Thursday, August 5, 2010

New york, New york...


न्युयार्क के महीने भर के मेरे प्रवास की जितनी बातें मुझे अभी याद हैं उसका ब्यौरा कुछ इस प्रकार है।
मैं जब न्युयार्क से वापिस लौटा और पहली बार Jet lag जैसी चीज़ का शिक़ार हुआ तो अपने ही नाटक का एक वाक्य याद आ गया कि “दुनियाँ बहुत बड़ी है, बहुत बड़ी, उड़ते-उड़ते वाट लग गई।“
जब मुझे कुछ दिन न्युयार्क में हो गए तो एक शाम मैं अपने दोस्त Aris के साथ हडसन नदी के किनारे बीयर पी रहा था, हम दोनों अपने-अपने देश के थियेटर के बारे में बातें कर रहे थे... तभी कुछ असहज सी चुप्पी के बीच मैंने Aris से कहा कि ’मैं असल में एक बहुत ही छोटे से गांव में पला बढ़ा हूँ।’ मुझे नहीं पता कि मैंने ऎसा क्यों कहा और उसने इसका क्या अर्थ समझा होगा... पर वह मुझे देखकर मुस्कुरा दिया, हम काफी देर तक उसी असहज सी चुप्पी के बीच शांत बैठे रहे।
यह बहुत ही सहज था कि गैर-अंग्रेज़ी देशों के लोग आपस में काफी अच्छे दोस्त बन गए...। मेरे कुछ करीबी दोस्तों में Orly Rabinyan (Israel) , Aris Troupakis (Athens, Greece), Xavier Gallais (France), Laura Caparrotti (Italy) थे। इन कुछ लोगों की ख़ास बात यह भी थी कि यह उस किस्म का थियेटर ज़्यादा पसंद करते थे जिसकी तरफ मैं शुरु के आकर्षित रहा हूँ।
न्युयार्क शहर बहुत ही खुबसूरत और अतिव्यवस्थित शहर है। उस सामजिक ढ़ाजे के नियमों का लोग बहुत ही अनुशासन से पालन करते है और यही बात उनकी कला में भी नज़र आती है। उनके नाटक (जो मैंने देखे और समझ पाया...) एक बने बनाए मनोरंजन के नियमों का पालन करते हैं, इसलिए हमसे बहुत दूर दिखते है। म्युज़िकल नाटक का हर गीत.. कहीं सुना हुआ गाना लगता है। कुछ broadway के नाटक देखने के बाद मैं कुछ निराश सा हो गया। फिर मैंने एक 0ff broadway नाटक देखा OUR TOWN (Thornton Wilder) जो मुझॆ बहुत पसंद आया।
Lincoln Center Directors lab में तीन हफ़्ते बहुत ही उम्दा बीते। ’शक्कर के पाँच दाने’ (अंग्रेज़ी मे) के दो Presentations हुए, पहला जो मैंने present कीया और दूसरा presentation एक अमेरिकन director, Andrew ने किया जो बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। कुल सत्तर निर्देशक सारी दुनियाँ से आए थे, लगभग सबका काम करने का तरीका और काम देखना बहोत ही रोमांचक अनुभव रहा। इस बार लेब का विषय “धर्म..” था... सो एक तरीके की बहस हर बात-चीत में छिड़ जाती... सबके अपने सिद्धांत थे, अलग-अलग आस्थाएं थी.... इन बहसों से मेरी थोड़ी दूरी रहती थी क्योंकि हमारे देश के चीख़ते चिल्लाते धर्म की थकान मेरे भीतर इतनी है कि मैं ऎसी बहसों में मौन ही रहता हूँ। इन सारी बहसों के करण कुछ लोगों की आपस में दूरीयाँ बढ़ गई और कुछ करीब आ गए। तीसरे हफ्ते अलग-अलग समूह साफ नज़र आने लगे थे। सभी लोगों ने अपने तरीक़े के लोग ढ़ूढ़ निकाले थे। धार्मिक बहसों के बीच मौन के कारण मैं लगभग हर समूह में भटकता रहा। जिन भी लोगों के साथ थोड़ी गहराई से जुड़ा उसका कारण सिर्फ थियेटर था.... धर्म नहीं।
इसके अलावा वह क्षण जिनका गहरा असर मेरे ऊपर अभी भी है वह हैं... JEAN-PAUL SARTRE और ALBERT CAMUS के PORTRAITS के सामने मंत्र मुग्ध सा खड़े रहना( CARTIER BRESSON की प्रदर्शनी में), VAN GOGH की पेंटिंग CYPRESSES AND STARS को घंटो अपलक ताकना, Aris के साथ थियेटर की बहसों में राते धुंआ करना, Orly के साथ बिताए कुछ पल... निम्रत के साथ पैदल न्युयार्क नापना.. और जो क्षण बुरी तरह याद है वह है उस अथाह शहर मैं धंटों अकेले धूमना... जहां आप किसीको नहीं जानते और आपको कोई नहीं जानता... कोई आपकी परवाह नहीं करता और आप किसी की परवाह नहीं करते और यह बात एक अजीब सी मुक्ति से आपको भर देती है। उस मुक्ति के क्षण में आप एक सच कहना चाहते हो, उसे लिख देना चाहते हो पर ऎसा नहीं करते और ‘ऎसा नहीं’ करना आपको खुशी से भर देता है... जिस खुशी के क्षण मैंने वहां खूब बटोरे हैं।
एक बड़ी समस्या अमरीकी थियेटर की है कि वहाँ जवान दर्शक नहीं है। सारे बूढ़े श्वेत अमीर अमेरीकन… महगें टिकिट खरीदकर नाटक देखते हैं और पूरा broadway थियेटर उनकी NOSTALGIA की भूख मिटाता है। वहां नाटको की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी है कि ’प्रयोग..’ जैसे शब्द की वहां कोई जगह नहीं है। पर off broadway और off off broadway में कुछ प्रयोग धर्मी नज़र आते हैं। अभिनेताओं और playwrights की बहुत इज़्ज़त है , जो जायज़ भी है, पर मेरे हिसाब से playwrights को थोड़ा ज़्यादा महत्व मिलता है... सो “Copy Left...” पर मैंने लिंकन सेन्टर में बात की जो सभी लोगों ने बड़े उत्साह से सुनी क्योंकि उन लोगों के लिए यह पहली बार सुना गया शब्द था।
एक भूखे बच्चे सा कोतुहल पूरे समय था कि सारा खाना खा जाऊं और फिर बाद में गाय जैसा सालों तक जुगाली करता रहूं..। मेरे एक अमेरिकन मित्र MARK जब मुझसे विदा ले रहा था तो उसने पूछा था कि ’इतना खूबसूरत समय.. इतने सारे लोग.. पता नहीं ज़िन्दग़ी में फिर इनसे कभी मुलाक़ात होगी भी कि नहीं...?’ मैंने कहां कि ’पता नहीं...’ बाद में मैंने जोड़ा ’वैसे... किसी बहुत खूबसूरत किताब को पढ़ने लेने के बाद हम कितनी बार उस किताब पर वापिस जाते हैं?’
अभी मैं कई लोगों के नाम भूल चुका हूँ, शायद कुछ समय में सब के चहरे भी खो जाए!! कुछ सालों बाद शहर याद रहे पर गलियाँ भूल जाऊं। बात याद रहे पर किसने कहीं थी यह भूल जाऊं। क्या छूट गया याद रहे पर क्या पाया था यह भूल जाऊं... मुझे नहीं पता। मेरे हिसाब से इन सबका मेरे अवचेतन पर जो असर हुआ है उसके निशान बहुत समय तक मेरे नाटको में नज़र आते रहेगें।

3 comments:

pratibha said...

Shaandar!

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुगढ़ चित्रण किया इस विधा का।

Kishore Choudhary said...

किताबों की दुकान को देखता हूँ और उसका नाम देखता हूँ फिर आपको भी देखता हूँ... सोचता हूँ इस तस्वीर में नाटक के तत्व सांस लेते हुए से हैं... जरूर बिना पढ़े ही उन किताबों से देर तक बातें की होगी.

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल