Wednesday, June 10, 2009

घर-घर


बचपन में मैं कुछ तकियों और चादरों का मिला कर घर बना लिया करता था... उसमें थोड़ा पानी और खाना आने की एक जगह छोड़ दिया करता था। बहुत समय तक मुझे यह लगता था कि....मैं पूरी ज़िदगी ऎसे ही रह सकता हूँ....माँ चिल्ला-चिल्ला कर कहती कि-’बस बहुत हो गया अब निकल आओ बाहर।’ मैं कहता कि मुझे एक सांकल या घंटी चाहिए अपने घर के लिए। घर छूटे ज़माना हो गया....सांकल की तलाश में एक दिन सांकल मिल गई.... पर तब तक तकियों और चादरों का घर खत्म हो चुका था... सांकल साथ रहती थी जो हमेशा चलते हुए बजने लगती थी। हर खड़-खड़ पर लगता, कि कोई घर में आना चाहता है। जब घर में बहुत समय तक कोई नहीं आया.. तब कोई आया है कि कल्पना शुरु कर दी....। आया, बैठा, खाया-पीया... और चला गया तक की कहानी रच दी.... यहीं, उस सांकल और उस तकियों और चादरों के घर ने ही लिखना शुरु करवाया।

रोज़ मर्रा सा कुछ....


खुला हुआ कुछ नहीं है सामने, एक बंधे हुए से कमरे में बैठा हूँ... बाहर धूमकर आता हूँ... फिर बैठा रहता हूँ... शहर एक अजनबीपन की चादर ओढ़े रहता है... बाहर जाते ही पर्यटक सा महसूस करता हूँ सो भागकर वापिस अपने दड़बे में धुस आता हूँ...बिखरा हुआ सा जीवन सामने पड़ा दिखता है.. इसमें तरतीब या व्यवस्था ढूढ़ना भी धोखा देना सा लगता है...धोखा मैं किसको दे रहा हूँ... पता नहीं...। जो सोचता हूँ उसे लिखने से डर लगता है... जो लिखता हूँ वह दूसरो की कही हुई बातें सी सुनाई देती है।आज बहुत ठंड़ हैजैसी छोटी बातों से अपनी बात कहना चाहता हूँ... और उसी पर रहना चाहता हूँ... बस, बाक़ी सारा बेईमानी सा लगता है... जो महसूस कर रहा हूँ भीतर वह है ठंड़ बस ना उससे ज़्यादा कुछ और ना ही कम... जो महसूस कर रहा हूँ बस उसी पर रहना चाहता हूँ। ठंड़ की कोई कहानी नहीं बनाना चाहता...। जो भी किताबें इस वक़्त पढ़ रहा हूँ उनमें भी यही ढ़ूढ रहा हूँ... ठंड़। ठंड़ महसूस करता हूँ... एक शब्द ठंड़ लिखता हूँ और बाहर निकल जाता हूँ।

दूर एक आदमी चिल्लाता हुआ जाता है... मैं उसे देखकर चुप हो जाता हूँ... भीतर मैं भी चिल्लाना चाहता हूँ...। उसपर लोग हँस रहे है.. सो मैं अपना चिल्लाना स्थगित करता हूँ। एक अंजान लड़की रिक्शे में गुज़र रही होती है... उसे चूम लेने की इच्छा होती है...। बगल में एक चर्च दिखता है वहाँ चला जाता हूँ... प्रेयर हो रही है... यीशू की तक़लीफ और पाप ना करने की कसमों के बीच हँसी आती है... हँसी सुनकर एक बच्चा पास में आता है, मैं che की टीशर्ट पहना हूँ, वह पूछता है यह कौन है...? मैं कहता हूँ... बाप... पापा... यीशू का बाप...। बच्चा चर्च में चिल्लाने लगता है यीशू का बाप..” सभी उसे धूमकर देखते है... उसका बाप आकर बच्चे को मेरे बगल से उठाकर ले जाता है ... कुछ देर बाद में वापिस अपने दड़बे में आकर बैठ जाता हूँ।

Tuesday, June 9, 2009

बेंग्लौर....


 

देर तक रुम में रहा... दिन में लंच करने चला गया। वँहा menu में rabbit लिखा हुआ था... मैंने खरगोश कभी भी किसी menu में नहीं देखा था मैं चौंक गया। मैंने पूछा तो पता लगा कि खरगोश नहीं है...। खाना ठीक था... तभी एक सज्जन मेरे सामने आकर बैठ गए। कन्नड़ थे... मैं मुस्कुरा दिया.. यूं इस तरह किसी अजनबी के साथ खाना खाने की आदत नहीं रही, पर उन्होने मेरी मुस्कुराहट को नज़रअंदाज़ कर दिया। खाना खाते हुए थोड़ी ही देर में, उन सज्जन की उपस्थिति के बावजूद मैं अकेला हो गया, अपने लिखने की प्रक्रिया के बारे में सोचने लगा। मैं कहीं किसी एक जगह पर जाकर क्यों बार बार रुक जाता हूँ। सोचता हूँ orhan pamuk की तरह कहानी को पहले हिस्सों में बांटू, फिर उसे सिलसिलेबार लिखना चालू करुँ। जिससे शायद यह पता हो कि कहाँ शुरुआत है और कहाँ जाना है। इसी तरीक़े की लेखनी मुझे पसंद नहीं आई है कभी... मैं शायद यह कभी भी नहीं कर सकता हूँ। मुझॆ लेखन इसलिए अच्छा लगता है कि वह जीवन के बहुत करीब है, आगे क्या होगा कुछ भी पता नहीं है, नाटक भी इसीलिए अच्छे लगते है, वह भी बिल्कुल जीवन के क़रीब हैं, उन्हें रोज़ जीना पड़ता है... जैसे जीवन चाहे जैसा भी हो आपको रोज़ जीना पड़ता है, ठीक वैसे ही नाटक चाहे आपने कितना भी अच्छा क्यों ना कर लिया हो... आपको उसे हर नए दिन में फिर से करना पड़ता है।

खाना खने के बाद मैं अपने कमरे में आया... कुछ देर llosa पढ़ता रहा... फिर लगा कि नाटक पर थोड़ा काम कर लेना चाहिए...। तेंदुलकर की स्क्रिप्ट (पंछी ऎसे आते हैं...) उठाकर रंग शंकरा थियेटर चल दिया। मेरे होटल के बाहर ही पार्क़ है, दोपहर में जवान जोड़े अलग-अलग बिख़रे हुए... अपने कोनों में दुबके नज़र आते है...। लगभग हर जोड़े में लड़की लड़के की तरफ देख रही होती है और लड़का उसकी आँखों को बचाते हुए... उसके जवाब ढूढ़ रहा होता है। मैं अपनी ग़ली के बाहर निकला... पैदल करीब बीस मिनिट का रास्ता है रंग-शंकरा तक। रास्ते में कुछ कन्नड़ फिल्म के पोस्टर्स दीवारों पर देखने की मेरी आदत पड़ी हुई है... आज एक नई फिल्म का पोस्टर था... पर कह वही बात रहा था... नायक खून में लथपथ.... नाईका चुलबुली सी, जीवन की सारी सुख-सुविधाओं से खुश...। मैं हर बार इन पोस्टर्स को देखकर हँसने लगता हूँ... कि फिर एक अजीब सी पीड़ा भी महसूस करता हूँ... कितना खूबसूरत आर्ट है फिल्म बनाने का... और हम कैसे बच्चों जैसी फिल्में बनाते हैं। आगे कुछ झुग्गीं पड़ती हैं मैंने हमेशा इसमें लोगों को या तो खाना बनाते हुए देखा है या पानी की एक लंबी लाईन में खड़े होते। आगे ही एक मंदिर आता है जो काफी बड़ा है... चौड़ाई में...। उसमें लगातार कुछ ना कुछ काम चलता रहता है...उसे और बड़ा और विशाल बनाने का। मैं हमेशा आश्चर्य करता हूँ... हमारे unknown की तलाश हमें कभी-कभी कितना अंधा बना देती है कि ... हम जीवित लोगों के बारे में कभी कुछ सोचते ही नहीं है... हम निर्जीव में अपना पूरा ध्यान लगाए रहते है... यह स्वर्ग के लिए प्वाईंट्स बटोने की कला मुझे बहुत ही हास्यास्पद लगती है... फिल्मों के पोस्टर सी।

रंग शंकरा पहुँचा... कन्नड़ में तेंदुलकर कर रहा हूँ... लगभग 70% प्ले काट चुका हूँ... कुछ दस-बारह सीन नए लिखे हैं... जय थियेटर का अच्छा लड़का है वह मेरे हिन्दी में लिखे दृश्यों को कन्नड़ में ट्रांस लेट कर रहा है।

      बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं का दुख मेरे पूरे शरीर से छलक रहा है। मैं खुद भी इंतज़ार कर रहा हूँ... किसी का... किसका? यह मेरी समझ के बाहर है। कुछ ही देर में रुम अभिनेताओं से भर गया... सभी लगभग कन्नड़ में बात कर रहे थे। मैं इन कबूतरों में कौवे सा अपनी जगह ढूढं रहा हूँ।

Saturday, May 30, 2009

सतोहल डायरी...


हर बात पर बिखर सा जाने वाला वह पात्र कहीं दूर पहाड़ पर, एक बल्ब सा चमकता दिखाई देता है। शरीर पर बहुत चर्बी चढ़ चुकी है, वज़न शरीर का बैठे-बैठे मिली वस्तुओं के कारण बढ़ता ही गया है। एक आराम दायक़ बिस्तर भी तैयार कर लिया है जिसपर बहुत से कारणों से भरे हुए... नर्म-गर्म तक़िये जमा कर रख्खे हैं। जब भी ’टीस...’ जैसी कोई चीज़ महसूस होती है अपने तक़ियों के भीतर मुँह छुपाकर मैं बहुत देर पड़ा रहता हूँ.. ’टीस...’, ’हिचकी..’ में बदल जाती है... और हिचकी को दूर करने के बहुत से नुस्ख़े मेरे दोस्त मुझे बता चुके हैं। छोटे-छोटे सच जैसे बहुत से चाय के प्याले हाथों से छलकते रहते हैं, बहुत सी मक्खियाँ सच को चाटने अगल-बगल धूमती रहती है। मक्खियों से परेशान हो मैं महिने में एक बार... एक बड़े सच का पोछा लगाकर वापिस पलंग पर बैठ जाता हूँ। पर छोटे-छोटे सच को चाटने वाली मक्खियाँ, अगल-बगल मंड़राती रहती हैं। मक्खियों से परेशान होकर मैं सांप के बारे में सोचना शुरु करता हूँ। जंगलों में कहीं सांप दिख जाते है जैसी बातों के साथ धूमने निकलता हूँ। सांप कहीं नज़र नहीं आता... अलग-अलग पहाड़ पर खड़े होकर मैं, ’हर बात पर बिखर जाने वाले उस पात्र को दूर पहाड़ पर, एक बल्ब-सा चमकता हुआ देखता हूँ।’

Friday, May 29, 2009

सतोहल डायरी... (मंण्ड़ी, हिमाचल)

 

       ’कल यहाँ से चले जाना है..’ की अंगड़ाई लेकर सुबह हुई....। चाय बनाते हुए भी एक खालीपन सा था। कुछ पढ़ते नहीं बना... सो मैंने पैदल जाना तय किया। चाय पीते हुए सेम भी उठ गया था... उसने कहाँ कि वह भी चलना चाहता है। हम दोनों के बीच बहुत देर तक संवाद शून्यता बनी रही। कुछ ही देर मे हम दोनों सड़क पर थे...। चलते हुए दोनों ने एक दो बातों का ज़िक्र छेड़ा पर संवादों का तारतम्य नहीं बना। सो दोनों ने ही शांत रहना ही उचित समझा। ’सतोहल’ हम कल छोड़ देगें। यह बात मेरे दिमाग़ में धूम रही थी... सोचा एक बार सेम से भी पूछ लू क्या वह भी यही सोच रहा है, पर मैं चुप रहा। हमारी इच्छा कुछ एक दो किलोमीटर पैदल चलने की थी... पर पैर रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

       यह शायद किसी जगह से आपके संबंध में ही ऎसा होता है... आप मूक चलते रहते हैं.... धीरे-धीरे बिना कुछ बोले... उस जगह की सुंदरता को निहारते हुए। क्या कर सकते हैं आप??? हम इंसानों को संबंधों पर इतना बात करना आता है... कि किसी भी संबंध का होने और नहीं होने की हम मोटी-मोटी किताबे लिख सकते हैं। पर यहाँ हमारे सारे तार्किक हथियार नाक़ाम सिद्ध होते हैं। कुछ दूर चलते हुए मैंने सेम से कहाँ...’मुझे लोगों के संबंध उतने परेशान नहीं करते जितना जगह से मेरे संबंध।’ मैंने परेशान शब्द इसलिए जोड़ा कि जब किसी संबंध में एक व्यक्ति मूक और तटस्थ हो... तो जो भी चंचल बचता है वह परेशान ही हो रहा होता है। सेम ने इस बात पर एक लकड़ी उठा ली.. और उससे खेलता हुआ आगे-आगे चलने लगा। कुछ देर में उसने कहाँ.. ’मेरी अभी भी बहुत इच्छा नहीं हो रही है वापिस बंबई जाने की...।’ शायद यह उसने मुझसे नहीं इस जगह से कहा था। एक मोड़ मुड़ते ही सतोहल से बड़ा गाँव दिखा.. सेम ने बताया कि यह साईगुली है... हम पाँच किलोमीटर चल चुके थे.. भूख भी ज़ोरो की लग रही थी...। सेम ने कहाँ कि अगर कोटली जाना है तो जो भी बस आएगी हम उसमें चढ़ जाएगें। मैंने हाँ कहाँ...। बस काफी देर तक नहीं आई। हम चलते रहे...।

       हिमाचल, उत्तरांचल से कहीं ज़्यादा खूबसूरत है। यहाँ पेड़ों की विविधता दिखाई देती है जिसके कारण यहाँ को पक्षी दिखाई देते है वह मैंने कभी उत्तरांचल में नहीं देखे। यहाँ पानी और बिजली की उस तरह की समस्या नहीं है। तभी बस आ गई और हम दोनों बस में चढ़ गए। उत्तरांचल में एक बात ज़्यादा अच्छी है कि वहाँ, कोई भी गाड़ी हो हर मोड़ पर वह हार्न ज़रुर बजाती है... पर यहाँ इतने खतरनाक़ मोड़ है पर कोई हार्न ही नहीं बजाता...। हम दोनों ड्राईवर के बग़ल वाली सीट पर बैठे थे.. हर मोड़ पर हम दोनों की आँखे फट जाते थी... पर ड्राईवर हार्न ही ना मारे। मैंने कहाँ कि भाई कल ही एक दुर्घटना हुई है आप मोड़ पर हार्न क्यों नहीं बजाते। तो उसने खिसियाते हुए कहाँ कि हार्न काम ही नहीं करता है। इस बात पर सेम और मैं हँस दिये और मोड़ों  की तरफ से अपना ध्यान हटा लिया...। हम अपने अगले ट्रिप के बारे में बात करने लगे...’केरल-बाईक पर’। हम दोनों को ही यह बहुत ही अच्छा लगता है... एक यात्रा के अंत तक आते-आते अगले यात्रा के बारे में बात करना। हम कोटली पहुँच गए थे... बड़ा बाज़ार था... वहाँ से तीन चार सड़के अगल बगल के गाँव के लिए कटती थी...। यहाँ से हमें खूबसूरत हिमालय भी दिखा। दोनों काफी देर तक उसे देखते रहे। एक दुकान मिली जिसपर लिखा था ’मछली ही मछली’, हम दोनों की आँखें फटी की फटी रह गई...। पिछले  बीस दिनों से नॉनवेज के नाम पर हम अण्डा ही सूत रहे थे। सो हम दोनों ने मछली और मटन पेट फटने की हद तक ठूसा। ज़्यादा खाने का दोनों को गिल्ट आने लगा तो हमने तय किया कि सईगुली तक दोनों पैदल चलेगें। कुछ ही दूर चलने पर पीछे से एक बस आई जो खुद ही हमारे बग़ल में आकर रुक गई। दोनों बिना कुछ बोले उसमें बैठ गए.. वह सतोहल नहीं जा रही थी.. वह सईगुली से किसी दूसरे गाँव मुड़ने वाली थी, सो हमने तय किया कि सईगुली तक जाएगें फिर वहाँ से पैदल। सईगुली पहुचकर मौसम बहुत ही सुंदर हो गया था। ठंड़ी हवा चलने लगी थी... बादल घिर आए थे और सईगुली का बस स्टाप लकड़ीयों से बना, पुराना सा बस स्टाप था, जिसमें अजीब सी ठंड़क थी। हम दोनों बहुत खाने के बाद वहीं पसर गए... करीब एक घंटे के बाद नींद टूटी। दोनों ने एक दूसरे को कोसा... और बस में बैठकर सतोहल आ गए।

       दिन जिस खालीपन से शुरु हुआ था... दोपहर होते-होते वह खालीपन दूर हो गया। हम दोनों आते ही अपने अपने कोनों में पढ़ने बैठ गए। 


 

Sunday, May 24, 2009

सतोहल डायरी... (मंण्ड़ी, हिमाचल)



(करीब बीस दिनों के लिए यहाँ हूँ... जगह सतोहल है.. कुल आबादी ४२१...। कुछ कविताएँ लि्खीं जिन्हें आप ’मेरी कविताएँ..” पर जाकर पढ़ सकते हैं....। कुछ दिनों से लिखीं बातों को चिपका रहा हूँ... बिना कांट छांट... धन्यवाद।:-))

देर रात तक जगता हूँ, सुबह जल्दी उठूगाँ की कसम खाकर सोने की कोशिश करता हूँ। सुबह आँखें खुलती है तो गई रात की बातों के बारे में सोचता रहता हूँ.. एक चक्र पर गोल-गोल घूमते हुए... जब भी छिटककर कहीं दूर गिरता हूँ तो रेंगने लगता हूँ। आत्मविश्वास को अपने काम में ढ़ढ़ने की कोशिश करता हूँ। कसमों का हिसाब कभी भी नहीं रख पाता हूँ... सो जो सबसे पुरानी कसम थी उसे याद करने की कोशिश करता हूँ। बहुत पुरानी चीज़ो को सोचना भी अजीब सुख देता है.... जैसे अभी-अभी घटे ग़म को मैं उतना महत्व नहीं देता हूँ... क्योंकि इसके बारे में मैं कई सालों बाद सोचूगाँ और पीड़ा महसूस करुगाँ। अभी-अभी लिखी हुई कविता भी मुझे ज़्यादा सुख नहीं देती... उस सुख के लिए मुझे बहुत पुरानी लिखी किसी कविता का सहारा लेना पड़ता है। तृप्ती की नींद का सहारा अभी तक पास में है... गहरे अधेरें में सोने की आदत पिछले कुछ समय से डाल ली है... बीच में कभी आँखें खुलती है तो सब तरफ गहरा अंधकार दिखता है तो नींद का खुलना भी सपना ही लगता है और मैं सोया रहता हूँ। कुछ दुख जो मैं बीते दिनों में जिए है उन्हें सोचकर भी डर लगता है... कई सालों बाद जब इन्हें जीने का समय आएगा तो कैसे जी पाऊगाँ इस पीड़ा को...????

      आज बहुत आंधी तूफान और बारिश बनी रही शाम के वक़्त... अच्छा है बहुत ठंड़क आ गई है। इस तूफान में सहसा: उन चिड़ियों का ख्याल हो आया जिन्हें देखते हुए मैं अभी तक आहे भर रहा था। हवा बहुत तेज़ चल रही थी.... कहाँ छिपी होगीं यह चिड़ियाएँ??? पिछले दो दिनों से काफी गर्मी थी... काफी मतलब पहाड़ के हिसाब से गर्मी... बारिश आते ही ठंड़क आ गई है। बहुत सुंदर रात है। इच्छा है कि बस बाहर ही घूमते रहो। वापिस जाने के दिन पास आ रहे हैं.. अकेलेपन की कमी महसूस कर रहा हूँ.. सच में मैं एक चुप और शांत जगह पर खो जाना चाहता हूँ.. बिना किसी काम या कुछ करने की इच्छा का खोना। अपने लिखे के जितने भी चहरे हैं वह बोर करने लगे हैं। नए चहरों की तलाश जीवन में उथल-पुथल लाएगीं... फिर जब पुराने चहरों की तरफ लौटने की इच्छा जागेगी तो वह वहाँ नहीं होगें। गुणा भाग है..... you lose some, you win some... 


यहाँ वहाँ धूमते हुए... भटकते-भटकते... जितने भी लोग मुझे दिखते है.. वह सब मुझे नाटक का हिस्सा लगते है.. पात्र... मेरे नाटको.. कहानियों... कविता या उपन्यास के पात्र...। यहाँ दर्शक की तरह मैं... शांत नहीं रहता... मैं बात करता पाया जाता हूँ, अपने पात्रों से... बात करते हुए भी मैं दर्शक ही रहता हूँ। शांति में चुप, दृश्य का बदलना... पात्र का चले जाना.. प्रवेश करना मैं घंटों देख सकता हूँ। और शायद इसीलिए पीछे के बेकड्राप को बदलने के लिए मैं यहाँ वहाँ भटकता फिरता हूँ।

आज सुबह बहुत जल्दी नींद खुल गई, बिस्तर काटने को दौड़ने लगा। एक अजीब सा खालीपन घर करने लगा। इससे पहले कि खालीपन मेरे ऊपर पूरी तरह हावी हो जाए और मेरा पूरा दिन घेर ले... मैंने बिस्तर छोड़ा और धूमने निकल गया। यह गाँव (सतोहल, मंण्डी) बहुत छोटा... कुछ कदम चलते ही खत्म हो जाता है। गाँव खत्म होते ही चिड़ियों की आवाज़े तज़ हो गई.... दूर कहीं एक मोर भी बोल रहा था। रात भार सांप के सपने आते रहे... सो जंगल में इधर-उधर निगाह सांप को ढूढ़ती रही। इक्का दुक्का घर बीच में आए... लगभग सभी बंद थे। कुछ घरों के सामने... उन घरों की ही उम्र के बूढ़े लोग बैठे हुए थे। वह मुझे, अजीब से आश्चर्य से देखते....और आपकी निग़ाह उनसे मिलते ही वह नज़रे आप पर से हटाते नहीं है... बल्कि कुछ देर में आपको ही अपनी नग़ाहे घुमानी पड़ती हैं... शायद यही गांव के और शहर के लोगों में अंतर है, वह आपको देखते रहते है... बिना किसी.. छल या मतलब के... आपको इसकी आदत नहीं होती और आप नज़रे हटा लेते हैं। पर वह चहरे बहुत देर तक मेरे आँखों के सामने धूमते रहे... मैं पहाड़ के एक छोर पर आकर खड़ा हो गया। नीचे बहुत सुंदर, पाँच घरों का एक गाँव को देखता रहा। कहाँ-कहाँ लोग रहते है.....। यह सब सोचते हुए भी वह चेहरे मेरी आँखों के सामने घूमते रहे। कुछ अजीब सा खालीपन है उनमें.... बहुत शांति की थकान सा कुछ, इतने ऊँचे पहाड़ों के सामने नगण्यता का एहसास लिए कुछ। उन चहरों में, इस पहाड़ में बिताए हर दिन... हर हफ्ते... हर महीने की गवाही देती रेखाएँ थी...। उन रेखाओं का बोझ ढोते बूढ़े लोग... झुके हुए... धीरे-धीरे... बिना आहट सा चलते हुए...। पता नहीं शायद यह मेरा ही सुबह का खालीपन हो जिससे बचने के लिए मैं.. यहाँ आ गया... पर वह खालीपन अभी भी मेरे बदन पर चिपका ही रह गया हो। देर तक चलते रहने से... चाय की इच्छा बढ़ने लगी थी... मैं सुबह-सुबह पैसे रखना भी भूल गया....नहीं चाय नहीं कुछ और था.. जिसने मुझे आगे जाने से रोक लिया... थकान नहीं...पता नहीं क्या??? मैं वापिस चलने लगा। वापिस अपने कमरे में पहुँचा तो खालीपन, पूरे कमरे में बिखरा पड़ा था। शहर की नीरसता से बचने के लिए यहाँ आया... यहाँ के खालीपन से बचने के लिए... सुबह धूमने चला गया... और वहाँ... वहाँ से क्यों वापिस आ गया?... नहीं महज़ चाय कारण नहीं हो सकता.. कारण कुछ और है। कारण शायद वह आँखे है... जिन्हें बहुत देर तक मैं देख नहीं पाया... कारण शायद वह चहरे पर जीवन उतर आया सी रेखाएँ है... कारण मेरी कमज़ोरियाँ है... कारण मेरा भागते रहना है। कारण ... कारण कुछ भी नहीं है।

देर रात तक जगता हूँ, सुबह जल्दी उठूगाँ की कसम खाकर सोने की कोशिश करता हूँ। सुबह आँखें खुलती है तो गई रात की बातों के बारे में सोचता रहता हूँ.. एक चक्र पर गोल-गोल घूमते हुए... जब भी छिटककर कहीं दूर गिरता हूँ तो रेंगने लगता हूँ। आत्मविश्वास को अपने काम में ढ़ढ़ने की कोशिश करता हूँ। कसमों का हिसाब कभी भी नहीं रख पाता हूँ... सो जो सबसे पुरानी कसम थी उसे याद करने की कोशिश करता हूँ। बहुत पुरानी चीज़ो को सोचना भी अजीब सुख देता है.... जैसे अभी-अभी घटे ग़म को मैं उतना महत्व नहीं देता हूँ... क्योंकि इसके बारे में मैं कई सालों बाद सोचूगाँ और पीड़ा महसूस करुगाँ। अभी-अभी लिखी हुई कविता भी मुझे ज़्यादा सुख नहीं देती... उस सुख के लिए मुझे बहुत पुरानी लिखी किसी कविता का सहारा लेना पड़ता है। तृप्ती की नींद का सहारा अभी तक पास में है... गहरे अधेरें में सोने की आदत पिछले कुछ समय से डाल ली है... बीच में कभी आँखें खुलती है तो सब तरफ गहरा अंधकार दिखता है तो नींद का खुलना भी सपना ही लगता है और मैं सोया रहता हूँ। कुछ दुख जो मैं बीते दिनों में जिए है उन्हें सोचकर भी डर लगता है... कई सालों बाद जब इन्हें जीने का समय आएगा तो कैसे जी पाऊगाँ इस पीड़ा को...????

      आज बहुत आंधी तूफान और बारिश बनी रही शाम के वक़्त... अच्छा है बहुत ठंड़क आ गई है। इस तूफान में सहसा: उन चिड़ियों का ख्याल हो आया जिन्हें देखते हुए मैं अभी तक आहे भर रहा था। हवा बहुत तेज़ चल रही थी.... कहाँ छिपी होगीं यह चिड़ियाएँ??? पिछले दो दिनों से काफी गर्मी थी... काफी मतलब पहाड़ के हिसाब से गर्मी... बारिश आते ही ठंड़क आ गई है। बहुत सुंदर रात है। इच्छा है कि बस बाहर ही घूमते रहो। वापिस जाने के दिन पास आ रहे हैं.. अकेलेपन की कमी महसूस कर रहा हूँ.. सच में मैं एक चुप और शांत जगह पर खो जाना चाहता हूँ.. बिना किसी काम या कुछ करने की इच्छा का खोना। अपने लिखे के जितने भी चहरे हैं वह बोर करने लगे हैं। नए चहरों की तलाश जीवन में उथल-पुथल लाएगीं... फिर जब पुराने चहरों की तरफ लौटने की इच्छा जागेगी तो वह वहाँ नहीं होगें। गुणा भाग है..... you lose some, you win some... 

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल