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Sunday, June 22, 2008

विमल को खत..

दोस्त विमल,
तुम्हारा कमेन्ट पढ़ा, चूकि पहले मैं भी कुछ ऎसा ही सोचता था सो वो बातें बहुत कुछ अपनी सी लगी, परंतु मेरे विचार इस संदर्भ में कुछ बदले हैं... जिन्हें बस मैं कह देना चाहता हूँ। यू हबीब साहब,रतन थियम जैसे लोगों की वजह से भारतीय रंगमंच को अलग तरह की भाषा मिली हैं ये सभी जानते हैं..।मैं काफ़ी व्यक्तिगत तौर पर बात करना चाहता हूँ। हबीब साहब के साथ मैं भी शोषण शब्द का प्रयोग कर चुका हूँ,पर अब मेरा मानना है कि जितना भी हबीब साहब ने अभी तक काम किया है, और जितना उसके बदले उन्हें मिला है वो इससे कहीं ज़्यादा पाने का हक़ रखते हैं।इस हिसाब से तो इस देश में उनके साथ भी शोषण ही हुआ है, तो शोषण बहुत बड़ा शब्द है। जैसे मेरा मानना है कि ’विनोद कुमार शुक्ल’ जैसे लेखक को इस देश को सिर आखों पे बिठाना चाहिए पर ऎसा नहीं है।निर्मल वर्मा को उनकी मृत्यू के पहले तक उनके सारे लेखन का राजकमल उन्हें 5000/ रु हर माह... मात्र देता था...तो अब इस सब में हम क्या कहें कि महत्वपूर्ण क्या है, निर्मल वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल का काम या वो शोषण जिसके असल में ज़िम्मेदार हम सब हैं। इन सब में जहाँ तक दीपक, या रामचंद्र जैसे अभिनेताओं का सवाल है वो बहुत ही वयक्तिगत प्रश्न है, राम अगर बाहर अभिनय नहीं कर पा रहा तो इसका कारण खुद राम है उसके ऊपर पारिवारिक ज़िम्मेदारीया कहीं ज़्यादा है उसके चार बच्चे हैं।जहाँ तक दीपक की बात है तो वो हबीब साहब को छोड़कर चला गया था फिर उसने अपना एक रंगमंच खोला और लगभग नया थियेटर का ही पुराना काम दोहराता रहा..नशे की लत की वजह से उसे पहला अटेक आया था फिर दूसरा...।इसके ज़िम्मेदार हबीब साहब नहीं हैं।हबीब साहब ने एक सोच का रंगमंच किया है उनकी बदोलत हमें बहुत ही उम्दा रंगमंच देखने को मिला है, ये सोच है, आविष्कार है... इसमें दीपक महत्वपूर्ण नहीं है, अभिनेता उस पूरे आविष्कार उस सोच का एक पुर्ज़ा मात्र है... आविष्कार नहीं...।दीपक के नहीं रहने पर भी वो सारे नाटक अभी भी चल रहे हैं।उस वक्त भी अगर दीपक नहीं होता तो कोई और होता.. पर अगर हबीब तनवीर या रतन थियाम नहीं होते तो हम एक अलग सोच, एक अलग तरह के रंग मंच से ही वंचित रह जाते।रतन थियाम के नाटक देखने के बाद हमें कितने अभिनेता याद रह जाते है? हमें अगर कुछ याद रह जाता है तो वो केनवास जिसपर रतन थियाम रंग भर रहे थे...और एक से बढ़कर एक दृश्य हमारे सामने आते जा रहे थे, और ये हम सबकी जानकारी की कमी हैं असल में हबीब साहब को पैसा शोहरत सब बहुत बाद में मिला है.. बहुत समय तक वो खुद पाई-पाई जमा करके रंगमंच किया है। और ये हमारे देश की हमारी त्रासदी है कि हमने हबीब साहब जैसे लोगों को उनका ढियू नहीं दिया है।
और जहाँ तक दूसरों का भविष्य बनाने का सवाल हैं वो एक बहुत छोटी बात है.... मेरा भविष्य कोई बनाएगा की आशा में अगर मैं जीना शुरु करु तो... माफ करना मैं मज़दूर हो जाना ज़्यादा पसंद करुगां।अ़च्छा रंगमंच करने वाले,अच्छे साहित्यकार यू भी समाज की परिधी पर जीते है तो इसे हम यूं नहीं आंक सकते कि मैंने फला कंपनी को इतने साल दिये पर उसने उसके बदले कुछ भी नहीं दिया।यूं मैं भी दुबेजी को काफी गरियाता रहता हूँ पर मैं ये कभी भी नहीं भूल सकता कि वो थे इसीलिए आज हम हैं... उनका भाषा का रंगमंच था... जो हमारे रंगमंच हैं।
उनके ऊपर लगे आरोप और सवाल उनके काम के सामने बहुत छोटे हैं..।
आशा है आप मेरी बात समझ रहे होगें...।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल