Friday, July 13, 2012

चाय या कॉफी...

हर लड़ाई के पहले बहुत देर तक सोचता हूँ कि स्टेक पर क्या है? यहां बहुत देर- क्षणिक है। सुबह-सुबह चाय पियूं या कॉफी... जूता पहनू या चप्पल... तेज़ चलू कि धीरे.... उठ जाऊं या बिस्तरे पर ही लोट-पोट होता रहूं? यह छोटे-छोटे चुनाव ही लड़ाई है। यह छोटे चुनाव और जीवन के बड़े-बड़े निर्णय बिल्कुल एक ही तरह के क्षणिक बिंदु पर टिके रहते हैं। दोनों पर एक ही बात लागू होती है.. स्टेक पर क्या है? बार बार यह सवाल गूंजता है। समस्या इस सवाल की नहीं है.... कुछ ही क्षण में हम अपने जवाब के बादल को लिए बारिश कर रहे होते हैं... समस्या इसके बाद शुरु होती है... चुनाव खत्म होते ही रंग बदल जाते हैं.... जो नहीं चुना वह दिमाग़ में रह जाता है और जो चुन लिया वह मेरे थके हुए जीवन का हिस्सा बन जाता है। ठीक इस वक़्त मैं चाय पी रहा हूँ... जबकि कॉफी दिमाग़ में है...। बाल्कनी में तकिये लगाकर बैठ गया कि पढ़ूंगा... The naïve and the sentimental novelist… नाम की किताब बाल्कनी में ले आया जबकि kafka on the shore बिस्तर पर पड़ी है, कल रात वह पढ़ते-पढ़्ते मैं सो गया था। हाथ में Orhan Pamuk है और दिमाग़ में Murakami….. दुविधा। मैंने चाय पीना बंद किया... लिखना बंद किया.. सीधे कॉफी बनाई और उसे बाल्कनी में लेकर आ गया...। साथ में Murakami को भी ले आया...। आप जीवन के बड़े-बड़े निर्णयों के साथा ऎसा नहीं कर सकते हैं...। अब Pamuk और Murakami … चाय और कॉफी... दोनों मेरे साथ हैं.. सामने हैं। जब मैंने अपने सारे options को अपने सामने पाया.. तो चीज़े कुछ ज़्यादा कांप्लेक्स हो गई। अब ना तो मैं कॉफी पी रहा हूँ ना चाय... दोनों किताबों के कवर पर आँखें जमाता हूँ... पर उठाता किसी को भी नहीं। नाटकीयता किस बात की है..? नाटकीयता तलाशने की है... अपने आपको चाय की जगह बिठाने की है... मानों मैं Murakami हूँ जो बाल्कनी में बैठे हुए खुद को देख रहा हूँ। हर चीज़ का अर्थ उसके होने में है.. भीड़ में रहकर अकेलेपन की कल्पना हमेशा सुख देती है.. पर अकेले में अकेलेपन का स्वप्न क्या है... यह दोगलापन है..। यात्राओं की कल्पना में जब भी अपने घर के दरवाज़े पर ताला लगाता हूँ तो दरवाज़ा वापिस खोलने का स्वप्न भीतर घर कर जाता है.... यह दूसरा बिंदु है..। दूसरे बिंदु का स्वन ही टाईम और स्पेस को पैदा करता है...। मेरी यात्रा का समय वह स्वप्न निर्धारित करना चाहता है....। मैं लगभग उसे फुस्लाते हुए कह देता हूँ कि करीब शाम तक.. या एक महिने बाद वापिस अपने घर का दरवाज़ा खोलूंगा...। इस दूसरे बिंदु के आते ही सब कुछ फिक्शन हो जाता है... यह सब एक कहानी में तबदील हो जाता है...। जिसकी शुरुआत मेरा घर में ताला लगाना है और अंत अपने घर का ताला खोलना है। अब यात्रा पर कौन निकला? मैं नहीं... ठीक अभी मैंने कॉफी और चाय दोनों को सिंक में उड़ेल दिया...। Murakami और Pamuk दोनों को वापिस बाक़ी किताबों के बीच फसा दिया...। एक नई शुरुआत... ’नई शुरुआत..’ इस शब्द के अपने स्वप्न है.. जिससे फिर टाईम और स्पेस पैदा होगा और फिर सब कुछ फिक्शन हो जाएगा... फिर मैं सिर्फ एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंचता हुआ एक आदमी होंऊगा... और वह कोई दूसरा होगा जो कहानी का नायक है..। मैं नायक नहीं हूँ... मैं अपने शरीर का एक अंग हूँ... जिसका मैं नाम नहीं रखना चाहता..।

6 comments:

@ngel ~ said...

As usual - Awesome flow of thoughts. I would call it perfect stream of consciousness.

But I wonder how one can read Orhan, Kafka n write so confidently in hindi. I am always stuck in English, when I read English. And in Hindi , when I read Hindi.

बाबुषा said...

"मैं नायक नहीं हूँ... मैं अपने शरीर का एक अंग हूँ... जिसका मैं नाम नहीं रखना चाहता..।" अच्छा लगा.

प्रवीण पाण्डेय said...

जो हाथ में है, उसके बाहर कुछ चाहता है मन, उत्तर मैं भी ढूढ़ पाया आज तक।

jyoti nishant said...

हर चीज़ का अर्थ उसके होने में है..

Pratibha Katiyar said...

जो नहीं चुना वह दिमाग़ में रह जाता है और जो चुन लिया वह मेरे थके हुए जीवन का हिस्सा बन जाता है।

वाह!

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

In the fight between tea and coffee, back the 'tea'.. :)

As always, loved the aatmalaap..

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल