Tuesday, January 29, 2008

अन्तिमा

मैं चाहता हूँ कि मैं अपने उपन्यास (अंतिमा) की यात्रा के दौरांन उसके अनुभवो को यहाँ लिखता चलूं....उसकी कहाँनी को बताए बिना...

एक अजीब सी पीडा, अजीब से अकेलेपन से होकर उपन्यास गुज़रता है। ठीक इस वक्त उपन्यास जिस छोर पर खड़ा है वहां अगर एक शब्द भी फेंको तो वो इतनी देर तक गूजता है कि लगता है जैसे, जल्द ही अगर उसे दूसरे शब्द का सहारा नही दिया गया, तो मेरे कान फट जायेंगे..ये अघिक्तर उन शब्दों के साथ होता है जो झूठे होते हैं, ज़बरदस्ति कहीं फसाए जाते है.. और जिन्हे मैंने अपनी पूरी ईमानदारी या पूरी सच्चाई के साथ नहीं लिखा होता है...। वक़्त उपन्यास को लिखने में उतना नहीं लग रहा है जितना वक़्त इन झूठे शब्दों को मिटाने.. अजीब बात है..:-).

3 comments:

QUIETUDE CHILD said...

i agree to your point..but kya sach hai aur kya jhuth yeh pata lagana bhi mushkil hai..
all the best for your upaniyas

दीपा पाठक said...

लेखकीय ईमानदारी बहुत जरूरी चीज़ है। जब तक तुम अपने शब्दों की सच्चाई को ले कर आश्वश्त नहीं होगे उनमें कही गई बात का मर्म पढ़ने वाले तक पहुंच ही नहीं सकता इसलिए कुछ वक्त भले ही लगे झूठे शब्दों को मिटा कर ही आगे लिखो। शुभकामनाएं।

Malay M. said...

rachna ki prakriya kisi prasav vedna se kam nahi hoti ... athaah kashton ke bad jab janm doge ek kriti ko , to us kshan ullas ka ek anokha hi anubhav hoga ... koi bhi rachna aseem vedna ka hi parinam hoti hai ... yaad hai na - " viyaogi hoga pehla kavi , aah se nikla hoga gaan ..." ... yun to main Deepa di se sehmat hoon ( satya v' imandari kisi bhi srijan ke sarvshreshtha kram hain ) , parantu sath main yeh bhi paksh rakhna chahunga ki koi bhi kriti ek bimb hoti hai apne kaal ki , apne sarjak ke kathya ko kahne ki itchha ki ... kaal main sab kuch kabhi bhi purnataya satya ya jhoot nahi hota ...aur kathya , jo kriti ka sabse mahatvapurna ang hai , sachche ya jhoote shabdon ke chunaav se swayam sach ya jhoot nahi ho jata kyonki voh sarvaadhik mahatvpurna hai ... kyon na hum chitra ko uski sampurnta main dekhen .. sachhe jhoote shabdon ke chashmon se nahi , kisi kone ya lakeer per baithkar nahi...bulki seedhe saamne se , uski nagnta main , uski sampoorn sundertaa main ... yeh bhi toh ek satya hi hai ...

- ek shubhchintak ki shubhkamnaayen

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

मानव

मानव

परिचय

My photo
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल