Friday, August 12, 2011

घोंसला...


जब भी कभी तेज़ हवा चलती है या तेज़ बारिश होने लगती है तो मैं चिंता करने लगता हूँ। मुझे आजकल तीन घोंसलों की बड़ी चिंता होती है। मेरी बाल्कनी से एक पेड़ दिखता है जिसपर एक छोटी चिड़िया (क्योंकि मैं हमेशा एक बार में एक ही चिड़िया देख पाता हूँ।) ने तीन घोंसले बनाए हैं। यह मेरे सामने ही बनना शुरु हुए... और अब एक सुंदर स्वरुप इख़्तियार कर चुके हैं। गर्मियों के दिनों में मेरी चिंता किंग्फिशर को लेकर थी.. वह रोज़ दोपहर के वक़्त मेरी तरफ मुँह करके बैठ जाती और देर तक अपना सिर हिलाती रहती। कभी-कभी लगता वह मुझसे कुछ पूछ रही है... धीर-धीरे मैं उससे बातें करने लगा.. यह बात मैंने कभी किसी को नहीं बताई। जब वह कुछ दिन नहीं आई तो मेरी चिंता बढ़ जाती... फिर दिखती तो मेरे सवाल और उसके सिर हिला-हिला के जवाब शुरु हो जाते। अभी बरसात में वह नहीं आती है.. उसके बदले यह छोटी चिड़िया आती है जिसने सुंदर तीन घोंसले बनाए हैं...।
कल रात बहुत बारिश हुई.. बुख़ार के पसीने में लथपथ मैं बार-बार अपनी बाल्कनी पर चला जाता। अंधेरा इतना ज़्यादा था कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने टार्च से भी देखने की कोशिश की पर कुछ नज़र नहीं आया। कुछ देर में मैं वापिस अपने बिसतरे पर था... इतनी बारिश में बेचारी क्या कर रही होगी? मैं बार बार उस चिड़िया के बारे में सोचने लगता। फिर लगने लगा कि शायद वह भी मेरे बारे में सोच रही होगी कि इतनी रात गए इसके घर की लाईट क्यों जल रहे है? शायद वह मेरी चिंता में सो ना पा रही हो? सो मैंने झट से उठक लाईट बंद कर दी। पर नींद से संबंध बहुत समय से ख़राब चल रहा है सो करवटों ने मुझे भीतर से छील सा दिया... उस छिलने की जलन से बार-बार मैं उठ बैठता..। खिड़की से निग़ाह बाहर जाती.. तो अंधेरे में लटके तीन घोंसले बहुत अकेले से दिखते..। फिर ख़्याल आया कि चिड़िया इंसान तो होती नहीं कि रात में उन्हें लाईट की ज़रुरत पड़े.. वह तो मेरी करवटों और हरकतों से ही जान गई होगी कि मैं सो नहीं पा रहा हूँ। मैंने वापिस जाकर लाईट जलाई और बाल्कनी में आकर खड़ा हो गया। कुछ देर अंधेरे में ताकते रहने से कुछ चीज़े साफ दिखाई देने लग गई... जैसे बहुत देर तक चुप शांत पड़े रहने से अपना ही जीवन साफ सुनाई देने लगता है... पर अपना जीवन सहन नहीं होता इसलिए हम तुरंत बोलना शुरु कर देते हैं... जबकि अंधेरा मुझे अपनी तरफ हमेशा से आकर्षित करता रहा है। अंधेरे में लटके हुए तीन घोंसले मुझे साफ दिखाई देने लगे। भीगे हुए... कुछ झूल से गए थे.. कल शाम को वह तीनों कितने सुंदर लग रहे थे... अभी रात के भीगेपन में वह खंडहर जैसे दिख रहे थे। मैं समझ गया कि चिड़िया वहा नहीं हो सकती.... उसकी इतने दिनों की पूरी महनत बेक़ार गई। अगर मैं चिड़िया की जगह होता तो अभी तक झल्ला गया होता.. चीख़ने चिल्लाने लगता.. गालिया दे देता पेड़ को, बारिश को.. सब को.. पर मुझे पता है कि सुबह होते ही चिड़िया आएगी और रात को खंड़हर हो चुके अपने घोंसलों पर काम करना शुरु कर देगी।
कुछ देर में मैं चाय बना रहा था...। देर रात को चाय पीने की मेरी पुरानी आदत है। चाय बनते ही मैं एक ऎसी क्रिया में व्यस्त हो जाता हूँ जो संगीत के जैसी है। चाय बनाना (ख़ास कर देर रात का चाय बनाना...) एक तरह का नृत्य है मेरे लिए जो मुझे हर झुंझलाहट से क्षणिक शांति प्रदान करता है। मैं चाय बहुत धीरे और एक लय में पीता हूँ..। मेरी मन: स्थिति चाय पीने की लय तय करती है। इस वक्त मैं झल्ला रहा था सो चाय पीने की लय कुछ तेज़ थी। मैं सोचने लगा काश यह चिड़िया चाय पीती.. इस बारिश में भीगने के बाद मैं उसे चाय बनाकर देता.. तो.. इस बात पर मुझे हंसी आने लगी... मेरी झल्लाहट थोड़ी कम हुई.. और मैं वापिस कुछ कोरे पन्नों को गूदने में व्यस्त हो गया।
समय बहुत तेज़ी से निकल गया.. मुझे चिड़ियों की आवज़े आने लगी...। पौ फट चुकी थी। मैं घबरा गया..। पौ फटते ही वह चिड़िया... अपने घर को खंडहर की शकल में देखेगी और कितना दुख होगा उसे.... मुझे पता है उसे कोई दुख नहीं होगा.. पर मेरी पीड़ा थी कि वापिस उसे उन घोंसलों पर काम करते देखना... । उसने तिनका-तिनका इक्कट्ठा करके यह घोंसले बनाए थे.. अब वापिस पूरा काम फिर से....। मैं यह सब नहीं देख सकता था....। मैंने चादर तानी और अपनी आँखें बंद कर दी........ चिड़ियों की आवाज़े बढ़ती गईं.. और उस सुंदर संगीत में मुझे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला..........।

Monday, August 8, 2011

आस-पास कहीं...।


कल रात एक सपना देखा... मैं अपने शरीर के भीतर कैद हो गया हूँ.. मेरा शरीर सो रहा है। मैं उसे भीतर से ठोकरे मार-मारकर जगाने की कोशिश कर रहा हूँ। शरीर सोया पड़ा है और मैं अपने ही शरीर के भीतर तड़प रहा हूँ.. सांस की नली के आस-पास कहीं...।
पिताजी ने कहा था कि ’जब बड़ा होगा तो मैं तुझसे कुछ भी नहीं कहूंगा... तब जो मर्ज़ी आए वह करना।’ मैंने सोचा था बस एक बार बड़ा हो जाऊं फिर देखना दिन भर खेलता रहूंगा, पतंग उड़ाता रहूँगा... कोई पढ़ाई की बात भी करेगा तो उसे एक लात मारुंगा... कूल्हे के आस-पास कहीं।
माँ बहुत देर तक नीलकंठ को खोजती रहती थी। सुबह उठते ही पेड़-पेड़ खोजती रहती... नीलकंठ दिखते ही उस पेड़ के चक्कर काटती... और बुदबुदाती जाती-’नीलकंठ तुम नीले रहियो, मेरी बात राम से कहियो, राम सोए हो तो जगाकर कहियो...।’ कभी नीलकंठ बीच बात में उड़ जाता तो कभी वह देर तक माँ को ताकता रहता...। कुछ दिन पेड़-पेड़ नीलकंठ खोजने मैं भी माँ के साथ गया हूँ...। मैंने माँ से एक बार कहाँ कि ’आपकी कौन सी बात है जो आप राम से कहना चाहती हो...।’ माँ ने एक ज़ोर का चपत लगाया मुझे.... कान और गाल के आस-पास कहीं।
मैं अगर नीलकंठ होता तो क्या करता...? माँ की बात सुनकर मैं राम के पास जाता और कहता कि ’एक बूढ़ी औरत जो लगातार बूढ़ी होती जा रही है... वह एक बात मुझसे कहती है कि मैं आपको आकर कह दूं... पर हर बार वह बात मुझे नहीं बताती कि मैं उसकी क्या बात आपसे आकर कह दूं...।’ मैं नीलकंठ होता तो पेड़ पर नहीं बैठता.. पेड़ पर बैठने से बार-बार राम के पास जाने की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती। मैं मकानों पर बैठता... काया के मकान के आस-पास कहीं।
काया के मकान की छत से बाज़ार दिखता होगा... क्योंकि मैं जब बाज़ार में घूमता हूँ तो मुझे बाज़ार से काया के मकान की छत दिखती है। काया का मकान बहुत सारे मकानों से घिरा है.. जैसे काया बहुत सारे लोगों से घिरी रहती है। काया के मकान तक पहुंचने में बहुत से बाज़ारों-घरों से होकर गुज़रना पड़ता है... तब भी वह मकान कभी अकेला नहीं मिलता है.. वह बहुत मकानों से घिरा मकान है.. जैसे काया...। काया बहुत से लोगों के किले में बंद है... उस तक पहुंचना असंभव है...। मुझे पीपल का पेड़ बहुत अच्छा लगता है जो नदी के किनारे किले के ऊपर उगा हुआ है। मैंने कई बार सपना देखा है कि मैं पीपल का पेड़ हूँ और काया मेरी छाया के भीतर कहीं बैठी हुई है...। और जब वह मेरे पेड़ की छाया तले सो जाएगी तब मैं उसके घर में घुसूगां और हमेशा हमेशा के लिए छुप जाऊंगा... उसके बिस्तर के आस-पास कहीं।
दिन में बाज़ार घूमते हुए अचानक जीवन दिखा। जीवन यायावर है। जीवन अपना घर बहुत पहले छोड़ चुका है, उसकी कमीज़ से पसीने की बदबू आती है। वह जब भी दिखता है मुझपर थोड़ा हस लेता है। मैं कई बार बीच सड़क को छोड़कर गलियों में छिप जाता हूँ... जीवन का सामना करने से मैं घबराता हूँ। जीवन की उम्र मेरी उम्र के आस-पास ही कहीं है। वह हमेशा अचानक मुझसे टकरा जाता है, कहता है कि ’चलो बैठकर बात करते हैं...’ मैं उसके साथ कभी नहीं बैठता हूँ। मैं उससे खड़े-खड़े बात करता हूँ... खड़े-खड़े बात करने में एक चलतापन होता है जिसपर मैं हमेशा सहज बना रहता हूँ... बैठकर बात करने में ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। बैठकर बात लंबी चलती है... फिर खड़े होने की गलियाँ खोजनी पड़ती हैं। बैठकर बात करने में बहुत देर खड़े होकर भी बात होती रहती है...। बैठे-बैठे आप सीधे जा नहीं सकते.. जबकि खड़े-खड़े बात करने में आप सीधे कहीं जा सकते हैं। जीवन बिठाकर बात करना चाहता है और मैं खड़े-खड़े चल देना। जीवन ने मिलते ही सीधे संवाद शुरु किये...
’चलो बैठकर बात करते हैं।’
मैं खड़ा रहा। कुछ देर में, नहीं बैठूंगा की ज़िद्द समझकर जीवन खड़े-खड़े बात करने की कोशिश करने लगा। खड़े-खड़े बात करने में वह हकलाने लगता था।
’तो जीवन कैसा चल रहा है?’ उसने पूछा
’कट रहा है।’ मैंने कहा
’तुम कहीं जाने वाले थे?’
’हाँ, मन बदल गया।’
’शरीर में मन ठीक-ठीक कहाँ होता है जानते हो?’
’दिल के आस-पास कहीं...!!!’
’ना...’
’फिर कहाँ होता है मन?’
’जिस जगह से रोंगटे खड़े होना शुरु होते हैं उसके आस-पास कहीं।’
मैं चकित उसे देखता रहा। किसी काम से कहीं जल्दी पहुंचना है- के बहाने मैं खोजने लगा। फिर अचानक एक सवाल याद हो आया।
’और रोंगटे खड़े होने की जगह कहाँ है शरीर में?’ मैंने पूछा
’जिस जगह से शरीर में सिहरन शुरु होती है उसके आस-पास कहीं।’
मैं चुप हो गया। मैं जानता था कि इस तरह की बातों का कोई अंत नहीं होता है। जीवन मेरे हाथों को देख रहा था। मैंने अपने हाथों को जेब में डाल दिया। मैं सच में सिहरन महसूस कर रहा था अपनी पीठ के आस-पास कहीं...। फिर मैं सोचने लगा कि सच में यह शरीर के ठीक-ठीक किस भाग से उठ रही है?
’तुमने मुझसे झूठ क्यों कहा?’ जीवन बोला
’किस बारे में? मैंने पूछा
’कि तुम कहीं जाने वाले हो?’
’मैं हमेशा से कहीं चला जाना चाहता हूँ।’ इस बार मैं सच बोलने पर आमादा था।
’तो?’
’तो क्या?’
’तो गए क्यों नहीं?’
’शरीर ने साथ नहीं दिया।’
’तुम तो कह रहे थे कि मन बदल गया?’
’मन शरीर है।’
’अभी भी कहीं जाना चाहते हो?’
’हाँ, अभी ठीक इसी वक़्त मैं कहीं चले जाना चाहता हूँ।’
’कहाँ?’
मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। इस बार मुझे कोई बहाना नहीं बनाना पड़ा, जीवन मेरे सामने से मुस्कुराकर चल दिया। मैं बाज़ार में अकेला खड़ा रहा.. जीवन जा चुका था। कहाँ जाऊंगा का जवाब मैं नहीं दे पाया। मैं आगे, बिना किसी दिशा के चलने लगा। कहाँ जाना चाहता हूँ मैं... मैं इस वक़्त कहाँ जा रहा हूँ मुझे यह भी नहीं पता। बाज़ार पीछे छूट चुका था। मैंने अपने आपको किले के पास, पीपल के पेड़ के नीचे पाया। नीचे नदी बह रही थी। तभी मुझे उत्तर मिल गया, मैं जाना चाहता हूँ... नदी के उदगम के आस-पास कहीं।

माँ सुबह-सुबह नीलकंठ की खोज में चली जाती। पिताजी घर की दीवार के पीछे मूतने...। मुझे उनको सहारा देना होता था... सो मैं नीलकंठ की सालों की खोज में कभी-कभी माँ का साथ नहीं दे पाता था। पिताजी मूतते हुए जर्जर और देयनीय लगते थे सो मैं उनकी तरफ कम ही देखता था। मैं उस वक़्त आसाम ताकता था जहाँ सुबह होने का उत्सव होता था। पिताजी कहते ’ऊपर क्या देखता रहता है... ज़मीन पर से निग़ाह कभी नहीं हटाना वर्ना कब ठोकर खाकर गिरोगे पता भी नहीं चलेगा।’ पिताजी के सारे उपदेश ऎसे होते जैसे हम जी नहीं रहे हैं कोई जंग लड़ रहे हैं। हारे तो मौत...। पिताजी बहुत डरे हुए रहते थे। वह घर में आए हर आदमी को दुश्मन का आदमी मानते थे। कुछ लोग जब घर के सामने से तेज़-तेज़ बाते करते हुए जाते तो पिताजी सतर्क हो जाते.. उन्हें लगता कि उन लोगों की बातों में कोई कोड छिपा है, वह घर में दीवार पर कान लगाकर सुनते। दूर से देखते हुए लगता कि पिताजी दीवार से कान खुजला रहे हैं। वह बहुत चालाक है- यह वह किसी भी नए आगंतुक को, अपने दूसरे या तीसरे वाक़्य में ही बता देते थे। नया आगंतुक अधिक्तर मेरा कोई दोस्त होता जो मुझे ताकता रहता। इकलौता होना कई बार बहुत भारी पड़ जाता था... पिताजी मुझे चालाक बनाना चाहते थे और माँ नीलकंठ... माँ-बाप दोनों की अपेक्षाओं का बोझ उठाने के लिए हमेशा कंधे कमज़ोर पड़ जाते। जब भी कंधों को सीधा करने की इच्छा होती मैं चल देता काया के घर के आस-पास कहीं।

एक दिन काया अकेली बाज़ार में दिखी। मैं बहुत देर उसके अगल बगल खोजता रहा कि वह किसी के साथ तो होगी। अकेली काया... मैंने इसकी हमेशा कल्पना की थी। मुझे पीपल का पेड़ याद हो आया और याद आया काया का उसके नीचे सो जाना। मैं उसके पीछे हो लिया। वह सलवार सूट की दुकान में घुस गई। मैं बाहर उसका इंतज़ार करने लगा। तभी पीछे से मुझे जीवन की आवाज़ आई।
’अरे! तुम यहाँ.... चलो बैठकर बातें करते हैं।’
मैंने जीवन को गुस्से से देखा। जीवन कुछ देर मेरा गुस्सा मेरी आँखों में पढ़ता रहा। अंत में मैंने ही आँखें हटा ली। काया को देखा वह अभी भी बहुत से सलवार सूट में अपनी पसंद खोज रही थी। तभी मुझे मेरे कान के पास किसी के सांस लेने की आवाज़ आई। मैंने कनखियों से देखा जीवन मेरे बगल में खड़ा है और खुसर-पुसर करके मुझसे कुछ कह रहा है...
’तुम एक पत्थर छोड़ते हो तो दूसरा पत्थर उठा लेते हो। भारी पत्थरों को ढ़ोते रहना तुम्हारी आदत है जिससे तुम बाज़ नहीं आते हो। हल्के रहो... छोड़ो पत्थर।’
जीवन कहता जा रहा था....
’तुम वह बच्चे हो जो अंत में अपनी माँ को बचा लेना चाहते हो। अपनी कब्र में लेटे रहने के स्वप्न देखते हो पर इधर-उधर के गढ़्ढों से बचते फिरते हो।’
तभी काया उस दुकान से बाहर निकली। मैं जीवन को छोड़कर अलग खड़ा हो गया मानों मैं उसे जानता ही ना हूँ। काया दो कदम दुकान से नीचे उतरी थी कि उसकी निग़ाह मुझपर पड़ी। वह थम गई। वह एकटक मुझे देखे जा रही थी जैसे मुझे बहुत पहले से जानती हो... तभी मुझे उसके पीछे अभी-अभी उगा पीपल का पेड़ दिखा। वह अचानक झेंप गई और निग़ाहें नीची किये बाज़ार की गलियों में घुस गई। मैंने पीछे पलटकर देखा तो जीवन गायब था। मैं बिना वक़्त गवाएं काया के पीछे हो लिया। काया कुछ देर में बाज़ार से अलग हो गई और एक सुनसान गली में प्रवेश कर गई। मैं अभी तक काया के बहुत पीछे था। मैंने अपनी गति बढ़ाई। उस सुनसान गली के मोड़ पर काया रुक गई। मैं रुकते-रुकते उसके करीब कहीं रुक गया। काया पलटी..
’क्या है?’ काया ने पूछा।
’तुम्हारा नाम काया है ना?’ मैंने पूछा
’नहीं...।’ और वह हसने लगी। फिल्मों में जैसे नायिका की सहेलियाँ हसती हैं ठीक वैसे।
’मुझसे दोस्ती करोगी?’
’नहीं मेरे पास वक़्त नहीं है... परिक्षा सिर पर है.. बहुत पढ़ना पड़ता है।’
’ठीक है।’ मैं तुरंत मान गया।
’तुम्हारा नाम क्या है?’ उसने पूछा।
’जीवन...।’ मैंने जीवन क्यों कहा... मेरा नाम जीवन नहीं है.. ओह! ओह! ओह!
’जीवन.. अच्छा नाम है।’
यह कहकर वह चल दी...। मैंने सोचा बस यही है अपने प्यार से पहली मुलाकात..? बस इतनी ही...? नहीं.. कुछ ओर भी है इसमें..। मैं काया के पीछे भाग लिया।
कुछ गलियों तक काया मुझे पीछे पलटकर देखती रही। फिर वह एक बाज़ार में निकल आई। मैं बाज़ार में काया के बहुत करीब आ गया... और भीड़ की आड़ में मैं उसका हाथ छूने की कोशिश करने लगा। काया मेरे हर स्पर्ष पर फिल्म में नायिकाओं की सहेलियों की तरह हंसने लगती। इस छूअन-छिलाई में मैं बहुत देर तक उस भाव को खोजता रहा जिसे प्रेम कहते हैं.. पर उसे प्रेम नामक भाव का शरीर में कहीं भी संचार नहीं हो रहा था। इतने में पता नहीं कब काया अपने घर के करीब पहुंच गई। तभी उसने अपनी चाल की गति बढ़ाई और दो हट्टे कट्टे नौजवानों को ’भाई.. भाई’ कहकर संबोधित किया। मैं अपनी डरपोक सतर्कता पर स्तब्ध बना रहा। काया की पीठ मेरी तरफ याने बाज़ार की तरफ थी... पर उसके दोनों भाईयों की आँखें भीड़ में किसी को टटोल रही थीं। मैं शुरु से ही भय सूंघ लेता था। काया पलटी और उसने सीधे मुझे देखा... और एक क्रूर मुस्कुराहट उसके होठों पर आ गई। काया ने हाथ के इशारे से अपने भाईयों को बाज़ार की भीड़ की तरफ धकेल दिया...। काया ने ठीक मेरी तरफ इशारा नहीं किया था... उसके भाई भीड़ को चीरते हुए घुसे और जो भी जवान सा लड़का दिखा उसे चपतियाने लगे। दो-तीन चपत मुझमें भी पड़े। दोनों भाई ’जीवन कौन है?’ नाम की रट लगा रहे थे..। मेरे कान और गाल सुन्न थे। दिमाग़ के भीतर कोई ’सुन्न..सुन्न’ शब्द का जाप कर रहा था। कुछ समय बाद मैंने खुद को अपने बिस्तर में पस्त पाया। काया, काया नहीं माया निकली। इन सबमें प्रेम कहाँ था। आकर्षण था.. हाँ आकर्षण.. जब काया बहुत क्रूरता मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी तब मैं सबसे ज़्यादा उसके प्रति आकर्षण अनुभव कर रहा था। तभी... ठीक उसी वक़्त मैंने पहली बार हलचल महसूस की अपने दोनों झांघों के बीच में कहीं....।
मेरे पिताजी ने कई बार पिशाब जाने के लिए घंटी बजाई और हर बार मैं ही उन्हें पिशाब कराने पीछे ले गया। बाथरुम में वह एक बार गिर चुके थे जिसकी वजह से उनके कूल्हे की हड़्ड़ी चटक गई थी। इस वजह से वह बाथरुम में पिशाब करन से घबराते थे..। हर घंटी पर मेरे दर्शन उनकी आदत में शुमार नहीं थे। चौथी बार जब वह पिशाब कर रहे थे और मैं बिना बादल के आसमान में काया को तलाश रहा था तो उन्होंने पूछ लिया..
’जवानी में बाप की इतनी सेवा खतरनाक है।’ उन्होने कहा
’किसके लिए?’ मैंने पूछा
’किसके लिए मतलब?’
’किसके लिए मतलब... मेरे लिए या आपके लिए?’
पिताजी गुर्राए... उनके मुंह से झाग निकलने लगा। वह जब भी गुस्से में होते थे तो उनके मुंह से झाग निकलने लगता था। मैंने उनके जेब से रुमाल निकाला और झाग साफ किया। उनका गुस्सा उनसे बहुत कुछ बुलवाना चाहता था पर उम्र के कई मौड़ मुड़ने के बाद वह अब एक सीध में चलना भूल चुके थे, एक बात पर बहुत देर बने रहना भी। वह कभी-कभी मुझसे कहते थे.. ’बेटा बहुत कठिन जीवन था.. आज सोचता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.....’ फिर मेरे चहरे पर कोई भी भाव ना पाकर मुझपर बरस पड़़ते। आज मैं सोचता हूँ तो मेरे पास कितने हज़ारों किस्से हैं जो लोग बहुत गरीबी और बेकारी का जीवन जी रहे थे। नंदू का बाप पहले ठेला लगाता था आज उसकी दुकान है... चीरु का बाप मिल मज़दूर था आज वह थोक का बड़ा व्यापारी है... रामू का बाप रामू काका हमारे घर में नौकर था आज रामू हमारे घर में नौकर है। यह संधर्ष थोड़ा अलग है... और इस संधर्ष का चश्मदीद गवाह मैं खुद हूँ....। रामू (याने रामू काका का बेटा) दोनों आवाज़ो पर प्रगट होता है.. अगर आप रामू चिल्लाओ तब भी और अगर... रामू काका चिल्लाओं तब भी। घर वालों को रामू काका बुलाने की आदत है... रामू उस आदत को समझता है.. अपने को खुद के नाम से पुकारे जाने की ज़िद्द नहीं करता है। असल में रामू काका का नाम बलविंदर सिंह था पर नौकरों के उस समय के पाप्युलर नाम में रामू सबसे ऊंचे पायदान पर था सो बलविंदर रामू हो गया..। रामू काका को शायद आजकल के नौकरों के नाम पसंद नहीं आते थे.. सो उन्होंने अपने बेटे के पैदा होते ही उसका नाम रामू रख दिया। रामू की उम्र मेरी उम्र लगभग बराबर है... पिताजी को मुझसे ज़्यादा रामू की शादी की चिंता खाए जाती है... वह चाहते है कि वह गाव की एक ऎसी औरत ढूढ़कर लाए जो रामू का दिमाग़ ना ख़राब कर दे... और रामू अपना बच्चा होने पर उसका नाम रामू ही रखे...। बचपन में रामू घर का सारा काम निपटाकर शाम को मेरे साथ खेलने के लिए थोड़ा सा समय निकाल लेता था। वह मेरे साथ खेलता भी किसी काम की तरह था। अगर थक जाता तो रुकता नहीं था... खेलता रहता.. गलती से अगर जीत जाता तो माफी मांग लेता। एक बार रामू और मैं ’बड़े होकर क्या बनेगें का सपना’ का सपना वाला खेल खेल रहे थे... मैंने उस वक़्त के सारे पाप्युलर सपने रामू को गिना दिए... और रामू ने कहा कि वह ट्रेन चलाना चाहता है...। मैं चुप बना रहा.. बस उसका यही सपना था...। वह सपना सुनाते वक़्त उसकी आँखों में एक गहरी चमक थी जिससे मुझे आज तक जलन महसूस होती है....। मैंने उसके बाद उसके साथ खेलना बंद कर दिया...। मैं आज तक अपने सपने जैसा कुछ भी नहीं बन पाया... फिर भी मैंने रामू को हरा दिया। पर आज भी जब कभी मैं ट्रेन देखता हूँ तो भीतर कहीं कोई चीख़ता है... और मैं सोचता हूँ कि यहाँ से कहीं चला जाऊं दूर... जहाँ ट्रन ना चलती हो... और जहाँ रामू कभी ना दिखे। गहरे अपने आपसे यह मैं कहता भी इसलिए हूँ कि रामू से बड़ा महसूस कर सकूं...। रामू चुप रहता है.. उसका मौन चुभता है... आँखों और कानों के बीच में कहीं।

मैं जीवन से भाग रहा था क्योंकि जीवन को काया के दोनों भाईयों ने मिलकर बहुत मारा था। जीवन ने मुझे काया को ताकते देखा था। जीवन गुणा भाग के बाद, पिटने की वजह में मेरे हाथ होने के निर्णय तक पहुंच चुका था। बाहर जीवन था.. और मैं घर में क़ैद था। जीवन की एक आँख काली हो चुकी थी। एक गहरी चोट लगी थी... कोहनी और कंधे के बीच में कहीं।
मैं दोनों ही जीवन से भाग रहा था... एक जो यायावर फटेहाल मेरा दोस्त था और दूसरा मेरा जीवन जो यायावर फटेहाल मेरा जीवन था। मेरे खुद के डरों ने मेरा मेरे ही जीवन से संबंध कुछ इस तरह का बना दिया है कि मैं अपने होने में क़ैद हूँ और मेरा जीवन बाहर मेरी प्रतीक्षा में है। भीतर मैं भी एक प्रतिक्षा में हूँ... किसी अनहोनी की... कुछ ऎसा हो जाए, चाहे दुखद ही सही.. जो जीवन की इस गति को बदल दे..। मैं अपने जीवन की इस गति का आदी हो चुका हूँ। इतनी सहजता से यह जीवन अपनी ज़िम्मेदारीयाँ मुझ पर लादता गया कि मैं हर दिन एक व्यस्त दिन की तरह जीता गया। फिर एक दिन पिताजी ने पूछा ’क्या करना चाहते हो जीवन में.. कुछ सोचा है?’ मैं प्रश्न के मानी नहीं समझ पाया.. क्या किया जा सकता है जीवन में? मैंने कहा ’मेरे पास समय ही कहाँ है?’ समय मेरे पास उस वक़्त नहीं था पर अब मैं जीवन के डर की वजह से घर में क़ैद हूँ सो समय है... बहुत समय..। घर के बाहर वाले सारे काम रामू काका का बेटा रामू करने लगा था। सो अब जीवन में क्या करना है सोचा जा सकता था। मैंने हर बार कहीं चले जाने के बारे में सोचा था। कहीं चला जाना या तो किसी चमत्कार के कारण हो सकता है.. या किसी अनहोनी के कारण... मैं दोनों के इंतज़ार में बरसों से था। चमत्कार होता हुआ कहीं नज़र नहीं आता था और अनहोनी होने को है जैसा एक कुत्ता घर के बग़ल की गली में चक्कर लगाता रहता.. कभी देर रात रोने लगता तो कभी भौंक-भौंक कर दिन खा जाता। मैं महसूस कर सकता था कि मेरा जीवन अनहोनी और चमत्कार के आस पास ही कहीं था।
एक दिन माँ नीलकंठ की खोज से वापिस आई तो सीधे किचिन में घुस गई। उनके दैनिक जीवन में नीलकंठ के बाद पिताजी थे फिर रामू काका.. फिर रामू और बाद में मैं था। वह नीलकंठ की खोज के बाद इसी गति से सभी से पूरे-पूरे संवाद निपटालेने के बाद घर के कभी ना खत्म होने वाले कामों में खुद को खपा देती थी। लेकिन आज वह नीलकंठ की खोज के बाद वह सीधा किचिन में घुस गई। मैं बहुत देर तक उनके बाहर आने का इंतज़ार करता रहा। पर वह बाहर नहीं आई। मैं किचिन के दरवाज़े के पास तक पहुंचा तो माँ के सुबकने की आवाज़ आने लगी। मैं भीतर किचिन में गया तो देखा वह गेस की टंकी के पास बैठी रो रही थी। मैं चुपचाप उनके बगल में बैठ गया बिना उनको छुए हुए। मैंने पानी का गिलास उन्हें पकड़ा दिया था जिसे वह एक सांस में पूरा का पूरा गटक गई थी। पर उनका रोना फिर भी जारी था। आँसू नहीं टपक रहे थी पर उनका सुबकना जारी था। मैं समझ गया अगर मैं किचिन में नहीं आता तो अब तक माँ अपना रोना बंद करके घर के कामों में मसरुफ हो चुकी होती... पर चूंकि अब उन्हें एक दर्शक मिल गया है.. सो वह अब अपने रोने को ज़ाया नहीं होने देंगी। अंत में मुझे सारी मनऊवल करनी पड़ी.. काफी देर के बाद उन्होंने कहा कि... नीलकंठ ने उन्हें सालों धोखा दिया है...। मुझे धोखे जैसी बातें सुनना हमेशा से अच्छा लगता रहा है.. चाहे वह धोखा खुद मैं ही क्यों ना खा रहा हूँ।
’उसने कभी भी मेरी बातें प्रभु राम से नहीं कहीं...’ माँ ने कहा..
’आपको कैसे पता..’ मैंने पूछा...
’पिछले कुछ दिनों से मुजे रोज़ नील कंठ दिख जाया करता... मैं उस पेड़ के नीचे जाती, जिस पेड़ पर वह बैठा होता, जैसा कि तुझे पता ही है ऎसा ही तो करना होता है....’
मैं हाँ में हाँ मिलाई... माँ ने आगे कहा...
’मैं रोज़ उससे अपनी बात कहती.. और इंतज़ार करती कि वह उड़ जाए.. पर वह मुआ टस-से-मस होने का नाम ही नहीं लेता... मुझे लगा नाराज़ है.. कुछ देर में उड़ जाएगा.. पर कहाँ.. थक्कर मुझे ही घर वापिस आना पड़ता..। आज फिर वह मुझे वहीं दिख गया.. मैं समझ गई इसने मेरी कोई भी बात प्रभु राम तक नहीं पहुँचाई... मैंने फिर अपनी बात कही.. पेड़ के तीन चक्कर लगाते हुए। पर वह वहीं बैठा रहा.. मैंने पत्थर उठाए और लगी मारने नीलकंठ को... वह उड़कर बगल वाले पेड़ पर बैठ गया.. मैंने फिर पत्थर मारा.. वह उड़ा और कुछ दूर जाकर फिर एक पेड़ पर बैठ गया..। मैं समझ गई यह ना जाने वाला प्रभु राम के पास.. मै उसके करीब गई... उससे हाथ जोड़कर विनती की.. कि हे नीलकंठ उड़ कर चले जाओ प्रभु राम के पास.. तब उसने.. उस मुए नीलकंठ ने मेरे ऊपर टट्टी कर दी...।’
यह सुनते ही मेरे भीतर एक हंसी का गुबार फूटा.. पर अगर इस वक्त हंसना ठीक नहीं था सो मैं हंसी दबा गया।
’इतना बड़ा अपश्गुन... अब मैं कभी उस नीलकंठ की ओर नहीं जा सकती.. अब कभी प्रभु राम तक मेरी बात नहीं पहुंचेगी।’
इस बात पर मेरे बहुत सवाल थे मेरी माँ से... पर मुझे पता है कि मेरे सारे सवालों के जवाब एक झिड़क ’तुझे क्या पता?’ पर खत्म कर दिये जाएगें... सो मैं किचिन से उठा और बाहर चला आया। माँ शाम तक अपने राम को भूल चुकी थी.. वह दैनिक दिनचर्या के खेल में पूरी तरह व्यस्त थी। उनकी व्यस्तता को देखकर मैं खुद की व्यस्तता के बारे में सोचने लगा..। मैं व्यस्त हूँ... पर अपनी पिछली व्यस्तताओं के बारे में यदि कोई मुझसे सवाल करे कि ’तुम ठीक-ठीक किस काम में व्यस्त हो?’ तो मैं उसका जवाब नहीं दे सकता हूँ। मैं अपने सब्ज़ी लाने को अपने जीवन में व्यस्त हूँ के कारण में नहीं रख सकता हूँ...। तो मैं कहा हूँ क्या कर रहा हूँ.... अचानक मैंने अपने जीवन को अपने घर की चाहरदीवारी के आस पास कहीं रेंगता हुआ पाया।
काया के घर के बगल से गुज़रते ही हृदय गति तेज़ हो जाती। बहुत दिनों से वह दिखी नहीं थी... पर फिर दिखेगी की कार्यवाही में मैं व्यस्त था। तभी मुझे मेरी छिछली व्यस्तताओं से घृणा होने लगी। मुझे लगा कि मैं रेंगता हुआ एक घिनौना जीव हूँ जिसके होने पर उस जीव को खुद ऊबकाई आती है। मैं तेज़ी से चलता हुआ चौक़ की तरफ पहुंचा.. मुझे वहाँ काया के दोनों जवान भाई दिखे.. मैं उनके सामने गया.. और उनसे कहा कि...
”मैंने उस दिन तुम्हारी बहन को छेड़ा था जीवन के नाम से.. बोलो क्या कर लोगे मेरा।“
वह दोनों पान की दुकान पर मुँह बाए मुझे देखते रहे। फिर एक भाई ने मेरे कंधे पर धक्का दिया.. और कहा..
’चल जा निकल ले वरना बहुत पिटेगा... चल निकल..।’
मैं वही खड़ा रहा..। दोनों भाई वापिस पान खाने में व्यस्त हो गए। मैं पिटना चाहता था बुरी तरह.. एक अनहोनी.. एक आश्चर्य की तलाश में..। मैंने दूसरे भाई को कंधे से पलटाया और एक तमाचा उसके गाल पर दे मारा....।
उसके बाद सब कुछ संगीत में बदल गया..। बहुत से धूंसे... बहुत सी लातें... चांटे... मैं पिटता हुआ सड़के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचा जा रहा था.. एक तरह का नृत्य था.. जिसे मैं लोट-पोट होकर किये जा रहा था। अचानक सब कुछ बहुत धीमी गति से चलने लगा। मैं दोनों भाईयों के सारे वार बहुत ही सहजता से देखे जा रहा था.. वह मुझपर वार नहीं कर रहे थे, यह तो मैं था शायद जो जैसा चाह रहा था वैसा वार खा रहा था। मुझे धीमी गति से अपनी तरफ आते हुए मुक्के दिखे.. लात धूल उड़ाती हुई मेरे कूल्हे के आस-पास कहीं चिपक गई। उन दोनों भईयों के चहरे राम और लक्ष्मण की तरह चमक रहे थे। उनके मुँह से फुफ्कारे निकल रही थी। यह सुख था.. नहीं सुख नहीं आनंद.. आनंद की चरम अनुभूति। फिर एक करारी लात जो मेरे सीने पर चिपकी मैं घिसटता हुआ सड़क के किनारे तक पहुंच गया...। वह दोनों सड़क के बीचों-बीच रुक गए, दोनों थकान चुके थे.. संगीत बीच में ही बंद हो गया। मैं लड़खड़ाता हुआ उठा. रेंगता हुआ उनके पास गया और एक भाई को फिर ज़ोर का चपत जड़ दिया.. फिर संगीत शुरु हो गया। मैं इतना प्रसन्न बहुत कम हुआ हूँ ज़िन्दगी में.. मैं चाह रहा था यह संगीत कभी बंद ना हो.. मैं पिटता जाऊं.. पिटता जाऊ...।
पिताजी के लाख पूछने पर भी मैंने किसी को नहीं बताया कि किसने मुझे मारा। माँ चुप थी। मुझे स्वस्थ होने में बहुत समय लगा। मैं बहुत ही हल्का महसूस कर रहा था। चीज़े मुझे साफ दिख रही थी। जब मैं स्वस्थ महसूस करने लगा तो एक दिन मैं पिताजी के कमरे में गया.. उनके पैर छुए... वह घबरा गए।
’क्या हुआ?’ उन्होंने पूछा
’मैं जा रहा हूँ।’ मैंने कहा...
’ठीक है...’
वह मुझे आश्चर्य से देख रहे थे...। उन्हें लगा कि शायद मैं बाज़ार कुछ खरीदने जा रहा हूँ पर उसके लिए पैर पड़ने की क्या ज़रुरत थी? जब तक मैं उन्हें दिखता रहा वह मुझे देखते रहे। फिर मैं माँ से मिला... रामू से और अपने घर से...। कुछ छूट रहा था... एक ऎसा संसार जो मेरे होने के कारण मुझमें व्यस्त था। कुछ दिनों से मैं अपनी इस संसार में नहीं होने के बारे में सोच रहा था तो लगा कि इस संसार में मैं नहीं हूँ की तरह यह संसार नहीं चलेगा... यह संसार चलेगा कि मैं हुआ करता था। ’था’ में मुझे मेरे घर वाले याद करेगें.. और मैं कहीं ओर होऊंगा। मैं कहा होऊंगा में आश्चर्य और चमत्कार था.. सो वह मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मै इस बार उस आकर्षण का सपना नहीं देख रहा था.. मैं उस ओर बढ़ चला था।
जीवन मुझे स्टेशन तक छोड़ने आया था। मेरे पिटने पर वह चुप था जैसे उसके पिटने पर मैं। स्टेशन छोड़ते वक़्त उसने कहा...
’कहा जाओगे?’
’शहर...।’ मैंने कहा
जीवन के लिए इतना जानना काफ़ी था। फिर उसने कहा..
’मुझे खुशी है।’
’मैं जानता हूँ।’ मैंने कहा
’एक वक़्त होता है जब तुम जा सकते हो.... मैं जिस दिन जा सकता था उस दिन मैं व्यस्त था।’
’मैं भी अभी तक व्यस्त था।’
’जब तुम वहाँ पहुच जाओगे तो वहाँ भी व्यस्तता होगी.. पर बहुत व्यस्त मत हो जाना।’
’क्यों?’
’छोटी-छोटी व्यस्तताएं आदमी को काकरोच बना देती है.. फिर उसे लगता है कि वह कभी भी नहीं मरेगा।’
जीवन थोड़ा उग्र हो गया था। ट्रेन आने में अभी वक्त था..। मैं स्टेशन के बाहर जीवन के साथ खड़ा था। वह स्टेशन के भीतर नहीं जाएगा मुझे मालूम था। मैं भीतर जाने को हुआ...
’कुछ देर रुक जाओ... अभी तुम्हारी ट्रेन आने में समय है।’
मैंने अपना सूटकेस वापिस रख दिया...।
’चाय पियोगे?’
’ना...’
’कुछ खाओगे?’
’भूख नहीं है।’
जीवन के भीतर पता नहीं क्या चल रहा था। मेरी इच्छा हुई कि उससे सीधा पूछ लू कि क्या बात है? पर मैं उसके सामने शांत खड़ा रहा। मैं सच में शांत था। जीवन अशांत था जो छूटने वाला था।
मैंने सूटकेस उठाया और स्टेशन की ओर चलने लगा। जीवन मुझे देख रहा था। वह कुछ देर के लिए ही सही मुझे रोक लेना चाहता था पर मैं रुका नहीं.... मैंने उसे आखरी बार पलटकर देखा.. वह वहीं खड़ा था.. मुझे देखता हुआ...। मुझे उसकी काकरोच वाली बात याद आई और मैं पलट गया।

मैं स्टेशन पर अपना छोटा सा सूटकेस लिए बैठ था। ट्रेन दाहिनी तरफ से आएगी.. और बाए तरफ को मुझे ले जाएगी। ट्रेन देर से नहीं चल रही थी... और इस बार मैं सही समय के आस पास कहीं था।

Thursday, July 28, 2011

life is good....


जीवन बहुत सुंदर है। यह बात लिख लेना होता है। पर उसे अपने लिखे में मैं दर्ज करना भूल गया था। आज दर्ज कर रहा हूँ। जिसकी वजह एक बूढ़ा ब्रिटिश आदमी है... जो मुझे न्युयार्क की मेट्रो ट्रेन में मिला था। उसके हाथ में डायरी थी, वह कुछ लिख रहा था। मैं हर बार की तरह अपना रास्ता भटक गया था और किसी गलत मेट्रों में चढ़ चुका था। जाना कहीं ओर था और कहीं ओर ही चल पड़ा था। उस बूढ़े ब्रिटीशर ने अपना लिखना बंद करके मुझे विस्तार से समझाया कि कहाँ उतरना और कौन सी मेट्रो किस स्टेशन से पकड़ना। बाद में उसने जोड़ा कि "फिर तुम उस रास्ते पर चलने लगोगे जहाँ तुम्हें जाना है” मैंने हस कर उसकी इस बात का स्वागत किया... उसे धन्यवाद दिया और उसके लेखन में बाधा पहुंचाने के लिए माफी मांगी। मैं उसके बगल में बैठ गया। गलत रास्ते पर चलने की असहजता पूरे शरीर में थी सो मैं ठीक से बैठ नहीं पा रहा था। उसने धीरे से पूछा क्या करते हो? यूं मैं लेखक हूँ कहने से कतराता हूँ पर चूंकि वह कुछ लिख रहा था इस बात से मुझे बल मिला और मैं बड़े अभिमान से कहा कि मै लेखक हूँ। फिर उसने पूछा कि ’How is life?’ मैं बिना झिझक जवाब दिया कि ’life is good.. very good.’ मेरी बात पर वह खुश हो गया और उसने कहा कि क्या मैंने यह बात लिखी है? मैंने पूछा कौन सी बात? उसने कहा कि ’life is good’ वाली बात। मैंने ना में सिर हिला दिया। वह कहने लगा कि... ”मैं जब भी अपनी पुरानी डायरीज़ पढ़ता हूँ तो मुझे सिर्फ पीड़ा, अवसाद और ग्लानी के पन्नों से भरी हुई वह दिखतीं हैं। फिर मुझे याद आया कि जब भी जीवन में मैं किसी भी प्रकार के डिप्रेशन से गुज़र रहा होता था तो मुझे अपनी डायरी याद आती थी और मैं उसके पन्ने के पन्ने गूद डालता था। अब इस उम्र में आकर जब अपनी डायरी पढ़ता हूँ तो लगता कि कितना पीड़ित जीवन जीया है मैंने... जबकि यह सही नहीं है.. मैं उन क्षणों को दर्ज़ करना ही भूल गया था जब मैं कहा था कि ’life is good.’ इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि इस बात को अभी इसी वक़्त लिख डालों...।”
Life is good… मैंने मेट्रो से उतरा और, उसके कहे अनुसार, दूसरी वाली मेट्रो में बैठ गया जो मुझे वहाँ ले जा रही थी जहाँ मुझे जाना था। कितने ही तरह के लोगों से घिरा हुआ था मैं... सभी अपनी किताबों, अपने संगीत और अपनी निजता में व्यस्त थे। कोई सीधे किसी से भी आँखें नहीं मिलाना चाहता था। मैंने अपनी डायरी निकाली और लिखा.. life is good… पर उस पर भी मुझे उस वाक़्य की संपूर्णता का एहसास नहीं हुआ... मैंने कुछ बड़े अक्षरों में लिखा .... LIFE IS GOOD… तब भी कुछ अधूरापन था। तभी मैंने धीरे से, खुद से, खुद के लिए फुसफुसाया life is good… और मुझे अच्छा लगा। जब मेरा स्टेशन आने वाला था। मैंने अपनी डायरी को वापिस बेंग़ में रखा... और खड़े होकर एक अंग्ड़ाई लेकर चिल्ला दिया.. LIFE IS GOOD. अगल बगल बैठे सभी लोग अपनी निजता से निकलकर मेरी तरफ देखने लगे... मैं हल्की झेंप के साथ मुस्कुरा दिया... सभी मुझे देखकर मुस्कुराने लगे।

Thursday, May 19, 2011

"मौन में बात..."





कुछ आहट हुई.. मेरी आँख खुल गई। हड़बड़ाहट-घबराहट। पहले झटके के बाद, मैं ’कोई है!’ के विचार पर मैं स्तब्ध था। बिना हिले-डुले मैं एक टिड्डे सा रुका रहा... लगा मेरे हिलने से वह आहट कहीं दब ना जाए। ’कोई है!’... ’कोई है!’.....”कोई है!”..... कुछ देर बाद मैंने हथियार डाल दिये...कोई नहीं है। मैं वापिस बिस्तर पर पसर गया। चादर खींच कर मुँह पर डाल दी। क्या मैं वापिस सो चुका था? मानों बीच में कुछ हुआ ही ना हो... कोई आहट ना हो, मेरे ’कोई है!’ का इंतज़ार सब झूठा हो।
एक सन्नाटा है मेरे अगल-बगल... इस सन्नाटे के ढ़ेरों शोर हैं... मैं अपने अकेलेपन में अलग-अलग शोर चुनता हूँ.. सुनता हूँ। पर मेरे अकेलेपन में एक आहट है जो हमेशा बनी रहती है कि बाहर कोई है.... कोई आने वाला है। मुझे असल में हमेशा किसी-न-किसी का इंतज़ार रहता... ना..ना..ना... किसी-न-किसी का नहीं... किसी का। कोई है जिसे मैं नहीं जानता हूँ... या जानता हूँ.. पर मिला नहीं हूँ। या मिलना चाहता हूँ बेसब्री से.. ऎसा कोई आने ही वाला है। अचानक दरवाज़े पर आहट होगी और मेरे दरवाज़ा खोलते ही मुझे वह दिख जाएगा... वह जिसका मैं सालों से... या शायद जबसे मुझे याद है तब से, इंतज़ार करता आ रहा हूँ। मुझे हमेशा से लगता था कि मैं अकेला रह रहा हूँ... जबकि मैं कतई अकेला नहीं रह रहा हूँ। मैं हमेशा इंतज़ार में हूँ उस एक के जो बस आने को है... इसका मतलब मैं हमेशा से उस एक के साथ रह रहा हूँ... और रहता रहूँगा जो कभी भी नहीं आएगा !!!!!!!
“सिमोन से मिलने जाना है।“
ओफ !!! अब सोया नहीं जाएगा। मैंने आँखों से चादर हटा ली...। टकटकी बांधे दीवार को देखता रहा। बहुत पहले... किसी चुप रात में मैंने उस दीवार पर पेन से, लेटे हुए... एक रोता हुआ चहरा बनाया था। हमेशा ऎसे कुछ हज़ार क्षणों में मैं कसम खाता हूँ कि उठते ही इसे मिटा दूंगा। पर कभी मिटा नहीं पाया... उठते ही भूल जाता हूँ। मैंने करवट बदल ली, उस रोते हुए चहरे की बजाए मैंने चलते हुए पंखें को देखना ज़्यादा बहतर समझा। कम से कम वह दीवार से तो बहतर ही है... वह चल रहा है... कहीं पहुच नहीं रहा है यह अलग बात है मगर कुछ कर्म में तो लीन है ना..। उसका कर्म है हवा देना... वह चल रहा है सालों से लगातार और हवा फेंकता आ रहा है।
मुझे खुद पे, कुछ बातों को लेकर अटूट विश्वास है। जैसे सालों से मुझे पूरा विश्वास है कि मैं रोज़ उठूगां और उठते ही भूल जाऊंगा कि मुझे दीवार पर बने उस रोते हुए चहरे को मिटा देना है.. हमेशा के लिए.. मैं उसे कभी भी नहीं मिटा पाऊंगा... और अभी, ठीक इसी वक़्त मैं सो नहीं सकता, मैं अभी कुछ ही देर में उठुंगा और एक बार दरवाज़ा खोलकर ज़रुर देखूंगा कि शायद पंद्रह मिनिट पहले जो मुझे लगा था कि आहट है.. वह अगर सच में आहट है तो वह अभी भी उस आहट के बाद वहीं, दरवाज़े के बाहर प्रतिक्षा में खड़ा होगा। अभी जितनी भी देर मैं बिस्तर में उलट-पलट रहा हूँ यह सब...दरवाज़ा ना खोलने के विरुद्ध मेरी कार्यवाही हैं... और कुछ भी नहीं।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। मैं सकबका गया... ओह! तो सच में कोई बाहर खड़ा है। मैं दरवाज़े की तरफ लपका। दरवाज़ा खोलते ही सामने मुझे एक आदमी खड़ा दिखा...
’बिल...?’
’हें...!’
’अखबार का बिल...?’
’हाँ...’
मैंने उसके हाथ से पर्ची ली और भीतर आ गया। मुझे लगा उसने मुझे पकड़ लिया है। उसे पता चल गया है कि मैं... ओह!!!
मैंने सरसरी निग़ाह से बिल देखा। कुछ देर अपना पर्स तलाशा... जब मिला तो उसमें मात्र बत्तिस रुपये थे। अख़बार वाला किसी बुरी ख़बर की तरह काफी देर से बाहर खड़ा था। मैं उसके पास गया।
’दोस्त, अभी पैसे तो.. नहीं हैं।’
’ठीक है कल आता हूँ।’
वह बड़बड़ाता हुआ चला गया। मेरे पास कभी भी पूरे पैसे नहीं रहते... नहीं मैं कभी भी थोड़े से नहीं चूकता हूँ। मेरे पास थोड़े होते हैं... और बहुत सारा, उस वक़्त की ज़रुरत का पैसा, मेरे पास कभी भी नहीं होता।
उसके चले जाने के बाद मैंने दरवाज़ा बंद किया... और उसके बिल की ओर घूरकर देखने लगा। एक सौ बावन रुपये...। अरे!!! यह तो मुझे ठग रहा है। इसने बीच में करीब दस दिन मुझे अख़बार नहीं दिया था। उसके पैसे इसने काटे ही नहीं जबकि मैंने इससे कहा था। वह मुझे ठग रहा है... वह मुझे ठग रहा है... और इस बात से मुझे खुशी हुई। मुझे असल में मेरा ठगा जाना हमेशा से अच्छा लगता आया है। जब मेरा कोई दोस्त मुझसे पैसे उधार लेता है और समय रहते लौटाता नहीं है तो मुझे उसके बाद से हमेशा उससे मिलने में खुशी मिलती है...। मैं कभी उससे पैसों का ज़िक्र नहीं करता... वह खुद कभी भी बात नहीं उठाता... पर मैं खुश हो रहा होता हूँ। मुझे मेरा लगातार ठगे जाना खुशी देता है।
कभी-कभी मैं इसके विरुद्ध खड़ा होना चाहता हूँ... चिल्लाना चाहता हूँ कि बस अब से मैं कसम खाता हूँ कि मैं कभी भी ठगा नहीं जाऊंगा। इस कसम के खत्म होते ही पता चलता है कि संधर्ष कितना बड़ा है... वह संधर्ष आलू-प्याज़ से लेकर पूरे बज़ार में, और पूरे बाज़ार से लेकर खुद मुझ तक फैला हुआ है...। मैं भी लगातार खुद को ठगता रहता हूँ.... अब इस ठगने में... कौन ठग है और कौन ठगा जा रहा है???
यूं जब दस दिन अख़बार नहीं आया था तो मुझे एक तरह की खुशी हुई थी। रोज़ सुबह ख़बर का एक जत्त्था मेरे घर में ’धम्म..’ से गिर जाता है। जब तक मैं उसे पुराने अख़बारों के ढ़ेर के ऊपर नहीं फैंक देता मुझे लगता है कि एक ज़िम्मेदारी है, ’यह पूरा अख़बार पढ़ने की...’ जिसे मैं रोज़ सिर्फ चित्र देखकर पूरी कर लेता हूँ। मुझे ज़िम्मेदारीयों से बहुत कोफ़्त होती है। किसी भी किस्म की ज़िम्मेदारी। मुझॆ ख़बरों से भी बहुत कोफ़्त होती है। मैं क्या कर लूंगा बहुत सारी समस्याओं को सुनकर सुबह-सुबह?
“सिमोन से मिलने जाना है।“
मैं आजकल अपने पुराने पड़ गए, छूटे हुए कपड़ों को पहनता हूँ। मैं कई सालों से बदला नहीं हूँ सो सालों पुरानी चीज़े वैसी-की-वैसी मुझसे चिपक जाती हैं मानों मैं बस उन्हें छोड़कर शाम को धूमने निकला था... अब मैं घर वापिस आ गया हूँ। यह पुरानी चीज़े मुझसे कोई शिक़ायत नहीं करती हैं... क्योंकि यह सालों से मेरे साथ है... इन्होंने धीरे-धीरे मुझसे अपनी सारी अपेक्षाओं को घिस डाला है। मेरी पुरानी चीज़े मुझे कोई ज़िम्मेदारी नहीं देती। लंबी उपेक्षाओं के बाद कोई सवाल नहीं करतीं। चुप मेरे शरीर से वह चिपक जाती हैं। सफेद शर्ट, जिसपर किसी लाल टी-शर्ट का रंग छूटा हुआ है और फटा-पुराना नीला जींस... उसे पहनकर मैं आईने के सामने खड़ा हुआ... उफ!! शेव कर लेता हूँ... सो मैंने झट-पट शेव कर डाली। हाँ.. अभी ठीक था।
’सिमोन से मिलने जाना है।’.....’सिमोन से मिलने जाना है।’..... ’सिमोन से मिलने जाना है।’
खुद को आईने में देखता हुआ मैं ’सिमोन से मिलने जाना है’ की रट लगाए था....। सिमोन के कई बार फोन करने पर भी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई। वह बुलाती रहीं पर मेरे जाने का साहस ही नहीं हुआ। मैं उनसे मिलने के लिए घर से निकला था... कई बार... पर जब भी घर के बाहर कदम रखा... एकटक भागती-दौड़ती गाड़ियों को.. लोगों को ताकता रहा...। मुझे पता था सिमोन कुछ परेशान हैं.. मेरा उनके पास इस वक़्त जाना भी बहुत ज़रुरी था... पर मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। हाँ... हिम्मत चाहिए दूसरी तरफ जाने में...। मेरा इतनी देर तक खुद को आईने में ताकते रहना एक तरह से हिम्मत बटोरना ही है। सिमोन मेरे जीवन में का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं...। करीब-करीब दस बारह साल से हम एक दूसरे को जानते हैं.... पिछली बार मैं उनसे उनके बयालीसवे जन्मदिन पर मिला था...। हम दोनों ही थे बस उनके घर पर... हमने केक काटा... Wine पी... और देर तक लंबी चुप्पी में... अपने-अपने एकांत में बैठे रहे। सिमोन confession box है मेरे लिए... जहाँ जाकर मुझे बस कुछ देर बैठना होता है... कुछ भी confess करने की ज़रुरत नहीं होती...।
मैंने झटपर घर में ताला लगाया और अपनी शर्ट के तीसरे बटन को देखता हुआ... दूसरी तरफ कूद गया। कुछ देर में मैं सिमोन के घर में.. सिमोन के सामने बैठा था।
उनके बालों के किनारे सफेद हो चले थे। आँखों के नीचे हल्का काला रंग बह निकला था... उसे काला नहीं कत्थई कहा जा सकता है। लंबी गर्दन... तीख़ी नाक़... आँखे किताबों के पन्नों में कुछ अर्थ टटोलती सी...। घर की सूती सफेद साड़ी पहने हुए थी...जिसमें बेंगनी रंग के छोटे फूल बने हुए थे।
’कुछ लिख रहे हो आजकल...?’
किताबों में कुछ टटोलते हुए उन्होंने पूछा।
’नहीं... घर में ही था..।’
’कोई महिला मित्र...?’
मैं खिसिया दिया...
’नहीं.... ना महिला, ना ही मित्र।’
’बहुत समय लगा दिया आने में....’
मैं चुप रहा... उन्होंने भी आगे कुछ नहीं कहा...। मैं क्या कहता कि “पता नहीं किससे डरा हुआ घर में दुबका बैठा हूँ.... कुछ देर के लिए बाहर निकलता हूँ तो घबरा जाता हूँ। लोगों के बीच बैठे हुए उनकी बातें मुझे जिबरिश लगती हैं... एक दूसरे का मनोरंजन करने की थकाने वाली कोशिश.. मुझे बाहर सांस लेने में दिक्कत होती है सो घर में बैठा हूँ... चुप्पी साधे..” क्या मतलब निकलता इन बातों का.. सो मैं चुप ही रहा।
’क्या हम लोग एक दूसरे को इतना भी नहीं जानते कि एक दूसरे के दुख सूंघ सके?”
यह कहकर वह भीतर चली गई। सामने खाली कुर्सी थी... जिसकी लकड़ी पर उनके सालों बैठे रहने के पीले निशान पड़ चुके थे। मुझे उन निशानों को छूना बहुत पसंद था... मैं हल्के से अपनी उंगलिया उस कुर्सी की चिकनी देह पर फेर लेता... और लगता कि किसी की सालों की तपस्या का मैं भी एक छोटा हिस्सा हूँ। सामने टेबल पर तीन किताबें पड़ी हुई थीं... जो आधी पढ़ी हुई, ओंधी पड़ी थी... एक अंग्रेज़ी की और दो हिंदी की। वह कभी भी एक बार में एक किताब नहीं पढ़ती थी। उनमें एक बात को एक बार में ही खत्म करने की धीरता नहीं थी। उनका घर उनकी मन:स्थिति की गवाही दे रहा था। चीज़े बिख़री हुई पड़ी थी। कल रात के खाने के निशान भी टेबल पर मौजूद थे... झाडू कुछ दिनों से नहीं लगी थी।
वह भीतर अपनी कही हुई बात को दफ़्न करने गई हैं...। जब वह उसे पूरी तरह दफ़्न कर देंगी तो एक मुस्कुराहट के साथ बाहर आ जाएगीं... जैसे वह मुझसे अभी-अभी मिली हों। वह मुझसे बहुत नाराज़ थी, पिछले कुछ हफ्तों की व्यस्तता के चलते मैं उनसे बिलकुल भी नहीं मिल पाया था।
’सिमोन... सिमोन...”
मैने उन्हें आवाज़ दी पर भीतर से कोई जवाब नहीं आया। मैं कुछ देर में उठकर टहलने लगा... वह अपना पूरा समय लेगीं मैं जानता हूँ। सुबह, सूरज की रोशनी खिड़की से सीधे उनकी दीवर पर पड़ती थी, फिर धीरे-धीरे रेंगते हुए एक उजले प्रेत की तरह घर छोड़कर चली जाती। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि ’क्या मैं इस रोशनी को अपने घर में रोक सकती हूँ...? घर का दरवाज़ा खिड़की सब बंद करके इसे क़ैद कर लूं? जैसे अपने घर में मैं क़ैद हूँ।’ उनके घर में घुसते ही लगता है कि आप उनके भीतर चले आए हैं। मैं उन्हें उनके घर से अलग करके कभी भी देख नहीं पाता। जब हम कभी बाहर घूमने निकलते थे तो वह एक छोटी बच्ची सी हरकते करने लगती थी... जो अपने माँ-बाप की छत्र-छाया से बहुत दिनों बाद भाग निकला हो। वह बिना अपने घर के नग्न सी जान पड़ती थी। मैंने कभी उन्हें नग्न दिखने वाली बात नहीं बताई...।
’यह देखो आज दार्जलिंग वाली चाय तुम्हारे लिए। मुझे पता था आज तुम ज़रुर आओगे.. सो मैंने कल शाम को तुम्हारे लिए यह चाय लेकर आई।’
इसके पहले मानों कुछ हुआ ही ना हो। हमारी बहस, मेरी लाचारी में झुकी हुई आँखें, उनका गुस्सा... सब कुछ जैसे कई महिनों पुरानी बात हो जिसे हम दोनों ने दफ़्न कर दिया हो। वह दफ़्न करके आ चुकी थी पर मैं अभी भी जल रहा था।
उन्होंने चाय के दोनों कप टेबल पर रखे और खुद अपनी कुर्सी पर बैठ गई... मैं अभी भी टहल रहा था।
’तुम बिस्कुट भी लोगे?’
’ना...।’
मैंने अपना कप उठाया और वापिस टहलने लगा। उन्हें पता था कि मेरे लिए कुछ भी दफ़्न करना इतना आसान नहीं है...। सिमोन अपनी चाय पर सहजता से बैठी रहीं... मेरा टहलना मुझे ही खटकने लगा।
’हमें ऎसा क्यों लगता है कि जो खेल हम खेल नहीं पाए... उसे अगर हम खेल लेते तो आज जीत चुके होते?’
पता नहीं यह बात मेरे मुंह से क्यों निकली...। शायद मैं उनके भीतर टहल रहा था... उनकी गोद में कहीं मेरे पांव पड़ रहे थे.. उनकी बाहों में मेरी ऎड़ियाँ गड़ रही थी सो मैं यह कह गया...। उन्हें यह ना लगे कि उनके गुस्से की वजह से मैं परेशान हूँ। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मैं परेशान हूँ... अपने व्यक्तिगत कारणों की वजह से...। वह अपनी चाय पर बनी रही। मैं कितना भी झूठ क्यों ना कहना चाहू.. पर सिमोन के सामने मेरे मुँह से हमेशा मेरे बहुत निजी सत्य ही निकल रहे होते हैं....। मैं सच में, गए कुछ समय से जीवन के उन खेलों के बारे में सोचता रहा हूँ जिनमें से मैंने बीच में ही कहीं exit ले ली। दुख यह भी है कि वह खेल अभी भी, मेरी गैरमौजूदगी में भी चल रहे हैं.. कहीं....।
’अगर उन खेलों के बारे में ज़्यादा सोचोगे तो मेरे तरह के लेखक बन जाओगे।’
यह कहते ही सिमोन हसने लगी। ज़ोर-ज़ोर से....। मैं अपना टहलना बंद करके उनके सामने आकर बैठ गया। उस हंसी में कमरे की हवा बहुत हल्की हो गई थी। यह सिमोन का घर था, इस घर में सांस लेने के लिए हवा कितनी ठोस हो यह सिमोन ही तय कर सकती थी। इतने सालों के हमारे संबंध में मैं आज भी उंगली रखकर नहीं बता सकता कि यह असली सिमोन है... वह हमेशा अलग होती है। जब मैं शुरु-शुरु के दिनों में सिमोन से मिलने आता था तो ’सिमोन जी’ कहकर उन्हें संबोधित करता था। मुलाकातों की शुरु की जिझक खत्म होते ही उन्होंने मुझे झिड़क दिया... ’जी’ हट गया और हम एक दूसरे के गहरे दोस्त हो गए। ’गहरा’ शब्द भी मैं सिर्फ अपने लिए ही इस्तेमाल कर सकता हूँ...। मेरे एकांत में वह गहरे बैठी है... और उनका एकांत मेरे लिए वह जगह है जहाँ मैं कभी ज़्यादा ठहर नहीं पाया।
’तुम्हें मनोज याद है?’
’हाँ जो मुझे बहुत पसंद नहीं करता था।’
’हाँ वही.... उसका ख़त आया था... पहले मैं इस ख़त को लेकर बहुत हंसी थी फिर मुझे तकलीफ होने लगी...।’
यह कहते ही उन्हेंने एक किताब अपने हाथों में रख ली। उसके कुछ पन्ने पलटे... और एक किसी पन्ने पर आकर वह रुक गई। जैसे कोई बच्चा अपना रटा-रटाया पाठ भूल जाता हो और फिर आगे की बात किताब में टटोलने लगता हो।
’यह कहानीया शायद तुम्हें याद हो...?’
’कौन सी...?’
’जो अभी अभी छपी हैं... जिसपर हमारी बहस हुई थी...।’
’हाँ मैंने कहा था कि यह प्रेम कहानीया है.... और आपने इसे ’मौंन में बात’ जैसा टाईटल दिया था।’
उन्होंने वह किताब मेरे हाथों में थमा दी..। टेबिल-क्लाथ के नीचे से एक ख़त निकाला और मुस्कुराने लगी।
’हम कितना fiction में जीते है? जीना बहुत क्षणिक होता है... कभी-कभी हम किसी आश्चर्य को जी लेते है...। उसके पहले और बाद में हम fiction में ही रहते हैं। तुम मुझे इस वक़्त सुन रहे हो... तुम्हारे हाथों में मेरी कहानियों की किताब है और मेरे हाथों में मनोज का ख़त... यह बात शायद तुम्हारी गढ़ी हुई कहानी हो...इसका मुझसे कोई संबंध ना हो? कई सालों बाद क्या यह घटना तुम्हारे जीए हुए के हिस्से में शामिल हो सकती है?’
यह सवाल नहीं था, मैंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। सिमोन का अंगूठा ख़त के कोने से खेल रहा था। वह कुछ ओर कहना चाहती थीं पर उस बात का दरवाज़ा उन्हें नहीं मिल रहा था... वह इस वक़्त दीवारे टटोल रही थीं।
’मैंने बहुत सघन प्रेम महसूस किया था जब मनोज मेरे साथ रह रहा था। तुम्हें आश्चर्य होगा पर मैं मनोज के साथ बहुत कम रही हूँ। मैंने कहानी गढ़ना शुरु कर दिया था... वह कोई ओर मनोज था जो मेरे साथ रह रहा था। कभी-कभी उस मनोज की शक़्ल इस मनोज से मिल जाया करती थी... आवाज़ भी एक सी थी... पर दोनों की सांस एकदम जुदा। मैं मनोज के होठों के ठीक पास... बहुत देर तक रुकी रहती थी... उसकी आँखें, उसकी गालों की उभरी हड़्डिया ताकती सी... मैं वहाँ रुककर उसकी सांसे चबा रही होती थी।’
उन्होंने ख़त को हलका मरोड़ा..
’...और यह मनोज इन कहानियों को पढ़कर वह मुझसे वापिस मिलना चाहता है। इस ख़त में यही लिखा है। पहले मुझे हंसी आई फिर तकलीफ होने लगी।’
’तकलीफ किस बात की...?’
’हमारे पास शब्द ही तो हैं... शब्दों को एक तरीके से जमाने पर कुछ भाव उत्पन्न होते हैं...। वह भाव किसके हैं? जिसने शब्द कहे है उसके यह जो वह शब्द सुन रहा है उसके?’
यह मेरी बात का जवाब नहीं था। मैं जवाब चाहता भी नहीं था। सिमोन ने धीरे से ख़त फाड़ दिया। ख़त के फटते ही मेरी ख़त में दिलचस्पी बढ़ गई... ठीक-ठीक क्या लिखा होगा उसमें... कौन सी बातें? ख़त फाड़कर उन्होंने उसे अपनी मुठठी में जकड़ लिया... उस ख़त के शब्द अभी भी उनके भीतर रिस रहे थे। मेरी इच्छा हुई कि मैं उस फटे हुए ख़त को उनके हाथों से छीन लूं.. फिर उसका कतरा-कतरा बड़ी तरतीब से जमाऊं....उसका एक-एक शब्द चबा लूं...और फिर वापिस सिमोन के सामने बैठकर यह दृश्य फिर से जीना शुरु कर दूं।
’यह एक बहुत बड़ी प्रदर्शनी है। मेरी बाल्कनी में वही कपड़े सूख रहे हैं जैसा लोग मुझे देखना-सुनना चाहते हैं। मैं भी लगातार उन्हीं कपड़ों को धोती-सुखाती हूँ... जिन कपड़ों में लोग मुझे देखना चाहते हैं। तुम्हें पता है यह हिंसा है... हमारी खुद पर। और इसीलिए शायद हम उन खेलों के बारे में बार-बार सोचते है... जिन्हें खेलना हमने बहुत पहले छोड़ दिया था... जिन्हें अगर खेल लेते तो शायद हम आज जीत जाते।’
सिमोन कुछ देर में उठी और डस्टबिन तलाशती हुई भीतर चली गईं। ख़त डस्टबिन में डालकर वापिस आई और घर की सफाई में लग गई। वह अपने एकांत में जा चुकी थी... मेरी मौजूदगी अब उनके लिए कोई माने नहीं रखती थी... पर मैं वहाँ मौजूद रहा..। इतने दिनों तक ना आ पाने का गिल्ट मेरे बीतर था। मैं उन्हें पूरा वक़्त देना चाहता था कि वह वापिस अपनी कुर्सी पर आ सकें और एक लय में अपनी बात कह सकें...। पर वह नहीं आई...।
कुछ देर मैं एक पेड़ के नीचे रिक्शे का इंतज़ार करता रहा। फिर पैदल घर की ओर चल पड़ा। मैं बहुत जल्दी किसी चीज़ को दफ़्न नहीं कर पाता हूँ... इस मामले में शायद मैं हिंदू हूँ। मैं चीज़ो को जलाना पसंद करता हूँ... पूरे संस्कारों के साथ, उन्हें कंधे पर कई दिनों तक ढ़ोता हूँ.... जलने के बाद उनकी गर्म राख से कई दिनों तक अपने हाथ सेकता रहता हूँ... फिर राख से जली हुई हड़्डीयों को बीनकर उन्हें नदी में सिराने जाता हूँ.. इस सब में कई बार सालों लग जाते हैं।
अधूरी बातों संख्या उम्र के साथ-साथ बढ़ती रहती है। मैं कितनी भी कोशिश क्यों ना करुं बात पूरी तरह पूरी करने की तब भी कहने को बहुत कुछ हमेशा बचा रह जाता है। फिर लगने लगता है कि यह बचा हुआ... कल्पना के संवाद जैसा है.. इस दुनिया के जिए हुए दृश्यों में यह संवाद हो ही नहीं सकते है। इन संवादो की फिर जगह कहाँ है? क्या यह वह सच हैं जिनकी बुनियाद पर हम बाक़ी बातें करते फिरते हैं.... या यह बिल्कुल झूठी बातें है... जिनका संबंध उस दूसरी दुनिया से है जो इस दुनिया का प्रतिबिंब है.. जिसे हम जी रहे हैं... या बात बिलकुल उल्टी है... यह दुनिया प्रतिबिंब है उस दुनिया का जिसकी बातें हम बार-बार कहने से चूक जाते हैं।
मैं किसी रिक्शे के आने का इंतज़ार नहीं कर रहा था...। मैं चल रहा था...। यह सड़क जानी पहचानी थी... हाँ मेरे जीवन का बहुत सा समय यहीं गुज़रा था... मैं अपने घर के सामने खड़ा था... नहीं वह घर नहीं जिसमें मैं रहता हूँ... वह कमरा है...। घर आपका हमेशा वहीं होता है जहाँ आप बड़े होते हैं। यह वह जगह है जिसे मैं अपना घर कहता हूँ... जहाँ अब सिर्फ मेरा बाप अकेले रहता है। मैं कब से इस तरफ नहीं आया। नीला दरवाज़ा सफेद दीवारें....
मुझे मेरे बाप और मेरे देश में बड़ी समानता लगती है। मेरा पूरा बचपन मेरे बाप की महानता में गुज़रा था। वह मेरे पेदा होने के पहले भी था, उसकी किससे कहानियाँ लोरी की तरह सुनते हुए मेरा बचपन बीता.... वह मेरा हीरो था। वह मेरे सारे सवालों का जवाब था। फिर जैसे-जैसे मैंने होश संभाला मुझे लगने लगा कि इस देश ने मेरे साथ धोखा किया है... यह कमज़ोर है... इसका भी पहले कोई बाप था... इसकी भी अपनी बहुत सी कमियाँ हैं। मुझे मेरे देश पर दया आने लगी। जब तक मैं मेरे धोखे की बात लेकर बाप के पास जाता... वह मुझे लेकर चुप हो चुका था। मैं वह नहीं हो पाया जिसका उन्होंने सपना देखा था... मैं वास्तविकता से भागने जैसा कोई आदमी हो चुका था.. जो अपने बाप जैसा दिखता था। वह अभी भी मुझमें अपना सपना ढ़ूढ़ते थे। मेरे जवाबों में जब उन्हें निराशा हाथ लगती तो वह चुप हो जाते। मेरा बाप मेरे देश की तरह था... जो मेरे सारे संवादों पर चुप्पी मारे बैठा था। माँ जब ज़िंदा थी तो हमारे बीच खूब लड़ाईया होती थी... माँ के बहाने से हम आपस में बात भी कर लिया करते थे। पर माँ के चले जाने के बाद अपने बाप के साथ रहना असहनीय हो गया था। सो मैंने उनको अकेला छोड़ दिया। एक किराय का कमरा लेकर रहने लगा।
कुछ देर सांकल बजाने के बाद भीतर से आवाज़ आई।
’अरे भाई कुछ नहीं चाहिए...।’
’पापा मैं हूँ...।’
कुछ देर की शांति के बाद दरवाज़ा खुल गया। बाप बहुत देर मुझे आश्चर्य से देखता रहा। फिर भीतर किचिन की तरफ चला गया। मैं घर में टहलने लगा। घर की एक सुंदर ठंडक है.. जिसकी कमी मैं अपने कमरे में सबसे ज़्यादा महसूस करता हूँ... मंदिरों-चर्च जैसी ठंड़क। शायद घर में बहुत सारा मृत दीवार से चिपके हुए तैरता रहता है... पुराना जीया, बीते हुए लोग और बहुत से रहस्य... जिसका सत्य अब घर अपनी दरारों में छुपाए खड़ा है। मैं पहले अपने कमरे में गया... वह अभी तक वैसा ही जमा हुआ था मानों मैं अभी भी यहाँ रह रहा हूँ। तभी मेरी निग़ाह उस शेल्फ पर पड़ी जिसके पीछे मैं, अपने बाप की मार के डर से, छिप जाया करता था। उस शल्फ के कोने से मैं सबको देख सकता था लेकिम मुझे कोई भी देख नहीं पाता था। एक अजीब सी इच्छा भीतर जाग गई उस शेल्फ के पीछे छिपने की... मैंने अपना बेग़ नीचे रखा और शेल्फ के पीछे घुसने की कोशिश की... मैं अब बड़ा हो गया था। मेरा वहाँ घुसना नामुमकिन था फिर भी मैं कोशिश करता रहा... मैं खीजने सा लगा... और एक अजीब आवाज़ के साथ मेरे आंसू गिरने लगे। मैं अपने आपको अपने बचपन में ज़बरदस्ती घुसाना चाह रहा था।
’क्या कर रहे हो?’
मेरा बाप दरवाज़े पर चाय का प्याला लिए खड़ा था। मैं बाहर निकला। बाप ने चाय के प्याले को टेबल पर रखा और मेरे कपड़े झाड़ने लगा, जिसपर चूना लग गया था। मैं उनसे मना करता रहा पर वह नहीं माने... शायद इससे पहले उन्होंने मुझे मेरी माँ की मृत्यु पर रोते देखा था। मेरा रोना रुक नहीं रहा था सो मैं कुछ देर के लिए बाथरुम चला गया।
हम दोनों चाय की टेबल पर आमने सामने बैठे थे।
’आप चाय नहीं पीएगें?’
’डॉक्टर ने मना किया है।’
’अरे! क्या हुआ है आपको?’
’बुढ़ापा है बिमारियाँ तो अब लगी रहेगीं।’
’बिमारी?’
’शुगर है... जिसकी वजह से परहेज़ करना पड़ रहा है।’
देश की व्यवस्था संभालने वाला एक सरकारी मुलाज़िम मेरा बाप था। सारी व्यवस्था में बेईमानी के बावजूद मेरे बाप को लगता था कि देश चंद ईमानदार लोगों की वजह से चल रहा है, जिसमें वह भी एक है। मेरे लिए देश भागा करता था क्योंकि मुझे लगता था कि मेरा बाप देश का बहुत सारा बोझ अपने कंधो पर लिए भाग रहा है। मेरा देश मेरे सामने बैठा था... बीमार... और मैं कुछ भी नहीं कर सकता था।
तभी मेरी निग़ाह मेरे पिताजी के हाथों पर पड़ी....। वह कितने बूढ़े हो चुके हैं। उनकी चमड़ी लटक गई है। कंधे झुके हुए हैं। वह कोई ओर था जिसे मैं अपना बाप माने बैठा था... मेरा बाप तो मेरे सामने बैठ है जिसे शायद मैं पहली बार देख रहा हूँ। अचानक मुझे उनकी उम्र बहुत ज़्यादा लगने लगी। उनके हाथों के ऊपर उगे हुए बाल भी सफेद हो चुके थे। क्या उम्र होगी इनकी.... मुझे मेरे बाप की उम्र नहीं पता है।
’आपकी उम्र क्या होगी?’
’क्या?’
’कुछ नहीं।’
फिर मैंने कुछ नहीं पूछा। हम दोनों को ही अब मेरी चाय खत्म होने का इंतज़ार था। उनकी निग़ाहे कुछ देर मुझपर रुकी थी जब हम बात कर रहे थे... अब वह दीवारों पर टंगी तस्वीरों को टटोल रही थीं।
’सिमोन कैसी है?’
जैसे किसी तस्वीर को देखकर उनको यह बात याद आई हो।
’ठीक है।’
’अभी भी मिलते हो उससे?’
’उन्हीं के घर से चला आ रहा हूँ।’
इस बात पर मेरा बाप उठकर अपने कमरे में चला गया। मैंने चाय का कप उठा और उसे किचिन में रख दिया। किचिन काफी बिखरा पड़ा था। सो मैं उसे साफ करने लगा। कुछ सुबह के बर्तन पड़े थे वह मांज दिये। जाने से पहले कुछ देर पिताजे के कमरे के बाहर खड़ा रहा.... वह अखबार में अपना सिर गडाए बैठे थे। मैंने सालों से पिताजी के कमरे की चौखट नहीं लांगीं...। मैं जाने को हुआ... तभी उनकी आवाज़ आई...
’मैं अगले महीने बहत्तर का हो जाऊंगा।’

रिक्शा, भीड़, पसीना, डर...
अंत में मैं अपने कमरे में पहुँचा। एक रजिस्टर्ड लेटर पैरों में पड़ा मिला... मेरी स्कालरशिप स्वीकार कर ली गई। तीन साल की रिसर्च पर मुझे विदेश जाने का मौका मिला है, जिसका मैं बहुत लंबे समय से इंतज़ार कर रहा था। तभी दरवाज़े पर आहट हुई... मैंने लेटर को फ्रिज के ऊपर रखा और दरवाज़ा खोला.... सामने सिमोन खड़ी थी।
’तुमसे बात पूरी नहीं हुई तो सोचा तुम्हारे घर आ जाती हूँ, इसी बहाने तुम्हारा घर भी देख लूंगी।’
’आईये... अंदर आ जाईये।’
घर में कोई कुर्सी नहीं थी और ना ही कुर्सी जैसी कोई जगह....। कुछ देर सिमोन बैठने की जगह खोजती रही, फिर कुछ हिचकिचाहट के बाद वह पलंग पर बैठ गईं। यह बहुत अजीब था... मैं जब सिमोन के यहाँ जाता हूँ तो जैसा मेरी उपस्थिति में सिमोन अपने घर में व्यवहार करती है.... मैं उसी व्यवहार की नकल, अपने घर में उसके सामने कर रहा था। मैंने अपने आपको घर के छोटे-छिछले कामों में व्यस्त कर लिया था। वह मेरे शेल्फ में रखी किताबें टटोलने लगी। लगभग किताबें उन्हीं ने मुझे दी थी।
‘कुछ दिनों पहले मैं तुम्हारे पिताजी से मिलने उनके घर गई थी।’
यह बात सुनते ही मेरे सारे छोटे-छिछले काम हाथ से छूट गए। मैं सीधे उन्हें देख रहा था और वह मेरी ओर......।
’मुझे पता था तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा... पर मैंने यह अपनी ख़ातिर किया है। शायद बहुत समय बाद मैंने कुछ अपनी ख़ातिर किया है।’
’पिताजी आपके बारे में अच्छी राय नहीं रखते हैं... उन्हें लगता है कि मेरे घर छोड़ने का कारण आप हैं।’
’उनसे मिलने के बाद मुझे भी लगने लगा कि शायद मैं ही हूँ वह कारण।’
’नहीं कतई नहीं... ।’
वह अपने हाथ में रखी किताब के पन्ने पलटने लगी....
’यह बहुत अच्छी किताब है...।’
’यह तीन साल पहले आप ही ने मुझे दी थी.... सॉरी मैं लौटा नहीं पाया...।’
’इतने सालों में मुझे नहीं लगता है कि तुमने कोई भी किताब मुझे लौटाई है।’
’पर मेरी नीयत थी....’
वह कामू के The Outsider के पन्ने पलट रहीं थीं। किसी एक पन्ने पर देर तक रुकी रहीं.... फिर किताब बंद करके वापिस शेल्फ में रख दी। मुझे उनकी दी हुई किताबें पढ़ने में बहुत मज़ा आता था... क्योंकि उनकी किताबों में उनके पढ़े हुए के निशान, नोट्स हर तरफ गुदे हुए होते थे। मुझे लगता है कि मैंने सिमोन को... किताबों में लगे पेंसिल के निशानों में कहीं पहचाना है। व्यक्तिगत तौर पर हमारे संवाद ABSURD रहे हैं।
’तुम्हारे पिताजी ने मुझसे एक अजीब बात कही थी...’
’क्या?’
’उन्होंने कहा था कि तुमने मेरे जवान बेटे को अपने चंगुल में फसा रखा है।’
’आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए था।’
’मैंने उन्हें कहा कि मैं एक शादि-शुदा औरत हूँ। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कहा कि पर रहती तो अकेली ही होना ना।’
’आपको लेकर मेरे और मेरे बाप के बीच कई बार कहा-सुनी हुई है...’
तभी सिमोन पलंग से उठी और मेरी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। मैं कमरे में ही बना रहा। मुझे सिमोन के ऎसे मौन की आदत है जो बीच संवाद में अचानक चले आते हैं। मुझे हमेशा लगता है कि सिमोन, जिन्हें मैं जानता हूँ वह इन मौन में है.... हमारी बातचीत महज़ वह पगड़्ड़ी है जिसपर चलकर वह उस मौन में बार-बार चली जाती है। उनकी दी हुई किताबों में मैं उन हिस्सों को बार-बार पढ़ता हूँ जिन्हें वह पेंसिल से मार्क करके रखती हैं... वह हिस्से बिलकुल इन मौन जैसे हैं... जो अभी मैं महसूस कर रहा हूँ। मैंने कभी सिमोन को नहीं कहा कि मैं उन पेंसिल से गुदे हुए हिस्सों को उस किताब का मौन कहता हूँ।
’अरे देखो... सामने पेड़ पर किंफिशर आई है।’
बालकनी से सिमोन की आवाज़ आई।
’हाँ वह इस वक़्त रोज़ आती है। मैंने उसका नाम भी रखा है।’
’क्या नाम है?’
’शुभचिंतक...’
सिमोन हंस दी... फिर उसने कई बार उस किंगफिशर को शुभचिंतक नाम से पुकारा....। शुभचिंतक कुछ देर में गर्दन इधर-उधर घुमाकर उड़ गया। हम दोनों बालकनी में खड़े शुभचिंतक का काफी देर तक इंतज़ार करते रहे पर वह नहीं आया।
’मैं सोचती हूँ कि मनोज के पास चली जाऊं।’
’मनोज के पास... बेंग्लौर?...’
’हाँ....’
’यूं... आचानक !!’
’हाँ अचानक, मुझे लगा यही ठीक रहेगा।’
’पर आपने तो उसका ख़त फाड़ दिया था, और आप....’
’मुझे जाना चाहिए. और शायद यह सही भी है।’
’आप कबसे सही काम करने लगी... और सही किसके लिए है?’
’तुम्हारे लिए... मेरे लिए... तुम्हारे पिताजी के लिए... मनोज के लिए...।’
मेरे पिताजी ने एक बार तुनक-कर मुझसे कहा था कि ’उस औरत के चक्कर में रहोगे तो बर्बाद हो जाओगे।’ यूं उनकी कही हुई बातें मुझपर ज़्यादा असर नहीं करती थीं... पर पता नहीं इस वाक़्य में किस अजीब तरीके का सम्मोहन था कि मेरी बहुत कोशिशों के बाद भी मैं इस बर्बाद हो जाने वाले हिस्से को भूल नहीं पाया। यह उस दिन के बाद से कुछ ऎसा मेरे शरीर से चिपका कि मैं इसे अलग नहीं कर पाया। मैं बर्बाद होना चाहता था। मैं चाहता था कि मैं सड़कों पर आ जाऊं... भीख़ मांगता हुआ अपने बाप को दिखूं...। मैंने अपना जॉब छोड़ दिया.. घर से बिना पैसे लिए पूरा शहर पैदल छानता रहता... जब सबकुछ बहुत असह हो जाता तो सिमोन के मौन में छुपकर बैठ जाता। सिमोन खाना खिला देती, मैं चुपचाप बिना किसी प्रतिक्रिया के उनका लिखा हुआ सुनता रहता। मेरे लिखे की प्रतिलिपी मैं सिमोन की टेबल पर जाने से पहले रख देता... बहुत समय बाद वह किसी एक कहानी का ज़िक्र करके कहती की वह बहुत अच्छी थी...। मैं घर जाता और उस कहानी को फाड़ देता। जिन कहानियों का ज़िक्र सिमोन ने कभी नहीं किया वह कहानिया अभी भी मेरी मेज़ की दराज़ में दुबकी पड़ी हैं। इसी बीच कहीं सिमोन ने मेरी कुछ कहानियों का एक संकलन छपवा दिया....। ’मौन में बात’ उसका उसने शीर्षक रखा.... हम बहुत समय तक इस बात पर हंसते रहे कि इस शीर्षक के साथ कौन इन कहानियों को पढ़ने की कोशिश करेगा। पर सिमोन का कहना था कि इससे बहतर उसे कुछ भी नहीं सूझा...। मुझे नहीं पता मैं इन कहानियों के छपने से खुश था या नाखुश...। इन कहानियों में कहानी जैसा कुछ भी नहीं था... ’मौन में बात’ सही शीर्षक था... सारी कहानियां अपनी चुप्पी लिए हुए थी...। अधिकतर कहानिया मेरे और मेरे बाप के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती-फिरती थी।

जो रजिस्टर्ड लेटर मैंने फ्रिज पर रखा था वह मैंने उठाकर सिमोन को दे दिया...। सिमोन ने उसे पढ़ा और मुझे गले लगा लिया, मानो मैं नहीं वह बरसों से इस लेटर का इंतज़ार कर रही हो।

किसी एक समय में बहुत सघनता से महसूस किये गए संबंध का स्वाद अचानक फीक़ा पड़ गया। सिमोन के संबंध में ऎसा ही हुआ। अचानक सब-कुछ फीक़ा सा लगने लगा। उस स्पेस में मुझे लगा मेरी ज़रुरत नहीं है। मैंने बहुत अभिनय की कोशिश की कि उस सघनता को मैं वापिस महसूस करने लगूं पर ऎसा हुआ नहीं। मैं सिमोन के साथ रहते हुए अपने आपको बहुत असहज महसूस करने लगा। सिमोन मनोज के पास नहीं गई और मैं अभी भी विदेश जाने के बारे में सोच ही रहा था। अब जो संबंध अपनी पहले जैसी सघनता लिए हुए था वह था मेरे और मेरे बाप के बीच का संबंध...। मैंने जब अपने बाप को वह लेटर दिखाया तो वह खुश नहीं हुए... ना ही कोई दुख उनके माथे पर उभरा। उन्होंने पूरा लेटर बड़ी तल्लीनता के साथ पड़ा... उसे बड़े ऎतियात के साथ वापिस लिफाफे में रखा और मुझे स-सम्मान वापिस लौटा दिया। ना तो मैंने उनसे कोई प्रश्न किया, ना ही उन्होंने कोई भी प्रतिक्रिया दिखाई। कुछ देर में वह उठकर अपने कमरे में चले गए। शायद इतने सालों में पहली बार मुझे उनपर दया आई थी। वह इस बात से खुश थे कि चलों मैंने कुछ करने के लिए कोई कदम तो उठाया... पर वह मेरे तीन सालों के लिए चले जाने पर बहुत उदास थे...। इतने सालों के हमारे शीत युद्ध के कारण मैं अपने बाप को इतना तो जान गया था कि वह कब धीरे से उठकर अपने कमरे में चले जाते हैं।
कुछ देर में मैं किचिन में गया... वह बहुत ही बिखरा पड़ा था, सिंक बर्तनों से भरा पड़ा था... शायद काम वाली बाई आ नहीं रही होगी.. या मेरे बाप ही उनसे लड़ गया होगा। मैंने पूरा किचिन साफ किया... हम दोनों के लिए चाय बनाई... उनकी चाय में शुगर फ्री डाली और उनके कमरे के दरवाज़े पर, दोनों कप लिए खड़ा हो गया। वह अपनी आराम कुर्सी पर बैठे हुए किसी किताब के पन्ने पलट रह थे। मैंने दरवाज़ा खट-खटाया... उन्होंने तुरंत किताब कोने में रख दी... मैंने (कई सालों बाद..) अपने बाप के कमरे में प्रवेश किया....
’अरे मुझे लगा तुम चले गए हो। चलो बाहर ही बैठते हैं...’
तब तक मैं चाय की ट्रे खिड़की के पास रख चुका था...। वह खड़े हुए और वापिस बैठ गए। हम दोनों अपनी-अपनी चाय पर थे। कुछ देर में उन्होंने वह किताब उठाकर मुझे दी जो वह पढ़ रहे थे। ’मौन में बात’ मैंने शीर्षक पढ़ा... सिमोन ने उन्हें यह किताब दी होगी...। किताब के बीच में कहीं बुकमार्क झांक रहा था...। पहली बार मैंने खुद को अपने बाप के सामने नग्न पाया। मैंने किताब किनारे रख दी। हम दोनों खिड़की से बाहर एक बच्ची को देख रहे थे जिसके पैरों में एक बड़ा सा कागज़ चिपक गया था... वह उसे निकालती तो दूसरे पांव पर चिपक जाता... फिर उसने हाथ से भी निकालने की कोशिश की, वह कागज़ पैर से निकलकर उस बच्ची के हाथ में चिपक गया...। उसे देखते हुए पहले मेरे और मेरे बाप के चहरे पर एक मुस्कुराहट सी आई पर बाद में वह मुस्कुराहट झुंझलाहट में बदल गई। वह कागज़ उस लड़की के शरीर से निकल ही नहीं रहा था.. तो गुस्से में आकर उस लड़की ने उस कागज़ को फाडना शुरु किया... कुछ टुकड़े छूट गए पर कुछ दूसरी जगह चिपक गए... वह उन्हें छुड़ाते-छुड़ाते ख़ीज चुकी थी फिर वह खीज रोने में तबदील हो गई। जब उसने रोना शुरु किया तो वह हार चुकी थी... वह रोते हुए अपने घर की ओर चली गई।
’यह बहुत अच्छा चांस तुम्हें मिला... अच्छा होगा कि तुम विदेश चले जाओ।’
मैं चुप-चाप अपने बाप को देखता रहा जो दूर उस बच्ची के चले जाने के बाद की खाली जगह में कुछ ढूंढ रहे थे।

मेरे घर में पंखा अपनी रफतार पर था। मैं निढ़ाल सा अपने बिस्तर पर पसरा पड़ा था। मेरी छाती पर वह लेटर था जिसमें मेरा भविष्य छिपा हुआ था। मैंने करवट बदली तो मेरी निग़ाह उस रोते हुए चहरे पर पड़ी जिसे मिटाना मैं फिर भूल चुका था। मैं जल्दी से उठा, एक कपड़े में हल्का सा साबुन लगाकर लाया और उस चहरे को ऊपर घिसने लगा। कुछ ही देर में वह चहरा गायब हो चुका था। पर वहाँ मेरी झल्लाहट का एक निशान रह गया था.. जो बहुत ही भद्दा लग रहा था।
जब शुरु-शुरु में मैं सिमोन से मिला था तो प्रेम में पड़ चुका था। पैंतिस साल उस वक़्त उन्होंने अपनी उम्र बताई थी। उनका कहानी संग्रह पढ़ने के बाद मैंने उनसे मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी। जीवन को जिस सहजता से अकेले रहकर जीना उन्हें आता है वह शायद मैं कभी भी नहीं हासिल कर पाऊंगा...। मनोज उन दिनों उनके घर कुछ-कुछ दिनों के लिए आया करता था। वह मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था। क्योंकि उन दिनो सिमोन और मैं काफी समय एक साथ बिताया करते थे। किस कदर मैं उनको छू लेना चाहता था...। जब कभी किताब, चाय का प्याला, पेन देते-लेते वक़्त उनकी उंग्लियों छू जाया करती थीं तो मैं किसी दूसरी दुनिया में पहुच जाया करता था... जहाँ मैं अपनी सारी तकलीफ लिए सिमोन के सिरहाने बैठा हुआ होता और वह अपने जीवन के छोटे बड़े किस्से मुझे सुनाती... पीला और लाल रंग चारो तरफ बिखरा होता... हरे रंग के कुछ छीटे दीवारो-चादरों पर दिखाई देते... कहीं से पानी बहने की आवाज़ आती... हम दोनों ही ठंड में ठिठुर रहे होते पर शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं होता... हल्के पीले रंग वह ओढ़े होती और हल्का लाल रंग मेरे शरीर से बाहर कहीं पड़ा होता।
मनोज के उनके जीवन से चले जाने के काफी समय के बाद तक मेरी इच्छा होती रही कि कभी मैं उन्हें अपने मन की बात बताऊंगा... पर हिम्मत नहीं होती। उन्होंने सही पहचाना था... लगभग मेरी किये हुए सारे कामों में उन्हें इंप्रेस कर देना ही मेरा लक्ष्य हुआ करता था। फिर अचानक क्या हुआ कि संबंध एक अलग ही दिशा में चला गया। मैं बस उस अवस्था में बहता रहा... मैं कभी उनके मौन का हिस्सा था और वह कभी-कभी मेरे मौन में टहल के निकल जाता करती थीं। लाल, पीला और हरा रंग धीरे-धीरे धुंधला पड़ चुका था... कुछ कत्थाई और नीले रंग का संबंध अब बचा हुआ था... जिसे मैं बचाए रखना चाहता था।
कुछ देर में मैंने वह लेटर जिसमें मेरा भविष्य पड़ा हुआ था वह फाड़ दिया....। इसकी वजह सिमोन नहीं थी .. इसकी वजह मेरा बाप था... तीन साल, इस उम्र में उनसे तीन साल दूर रहने की मुझमे हिम्मत नहीं थी। कुछ देर में मैंने काग़ज़ और पेन उठाया और एक कहानी लिखने बैठ गया... शीर्षक दिया.... “सिमोन....”।


Friday, April 8, 2011

निर्मल और मैं....


मैं पहले घर से निकलकर दूसरे घर में आया हूँ।
पर दूसरे घर में जाता हूँ तो खुद को पहले घर के कमरों में बैठा पाता हूँ। पहला घर, जहाँ से मैं आया हूँ....पीछा नहीं छोड़ता है। आँखें जल्दी-जल्दी झपकाता हूँ, सिर को एक दो झटके देता हूँ तो दूसरे घर के रंग नज़र आने लगते हैं। कमरे में तीन खिड़कियाँ है... गहरे रंग के पर्दे हैं। सामने चाय पड़ी हुई है जिसे मैं पहले घर में बैठा हुआ पी रहा था। मैं तुरंत कप उठा लेता हूँ। अभी मैं वापिस दूसरे घर में आ चुका हूँ। चाय का स्वाद जाना पहचाना है। चाय शब्द के दिमाग़ में जाते ही शायद मेरी स्वादेन्द्री... अपने चाय के स्वाद के खजाने से कुछ स्वादों को बाहर निकाल लेती है। चाय का एक घूंट लेते ही मुझे किसी एक स्वाद को चुन लेना होता है। मैंने अपने जीवन में इतने किस्मों की चाय पी है कि मुझमें चाय पीने का अंतर खत्म हो गया है। शायद इस चाय का स्वाद अलग हो लेकिन मैं उस स्वाद को कभी पता ही नहीं कर पाऊंगा..। चाय के स्वाद को लेकर मेरी स्वादेन्द्री सिर्फ कुछ ही option मुझे देती है जिसमें से मुझे किसी एक को चुनना पड़ता है.... और मुझे पता लग जाता है कि मैं चाय पी रहा हूँ। ठीक-ठीक स्वाद मुझे कभी पता नहीं चलेगा।
निर्मल मेरे सामने बैठें हैं। मैं इन्हें सालों से जानता हूँ। मेरी उम्र और इनकी उम्र में बहुत अंतर है। जब जीवन में बहुत सी उठापटक हो जाती है, और वह मेरे संभाले नहीं संभलती तो मैं इनके पास चला आता हूँ। इनके घर की बालकनी को मैं अपना confession box कहता हूँ। अधिक्तर मैंनें अपनी सारी ग्लानी, पीड़ा इन्हें वही कह दी है। जब मैं अपनी पूरी बात कह देता हूँ... तो एक लंबे सन्नाटे के बाद निर्मल कहते हैं...’चलो चाय पीते हैं।’ और मैं ठीक महसूस करने लगता हूँ।
आज वातावरण कुछ दूसरा है। हवा उल्टी बह रही है। आज निर्मल का फोन मुझे आया और बड़ी हिचकिचाई-भर्राई आवाज़ में उन्होने कहा... अगर व्यस्त नहीं हो तो आ जाओ। और मैं आ गया।
मैं- जी कहें..?
निर्मल- क्यों चाय ठीक नहीं है क्या?
मैं- अरे! अच्छी है। मैं पूछ रहा था... सब ठीक तो है ना?
निर्मल- हाँ।
मैं- फोन पर आपकी आवाज़ कुछ ठीक नहीं लग रही थी।
निर्मल- हाँ... मैं सोच रहा था कुछ बदल दूं।
मैं- क्या बदलना चाहते हैं?
निर्मल- बदलने की शुरुआत करना चाह रहा था। बहुत समय से सब कुछ वैसा का वैसा ही लग रहा था।
मैं- तो?
निर्मल- तो क्या?
मैं- तो कुछ बदला?
निर्मल- हाँ शुरुआत घर से की...।
मैं- घर से..?
निर्मल- हाँ... तुम्हें कुछ बदला हुआ नहीं लग रहा है?
मैं- मुझे बहुत बदलाव नज़र तो नहीं आ रहा।
निर्मल- तुम बहुत दिनों बाद आए हो इसीलिए... देखों तुम पहले इस तरफ बैठते थे... वह दीवान यहाँ रखा हुआ था। कुर्सीयाँ सारी मैंने भीतर के कमरे में रख दी हैं।
मैं- हाँ यह कमरा काफी खाली लग रहा है। पर कुर्सीयाँ तो ठीक थीं...।
निर्मल- बहुत सी खाली कुर्सीयाँ दिन भर आँखों के सामने पड़े-पड़े खालीपन को बढ़ा देती हैं। ख़ाली कुर्सीयाँ नहीं होगी तो कोई आएगा की प्रतिक्षा भी मर जाएगी।
मैं- आप किसी का इंतज़ार कर रहे थे क्या?
निर्मल- हम सब किसी ना किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं... हमेशा।
मैं- इस बदलाव के बाद कैसा लग रहा है?
निर्मल- बाहरी बदलाव बहुत ज़रुरी है। बाहरी चीज़ों की परछाईयाँ ही भीतर के अंधेरे में काम करती है।
मैं- उस हिसाब से तो यह बहुत छोटा बदलाव है।
निर्मल- शुरुआत कहीं से करना था।
मैं- तो अभी कैसा लग रहा है।
निर्मल- तुम्हारे आने के पहले तक ठीक लग रहा था।
मैं- अरे!.. मैंने क्या किया?
निर्मल- सोचा था इस बदलाव का तुम्हारे ऊपर भी कुछ असर होगा.. पर तुम्हारे सारे सवाल वहीं है... भले ही दीवान यहाँ होता.. या वहाँ.. चाहे कुर्सीयाँ यहाँ होती या भीतर... तुमपर कुछ असर नहीं होता।
मैं- आप तो नाराज़ हो गए!!!
निर्मल- नाराज़ नहीं... अगर कुर्सीयाँ यहाँ होती तो मैं नाराज़ होता.. पर कुर्सीयाँ भीतर है... इस बात की मुझे खुशी है...। अब भीतर जाना भी अच्छा लगता है.. और यहाँ बैठना भी। तुमने चाय ख़त्म कर ली।
मैं- जी।
निर्मल- चलो मेरे भीतर जाने का समय हो गया।

और मैं वहाँ से चला आया। फिर पहले घर की तरफ... जो मेरा अपना है... जिसे में दूसरे घरों में अपने साथ लिये घूमता हूँ। पहले घर की तरफ चलते-चलते ’बदलाव’ शब्द बुरी तरह भीतर हरकत कर रहा था।

निर्मल और मैं....

मैं पहले घर से निकलकर दूसरे घर में आया हूँ।
पर दूसरे घर में जाता हूँ तो खुद को पहले घर के कमरों में बैठा पाता हूँ। पहला घर, जहाँ से मैं आया हूँ....पीछा नहीं छोड़ता है। आँखें जल्दी-जल्दी झपकाता हूँ, सिर को एक दो झटके देता हूँ तो दूसरे घर के रंग नज़र आने लगते हैं। कमरे में तीन खिड़कियाँ है... गहरे रंग के पर्दे हैं। सामने चाय पड़ी हुई है जिसे मैं पहले घर में बैठा हुआ पी रहा था। मैं तुरंत कप उठा लेता हूँ। अभी मैं वापिस दूसरे घर में आ चुका हूँ। चाय का स्वाद जाना पहचाना है। चाय शब्द के दिमाग़ में जाते ही शायद मेरी स्वादेन्द्री... अपने चाय के स्वाद के खजाने से कुछ स्वादों को बाहर निकाल लेती है। चाय का एक घूंट लेते ही मुझे किसी एक स्वाद को चुन लेना होता है। मैंने अपने जीवन में इतने किस्मों की चाय पी है कि मुझमें चाय पीने का अंतर खत्म हो गया है। शायद इस चाय का स्वाद अलग हो लेकिन मैं उस स्वाद को कभी पता ही नहीं कर पाऊंगा..। चाय के स्वाद को लेकर मेरी स्वादेन्द्री सिर्फ कुछ ही option मुझे देती है जिसमें से मुझे किसी एक को चुनना पड़ता है.... और मुझे पता लग जाता है कि मैं चाय पी रहा हूँ। ठीक-ठीक स्वाद मुझे कभी पता नहीं चलेगा।
निर्मल मेरे सामने बैठें हैं। मैं इन्हें सालों से जानता हूँ। मेरी उम्र और इनकी उम्र में बहुत अंतर है। जब जीवन में बहुत सी उठापटक हो जाती है, और वह मेरे संभाले नहीं संभलती तो मैं इनके पास चला आता हूँ। इनके घर की बालकनी को मैं अपना confession box कहता हूँ। अधिक्तर मैंनें अपनी सारी ग्लानी, पीड़ा इन्हें वही कह दी है। जब मैं अपनी पूरी बात कह देता हूँ... तो एक लंबे सन्नाटे के बाद निर्मल कहते हैं...’चलो चाय पीते हैं।’ और मैं ठीक महसूस करने लगता हूँ।
आज वातावरण कुछ दूसरा है। हवा उल्टी बह रही है। आज निर्मल का फोन मुझे आया और बड़ी हिचकिचाई-भर्राई आवाज़ में उन्होने कहा... अगर व्यस्त नहीं हो तो आ जाओ। और मैं आ गया।
मैं- जी कहें..?
निर्मल- क्यों चाय ठीक नहीं है क्या?
मैं- अरे! अच्छी है। मैं पूछ रहा था... सब ठीक तो है ना?
निर्मल- हाँ।
मैं- फोन पर आपकी आवाज़ कुछ ठीक नहीं लग रही थी।
निर्मल- हाँ... मैं सोच रहा था कुछ बदल दूं।
मैं- क्या बदलना चाहते हैं?
निर्मल- बदलने की शुरुआत करना चाह रहा था। बहुत समय से सब कुछ वैसा का वैसा ही लग रहा था।
मैं- तो?
निर्मल- तो क्या?
मैं- तो कुछ बदला?
निर्मल- हाँ शुरुआत घर से की...।
मैं- घर से..?
निर्मल- हाँ... तुम्हें कुछ बदला हुआ नहीं लग रहा है?
मैं- मुझे बहुत बदलाव नज़र तो नहीं आ रहा।
निर्मल- तुम बहुत दिनों बाद आए हो इसीलिए... देखों तुम पहले इस तरफ बैठते थे... वह दीवान यहाँ रखा हुआ था। कुर्सीयाँ सारी मैंने भीतर के कमरे में रख दी हैं।
मैं- हाँ यह कमरा काफी खाली लग रहा है। पर कुर्सीयाँ तो ठीक थीं...।
निर्मल- बहुत सी खाली कुर्सीयाँ दिन भर आँखों के सामने पड़े-पड़े खालीपन को बढ़ा देती हैं। ख़ाली कुर्सीयाँ नहीं होगी तो कोई आएगा की प्रतिक्षा भी मर जाएगी।
मैं- आप किसी का इंतज़ार कर रहे थे क्या?
निर्मल- हम सब किसी ना किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं... हमेशा।
मैं- इस बदलाव के बाद कैसा लग रहा है?
निर्मल- बाहरी बदलाव बहुत ज़रुरी है। बाहरी चीज़ों की परछाईयाँ ही भीतर के अंधेरे में काम करती है।
मैं- उस हिसाब से तो यह बहुत छोटा बदलाव है।
निर्मल- शुरुआत कहीं से करना था।
मैं- तो अभी कैसा लग रहा है।
निर्मल- तुम्हारे आने के पहले तक ठीक लग रहा था।
मैं- अरे!.. मैंने क्या किया?
निर्मल- सोचा था इस बदलाव का तुम्हारे ऊपर भी कुछ असर होगा.. पर तुम्हारे सारे सवाल वहीं है... भले ही दीवान यहाँ होता.. या वहाँ.. चाहे कुर्सीयाँ यहाँ होती या भीतर... तुमपर कुछ असर नहीं होता।
मैं- आप तो नाराज़ हो गए!!!
निर्मल- नाराज़ नहीं... अगर कुर्सीयाँ यहाँ होती तो मैं नाराज़ होता.. पर कुर्सीयाँ भीतर है... इस बात की मुझे खुशी है...। अब भीतर जाना भी अच्छा लगता है.. और यहाँ बैठना भी। तुमने चाय ख़त्म कर ली।
मैं- जी।
निर्मल- चलो मेरे भीतर जाने का समय हो गया।

और मैं वहाँ से चला आया। फिर पहले घर की तरफ... जो मेरा अपना है... जिसे में दूसरे घरों में अपने साथ लिये घूमता हूँ। पहले घर की तरफ चलते-चलते ’बदलाव’ शब्द बुरी तरह भीतर हरकत कर रहा था।

Wednesday, February 23, 2011

ख़त जैसा कुछ...

किससे कहूं अपने डरों और अंधेरे कोनों की बातें.. इसलिए तुम्हारे पास वापिस आया हूँ, बहुत दिनों के बाद। डरों और अंधेरे कोनों में ‘मुझे कुछ भी नहीं आता’ जैसी बातें छिपि है... कुछ समर्पण हैं... और बहुत से confessions....। इन सारी चीज़ों की एक टीस है जो हर कुछ समय में भीतर उठती रहती है।
अपनी बहुत सी बचकानी इच्छाओं को जबसे थोड़ा गंभीरता से देखना शुरु किया है तो लगता है, ग़लती कर दी... यह वह जगह नहीं है, या यह वह समय नहीं है... यहां इन बातों की किसी को ज़रुरत नहीं है, यह एक तरह से रेगिस्तान में नांव खींचने जैसी बात है। फिर कुछ ही पलों में खुद को खपा देने का.. या... खो जाने का भय नहीं.... मन करता है। दिन में बहुत देर तक अपनी बालकनी से आकाश ताकता रहता हूँ... वहीं कहीं कुछ छुपा है यह रात में लेटे-लेटे सोचता हूँ। सपने, डर नहीं रहस्य लिए हुए आते हैं... सुबह उठकर कभी उस रहस्य में कुछ खोज लेता हूँ या कभी कुछ खो देता हूँ। सुबह चाय बनाना सपने के रहस्य का ही हिस्सा लगता है... लगभग पूरी सुबह रात का स्पर्ष लिए हुए होती है। दिन का रंगीन जाल बहुत देर बाद अपना असर दिखाना शुरु करता है। किताबें देर रात की करवटों की तरह दिन में काम करती हैं। एक किताब पर बहुत देर तक रहा नहीं जाता। फिर बहुत करवटों के बाद किस किताब के किस पन्ने पर बहुत सुंदर नींद आ जाती है पता नहीं चलता। थका हूँ.... घिसट-घिसटकर कहीं पहुंच जाऊं कि वह दिखें... और मैं अपना सारा लिखा बहा सकूं.... और मुक्त हो जाऊं.... चुप-शांति की अग्नि के बगल में स्नान कर सकूं देर तक...। सिर घुटा लूं... कि तिलांजली देकर अपने सरल-सहज पद्चिन्हों को फिर से ढूंढ़ सकूं.... उन पर चल सकूं..। अपनी बचकानी इच्छाओं को गंभीरता से ना देखूं... उनसे उन्हीं की भाषा में खेल सकूं.....।
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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल