Saturday, May 10, 2008

अपने से...

हमारे सीखे और समझे हुए इतिहास ने हमें एक तरह का पर्यटक बना दिया है। हम इस दुनियाँ को उसके पूरे आश्चर्य से बस देख सकते है, धूम सकते है, यहाँ जब तक ज़िन्दा है रह सकते है। पर इस बात पे मेरा हमेशा एक तरह का प्रश्नचिन्ह बना रहेगा कि हम उसे कितना जी सकते है? प्रथम बार किसी भी चीज़ से, किसी भी तरह का संबंध स्थापित करना, उसका प्रथम बार अनुभव करना कितना कठिन है?यहाँ तक कि मौत के बारे में भी हम इतना ज़्यादा जानते है कि अपनी मौत आने पे भी, शायद हम उसका अभिनय करते नज़र आए।
जैसे मैंने जब गोवा जाना, पहली बार अपने दोस्तों के साथ plan किया, तो मेरे दिमाग़ में गोवा की एक तस्वीर थी,कुछ सुनी हुई, कुछ तस्वीरों में देखी हुई। गोवा जाने के पहले ही मैं तय कर चुका था कि वहाँ जाकर हम लोग कैसे ‘’enjoy’’ करेगें, और आश्चर्य की बात है कि हमने सच में लगभग वो ही सब किया जो हम लोग सोचकर गये थे। मतलब गोवा पहली बार जाकर भी मैं पहली बार गोवा नहीं गया था। या जैसे मेरे सामने शेर आ जाए तो क्या मैं उस शेर को देख सकता हूँ जो मेरे सामने आया है। मुझे लगता है कि मैं नहीं देख सकता हूँ। मैं हमेशा उस शेर को देखने को बाध्य हूँ जिसके किस्से या कहानियाँ मैंने सुनी हुई है। इसलिए या तो मैं वहाँ से डर के मारे भागने का प्रयत्न करुगाँ या उसे मार डालूगाँ, और शायद इसी लिए हमने लगभग सारे शेरों को मार ही डाला है।
मैं उस अभिनय से किस तरह से बच सकता हूँ जो हम लगातार जीते हुए करते है, मैं यूँ भी काफी असामाजिक प्राणी हूँ पर समाज तो यूँ भी लगातार एक साथ रहने का अभिनय ही तो है।समाज में जो व्यक्ति सामूहिक अभिनय के मापदंड़ो से अलग जाएगा वो असमाजिक हुआ। मुझे सामुहिक अभिनय से उतनी दिक्कत नहीं है जितनी दिक्कत है कि समाज बज़ार की मानसिक्ता को बढ़ावा देता है।हम समाज से बाहर नहीं है, पर मैं समाज की परिधी पर हूँ...शायद परिधी पर चलने का अभिनय करता हुआ।:-)

5 comments:

Parul said...

समाज तो यूँ भी लगातार एक साथ रहने का अभिनय ही तो है।
iss abhinay se mukti hai kya kabhi? jo abhinay nahi kartey..asaamaajik kahlaatey hain...sahi kahaa aapney..bahut himmat chahiye asaamaajik bannay ke liye bhii....kaafi dino baad padhaa aapko

Malay M. said...

Hurreyyyyy .... Maanav is backkk !!! I was actually worried if this gap would effect your pen & not let it be as sharp as it was ... me feeling so happy to be proved wrong !! This piece shines just as your other writings do ...

Incidentally , if I could understand it , this one is very much related to very microscopic introspection of oneself & conversion of general thoughts into similar social behaviour . I can bet that very few ( read only the 'genious' variety ) people indulge in self introspection ( I am sure rest of them dont want to scare themselves ) . This isnt being on the 'cicumference' or even being a rebel for you , it is the begining of the journey of a trend setter / changer / maverick , someone who would show path to the rest of ordinaires towards brining in noble changes ... keep it up boy ...

Anonymous said...

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Anonymous said...

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल