मौन में बात...

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Wednesday, February 23, 2011

ख़त जैसा कुछ...

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किससे कहूं अपने डरों और अंधेरे कोनों की बातें.. इसलिए तुम्हारे पास वापिस आया हूँ, बहुत दिनों के बाद। डरों और अंधेरे कोनों में ‘मुझे कुछ भी न...
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किससे कहूं अपने डरों और अंधेरे कोनों की बातें.. इसलिए तुम्हारे पास वापिस आया हूँ, बहुत दिनों के बाद। डरों और अंधेरे कोनों में ‘मुझे कुछ भी न...
Sunday, February 6, 2011

शब्द और उनके चित्र....

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मैं तुम्हारा नाम लिखना चाहता था पर मैंने लिखा ’आशा’... फिर तुम्हें ढ़ूढना शुरु किया...। तुम्हारा चित्र ’आशा’ के भीतर ही कहीं था। ’आशा’ मैंने...
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Monday, January 31, 2011

मौन...

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इन दिनों आनंद की उन सीमाओं को छूने की कोशिश में हूँ जिनकी कभी मैं कल्पना किया करता था। अभी वहाँ था और अभी अकेले..। चंद चिपक के चलने वाले, अब...
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Sunday, January 9, 2011

निर्मल और मैं....

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निर्मल- क्या हाल है भाई? मैं- निर्मल जी नमस्कार है.. बड़े दिनों बाद आना हुआ? निर्मल- तुम्हारी व्यस्तता ने तुमने मुझे याद ही नहीं किया। मैं- ...
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Thursday, January 6, 2011

तीन एकांत...

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एक एकांत नाम का शब्द लिखूं... एक खालीपन को जी लूं... एक अकेलेपन के साथ नाच लूं....। मैं उत्सव मनाना चाहता हूँ इन तीनों का... मैं संन्नाटे मे...
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Wednesday, September 15, 2010

निर्मल और मैं....

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निर्मल और मैं... निर्मल- देखो इस बार मैं खुद ही चला आया बिना तुम्हारे बुलाए। मैं- आपका इंतज़ार था मुझे। निर्मल- तो इन दिनों क्या चल रहा है। ...
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परिचय

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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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