Wednesday, June 17, 2009

निर्मल वर्मा- बुखार


यूं तो मैं निर्मल वर्मा की हर रचना पर कुछ लिखना चाहता हूँ... पर अभी-अभी पढ़ी उनकी कहानी ’बुखार...’ पढ़ी, इच्छा हुई कि यूं ही कुछ इसके बारे में लिखू...।

 इतनी सरलता से यह कहानी खिसकते-खिसकते भीतर ऎसी जगह जाकर बैठ जाती है कि आपको लगता है कि आप कोई बहुत ही खूबसूरत सिनेमा देख रहे हैं जो आप ही की यादों को मिला जुलाकर बना है। बातों की इतनी छोटी-छोटी छवीयाँ बनती है कि वह मिलकर एक गाँव, एक शहर... हनुमान का मंदिर, रेल्वे स्टेशन... सब कुछ बना देती है। आप पेंट और शर्ट पहनकर धूमते हुए निर्मल जी को हर तरफ देख सकते हैं। पूरे चित्र में एक पीलापन दिखाई देता है... उदासी, थकान के परे.. कुछ आपके सपनों सा आलोक लिए। कहानी कुछ ऎसा सपना सा जान पड़ती है जिसे आप खत्म होते नहीं देखना चाहते हो। कहानी का एक हिस्सा पढ़ती ही उसे फिर से पढ़ने की इच्छा भीतर जागती है...। कहानी खत्म होते ही... हाथ खाली दिखते है। क्या था यह??? लगता है कि मेरा ही जिया हुआ कुछ है... बहुत पास का रहस्य। जिसे मैंने अभी-अभी पढ़ा और जिसे किसी को भी बताना बेईमानी होगा।

7 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

निर्मल वर्मा जी का शब्दों का प्रयोग दिल को छूता है। एक कहानी कुछ दिनों पहले पढी थी शायद नाम डाक टिकटें। कैसे एक बच्चे का चित्रण किया था उस कहानी में। सच दिल खुश हो गया। आज पहली बार आपके ब्लोग पर निर्मल जी के कारण हुआ और आकर अच्छा भी लगा। खासकर किताबों की पंक्तियों को पढना।

सुशील कुमार छौक्कर said...

निर्मल वर्मा जी का शब्दों का प्रयोग दिल को छूता है। एक कहानी कुछ दिनों पहले पढी थी शायद नाम डाक टिकटें। कैसे एक बच्चे का चित्रण किया था उस कहानी में। सच दिल खुश हो गया। आज पहली बार आपके ब्लोग पर निर्मल जी के कारण हुआ और आकर अच्छा भी लगा। खासकर किताबों की पंक्तियों को पढना।

Sachi said...

निर्मल वर्मा की प्रसिद्ध रचनाओं में "वे दिन" और उनके अनुवादों में रोमियो जूलियट और अँधेरा बहुत प्रसिद्ध है...
चेक साहित्य को हिंदी में लाने का काम उन्ही का है, पता नहीं ऐसे लेखक के अनुवाद को क्यों नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है.
भारतीय होते हुए भी उनकी कई रचनाओं का परिप्रेक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय रहा है..
अगर संभव हो सके तो आप उनकी रचनाओं को वेब पर लायें, आभारी रहूँगा...

yunus said...

निर्मल वर्मा की रचनाओं को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि जो मज़ा आ रहा है उसे 'प्रोलॉन्‍ग' करने के लिए बचा-बचा कर आहिस्‍ता आहिस्‍ता पढ़ा जाए ।
सर्दियों के गुनगुने दिनों में छत पर लेटकर निर्मल वर्मा को पढ़ने वाले छोटे शहर के वो दिन खूब खूब याद आए ।

ravindra vyas said...

nirmalji nirmal hain!

दीपा पाठक said...

मानव आज बहुत अरसे के बाद यहां आना हो रहा है और आते ही निर्मल वर्मा जी से मुलाकात कर आनंद आ गया। निर्मल वर्मा का लिखा हुआ हमेशा ऐसा लगता है जैसे हमारा सोचा, जीया, भोगा जीवन शब्दों में उतर आया हो। मैं बहुत से लेखकों को बहुत पसंद करती हूं लेकिन निर्मल जी को पढ़ कर जो अनुभूति होती है वो सबसे अलग होती है बिल्कुल निजी।

Swatantra said...

Your blog has taken me into a all together new world!!

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल