Thursday, May 19, 2011

"मौन में बात..."





कुछ आहट हुई.. मेरी आँख खुल गई। हड़बड़ाहट-घबराहट। पहले झटके के बाद, मैं ’कोई है!’ के विचार पर मैं स्तब्ध था। बिना हिले-डुले मैं एक टिड्डे सा रुका रहा... लगा मेरे हिलने से वह आहट कहीं दब ना जाए। ’कोई है!’... ’कोई है!’.....”कोई है!”..... कुछ देर बाद मैंने हथियार डाल दिये...कोई नहीं है। मैं वापिस बिस्तर पर पसर गया। चादर खींच कर मुँह पर डाल दी। क्या मैं वापिस सो चुका था? मानों बीच में कुछ हुआ ही ना हो... कोई आहट ना हो, मेरे ’कोई है!’ का इंतज़ार सब झूठा हो।
एक सन्नाटा है मेरे अगल-बगल... इस सन्नाटे के ढ़ेरों शोर हैं... मैं अपने अकेलेपन में अलग-अलग शोर चुनता हूँ.. सुनता हूँ। पर मेरे अकेलेपन में एक आहट है जो हमेशा बनी रहती है कि बाहर कोई है.... कोई आने वाला है। मुझे असल में हमेशा किसी-न-किसी का इंतज़ार रहता... ना..ना..ना... किसी-न-किसी का नहीं... किसी का। कोई है जिसे मैं नहीं जानता हूँ... या जानता हूँ.. पर मिला नहीं हूँ। या मिलना चाहता हूँ बेसब्री से.. ऎसा कोई आने ही वाला है। अचानक दरवाज़े पर आहट होगी और मेरे दरवाज़ा खोलते ही मुझे वह दिख जाएगा... वह जिसका मैं सालों से... या शायद जबसे मुझे याद है तब से, इंतज़ार करता आ रहा हूँ। मुझे हमेशा से लगता था कि मैं अकेला रह रहा हूँ... जबकि मैं कतई अकेला नहीं रह रहा हूँ। मैं हमेशा इंतज़ार में हूँ उस एक के जो बस आने को है... इसका मतलब मैं हमेशा से उस एक के साथ रह रहा हूँ... और रहता रहूँगा जो कभी भी नहीं आएगा !!!!!!!
“सिमोन से मिलने जाना है।“
ओफ !!! अब सोया नहीं जाएगा। मैंने आँखों से चादर हटा ली...। टकटकी बांधे दीवार को देखता रहा। बहुत पहले... किसी चुप रात में मैंने उस दीवार पर पेन से, लेटे हुए... एक रोता हुआ चहरा बनाया था। हमेशा ऎसे कुछ हज़ार क्षणों में मैं कसम खाता हूँ कि उठते ही इसे मिटा दूंगा। पर कभी मिटा नहीं पाया... उठते ही भूल जाता हूँ। मैंने करवट बदल ली, उस रोते हुए चहरे की बजाए मैंने चलते हुए पंखें को देखना ज़्यादा बहतर समझा। कम से कम वह दीवार से तो बहतर ही है... वह चल रहा है... कहीं पहुच नहीं रहा है यह अलग बात है मगर कुछ कर्म में तो लीन है ना..। उसका कर्म है हवा देना... वह चल रहा है सालों से लगातार और हवा फेंकता आ रहा है।
मुझे खुद पे, कुछ बातों को लेकर अटूट विश्वास है। जैसे सालों से मुझे पूरा विश्वास है कि मैं रोज़ उठूगां और उठते ही भूल जाऊंगा कि मुझे दीवार पर बने उस रोते हुए चहरे को मिटा देना है.. हमेशा के लिए.. मैं उसे कभी भी नहीं मिटा पाऊंगा... और अभी, ठीक इसी वक़्त मैं सो नहीं सकता, मैं अभी कुछ ही देर में उठुंगा और एक बार दरवाज़ा खोलकर ज़रुर देखूंगा कि शायद पंद्रह मिनिट पहले जो मुझे लगा था कि आहट है.. वह अगर सच में आहट है तो वह अभी भी उस आहट के बाद वहीं, दरवाज़े के बाहर प्रतिक्षा में खड़ा होगा। अभी जितनी भी देर मैं बिस्तर में उलट-पलट रहा हूँ यह सब...दरवाज़ा ना खोलने के विरुद्ध मेरी कार्यवाही हैं... और कुछ भी नहीं।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। मैं सकबका गया... ओह! तो सच में कोई बाहर खड़ा है। मैं दरवाज़े की तरफ लपका। दरवाज़ा खोलते ही सामने मुझे एक आदमी खड़ा दिखा...
’बिल...?’
’हें...!’
’अखबार का बिल...?’
’हाँ...’
मैंने उसके हाथ से पर्ची ली और भीतर आ गया। मुझे लगा उसने मुझे पकड़ लिया है। उसे पता चल गया है कि मैं... ओह!!!
मैंने सरसरी निग़ाह से बिल देखा। कुछ देर अपना पर्स तलाशा... जब मिला तो उसमें मात्र बत्तिस रुपये थे। अख़बार वाला किसी बुरी ख़बर की तरह काफी देर से बाहर खड़ा था। मैं उसके पास गया।
’दोस्त, अभी पैसे तो.. नहीं हैं।’
’ठीक है कल आता हूँ।’
वह बड़बड़ाता हुआ चला गया। मेरे पास कभी भी पूरे पैसे नहीं रहते... नहीं मैं कभी भी थोड़े से नहीं चूकता हूँ। मेरे पास थोड़े होते हैं... और बहुत सारा, उस वक़्त की ज़रुरत का पैसा, मेरे पास कभी भी नहीं होता।
उसके चले जाने के बाद मैंने दरवाज़ा बंद किया... और उसके बिल की ओर घूरकर देखने लगा। एक सौ बावन रुपये...। अरे!!! यह तो मुझे ठग रहा है। इसने बीच में करीब दस दिन मुझे अख़बार नहीं दिया था। उसके पैसे इसने काटे ही नहीं जबकि मैंने इससे कहा था। वह मुझे ठग रहा है... वह मुझे ठग रहा है... और इस बात से मुझे खुशी हुई। मुझे असल में मेरा ठगा जाना हमेशा से अच्छा लगता आया है। जब मेरा कोई दोस्त मुझसे पैसे उधार लेता है और समय रहते लौटाता नहीं है तो मुझे उसके बाद से हमेशा उससे मिलने में खुशी मिलती है...। मैं कभी उससे पैसों का ज़िक्र नहीं करता... वह खुद कभी भी बात नहीं उठाता... पर मैं खुश हो रहा होता हूँ। मुझे मेरा लगातार ठगे जाना खुशी देता है।
कभी-कभी मैं इसके विरुद्ध खड़ा होना चाहता हूँ... चिल्लाना चाहता हूँ कि बस अब से मैं कसम खाता हूँ कि मैं कभी भी ठगा नहीं जाऊंगा। इस कसम के खत्म होते ही पता चलता है कि संधर्ष कितना बड़ा है... वह संधर्ष आलू-प्याज़ से लेकर पूरे बज़ार में, और पूरे बाज़ार से लेकर खुद मुझ तक फैला हुआ है...। मैं भी लगातार खुद को ठगता रहता हूँ.... अब इस ठगने में... कौन ठग है और कौन ठगा जा रहा है???
यूं जब दस दिन अख़बार नहीं आया था तो मुझे एक तरह की खुशी हुई थी। रोज़ सुबह ख़बर का एक जत्त्था मेरे घर में ’धम्म..’ से गिर जाता है। जब तक मैं उसे पुराने अख़बारों के ढ़ेर के ऊपर नहीं फैंक देता मुझे लगता है कि एक ज़िम्मेदारी है, ’यह पूरा अख़बार पढ़ने की...’ जिसे मैं रोज़ सिर्फ चित्र देखकर पूरी कर लेता हूँ। मुझे ज़िम्मेदारीयों से बहुत कोफ़्त होती है। किसी भी किस्म की ज़िम्मेदारी। मुझॆ ख़बरों से भी बहुत कोफ़्त होती है। मैं क्या कर लूंगा बहुत सारी समस्याओं को सुनकर सुबह-सुबह?
“सिमोन से मिलने जाना है।“
मैं आजकल अपने पुराने पड़ गए, छूटे हुए कपड़ों को पहनता हूँ। मैं कई सालों से बदला नहीं हूँ सो सालों पुरानी चीज़े वैसी-की-वैसी मुझसे चिपक जाती हैं मानों मैं बस उन्हें छोड़कर शाम को धूमने निकला था... अब मैं घर वापिस आ गया हूँ। यह पुरानी चीज़े मुझसे कोई शिक़ायत नहीं करती हैं... क्योंकि यह सालों से मेरे साथ है... इन्होंने धीरे-धीरे मुझसे अपनी सारी अपेक्षाओं को घिस डाला है। मेरी पुरानी चीज़े मुझे कोई ज़िम्मेदारी नहीं देती। लंबी उपेक्षाओं के बाद कोई सवाल नहीं करतीं। चुप मेरे शरीर से वह चिपक जाती हैं। सफेद शर्ट, जिसपर किसी लाल टी-शर्ट का रंग छूटा हुआ है और फटा-पुराना नीला जींस... उसे पहनकर मैं आईने के सामने खड़ा हुआ... उफ!! शेव कर लेता हूँ... सो मैंने झट-पट शेव कर डाली। हाँ.. अभी ठीक था।
’सिमोन से मिलने जाना है।’.....’सिमोन से मिलने जाना है।’..... ’सिमोन से मिलने जाना है।’
खुद को आईने में देखता हुआ मैं ’सिमोन से मिलने जाना है’ की रट लगाए था....। सिमोन के कई बार फोन करने पर भी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई। वह बुलाती रहीं पर मेरे जाने का साहस ही नहीं हुआ। मैं उनसे मिलने के लिए घर से निकला था... कई बार... पर जब भी घर के बाहर कदम रखा... एकटक भागती-दौड़ती गाड़ियों को.. लोगों को ताकता रहा...। मुझे पता था सिमोन कुछ परेशान हैं.. मेरा उनके पास इस वक़्त जाना भी बहुत ज़रुरी था... पर मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। हाँ... हिम्मत चाहिए दूसरी तरफ जाने में...। मेरा इतनी देर तक खुद को आईने में ताकते रहना एक तरह से हिम्मत बटोरना ही है। सिमोन मेरे जीवन में का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं...। करीब-करीब दस बारह साल से हम एक दूसरे को जानते हैं.... पिछली बार मैं उनसे उनके बयालीसवे जन्मदिन पर मिला था...। हम दोनों ही थे बस उनके घर पर... हमने केक काटा... Wine पी... और देर तक लंबी चुप्पी में... अपने-अपने एकांत में बैठे रहे। सिमोन confession box है मेरे लिए... जहाँ जाकर मुझे बस कुछ देर बैठना होता है... कुछ भी confess करने की ज़रुरत नहीं होती...।
मैंने झटपर घर में ताला लगाया और अपनी शर्ट के तीसरे बटन को देखता हुआ... दूसरी तरफ कूद गया। कुछ देर में मैं सिमोन के घर में.. सिमोन के सामने बैठा था।
उनके बालों के किनारे सफेद हो चले थे। आँखों के नीचे हल्का काला रंग बह निकला था... उसे काला नहीं कत्थई कहा जा सकता है। लंबी गर्दन... तीख़ी नाक़... आँखे किताबों के पन्नों में कुछ अर्थ टटोलती सी...। घर की सूती सफेद साड़ी पहने हुए थी...जिसमें बेंगनी रंग के छोटे फूल बने हुए थे।
’कुछ लिख रहे हो आजकल...?’
किताबों में कुछ टटोलते हुए उन्होंने पूछा।
’नहीं... घर में ही था..।’
’कोई महिला मित्र...?’
मैं खिसिया दिया...
’नहीं.... ना महिला, ना ही मित्र।’
’बहुत समय लगा दिया आने में....’
मैं चुप रहा... उन्होंने भी आगे कुछ नहीं कहा...। मैं क्या कहता कि “पता नहीं किससे डरा हुआ घर में दुबका बैठा हूँ.... कुछ देर के लिए बाहर निकलता हूँ तो घबरा जाता हूँ। लोगों के बीच बैठे हुए उनकी बातें मुझे जिबरिश लगती हैं... एक दूसरे का मनोरंजन करने की थकाने वाली कोशिश.. मुझे बाहर सांस लेने में दिक्कत होती है सो घर में बैठा हूँ... चुप्पी साधे..” क्या मतलब निकलता इन बातों का.. सो मैं चुप ही रहा।
’क्या हम लोग एक दूसरे को इतना भी नहीं जानते कि एक दूसरे के दुख सूंघ सके?”
यह कहकर वह भीतर चली गई। सामने खाली कुर्सी थी... जिसकी लकड़ी पर उनके सालों बैठे रहने के पीले निशान पड़ चुके थे। मुझे उन निशानों को छूना बहुत पसंद था... मैं हल्के से अपनी उंगलिया उस कुर्सी की चिकनी देह पर फेर लेता... और लगता कि किसी की सालों की तपस्या का मैं भी एक छोटा हिस्सा हूँ। सामने टेबल पर तीन किताबें पड़ी हुई थीं... जो आधी पढ़ी हुई, ओंधी पड़ी थी... एक अंग्रेज़ी की और दो हिंदी की। वह कभी भी एक बार में एक किताब नहीं पढ़ती थी। उनमें एक बात को एक बार में ही खत्म करने की धीरता नहीं थी। उनका घर उनकी मन:स्थिति की गवाही दे रहा था। चीज़े बिख़री हुई पड़ी थी। कल रात के खाने के निशान भी टेबल पर मौजूद थे... झाडू कुछ दिनों से नहीं लगी थी।
वह भीतर अपनी कही हुई बात को दफ़्न करने गई हैं...। जब वह उसे पूरी तरह दफ़्न कर देंगी तो एक मुस्कुराहट के साथ बाहर आ जाएगीं... जैसे वह मुझसे अभी-अभी मिली हों। वह मुझसे बहुत नाराज़ थी, पिछले कुछ हफ्तों की व्यस्तता के चलते मैं उनसे बिलकुल भी नहीं मिल पाया था।
’सिमोन... सिमोन...”
मैने उन्हें आवाज़ दी पर भीतर से कोई जवाब नहीं आया। मैं कुछ देर में उठकर टहलने लगा... वह अपना पूरा समय लेगीं मैं जानता हूँ। सुबह, सूरज की रोशनी खिड़की से सीधे उनकी दीवर पर पड़ती थी, फिर धीरे-धीरे रेंगते हुए एक उजले प्रेत की तरह घर छोड़कर चली जाती। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि ’क्या मैं इस रोशनी को अपने घर में रोक सकती हूँ...? घर का दरवाज़ा खिड़की सब बंद करके इसे क़ैद कर लूं? जैसे अपने घर में मैं क़ैद हूँ।’ उनके घर में घुसते ही लगता है कि आप उनके भीतर चले आए हैं। मैं उन्हें उनके घर से अलग करके कभी भी देख नहीं पाता। जब हम कभी बाहर घूमने निकलते थे तो वह एक छोटी बच्ची सी हरकते करने लगती थी... जो अपने माँ-बाप की छत्र-छाया से बहुत दिनों बाद भाग निकला हो। वह बिना अपने घर के नग्न सी जान पड़ती थी। मैंने कभी उन्हें नग्न दिखने वाली बात नहीं बताई...।
’यह देखो आज दार्जलिंग वाली चाय तुम्हारे लिए। मुझे पता था आज तुम ज़रुर आओगे.. सो मैंने कल शाम को तुम्हारे लिए यह चाय लेकर आई।’
इसके पहले मानों कुछ हुआ ही ना हो। हमारी बहस, मेरी लाचारी में झुकी हुई आँखें, उनका गुस्सा... सब कुछ जैसे कई महिनों पुरानी बात हो जिसे हम दोनों ने दफ़्न कर दिया हो। वह दफ़्न करके आ चुकी थी पर मैं अभी भी जल रहा था।
उन्होंने चाय के दोनों कप टेबल पर रखे और खुद अपनी कुर्सी पर बैठ गई... मैं अभी भी टहल रहा था।
’तुम बिस्कुट भी लोगे?’
’ना...।’
मैंने अपना कप उठाया और वापिस टहलने लगा। उन्हें पता था कि मेरे लिए कुछ भी दफ़्न करना इतना आसान नहीं है...। सिमोन अपनी चाय पर सहजता से बैठी रहीं... मेरा टहलना मुझे ही खटकने लगा।
’हमें ऎसा क्यों लगता है कि जो खेल हम खेल नहीं पाए... उसे अगर हम खेल लेते तो आज जीत चुके होते?’
पता नहीं यह बात मेरे मुंह से क्यों निकली...। शायद मैं उनके भीतर टहल रहा था... उनकी गोद में कहीं मेरे पांव पड़ रहे थे.. उनकी बाहों में मेरी ऎड़ियाँ गड़ रही थी सो मैं यह कह गया...। उन्हें यह ना लगे कि उनके गुस्से की वजह से मैं परेशान हूँ। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मैं परेशान हूँ... अपने व्यक्तिगत कारणों की वजह से...। वह अपनी चाय पर बनी रही। मैं कितना भी झूठ क्यों ना कहना चाहू.. पर सिमोन के सामने मेरे मुँह से हमेशा मेरे बहुत निजी सत्य ही निकल रहे होते हैं....। मैं सच में, गए कुछ समय से जीवन के उन खेलों के बारे में सोचता रहा हूँ जिनमें से मैंने बीच में ही कहीं exit ले ली। दुख यह भी है कि वह खेल अभी भी, मेरी गैरमौजूदगी में भी चल रहे हैं.. कहीं....।
’अगर उन खेलों के बारे में ज़्यादा सोचोगे तो मेरे तरह के लेखक बन जाओगे।’
यह कहते ही सिमोन हसने लगी। ज़ोर-ज़ोर से....। मैं अपना टहलना बंद करके उनके सामने आकर बैठ गया। उस हंसी में कमरे की हवा बहुत हल्की हो गई थी। यह सिमोन का घर था, इस घर में सांस लेने के लिए हवा कितनी ठोस हो यह सिमोन ही तय कर सकती थी। इतने सालों के हमारे संबंध में मैं आज भी उंगली रखकर नहीं बता सकता कि यह असली सिमोन है... वह हमेशा अलग होती है। जब मैं शुरु-शुरु के दिनों में सिमोन से मिलने आता था तो ’सिमोन जी’ कहकर उन्हें संबोधित करता था। मुलाकातों की शुरु की जिझक खत्म होते ही उन्होंने मुझे झिड़क दिया... ’जी’ हट गया और हम एक दूसरे के गहरे दोस्त हो गए। ’गहरा’ शब्द भी मैं सिर्फ अपने लिए ही इस्तेमाल कर सकता हूँ...। मेरे एकांत में वह गहरे बैठी है... और उनका एकांत मेरे लिए वह जगह है जहाँ मैं कभी ज़्यादा ठहर नहीं पाया।
’तुम्हें मनोज याद है?’
’हाँ जो मुझे बहुत पसंद नहीं करता था।’
’हाँ वही.... उसका ख़त आया था... पहले मैं इस ख़त को लेकर बहुत हंसी थी फिर मुझे तकलीफ होने लगी...।’
यह कहते ही उन्हेंने एक किताब अपने हाथों में रख ली। उसके कुछ पन्ने पलटे... और एक किसी पन्ने पर आकर वह रुक गई। जैसे कोई बच्चा अपना रटा-रटाया पाठ भूल जाता हो और फिर आगे की बात किताब में टटोलने लगता हो।
’यह कहानीया शायद तुम्हें याद हो...?’
’कौन सी...?’
’जो अभी अभी छपी हैं... जिसपर हमारी बहस हुई थी...।’
’हाँ मैंने कहा था कि यह प्रेम कहानीया है.... और आपने इसे ’मौंन में बात’ जैसा टाईटल दिया था।’
उन्होंने वह किताब मेरे हाथों में थमा दी..। टेबिल-क्लाथ के नीचे से एक ख़त निकाला और मुस्कुराने लगी।
’हम कितना fiction में जीते है? जीना बहुत क्षणिक होता है... कभी-कभी हम किसी आश्चर्य को जी लेते है...। उसके पहले और बाद में हम fiction में ही रहते हैं। तुम मुझे इस वक़्त सुन रहे हो... तुम्हारे हाथों में मेरी कहानियों की किताब है और मेरे हाथों में मनोज का ख़त... यह बात शायद तुम्हारी गढ़ी हुई कहानी हो...इसका मुझसे कोई संबंध ना हो? कई सालों बाद क्या यह घटना तुम्हारे जीए हुए के हिस्से में शामिल हो सकती है?’
यह सवाल नहीं था, मैंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। सिमोन का अंगूठा ख़त के कोने से खेल रहा था। वह कुछ ओर कहना चाहती थीं पर उस बात का दरवाज़ा उन्हें नहीं मिल रहा था... वह इस वक़्त दीवारे टटोल रही थीं।
’मैंने बहुत सघन प्रेम महसूस किया था जब मनोज मेरे साथ रह रहा था। तुम्हें आश्चर्य होगा पर मैं मनोज के साथ बहुत कम रही हूँ। मैंने कहानी गढ़ना शुरु कर दिया था... वह कोई ओर मनोज था जो मेरे साथ रह रहा था। कभी-कभी उस मनोज की शक़्ल इस मनोज से मिल जाया करती थी... आवाज़ भी एक सी थी... पर दोनों की सांस एकदम जुदा। मैं मनोज के होठों के ठीक पास... बहुत देर तक रुकी रहती थी... उसकी आँखें, उसकी गालों की उभरी हड़्डिया ताकती सी... मैं वहाँ रुककर उसकी सांसे चबा रही होती थी।’
उन्होंने ख़त को हलका मरोड़ा..
’...और यह मनोज इन कहानियों को पढ़कर वह मुझसे वापिस मिलना चाहता है। इस ख़त में यही लिखा है। पहले मुझे हंसी आई फिर तकलीफ होने लगी।’
’तकलीफ किस बात की...?’
’हमारे पास शब्द ही तो हैं... शब्दों को एक तरीके से जमाने पर कुछ भाव उत्पन्न होते हैं...। वह भाव किसके हैं? जिसने शब्द कहे है उसके यह जो वह शब्द सुन रहा है उसके?’
यह मेरी बात का जवाब नहीं था। मैं जवाब चाहता भी नहीं था। सिमोन ने धीरे से ख़त फाड़ दिया। ख़त के फटते ही मेरी ख़त में दिलचस्पी बढ़ गई... ठीक-ठीक क्या लिखा होगा उसमें... कौन सी बातें? ख़त फाड़कर उन्होंने उसे अपनी मुठठी में जकड़ लिया... उस ख़त के शब्द अभी भी उनके भीतर रिस रहे थे। मेरी इच्छा हुई कि मैं उस फटे हुए ख़त को उनके हाथों से छीन लूं.. फिर उसका कतरा-कतरा बड़ी तरतीब से जमाऊं....उसका एक-एक शब्द चबा लूं...और फिर वापिस सिमोन के सामने बैठकर यह दृश्य फिर से जीना शुरु कर दूं।
’यह एक बहुत बड़ी प्रदर्शनी है। मेरी बाल्कनी में वही कपड़े सूख रहे हैं जैसा लोग मुझे देखना-सुनना चाहते हैं। मैं भी लगातार उन्हीं कपड़ों को धोती-सुखाती हूँ... जिन कपड़ों में लोग मुझे देखना चाहते हैं। तुम्हें पता है यह हिंसा है... हमारी खुद पर। और इसीलिए शायद हम उन खेलों के बारे में बार-बार सोचते है... जिन्हें खेलना हमने बहुत पहले छोड़ दिया था... जिन्हें अगर खेल लेते तो शायद हम आज जीत जाते।’
सिमोन कुछ देर में उठी और डस्टबिन तलाशती हुई भीतर चली गईं। ख़त डस्टबिन में डालकर वापिस आई और घर की सफाई में लग गई। वह अपने एकांत में जा चुकी थी... मेरी मौजूदगी अब उनके लिए कोई माने नहीं रखती थी... पर मैं वहाँ मौजूद रहा..। इतने दिनों तक ना आ पाने का गिल्ट मेरे बीतर था। मैं उन्हें पूरा वक़्त देना चाहता था कि वह वापिस अपनी कुर्सी पर आ सकें और एक लय में अपनी बात कह सकें...। पर वह नहीं आई...।
कुछ देर मैं एक पेड़ के नीचे रिक्शे का इंतज़ार करता रहा। फिर पैदल घर की ओर चल पड़ा। मैं बहुत जल्दी किसी चीज़ को दफ़्न नहीं कर पाता हूँ... इस मामले में शायद मैं हिंदू हूँ। मैं चीज़ो को जलाना पसंद करता हूँ... पूरे संस्कारों के साथ, उन्हें कंधे पर कई दिनों तक ढ़ोता हूँ.... जलने के बाद उनकी गर्म राख से कई दिनों तक अपने हाथ सेकता रहता हूँ... फिर राख से जली हुई हड़्डीयों को बीनकर उन्हें नदी में सिराने जाता हूँ.. इस सब में कई बार सालों लग जाते हैं।
अधूरी बातों संख्या उम्र के साथ-साथ बढ़ती रहती है। मैं कितनी भी कोशिश क्यों ना करुं बात पूरी तरह पूरी करने की तब भी कहने को बहुत कुछ हमेशा बचा रह जाता है। फिर लगने लगता है कि यह बचा हुआ... कल्पना के संवाद जैसा है.. इस दुनिया के जिए हुए दृश्यों में यह संवाद हो ही नहीं सकते है। इन संवादो की फिर जगह कहाँ है? क्या यह वह सच हैं जिनकी बुनियाद पर हम बाक़ी बातें करते फिरते हैं.... या यह बिल्कुल झूठी बातें है... जिनका संबंध उस दूसरी दुनिया से है जो इस दुनिया का प्रतिबिंब है.. जिसे हम जी रहे हैं... या बात बिलकुल उल्टी है... यह दुनिया प्रतिबिंब है उस दुनिया का जिसकी बातें हम बार-बार कहने से चूक जाते हैं।
मैं किसी रिक्शे के आने का इंतज़ार नहीं कर रहा था...। मैं चल रहा था...। यह सड़क जानी पहचानी थी... हाँ मेरे जीवन का बहुत सा समय यहीं गुज़रा था... मैं अपने घर के सामने खड़ा था... नहीं वह घर नहीं जिसमें मैं रहता हूँ... वह कमरा है...। घर आपका हमेशा वहीं होता है जहाँ आप बड़े होते हैं। यह वह जगह है जिसे मैं अपना घर कहता हूँ... जहाँ अब सिर्फ मेरा बाप अकेले रहता है। मैं कब से इस तरफ नहीं आया। नीला दरवाज़ा सफेद दीवारें....
मुझे मेरे बाप और मेरे देश में बड़ी समानता लगती है। मेरा पूरा बचपन मेरे बाप की महानता में गुज़रा था। वह मेरे पेदा होने के पहले भी था, उसकी किससे कहानियाँ लोरी की तरह सुनते हुए मेरा बचपन बीता.... वह मेरा हीरो था। वह मेरे सारे सवालों का जवाब था। फिर जैसे-जैसे मैंने होश संभाला मुझे लगने लगा कि इस देश ने मेरे साथ धोखा किया है... यह कमज़ोर है... इसका भी पहले कोई बाप था... इसकी भी अपनी बहुत सी कमियाँ हैं। मुझे मेरे देश पर दया आने लगी। जब तक मैं मेरे धोखे की बात लेकर बाप के पास जाता... वह मुझे लेकर चुप हो चुका था। मैं वह नहीं हो पाया जिसका उन्होंने सपना देखा था... मैं वास्तविकता से भागने जैसा कोई आदमी हो चुका था.. जो अपने बाप जैसा दिखता था। वह अभी भी मुझमें अपना सपना ढ़ूढ़ते थे। मेरे जवाबों में जब उन्हें निराशा हाथ लगती तो वह चुप हो जाते। मेरा बाप मेरे देश की तरह था... जो मेरे सारे संवादों पर चुप्पी मारे बैठा था। माँ जब ज़िंदा थी तो हमारे बीच खूब लड़ाईया होती थी... माँ के बहाने से हम आपस में बात भी कर लिया करते थे। पर माँ के चले जाने के बाद अपने बाप के साथ रहना असहनीय हो गया था। सो मैंने उनको अकेला छोड़ दिया। एक किराय का कमरा लेकर रहने लगा।
कुछ देर सांकल बजाने के बाद भीतर से आवाज़ आई।
’अरे भाई कुछ नहीं चाहिए...।’
’पापा मैं हूँ...।’
कुछ देर की शांति के बाद दरवाज़ा खुल गया। बाप बहुत देर मुझे आश्चर्य से देखता रहा। फिर भीतर किचिन की तरफ चला गया। मैं घर में टहलने लगा। घर की एक सुंदर ठंडक है.. जिसकी कमी मैं अपने कमरे में सबसे ज़्यादा महसूस करता हूँ... मंदिरों-चर्च जैसी ठंड़क। शायद घर में बहुत सारा मृत दीवार से चिपके हुए तैरता रहता है... पुराना जीया, बीते हुए लोग और बहुत से रहस्य... जिसका सत्य अब घर अपनी दरारों में छुपाए खड़ा है। मैं पहले अपने कमरे में गया... वह अभी तक वैसा ही जमा हुआ था मानों मैं अभी भी यहाँ रह रहा हूँ। तभी मेरी निग़ाह उस शेल्फ पर पड़ी जिसके पीछे मैं, अपने बाप की मार के डर से, छिप जाया करता था। उस शल्फ के कोने से मैं सबको देख सकता था लेकिम मुझे कोई भी देख नहीं पाता था। एक अजीब सी इच्छा भीतर जाग गई उस शेल्फ के पीछे छिपने की... मैंने अपना बेग़ नीचे रखा और शेल्फ के पीछे घुसने की कोशिश की... मैं अब बड़ा हो गया था। मेरा वहाँ घुसना नामुमकिन था फिर भी मैं कोशिश करता रहा... मैं खीजने सा लगा... और एक अजीब आवाज़ के साथ मेरे आंसू गिरने लगे। मैं अपने आपको अपने बचपन में ज़बरदस्ती घुसाना चाह रहा था।
’क्या कर रहे हो?’
मेरा बाप दरवाज़े पर चाय का प्याला लिए खड़ा था। मैं बाहर निकला। बाप ने चाय के प्याले को टेबल पर रखा और मेरे कपड़े झाड़ने लगा, जिसपर चूना लग गया था। मैं उनसे मना करता रहा पर वह नहीं माने... शायद इससे पहले उन्होंने मुझे मेरी माँ की मृत्यु पर रोते देखा था। मेरा रोना रुक नहीं रहा था सो मैं कुछ देर के लिए बाथरुम चला गया।
हम दोनों चाय की टेबल पर आमने सामने बैठे थे।
’आप चाय नहीं पीएगें?’
’डॉक्टर ने मना किया है।’
’अरे! क्या हुआ है आपको?’
’बुढ़ापा है बिमारियाँ तो अब लगी रहेगीं।’
’बिमारी?’
’शुगर है... जिसकी वजह से परहेज़ करना पड़ रहा है।’
देश की व्यवस्था संभालने वाला एक सरकारी मुलाज़िम मेरा बाप था। सारी व्यवस्था में बेईमानी के बावजूद मेरे बाप को लगता था कि देश चंद ईमानदार लोगों की वजह से चल रहा है, जिसमें वह भी एक है। मेरे लिए देश भागा करता था क्योंकि मुझे लगता था कि मेरा बाप देश का बहुत सारा बोझ अपने कंधो पर लिए भाग रहा है। मेरा देश मेरे सामने बैठा था... बीमार... और मैं कुछ भी नहीं कर सकता था।
तभी मेरी निग़ाह मेरे पिताजी के हाथों पर पड़ी....। वह कितने बूढ़े हो चुके हैं। उनकी चमड़ी लटक गई है। कंधे झुके हुए हैं। वह कोई ओर था जिसे मैं अपना बाप माने बैठा था... मेरा बाप तो मेरे सामने बैठ है जिसे शायद मैं पहली बार देख रहा हूँ। अचानक मुझे उनकी उम्र बहुत ज़्यादा लगने लगी। उनके हाथों के ऊपर उगे हुए बाल भी सफेद हो चुके थे। क्या उम्र होगी इनकी.... मुझे मेरे बाप की उम्र नहीं पता है।
’आपकी उम्र क्या होगी?’
’क्या?’
’कुछ नहीं।’
फिर मैंने कुछ नहीं पूछा। हम दोनों को ही अब मेरी चाय खत्म होने का इंतज़ार था। उनकी निग़ाहे कुछ देर मुझपर रुकी थी जब हम बात कर रहे थे... अब वह दीवारों पर टंगी तस्वीरों को टटोल रही थीं।
’सिमोन कैसी है?’
जैसे किसी तस्वीर को देखकर उनको यह बात याद आई हो।
’ठीक है।’
’अभी भी मिलते हो उससे?’
’उन्हीं के घर से चला आ रहा हूँ।’
इस बात पर मेरा बाप उठकर अपने कमरे में चला गया। मैंने चाय का कप उठा और उसे किचिन में रख दिया। किचिन काफी बिखरा पड़ा था। सो मैं उसे साफ करने लगा। कुछ सुबह के बर्तन पड़े थे वह मांज दिये। जाने से पहले कुछ देर पिताजे के कमरे के बाहर खड़ा रहा.... वह अखबार में अपना सिर गडाए बैठे थे। मैंने सालों से पिताजी के कमरे की चौखट नहीं लांगीं...। मैं जाने को हुआ... तभी उनकी आवाज़ आई...
’मैं अगले महीने बहत्तर का हो जाऊंगा।’

रिक्शा, भीड़, पसीना, डर...
अंत में मैं अपने कमरे में पहुँचा। एक रजिस्टर्ड लेटर पैरों में पड़ा मिला... मेरी स्कालरशिप स्वीकार कर ली गई। तीन साल की रिसर्च पर मुझे विदेश जाने का मौका मिला है, जिसका मैं बहुत लंबे समय से इंतज़ार कर रहा था। तभी दरवाज़े पर आहट हुई... मैंने लेटर को फ्रिज के ऊपर रखा और दरवाज़ा खोला.... सामने सिमोन खड़ी थी।
’तुमसे बात पूरी नहीं हुई तो सोचा तुम्हारे घर आ जाती हूँ, इसी बहाने तुम्हारा घर भी देख लूंगी।’
’आईये... अंदर आ जाईये।’
घर में कोई कुर्सी नहीं थी और ना ही कुर्सी जैसी कोई जगह....। कुछ देर सिमोन बैठने की जगह खोजती रही, फिर कुछ हिचकिचाहट के बाद वह पलंग पर बैठ गईं। यह बहुत अजीब था... मैं जब सिमोन के यहाँ जाता हूँ तो जैसा मेरी उपस्थिति में सिमोन अपने घर में व्यवहार करती है.... मैं उसी व्यवहार की नकल, अपने घर में उसके सामने कर रहा था। मैंने अपने आपको घर के छोटे-छिछले कामों में व्यस्त कर लिया था। वह मेरे शेल्फ में रखी किताबें टटोलने लगी। लगभग किताबें उन्हीं ने मुझे दी थी।
‘कुछ दिनों पहले मैं तुम्हारे पिताजी से मिलने उनके घर गई थी।’
यह बात सुनते ही मेरे सारे छोटे-छिछले काम हाथ से छूट गए। मैं सीधे उन्हें देख रहा था और वह मेरी ओर......।
’मुझे पता था तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा... पर मैंने यह अपनी ख़ातिर किया है। शायद बहुत समय बाद मैंने कुछ अपनी ख़ातिर किया है।’
’पिताजी आपके बारे में अच्छी राय नहीं रखते हैं... उन्हें लगता है कि मेरे घर छोड़ने का कारण आप हैं।’
’उनसे मिलने के बाद मुझे भी लगने लगा कि शायद मैं ही हूँ वह कारण।’
’नहीं कतई नहीं... ।’
वह अपने हाथ में रखी किताब के पन्ने पलटने लगी....
’यह बहुत अच्छी किताब है...।’
’यह तीन साल पहले आप ही ने मुझे दी थी.... सॉरी मैं लौटा नहीं पाया...।’
’इतने सालों में मुझे नहीं लगता है कि तुमने कोई भी किताब मुझे लौटाई है।’
’पर मेरी नीयत थी....’
वह कामू के The Outsider के पन्ने पलट रहीं थीं। किसी एक पन्ने पर देर तक रुकी रहीं.... फिर किताब बंद करके वापिस शेल्फ में रख दी। मुझे उनकी दी हुई किताबें पढ़ने में बहुत मज़ा आता था... क्योंकि उनकी किताबों में उनके पढ़े हुए के निशान, नोट्स हर तरफ गुदे हुए होते थे। मुझे लगता है कि मैंने सिमोन को... किताबों में लगे पेंसिल के निशानों में कहीं पहचाना है। व्यक्तिगत तौर पर हमारे संवाद ABSURD रहे हैं।
’तुम्हारे पिताजी ने मुझसे एक अजीब बात कही थी...’
’क्या?’
’उन्होंने कहा था कि तुमने मेरे जवान बेटे को अपने चंगुल में फसा रखा है।’
’आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए था।’
’मैंने उन्हें कहा कि मैं एक शादि-शुदा औरत हूँ। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कहा कि पर रहती तो अकेली ही होना ना।’
’आपको लेकर मेरे और मेरे बाप के बीच कई बार कहा-सुनी हुई है...’
तभी सिमोन पलंग से उठी और मेरी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। मैं कमरे में ही बना रहा। मुझे सिमोन के ऎसे मौन की आदत है जो बीच संवाद में अचानक चले आते हैं। मुझे हमेशा लगता है कि सिमोन, जिन्हें मैं जानता हूँ वह इन मौन में है.... हमारी बातचीत महज़ वह पगड़्ड़ी है जिसपर चलकर वह उस मौन में बार-बार चली जाती है। उनकी दी हुई किताबों में मैं उन हिस्सों को बार-बार पढ़ता हूँ जिन्हें वह पेंसिल से मार्क करके रखती हैं... वह हिस्से बिलकुल इन मौन जैसे हैं... जो अभी मैं महसूस कर रहा हूँ। मैंने कभी सिमोन को नहीं कहा कि मैं उन पेंसिल से गुदे हुए हिस्सों को उस किताब का मौन कहता हूँ।
’अरे देखो... सामने पेड़ पर किंफिशर आई है।’
बालकनी से सिमोन की आवाज़ आई।
’हाँ वह इस वक़्त रोज़ आती है। मैंने उसका नाम भी रखा है।’
’क्या नाम है?’
’शुभचिंतक...’
सिमोन हंस दी... फिर उसने कई बार उस किंगफिशर को शुभचिंतक नाम से पुकारा....। शुभचिंतक कुछ देर में गर्दन इधर-उधर घुमाकर उड़ गया। हम दोनों बालकनी में खड़े शुभचिंतक का काफी देर तक इंतज़ार करते रहे पर वह नहीं आया।
’मैं सोचती हूँ कि मनोज के पास चली जाऊं।’
’मनोज के पास... बेंग्लौर?...’
’हाँ....’
’यूं... आचानक !!’
’हाँ अचानक, मुझे लगा यही ठीक रहेगा।’
’पर आपने तो उसका ख़त फाड़ दिया था, और आप....’
’मुझे जाना चाहिए. और शायद यह सही भी है।’
’आप कबसे सही काम करने लगी... और सही किसके लिए है?’
’तुम्हारे लिए... मेरे लिए... तुम्हारे पिताजी के लिए... मनोज के लिए...।’
मेरे पिताजी ने एक बार तुनक-कर मुझसे कहा था कि ’उस औरत के चक्कर में रहोगे तो बर्बाद हो जाओगे।’ यूं उनकी कही हुई बातें मुझपर ज़्यादा असर नहीं करती थीं... पर पता नहीं इस वाक़्य में किस अजीब तरीके का सम्मोहन था कि मेरी बहुत कोशिशों के बाद भी मैं इस बर्बाद हो जाने वाले हिस्से को भूल नहीं पाया। यह उस दिन के बाद से कुछ ऎसा मेरे शरीर से चिपका कि मैं इसे अलग नहीं कर पाया। मैं बर्बाद होना चाहता था। मैं चाहता था कि मैं सड़कों पर आ जाऊं... भीख़ मांगता हुआ अपने बाप को दिखूं...। मैंने अपना जॉब छोड़ दिया.. घर से बिना पैसे लिए पूरा शहर पैदल छानता रहता... जब सबकुछ बहुत असह हो जाता तो सिमोन के मौन में छुपकर बैठ जाता। सिमोन खाना खिला देती, मैं चुपचाप बिना किसी प्रतिक्रिया के उनका लिखा हुआ सुनता रहता। मेरे लिखे की प्रतिलिपी मैं सिमोन की टेबल पर जाने से पहले रख देता... बहुत समय बाद वह किसी एक कहानी का ज़िक्र करके कहती की वह बहुत अच्छी थी...। मैं घर जाता और उस कहानी को फाड़ देता। जिन कहानियों का ज़िक्र सिमोन ने कभी नहीं किया वह कहानिया अभी भी मेरी मेज़ की दराज़ में दुबकी पड़ी हैं। इसी बीच कहीं सिमोन ने मेरी कुछ कहानियों का एक संकलन छपवा दिया....। ’मौन में बात’ उसका उसने शीर्षक रखा.... हम बहुत समय तक इस बात पर हंसते रहे कि इस शीर्षक के साथ कौन इन कहानियों को पढ़ने की कोशिश करेगा। पर सिमोन का कहना था कि इससे बहतर उसे कुछ भी नहीं सूझा...। मुझे नहीं पता मैं इन कहानियों के छपने से खुश था या नाखुश...। इन कहानियों में कहानी जैसा कुछ भी नहीं था... ’मौन में बात’ सही शीर्षक था... सारी कहानियां अपनी चुप्पी लिए हुए थी...। अधिकतर कहानिया मेरे और मेरे बाप के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती-फिरती थी।

जो रजिस्टर्ड लेटर मैंने फ्रिज पर रखा था वह मैंने उठाकर सिमोन को दे दिया...। सिमोन ने उसे पढ़ा और मुझे गले लगा लिया, मानो मैं नहीं वह बरसों से इस लेटर का इंतज़ार कर रही हो।

किसी एक समय में बहुत सघनता से महसूस किये गए संबंध का स्वाद अचानक फीक़ा पड़ गया। सिमोन के संबंध में ऎसा ही हुआ। अचानक सब-कुछ फीक़ा सा लगने लगा। उस स्पेस में मुझे लगा मेरी ज़रुरत नहीं है। मैंने बहुत अभिनय की कोशिश की कि उस सघनता को मैं वापिस महसूस करने लगूं पर ऎसा हुआ नहीं। मैं सिमोन के साथ रहते हुए अपने आपको बहुत असहज महसूस करने लगा। सिमोन मनोज के पास नहीं गई और मैं अभी भी विदेश जाने के बारे में सोच ही रहा था। अब जो संबंध अपनी पहले जैसी सघनता लिए हुए था वह था मेरे और मेरे बाप के बीच का संबंध...। मैंने जब अपने बाप को वह लेटर दिखाया तो वह खुश नहीं हुए... ना ही कोई दुख उनके माथे पर उभरा। उन्होंने पूरा लेटर बड़ी तल्लीनता के साथ पड़ा... उसे बड़े ऎतियात के साथ वापिस लिफाफे में रखा और मुझे स-सम्मान वापिस लौटा दिया। ना तो मैंने उनसे कोई प्रश्न किया, ना ही उन्होंने कोई भी प्रतिक्रिया दिखाई। कुछ देर में वह उठकर अपने कमरे में चले गए। शायद इतने सालों में पहली बार मुझे उनपर दया आई थी। वह इस बात से खुश थे कि चलों मैंने कुछ करने के लिए कोई कदम तो उठाया... पर वह मेरे तीन सालों के लिए चले जाने पर बहुत उदास थे...। इतने सालों के हमारे शीत युद्ध के कारण मैं अपने बाप को इतना तो जान गया था कि वह कब धीरे से उठकर अपने कमरे में चले जाते हैं।
कुछ देर में मैं किचिन में गया... वह बहुत ही बिखरा पड़ा था, सिंक बर्तनों से भरा पड़ा था... शायद काम वाली बाई आ नहीं रही होगी.. या मेरे बाप ही उनसे लड़ गया होगा। मैंने पूरा किचिन साफ किया... हम दोनों के लिए चाय बनाई... उनकी चाय में शुगर फ्री डाली और उनके कमरे के दरवाज़े पर, दोनों कप लिए खड़ा हो गया। वह अपनी आराम कुर्सी पर बैठे हुए किसी किताब के पन्ने पलट रह थे। मैंने दरवाज़ा खट-खटाया... उन्होंने तुरंत किताब कोने में रख दी... मैंने (कई सालों बाद..) अपने बाप के कमरे में प्रवेश किया....
’अरे मुझे लगा तुम चले गए हो। चलो बाहर ही बैठते हैं...’
तब तक मैं चाय की ट्रे खिड़की के पास रख चुका था...। वह खड़े हुए और वापिस बैठ गए। हम दोनों अपनी-अपनी चाय पर थे। कुछ देर में उन्होंने वह किताब उठाकर मुझे दी जो वह पढ़ रहे थे। ’मौन में बात’ मैंने शीर्षक पढ़ा... सिमोन ने उन्हें यह किताब दी होगी...। किताब के बीच में कहीं बुकमार्क झांक रहा था...। पहली बार मैंने खुद को अपने बाप के सामने नग्न पाया। मैंने किताब किनारे रख दी। हम दोनों खिड़की से बाहर एक बच्ची को देख रहे थे जिसके पैरों में एक बड़ा सा कागज़ चिपक गया था... वह उसे निकालती तो दूसरे पांव पर चिपक जाता... फिर उसने हाथ से भी निकालने की कोशिश की, वह कागज़ पैर से निकलकर उस बच्ची के हाथ में चिपक गया...। उसे देखते हुए पहले मेरे और मेरे बाप के चहरे पर एक मुस्कुराहट सी आई पर बाद में वह मुस्कुराहट झुंझलाहट में बदल गई। वह कागज़ उस लड़की के शरीर से निकल ही नहीं रहा था.. तो गुस्से में आकर उस लड़की ने उस कागज़ को फाडना शुरु किया... कुछ टुकड़े छूट गए पर कुछ दूसरी जगह चिपक गए... वह उन्हें छुड़ाते-छुड़ाते ख़ीज चुकी थी फिर वह खीज रोने में तबदील हो गई। जब उसने रोना शुरु किया तो वह हार चुकी थी... वह रोते हुए अपने घर की ओर चली गई।
’यह बहुत अच्छा चांस तुम्हें मिला... अच्छा होगा कि तुम विदेश चले जाओ।’
मैं चुप-चाप अपने बाप को देखता रहा जो दूर उस बच्ची के चले जाने के बाद की खाली जगह में कुछ ढूंढ रहे थे।

मेरे घर में पंखा अपनी रफतार पर था। मैं निढ़ाल सा अपने बिस्तर पर पसरा पड़ा था। मेरी छाती पर वह लेटर था जिसमें मेरा भविष्य छिपा हुआ था। मैंने करवट बदली तो मेरी निग़ाह उस रोते हुए चहरे पर पड़ी जिसे मिटाना मैं फिर भूल चुका था। मैं जल्दी से उठा, एक कपड़े में हल्का सा साबुन लगाकर लाया और उस चहरे को ऊपर घिसने लगा। कुछ ही देर में वह चहरा गायब हो चुका था। पर वहाँ मेरी झल्लाहट का एक निशान रह गया था.. जो बहुत ही भद्दा लग रहा था।
जब शुरु-शुरु में मैं सिमोन से मिला था तो प्रेम में पड़ चुका था। पैंतिस साल उस वक़्त उन्होंने अपनी उम्र बताई थी। उनका कहानी संग्रह पढ़ने के बाद मैंने उनसे मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी। जीवन को जिस सहजता से अकेले रहकर जीना उन्हें आता है वह शायद मैं कभी भी नहीं हासिल कर पाऊंगा...। मनोज उन दिनों उनके घर कुछ-कुछ दिनों के लिए आया करता था। वह मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था। क्योंकि उन दिनो सिमोन और मैं काफी समय एक साथ बिताया करते थे। किस कदर मैं उनको छू लेना चाहता था...। जब कभी किताब, चाय का प्याला, पेन देते-लेते वक़्त उनकी उंग्लियों छू जाया करती थीं तो मैं किसी दूसरी दुनिया में पहुच जाया करता था... जहाँ मैं अपनी सारी तकलीफ लिए सिमोन के सिरहाने बैठा हुआ होता और वह अपने जीवन के छोटे बड़े किस्से मुझे सुनाती... पीला और लाल रंग चारो तरफ बिखरा होता... हरे रंग के कुछ छीटे दीवारो-चादरों पर दिखाई देते... कहीं से पानी बहने की आवाज़ आती... हम दोनों ही ठंड में ठिठुर रहे होते पर शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं होता... हल्के पीले रंग वह ओढ़े होती और हल्का लाल रंग मेरे शरीर से बाहर कहीं पड़ा होता।
मनोज के उनके जीवन से चले जाने के काफी समय के बाद तक मेरी इच्छा होती रही कि कभी मैं उन्हें अपने मन की बात बताऊंगा... पर हिम्मत नहीं होती। उन्होंने सही पहचाना था... लगभग मेरी किये हुए सारे कामों में उन्हें इंप्रेस कर देना ही मेरा लक्ष्य हुआ करता था। फिर अचानक क्या हुआ कि संबंध एक अलग ही दिशा में चला गया। मैं बस उस अवस्था में बहता रहा... मैं कभी उनके मौन का हिस्सा था और वह कभी-कभी मेरे मौन में टहल के निकल जाता करती थीं। लाल, पीला और हरा रंग धीरे-धीरे धुंधला पड़ चुका था... कुछ कत्थाई और नीले रंग का संबंध अब बचा हुआ था... जिसे मैं बचाए रखना चाहता था।
कुछ देर में मैंने वह लेटर जिसमें मेरा भविष्य पड़ा हुआ था वह फाड़ दिया....। इसकी वजह सिमोन नहीं थी .. इसकी वजह मेरा बाप था... तीन साल, इस उम्र में उनसे तीन साल दूर रहने की मुझमे हिम्मत नहीं थी। कुछ देर में मैंने काग़ज़ और पेन उठाया और एक कहानी लिखने बैठ गया... शीर्षक दिया.... “सिमोन....”।


10 comments:

pallavi trivedi said...

आज पहली बार ये ब्लॉग पढ़ा... लगा कि पहले क्यों नहीं आई इधर! बढ़िया संतुलन के साथ सिमोन और पिता दोनों के साथ रिश्ता उतार चढ़ाव लेता रहा और कहानी बहती रही! लास्ट में तीन साल के लिए पिता को न छोड़ना सुखद मोड़ था!

Pratibha Katiyar said...

बाद मुद्दत वापसी सुखद है. कहानी में इतना कुछ है कि एक बार में समेट पाना मुश्किल है...कई बार पढना होगा. फ़िलहाल तो सिमोन से मिलने जा रही हूँ...

प्रवीण पाण्डेय said...

कारण कुछ भी रहे शीर्ष में सिमोन ही रहेगी। लम्बी पर अच्छी।

dharitri boro said...

amazing the play of words... was more sinking into the lines than the story...each para has something to say...loved the minuteness...

डॉ .अनुराग said...

तुम्हे अँधेरे ओर फतान्सियो से एक लगाव सा दिखता है ..कई बार चीजों को मिला -जुला कर पोट्रे करते हो....

rashmi ravija said...

अक्सर पिता-पुत्र के बीच सबकुछ अनकहा ही रह जाता है....दोनों ही एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं....पर जतलाते नहीं...

सिमोन और पिता के साथ ये मौन का रिश्ता खूबसूरती से मुखरित हुआ है, कहानी में...

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

"यह एक बहुत बड़ी प्रदर्शनी है। मेरी बाल्कनी में वही कपड़े सूख रहे हैं जैसा लोग मुझे देखना-सुनना चाहते हैं। मैं भी लगातार उन्हीं कपड़ों को धोती-सुखाती हूँ... जिन कपड़ों में लोग मुझे देखना चाहते हैं। तुम्हें पता है यह हिंसा है... हमारी खुद पर। और इसीलिए शायद हम उन खेलों के बारे में बार-बार सोचते है... जिन्हें खेलना हमने बहुत पहले छोड़ दिया था... जिन्हें अगर खेल लेते तो शायद हम आज जीत जाते।"

इस पैराग्राफ़ के शब्दों को धीरे धीरे चबाने की कोशिश में हूँ...

jyoti nishant said...

aapki kahaniya siddhi ki tarah man ke bhiter utarti chali jaati hai.

Anonymous said...

GUD GUD.SON KO SUNY HOTE DEKHNA

हमारीवाणी said...

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल