Tuesday, June 10, 2008

writing...


देर से वही... वैसी ही सांसे ले रहा था।एक पैर सांसों की गति से हिल रहा था।आँखें दीवार पर टिकी थी। बचे रह गए चरित्रों में कहानियाँ ढूंढ रहा था।नींद में सने पात्र, सपनों से लग रहे थे।कुछ दृश्य घर से शुरु होके... समुद्र में चले जाते थे,तो कुछ पात्र, नदी में तैरते-तैरते गांव में गुम हो जाते थे।अचानक मैं अपने आपको कोसने लगा... क्या है ये? बस भर पाया मैं इन रतजगों से। तभी मुझे एलियट की बात याद आई।

-There is always a separation between the man who suffers and the artist who creates; and the greater the artist the greater the separation.

एक मुस्कान नाम की लड़की कहानी के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ गई।देर तक एलियट के शब्दों के बीच खुद को ढूंढ़ता रहा। मैं इन शब्दों में बहुत मुझे मिला नहीं... पर मैं आस पास ही कहीं छुपा हूँ का ख्याल सुख देता रहा।
अबाबील नाम की नई कहानी के बारे में मैंने सोचना शुरु किया, बहुत पहले इसे पहाड़ो पे लिखना शुरु किया था। एक बार उसे वापिस पढ़ा फिर बंद कर के रख दिया।सोचा उपन्यास भी काफी समय से उसी सड़क पे खड़ा मेरा इंतज़ार कर रहा है जहां उसे छोड़ा था।फिर नया नाटक भी है जिसके दो scene लिखकर मैं चुप बैठा हूँ।ये सब कुछ दूर चलकर चुपचाप बैठे हैं, मैंने इन सारे नाटक, कहानी और उपन्यास में एक मुसकान नाम की लड़की का पात्र बढ़ा दिया।:-)

"writing doesn't come from contentment and champagne.That's not where a novel comes from.writers lock them selves in there rooms, they treavel, they vanish and some times lives fall apart."- kiran desai.

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल