Monday, November 23, 2015

वह क्षण....

कल शाम ज़ोरों की भूख लगी। मैंने फ्रिज से अंड़े, कुछ बचा हुआ चावल निकाला, एक प्याज़ हरी मिर्च काटी और egg fried rice सा कुछ बनाने लगा। Thailand से कुछ प्रिमिक्स कॉफी लाया था सो बगल में एक कप पानी भी रख दिया। तभी, इस व्यस्तता के बीच वह हुआ... किचिन की खिड़की से सूरज की रोशनी भीतर आ रही थी... सामने के पेड़ पर गिलहरी टकटकी बांधे इसी तरफ देख रही थी.. ऊपर से एक प्लेन जाने की ज़ोर की आवाज़ हुई और सब कुछ अचानक से आनंदमय हो गया... लगा कि यह सब कितना खूबसूरत है। यह अकेली ख़ाली दौपहरें... पीछे रफ़ी के नग़में... दूर से आती हुई बहुत सारी चिड़ियाओं की आवाज़े। अकेले रहने के बड़े सुख हैं... यह बहुत कुछ वैसा ही है जैसे कोई बच्चा जब अपनी शुरु-शुरु की संगीत की कक्षा में वायलन या सितार पर कोई बहुत कठिन राग़ शुरु करता है... अधिकतर सब कुछ असाघ्य और कठिन लगता है.. सारे सुर भी छितरे-छितरे चीख़ते दिखते हैं... पर उन्हीं दिनों में एक दिन वह क्षण अचानक आता है जब एक सटीक सुर लगता है.. और उस बच्चे को वह सुनाई देता है... पहली बार.. वह धुन.. धुंध से उठती हुई सी। वह उसके शरीर के भीतर से ही कहीं उठ रही थी... उसे आश्चर्य होता है कि वह उसके भीतर ही कहीं छुपी बैठी थी... उंगलियां उसके बस में नहीं होती.. उसकी फटी हुई आँखें, सामने तेज़ी से गुज़रे हुए सुर पकड़ रही होती हैं। इस क्षण की मुस्कुराहट सुबह की चाय तक क़ायम है। मुझे लगा इसे लिख लेना चाहिए.. कभी जब फिर सुर भटक रहे होंगे.. जीवन कठिन लम्हों में दिखेगा.. तब इन दौपहरों को फिर से पढ़ लेंगें। फिर एक गहरी सांस लेंगें... फिर प्रयास करेंगें.. सुर भीतर ही है.. वह सटीक सुर वाला क्षण फिर आएगा.... फिर आंखें फटेगीं.. फिर से मुस्कुराहट कई सुबह की चाय को बना देंगीं।

बहुत दिनों बाद....

कुछ तीन बार यह लाईन लिखकर मिटा दी कि बहुत दिनों बाद लिखने बैठा हूँ। अभी लिखने में लग रहा है कि बस कुछ दिनों पहले की ही बात थी कि मैं लगातार लिख रहा था। फिर उस आदमी से थोड़ा बैर हो गया जो लिखता था। मैंने यूं तो कई बार कोशिश की उसे बुला लूं चाय पर और सुलह कर लूं... पर हम दोनों ही बड़े ज़िद्दी हैं। बहुत कोशिश के बाद कुछ उसके कदम मेरी तरफ बहके...कुछ मैंने उसकी ठाह लेने की कोशिश की कि वह ठीक तो है? और ठीक अभी हम एक दूसरे के सामने खड़े मिले...। ’क्या हाल है?’ मैंने पूछा.. वह गंभीर था, लेखक है इतनी नाराज़गी तो बनती है। मैंने अपने कदम किचिन तक बढ़ाए तो उसने कहा कि ’चाय नहीं, मैंने चाय छोड़ दी है।’ मुझे हंसी आई... पर इस वक़्त माहौल इतना गर्म था कि मेरी हंसी से मेरा लेखन मुझे हमेशा के लिए छोड़कर जा सकता था।’चाय कब छोड़ी’, मैंने उसकी संजदगी के अभिनय में पूछा। ’तुम्हें सच में यह जानना है कि मैंने चाय कब छोडी?’ उसने पूछा और हमारी बात वहीं ख़त्म हो गई। हम दोनों बाहर घूमने आ गए। सोचा बाहर कहीं कॉफी पीएगें, खुले में, चाय पर संवाद ठीक नहीं बैठ रहे थे। चलते हुए एक दो बार गलती से हमारे हाथ एक दूसरे से टकराए... कितना पहचाना हुआ है सब कुछ... मुझे लगा अभी भी वह वही है और मैं भी वह ही हूँ..। मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया पर वह खामोश था। कुछ देर में एक कॉफी हाऊस पर हम रुके... मैं आर्डर देने की सोच रहा था पर वह पहले ही कुर्सी पर बैठ गया। मैंने सोचा कुछ देर में वेटर आ ही जाएगा..। अब ख़ामोशी मुमकिन नही थी सो हमने सीधा एक दूसरे का सामना किया... शुरुआत फिर मैंने ही की... ’सच कहना चाहता हूँ, तुम मेरे लिए बहुत प्रिडिक्टेबल हो गए थे, और मुझे लगा कि हमारा संबंध कभी भी ऎसा नहीं था। हमने हमेशा एक दूसरे को चकित किया है... मतलब ख़ासकर तुमने मुझे। पर..... हम अपनी हर बात उन्हीं घिसेपिटे शब्दों से शुरु कर रहे थे... वही सारे वाक़्य हम बार-बार कह रहे थे.. तुम मुझे बार-बार उन जगहों पर घसीटकर ले जा रहे थे जहां मैं रहना नहीं चाहता था।’ वह हंस दिया। मैं बीच में ही कहीं रुक गया। ’क्या हुआ?’ मैंने पूछा। ’तुम झूठ बोल रहे हो... सच कहो।’ वह सीधा मुझे देख रहा था मानों खुद को देख रहा हो। ’मैं सच कह रहा हूँ।’ मेरे वाक़्य टूट गए... हिज्जे में वाक़्य निकला... और मैंने समर्पण कर दिया। ’तुमने खून किया है... तुमने जान बूझकर मुझे ख़त्म करने की कोशिश की है...पर तुम बहुत कायर हो.. तुमसे वह भी नहीं हुआ। तुमने मुझे मारा और फिर ज़ख़्म पर हल्का मलहम लगाते रहे कि मैं ज़िदा रहूं।’ वह सच कह रहा था। मैंने उसे मारने की पूरी कोशिश की थी.... पर क्या हम कभी भी किसी को भी मार सकते हैं। अपना ही चख़ा सारा स्वाद किस तरह अपने शरीर से निकालकर बाहर किया जाए? ’तुम भाग रहे थे... अब भटक गए हो। बहुत दूर भटकने के बाद जब तुम ख़ाली हुए तो लगा - देखे उसे कितना पीछे छोड़ा है... कितना दुख हुआ देखकर कि मैं अभी भी तुम्हारे पास ही था।’ मैं जवाब देने को था कि वेटर आ गया...। मैंने दो कॉफी कहलवा दी.. उसने टेबल साफ किया और दो गिलास पानी रख दिया। हम दोनों एक दूसरे का इंतज़ार कर रहे थे... पहले भी और अब भी... मैं कभी भी अच्छा इंतज़ार करने वाला नहीं रहा हूँ.. मैं असहज हो जाता हूँ... मुझे लगता है कि ख़त्म कर दूं ख़ुद को या इंतज़ार को... सो मैं फिर बोल पड़ा..। ’मैं कुछ कहूँ...?’ मैंने हल्के अपनेपन में कहा। ’तुम्हारे पास कुछ कहने को नहीं है।’ वह उठकर जाने लगा। ’कॉफी???’ मेरे मुँह से निकला और वह रुक गया। कुछ चुभ गया था भीतर... वह वापिस बैठ गया। ’मेरे पास बहुत कुछ है कहने को... इतने समय का नहीं लिखना भी भीतर काफी सारा भरा पड़ा है। मैं भटक गया हूँ क्योंकि मैं भटकना चाहता हूँ। मैं अपने निजी जीवन में खाए धोखों का बदला अपने लिखे से नहीं लेना चाहता था... मैं तुम्हें अपने जीवन की निजी हार-जीत की तुच्छता से दूर रखना चाहता था। पर यह भी पूरा सच नहीं है... इसमें बहुत सारी थकान है, अपने घने अकेलेपन की... इसमें बहुत सारी शामों की हार है... रातों का रोना है... बिना किसी वजह की सुबहें हैं। इसमें हर जगह जाना है और कहीं न पंहुचपाना है... इसमें कड़वाहट है.. और यह भी पूरा सच नहीं है सच और भी चारों तरफ छितरा पड़ा है। फिर यह भी लगता है कि क्यों ना बदल जाऊं... मैं जब भी किसी यात्रा पर होता हूँ तो एक सवाल उन लोगों के लिए उठता है जो आत्महत्या करते हैं। मुझे हमेशा से यह लगता है कि अगर मुझे ख़त्म ही करना है तो मैं जो अभी जी रहा है उसे ख़त्म करुंगा और कहीं भी फिर से, किसी एकदम दूसरे तरीक़े से जीवन शुरु करुंगा। तुमने सच कहा है कि मैंने तुम्हारी हत्या की है... कोशिश नहीं की है... पर किसी के मारने से अगर कोई मर जाता तो बात कितनी सरल होती। मुझमें एक ख़ामी है.. सारा जिया हुआ मेरे पूरे शरीर से चिपक जाता है... फिर धीरे-धीरे पपड़ी दर पपड़ी झड़ता रहता है। मुझॆ लगा था तुम भी झड़ जाओगे एक दिन.. समय रहते... पर...।“ वेटर कॉफी ले आया... वह तुरंत कॉफी पीने में व्यस्त हो गया.. मैं अपने अधूरे वाक़्य पर अभी भी टंगा हुआ था। सारा कुछ बोलकर मुझे लगा मानों मैंने कुछ कहा ही नहीं... मैं उसके सामने सालों से चुप सा बैठा था। उसने कॉफी का आख़री सिप लिया और ख़ाली कप मेरी तरफ बढ़ाया दिखाने के लिए कि मैं कॉफी पी चुका हूँ। वह खड़ा हो गया। ’तुम्हें कुछ नहीं कहना है।’ ’मुझे सिगरेट पीना है... यहां कैफे में नहीं पी सकते हैं..।’ मैं तुरंत खड़ा हुआ भीतर जाकर बिल दिया और उसके साथ हो लिया। हम बहुत से घरों की पिछली गली में निकल आए.. यह पिछवाड़े बड़े अजीब होते हैं.. यहां सारी गैरकानूनी हरकत जायज़ लगती है.. सिगरेट पीना भी...। सिगरेट के पहले गहरे कश के साथ उसने कहा.... ’तुम्हें याद है हमारी पहली कविता... तुमने डरे-डरे अपने दोस्तों को सुनाई थी। अभी उस कविता को पढ़ो तो कितनी ख़राब लगती है वह... कैसे लिखी थी।’ मैं हंस दिया मुझे बिल्कुल याद थी वह कविता। बहुत दिनों के बाद हम दोनों साथ हंस रहे थे। ’पर कितनी महत्वपूर्ण थी वह ख़राब कविता... अगर वह लिखी ना होती और उसे सुनाने की लज्जा ना सही होती तो क्या यहां तक यात्रा कर पाते?’ उसने सवाल जैसा सवाल नहीं किया... यह जवाब वाला सवाल था। मैं चुप रहा। ’यह भटकना भी कुछ वैसा ही है... एक दिन फिर हम किसी पिछवाड़े सिगरेट पीते हुए इस भटकने पर साथ हंसेगें।’ उसके यह कहते ही सब कुछ हल्का हो गया। हम दोनों कितना एक दूसरे को समझते है... कितना संयम है उसमें। मैं कुछ देर में उससे सिगरेट मांगी और दो तीन तेज़ कश ख़ीचे... आह! आनंद। हम फिर साथ थे।

Wednesday, September 24, 2014

’पीले स्कूटर वाला आदमी’

मैंने कहीं पढ़ा था- ’वेस्ट में अकेलापन एक स्थिति है, पर हमारे देश में, हम लोगों को हमारा अकेलापन चुनना पड़ता है, और इस बात के लिए हमें कोई माफ नहीं करता है... ख़ासकर आपके अपने..।’ इस देश में लेखक होने के बहुत कम मुआवज़े मिलते हैं उनमें से एक है कि हम अपने भीतर पड़ी हुई गठानों को अपने हर नए लिखे से खोलते चलते हैं। जैसे बड़े से ब्लैकबोर्ड पर गणित का एक इक्वेशन लिखा हुआ है और हम नीचे उसे चॉक से हल कर रहे होते हैं... डस्टर हमारी बीति हुई ज़िदग़ी को लगातार मिटा रहा होता है.. पर कुछ शब्द, कुछ अधूरे वाक़्य जिसे डस्टर ठीक से मिटा नहीं पाता, हम उन टूटी-फूटी बातों का रिफ्रेंस ले लेकर अपने जीवन की इक्वेशन को हल कर रहे होते हैं लगातार। ’पीले स्कूटर वाला आदमी’ इसी कड़ी का एक प्रयास था। ’शक्कर के पाँच दाने’ के बाद यह मेरा दूसरा नाटक था। उस वक़्त बतौर लेखक कुछ भीतर फूट पड़ा था, इतना सारा कहने को था कि मैं लगातार लिखता ही रहता था... इस बीच मैंने कई कविताएं लिखी... कई कहानियां... और मेरा दूसरा नाटक..। कविताएं मुझे बोर करने लगी थीं... मेरी बात कविता की सघनता में अपने मायने खो देती थी... सो मैंने कविताएं लिखनी बंद कर दी... मुझे नाटकों और कहानियों में अपनी बात कहने में मज़ा आने लगा था। असल में मज़ा सही शब्द नहीं है... सही शब्द है ईमानदारी... मैं कविताओं में खुद को बेईमानी करते पकड़ लेता था... मरी क़लम वहीं रुक जाती थी। ईमानदारी से मेरा कतई मतलब नहीं है कि मैं अपनी निजी बातों को नाटकों में लिखना पसंद करता था... ईमानदारी का यहां अर्थ कुछ भिन्न है.... एक लेखक के सोचने, जीने, महसूस करने और लिखने के बीच कम से कम ख़ाई होनी चाहिए.... हर लेखक (ख़ासकर जिनका लेख़न मुझे बहुत पसंद है) अपने नए लिखे से उस ख़ाई को कुछ ओर कम करने का प्रयास करता है। पीले स्कूटर वाला आदमी एक लेखक की इसी जद्दोजहद की कहानी है... वह कितना ईमानदार है? वह जो लिखना चाहता है और असल में उसे इस वक़्त जो लिखना चाहिए के बीच का तनाव है। मैं उन दिनों काफ़्का और वेनग़ाग के लिखे पत्रों को पढ़ रहा था.. वेनग़ाग की पेंटिग़ Room at Arles ने मुझे बहुत प्रभावित किया था.. पीले स्कूटर वाले आदमी का कमरा भी मैं कुछ इसी तरह देखता था। मेरे लिए वेनग़ाग के स्ट्रोक्स उस कमरे में कहे गए शब्द हैं, पात्र हैं और संगीत है...। अपने लेखन के समय के रतजगों में मैंने हमेशा खुद को संवाद करते हुए सुना है... आप इसे पागलपन भी कह सकते हैं.. पर मेरे लिए यह अकेलेपन के साथी हैं। मेरे अधिक्तर संवाद किसी न किसी लेखक से या किसी कहानी/उपन्यास के पात्रों से होते रहे हैं... मुझे लगता है कि मेरे पढ़े जाने के बाद कुछ लेखक, कुछ पात्र मेरे कमरे में छूट गए हैं। देर रात चाय पीने की आदत में मैं हमेशा दो कप चाय बनाता हूँ.. एक प्याला चाय मुझे जिस तरह का अकेलापन देता है उसे मैं पसंद नहीं करता... दो प्याला चाय का अकेलापन असल में अकेलेपन का महोत्सव मनाने जैसे है...। दूसरे प्याले का पात्र अपनी मौजूदग़ी खुद तय करता है... आप किसी का चयन नहीं करते.. आप बहते है उनके साथ जो आपके साथ हम-प्याला होने आए हैं। यही पीले स्कूटरवाले आदमी का सुर है. और दो चाय के प्यालों के संवाद है।

Monday, January 13, 2014

साथी.....

एक मधुर स्वर वाली चिड़िया बाल्कनी में आई...। वह बहुत शर्मीली है... उसे देखने के लिए सिर घुमाता हूँ तो वह दूसरी बाल्कनी में चली जाती है...। मैं चाय बनाने के बहाने जब दूसरी बाल्कनी के पास गया तो वह दिख गई... गहरी काले रंग की... लाल रंग की नोक अपने माथे पर चढ़ाए हुए...। मेरी सुबह मुस्कुराहट से फैल गई। मैं बहुत हल्के कदमों से बाल्कनी के कोने में खड़ा हो गया... सूरज मेरे चहरे पर सुन्हेरा रंग उड़ेल रहा था। मैं उस चिड़िया को अपना सपना सुनाने लगा... कल रात के कुछ डर मैं उस सपने में छुपाना चाहता था... पर वह सूरज की रोशनी में चीनी में लगी चींटियों की तरह बाहर आने लगे...। आजकल मेरी दोस्ती कूंए में पल रहे कछुए से बहुत बढ़ गई हैं...। उसका नाम मैंने ’साथी’ रखा है... अपने चुप धूमने में मैं जब ’सुपर मिल्क सेंटर’ चाय पीने जाता हूँ तो कुछ आत्मीय संवाद अपने साथी से कर लेता हूँ। मैंने साथी को अपने सपनों के बारे में कभी नहीं बताया... मुझे डर है कि वह एक दिन कुंआ छोड़कर चला जाएगा....। सपनों के सांझी कुछ समय में चले जाते हैं...। मैं उससे दैनिक दिनचर्या कहता हूँ... उसे आश्चर्य होता है कि मैं कितना उसके जैसा जीता हूँ...। मैंने उससे कहा है कि मेरा भी एक कुंआ है... कुछ देर ऊपर रहने पर मैं भी भीतर गोता लगा लेता हूँ और बहुत समय तक किसी को नहीं दिखता...। भीतर हम दोनों क्या करते हैं इस बात की चर्चा हम दोनों एक दूसरे से नहीं करते हैं...। साथी कभी-कभी मेरे कुंए की बात पूछता है... मेरे पास अपने कुंए के बारे में बहुत कुछ कहने को नहीं होता... अकेलपन की बात उससे कहना चाहता हूँ पर उससे अकेलापन कैसे कह सकता हूँ...? सो मैं एक वाचमैन के बारे में बात करता हूँ जो मेरा क्रिकेट दोस्त है... उससे मैं क्रिकेट की बात करता हूँ.... बाहर ’सुपर मिल्क सेंटर’ पर एक लड़का है जो मेरे लिए चाय लाता है... वह अभी-अभी दोस्त हो चला है... पता नहीं क्यों वह मुझसे अंग्रेज़ी में बात करना चाहता है... थेंक्यु और नाट मेनशन वह कहीं भी बीच संवाद में कह देता है...। फिर एक गोलगप्पे वाला भी है जो एक लड़की को पसंद करता है... वह उस लड़की से गोलगप्पे के पैसे नहीं लेता... वह अगर अपनी सहेलियों के साथ आती है तब वह उसकी सहलीयों से भी पैसे नहीं लेता...। जब वह लड़की गोलगप्पे खा रही होती है तो उसकी गोलगप्पे बनाने की सरलता... लड़खड़ा जाती है...। लड़की गोलगप्पे खाते हुए बहुत खिलखिलाकर हंसती है.... जब जाती है तो दूर जाते हुए एक बार पलटकर गोलप्पे वाले लड़के को देख लेती है... वह खुश हो जाता है। साथी बार-बार मुझसे उस गोलगप्पे वाले लड़के के बारे में पूछता है... क्या हुआ उसका उस लड़के के साथ। मैं उससे कहता हूँ कि असल में मैं इसके बाद की कहानी जानना नहीं चाहता हूँ... यह ठीक इस वक़्त तक इतनी खूबसूरत है... कि मैं खुद भीतर गुदगुदी महसूस करता हूँ.. पर ठीक इसके बाद क्या होगा? इसपर मेरे भीतर के डर धूप में चीनी के डब्बे मे पड़ गई चींटियों की तरह बाहर आने लगते हैं...। साथी कहता है कि तुम बहुत डरपोक हो... मैं कहता हूँ... मैं हूँ...। साथी से संवाद ख़त्म करके जब भी मैं सुपर मिल्क सेंटर की तरफ जाता हूँ तो भीतर एक गिजगिचापन महसूस करता हूँ....। मैं अपने इतने सुंदर साथी से भी वही टूटी हुई बिख़री हुई बातें करता हूँ...। फिर तय करता हूँ कि एक किसी नए सुंदर दोस्त से मिलूंगा... उसे उसके बारे में बताऊंगा... ओह! उसे मैंने अपनी बाल्कनी पर आई चिड़िया के बारे में भी नहीं बताया है... अचानक मुझे मेरे अकेलेपन के बहुत सारे छोटे-छोटे दोस्त दिखने लगे... ओह अभी तो ओर भी कितना है... कितना सारा है जिसे मैं कह सकता हूँ...। जैसे बोबो के बारे में...। बोबो की आँखें... उसकी पवित्रता...(पवित्र शब्द कितना दूर लगता है मुझसे.. इस शब्द के लिखने में भी मेरी उंग्लियां लड़खड़ा जाती हैं।) मैं बोबो के बारे में साथी से कहूंगा.... कहूंगा कि वह बोबो है जो मुझे मेरे छुपे में तलाश लेता है...। आज की सुबह बहुत पवित्र लग रही है... आज की सुबह...

Friday, August 30, 2013

नाम “गुड्डू” निकला... (पिछली पोस्ट से जुड़ा हुआ....)

आह!!! उस चाय वाले का
मेरे पूरे शरीर ने उसका नाम सुनते ही ‘नहीं ई ई...’ चीख़ा। इसलिए शायद लेखक जिसके बारे में भी लिखना चाहते हैं... उसका नाम वह खुद ही रखते थे। किसी के होने से ही उसकी कहानी घट रही होती है...। सुबह की लंबी walk समुद्र पर रुकी....। सुबह छ: बजे समुद्र उफान पर था.... पानी की आवाज़ भीतर घट रहे संसार को संगीत दे रही थीं... मैं शांत बैठा रहा। दूर एक अकेली लड़ी बैठी हुई थी..... सिर पर चुनरी ओढ़े.... अपनी गुलाबी चप्पलों को बगल में रखे हुए वह अपना सिर घुटनों में दबाए हुई थी। बीच-बीच में वह समुद्र की तरफ देख लेती.. मैं उसकी चुनरी में से उसका चहरा देखने की कोशिश कर रहा था... चहरे के बिना कैसे कहानी जानी जा सकती है....। सुबह छ: बजे मेरे अलावा वह ही थी उस Beach पर.... सो मेरी जिज्ञासा, हर उसके सिर उठाने पर उसके सामने कूद जाना चाहती थी। मैंने सोचा मैं अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हूँ.... कुछ गाकर... ख़ांसकर... अचानक हंसकर... या इन पत्थरों पर गिरने का अभिनय करके...। मैंने कुछ नहीं किया...। असल में इस सुबह में बहुत शांति है... सिर्फ पानी की आवाज़ है.. मैं उस पवित्रता में और कुछ भी नहीं हिंसक नहीं देख सकता था। मैंने उस लड़की की तरह पीठ मोड़ ली..... हम दोनों अपने अपने-अपने एकांत के साथ पूरे संसार के सामने बैठे थे...। एक बारको मुझे लगा कि मैं असल में पृथ्वी के ऊपर बैठा हूँ..... और पूरे ब्रंम्हांड को अपने सामने देख रहा हूँ... और दूसरे तरफ वह गुलाबी चप्पल वाली लड़की है जो मेरी ही तरफ पृथ्वी के ऊपर बैठी है पर वह ब्र्ह्मांड नहीं वह धरती के गर्भ में कहीं झांकने की कोशिश कर रही थी...। अचानक मुझे उसका धरती का मूल टटोलना मेरे ब्रह्मांड बांचने से ज़्यादा सुखद लगने लगा...। मैंने उसकी तरफ पलटा... और चौंक पड़ा वह मुझे देख रही थी.... और सब बिख़र गया... वह भी “गुड्डू...” निकली...। उसके हाथ में मोबाईल था वह गाने और मेसेज़ कर रही थी..... उसके देखने में एक दूसरी कहानी थी... जो इस सुबह की मेरी कहानी में दर्ज नहीं हो पा रही थी। मैं उठा और वहां से तुरंत चल दिया...। हमेशा दिमाग़ में इस तरह एक अजान लड़की को देखकर लगता है कि आज मैं पहली बार जीवन में किसी ऎसी लड़की से मिलूंगा जिसका मैं बरसों से इतंज़ार कर रहा था....। जो घटक की फिल्म से सीधा निकलकर आई हो... जो इतने सालों टेगोर की कहानी कविता में भटकर रही थी ... आज सुबह छ: बजे मैंने Beach पर उसे देख लिया है....। बस ठीक उसे वक़त मुझे वहां से निकल जाना चाहिए था... और अपनी डॆस्क पर बैठकर एक कहानी लिख देनी थी.... ’सुबह के घटने में उसका होना....’। पर मैंने ऎसा नहीं किया.... मुझे उत्सुक्ता थी...कुछ दूसरा देखने की.... कहीं कुछ छिपा बैठा है उसे ढूंढ़ निकालने की... कुछ नया आश्चर्य वगैहरा-वगैहरा। “जो मुझसे नहीं हुआ... वह मेरा संसार नहीं....” (कहीं पढ़ा था... याद आ गया।) वापसी में लगभग अलग-अलग टपरियों पर चाप पी.... गुरुद्वारे भी मथ्था टेक लिया वहां भी चाय मिल गई। वापिस आकर पहली बार मैंने ’सुबह’ Coetzee का लेटर पढ़ा..... मातृभाषा पर... उसमें Derrida की किताब का ज़िक्र है... Monolingualisam of the Other – 1996… यह किताब बहुत इंट्रस्टिंग लग रही है..। एक बार किसी ने शमशेर से मातृभाषा के ऊपर कुछ पूछा था... तो उनका जवाब था कि इस दुनियां में बोली जाने वाली सारी भाषांए हमारी मातृभाषा हैं। मुझे यह जवाब बहुत सुंदर लगा था... और कुछ इसी तरीक़े की पर पेचीदगी के साथ Derrida की किताब होगी जिसे पढ़ने में मज़ा आएगा.. क्यों कि वह बहुत सारी भाषा के जानकार थे। इसके बाद अचानक मेरी निग़ाह एक पुरानी ख़रीदी हुई किताब पर पड़ी जिसे जल्द पढूंगा की अलमीरा में रखा हुआ था... THE MASATER OF GO-YASUNARI KAWABATA… अभी इसे शुरु किया है...। “IT IS EASY TO ENTER THEE WORLD OF THE BUDDHA, IT IS HARD TO ENTEER THEE WORLD OF THE DEVIL.”

सुबह...

पिछले कुछ दिनों से PAUL AUSTER AND J.M. COETZEE बीच में हुए पत्राचार पढ़ रहा हूँ। साथ में कुछ दूसरी किताबों में दूधनाथ सिंह की ’लौट आ ओ धार..’ पता नहीं कहां से फिर छोले में साथ हो ली है। मुझे यह नाम बहुत पसंद है... HERE AND NOW… दो बड़े लेखक... खेल, लेखन, अर्थशास्त्र, दोस्ती... बूढ़ा होना... हर विषय पर कितनी सरलता से लिख रहे हैं। मैं इस किताब को रोज़ लगभग ऎसे पढ़ता हूँ कि एक ख़त मुझे भी आया है आज...। सुबह मैं PAUL का जवाब/ ख़त... पढ़ता हूँ और शाम का इंतज़ार करते हुए अपनी बाल्कनी में शाम की चाय के साथ Coetzee को। मैंने शाम Coetzee को क्यों पढ़ता हूँ मुझे नहीं पता...। मैंने कभी Paul के ख़त शाम को नहीं पढ़े...। कैसे लेखक संगीत की तरह हैं... जिस संगीत को सुनकर हम सुबह उठना पसंद करते हैं... उस संगीत को हम अपनी शाम के होने में शामिल नहीं करना चाहते....। बहरहाल...मैं इन दोनों के बीच डॉकिया जैसा कुछ हो गया हूँ..... नहीं डॉकिया नहीं... लेटर बाक्स...। ठीक इस वक़्त रात के तीन बज रहे हैं...। बाहर अभी ज़ोरों की बारिश शुरु हुई... मैं ’लेटर बाक्स’ शब्द लिखकर मुस्कुराया.... इस शब्द पर भी और बारिश के बुलावे पर भी...तुरंत बाल्कनी में भागा...। फिर याद आया कि चाय का कप तो टेबल पर ही छूट गया है। वापिस आया और चाय का कप लेकर बाल्कनी में बैठ गया। बहुत हल्की बारिश की फुहारें चहरे पर पड़ रही थी.... पूरी कालोनी में सन्नाटा था...। मैं बची-कुची आवाज़ों पर ध्यान देने लगा..। आंवले का पेड़ अपनी पत्तीयां छोड़ रहा है.... बाल्कनी के नीचे मानों पीला कालीन बिछ गया है। मैं वापिस भीतर आया मानों मुझे कुछ याद आया हो और मैंने वान गॉग के कुछ पत्र पढ़ ढ़ाले... “मुझ पर भरोसा रखना....”। हर बार एक अजीब आदत सी पड़ी है कि खुद को समेट लो...। झाड़ू लगाकर सारे बिखरे हुए को एक तरफ कर दो...। दो बजकर पैंतिस मिनट पर नींद खुली थी... मैं फिर सो जाता तो समेट लेता खुद को.... मैं उठ बैठा... लिखना, चाय, बारिश और चुप्पी....। अभी कुछ देर में मैं नीचे जाऊंगा... सुबह होने को देखने... कालोनी के गेट पर एक चाय वाला है जो सुबह.... पांच बजे दुकान खोल देता है। पीले बल्ब की रोशनी में जब वह मुझे सुबह-सुबह आता हुआ देखता है तो मुस्कुरा देता है...। शुरु कुछ दिनों में मुझे लगता था कि वह मेरे ऊपर हंस रहा है.... (इस शहर में आप अपने अकेलेपन पर झेंपना शुरु कर देते हो....) पर मैं ग़लत था... वह स्वभाव का अति उत्साही व्यक्ति है। सुबह मुझे जैसे आदमी को देखकर वह प्रसन्न हो जाता है। बारिश अभी रुक चुकी है...। “जो नहीं है... जैसे कि ’सुरुचि’ उसका ग़म क्या... वह नहीं है..” शमशेर का लिखा पढ़ा। कुछ देर तक उनकी बाक़ी लिखी चीज़े भी गूंजती रहेगीं। मैंने फिर खुद को समेटा... बाहर बाल्कनी में पहुंचा तो कुछ घरों से ख़ांसने बुहारने की आवाज़े आने लगी थी...। यह शहर ज़िदा हो रहा है.... हम सब यक़ीन से सोए थे कि सुबह उठ बैठेगें.... और सुबह हो रही थी। मैं आज उस चाय वाले का नाम पूछूंगा.... बस... नाम...।

Sunday, August 18, 2013

A very easy Death.....

A very easy Death…. Simone de Beauvoir …. “WHETHER YOU THINK OF IT AS HEAVENLY OR EARTHLY, IF YOU LOVE LIFE IMMORTALITY IS NO CONSOLATION FOR DEATH.” मृत्यु... कितना गहरा असर है इस किताब का...। बचपन की बहुत छोटी-छोटी चीज़ों का असर हम अपने पूरे जीवन देख सकते हैं...। माँ ऎसा शब्द है जो घर की तरह काम करता है....। दो बहने... Poupette और Simone …. और उनके उनकी माँ से संबंध... Complex, sometimes shocking …। हस्पताल में हर एक दिन का धीरे-धीरे गुज़रना...। माँ के चहरे के बदलते रंगों में, उनके सपनों में, उनके दिखने और नहीं दिखने में दिन का सरकना। मृत्यु को अपनी माँ के अगल बगल देखना और कुछ ना कर पाना... माँ की पीड़ा जिसमें उन्हें मृत्यु जल्दी आ जाए बिना तड़पे... यह प्रार्थना करना और फिर उस प्रार्थना की गलानी। एक बूढ़ी माँ का मरना बहुत स्वाभाविक है... पर सिमोन ने जिस तरह बहुत स्वाभाविक ढ़ंग से उनके अंतिम दिनों का ब्यौरा लिखा है... हम पर उनकी मृत्यु असर करने लगती है... और फिर वह बीच में उनकी बहन और उनके माँ से संबंध के बारे में लिखती है तो हमें पता चलता है कि वह माँ जो बिस्तर पर लेटी हुई है उनका कितना गहरा प्रभाव है दोनों बहनों पर.... कुछ ही देर में आप सिमोन की आँखों से सोमवार.. मंगलवार... का गुज़रना जीने लगते हैं। “When someone you love dies you pay for the sin of outliving her with a thousand piercing regrets.” आख़री पन्नों में…. जब मृत्यु के बाद माँ चीज़ों में बट जाती है...। सिमोन की बहन उनका रिबिन रखना चाहती थी... पर उससे क्या होगा? जब उन्हें शमशान ले जाया जा रहा था तो सिमोन की बहन ने कहा.... “THE ONLY COMFORT I HAVE IS THAT IT WILL HAPPEN TO ME TOO… OTHERWISE IT WOULD BE TOO UNFAIR.” हम किस तरह किसी के चले जाने की खाली जगह को भर सकते हैं? हमें हर बार लगता है कि वह गुण हमें आता है... पर हम हर बार हारे हुए उन ख़ाली जगहों में अपनी ही आवाज़ को गूंजता हुआ सुनते हैं। किसी अपने के चले जाने को पूरी ज़िदग़ी ढ़ोते रहते हैं.... फिर-फिर बार-बार वह अलग-अलग अर्थों में अलग-अलग कमरों में हमसे टकराता है पर हम उसे कभी देख नहीं पाते। जब मेरी नानी की मृत्यु हो रही थी तब मैं उनके बगल में बैठा था... ठंड थी... हम सब उनके शरीर से प्राण निकल जाने का इंतज़ार कर रहे थे... वह उल्टी सांसे लेने लगी थी। तब मैंने उनकी देह को बहुत करीब से देखा था... सूख़ी सी देह... मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था कि इसी शरीर ने मेरी माँ को जन्म दिया है....। तभी मुझे उनकी तनी हुई नसें दिखी थी... पता नहीं कितने सालों का संघर्ष... उन नसों में सूखकर जम गया था। मैं आज तक उस रात को नहीं भूला हूँ...। जब सिमोन अपने माँ के खुले हुए मुँह की बात कर रही थीं तब मैं अपनी नानी के चहरे को देख सकता था साफ...। इस किताब ने भीतर पल रहे पता नहीं कितने छोटे-छोटे हिस्सों को ज़िदा कर दिया है। हम सबने अपने माँ बाप की मृत्यु की कल्पना की है... पर हम कभी भी उसके लिए खुद को तैयार नहीं कर सकते...। सिमोंन जितनी बार हस्पताल का कमरा नम्बर 114 लिखती हैं किताब में... मैं उस कमरे के बाहर उनका खड़ा रहना देख सकता हूँ... धीरे-धीरे उनका रेंगते हुए उस दरवाज़े का खोलना.. धीरे-धीरे मृत्यु के करीब आने को लिखना। मैं जब दुबे जी (पं. सत्यदेव दुबे) को देखने हस्पताल गया था... वह कोमा में थे... उनकी मृत्यु के कुछ दिन पहले की बात है.... मैंने उनके पास खड़े रहकर पता नहीं क्यों उनके माथे पर हाथ रख दिया था... (जब वह ज़िंदा थे मेरी कभी हिम्मत नहीं थी कि उनका माथ छू दूं...)। शायद मुझे लगा था कि वह कोमा में कुछ बुरा सपना देख रहे हैं... उनकी देह बार-बार कांप जाती थी। उनके माथे पर हाथ रखते ही पता नहीं क्या हुआ मैं ज़ार-ज़ार रोने लगा... मैं खुद को संभाल नहीं पाया.... पता नहीं... आज यह किताब पढ़ते वक़्त मुझे बार-बार मेरा दुबे जी का माथा छूना याद आ रहा था... पता नहीं...मैं अपने रोने को लेकर इतना झेंप क्यों रहा था...... “THERE IS NO SUCH THING AS A NATURAL DEATH: NOTHING THAT HAPPENS TO A MAN IS EVER NATURAL, SINCE HIS PRESENCE CALLS THE WORLD INTO QUESTION. ALL MEN MUST DIE: BUT FOR EVERY MAN HIS DEATH IS AN ACCIDENT AND, EVEN IF HE KNOWS IT AND CONSENTS TO IT, AN UNJUSTIFIABLE VIOLATION.”- Simone ….

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल