सटीक सुर वाला क्षण फिर आएगा.... फिर आंखें फटेगीं.. फिर से मुस्कुराहट कई सुबह की चाय को बना देंगीं।

बहुत दिनों बाद....

कुछ तीन बार यह लाईन लिखकर मिटा दी कि बहुत दिनों बाद लिखने बैठा हूँ। अभी लिखने में लग रहा है कि बस कुछ दिनों पहले की ही बात थी कि मैं लगातार लिख रहा था। फिर उस आदमी से थोड़ा बैर हो गया जो लिखता था। मैंने यूं तो कई बार कोशिश की उसे बुला लूं चाय पर और सुलह कर लूं... पर हम दोनों ही बड़े ज़िद्दी हैं। बहुत कोशिश के बाद कुछ उसके कदम मेरी तरफ बहके...कुछ मैंने उसकी ठाह लेने की कोशिश की कि वह ठीक तो है? और ठीक अभी हम एक दूसरे के सामने खड़े मिले...। ’क्या हाल है?’ मैंने पूछा.. वह गंभीर था, लेखक है इतनी नाराज़गी तो बनती है। मैंने अपने कदम किचिन तक बढ़ाए तो उसने कहा कि ’चाय नहीं, मैंने चाय छोड़ दी है।’ मुझे हंसी आई... पर इस वक़्त माहौल इतना गर्म था कि मेरी हंसी से मेरा लेखन मुझे हमेशा के लिए छोड़कर जा सकता था।’चाय कब छोड़ी’, मैंने उसकी संजदगी के अभिनय में पूछा। ’तुम्हें सच में यह जानना है कि मैंने चाय कब छोडी?’ उसने पूछा और हमारी बात वहीं ख़त्म हो गई। हम दोनों बाहर घूमने आ गए। सोचा बाहर कहीं कॉफी पीएगें, खुले में, चाय पर संवाद ठीक नहीं बैठ रहे थे। चलते हुए एक दो बार गलती से हमारे हाथ एक दूसरे से टकराए... कितना पहचाना हुआ है सब कुछ... मुझे लगा अभी भी वह वही है और मैं भी वह ही हूँ..। मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया पर वह खामोश था। कुछ देर में एक कॉफी हाऊस पर हम रुके... मैं आर्डर देने की सोच रहा था पर वह पहले ही कुर्सी पर बैठ गया। मैंने सोचा कुछ देर में वेटर आ ही जाएगा..। अब ख़ामोशी मुमकिन नही थी सो हमने सीधा एक दूसरे का सामना किया... शुरुआत फिर मैंने ही की... ’सच कहना चाहता हूँ, तुम मेरे लिए बहुत प्रिडिक्टेबल हो गए थे, और मुझे लगा कि हमारा संबंध कभी भी ऎसा नहीं था। हमने हमेशा एक दूसरे को चकित किया है... मतलब ख़ासकर तुमने मुझे। पर..... हम अपनी हर बात उन्हीं घिसेपिटे शब्दों से शुरु कर रहे थे... वही सारे वाक़्य हम बार-बार कह रहे थे.. तुम मुझे बार-बार उन जगहों पर घसीटकर ले जा रहे थे जहां मैं रहना नहीं चाहता था।’ वह हंस दिया। मैं बीच में ही कहीं रुक गया। ’क्या हुआ?’ मैंने पूछा। ’तुम झूठ बोल रहे हो... सच कहो।’ वह सीधा मुझे देख रहा था मानों खुद को देख रहा हो। ’मैं सच कह रहा हूँ।’ मेरे वाक़्य टूट गए... हिज्जे में वाक़्य निकला... और मैंने समर्पण कर दिया। ’तुमने खून किया है... तुमने जान बूझकर मुझे ख़त्म करने की कोशिश की है...पर तुम बहुत कायर हो.. तुमसे वह भी नहीं हुआ। तुमने मुझे मारा और फिर ज़ख़्म पर हल्का मलहम लगाते रहे कि मैं ज़िदा रहूं।’ वह सच कह रहा था। मैंने उसे मारने की पूरी कोशिश की थी.... पर क्या हम कभी भी किसी को भी मार सकते हैं। अपना ही चख़ा सारा स्वाद किस तरह अपने शरीर से निकालकर बाहर किया जाए? ’तुम भाग रहे थे... अब भटक गए हो। बहुत दूर भटकने के बाद जब तुम ख़ाली हुए तो लगा - देखे उसे कितना पीछे छोड़ा है... कितना दुख हुआ देखकर कि मैं अभी भी तुम्हारे पास ही था।’ मैं जवाब देने को था कि वेटर आ गया...। मैंने दो कॉफी कहलवा दी.. उसने टेबल साफ किया और दो गिलास पानी रख दिया। हम दोनों एक दूसरे का इंतज़ार कर रहे थे... पहले भी और अब भी... मैं कभी भी अच्छा इंतज़ार करने वाला नहीं रहा हूँ.. मैं असहज हो जाता हूँ... मुझे लगता है कि ख़त्म कर दूं ख़ुद को या इंतज़ार को... सो मैं फिर बोल पड़ा..। ’मैं कुछ कहूँ...?’ मैंने हल्के अपनेपन में कहा। ’तुम्हारे पास कुछ कहने को नहीं है।’ वह उठकर जाने लगा। ’कॉफी???’ मेरे मुँह से निकला और वह रुक गया। कुछ चुभ गया था भीतर... वह वापिस बैठ गया। ’मेरे पास बहुत कुछ है कहने को... इतने समय का नहीं लिखना भी भीतर काफी सारा भरा पड़ा है। मैं भटक गया हूँ क्योंकि मैं भटकना चाहता हूँ। मैं अपने निजी जीवन में खाए धोखों का बदला अपने लिखे से नहीं लेना चाहता था... मैं तुम्हें अपने जीवन की निजी हार-जीत की तुच्छता से दूर रखना चाहता था। पर यह भी पूरा सच नहीं है... इसमें बहुत सारी थकान है, अपने घने अकेलेपन की... इसमें बहुत सारी शामों की हार है... रातों का रोना है... बिना किसी वजह की सुबहें हैं। इसमें हर जगह जाना है और कहीं न पंहुचपाना है... इसमें कड़वाहट है.. और यह भी पूरा सच नहीं है सच और भी चारों तरफ छितरा पड़ा है। फिर यह भी लगता है कि क्यों ना बदल जाऊं... मैं जब भी किसी यात्रा पर होता हूँ तो एक सवाल उन लोगों के लिए उठता है जो आत्महत्या करते हैं। मुझे हमेशा से यह लगता है कि अगर मुझे ख़त्म ही करना है तो मैं जो अभी जी रहा है उसे ख़त्म करुंगा और कहीं भी फिर से, किसी एकदम दूसरे तरीक़े से जीवन शुरु करुंगा। तुमने सच कहा है कि मैंने तुम्हारी हत्या की है... कोशिश नहीं की है... पर किसी के मारने से अगर कोई मर जाता तो बात कितनी सरल होती। मुझमें एक ख़ामी है.. सारा जिया हुआ मेरे पूरे शरीर से चिपक जाता है... फिर धीरे-धीरे पपड़ी दर पपड़ी झड़ता रहता है। मुझॆ लगा था तुम भी झड़ जाओगे एक दिन.. समय रहते... पर...।“ वेटर कॉफी ले आया... वह तुरंत कॉफी पीने में व्यस्त हो गया.. मैं अपने अधूरे वाक़्य पर अभी भी टंगा हुआ था। सारा कुछ बोलकर मुझे लगा मानों मैंने कुछ कहा ही नहीं... मैं उसके सामने सालों से चुप सा बैठा था। उसने कॉफी का आख़री सिप लिया और ख़ाली कप मेरी तरफ बढ़ाया दिखाने के लिए कि मैं कॉफी पी चुका हूँ। वह खड़ा हो गया। ’तुम्हें कुछ नहीं कहना है।’ ’मुझे सिगरेट पीना है... यहां कैफे में नहीं पी सकते हैं..।’ मैं तुरंत खड़ा हुआ भीतर जाकर बिल दिया और उसके साथ हो लिया। हम बहुत से घरों की पिछली गली में निकल आए.. यह पिछवाड़े बड़े अजीब होते हैं.. यहां सारी गैरकानूनी हरकत जायज़ लगती है.. सिगरेट पीना भी...। सिगरेट के पहले गहरे कश के साथ उसने कहा.... ’तुम्हें याद है हमारी पहली कविता... तुमने डरे-डरे अपने दोस्तों को सुनाई थी। अभी उस कविता को पढ़ो तो कितनी ख़राब लगती है वह... कैसे लिखी थी।’ मैं हंस दिया मुझे बिल्कुल याद थी वह कविता। बहुत दिनों के बाद हम दोनों साथ हंस रहे थे। ’पर कितनी महत्वपूर्ण थी वह ख़राब कविता... अगर वह लिखी ना होती और उसे सुनाने की लज्जा ना सही होती तो क्या यहां तक यात्रा कर पाते?’ उसने सवाल जैसा सवाल नहीं किया... यह जवाब वाला सवाल था। मैं चुप रहा। ’यह भटकना भी कुछ वैसा ही है... एक दिन फिर हम किसी पिछवाड़े सिगरेट पीते हुए इस भटकने पर साथ हंसेगें।’ उसके यह कहते ही सब कुछ हल्का हो गया। हम दोनों कितना एक दूसरे को समझते है... कितना संयम है उसमें। मैं कुछ देर में उससे सिगरेट मांगी और दो तीन तेज़ कश ख़ीचे... आह! आनंद। हम फिर साथ थे।

Wednesday, September 24, 2014

’पीले स्कूटर वाला आदमी’

मैंने कहीं पढ़ा था- ’वेस्ट में अकेलापन एक स्थिति है, पर हमारे देश में, हम लोगों को हमारा अकेलापन चुनना पड़ता है, और इस बात के लिए हमें कोई माफ नहीं करता है... ख़ासकर आपके अपने..।’ इस देश में लेखक होने के बहुत कम मुआवज़े मिलते हैं उनमें से एक है कि हम अपने भीतर पड़ी हुई गठानों को अपने हर नए लिखे से खोलते चलते हैं। जैसे बड़े से ब्लैकबोर्ड पर गणित का एक इक्वेशन लिखा हुआ है और हम नीचे उसे चॉक से हल कर रहे होते हैं... डस्टर हमारी बीति हुई ज़िदग़ी को लगातार मिटा रहा होता है.. पर कुछ शब्द, कुछ अधूरे वाक़्य जिसे डस्टर ठीक से मिटा नहीं पाता, हम उन टूटी-फूटी बातों का रिफ्रेंस ले लेकर अपने जीवन की इक्वेशन को हल कर रहे होते हैं लगातार। ’पीले स्कूटर वाला आदमी’ इसी कड़ी का एक प्रयास था। ’शक्कर के पाँच दाने’ के बाद यह मेरा दूसरा नाटक था। उस वक़्त बतौर लेखक कुछ भीतर फूट पड़ा था, इतना सारा कहने को था कि मैं लगातार लिखता ही रहता था... इस बीच मैंने कई कविताएं लिखी... कई कहानियां... और मेरा दूसरा नाटक..। कविताएं मुझे बोर करने लगी थीं... मेरी बात कविता की सघनता में अपने मायने खो देती थी... सो मैंने कविताएं लिखनी बंद कर दी... मुझे नाटकों और कहानियों में अपनी बात कहने में मज़ा आने लगा था। असल में मज़ा सही शब्द नहीं है... सही शब्द है ईमानदारी... मैं कविताओं में खुद को बेईमानी करते पकड़ लेता था... मरी क़लम वहीं रुक जाती थी। ईमानदारी से मेरा कतई मतलब नहीं है कि मैं अपनी निजी बातों को नाटकों में लिखना पसंद करता था... ईमानदारी का यहां अर्थ कुछ भिन्न है.... एक लेखक के सोचने, जीने, महसूस करने और लिखने के बीच कम से कम ख़ाई होनी चाहिए.... हर लेखक (ख़ासकर जिनका लेख़न मुझे बहुत पसंद है) अपने नए लिखे से उस ख़ाई को कुछ ओर कम करने का प्रयास करता है। पीले स्कूटर वाला आदमी एक लेखक की इसी जद्दोजहद की कहानी है... वह कितना ईमानदार है? वह जो लिखना चाहता है और असल में उसे इस वक़्त जो लिखना चाहिए के बीच का तनाव है। मैं उन दिनों काफ़्का और वेनग़ाग के लिखे पत्रों को पढ़ रहा था.. वेनग़ाग की पेंटिग़ Room at Arles ने मुझे बहुत प्रभावित किया था.. पीले स्कूटर वाले आदमी का कमरा भी मैं कुछ इसी तरह देखता था। मेरे लिए वेनग़ाग के स्ट्रोक्स उस कमरे में कहे गए शब्द हैं, पात्र हैं और संगीत है...। अपने लेखन के समय के रतजगों में मैंने हमेशा खुद को संवाद करते हुए सुना है... आप इसे पागलपन भी कह सकते हैं.. पर मेरे लिए यह अकेलेपन के साथी हैं। मेरे अधिक्तर संवाद किसी न किसी लेखक से या किसी कहानी/उपन्यास के पात्रों से होते रहे हैं... मुझे लगता है कि मेरे पढ़े जाने के बाद कुछ लेखक, कुछ पात्र मेरे कमरे में छूट गए हैं। देर रात चाय पीने की आदत में मैं हमेशा दो कप चाय बनाता हूँ.. एक प्याला चाय मुझे जिस तरह का अकेलापन देता है उसे मैं पसंद नहीं करता... दो प्याला चाय का अकेलापन असल में अकेलेपन का महोत्सव मनाने जैसे है...। दूसरे प्याले का पात्र अपनी मौजूदग़ी खुद तय करता है... आप किसी का चयन नहीं करते.. आप बहते है उनके साथ जो आपके साथ हम-प्याला होने आए हैं। यही पीले स्कूटरवाले आदमी का सुर है. और दो चाय के प्यालों के संवाद है।

Monday, January 13, 2014

साथी.....

एक मधुर स्वर वाली चिड़िया बाल्कनी में आई...। वह बहुत शर्मीली है... उसे देखने के लिए सिर घुमाता हूँ तो वह दूसरी बाल्कनी में चली जाती है...। मैं चाय बनाने के बहाने जब दूसरी बाल्कनी के पास गया तो वह दिख गई... गहरी काले रंग की... लाल रंग की नोक अपने माथे पर चढ़ाए हुए...। मेरी सुबह मुस्कुराहट से फैल गई। मैं बहुत हल्के कदमों से बाल्कनी के कोने में खड़ा हो गया... सूरज मेरे चहरे पर सुन्हेरा रंग उड़ेल रहा था। मैं उस चिड़िया को अपना सपना सुनाने लगा... कल रात के कुछ डर मैं उस सपने में छुपाना चाहता था... पर वह सूरज की रोशनी में चीनी में लगी चींटियों की तरह बाहर आने लगे...। आजकल मेरी दोस्ती कूंए में पल रहे कछुए से बहुत बढ़ गई हैं...। उसका नाम मैंने ’साथी’ रखा है... अपने चुप धूमने में मैं जब ’सुपर मिल्क सेंटर’ चाय पीने जाता हूँ तो कुछ आत्मीय संवाद अपने साथी से कर लेता हूँ। मैंने साथी को अपने सपनों के बारे में कभी नहीं बताया... मुझे डर है कि वह एक दिन कुंआ छोड़कर चला जाएगा....। सपनों के सांझी कुछ समय में चले जाते हैं...। मैं उससे दैनिक दिनचर्या कहता हूँ... उसे आश्चर्य होता है कि मैं कितना उसके जैसा जीता हूँ...। मैंने उससे कहा है कि मेरा भी एक कुंआ है... कुछ देर ऊपर रहने पर मैं भी भीतर गोता लगा लेता हूँ और बहुत समय तक किसी को नहीं दिखता...। भीतर हम दोनों क्या करते हैं इस बात की चर्चा हम दोनों एक दूसरे से नहीं करते हैं...। साथी कभी-कभी मेरे कुंए की बात पूछता है... मेरे पास अपने कुंए के बारे में बहुत कुछ कहने को नहीं होता... अकेलपन की बात उससे कहना चाहता हूँ पर उससे अकेलापन कैसे कह सकता हूँ...? सो मैं एक वाचमैन के बारे में बात करता हूँ जो मेरा क्रिकेट दोस्त है... उससे मैं क्रिकेट की बात करता हूँ.... बाहर ’सुपर मिल्क सेंटर’ पर एक लड़का है जो मेरे लिए चाय लाता है... वह अभी-अभी दोस्त हो चला है... पता नहीं क्यों वह मुझसे अंग्रेज़ी में बात करना चाहता है... थेंक्यु और नाट मेनशन वह कहीं भी बीच संवाद में कह देता है...। फिर एक गोलगप्पे वाला भी है जो एक लड़की को पसंद करता है... वह उस लड़की से गोलगप्पे के पैसे नहीं लेता... वह अगर अपनी सहेलियों के साथ आती है तब वह उसकी सहलीयों से भी पैसे नहीं लेता...। जब वह लड़की गोलगप्पे खा रही होती है तो उसकी गोलगप्पे बनाने की सरलता... लड़खड़ा जाती है...। लड़की गोलगप्पे खाते हुए बहुत खिलखिलाकर हंसती है.... जब जाती है तो दूर जाते हुए एक बार पलटकर गोलप्पे वाले लड़के को देख लेती है... वह खुश हो जाता है। साथी बार-बार मुझसे उस गोलगप्पे वाले लड़के के बारे में पूछता है... क्या हुआ उसका उस लड़के के साथ। मैं उससे कहता हूँ कि असल में मैं इसके बाद की कहानी जानना नहीं चाहता हूँ... यह ठीक इस वक़्त तक इतनी खूबसूरत है... कि मैं खुद भीतर गुदगुदी महसूस करता हूँ.. पर ठीक इसके बाद क्या होगा? इसपर मेरे भीतर के डर धूप में चीनी के डब्बे मे पड़ गई चींटियों की तरह बाहर आने लगते हैं...। साथी कहता है कि तुम बहुत डरपोक हो... मैं कहता हूँ... मैं हूँ...। साथी से संवाद ख़त्म करके जब भी मैं सुपर मिल्क सेंटर की तरफ जाता हूँ तो भीतर एक गिजगिचापन महसूस करता हूँ....। मैं अपने इतने सुंदर साथी से भी वही टूटी हुई बिख़री हुई बातें करता हूँ...। फिर तय करता हूँ कि एक किसी नए सुंदर दोस्त से मिलूंगा... उसे उसके बारे में बताऊंगा... ओह! उसे मैंने अपनी बाल्कनी पर आई चिड़िया के बारे में भी नहीं बताया है... अचानक मुझे मेरे अकेलेपन के बहुत सारे छोटे-छोटे दोस्त दिखने लगे... ओह अभी तो ओर भी कितना है... कितना सारा है जिसे मैं कह सकता हूँ...। जैसे बोबो के बारे में...। बोबो की आँखें... उसकी पवित्रता...(पवित्र शब्द कितना दूर लगता है मुझसे.. इस शब्द के लिखने में भी मेरी उंग्लियां लड़खड़ा जाती हैं।) मैं बोबो के बारे में साथी से कहूंगा.... कहूंगा कि वह बोबो है जो मुझे मेरे छुपे में तलाश लेता है...। आज की सुबह बहुत पवित्र लग रही है... आज की सुबह...

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल