Friday, August 16, 2013

Colour Blind...5

कितना महत्वपूर्ण होता है जीवन का दिख जाना। ज़िंदा होते हुए शब्द... जो बहुत समय तक कागज़ पर मृत अक्षरों की तरह पड़े हुए थे...। नाटक को सांस लेते हुए देखना....। इन्हीं बहुत छोटी पहली सांसों के लिए नाटक करते रहने का सुख है...। कोई जब मुझसे यह छिछला सवाल पूछता है कि नाटक और फिल्मों में क्या अंतर है...? तो शायद उसका जवाब भी मुझे अब मिला है.... इस नाटक के जन्म में....। किसी चीज़ का जन्म होते हुए देखना... आपके खुद के मृत अतीत पर मरहम का काम करता है। और यह मज़ा सिर्फ नाटक में ही मिलता है क्योंकि नाटक का जन्म एक दिन नहीं होता... वह लगातार.. हर दिन.. हर तालीम (मराठी में रिहर्सल को तालीम कहते हैं.. जो मुझे बहुत पसंद है) में होता है। मैं अपना पूरा दिन बिना किसी काम के पड़े-पड़े बिता देता हूँ इस इंतज़ार में कि शाम होगी और आज की तालीम में मैं फिर कुछ पैदा होते देखूंगा। एक मूर्तिकार जब गीली मिट्टी से खेलता है.... और धीरे-धीरे पानी की मदद से वह उस मिट्टी को एक दिशा में धुमाना शुरु करता है तो अचानक एक संरचना दिखने लगती है। मेरे नाटक बनाने में थोड़ा अंतर है... मैं गीली मिट्टी के सामने घंटो बैठा रहता हूँ....। बहुत लंबे संयम के बाद मिट्टी अपने छोटे-छोटे हिस्सों में बात करने लगती है...। उस क्षण को मैं कभी पकड़ नहीं पाया जब मेरे हाथ खुद ब खुद उठकर खेलने लगते हैं। तब एक लुका-छिपी का खेल शुरु होता है.... इस खेल में मिट्टी अपनी संरचना पर खुद आती हैं.... चूकि मैं मूर्तिकार हूँ.... इसलिए मेरे हाथ उस मिट्टी की मदद करते हैं...। मैं उसे नहीं वह मुझे बनाती है...। मैं पूरी तरह खाली होकर मिट्टी के पास जाता हूँ... रोज़। बिना सोचे-जाने... इसमें हम दोनों एक दूसरे को तुरंत अपना लेते हैं... मैं अपने बंधे-बंधाए सिद्धांत उसपर थोपता नहीं हूँ.. और वह भी अपने संवाद में सूखती नहीं है। मिट्टी अपनाने में अपना समय लेती है... पर जब अपनेपन के खेल शुरु होते हैं तो मुझे मेरा बचपन का सा सुख दिखने लगता है। अभी नाटक किसी बचपन के खेल में मुक्त है। अभी वह पीपल और इमली के पेड़ के नीचे बैठकर सांस ले रहा है।

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने मन में व्यक्तित्व गढ़ना, कितने गहरे जाकर प्रारम्भ करें।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल