Friday, May 4, 2012

त्रासदी... (भाग-एक)

(कहानी शायद पांच भागो में है... सो भाग-एक यह रहा.....) बीमार... सुबह पांच बज रहा होगा। वह बिना आवाज़ किये तीसरी बार बाथरुम जा रहा था। बाथरुम का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं होता था.... दरवाज़े और चौखट की लकड़ी आपस में अटक जाती थी। मौसी ने कहा था कि दरवाज़े में चिटकनी लगाने की ज़रुरत नहीं है बस उड़का दे...। बिना चटकनी लगाए कोई कैसे पैखाना जा सकता है...। तीनों बार उसने ज़ोर लगाकर चटखनी लगा दी। पिछले पचास सालों की आदत का वह क्या कर सकता था...? बिना चटकनी लगाए वह कभी हगा नहीं था.... यूं भी घर में उसके और मौसी के अलावा कोई नहीं था... पर दरवाज़ा तो था... और उसका पूरी तरह बंद होना एक सुरक्षा प्रदान करता है... जब तक वह सुरक्षित महसूस नहीं कर लेता उसका पेट साफ होना असंभव था। तीसरी बार दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था... उसने बहुत ज़ोर लगाया पर वह अटका रहा... सोचा मौसी को आवाज़ लगा दे... उसका अनुमान था कि मौसी दरवाज़े की पहली ही आवाज़ में जाग गई थीं... पर यह महज़ अनुमान ही था। वह रुक गया..। बाथरुम में कपड़े और नहाने का साबुन साथ रखा था.. एक के ऊपर एक। कुछ भीगे हुए कपड़े एक छोटी हरे रंग की बाल्टी में रखे हुए थे। आईना अपने कोनों में ज़ंग खाकर खत्म हो चुका था...पर ठीक बी़च में वह अपना चहरा देख सकता था... उसने अपनी उंग्लियों से आईने के कोनों को छुआ.... खुरदुरे... मटमैले... कत्थई कोने। आईने को अपनी हद कैसे पता है? कैसे उसे पता है कि इस सीमा के बाद चहरा शुरु होता है..? उसने अपने चहरे को ध्यान से देखा... शायद साफ आईना होता तो वह यह ना करता... झुर्रियां...अपने चहरे की झुर्रियां.. आँखों के कोने... माथे की तरफ... पचास साल के गहरे होते निशान। उसने कुछ और कोशिश की... पर दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था। हारकर उसने आवाज़ लगाई...’मौसी... मौसी...’ उस तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई..। शरीर में कमज़ोरी इतनी आ गई थी कि दो आवाज़ में ही पेट गुडगुडाने लगा... उसने दरवाज़े को फिर धक्का मारा और चिटकनी लगा दी...। पर इस बार पहले उल्टी हुई... रात का, सुबह का पिया हुआ सारा पानी बाहर निकल आया... सिर्फ पानी। तभी मौसी ने दरवाज़ा खटखटाया... ’इंदर... इंदर तूने ठीक है...?’ ’मौसी दो मिनट...’ ’अरे चिटकनी लगाने को मना किया था... इंदर... इंदर...।’ इंदर ने चिटकनी खोली...। मौसी बाहर से ऎसे धक्का दे रही थीं मानो दरवाज़ा तोड़ रही हो...। दरवाज़ा खुलते ही इंदर लड़खड़ा गया...। हाथ फिसलकर छोटी हरी बाल्टी में चला गया...। मौसी ने भीतर आकर उसे सहारा दिया...। खड़े होते ही वह थक गया... मानो कई हज़ार सीढ़ियां चढ़ा हो....। वाशबेसिन का सहारा लेकर वह खड़ा हो गया..। मौसी उसके बगल में उसे सहारा दिए खड़ी थीं...। ’क्या हुआ इंदर...?’ तभी इंदर के दिमाग़ में आया मौसी यह सामने ज़ंग खाया आईना कैसे देखती होंगी...? उन्हें अपना चहरा देखने के लिए किसी चीज़ पर चढ़ना पड़ता होगा... किस चीज़ पर? वह अचानक पूरे बाथरुम में वह चीज़ तलाशने लगा.. ’क्या हुआ इंदर कुछ गिर गया क्या?... अरे तेरा तो पूरा शरीर तप रहा है....। तू चल अभी.. अस्पताल चलते हैं... चल...।’ मौसा जी की मृत्यु छह महीने पहले ह्रिदय गति रुक जाने की वजह से हुई थी। वह तब महज़ दो दिनों के लिए आ पाया था। जल्द आने को कह गया था... पर जल्द नहीं आ पाया....। ऑफिस... काम... संबंध... व्यस्तता.. आलस... बोरियत... कमीनापन... और खुद के साथ रहने की थकान... यह सारे कारण मिलाकर भी पूरा कारण नहीं बनता जिसे वह मौसी को कह सके? मौसी ने भी एक बार ही पूछा... वह खिसिया दिया.. मौसी ने बात बदल दी..। वह नहीं आना चाहता था... वह अभी भी नहीं आना चाहता था... वह कुछ नहीं जैसी निर्थकता में कहीं चरता रहना चाहता था...। ऎसी निर्थकता में आदतन सब कुछ हो रहा होता है... वह आदतन जी रहा था... इस आदत में कहीं हज़ारों लोग अचानक मर जाएं... या घर में चूहा आकर नई शर्ट कुतर डाले... दोनों ही पीड़ा का एक छोटा बुलबुला बनाते और वह बुलबुला दृश्य होते-होते फूट पड़ता..। बुलबुले के भीतर से जो दुनिया थोड़ी सी विकृत दिखने लगी थी... कुछ ही देर में सामान्य हो जाती... फिर सब कुछ वैसा का वैसा होने लगता...। मानों कोई देखी-दिखाई फिल्म चल रही हो... जिसके सारे दृश्य पता हो... सारे आश्चर्य अभिनय हों... सब कुछ जिया जा चुका हो... फिर भी रोज़ भूख लगती हो.... और रोज़ वही, एक ही जैसे स्वाद की स्मृति उसे खाने और हगने के चक्र के बीच में खड़ा कर देती हो। वह मौसी के साथ अस्पताल की और चल दिया..। दो गलि छोड़कर एक प्रायवेट अस्पताल था...। कुछ दूर चलते हुए वह रुक गया...। मौसी के हाथ में पानी की बोतल थी.. ’पानी पी ले...’ उसने मना किया और धीरे-धीरे चलने लगा..। पौ फटी थी... चौक पर अख़बार वालों की हलचल थी..। बहुत सी साईकिलों के बीच अख़बार वाले अपने-अपने अख़बार छांट रहे थे... ताज़ा खबरें.. सुर्खियां.. सब ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं..। ट्न..ट्न..ट्न.. की आवाज़ से उसकी निग़ाह पीछे चाय की दुकान पर चली गई... ऎसी सुबहों में उसे चाय पीना बहुत पसंद था... पर अभी चाय की कल्पना भी उसे बाथरुम याद दिला रही थी... उसने वहां से निगाह हटा ली..। उसके सामने एक काले रंग का कुत्ता चला आया... वह उसके साथ-साथ चलने लगा.. उसे कुत्ते बहुत पसंद नहीं थे... उसे ख़ीज होने लगी...। मौसी ने एक पत्थर उठा लिया... कुत्ता दुम नीची करके एक किनारे हो गया... पर कुछ दूरी बनाए वह पीछे-पीछे चला आ रहा था। ’शेखर अस्पताल’ उस बिल्डिंग में कई जगह लिखा था..। सामने लोहे का शटर था.. जो बंद दिख रहा था.. पर कोई ताला नहीं था। भीतर वीराना था.. सिर्फ एक ट्युबलाईट की रोशनी रिसेप्शन से चारों और फैली थी.. पर डेस्क पर कोई नहीं बैठा था। मौसी ने पानी की बोतल को इंदर के हाथों में पकड़ा दिया और खुद ज़ोर लगाकर शटर खोलने की कोशिश की.. पर वह कहीं अटक रहा था। फिर उन्होंने हारकर आवाज़ लगाई..। एक आदमी हाथ में बड़ी सी झाडू लिए चला आया... उसने एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया..। जैसे ही इंदर ने अंदर प्रवेश किया... वही अस्पताल की बू,, उसके पूरे जिस्म में फैल गई..। दवाईया.. पसीने... खून.. पिशाब.. मृत.. ज़िदा.. बीमार बू...। कोमा में अपनी बहन के साथ बिताया समय.. हेपेटाईटिस-बी से लड़ते हुए पिताजी के अंतिम कुछ साल... अपनी पत्नि की टी.बी.... पीलिया की दौड़धूप... बहुत से दोस्तों के मौसी-बाप.. खून देना.. लाश उठाना.. पोस्टमार्टम.. बू.. बू.. बू...। कमरा नंबर एक सौ चार... लिफ्ट काम नहीं कर रही थी.. उसे पहले माले पर सीढ़ी से ही जाना था। वह धीरे-धीरे सीढ़ी चढ़ने लगा..। मौसी उसकी बीमारी के पहले सुस्त थी अब वह बहुत फुर्ती में आ गई थीं... उन्हें एक काम मिल गया था... कुछ लोग होते हैं जिन्हें लोगों की चिंता करने में सुख मिलता है...। मौसी सीढ़ी चढ़ने में भी इंदर की मदद करना चाहती थीं... अपनी पूरी चिंता से... वह कभी इंदर के आगे चलती कभी उसके बगल में चलते हुई उसका हाथ पकड़ लेतीं तो कभी पीछे-पीछे चलने लगतीं..। इंदर रुक गया.. ठीक वैसे ही जैसे वह सुबह कुत्ते के सामने रुका था... उसने मौसी को आगे जाने का इशारा। मौसी जल्दी-जल्दी सीड़ी चढ़ गईं..। वह कमरा नम्बर एक सौ चार के सामने रुकी थीं....। भीतर एक औरत बिस्तर की चद्दर बदल रही थी। वह लेटना चाहता था... उसके पैर जवाब दे रहे थे.. पेट में रह-रह कर मरोड़े उठ रही थीं। उसके कमरे के ठीक सामने कमरा नम्बर एक सौ तीन था... जिसका दरवाज़ा हल्का खुला हुआ था..। बिस्तर पर कोई लेटा था और उसके हाथ आकाश की तरफ उठे हुए थे। उसने थोड़ा ध्यान से देखा वह किसी लड़की के हाथ थे.. पतले... एक हाथ में घड़ी थी.. वह अपनी उंगलियों से हवा में कुछ बना रही थी... या किसी का नाम लिख रही थी... उसकी बहुत इच्छा हुई उसका चहरा देखने की... पर दरवाज़ा बहुत कम खुला हुआ था.. वह हल्का दाईं ओर झुका.. पर उस लड़की की ठुड्डी ही दिखाई दी बस... तभी उसने आकाश में कुछ बनाना रोक दिया... मानों उसे मेरी आँखों की चुभन महसूस हुई हो... उसने झटके से अपना सिर उठाया और सीधा उसकी और देखने लगी...। वह चौंक गया.. पकड़ा गया... ’वह मेरी मौसी को बता देगी...’ वाला गिल्ट उसके भीतर मरोड़ की तरह उठा.. वह सीधा कमरा नम्बर एक सौ चार में घुसा और खुद को बाथरुम में बंद कर लिया। अस्पताल... इसका एक केरेक्टर होता है..। सरकारी अस्पताल अपनी पूरी गंदगी में आपके चहरे पर होते हैं... और प्रायवेट अस्पताल, अस्पताल जैसा ना दिखने की ज़िद्द, आपको डरा देती है। इंदर समर्पण कर चुका था..। उसने अपना बटुआ मौसी को दे दिया था.. जब वह आँखें खोलता मौसी लोगों में उसे पैसे बाटती हुई दिखतीं...। कई बाटल ड्रिप और कई बार हगने के बाद... उसके सामने अंग्रेज़ी से संघर्ष करता हुआ एक डाक्टर आया.. उस डाक्टर के अगल बगल में बहुत से उसके चम्चे जैसे असिस्टेंट थे...। डाक्टर बिल्कुल डाक्टर के जैसा दिख रहा था... जैसे हमारे देश में जो चीज़ जैसी है बिल्कुल वैसी ही दिखती है...। उस डाक्टर की पतली सी काली मूछें... साफ चमकदार शर्ट.. अभी-अभी काले किये हुए बाल.. हल्की तोंद... कस कर बांधा हुआ ढ़ीला पेंट... काले चमकदार जूते.. और शरीर से आती हुई... अमृत जैसी खुशबू...। ’हाउ आर यू फीलिंग सर...?’ डॉक्टर ने बहुत करीब आकर पूछा...। इंदर कुछ कहने को हुआ उसके पहले ही डॉक्टर ने अपने असिस्टेंट से ’खुसुर-पुसुर’ जैसी ध्वनी में तीन बातें कहीं और तेज़ कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ तीन की तरफ निकल गया। कितना सस्ता है सब कुछ... इंदर ने सोचा... मेरा अब तक का जिया हुआ। एक क्षण में यह खुशबूदार आदमी कह सकता है कि अब बहुत मुश्किल है... और सब कुछ झड़ जाएगा... मेरा सारा बिखरा हुआ.. बटा पड़ा इंदर.. एक थड़ की आवाज़ के साथ खत्म हो जाएगा..। शायद कोई आवाज़ भी ना हो... ठीक उस क्षण से मैं अतीत की किसी गुफा में ज़बर्दस्ति घुसेड़ा जाऊंगा... जहां मौसा जी गायब हुए हैं... वहां शायद मुझे वह मिलेंगे.. क्या मैं वहां भी उनसे वही व्यस्तता का अभिनय करुंगा..। अपना सस्ता.. सुस्त.. घटिया अभिनय...। मौसा जी पिछले कुछ सालों में बहुत चुप रहते थे.. मौसी चुप्पी से ठीक उलट थीं... वह महिलाओं के साथ गप्पबाज़ी में अपना मनोरंजन ढ़ूढ़ने लगी थीं...। मौसाजी के ख़त मुझे हर कुछ समय में मिल जाते थे... कुछ अधूरे पढ़े और कुछ अभी तक नहीं खोले हैं। वह सो चुका था..। डॉक्टर के जाते ही उसकी गहरी नींद लग गई थी। मौसा जी सपने में आए थे.. वह बहुत सुस्त लग रहे थे.. वह अपने सारे ख़तों को लेकर उसके पास आए थे... वह व्यस्त है वह कहता रहा पर वह इंतज़ार कर रहे थे..। वह अपने ऑफिस की खिड़की से देखता.. वह बिल्डिंग के नीचे खड़े उसकी राह तक रहे हैं.। इंदर हड़बड़ाकर उठ गया.. उसने उठते ही दो तीन बार अपनी आँखें घिंसी.... क्या हुआ? कितना बजा है? देखा बग़ल के तख़त नुमा पलंग पर मौसी नहीं है.. उस छोटी सी गुफा रुपी कमरे में कोई भी नहीं था..। उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी.. उसे लगा कि यह अतीत की गुफा है, अतीत का कमरा... जिसमें उसे ज़बर्दस्ती ढ़ूंसा जा रहा है... उसने चिल्लाया...। ’नर्स.. नर्स... सिस्टर.. सिस्टर...’ एक वृद्ध महिला आई जिसकी आवाज़ में मौसी सा अधिकार था... ’क्या है?.. आराम करो.. अभी बहुत ड्रिप लगने हैं...।’ ’बाथरुम...’ बस एक यह ही शब्द काम करता था। नर्स ने थोड़ा मुंह बनाया.. उसके हाथ से सिरिंज निकाली... उस सिरिंज को वापिस बोतल में ठूंसा. और एक छोटा सा ढ़क्कन उस सिरिंज की जगह लगा दिया। ’जाओ.. हो जाए तो आवाज़ लगा देना...।’ ’जी....।’ सिस्टर/नर्स तेज़ कदम ताल करती हुई निकल गई। उसे बाथरुम नहीं जाना था.. वह किसी एक इंसान से बात करना चाहता था। इस दुनिया के इंसान से... वह सपने में था जो बहुत ही असल सा था..। वह बहुत कमज़ोरी महसूस कर रहा था...। पीठ में टी शर्ट चिपकी हुई थी... पसीने से... उसने सोचा फ़ेन चालू कर दूं... तभी उसकी निग़ाह कमरा नम्बर एक सौ तीन के दरवाज़े पर गई... वह दरवाज़ा पिछली बार से कुछ ज़्यादा खुला हुआ था। वहां कोई है... कोई ऎसा जो इसका इंतज़ार कर रहा है... जो इसे जानता है.. शायद मौसा जी हों अपने ख़त लेकर.. नहीं.. पर उसने वहां एक एक लड़की का हाथ देखा था... वह अपने कमरे, एक सौ चार, की चौख़ट तक आया...। उस कोरिड़ोर के अंतिम छोर पर कुछ लोग खड़े थे.. सारे एक जैसे कपड़े पहने.. यह इसी अस्पताल का स्टाफ था। वह धीमे कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ तीन के पास पहुंच गया। उसने खुले हुए दरवाज़े से झांककर देखा तो उसे वह लड़की दिखी.. वह सो रही थी... उसने पूरे कमरे में देखा तो उसके बहुत से कपड़े दिखे.. पर बगल वाले पलंग पर कोई नहीं था। नीचे चप्पल रखी हुई थी... उसे चप्पले बहुत छोटी लगीं.. लगा किसी बच्चे की हैं... उसकी इच्छा हुई कि वह उसके पैर देखे.. क्या इन्हीं पैरों की यह चप्पल है? ’पानी.. दे दीजिए।’ वह आवाज़ सुनकर चौंक पड़ा..। वह उसे ही देख रही थी... उसकी आँखें बड़ी थीं.. सीधी नाक़.. बिखरे हुए बाल.. सांवला रंग.. उम्र लगभग... लगभग.. चहरे से उसकी उम्र पता नहीं लग रही थी। ’पानी वहां है...’ सामने वाले पलंग के नीचे पानी रखा हुआ था...। वह गिलास ढूढ़ने लगा... कुछ देर में हारकर उसने उसकी तरफ देखा...। वह उसे जानती है... उसके बारे में सब कुछ... उसे ऎसा लगा। ’गिलास नहीं है..’ उस लड़की ने कहा और बोतल के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। पानी पीने के लिए वह कुछ सीधी होकर बैठ गई। इंदर ने उसके वक्ष देखे.. उभरे हुए... उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी। पानी पीते हुए उसने चद्दर से अपनी छाती ढ़ांक ली। इंदर ने अपनी आँखे नीची कर ली। उसकी उम्र करीब अट्ठाईस-उनतीस साल की होगी.. उसने अनुमान लगाया। फिर वह खुद को कोसने लगा.. नहीं ठीक कोसने नहीं... कोसने के ठीक पहले की स्थिति... उसकी उम्र पचास की थी.. पर किसी भी लड़की को बिना कपड़े के देखने की उसकी इच्छा वह कभी दबा नहीं पाया। उसने उस लड़की के हाथों से बोतल ली पर ज्यों ही वह उसको नीचे रखने के लिए झुका... उसके शरीर ने जवाब दे दिया.. उसे चक्कर आने लगे... वह कांपने लगा। लड़खड़ाता हुआ वह दूसरे बिस्तर पर पसर गया.. उसे ठंड़ लगने लगी... वह सिकुड़ने लगा। वह उसे देख रही थी...जैसे कि वह खुद को देखता हो... वह दयनीय नहीं दिखना चाहता था... वह कुछ संभला.. उसने लेटे-लेटे ही पानी की बोतल उठाई पर सिर्फ दो घूंट पानी पिया.. उसे पेट गुड़गुड़ाने का डर था..। कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा खुला हुआ था.. इंदर ने अपने कमरे की तरफ देखा.. उसे लगा वह एक सौ चार में अभी भी पड़ा हुआ है.. उसे ड्रिप लगी हुई है.. और वह कमरा नम्बर एक सौ तीन के बारे में सोच रहा है। क्या वह सच में यहां है...? उसकी इच्छा हुई कि वह कमरा नम्बर एक सौ चार में जाए और खुद को देखकर आए कि वह वहां है कि नहीं....। ’अभी मत जाईये...।’ ’जी...’ ’दौपहर को कोई नहीं आता है यहां... मैं बोर हो जाती हूँ... आप कुछ देर और बैठ जाईये।’ ’मैं कुछ देर बैठके ही जाऊंगा... मैं अभी जाने की हालत में भी नहीं हूँ।’ वह यहीं था... कमरा नम्बर एक सौ तीन में..। कमरा नम्बर एक सौ चार ख़ाली था... उसका बंबई का घर भी खाली था.. उसके ऑफिस की कुर्सी भी ख़ाली थी... वह यहां था..। कमरा नम्बर एक सौ चार यहां से गुफा की तरह दिख रहा था उसे...। उसने कमरा नम्बर एक सौ तीन का कमरा नम्बर एक सौ चार से तुलनात्मक अध्ययन किया... इस कमरे में दो खिड़कियां है... जबकि उसके कमरे में सिर्फ एक खिड़की है.. दूसरी खिड़की है पर उसमें एसी लगा हुआ है.. सो वह बंद कर दी गई है... यहां एसी नहीं है...। उसे एसी की ज़रुरत नहीं है.. उसे उजाला चाहिए.. उसे धूप चाहिए.. उसे गुफा में नहीं जाना। वह थक गया। ’मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगी...’ लड़की ने यह खुद से ही कहा....। ’ठीक होने के बाद तुम क्या करोगी?... मतलब इस अस्पताल से निकलने के ठीक बाद तुम पहली चीज़ क्या करना चाहती हो?’ ’गोलगप्पे खाऊंगी... वह नीचे देखो.. उस पेड़ के नीचे वह रोज़ शाम को बैठता है... बहुत भीड़ होती है उसके पास.. बस वहीं जाऊंगीं...।’ उस गोलगप्पे वाले के पेड़ को देखने के लिए उसे उसके पलंग के पास आना पड़ा। उसने उस पेड़ को देखा और मुस्कुरा दिया। ’और आप क्या करोगे?’ ’मैं... पहली फ्लाईट पकड़कर सीधा बंबई.. बहुत काम पड़ा है... मुझे तो अपने ऑफिस की डेस्क दिख रही हैं.. और कुछ भी नहीं।’ झूठ था यह..। यह बोलते ही उसने अपने दोनों हाथों से पलग के छोर को दबाया.. उसके कंधों मे खिचाव आया.. उसकी गर्दन दोनों कंधों बीच झूल गई... फिर झूठ.. झूठ क्यों? सच यह है कि वह इस अस्पताल से छूटते ही सुरुचि के पास जाएगा... वह सिर्फ एक बार ही उसके साथ सोया है। फिर उसे नग्न देखने की चाह रह रहकर वह अपने भीतर महसूस करता है...। और एक तकलीफ भी...पज़ेसिवनेस। इस शब्द से हमेशा से वह भागता रहा है.. पर इस शब्द ने हमेशा उसे हर अकेली रातों में धर दबोचा है...। सुरुचि बदला था किसी और लड़की से... पर वह बदला, हमेशा बदला लेने वाले से बड़ा हो जाता था... असल में वह किससे बदला ले रहा था उसे कुछ समय बाद इस बात का कोई पता भी नहीं रहता। जलन.. तीख़ी जलन... सुरुचि इस वक़्त कहां होगी... किसके साथ.. वह अपने सुंदर शरीर को लेकर शायद किसी के बहुत करीब... सटी हुई खड़ी होगी...कोई और उसे छूएगा.. चिपकेगा... कोई उसके... ऊफ...!!! यह पज़ेसिवनेस नहीं है इंसिक्योरिटी है... इस तरह की इंसिक्योरिटी उम्र के साथ-साथ बढ़ती जाती है ’आप क्या काम करते हैं?’ कुछ देर के मौन के बाद उसने पूछा...। वह थोड़ा ऊपर होकर बैठ गई थी.. सिर के पीछे उसने तकिया लगा लिया था... उसने चद्दर सिर्फ कमर तक ही रखी थी.. उसके वक्ष वह देख सकता था... पर उसकी निग़ाह उसकी आँखों से नहीं हट रही थीं... उस लड़की की आँखों में कुछ था... वह उसे जानती थी... उसके बारे में सब कुछ फिर भी बहाना कर रही थी पूछने का... यह शायद सपना है.. उसे लगा.. सपने में ही आप ऎसे पात्रों से मिलते हो जो कहानी के पात्र जैसे लगते हैं... जिनके सामने समर्पण करने को जी चाहता है..। ’मैं सामान बेचने में मदद करता हूँ... एक ऎसी कंपनी में काम करता हूँ जो इश्तेहार बनाती है... जिससे आप जाकर उसे खरीदें... मैं सालों से यह काम कर रहा हूँ.. लोग कहते हैं कि मैं अपने काम में बहुत तेज़ हूँ... पर मैं वह नहीं हूँ.. मैं इंदर नहीं हूँ.. मैं खुद एक प्रोडक्ट जैसा हूँ... जिसे रोज़ नए-नए तरीके से मैं बेचने की कोशिश करता हूँ...। मैंने अपने चारो तरफ ’मैं बहुत अलग हूँ... मैं जीवन को उसकी मुक्तता में जीता हूँ.. मैं यायावर हूँ...’ जैसे वाक्यों का एक ओरा बनाया हुआ है... उसे रोज़ चमका के रखता हूँ... असल में मैं एक कमीज़ हूँ.... जो रंग बदलती है... मैंने बस उस कमीज़ की धुलाई सफाई की है... उसे चमकाया है.. उसे बाज़ार में हर बदलते मौसम में आज़माया है.. वह हमेशा काम करती है... मैं हमेशा काम करता हूँ...। मेरे लिए सबसे कठिन काम है अपने साथ रहना... अपने खुद के साथ.. खुद के पूरे झूठ के साथ लगतार रहना...। मेरे भीतर एक खालीपन है... जिसके लिए बस में दूसरों क उपयोग करता हूँ.. वह आते है और कुछ समय के लिए इसे भर देते हैं.. पर वह जाते ही मुझे एक कड़वाहट महसूस होती है.. अपने से.. खुद से.. उनके कुछ देर मेरे साथ होने से.. सब से.. और मैं बाहर निकल जाता हूँ.. फिर किसी को खोजता.. ढूढ़ता हुआ। मुझे असल में माफा मांगना चाहता हूँ... कहीं किसी गिरजे में कोई बूढ़ा फादर होगा जो कह देगा कि... जाओ....भगवान ने तुम्हें माफ किया...।’ इसके बाद शांति छा गई। वह कमज़ोरी महसूस करने लगा। वह कुछ नहीं बोली... चुप बनी रही...। इंदर से यह शांति सहन नहीं हो रही थी। उसने अपने माथे पर पसीने की एक बूद को सरकते हुए महसूस किया... वह बालों से निकलकर उसकी भौं की तरफ सफर कर रही थी। वह हलके से उठा... दो कदम चलकर उसने कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा पकड़ लिया..। कुछ गहरी सांसे ली... उस लड़की की आवाज़ उसे आई... ’मेरा नाम रोशनी है...’ इंदर ने मानों उसका नाम सुना ही नहीं...। वह धीमे कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ चार की तरफ बढ़ने लगा... जो बिल्कुल एक गुफा की तरह दिख रहा था...। वह जल्दी से उस गुफा में गुम जाना चाहता था... वह चाहता था कि वह सो जाए... गहरी नींद.. और जब उठे तो सब कुछ मिट जाए.. उसका कमरा नम्बर एक सौ तीन में जाना.. उसका इस शहर में आना... मौसा जी की मौत.. उनके ख़त.. सुरुची.. उसके ऑफिस की डेस्क... और उसका नाम.. सब कुछ.. मिट जाए..। वह कमरा नम्बर एक सौ चार में ऎसे घुस रहा था जैसे कोई अपनी नींद में प्रवेश करता है...। - - ¬- नींद एक धोखा है... बिखरी हुई ज़िदगी के बीच जब भी एक गहरी नींद मिलती है तो लगता है कि सब सही हो गया है... मानों बिखरा हुआ घर उठते ही वापिस, खुद-ब-खुद सलीके से जम गया। हमेशा लगता है कि एक बार सब सही हो जाए.. फिर नए सिरे से शुरुआत करेंगें... पर वह नया कौन होगा जो शुरु करेगा? वह खुद पचास साल पुराना है... झूठे बहानों से लदा हुआ... वह कैसे एक दम नई शुरुआत कर सकता है...? नींद एक अच्छा धोखा है.. नींद खुलते ही एक क्षणिक सुख प्रदान करता है... कि यह खेल की नई शुरुआत है... पर कुछ ही समय में सब कुछ वैसा का वैसा बिखर जाता है। इच्छा होती है कि वापिस नींद की शरण में चले जाओ.. बस सोते रहो... पर नींद दुत्कारके भगा देती है... बिस्तर पर देर तक उलट-पलट की कलाबाज़ी थका देती है...। वह उठ गया था...। मौसी बगल में बैठी उसके लिए सेब काट रही थीं...। बिमारी कितना आश्रित कर देती है... उसे अचानक वह दिन याद आ गया जब बचपन में वह बरामदे में कंचे खेल रहा था और मौसी राजमा-चावल लिये उसके पीछे-पीछे धूंम रहीं थीं.. हर कुछ देर में एक कोर उसे खिला देती...। खेलते-खेलते मैं ज़्यादा खाना खा लेता हूँ ऎसा मौसी को लगता था। मौसी की उंग्लियों की नंसे दिख रही थी.. उभरी हुई... हरी नंसे..। मौसा जी के जाने के बाद वह कितनी अकेली हो गई होंगी... उन्होंने उसे फोन किया था... ’बेटा कुछ दिनों के लिए आ जाता तो अच्छा लगता।’ बस एक छोटा आग्रह.. विनती जैसा... वह कोई बहाना नहीं कर सका..। वह अभी तक वापिस चला गया होता अगर वह बीमार नहीं पड़ा होता। ’मौसी आप मेरे साथ बंबई चलो.. वहीं रहना मेरे साथ..’ बीमार भर्राई आवाज़ में बहुत हलके से उसने कहा...। मौसी ने कटे हुए सेब उसकी तरफ बढ़ा दिये... ’अभी बीमार है इसलिए ऎसा कह रहा है...।’ ’नहीं मौसी.. आप सच में मेरे साथ रहो...।’ मौसी मुस्कुरा दी..। वह भी चुप हो गया। अचानक बचपन के ख़्याल से वह शायद भावुक हो गया होगा.. उसने सोचा..। ’मेरा मोबाईल आप लाईं हैं?’ ’अरे कहां.. वह तो मिला ही नहीं.. मैं ढूढ़ रही थी.. फोन भी लगाया.. पर कहीं कोई आवाज़ ही नहीं आई...।’ ’वह साईलेंट पर रखा है... बेग़ में है.. अंदर की पाकेट में.. अभी जाएं तो ले आना...।’ तभी वह बूढ़ी सिस्टर आई और उसने एक पर्ची मौसी के हाथों में थमा दी..। ’यह दवाईंया ले आईये...।’ यह कहकर वह चल दी..। ’पैसे हैं ना आपके पास..।’ ’हाँ हैं.. मैं अभी आई..।’ कभी-कभी उसकी इच्छा होती थी कि वह मौसी से बैठकर बात करे... या शाम को अपनी लंबी वाक पर उन्हें साथ ले जाए। ऎसे कुछ क्षणों में वह मौसी से अपने बचपन के किससे सुनना चाहता था... उन मुक्त दिनों की बातें जब वह खेलने और खाने के बीच दौड़ लगा रहा होता था। कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा बंद था... उसे लगा कि वह कमरा उसके कमरे से थोड़ा दूर हो गया है। जब वह वहां नहीं गया था तब वह कमरा उसे पास लगता था... उसके मिलते ही कमरा नम्बर एक सौ तीन, कमरा नम्बर एक सौ चार से थोड़ा दूर हो गया... जैसे बाक़ी सारे गृह पृथ्वी से दूर होते जा रहे हैं.. जैसे... धरती भी धीरे-धीरे फैलती जा रही है.. जैसे उसका जीवन जीते-जीते बिखरता जा रहा है... जो संबंध पहले एक हाथ की दूरी पर थे.. अब उनसे मिलना असंभव हो गया है। समय किसी एक कोने में कितना धीमा हो जाता है। उसकी गति इतनी धीमी होती है कि बीता हूआ सारा कचरा उस ओर धीरे-धीरे सरक कर जमा होने लगता है...। अपनी गलतियां.... क्या उन्हें कभी सुधारा जा सकता है?

2 comments:

Anonymous said...

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल