Friday, August 30, 2013

सुबह...

पिछले कुछ दिनों से PAUL AUSTER AND J.M. COETZEE बीच में हुए पत्राचार पढ़ रहा हूँ। साथ में कुछ दूसरी किताबों में दूधनाथ सिंह की ’लौट आ ओ धार..’ पता नहीं कहां से फिर छोले में साथ हो ली है। मुझे यह नाम बहुत पसंद है... HERE AND NOW… दो बड़े लेखक... खेल, लेखन, अर्थशास्त्र, दोस्ती... बूढ़ा होना... हर विषय पर कितनी सरलता से लिख रहे हैं। मैं इस किताब को रोज़ लगभग ऎसे पढ़ता हूँ कि एक ख़त मुझे भी आया है आज...। सुबह मैं PAUL का जवाब/ ख़त... पढ़ता हूँ और शाम का इंतज़ार करते हुए अपनी बाल्कनी में शाम की चाय के साथ Coetzee को। मैंने शाम Coetzee को क्यों पढ़ता हूँ मुझे नहीं पता...। मैंने कभी Paul के ख़त शाम को नहीं पढ़े...। कैसे लेखक संगीत की तरह हैं... जिस संगीत को सुनकर हम सुबह उठना पसंद करते हैं... उस संगीत को हम अपनी शाम के होने में शामिल नहीं करना चाहते....। बहरहाल...मैं इन दोनों के बीच डॉकिया जैसा कुछ हो गया हूँ..... नहीं डॉकिया नहीं... लेटर बाक्स...। ठीक इस वक़्त रात के तीन बज रहे हैं...। बाहर अभी ज़ोरों की बारिश शुरु हुई... मैं ’लेटर बाक्स’ शब्द लिखकर मुस्कुराया.... इस शब्द पर भी और बारिश के बुलावे पर भी...तुरंत बाल्कनी में भागा...। फिर याद आया कि चाय का कप तो टेबल पर ही छूट गया है। वापिस आया और चाय का कप लेकर बाल्कनी में बैठ गया। बहुत हल्की बारिश की फुहारें चहरे पर पड़ रही थी.... पूरी कालोनी में सन्नाटा था...। मैं बची-कुची आवाज़ों पर ध्यान देने लगा..। आंवले का पेड़ अपनी पत्तीयां छोड़ रहा है.... बाल्कनी के नीचे मानों पीला कालीन बिछ गया है। मैं वापिस भीतर आया मानों मुझे कुछ याद आया हो और मैंने वान गॉग के कुछ पत्र पढ़ ढ़ाले... “मुझ पर भरोसा रखना....”। हर बार एक अजीब आदत सी पड़ी है कि खुद को समेट लो...। झाड़ू लगाकर सारे बिखरे हुए को एक तरफ कर दो...। दो बजकर पैंतिस मिनट पर नींद खुली थी... मैं फिर सो जाता तो समेट लेता खुद को.... मैं उठ बैठा... लिखना, चाय, बारिश और चुप्पी....। अभी कुछ देर में मैं नीचे जाऊंगा... सुबह होने को देखने... कालोनी के गेट पर एक चाय वाला है जो सुबह.... पांच बजे दुकान खोल देता है। पीले बल्ब की रोशनी में जब वह मुझे सुबह-सुबह आता हुआ देखता है तो मुस्कुरा देता है...। शुरु कुछ दिनों में मुझे लगता था कि वह मेरे ऊपर हंस रहा है.... (इस शहर में आप अपने अकेलेपन पर झेंपना शुरु कर देते हो....) पर मैं ग़लत था... वह स्वभाव का अति उत्साही व्यक्ति है। सुबह मुझे जैसे आदमी को देखकर वह प्रसन्न हो जाता है। बारिश अभी रुक चुकी है...। “जो नहीं है... जैसे कि ’सुरुचि’ उसका ग़म क्या... वह नहीं है..” शमशेर का लिखा पढ़ा। कुछ देर तक उनकी बाक़ी लिखी चीज़े भी गूंजती रहेगीं। मैंने फिर खुद को समेटा... बाहर बाल्कनी में पहुंचा तो कुछ घरों से ख़ांसने बुहारने की आवाज़े आने लगी थी...। यह शहर ज़िदा हो रहा है.... हम सब यक़ीन से सोए थे कि सुबह उठ बैठेगें.... और सुबह हो रही थी। मैं आज उस चाय वाले का नाम पूछूंगा.... बस... नाम...।

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

संवाद के बीच तत्व को समेटता डाकिया

shraddha kadam said...

Speechless..
Ek baar aapki koi post padhna shuru kar du to bina khatm kiye me ruk he nahi sakti..
sardiyon ki subahon me jaise der tak kambal se nikalne ka man nahi karta.. waise he aap k blogs padhana shuru kar du to bas padhte rehne ko man karta hai :)
keep writing

HAVAS beyondlimits said...

finest of the writings i've read

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल