Friday, February 20, 2009

सूअर...



एक सूअर लटकटा-मटकता अपना पेट भरने के बाद एक गाँव की एक गली से गुज़र रहा था। गली के दूसरे छोर पर कांग्रेस का एक बहुबली युवा कार्यकर्ता एक बड़ा सा पत्थर लेकर उस सूअर का इंतज़ार कर रहा था। सूअर, नज़दीक पहुचने ही वाला था कि एक बीजेपी का कार्यकर्ता, ठीक उसी वक़्त, शेव करने के बाद बाक़ी बचे पानी को तुलसी में उड़ेलने, अपनी बॉलकनी पर पहुँचा। बहुबली कार्यकर्ता ने पूरे जोश के साथ वह पत्थर सूअर पर दे मारा... सूअर लड़खड़ाया... फिसला... काग्रेस के बाक़ी कार्यकर्ता उछल पड़े... कूदने लगे...। तभी सूअर कुछ संभला, उसने ऊपर आसमान की और देखना चाहा.. पर वहा उसे बीजेपी का अधीर कार्यकर्ता अपनी बॉलकनी पर खड़ा दिखा, उसने अपनी पीठ और सिर को झटका और सरपट दौड़ लगा दी। ठीक उसी वक़्त बीजेपी के कार्यकर्ता ने एक भगवा गमछा अपने सिर पर लपेट कर अपने कार्यालय की और भागा। रिपोर्ट लिखाई गई... बात बढ़ते बढ़ते.... देश में फैल गई। उस सूअर को ढूढ़ने का काम जनता पर छोड़ा गया। जनता हकाबका होकर अपने बीच एक सूअर तलाशने लगी... ठीक उसी वक़्त, सूअर जैसे एक सूअर ने मायावति के बंग्ले के बाहर विचरण करने की गलती कर ली। एक छोटे स्तर की बड़ी मीटिंग मायावति ने बुलवा ली, यूवा कांग्रेस और यूवा बीजेपी... मायावति के दरबार में एकत्रित हुए...। मायावति ने सूअर के बाल नुचवा लिए थे... उसे presentable बनाने के लिए...। सभी अवॉक से सूअर को देखते रहे... जब वह सबके बीच आ रहा था तो उसकी चाल का लटका-झटका सब गायब था...। उससे पूछा गया... क्या यही थे वह लोग?... कौन-कौन थे? और अब तुम्हें इसके बदले में क्या चाहिए?...सूअर काफी समय तक शांत रहा... फिर कुछ ही देर में उसने ऊपर आसमान की तरफ देखा.... वापिस सब लोगों को देखा... और एक शब्द कहा ’गू..’।

Saturday, February 7, 2009

बगुले...




.... सामने, कुछ ही दूरी पर चलते रहने से समुद्र आ जाएगा...। बहुत सारा पानी...। मैं पेड़ के सामने बैठा हूँ....। खुरदुरापन है मानो कोई भीतर रगड़ते हुए निकल गया है, बार-बार खांसता, ख़खारता हूँ... कि उसके छूटे हुए घावों को मैं बाहर थूक सकूँ। फिर काफी देर तक पेड़ को देखता रहता हूँ... शाम होते ही इसपर बहुत से बगुले मड़ंराने लगते है... वह इसी पर सोते हैं। देर रात, अंधेरे में लगता है कि पेड़ पर सफेद रुईया ऊग आई है। फिर कुछ देर में समुद्र के बारे में सोचना शुरु करता हूँ... सीधे चलते रहने से वह आ जाएगा.. पर मैं इस पेड़ के सामने बैठा रहता हूँ। दिन भर जितना भी सोचता, देखता, जीता हूँ, वह रात में सब बगुले बन जाते है...। काले अंधेरे में सफेद-सफेद टमटमाते रहते है। थोड़ी दूर तक चलूगाँ तो सब पानी ही पानी है पर नहीं चलता हूँ। एक शब्द दिमाग में धूमता है, पता नहीं कितने ही जिये हुए चित्र आखों के सामने धूमने लगते है। उन सारे चित्रो में यह सामने खड़ा पेड़ भी है। मुझे आश्चर्य होता है कि इसे मैं पहली बार देख रहा हूँ पर यह मेरे अतीत के चित्रों में भी कैसे मौजूद है...। एक कोरे पन्ने की इच्छा कुलबुलाने लगती है... मैं भागता हुआ घर की और चलता हूँ... जहाँ सब खाली है... सूखा.... अगर मैं सीधा आगे की तरफ चलता तो वहाँ समुद्र था, पानी ही पानी....।... घर एक मूक बूढ़े आदमी सा मेरा इंतज़ार करता है। प्रवेश करने पर वही है जो "कौन...?" कहता है... और मैं कमरे की बत्ती जला देता हूँ....।

Wednesday, February 4, 2009

"मैं आलू...!!!"

कुछ दिनों से नए नाटक ’मैं आलू...’ के सिलसिले में, लोगों से मिल रहा हूँ.....। एक दिन मैं एक साथ काफी लोगों से मिला...(लगभग सभी यूवा...) सभी अपने-अपने किस्म के लोग थे.. सबकी नाटको में काम करने की अपनी-अपनी वजहें थी...। मैं गोया चुपचाप बातें सुनता रहा....। “उमंगो भरी उम्र है, पूरे आलम को फतह करने के ख्वाब देखने की.....” –जैसे वाक्य बार-बार मेरे दिमाग में कौंध जाते। और मैं उन सबसे पूछना चाहता... क्या हमें, एक ऎसी चीज़ जीवन में नहीं खोजनी चाहिए जिसके लिए हम अपनी जान दे सकें? या जीवन न्यौछावर कर दें..? मैंने पूछा नहीं...। मुझे यह बात कतई रुमानी... या फलसफे वाली नहीं लगती है। मुझे यह बात बहुत ही बुनियादी बात लगती है। मैं ऎसा नहीं सोचता हूँ कि ज़िन्दगी न्यौछावर करना ही उसका अंतिम मक़सद है... मैं कहता हूँ हमें पता होना चाहिए कि मैं इस बात... या इस वजह पर अपनी ज़िदगी गवां सकता हूँ.... नहीं कर रहा हूँ यह बात अलग है। बहुत सी चीज़े सरल हो जाती है.... सीधी-सपाट दिखने लगती है।
कुछ दोस्त बीच-बीच में कहाँ करते है कि ’काहे जीवन को इतनी गंभीरता से ले रहे हो दोस्त...!’ मैं इस मामले में तो थोड़ा गंभीर होना चाहूगाँ फिर चाहे जीवन हंसी-हंसी में गवां दू।
मैं उस पहले दिन की कभी कभी कल्पना करता हूँ जब नदी पहली बार अपने उदगम से निकली होगी.... उसे अपने गंतव्य तक पहुचने में कितना वक्त लगा होगा....और कैसे उसने अपना रास्ता सारी धरती को चीरते हुए बनाया होगा...। आज नदी की स्थिरता को देखकर, उस दिन की गंभीरता का पता ही नहीं लगता है।
बात चीत में यह बात भी सामने आई कि नई तरह की कला... या नए प्रयोग हमें देखने को क्यों नहीं मिल रहे हैं....??? मैं इस शिकायत को बेबुनियाद मानता हूँ....। मेरी शिकायत है कि जब हम अपने दोस्तों की महफिलों में चाय की चुस्कियों के साथ गपया रहे होते हैं... तब उस वक्त हम क्या बातें करते हैं। वह बातें जो हमें अस्थिर कर देती है...क्या हम उनपर बहस करते हैं??... वह बातें जो हमारी समझ के परे हैं क्या हम उन बकवासों के बीच उसे सुलझाना चाहते हैं? तो हम यह अपेक्षा कैसे कर सकते है कि अचानक कहीं से हमें एकदम नई कला या नई बात सुनाई दे....। नई कला हमारे बीच ही जन्म लेगी पर हमें उसके पहले, हमारी बहसों के बीच, उसकी पीड़ा सहनी ही होगी। पता नहीं कब हम एक दूसरे को हसाने से बोर होगें... कब तक हम पुरानी महफिलों के अच्छे दिनों को बार-बार जीते रहेगें....। आप आश्चर्य करेगें कि हमारा सिनेमा, हमारे नाटक... और कला, यह सभी इस वक्त ठीक यह ही काम कर रहे है। हसाने की पुर्ज़ोर कोशिश..!!!
“मनोरंजन”.... यह शब्द फूहड़ लगने लगा है। और एक “जादू”... मेरी समझ में नहीं आता कि लोग कैसे कर लेते हैं... और आपको कहते भी है कि करो... वह कहते है कि- “भई इसमें अपना दिमाग घर रख कर आओ!!!” यह काम लोग कैसे कर लेते हैं...??? एक बंदर और मगरमच्छ की कहानी मैंने पढ़ी थी, जिसमें बंदर मगर से कहता है ’मैं तो अपना कलेजा पेड़ पर ही भूल गया....’ और अपनी जान बचा लेता है। मैं बचपन से उस आश्चर्य से ही बाहर नहीं निकल पाया था कि यह एक और आश्चर्य मेरे गले पड़ गया। मैं हर बार लोगों से पूछता हूँ कि भाई यह कैसे करते है... मैं सच में जानना चाहता हूँ... तो वह सभी नाराज़ हो जाते हैं। यह तो मैं मानता हूँ कि दिमाग बाहर रखने की कला में हमने काफी सिद्धि प्राप्त कर ली है....। मुझे जिस भी दिन यह सिद्धि प्राप्त होगी मैं उसका फार्मूला अपने ब्लाग पर ज़रुर चिपकाऊगाँ....।

यह उहापोह "मैं आलू..." की ही है शायद

"मैं आलू...!!!"

कुछ दिनों से नए नाटक ’मैं आलू...’ के सिलसिले में, लोगों से मिल रहा हूँ.....। एक दिन मैं एक साथ काफी लोगों से मिला...(लगभग सभी यूवा...) सभी अपने-अपने किस्म के लोग थे.. सबकी नाटको में काम करने की अपनी-अपनी वजहें थी...। मैं गोया चुपचाप बातें सुनता रहा....। “उमंगो भरी उम्र है, पूरे आलम को फतह करने के ख्वाब देखने की.....” –जैसे वाक्य बार-बार मेरे दिमाग में कौंध जाते। और मैं उन सबसे पूछना चाहता... क्या हमें, एक ऎसी चीज़ जीवन में नहीं खोजनी चाहिए जिसके लिए हम अपनी जान दे सकें? या जीवन न्यौछावर कर दें..? मैंने पूछा नहीं...। मुझे यह बात कतई रुमानी... या फलसफे वाली नहीं लगती है। मुझे यह बात बहुत ही बुनियादी बात लगती है। मैं ऎसा नहीं सोचता हूँ कि ज़िन्दगी न्यौछावर करना ही उसका अंतिम मक़सद है... मैं कहता हूँ हमें पता होना चाहिए कि मैं इस बात... या इस वजह पर अपनी ज़िदगी गवां सकता हूँ.... नहीं कर रहा हूँ यह बात अलग है। बहुत सी चीज़े सरल हो जाती है.... सीधी-सपाट दिखने लगती है।
कुछ दोस्त बीच-बीच में कहाँ करते है कि ’काहे जीवन को इतनी गंभीरता से ले रहे हो दोस्त...!’ मैं इस मामले में तो थोड़ा गंभीर होना चाहूगाँ फिर चाहे जीवन हंसी-हंसी में गवां दू।
मैं उस पहले दिन की कभी कभी कल्पना करता हूँ जब नदी पहली बार अपने उदगम से निकली होगी.... उसे अपने गंतव्य तक पहुचने में कितना वक्त लगा होगा....और कैसे उसने अपना रास्ता सारी धरती को चीरते हुए बनाया होगा...। आज नदी की स्थिरता को देखकर, उस दिन की गंभीरता का पता ही नहीं लगता है।
बात चीत में यह बात भी सामने आई कि नई तरह की कला... या नए प्रयोग हमें देखने को क्यों नहीं मिल रहे हैं....??? मैं इस शिकायत को बेबुनियाद मानता हूँ....। मेरी शिकायत है कि जब हम अपने दोस्तों की महफिलों में चाय की चुस्कियों के साथ गपया रहे होते हैं... तब उस वक्त हम क्या बातें करते हैं। वह बातें जो हमें अस्थिर कर देती है...क्या हम उनपर बहस करते हैं??... वह बातें जो हमारी समझ के परे हैं क्या हम उन बकवासों के बीच उसे सुलझाना चाहते हैं? तो हम यह अपेक्षा कैसे कर सकते है कि अचानक कहीं से हमें एकदम नई कला या नई बात सुनाई दे....। नई कला हमारे बीच ही जन्म लेगी पर हमें उसके पहले, हमारी बहसों के बीच, उसकी पीड़ा सहनी ही होगी। पता नहीं कब हम एक दूसरे को हसाने से बोर होगें... कब तक हम पुरानी महफिलों के अच्छे दिनों को बार-बार जीते रहेगें....। आप आश्चर्य करेगें कि हमारा सिनेमा, हमारे नाटक... और कला, यह सभी इस वक्त ठीक यह ही काम कर रहे है। हसाने की पुर्ज़ोर कोशिश..!!!
“मनोरंजन”.... यह शब्द फूहड़ लगने लगा है। और एक “जादू”... मेरी समझ में नहीं आता कि लोग कैसे कर लेते हैं... और आपको कहते भी है कि करो... वह कहते है कि- “भई इसमें अपना दिमाग घर रख कर आओ!!!” यह काम लोग कैसे कर लेते हैं...??? एक बंदर और मगरमच्छ की कहानी मैंने पढ़ी थी, जिसमें बंदर मगर से कहता है ’मैं तो अपना कलेजा पेड़ पर ही भूल गया....’ और अपनी जान बचा लेता है। मैं बचपन से उस आश्चर्य से ही बाहर नहीं निकल पाया था कि यह एक और आश्चर्य मेरे गले पड़ गया। मैं हर बार लोगों से पूछता हूँ कि भाई यह कैसे करते है... मैं सच में जानना चाहता हूँ... तो वह सभी नाराज़ हो जाते हैं। यह तो मैं मानता हूँ कि दिमाग बाहर रखने की कला में हमने काफी सिद्धि प्राप्त कर ली है....। मुझे जिस भी दिन यह सिद्धि प्राप्त होगी मैं उसका फार्मूला अपने ब्लाग पर ज़रुर चिपकाऊगाँ....।


यह उहापोह "मैं आलू..." की ही है शायद

Saturday, December 6, 2008

ईकोपा...




आज शायद आख़िरी बार मैं ईकोपा (मेरा घर....) के साथ बैठा हूँ...।
दरारें........
कुछ छोटे चहबच्चों से जाले, कुछ बड़े भी...
पीठ और सिर के निशानों से भीगी हुई दीवारें, और कुछ नाखूनों के खुरचने का दर्द ली हुई दीवारें....।
मैं शांत था... वहीं अपनी कुर्सी पर बैठा था। चार सालों की सी सदी.... यहीं इसी के साथ जी है। यहीं सारा कुछ लिखा, सारी चित्रकारी की, सारा का सारा यहीं बना और यहीं बिगड़ा भी हैं। यह घर एक लौ की तरह मेरे साथ रहा है...मैं इसमें नहीं यह मुझमे था। ’था’ का प्रयोग करना थोड़ा कठिन है... पर यह ’था’ ही सही है अब!!!
काफी देर से मैं एक दरार देख रहा था। हमारे संबंध में मुझे इसके, इस तरह के मूक संवादों की आदत सी है। यह टूटा नहीं... शायद इसे बहुत पहले टूट जाना था, पर यह बना रहा, अपनी लौ के दायरे में मुझे समेटे हुए। यह जितने सच का साक्षी होकर चमक रहा है... उतने ही झूठ इसने अपनी दीवारों के कोनों के जालों में लटकाए हुए है। यहाँ-वहाँ कोनों में सिमटी हुई नमी भी है.... जिसका एहसास सिर्फ हम दोनों को है।
पता नहीं क्यों मैं अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया... और मेरे मूँह से ’sorry’ की एक अजीब बुदबुदाहट हुई। मैं माफी मांगना चाह रहा था... इस घर से... इसके ना टूटने से.. इसकी लौ से... इसके जालों, दरारों से...।कौन माफ करेगा मुझे? क्या माफी काफी है?
तभी मुझे मेरे गद्दे के पास की दीवारों पर कुछ निशांन दिखे... यह सारे निशांन अपनी-अपनी कहानियाँ लिए हुए है। यह मिटा दूँ?.. कैसे मिटते हैं यह?... यह असल में कहानी भी नहीं हैं... यह कहानी की कतरनें हैं... जो छूटी हुई है। इन कतरनों से जो कहानी बन रही है वह मैं अब सुनना नहीं चाहता।
मैं वापिस अपनी कुर्सी पर बैठ गया। इसके बाद कुछ निजी संवाद हुए, जिसकी ’आह’ हम दोनों के मूँह से निकलती रही।
कैसे छिन सकता है यह.... मुझसे?
मैंने यह लौ नोचकर अपने शरीर से बाहर की... और घर को विदा कहाँ.... नहीं विदा कह नहीं पाया...।अभी कुछ दिन और है.... शायद मैं इसे कभी विदा कह भी नहीं पाऊगाँ।
ईकोपा, मेरा गुलाबी सा जवान घर, हमेशा अकेले में मेरे साथ रोता है..... पता नहीं क्यों?

Wednesday, October 22, 2008

Father


’तबीयत खराब है भाई।’
आज ही सुबह मेरे भाई का फोन आया... वह मुझे भारत के जीतने पर ( क्रिकेट..) बधाई देना चाह रहा था। मेरी तबियत की बात सुनते ही उसका थोड़ा जोश कम हो गया। पर मैंने ज़ोर लगाकर बधाई दी तो उसने कुछ तफसील से ज़हीर खाँन के विकट लेने का आँखों देखा हाल (टी.वी.) सुना दिया। फिर कुछ इसी तरह का मेरे पिताजी का भी फोन आया और हमने एक दूसरे को, पूरी गरम जोशी से बधाईयाँ दी।
शाम को जैसे-तैसे धूमने सा निकला... तो लगातार क्रिकेट और अपने पिताजी के बारे में सोचता रहा। मेरे बचपन में... बारामुला, खोजाबाग़ (कश्मीर...) में पिताजी रेड़ियों पर क्रिकेट सुना करते थे। भारत और पाकिस्तान का मैच होता तो घर एक war room बन जाता...। सिग़रेट के कश पे कश लगाते हुए, मेरे पिताजी के कई हिन्दु दोस्त, रेड़ियों को घेरे हुए बैठे रहते...। भीतर माँ डरी हुई, चाय के प्याले बाहर पहुचवा रही होती। उस खेल का अंत हमेशा एक सा ही होता था। भारत अगर हार जाता तो पिताजी तुरंत रेड़ियों को दीवार पर मार कर तोड़ देते, घर के दरवाज़े, खिड़कियाँ बंद कर देने की हिदायत दी जाती, घर के बाहर पिताजी के ऑफिस के कुछ मुसलमान दोस्त आकर पटाखें फोड़ते और पिताजी ऑफिस से कुछ तीन-चार दिन की छुट्टी ले लेते। और अग़र भारत जीत जाता तो तुरंत मिठाई का एक ढिब्बा मंगवाया जाता और पिताजी अपने सारे ऑफिस के मुसलमान दोस्तों के घर जाकर तुरंत उनका मुँह मीठा कराते... कुछ रॉकेट जलाए जाते... अगले दिन पिताजी ऑफिस नए कपड़े पहनकर जाते थे। मैं काफी छोटा था तब...... उस वक़्त उतना ज़्यादा क्रिकेट भी नहीं होता था.... उस वक़्त क्रिकेट का अपना एक अलग मौसम होता था, और उस मौसम में जब भी भारत और पाकिस्तान भिड़ते थे... तो उसका तनाव पूरे मोहल्ले में नज़र आता था। बाक़ी दिनों में हम लोग पिताजी के उन्हीं मुसलमान दोस्तों के यह... या वह लोग हमारे यहाँ दावते उड़ाया करते थे।
यह सिलसिला सालों चलत रहा.... रेड़ियों टूटते गए... मिठाईयाँ बटती गईं। कई सालों बाद हम होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) आ गए। पिताजी छुट्टीयों में आते जाते रहते थे। बचपन में रेड़ियों सुनते हुए मुझे हमेशा लगता था कि यह खेल शायद पहाड़ियॊं पर खेला जाता होगा। एक तरफ से गेंदें फेक़ी जाती होगीं और दूसरी तरफ से जवाब में छक्के और चौकों मारे जाते होगें, गर चूक गए तो हाथ पेर टूटे समझो। तभी एशियाड के समय घर में टी.वी. आया। उसके काफ़ी समय बाद एक दिन हमने क्रिकेट मेच देखा और लगने लगा कि यह तो महज़ एक खेल है... इसमें इतनी ज़्यादा तोड़ा-फोड़ी क्यों मची रहती है। खैर घर की हालत खस्ता थी, सो पिताजी ने अपने परिवार के साथ रहने के लालच और रिटायर होने के बाद मिलने वाले पैसों के चक्कर में जल्द अपना रिटायर्मेंट ले लिया। रिटायर्मेंट लेते ही आतंकियों ने पिताजी का ऑफिस एक ब्लास्ट में उड़ा दिया.... सारे दस्तावेज़ स्वाहा हो गए। पिताजी का पैसा तो दूर, वह वहाँ जॉब करते थे, इसका भी सबूत देना मुश्किल हो गया।
आज तक उन्हें वह पैसा नहीं मिला... जिसका गुस्सा उन्होंने सब पे निकाला....। इस गुस्से और निराशा के दौर में एक चीज़ अजीब हुई...। मैं और मेरा भाई... क्रिकेट के क़रीब आते गए और पिताजी क्रिकेट के नाम से ही चिड़ने लगे। मुझे पिताजी के जोश भरे दिन याद थे... मैं जब भी उन्हें, बहुत उत्साह में कहता कि आज भारत-पाकिस्तान का मैच है तो वह अपना मुँह बना कर, मैंने कश्मीर में जॉब किया है के सबूतों में खो जाते थे।
बीच में एक world cup मैच के दौरान उनका जोश मुझे वापिस दिखा था, जिस मैच में वेंकटेश प्रसाद हीरों हो गया था और भारत वह मैच हारते-हारते जीत गया था। पिताजी उछल पड़े थे... हम सबने उस मैच के बाद, बाज़ार जाकर आइस्क्रीम खाई थी।
पर उसके बाद भी वह क्रिकेट से उस तरीक़े से जुड़ नहीं पाए...। एक अजीब सी निराशा ने उन्हें घेर रखा था। बात चीत के दौरान कई बार उनके मुँह से निकल जाता कि मैं तुम लोगों के लिए कुछ नहीं कर पाया। टी.वी. देखते हुए जब भी कश्मीर के समाचार आते तो पिताजी या तो चैनल बदल देते या गाली देते हुए टी.वी. ही बंद कर देते, मानो कश्मीर से उनका कोई संबंध ही ना हो।
इन सबके बाद मैं मुबंई आ गया...। पिताजी और मेरे बीच की दूरियाँ, जो काफ़ी बढ़ चुकी थी.... में एक अजीब सा रुखापन आ गया। मैंने इसपर बहुत गौर नहीं किया क्यों कि हम सभी अपने माता पिता के संबंध को बहुत तय संवादों की तरह जीते हैं। तभी इसी बीच एक कमाल की बात हुई.... ’धोनी..’ नाम का एक युवा खिलाड़ी का नाम उभरा...कुछ ही समय में देखते-देखते वह भरतीय टीम का कप्तान बन गया। मेरे पिताजी को भी अब, मैं नौकरी करता था के सबूतों के साथ रहना आ गया था। अचानक मेरे पास एक दिन पिताजी का फोन आया... ’तुमने यह मैच देखा क्या खेला धोनी...। एक दम कपिल देव जैसा।’ उन्हें कपिल देव की वह पारी आज भी याद है जिसमें ने सारे बॉलरों की धुलाई की थी कुछ १७५ रन बनाए थे और एक बॉलर ने सफेद रुमाल कपिल के सामने हिलाया था। धोनी के कारण मेरे पिताजी वापिस क्रिकेट में उसी जोश से कूद पड़े। हमारे संबंध में भी यह... एक अजीब सी ताज़गी लाया है। अभी पिताजी के लिए पाकिस्तान उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि आस्ट्रेलिया... या इग्लेंड़...। मैच के जीतने के बाद हमारी बात होना तय है.... और हारने पर फोन ना करने में ही भलाई है।
मुझे क्रिकेट अच्छा लगता है... यह मेरे खून में है, पर मैं पिताजी के रोमांच का मुकाबला कतई नहीं कर सकता हूँ। उनके और मेरे बीच में धोनी, क्रिकेट... सचिन... बहुत ही महत्वपूर्ण किरदार है, जिनकी सफलता का सुख मैं अपने संबंध की सफलता में बटोरता हूँ।

Saturday, October 18, 2008

थकान...


फिर सामने एक कोरा पन्ना पड़ा हुआ है.... अपनी सारी अपेक्क्षाओं के साथ..। क्या भरुं इसमें? शब्दों के वह कौन से चित्र बनाऊँ जिन्हें बनाते ही मैं हल्का हो सकूँ..। शायद थकान की कहानी लिखनी चाहिए... एक अनवरत थाकान की जो सब से है... अपने से... आस-पास से... इन लगातार सीड़ी चढ़ते लोगों से... उन ज्ञान वर्धक बातों से.. और उन अनुभवों से जिन्हें घर में कहाँ रखूँ, के विचार से मैं दिनों, हफ्तों महींनों व्यस्त रहता हूँ। पड़े-पड़े दीवार पर निग़ाह टिकी रहती है...दीवार पर लोगों के चहरे ढूढ़ता हूँ... मैं इन दिवास्वप्न से भी बोर हो चुका हूँ..। कुछ शब्द लिखने बैठता हूँ तो ’एवंम इन्द्रजीत’ नाटक याद आ जाता है... उसे पढ़ता हूँ... तो ’देवयानी का कहना है...’ नाटक याद हो आता है..। एवंम इन्द्रजीत को वापिस रख देता हूँ...। फिर एक लंबीं यात्रा पर निकलना चाहता हूँ सो Anna Karenina पढ़ना शुरु कर देता हूँ। Stephen Oblonsky का पात्र तक़लीफ देने लगता है, सो उसे भी थोड़ी देर में रख देता हूँ। फिर से थकान के बारे में सोचना शुरु कर देता हूँ। कुछ पुराने कटु अनुभवों को याद करता हूँ... और मुसकुराने लगता हूँ... अच्छे अनुभव याद आते ही पीड़ा देने लगते हैं। सोचता हूँ कुछ तो लिखूँ... इस सामने पड़े कोरे पन्ने को कितनी देर तक देख सकता हूँ..। सो पहला शब्द लिखता हूँ ’थकान...’ और उसे देखता रहता हूँ। फिर कुछ लिखा नहीं जाता सो इच्छा जागती है कि चलो कोई फिल्म देख लेता हूँ.... पर ’थकान’ शब्द डेस्क से उठने नहीं देता है। इस शब्द को देखते रहने का सुख है...। इस सुख पर हसीं आ जाती है। वापिस किताबों के पास जाता हूँ जो किताब पढ़ी हुई है उसे फिर से पढ़ना चाहता हूँ, नई किताब नहीं..। नई किताब पढ़ना, किसी नए व्यक्ति से मिलना जैसा लगता है... सो बहुत समय तक डर बना रहता है... वह कैसे बात शुरु करेगा? किस विषय पर बात करेगा? पहला संवाद कैसा होगा? वगैराह वगैराह..। इसीलिए पुराने दोस्त सी कोई किताब ढूढ़ने लगता हूँ। R K Narayan के My Days (autobiography) पर निग़ाह पड़ती है... उसे उठाकर पढ़ने लगता हूँ और.... :-).।

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मानव

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परिचय

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल