Thursday, January 6, 2011

तीन एकांत...


एक एकांत नाम का शब्द लिखूं... एक खालीपन को जी लूं... एक अकेलेपन के साथ नाच लूं....। मैं उत्सव मनाना चाहता हूँ इन तीनों का... मैं संन्नाटे में मौन कहना चाहता हूँ....। कुछ शब्द लिखना चाहता हूँ जो मेरे साथ गूंजते हुए चले... मैं उन्हें अपने साथ घुमाने ले जाऊं... उन्हें वह रास्ते दिखाऊं जिनसे मैं डरा हुआ रहता हूँ.. उन्हें वह पगडंडियों पर चलाऊं जहाँ मैं मुक्त कभी भागा हूँ। उनसे प्यार करुं... उनके कानों मे फुसफुसाते हुए रोज़ एक कविता सुलाऊं... उन्हें तेज़ धूप से बचाने के लिए अपनी बाहों में भर लूं... चिपका लूं... भीतर कहीं छुपा लूं...। और फिर नाचूं उनके साथ,,,, देर रात तक... अपने अकेले वीरानों में वह मेरा घर बनाए... मैं चुप हो जाऊं... छुप जाऊं.... सो जाऊं... और उनसे पूछू... क्या यह सब सच है?????????
शायद यह सारा कुछ एक भ्रम हो... पूरी तरह बुरी तरह... एक भ्रम। पर इस भ्रम के स्वप्न भी मुझे खुद तक पहुंचाते हैं। इन भ्रमों का आनंद ही मुझे एक झूठ से छुटकारा दिलाता है....। गहरे पहुंच कर मैं शायद उसे देख लूं.... उसे छू लूं... जिसका इंतज़ार मैं बहुत सालों से कर रहा हूँ। वह फटी हुई तस्वीर अचानक पूरी हो जाए। मैं उस दूसरे को देख लूं जो अपनी टीस हर शाम भीतर छोड़ देता है। उससे साथ शाम की लंबी walk पर निकलूं...वह कहें... बहे... मैं चुप रहूँ... एकदम शांत.. अपनी पूरी खामोशी से मैं उसका मौन सुनूं..। फिर रात होने के ठीक पहले... किसी वीराने में मैं उससे एक सवाल करुं.... “क्यों तुमने मुझे इतने सालों अधूरा छोड़ रखा था??????’

8 comments:

दीपक बाबा said...

“क्यों तुमने मुझे इतने सालों अधूरा छोड़ रखा था??

pratibha said...

aapko padhna khud ko padhne sareekha hota hai.

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं क्यों, पर आज मेरा भी मौन रहने का मन है।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

वाह.. सिर्फ़ वाह..

Svetlana Naudiyal said...
This comment has been removed by the author.
ajit gupta said...

मौन की ताकत का अहसास हो रहा है। बहुत अच्‍छे।

Anonymous said...

Aj moun ke sath nachne vali kvita jaisa lekh padhakh.pyara ahsas!!!!!!!!

Anonymous said...

khud ko etne acche se padhne me KHUD ke kitane pas ya kitne door rahne ki aavashayakta hoti hai manav? TUMHARI nap jokh kahane likhne ko kya kahun MOUN HUUUUU

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल