Friday, June 12, 2009

उदासी....

       
वह कहानी पढ़ते-पढ़ते रुक गया... बाहर बहुत बारिश हो रही थी। उसने किताब टेबल पर रखी और कमरे में टहलने लगा। अंधेरे में, जब बारिश हो रही हो तो कोई भी शहर कितना अजीब लगता है... वह सोचने लगा। पेड़ों के झुंड़ के बीच से, स्ट्रीट लेंप का पीलापन झांक रहा था.. मानों किसी पेंटर ने काले रंग के ऊपर बहुत सा उदास पीला सा रंग फेंक दिया हो। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसने टहलना बंद कर दिया और कब वह खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया। कुछ ही देर में उसने बारिश को, अंधेरे को देखना भी छोड़ दिया और वह उस कहानी के बारे में सोचने लगा जो वह अभी-अभी पढ़ रहा था। देर रात तक लड़का और लड़की धूमते रहते है... लड़की होस्टल में रहती है... अकेले मिलने की कोई जगह नहीं... सड़को की ख़ाक छानने के अलावा कोई चारा नहीं, इस बीच लड़का कई बार लड़की का हाथ पकड़ता है... लड़की उसे हाथ पड़ने देती है और बीच-बीच में उसे ज़्यादा करीब भी आने देती है...पर चूमने नहीं देती।

कहानी का एक अजीब सा असर... उसपर हुआ था... नहीं उसे कोई लड़की की याद नहीं आई। वह एक किस्म की उदासी से भर गया था। यह उस कहानी की दी हुई उदासी ही थी जो एक अच्छा लेखक आपके ऊपर छोड़ सकता है। उस कहानी में बारिश नहीं थी... पर यहाँ बाहर हो रही बारिश उसे उसी कहानी का हिस्सा लगी। उसे लगा कि अगर वह थोड़ी देर तक खड़ा रहा तो वह कहानी के दोनों पात्र उसे लेंप-पोस्ट के नीचे खड़े दिखेगें...। उसकी खिड़की से दो लेंप-पोस्ट उसे दिख रहे थे...। उसने अपने कमरे की लाईट बंद कर दी... यह सोचकर कि कहीं वह पात्र अगर सही में वहाँ आए तो ’कोई उन्हें देख रहा है’ का उन्हें कोई डर ना हो। खिड़की पर खड़े होते ही उसे हँसी आने लगी... “वह कहानी को ज़्यादा गंभीरता से ले रहा है“ वह सोचने लगा। थोड़ी देर वह वहीं खड़ा रहा... कोई आहट नहीं हुई, बस बारिश अपनी पूरी रफ्तार से गिर रही थी। यह अजीब ही था... कहानी उसके जीवन से किसी भी तरह जुड़ी हुई नहीं थी... ऎसा कुछ भी उसके जीवन में नहीं हुआ था, फिर भी कहानी किस हद्द तक उसके भीतर थी, उसे लग रहा था कि अगर उसने अभी इस कहानी को नहीं पढ़ा होता तो शायद कल इसे वह लिख चुका होता। “क्या वह उस लड़की को जानता है??? या उस जैसी किसी लड़की को???” बहुत देर तक सोचते रहने के बाद भी वह चुप ही रहा। हाँ वह ऎसी किसी लड़की को जानना चाहता है... यह वह अपने भीतर पूरी इंमानदारी से महसूस कर रहा था। उसे इस कहानी से उपजी उदासी की थोड़ी वजह भी समझ में आई.... यह शायद उसके पिछले कुछ खराब संबंधों का ही नतीजा है शायद... पर वह पूरे विश्वास के साथ कुछ भी नहीं कह सकता था। फिर भीतर एक अजीब सी इच्छा कुलबुलाने लगी कि “शायद वह अकेली आए... वह शायद आज रात अकेली धूम रही हो...और वह लड़का कोई और नहीं मैं ही हूँ। जो अपने कमरे से निकलकर उसके साथ पूरी शहर की ख़ाक छाने।“ उसे अच्छा लगा कि उसने वह कहानी पूरी नहीं पढ़ी थी.. अंत अभी बाक़ी था। वह कहानी के आखीर में कहीं था।

अचानक बिजली कड़कने लगी... वह डर गया। बचपन में उसकी माँ से एक ज्योतिष ने कहा था कि “इसकी मौत बिजली के गिरने से होगी।“ बचपन में सुनी हुई बातें हमें अंत तक याद रहती है। उसे मौत का उतना भय नहीं था... पर बचपन में बिजली कड़ते ही उसकी माँ के भागकर आने और उसे अपने पल्लु में छुपा लेने की उसे आदत पड़ी हुई थी। वह बिजली के कड़कने से कभी उस तरह डरा नहीं पर पल्लु में छुप जाने की उसे आदत लगी हुई थी। वह उस कमरे में छुप जाना चाहता था... पर वह नहीं छुपा। उसने सोचा कि वह लाईट चालू कर दे... पर ’कोई उन्हें देख रहा है का भय’ वह उस लड़की को नहीं देना चाहता था। वह पहली बार बिजली के कड़कने के सामने खड़ा था।

तभी एक हलचल हुई... एक आहट सी, बारिश के उस शोर में भी उसने उस आहट को सुन लिया। दो लोग बहुत धीमे कदमों से चलते हुए... लेप-पोस्ट के नीचे से गुज़र रहे थे। उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा... यह वही थे... वही दोनों। वह एक लेंप-पोस्ट के नीचे से गुज़रे...कुछ देर के लिए अधेंरे में कहीं ओझल हुए और फिर अचान दूसरे लेंप-पोस्ट के पास प्रगट हुए और वहीं आकर रुक गए। वह लड़की अकेली नहीं थी- का भी उसे कोई दुख नहीं था... वह उन दोनों को देखकर प्रसन्न हो चुका था। वह दोनों लेंप-पोस्ट के नीचे पानी में भीगते हुए खड़े थे। तभी उस लड़के ने, उस लड़की का हाथ पकड़ा... और उसे अपने पास खींच लिया...लड़की ने कुछ भी नहीं कहाँ... वह शायद हल्की सी शरमाई, पर उसे सब कुछ साफ-साफ नहीं दिख रहा था... इसलिए वह कुछ भी ठीक से नहीं कह सकता था। कुछ ही देर में दोनों एक दूसरे को चूम रहे थे। वह हक्का-बक्का रह गया... कहानी में दोनों ने बस एक दूसरे को छुआ था चूमा नहीं था। वह थोड़ी देर तक दोनों को देखता रहा...दोनों एक दूसरे को लगातार चूमे जा रहे थे। उसने खिड़की का पर्दा लगा दिया... भागकर लाईट चालू की.. और कहानी का अंत पढ़ने लगा........।

5 comments:

ओम आर्य said...

khubsoorat rachana

bhawna said...

ek aur umda lekhan, aapke blog ko shamil karna sarthak raha .

हिमांशु । Himanshu said...

पहली बार आया आपके ब्लॉग पर । ऐसी प्रवहित होने वाली लेखनी से चमत्कृत हुआ । आभार ।

chandni mehta said...

simply beautiful....i think i have something to look forward to when i stare out of my window on a rainy nite!

Vikrant said...

aapke chulbule mann ko aapki ungliyaan swatah hi grahan kar leti hain...while reading i can imagine u at ur window...pyaari rachna

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल