Tuesday, August 17, 2010

मेरे प्रिय दोस्त... (दो..)



प्रिय दोस्त,
हर कुछ समय में हम सब एक ऎसी स्थिति में पहुंच जाते है कि हमें दुनियाँ का अर्थ बूझे नहीं बूझता है। सारे जवाब GOOGLE भगवान के पास मौजूद होने के बावजूद।
मैं इस संबंध मे कई दिनों से विचार कर रहा था कि इतनी सारी information का हम क्या कर सकते हैं? इतिहास मेरा प्रिय विषय होने के बावजूद मुझे कभी सन याद नहीं रहते थे। मुझे किसी के जन्म दिन याद नहीं रहते। मेरा अपना मोबाईल नम्बर याद करने में मुझे बहुत परेशानी होती है।
मैं जब new York के म्युज़ियम में धूम रहा था तो यह बात मुझे सबसे ज़्यादा अखरती थी। इतनी सारी information ... मुझे पता था कि मैं म्युज़ियम से बाहर निकलते ही यह सब भूल जाऊंगा फिर मैं क्यों यह सब सुन रहा हूँ।... फिर मुझे लगने लगा कि यह सारी information मुझसे चख़ने का हक़ छीन रही है। मैं किसी भी चीज़ का स्वाद ही नहीं ले पा रहा हूँ। मैं सारी information’s को दरकिनार करके वापिस म्युज़ियम घुसा... ओह!!!
Information एक तरीके से मेरे लिए हर चीज़ को मृत कर देती है। “यह था.....इस वक़्त.. ऎसे... “ – जैसे वाक़्य कला को मेरे लिए बिल्कुल ही निर्जीव चीज़ बना देते थे। मेरा उससे संबंध बनाए नहीं बनता।
प्रिय दोस्त, सीधे शब्दों में, मुझे हमेशा लगता है कि मेरे पहले एक दुनियाँ थी... जो चली आ रही थी लगातार... कुछ उसकी सूचना “Bill Bryson की खूबसूरत किताब- a short History of nearly everything से मिली... मेरा इसमें प्रवेश 1974 में हुआ.. उसके बाद से मैं दुनियाँ को, जैसी वह मेरे सामने आती है, जीना शरु कर दिया।
यह आसान नहीं है... इस जीने की प्रक्रिया के बहुत से नियम है जो एक सामाजिक ढ़ांचे के रुप में हमारे पुराने लोगों ने बनाए है... जिससे हम इस दुनियाँ में एक क़ायदे से जी सके। उन नियमों को जानने समझने और फिर अमल करने में (नियमों का उलंघन करने में भी...) आप खुद को एक ऎसी जगह पाते है जहाँ से आप एक तरीके की दुनियाँ देख रहे होते है (आपका point of view जैसा कुछ..)। फिर जिस दुनियाँ के इतिहास को आपने जीते-जी बटोरा था वह इतिहास और आपकी जगह से देखी जा रही दुनियाँ, आपस में मेल नहीं खाती। तब आप अपने तरीके से इस दुनियां को interpret करना शरु करते हैं.. जिससे कला, धर्म, अतंकवाद, नकसलवाद... आदि आदि शुरु होते हैं।
पर जब पहली बार आपको वह जगह मिली थी जिसे आप अपनी ज़मीन कह सकते थे... जहाँ से आप एक अलग तरीक़े की दुनियाँ देख रहे थे... तब आप अकेले थे...। उस वक़्त की खुजली कि- मैं बता दूं कि जो दुनियाँ मैं यहाँ से खड़े होकर देख रहा हूँ वह अलग है... ने सारा संधर्ष शुरु किया। जबकि सब अपनी अलग जगह से दुनियाँ देख रहे थे... और सभी अपनी-अपनी जगह बिलकुल अकेले हैं। इसमें हिंसा वहाँ शुरु होती है जब आप अपनी दुनियाँ को पूर्ण सत्य के रुप में स्थापित करना चाहते हो...। इसमें कुछ लोग आपके साथ हो जाते है जिनको अपनी ही जी हुई दुनियाँ पर थोड़ा कम भरोसा था। अब चूंकि वह अपनी ज़मीन और जहाँ से वह अपनी अलग दुनियाँ देख रहे थे, खो चुके होते है तो उन लोगों में हिंसक प्रवृति ज़्यादा होती है।
अब इसमें इतिहास इतना सारा और अनंत है कि वह काल्पनिक मौखिक उपन्यास जैसा हो जाता है। (जैसे war and peace लिखित न होकर एक मौखिक कथा हो।) अनंत इतिहास के कारण शब्दों पर भी विश्वास करने से डर लगता है। जैसे एक शब्द ’मन...’ है... बचपन से ’मन..’ से संबंधित मैंने इतना कुछ पढ़ा और सुना है कि वह एक व्यक्ति सा जान पड़त है जिसे मैं जानता था... जबकि मन कहीं नहीं है... भगवान भी मन के बहुत करीब आता है। खेर मेरे प्रिय दोस्त शब्दों को लेकर मेरी अपनी एक अलग कहानी है जिसका ज़िक्र मैं अभी नहीं करना चाहता हूँ।
प्रिय दोस्त यह सब शायद मैं अपनी ज़मीन पर खड़े होकर देख रहा हूँ, यह मेरी सुविधा की ज़मीन है जिससे मुझे थोड़ा जीने में आसानी सी लगती है। इस पूरी उथल-पुथल में मैं अपना मतलब निकाल कर किनारा नही कर रहा हूँ बल्कि अपने मतलबों को थोड़ा उल्टा-पल्टाकर देख रहा हूँ। दोस्त यह बात तुमसे कहते हुए भी मैंने ना जाने कितने वाक्य काटे और कितने वापिस जोड़ दिये... इस ख़त को लिखने में ही मेरे भीतर मानों कुछ सफाई सी हो गई... या कुछ कचरा स्थाई हो गया कौन जाने।
तुमसे संवाद करके अच्छा लगा। आशा है तुम्हें भी प्रसन्नता हुई होगी।
आपना ख्याल रखना।
बाक़ी अगले विचार पर...
तुम्हारा..
मानव

2 comments:

pratibha said...

सही कहा आपने. मेरे साथ भी ऐसा ही होता है. इतिहास विषय हमेशा अच्छा लगा लेकिन तिथियां याद नहीं रहतीं. इंफॉर्मेशंस चीजों का स्वाद बिगाड़ देती हैं.

प्रवीण पाण्डेय said...

अपना जीवन भूत, वर्तमान और भविष्य का सम्मलित वक्तव्य है।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल