मौन में बात...

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Sunday, March 3, 2013

ख़त...

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जैसे ठंड के दिनों में सुबह टांगे पर बैठकर स्कूल जाना... परिक्षा के दिनों में खेलने के आधे घंटे का सुख चुरा लेना... अपने घर के अंधेरे कोने मे...
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Sunday, February 24, 2013

प्यादा...

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दीवार पर हम चिपक जाते हैं...। किसी तरह से बस दृश्य से गायब हो जाए... दूर चांद पर दीवार दिखती है.. उस दीवार पर मौसम नहीं बदलते हैं। नीचे मौसम...
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Friday, February 15, 2013

धूप....

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(अपनी लिखी जा रही कहानी का एक अंश...) धूप थी बहुत तेज़... आँखें बार-बार बंद हो जाती थीं। वह बादलों जैसे कभी आती तो हम अपने छोटे-छोटे बर्तन इ...
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आकार.....

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एक आकार दिखता है। कुछ बातों में... मुलाकातों में... जब भी एक अच्छा मनुष्य होने की बातों पर ज़ोर देता हूँ वह दिखने लगता है... आकार!!! मैं बा...
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Thursday, February 7, 2013

पेटर्नस........

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कल रात खत्म हुई थी वर्जीनिया वुल्फ की कुछ पंक्तियों से....। उनके लेखन का शायद यह सबसे असरदार पहलू है कि वह गूंजता है.. बहुत दिनों तक..। आज ...
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Wednesday, February 6, 2013

NOTES FROM A SMALL ROOM.....

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बहुत सुबह उठना मुझे हमेशा से पसंद है। मैं अपने कमरे में अंधेरा रखता हूँ और बहुत धीमी गति से रोशनी का कमरे में प्रवेश देखता हूँ.... यह हमेशा...
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Tuesday, February 5, 2013

बिना वजह...

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काम खत्म होता है... एक सपना जिसे बहुत मन से देखा गया था खत्म होता है... दिन, पूरा जी लेने के बाद अपने अंजाम पर पहुंच जाता है... शाम टहलते-टो...
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परिचय

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मानव
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल
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