Thursday, March 6, 2008

नाटक...

अभी हाल ही में (दिल्ली में) कुछ नाटक देखे।हर नाटक की शुरुआत में मै और आशीष (मेरे मित्र) ये शर्त लगाते हैं कि- इस नाटक के दौरांन कितने मोबाईल बजेगें... अधिकतर शर्त वो ही जीतते हैं..मैं हमेशा एक या दो की संख्या पर रुक जाता हूँ, वो दिल्ली में रहे हैं सो हर बार उनकी दिल्ली के दर्शको की जानकारी, मेरी जानकारी को मात दे देती है।हमने कुछ नाटक देखे जिनमें, मराठी.. अंग्रेज़ी.. हिन्दी, दादी का पपेट थियेटर शामिल थे।
इसमें दर्शकों के बीच में बैठा हुआ, मैं उस नाटक में अपनी भूमिका के बारे में सोच रहा था, महज़ दर्शक की हैसियत से।किस तरह की अपेक्षा कर रहा होता हूँ मैं, नाटक चलने के पहले, नाटक शुरु होने के बाद, नाटक के अंत के ठीक पहले...।वो कौन से एसे क्षण होते हैं.. जिन्हें मैं जी लेता हूँ, जो उस सारे पागलपन के बीच अचानक सत्य जैसा कुछ फ़ैकने लगते हैं।
इसी सब में मुझे वो क्षण सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं, जिसमें नाटक नहीं चलता है, जिसमें वो नाटक अपनी परिधी के बाहर आकर आपसे बात करने लगता है। बात कुछ ऎसी जिसमें मैं एक पांच साल के बच्चे की तरह, अपने खुले मुंह से वो ही बातें देख रहा हूँ, सुन रहा हूँ, जिन्हें मैं खुद भीतर पूरी तरह जानता हूँ।

2 comments:

loverboy said...
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nirupama said...

tumhari her kavitao ko padha.... dil ko choo lene wali... hamesha se tum achaa or bahut achaa likhte aae ho blog main padh kar bahut achaa laga all the best... painting bahut bahut bahut hi acchi hai infact isse kahi jyada..... :-)

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल