Wednesday, September 7, 2011

प्यास...


क्या इतना सब कुछ लिख सकता हूँ मैं जिस सहजता से आँखे देख लेती है और शरीर अपनी सिहरन में नए अनुभव ठूंस लेता है। आज बुद्ध के एक मंदिर में गया था... (मै पूरी तरह नास्तिक हूँ...)। घने जंगल में के बीच मंदिर का नाम कछुए और ड्रेंगन था। सुंदर घना जंगल पार करके जैसे ही हम उस मंदिर में पहुंचे... उसके रंग ... उस जगह की शांति को मैं अपने भीतर आने से रोक नहीं सका...। हम जो पूरे रस्ते अपने घिसे पिटे अनुभवों को हंस-हंस कर एक दूसरे को बता रहे थें... अचानक शांत हो गए... जो भी बीच में बात करता लगता कि यह आवाज़ यहा की नहीं है... यह आवाज़ यहां नहीं होनी चाहिए... सब चुप थे..। बुद्ध की मूर्ती जहाँ रखी हुई थी मैं वहाँ जाने से पहले थोड़ा हिचक रहा था... सो बाहर ही खड़ा रहा..। जब सब भी तरह हो आए तो सू (एक कोरियन दोस्त...) ने बड़े अपने पन से मुझे भीतर जाने को कहा.. मैंने अपने जूते उतारे और भीतर चला गया। जैसा कि सब लोग.. बुद्ध की मूर्ति के सामने करते हैं मैंने भी वैसा ही सब कुछ दौहराया... पर बीच में ही कहीं... कुछ टूट गया...। कुछ अनकहा... कोई एक गांठ... कुछ बहुत गहरे में दबा हुआ ऊपर को आ गया...। मैं अचानक मुस्कुराने लगा... और दूसरे ही क्षण मेरा गला भर आया...। मेरी आँखें छलकने लगी। कोई मुझे देख रहा है... बहुत करीब से...इसका अहसास मुझे हुआ.. मैंने अपनी आँखें बंद कर ली...। तभी मुझे लगा कि कुछ सुनहरा... जिसकी शक्ल भी थी.... (नहीं बुद्ध नहीं...) बहुत लंबे-लटके हुए सुनहरे कपड़ों समेत मेरे करीब उड़ता हुआ आ रहा था...। मैं पूरी तरह stiff हो गया...। फिर मुझे लगा उस सुनहरी चीज़ ने मुझे अपने गले लगा लिया.... अपने भीतर भीच लिया.... मैं अपने गालों पर उसके नर्म कपड़ों को महसूस कर सकता था..। मुझे लगा यह सब मैं एक कहानी की तरह गढ़ रहा हूँ..... फिर मैं अपने गाल रगड़े उस सुनहरी चीज़ में....। फिर सब कुछ छूटने लगा.... मेरी उंग्लियाँ... ढ़ीली पड़ गई..... मेरे कंधे लटक गए...। मैंने मेरी गर्दन पर एक थाप महसूस की.. फिर कुछ खिचकर अलग होने लगा... बहुत हल्के से...।
मैंने अपनी आँखें खोल दी...। इधर-उधर देखा... सू मेरी तरफ देख रही थी... मुझे लगा शायद उसने सब कुछ देखा है... मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया...। वह चुप मेरी तरफ देखती रही.... मैं उठ गया...।
जब मैं उस मंदिर से निकल रहे थे.. तो मैं बार-बार पलटकर उस मंदिर की तरफ देख रहा था। क्या हुआ था? मैं मुस्कुरा रहा था... लगा किसी बहुत अपने के जी भरकर गले लग कर आया हूँ.....। बाहर जाते हुए मैं सू को यह बताना चाहता था... पर वह अंग्रेज़ी नहीं समझती है.. सो मैं चुप रहा। मैंने बस सू को इशारे से कहा कि प्यास लगी है.. बहुत प्यास... उसने पानी की तरफ इशारा कर दिया... और मैं अपनी प्यास बुझाने उस ओर चल दिया...।

5 comments:

अनुपमा पाठक said...

कुछ अनुभूतियाँ तर्क से परे होती हैं!

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द कम लगने लगते हैं कभी।

jyoti nishant said...

क्या इतना सब कुछ लिख सकता हूँ मैं जिस सहजता से आँखे देख लेती है और शरीर अपनी सिहरन में नए अनुभव ठूंस लेता है। feeling of purity.

Pratibha Katiyar said...

क्यों जरूरी है हर बार कुछ कहा ही जाये..सुन्दर, अद्भुत, खूबसूरत...कितने बेजान हैं ये शब्द.
इन अनुभूतियों को सिर्फ मौन में अभिव्यक्त किया जा सकता है...इसलिए रख रही हूँ मौन का एक टुकड़ा...

The Myth Of Sysphus said...

Brought tears to my eyes and i am just thinking whatbrought this poem to me at this hour :)

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल