Wednesday, September 14, 2011

टीस...


सुबह बहुत सामान्य थी, जब तक उसकी निग़ाह घड़ी पर नहीं गई... उसके मुँह से आह! निकली.. और वह भागा........
वह भाग रहा था... जूतों के लेस खुल चुके थे... पर उसे गिरने का कोई डर नहीं था। वह बीच में धीमा हुआ... सिर्फ कुछ सांस बटोरने के लिए... एक ..दो... तीन... वह फिर भागने लगा। कहीं वह चले ना गए हो? यह बात उसके दिमाग़ में धूम रही थी। उसे उनके चहरे की झुर्रीयाँ दिख रही थी.... वह उसी को देख रहे थे... अचानक वह उनके चहरे की झुर्रीयाँ गिनने लगा। उसने अपने सिर को एक झटका दिया और सब ग़ायब हो गया... मानों सब कुछ ड्स्ट बिन में चला गया हो। दिमाग़ में एक ड्स्ट बिन होता है जिसे आप सिर के एक झटके से भर सकते हैं... पर अगर ड्स्ट बिन भर गया तो उसे कैसे झटका देते हैं?... दिमाग़ के ड्स्ट बिन को कहाँ ख़ाली करते हैं? उसने फिर दिमाग़ को एक झटका दिया... और भागता रहा....
वह दरवाज़े के सामने काफी देर से खड़ा था...। उसका माथा दरवाज़े से सटा हुआ था। वह बीच में एक गहरी सांस छोड़ते हुए अपना माथा धीरे से दरवाज़े पर पटकता और एक ठ्क की आवाज़ आती। उसने अपना दाहिना हाथ घंटी पर रख रखा था। उसके दो माथे की ठ्क के बीच में घंटी की आवाज़ सुनाई दे जाती...यह एक तरह की रिद्यम में यह चलने लगा था, पर बहुत ही धीरे, इतना धीरे कि अगली ठ्क की आवाज़ शायद ना आए...। उसकी आँखें दरवाज़े पर लगे ताले पर थी... काला पड़ चुका ताला...। घंटी की आवाज़ और ठ्क के बीच अचानक एक वाक़्य भी बजने लगा था... “मैं सुबह चला जाऊगाँ...।“ कुछ देर में वह बैठ गया... सोचा स्टेशन जाऊगाँ पर कोई फायदा नहीं है। वह कहाँ से जाएगें इसका कोई पता नहीं था... या शायद वह गए भी नहीं हो.. वह अभी भी यहीं हो आस पास ही कहीं। छुपकर उसका इस तरह पछताना देख रहे हों। वह खड़ा रहा। उसने दरवाज़े पर एक लात मारी और सीड़ीयों से नीचे उतर गया। अचानक वह पलटा और उसने जिस जगह लात मारी थी वहाँ हाथ से दरवाज़ा पोछ दिया... कहीं वह सच में छुपकर देख रहे हो तो?


यह यही तक है... इसकी इतनी ही कहानी है...। कौन छुपकर देख रहा है? कौन दरवाज़े पर है? इसका कोई सिर पैर नहीं है। इसके बाद उसने क्या किया, वह सोची समझी कहानी की तरह मेरे दिमाग़ में चलने लगा... मैं कहानी जीना चाहता हूँ... पहले से ही पता है- वाली कहानी मैं नहीं लिखना चाहता। मैंने लिखना बंद कर दिया। आप चाहे तो पढ़ना बंद कर सकते हैं। अभी यही रुक जाईये। क्योंकि अगर आप कहानी ढ़ूढ़ रहे है तो वह आपके हाथ नहीं आने वाली....। मैं कहानी नहीं कहना चाहता हूँ... ख़ासकर वह कहानी जिसका अंत मुझे पहले से ही पता हो..। मैं उस स्थिति से नहीं गुज़रना चाहता जिसमें मुझे एक अच्छी कहानी कहने का बोझ ढ़ोना पड़े। यहाँ जो भी हो रहा है या होगा... वह कुछ भी नहीं है... ऎसा जो शायद मैं पढ़ना चाह रहा था। शायद मुझे इसे लिखना और आपको इसे पढ़ना बंद कर देना चाहिए....मैं अभी भी आपको थोड़ा वक़्त देता हूँ... और खुद को भी....................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................।
अब हम दोनों ही एक ही स्थिति में है... आप रुके नहीं... आप अभी भी इसे पढ़ रहे हैं.. और मैंने भी लिखना बंद नहीं किया। अब आगे जो भी होगा उसके ज़िम्मेदार हम दोनों हैं। ठीक इस वक़्त आपको भी नहीं पता कि आगे क्या होगा.. और मुझे तो यह अंदाज़ा भी नहीं है कि अगला शब्द क्या होगा...। सो चलते हैं......
राही... मैं हमेशा सोचा करता था कि जब भी मेरी कोई लड़की होगी मैं उसका नाम राही रखुगाँ। राही को मेरे साथ धूमेगी... मेरे साथ रहेगी... मेरी सबसे अच्छी दोस्त बनकर...। वह खुद सब चुने और करे। उसे जानने सीखने की ओछी दुनियाँ से दूर ही रखुगाँ। मुझे जानने सीखने और आगे बढ़ने जैसे शब्दों से सख्त नफरत है। खैर ऎसा होना इस जनम में मुझे संभव अब लगता नहीं है... वह उम्र मेरी निकल चुकी है जिसमें इस तरह के सपनों की जगह था।
अभी इस वक़्त आप भी और मैं भी बार-बार उस आदमी के बारे में सोच रहे हैं जो दरवाज़े पर था.. हे ना...? वह दरवाज़ा पोछने के बाद कहाँ गया होगा..? उसका नाम क्या है...? उसका नाम... अली है। अली नाम अच्छा है मुझे हमेशा छोटे नाम अच्छे लगते है... टाईप करने में आसानी होती है।

वह अली का कमरा था और राही उसके साथ थी.........

अली- मेरे पास आओ।
राही- अली नहीं।
अली- राही.. मेरे पास आओ।
राही- अली मैं तुम्हारी मुँह बोली बहन हूँ।
अली- मुझे पता है, याद दिलाने की तुम्हें ज़रुरत नही हैं।
राही- हाथ छोड़ो।
अली- मुँह बोली हो ना... तो मैं अपने मुँह से बोलता हूँ.. आज से तुम मेरी बहन नहीं हो।
राही- बचपना बंद करो।
अली- प्लीज़।
राही- अली... अली।

राही सलवार सूट पहने थी..। वह बार बार अली के हाथों को अपने शरीर पर से हटा रहे थी। अली ने उसका चहरा अपने हाथों में पकड़ लिया... और शांत खड़ा हो गया। राही ने उसके हाथों को चहरे से नहीं हटाया... दोनों चुप खड़े रहे।
राही- छोड़ो अली।
राही ने बहुत धीरे से कहाँ... अली ने उसकी आखों को चूम लिया। शायद आखों को चूमना सीमा पार करना नहीं था.. सो राही ने उसे रोका नहीं। वह आखों को चूमते हुए उसके गालों को चूमने लगा... गालों से सरकता हुआ होटों के किनारों तक आया... पर होटों को नहीं छुआ। राही का शरीर थोड़ा ढीला पड़ने लगा था... उसने अपनी आखें बंद कर ली थी। गालों पर से अली का एक हाथ हट गया था और वह राही के सूट के भीतर जाने का छोर ढ़ूढ़ने लगा। राही हलके हलके उसके हाथ को रोकती रही... इस जद्दोजहद में दोनों लड़खड़ाए और बिस्तर पर लेट गए। अली का हाथ राही के सूट के भीतर उसकी ब्रा खोलने में लग गया...। वह अभी भी होठों के किनारों को ही चूम रहा था।

राही- अली देखो यह ठीक नहीं है... मैं इसीलिए तुमसे दूर रहती हूँ...। तुम पगला रहे हो... अली मेरी बात सुनो।

अली ने ब्रा खोल दी थी....उसके हाथ राही के वक्ष के इर्द गिर्द घूमने लगे। राही चुप हो गई। राही, अली को चूमने लगी...पर अली राही को होठों पे चूमने के पहले ही अपना चहरा हटा लेता। अली के दोनों हाथ राही के वक्ष के पास थे... पर वह उसके nipples को नहीं छू रहे थे...। राही, अली के हाथों को खीचकर उसके वक्षों पर ले जाती पर अली उसके nipples को नहीं छूता। अली ने धीरे से राही को बिठाया और उसका सूट... एक ही झटके में खींच के उतार दिया। सूट के साथ ब्रा को भी उसने कुर्सी पर रख दिया...। राही... अली से चिपक गई। अली उसे हटाता रह... वह उसके चेहरे को उसके वक्षों के साथ देखना चाहता था... पर राही उससे दूर नहीं हो रही थी। अली ने एक झटके से राही को लिटाया और उसके दोनों हाथों को ज़बरदस्ती उसके सिर के पीछे ख़ीचकर ले गया। राही कुछ देर तक विरोध करती रही, फिर उसने अपना सिर एक तरफ घुमा लिया और अपनी आँखे बंद कर ली। अली उसके वक्ष को उसके चहरे के साथ पहली बार देख रहा था। उसने राही के दोनों हाथों को एक हाथ से जकड़ लिया और दूसरा हाथ उसकी शलवार की तरफ बढ़ाया। राही विरोध में पूरे शरीर को मरोड़ती रही पर अली की पकड़ मज़बूत थी वह उससे छूट नहीं पाई। अली शलवार के नाड़ का ओर-छोर ढूढ़ने लगा। छोर अचानक उसके हाथ में आ गया। राही के मुँह से चीख निकली.... अली ने नाड़े का छोर खींच लिया। तभी दरवाज़े पर एक खट हुई और आली की पकड़ ढीली पड़ गई।



हर संबंध एक छोर पर आकर आत्महत्या की जगह खोज रहा होता है। वह आत्महत्या करे या ना करे की उहापोह में वह संबंध ज़िदा रहता है.... किसी भी तरह का नर्णय उस संबंध की हत्या है।

बाहर दरवाज़े पर खट की आवाज़ किसकी थी यह कहना मुश्किल था...। उसे लगा नरेद्र होगा... वह राही और राही उसको बहुत पसंद करते थे। शायद नरेद्र को पता हो कि आज राही अली से मिलने आ रही है? .. पता नहीं....

थोड़ी सी संरचना जो मुझे अभी दिख रही है........
जिस बूढ़े आदमी से मिलने अली भाग रहा था और अंत में उसने दरवाज़े पर ताला पाया....। उस बूढ़े आदमी का नाम..... हम्म्म्म्म.... कमल है...। हाँ.. कमल.... पूरी ज़िदगी लिखा... ढ़लती उम्र में शादी की... करीब पचपन-साठ के बीच में बीबी अपने बच्चे के साथ उन्हें छोड़कर चली गई। उनका बेटा (आयुश) और अली दोस्त थे..। नशे की बुरी आदत पड़ गई थी... बेटे के सामने अच्छे बाप की भूमिका निभाने के चक्कर में हमेशा गड़बड़ हो जाती... बेटा बाप से नाराज़ रहता...। पुराने लिखे की जो भी रॉयल्टी आती थी उससे उनका घर चलता था। उनके बेटे... आयुश के साथ अली कई बार कमल से मिला था... अपने कॉलेज के दिनों में...। आयुश वह आदमी कमल में नहीं देख पाया जो अली ने देख लिया.... सो अली अदतन उनसे मिलने लगा...। अली खुद कुछ नहीं करता था.. उसे लगता था कि वह लेखक है.. पर लिखते ही.. उसे पेंटिग करने की इच्छा होती.. उसे धूमना पसंद था... सो वह उसकी जुगाड़ में हमेशा लगा रहता था।

एक दिन पहले की रात... अलि और कमल... कमल के घर....

कमल सामने थे। उसकी आखें कहीं अनंत को छूने में दूर कुछ टटोल रही थी। खिड़की से हल्की सी रोशनी भीतर आ रही थी। बाक़ी कमरे में अंधेरा था। ’लाईट मत आन करो…’ अली के भीतर आते ही उनका यह पहला वाक्य था उसके बाद से अभी तक सब चुप था। अली उनके करीब जाकर बैठ गया.. सस्ती शराब की बदबू उनके मुँह से आ रही थी। अली कई घंटे.. ऎसे ही उनके सामने बैठ सकता था… स्थिर.. शायद इसीलिए अली अभी तक उनके जीवन का हिस्सा है… अली के अलावा उनसे कोई दूसरा मिलने नहीं आता था। अयुश कभी-कभी आता था... कमल अयुश का इंतज़ार करते थे.. पर उससे मिलना पसंद नहीं करते थे। कमल कभी-कभी किसी से मिलने जाते थे… पर किससे यह किसी को पता नहीं था...। अगर अली कभी पूछता तो कहते कि-’दोस्त के यहाँ जा रहा हूँ…’ किस दोस्त के यहाँ? यह पूछने की हिम्मत अली में नहीं थी। अली पिछले कुछ महीनों से बाहर था... कुछ विदेशी लोगों को लेकर एक ग्लेशियर के ट्रिप पर... सो कमल से नहीं मिल पाया था... कमल ऎसे वक़्त हमेशा नाराज़ हो जाते..… ’कहाँ थे..??? कोई ख़बर नहीं है, कम से कम बताया तो करो कि तुम नहीं आ रहे हो?’ अली ऎसे कुछ क्षणों में खुद को उनके करीब महसूस करता.. पर अगर अली बताता कि मैं एक महिने के लिए बाहर जा रहा हूँ... तो भी कमल नाराज़ हो जाते... ’तो मैं क्या करुं... जाओ.. तुम्हारी उम्र है.. धूमों.. मुझ बूढ़े के साथ तो बस तुम अपना समय बरबाद कर रहे हो...।’ सो अली कभी बताता कभी नहीं बताता...
अली बिना ज़्यादा आवाज़ किये उठा…. टटोलते-टटोलते पानी का मटका की तरफ बढ़ा… मटका नहीं मिला… ’कहीं मटका भी तो नहीं फेंक दिया’ अली ने सोचा.... फिर एक बुरी आवाज़ हुई… मटके के ऊपर रखा पानी का गिलास गिर पड़ा अली से गिर पड़ा... अली वहीं ठिठक कर खड़ा रहा… धीरे से पलटकर उनकी तरफ देखा तो वह अभी भी खिड़की के बाहर कुछ तलाश रहे थे। वह झुका और गिलास टटोलने लगा.. गिलास हाथ में आते ही उसने पानी निकालना चाहा… ’खड़र.र्र.. खड़र..र्र..’ आवाज़ हुई… मटका खाली था। वह खिड़की की रोशनी के सहारे वापिस आकर अपनी जगह बैठ गया…। वह गिलास को वापिस रखना भूल गया.. गिलास उसके हाथ में ही था…। तभी पहली बार कमल उसकी तरफ मुड़े.. फिर उनकी निग़ाह गिलास पर गई।
’पानी नहीं है….....’
अली बस इतना ही कहना चाह रहा था… पर वाक्य कुछ इस तरह निकला कि पूरा नहीं हो पाया… लगा इसके आगे भी कुछ कह सकने की गुंजाईश है… अली झटके से चुप हो गया।
’यहाँ पानी नहीं है… यहाँ क्यों आते हो???’ कमल ने कहा...
घर में सस्ती दारु की महक थी। खिड़की का पर्दा शायद कमल के एकटक बाहर देखने की वजह से एकदम स्थिर था... । कमरे में गर्मी थी.... उनके भीतर के कमरे से संगीत की आवाज़ आ रही थी.. piano …
’बहुत प्यास नहीं है मुझे...’ अली ने कहा...
फिर उसने गिलास को नीचे रख दिया...।
’सिगरेट है...?’ कमल ने पूछा..
अली ने अपनी जेब से सिगरेट निकालकर दी... पहले कश के साथ ही कमल ने फिर वही वाक्य दौहराया..
’यहाँ क्यों आते हो...?’
’अच्छा लगता है..।’
अली की सिगरेट पीने की इच्छा थी पर उसने जल्दबाज़ी में पेकट अपनी जेब में रख लिया.. फिर वापिस निकालना उसे ठीक नहीं लगा सो उसने उसे वहीं पड़ा रहने दिया...
’आज मैने बहुत दिनों बाद कुछ लिखा....’ कमल ने कहा..
’अरे वाह...’
’तुम्हारे बारे में....’
’मेरे बारे में...?’
’तुम्हे बुरा तो नहीं लगेगा कि मैं तुम्हें कहानी के एक पात्र की तरह देख रहा हूँ....’
’नहीं... बल्कि....’
’मेरे सारे निजी संबंधों की झलक मेरी कहानियों में है.. और उन्हें यह बात कभी अच्छी नहीं लगी....।’
’मुझे कोई तक़लीफ नहीं है....।’ अली ने अपनी बात साफ-साफ कह दी...
’यह तुम्हारे और राही के बारे में है....।’
’राही????’
अली को यह कुछ अजीब लगा....। अली ने अगर अपने जीवन में कमल से कुछ भी नहीं छुपाया था... ख़ासकर उसके गहन निजी संबंध... वह सब कुछ खोलकर बता देता था.. और कमल चुप सब कुछ सुन लेते थे.. कभी किसी निर्णय पर नहीं पहुंचते थे.. उसे जज नहीं करते थे..। पर राही के बार में लिखना... उसे अजीब लग...
’क्यों तुम्हें ठीक नहीं लगा...?’
’क्या मैं पढ़ सकता हूँ....?’
’क्यों नहीं..’
कमल उठे और उन्होंने कुछ पन्ने लाकर अली के हाथ में थमा दिये...।
’दारु पियोगे...?’
’ना....’
’शायद इसे पढ़ने के बाद अपने विचार बदल दो....!!!’
यह कहकर कमल किचिन में चले गए...। अली पढ़ने लगा.. पर बहुत अंधेरा है...
’मैं लाईट आन कर लूं...?’
’नहीं खिड़की के करीब चले जाओ... पढ़ पाओगे।’
अली अपनी कुर्सी खिड़की से आती हुई रोशनी की तरफ खिसका लेता है। कुछ वाक्य पढ़्ने पर ही वह सिगरेट निकालकर जला लेता है....। वह पूरा नहीं पढ़ पाया... बाक़ी सारे पन्ने उठाकर वह पलंग पर पटक देता है..। बाथरुम से फ्लश की आवाज़ आती है.... बाथरुम का दरवाज़ा खुलता है.. बल्ब की रोशनी पूरे कमरे में फैल जाती है....। उस ज़रा से उजाले की घड़ी में अली कमरे में चारों तरफ निग़ाह डालता है.. कमरा एकदम खाली है.. जैसे वहाँ अब कोई नहीं रहता हो... बस एक सूटकेस दिखता है... और उसके बगल में एक बेग़...। बाथरुम का दरवाज़ा बंद होती ही फिर अंधेरा हो जाता है.. पर इस बार पहले से थोड़ा गाढ़ा अंधेरा। कमल किचिन में ही खड़े थे... अली ने किचिन की तरफ देखा...
’मेरे लिए एक पग पना दीजिए...’
कुछ देर में कमल और अली अपने-अपने पेग के साथ आमने-सामने बैठे थे।
’यह ठीक नहीं है... आप... राही को इसमें मत लिखिए..।’
’क्यों..? यह fiction है।’
’पर आपने तो नाम भी नहीं बदले...।’
’उससे कितना फर्क पड़ जाएगा...?’
’मुझे नहीं पता... आप बस नाम बदल दीजिए..।’
’देखो मैंने इतने सालों से नहीं लिखा है... उसकी वजह है... हर कहानी कुछ समय में नाटकीय लगने लगती है। पात्रों से ज़्यादा वह लोग दिखने लगते हैं जो इसे पढ़ेगें...। एक पूरा झूठा संसार... जिसमें छिछला मनोरंजन.. एक ससपेंस भरा अंत... गढ़ने के लिए... दिन रात एक कर दो.. ना मैं नहीं लिख सकता यह सब...।’
’तो यह जो लिखा है वह क्या है...? एक erotic B-Grade साहित्य...जिसका मुख्य पात्र मैं हूँ।’
’यह तुम नहीं हो...?’
’यह मैं नहीं हूँ?... तो यह कौन है?’
’अगर तुम इस कहानी के अली होते तो मेरी बात का जवाब सही देते?’
’कौन सी बात का....?’
’जो मैंने तुमसे पूछा था।’
’क्या पूछा था?’
’जब पानी नहीं है तो यहाँ क्यों आत्ते हो?’
’यह सब क्या है.... यह.... सब.....।’
’मैं कहानी के इसी वाक़्य पर अटका हूँ.. कि अली इस बात का क्या जवाब देगा?’
’enough!!!’
अली एक झटके में पूरा ड्रिंक खत्म कर देता है। कमल उसका गिलास उठाते हैं और एक किनारे रख देते हैं... फिर वह पानी वाला गिलास भी मटके में जाकर रख देते हैं। अली अपनी कुर्सी से उठता है और लाईट बोर्ड की तरफ बढ़ता है....
’मैं लाईट आन कर रहा हूँ।’
’लाईट आन मत करो....’
’मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है... मुझे अजीब लग रहा है.. मैं लाईट आन करता हूँ....।’
’नहीं... कहानी में भी इस वक़्त अंधेरा है... सिर्फ रोशनी खिड़की से आ रही है.... बस... लाईट आन नहीं होगी।’
अली वापिस आकर बैठ जाता है।
’मुझे एक पेग और चाहिए.... ’
कमल मटके के पास खड़े हैं..जवाब नहीं देते...।
’मिलेगा?’
’मैं दे दूंगा... देशी है... आगे जो होगा उसके ज़िम्मेदार तुम खुद होगे...?’
’अब आगे और क्या होने वाला है..!!!’
’कुछ नहीं...’
कमल अंदर जाते हैं.. और एक पेग बनाकर अली के लिए लाते हैं... पर खुद नहीं पीते..।
’आप नहीं लेंगे...।’
’अभी नहीं.....’
अली एक बार में आधा पेग खत्म कर देता है। गिलास नीचे रखता है। मुँह पोछता है... उसे ज़ोर का एक ठसका का जाता है.. कुछ देर खांसता है...।
’पानी नहीं है.....’
’मुझे नहीं चाहिए पानी....’
खांसी कुछ देर में बंद हो जाती है...। अली कुछ देर शांत रहता है...। फिर पलंग से बाक़ी पन्ने उठाता है.... उन्हें अपने पास रखता है...।
’राही सच में मेरी मुँह बोली बहन है....। मैंने आपसे यह सब एक अच्छे दोस्त की हेसियत से कहा था...’
’पर दोस्त लेखक निकला...’
’यह बेईमानी है...’
’बेईमानी है झूठा लिखना... यह ईमानदारी है.. ’
’ईमानदारी कैसे हुई.. ऎसा कुछ कभी हुआ ही नहीं था...’
’मैं तुम्हारी आत्मकथा नहीं लिख रहा हूँ... यह काल्पनिक कहानी है... बस’
अली को सवालों के बहुत से उबाल आ रहे थे.... पर वह चुप हो गया.। उसने अपन सिर पन्नों में गड़ा दिया...।
’आप सामने से हटेगें...?’
अली कमल से कहता है.. कमल समझ नहीं पाते हैं...।
’एक मात्र रोशनी जो खड़की से आ रही है आप उसे भी रोक रहे हैं...।’
कमल धीरे से उठकर पलंग पर बैठ जाते हैं...।

यहाँ यह अजीब सा नाटकीय दृश्य खत्म होता है। ओह!.... आप कहानी पढ़ रहे हैं... जबकि आप कहानी नुमा कुछ पढ़ रहे हैं... मैं कहानी नहीं लिखना चाहता हूँ... पर कहानी जैसी ही कोई चीज़ सुनाई दे रही है। ओह!!! क्या यह वैसा ही नहीं है जैसे हम अपने बाथरुम में बैठते थे.. तो गीली दीवारों में हमें चहरे दिखाई देते थे.. जबकि वहाँ कोई चहरा नहीं होता था... पर हम चहरा देख लेते थे। हमें कोई एक घांस का तिनका भी देगा तो उसमें भी हमे सीता की कहानी याद है रावण के खिलाफ लड़ाई की...। हमने इतनी कहानिया पढ़ी और सुनी है कि हमने कोई भी चीज़ ऎसी नहीं छोड़ी है जिसकी कोई कहानी नहीं हो...। पर आप कहानी नहीं पढ़ रहे हैं... और मैं कहानी नहीं लिख रहा हूँ... हम यह बात याद रखेंगें.... अब आगे बढ़ते हैं....

मुझे नरेन्द्र दिखा दरवाज़ा खटखटाता हुआ....। नरेन्द्र अली का दोस्त है... और उसका संबंध राही से है..। उसे लगता है कि अली में कुछ बात है.. वह या तो लेखक बनेगा या बड़ा पेंटर... सो वह अली का दोस्त होते हुए उसका सम्मान भी करता है। उसे लगता है कि वह अली का दोस्त है.. और उसकी मदद कर रहा है। नरेन्द्र बड़ी कंपनी में काम करता है.. हंसे-मज़ाक से भरपूर आदमी है.. राही उसे बहुत पसंद करती है। दोनों की जोड़ी अली को भी पसंद है.... जब तीनों साथ होते हैं तो अली अच्छे दोस्त, और अच्छे भाई की भूमिका में दोनों ट्रीट करता है।

राही ने तुरंत नाड़ा बांधा और अपनी ब्रा की तरफ लपकी...।
’कौन?’
’अरे अली मैं नरेन्द्र...’
अली ने एक बार राही की तरफ देखा...। राही ने अपना कुर्ता पहन लिया था पर ब्रा नहीं पहन पाई थी.. सो उसने अपनी ब्रा बिस्तर के नीचे छिपा दी और चुनरी ओढ़ ली.....। अली ने दरवाज़ा खोला...
’अबे फिर सो रहा था.. इतनी देर लग गई दरवाज़ा खोलने में......?’
नरेन्द्र शक्कर और अंड़े लाया था। वह सीधा किचिन में जाना चाह रहा था तभी उसकी निग़ाह राही पर पड़ी। वह बीच में ही रुक गया।
’अरे तुम यहा हो...?’
राही उठकर खड़ी हो गई...।
’ऎसे ही... मैं इसे कुछ पढ़कर सुना रहा था।’
अली ने कहा...। नरेन्द्र ने राही को ऊपर से नीचे तक देखा...राही के बाल बिख़रे हुए थे। राही को कुछ समझ में नहीं आया... तो वह नरेन्द्र से अंड़े और शक्कर लेकर किचिन में चली गई।
’मुझे बहुत भूख लग रही है... थेक्यु तुम यह सब ले आए... अली तो मुझे भूखा मार देता...।’
नरेन्द्र पहले बिस्तर की तरफ गया.. फिर वह कुर्सी पर जाकर बैठ गया।
’तो क्या सुना रहा था...तेरी डायरी तो है नहीं यहा?’
नरेन्द्र ने कहा...
’नहीं एक आईडिया सुना रहा था.. नई कहानी का....’
’तुम्हें यह नया आईडिया पसंद आया राही?’
नरेन्द्र ने ऊंची आवाज़ में राही से पूछा....।
’ठीक है...’
अली पलंग पर बैठ गया....। दोनों चुप रहे...
’तुम कुछ खाओगे नरेन्द्र?’
राही ने पूछा..
’नहीं.. मैं तो इस कुत्ते के लिए लाया था।’
कुत्ता कहन में इतना ज़्यादा कड़वापन था... कि अली असहज हो गया। वह उठकर बाथरुम चला गया। राही अपने लिए आमलेट और चाय बनाकर लाई और नरेन्द्र के पास आकर बैठ गई। राही भूखी नहीं थी... उसे आमलेट खाने की इच्छा भी नहीं थी..। वह हर आमलेट का कोर चाय के साथ निगल रही थी।
’तुम्हें खाने की ज़रुरत नहीं है अगर तुम्हें भूख नहीं लग रही है..।’ नरेन्द्र ने कहा..
’अरे मैं भूखी हूँ।’ राही ने जवाब दिया..
’मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था.. हे ना?’
’अरे ऎसा क्यों बोल रहे हो?’
’खेर मुझे कहीं जाना है... शाम को मिलते हैं...।’
’अरे .. तुम ऎसे कैसे जा रहे हो... रुको मैं भी चलती हूँ तुम्हारे साथ...।’
’नहीं.. तुम रुको... मैं जाता हूँ।’
राही ने नरेन्द्र को रोकने की कोशिश की पर वह नहीं रुका। राही ने बचे हुए आमलेट को वापिस किचिन में रख दिया। अली बाथरुम से बाहर निकला उसे नरेन्द्र नहीं दिखा..
’अरे कहाँ गया....?’
’उसे शक़ हो गया है?’
’अरे... ऎसा कुछ नहीं है..।’
’नहीं उसे शक हो गया है।’
’उसने कुछ कहा तुमसे?’
’नहीं पर मैं उसे जानती हूँ...।’
अली ने जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया...। वापिस आकर उसने राही को पकड़ लिया...।
’अली नहीं... रुको.. यह ठीक नहीं है...।’
पर अली नहीं रुका... उसने राही का कुर्ता उतार दिया..। राही बहुत देर तक उसे मना करती रही... पर वह नहीं माना..। अली ने राही की शलवार के अंदर हाथ डाल दिया... राही... अली को चूमने लगी..। अली ने राही की शलवार उतार दी.... पर राही ने पूरी तरह नग्न होने से मना कर दिया..। वह इसके आगे नहीं जाना चाहती थी। अली बहुत कोशिश करता रहा.. पर राही नहीं मानी...। अंत में अली ने राही को अलग कर दिया...। दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे... फिर राही ने अली को गले लगा लिया...।
’तुम मुझसे प्रेम नहीं करते हो... तुम किसी से बदला ले रहे हो और उसके लिए तुम मेरा इस्तेमाल करना चाहते हो।’
’नहीं ऎसा नहीं है...।’
’मैं तुम्हें जानती हूँ अली... तुम बहुत कमज़ोर हो...। और यह तुम्हारी कमज़ोरी से उपजा गुस्सा है जो तुम मुझपर निकाल रहे हो।’
’नहीं... मैं हरामी हूँ... बस... उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं...’
’ऎसा मत कहो.... मैं तुम्हारे साथ यह नहीं करना चाहती... उसका कारण नरेन्द्र है.. मैं उसके साथ यह नहीं कर सकते.. अली.. और शायद तुम भी ऎसा कुछ नहीं करना चाहते हो।’
’हाँ... मैं भी नहीं चाहता... पर जब सब कुछ हाथ से छूट रहा होता है तो लगता है कि कुछ पकड़ लो.. चाहे वह कितना भी गलत क्यों ना हो... उसे पकड़कर ....’
फिर अली कुछ नहीं बोल पाया...। राही उठी और उसने अपने कपड़े पहन लिये..। दोनों चुप चाप बैठे रहे... फिर अली राही के पास गया.. और उसे चूम लिया... राही ने कुछ नहीं कहा.. । वह उसे चूमता गया...।


यह किससा यहीं तमाम हुअ.....
तो बात चलते-चलते यहाँ तक पहुंच गई है। नहीं.. इसमें कोई भी सोची समझी चाल नहीं है...। यह शब्द.. अली.. राही.. और नरेन्द्र जैसा देखते गए.. मैं लिखता गया...। अब मैं भी नहीं यह खुद अपनी बात कह रहें है.. जैसा हम कहते है कि इंसान क्या है बस परिस्थियों से बना हुआ पुतला। मैं इसे अभी भी कहानी मानने से इनकार करता हूँ... क्योंकि अगर यह कहानी होती तो मैं लिखना और आप पढ़ना बंद कर चुके होते... हम दोनों ही यह नहीं चाहते कि यह कहानी हो... तो मैं यक़ीन दिलाता हूँ आपको कि यह कहानी नहीं है। अब यह ताना बाना जो बुना हुआ है.. यह परिस्थितिवश है...। क्योंकि इन बातों का अंत मैं पहले ही लिख चुका हूँ... जिसमें कमल जा चुके हैं.. अपने घर में ताला लगाकर...।

अली अभी भी उस अंधेरे कमरे में कमल के साथ बैठा हुआ है। ’अली राही को चूमता है...’ उसके बाद उसने कहानी पढ़ना बंद कर दिया...। पर कहानी के पन्ने अभी भी उसके हाथ में है।
’क्या हुआ?’ कमल ने पूछा...
’सिगरेट पीना है..।
अली जेब से सिगरेट निकालता है..। एक सिगरेट कमल को देता है और दूसरी अपने मुँह में लगा देता है... कमल माचिस निकालकर दोनों की सिगरेट जलाता है। अली एक कश के साथ अपना बचा हुआ ड्रिंक पी जाता है... और गिलास कमल की तरफ बढ़ा देता है...
’एक और.......’
कमल कुछ नहीं कहते.. वह गिलास लेकर भीतर चले जाते हैं....।
’इसलिए आपको आपकी बीवी छोड़कर चली गई.. हे ना?’
कमल अंदर पेग बना रहे हैं और इसका कोई जवाब नहीं देते।
’आपको आपके बेटे आयुष में कोई कहानी नहीं दिखती?’
कमल उसका पेग लाकर उसे दे देते हैं...। अली फिर एक झटके में आधा पेग खत्म कर देता है... और गिलास नीचे रख देता है। इस बार उसे ठसका नहीं लगता।
’क्योंकि वह मेरी तरह चूतिया नहीं है ना.. वह आपके पास आकर अपने जीवन की पर्सल बातें आपको नहीं बताता है...।’
’कुछ ही पन्ने बचे हैं... उसे पढ़ लो फिर बात करेगें...।’
अली नहीं पढ़ता है। वह कमल को देखता रहता है।
’तुम तो पेंटर भी हो... तुम्हें कोई भी पेंटिग क्यॊं अच्छी लगती है...?’
’क्योंकि वह अच्छी होती है... बस..’
’नहीं... क्योंकि उसमें तुम खुद का अंश देख लेते हो.. उसके रंग तुम्हारे जीए हुए रंग से मेल खा लेते है.. कभी तुम्हारी मन:स्थिति से... कुछ क्रूरता मेल खा जाती है.. और तुम्हें वह अच्छा लगता है। ऎसे ही कहानी भी... तुम खुद का एक अंश उन संवादों में महसूस करते हो...।’
’तो...?’
’तो कुल मिलाकर हम हर जगह खुद को ही तलाश रहे होते है... और जब-जब हमें अपना अंश इस संसार में दिखता हैं.. हमें जीने में एक sence मिलता है। इस हिसाब से तो तुम्हें यह बहुत अच्छी कहानी लगनी चाहिए... हे ना..’
’यह सब बहुत पर्सनल है...।’
’मैं जानता हूँ... लेकिन यह तुम्हारी बात नहीं है...।’
’मैंने यह सारे संवाद आपसे किये थे... कि मैं कमज़ोर हूँ.. मुझे लगता है कि मैं बदला ले रहा हूँ....’
’मैंने कहा ना यह fiction है...’
’और मैंने राही को बस चूमा था.. उससे ज़्यादा...’
’इसी बाद का तो तुम्हें दुख है कि तुमने उसे सिर्फ चूमा था... और यहाँ तुम बहुत आगे बढ़ गए हो...।’
’नहीं....’
’तुम यह बात मानों या ना मानों.. पर यही सही है...’
’यह झूठ है.. यह झूठ है..यह......’
अली अपने गुससे पर काबू नहीं रख पाता... और वह कमल की तरफ बढ़ता है.. पर रुक जाता है। वापिस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है। कुछ देर चुप्पी बनी रहती है.. फिर अली कहता है...
’sorry…..’
‘तुम्हें पता है तुमने पूछा था कि मैं किससे मिलने जाता हूँ..? तब मैंने कहा था कि मैं अपने दोस्त से मिलने जाता हूँ.... तुम्हें पता है असल में मैं किससे मिलने जाता था...?’
’किससे...?’
’अपनी बीवी से...’
’अयुश जानता है यह बात...?’
’ना.... हम दोनों पार्क में, कॉफी शॉप में मिलते हैं...। अजीब है मैं उससे बस एक बार मिलना चाहता था कि माफी मांग सकूं... उन बहुत छोटी चीज़ों की जो वह मुझसे चाहती थी और मैं उसे दे नहीं पाया...। पर मिलना इतना सुंदर लगा कि... हम मिलते रहे...। मैंने अभी तक उससे माफी नहीं मांगी है..।
’आप यह सब मुझे क्यों बता रहे हैं?’
’पता नहीं... मैं इसके अलावा एक और आदमी से भी मिलने जाता था..।’
’किससे....?’
’नरेन्द्र से.....’
’क्या?’
’हाँ... मुझॆ उसका पक्ष भी जानना था...’
’अरे ... आप....’
’वैसे.. नरेन्द्र अच्छा लड़का है...।’
’हाँ मैं जानता हूँ....।’
’तुमने मेरी एक कहानी राही को यह कहकर सुनाई थी कि वह तुमने लिखी है...?’
’आपको कैसे पता यह बात.. यह तो बहुत पुरानी बात है.. और मैंने राही को बता भी दिया था बाद में कि वह आपने लिखी है।’
’यह नहीं पता था मुझॆ...’
’पर यह बात राही के अलावा और किसी को नहीं पता थी....।’
’नरेन्द्र ने मुझे बताया....।’
’क्या आप राही से भी मिले हैं...?’
’नहीं उसे सिर्फ दूर से देखा है.. सुंदर है वह...।’
’आप कब से यह कर रहे हैं...?’
’मैं लेखक हूँ... जब से होश संभाला है तब से लिख रहा हूँ...।’
’आपको नहीं लगता कि आपने सबको इस्तेमाल किया है?’
’हम सब एक दूसरे का इस्तेमाल करते हैं.. इस बात को हम चाहे माने या न माने...।’
’नहीं..... ऎसा नहीं है..।’
’क्यों तुमने राही का use नहीं किया अपने लिए... तुमने नरेन्द्र का इस्तेमाल किया...।’
’वह गलती थी मेरी...।’
’अगर दौबारा मौक़ा मिलेगा तुम वह ग़लती दौबारा दौहराओगे..।’
’नहीं.. कभी नहीं...।’
कमल वहाँ से उठकर चले जाते हैं....। अली भीतर सी आती कुछ आवज़े सुनता है चीज़ो के उठाने रखने की...। वह खिड़्की से आती रोशनी में फिर उन पन्नों को लाता है और पढ़ना शुरु करता है।

मुझे इस वक़्त अजीब सी घबराहट हो रही है। मुझे इन पात्रों से संवाद ठीक नहीं लग रहे हैं। हाँ इन पात्र से मेरे संवाद.... । जब-जब बीच में मैं लिखना बंद करता हूँ... पात्र मुझसे .. या आपस में बात करने लगते हैं..। मैं उनको मेरी बुराई करते सुन सकता हूँ। हम जब भी उनके चरित्र के खिलाफ एक भी वाक्य लिखते हैं वह पात्र हमें माफ नहीं करते...। कमल मुझसे नाराज़ है.... वह अपनी बीबी से नहीं मिलना चाह रहा था...। हाँ उसकी अपने चरित्र को लेकर अपनी आज़ादी है... पर मुझे कमल से उसकी आज़ादी छींननी पड़ी... इसलिए कमल खफ़ा है..। अगर कमल मुझे एक मोची के रुप में दिखता .. बस कंड़क्टर के रुप में.. तो शायद वह इस बात पर नाराज़ नहीं होता.. पर तब उसकी दूसरी समस्या होती...। पात्रों से बहस कई बार कहानी रोक देती है.. अगर मैं कहानी लिख रहा होता तो !!! यहाँ कमल और मेरी बहस में कहानी रुक गई होती... पर यह कहानी नहीं हैं..। मैं कहानी नहीं लिख रहा हूँ.. इस बात में आज़ादी है.. मैं यह बात यहीं खत्म कर सकता हूँ और कह सकता हूँ कि बस... यह यहीं तक है..। आप कहेंगे यह तो अधूरी है... इसे पूरा तो कीजिए...!!! मुझे अपने जीवन में सारी अधूरी छूटी हुई चीज़े याद है.. पूरी तरह.... बहुत से संबंध.. किस्से.. बातें... जो बीच में ही कहीं छूट गए थे... एक टीस की तरह.. जो टीस हमेशा याद रहती है। कहानी नहीं लिख रहा हूँ इस बात की सबसे बड़ी आज़ादी यही है कि... मैं कभी भी इसे किसी भी टीस पर खत्म कर सकता हूँ.....।

अली, राही से मिलने उसके घर पर गया है। राही उसे अपने कमरे में बुलाती है...। अली, राही से और नरेन्द्र से बहुत दिनों से नहीं मिला है....।
’तुम आखरी बार नरेन्द्र से कब मिले थे?’ राही ने पूछा
’क्यों? सब ठीक है...?’ अली थोड़ा डर गया..
’तुम बताओ.. कब मिले थे...?’
’उसी दिन.... जब वह अंडे और शक्कर लेकर आया था।’
’उसके बाद क्यों नहीं मिले तुम?’
’पता नहीं... वह व्यस्त था.. मैंने एक दो बार फोन किया... पर उसने मेरा फोन नहीं उठाया.. वापिस फोन भी नहीं किया तो नहीं मिले...।’
’तुम मुझसे भी नहीं मिले...।’
’हाँ.. तुमसे जान बूझकर नहीं मिला.... मैं तुमसे नहीं मिलना चाहता था...।’
राही इस बात पर अली के सामने से उठ गई...। बहुत से धुले हुए कपड़े पलंग पर पड़े थे.... वह उन्हें घड़ी करने लगी...। सलीके से.. धीरे-धीरे.. तह करके वह सारे कपड़ों को रखने लगी...।
’बस यही पूछने के लिए तुमने मुझे बुलाया था?’ अली ने पूछा...
’नहीं...’
’तो क्या बात है बोलो?’
’मैं चाहती हूँ तुम जाकर नरेन्द्र से मिल लो...।’
’नहीं मैं नहीं मिलूगां।’
राही ने कपड़े तह करना बंद कर दिया...। वह अली की तरफ देखने लगी...
’मेरी ख़ातिर... एक बार...।’
’ठीक है...। मैं कल मिल लूंगा उससे...।’
’नहीं कल नहीं.. आज रात... वह बहुत पीने लगा है...। तुम्हारा उससे मिलना बहुत ज़रुरी है...।’
’ठीक है..।’
’उसे फोन मत करना.. वह तुम्हारा फोन नहीं उठाएगा...। सीधे रात उसके घर चले जाना...।’
’ठीक है...।’
अली वहाँ से चला जाता है...। वह अपने कमरे में नहीं जाता... उसे लगता है कि अगर वह अपने कमरे में गया तो नरेन्द्र से नहीं मिलने के कारण ढूढ़ लेगा.. सो वह एक कॉफी हाऊस में जाकर बैठ जाता है। तभी एक बुज़ुर्ग से व्यक्ति उसके सामने आकर बैठ जते हैं.. वह उसे अपना नाम कमल बताते हैं।
’जी ....?’ अली पूछता है..
’मैंने कहा मेरा नाम कमल है...।’ कमल जवाब देते हैं...
अली चुप रहता है.. वह अपना नाम नहीं बताता...। कमल एक काग़ज़ और पेन बाहर निकाल लेते हैं.. और अली का स्केच सा बनाने लगते हैं..।
’अरे! आप यह क्या कर रहे हैं...?’
’जिस तरीक़े से तुम काफी देर से यहाँ बैठे हो... मुझे वह तरीक़ा बहुत अच्छा लग रहा है। मैं भूल न जाऊं उससे पहले स्केच कर लेना चाहता हूँ।’
’अरे!.. पर...’
’अगर आपको दिक्कत है तो....’
’नहीं पर आप यह...’
’मैं एक लेखक हूँ.. और जिस तरह आप बैठें है.. बुरा मत मनियेगा.. जिस पीड़ा से आप बैठे है और कॉफी पे कॉफी पीये जा रहे हैं.. मुझे आपमें एक कहानी दिख रही है...।’
’कहानी...?’
’मैं कतई कहानी नहीं लिखना चाहता हूँ.. मुझे कहानिया बोर करती है.. मैं बस तुम्हारा इस पीड़ा से बैठा लिखना चाहता हूँ...।’
’मुझे कोई इच्छा नहीं यह जानने की कि आप क्या और क्यों लिखना चाहते हैं... मैं अकेले बैठना चाहता हूँ।’
’इसलिए तो मैं आपकी तरफ आकर्षित हुआ...। मुझे पता है आप आकेले बैठना चाहते हैं... बस मैं कुछ देर में चला जाऊंगा..।’
अली की कुछ समझ में नहीं आता कि वह क्या करे...। वह वापिस अपनी कॉफी पीने लगता है। कमल उसका स्केच बनाने लगते हैं। कुछ देर में वह अपना कागज़ और पेन वापिस जेब में डाल लेते हैं... पर वहाँ से उठते नहीं है...। कमल अली की तरफ देखकर मुस्कुराते हैं... पर अली उनकी तरफ नहीं देखता...
’इस उम्र में ही इतनी गहरी समस्या होती है। मेरी उम्र में आते-आते या तो सब सुलझ जाता है या समस्याएं असर करना बंद कर देती है।’
अली चुप रहता है।
’शायद मैं आज रात में ही आपकी कहानी लिख दूं..... सच में मैंने बहुत समय से कुछ भी नहीं लिखा है। आपको देखकर लगता है कि मैं आज रात मे ही यह कहानी लिख दूंगा...। क्योंकि कल मैं यह शहर छोड़कर जा रहा हूँ... बहुत समय से सोच रहा था पर अब... मैंने मन बना लिया है.. सारा सामन भी बांध लिया है...।’
अली चुप रहता है....। कमल वापिस अपनी जेब से कागज़ और पेन निकालते हैं.. और अपने घर का पता लिखते हैं...।
’देखिए..मुझे पता है आपको कोई इन्टरेस्ट नहीं है... पर अगर आपको अपनी कहानी सुननी है तो आपको मेरे घर सुबह छ: बजे के पहले आना पड़ेगा... वरना मैं निकल जाऊंगा...। यह रहा मेरा पता...।’
अली वह कागज़ नहीं लेता....। कमल उसकी टेबल के पास वह कागज़ रख देते हैं। और अपना पेन वापिस शर्ट की जेब में फसाते हैं और चल देते है। कुछ देर अली उस कागज़ को देखता है फिर उसे बिना वजह अपनी जेब में डाल लेता है...। वह एक कॉफी और पीता है... फिर नरेन्द्र के घर की और चल देता है....।
अली नरेन्द्र के दरवाज़े पर खड़ा है... एक गहरी सांस लेकर वह दरवाज़ा खटखटाता है...। पर वहा से कोई आहट नहीं सुनाई देती.. वह फिर खटखटाता है... फिर चुप्पी...। वह थोड़ा सा दरवाज़ा धकेलता है... वह खुल जाता है...। वह आवाज़ लगाता है..
’नरेन्द्र... नरेन्द्र....’
’हा.. अली...’
कमरे में अंधेरा है...।
’मैं दरवाज़ा खटखटा रहा था...पर..’
अली चुप हो जाता है.. उसे अपना बोलना व्यर्थ लगने लगता है। पूरा कमरा सस्ती दारु से महक रहा था....। वह टटोलते हुए लाईट जलाने की कोशिश करता है.. तभी नरेन्द्र की आवाज़ आती है..
’लाईट बंद रहने दो... लाईट चालू मत करो....।’
अली हाथ वापिस खींच लेता है....। धीरे-धीरे... वह नरेन्द्र की तरफ बढ़ता है...। पूरे कमरे में अधेरा है.. सिर्फ खिड़की से रोशनी आ रही है..। नरेन्द्र खिड़की के पास बैठा है...। अली नरेन्द्र के सामने बैठ जाता है।
’दारु पियेगा..?’ नरेन्द्र पूछता है..
’नहीं.... नहीं’
’पी ले...’
’नहीं.. मैं पानी पीयुंगा....’
और अली मटके की तरफ बढ़ता है...।
’यहाँ पानी नहें है.... तो यहाँ क्यों आया है?’
अली बात कहा से शुरु करे..? पुरानी दोस्ती से...? अभी की समस्या से..? या सीधे राही की बात पर आ जाए? अली खामोश है और नरेन्द्र अली के लिए एक ड्रिंक बनाता है।
अली और कमल... कमल के घर रात...
कमल ने कहानी यहीं तक लिखी थी। अली अधूरेपन की टीस महसूस करता है। कमल भीतर से निकलकर बाहर आते हैं...।
’तो पढ़ ली..?’ कमल ने पूछा..
’हाँ.... पर नरेन्द्र से क्या बात हुई...।’
’वहीं पर तो मामला रुका हुआ है...।’
’क्या आप सच में कल सुबह जा रहे हैं।’
’तुम कहानी को और रियेलिटी को मिक्स कर रहे हो!!!’
’आप जा रहे हैं...।’
’मुझे आज कैसे भी यह कहानी पूरी करना है। तो बताओ क्या बात होनी चाहिए नरेन्द्र और तुम्हारे बीच...?’
’यह आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? आप तो उससे मिले हैं ना... अब लिखिए।’
’यही तो गलती कर दी मैंने... जब आपको एक पक्ष की बात ज़्यादा ठीक से पता हो तो.. आप चीज़े आसानी से लिख लेते हो..। देखों दुनिया में लोगों ने एक पक्ष पर लिख लिखकर किताबें भर दी है।’
’मुझे लगता है दोनों बैठकर पीते हैं और बस.. दोस्ती वापिस शुरु हो जाती है.. उस बारे में कोई बात नहीं करता..।’
’हम्म.. यह हो सकता है.. पर मैं कुछ और देख रहा हूँ...। मैं कभी तुम्हें रोता हुआ देखता हूँ तो कभी नरेन्र्आ को.. पर फैसला नहीं कर पा रहा हूँ कि किसको रुलाऊं...।’
’अब मेरी इच्छा है इसका अंत जानने की... और तब मैं आपसे बात करुंगा...।’
’तो ठीक है.. अंत जानना है तो कल सुबह.. छ: बजे के पहले...।’
और कमल यह कहकर हसने लगते हैं। कुछ देर में अली वहाँ से चला जाता है। कमल कहानी के पन्नों को लेकर अपनी डेस्क पर चले जाते हैं।

बात कितनी सीधी हुई है अब तक...। आपको भी चीज़े साफ-साफ दिखने लगी और मुझे भी...। इसके बाद इसके कई अंत हो सकते हैं। जैसे Woyzeck नाटक जो Georg Buchner पूरा नहीं लिख पाए थे। अंत खुला था... जो चाहे जैसा अंत वैसा लिख ले.. वह नाटक सबसे ज़्यादा खेले गए नाटको में से एक है। जैसे कहानी नहीं लिखने में एक आज़ादी है वैसे ही अधूरेपन में भी आज़ादी है... हर आदमी खुद अपना हिस्सा उसमें मिला सकता है और उसे पूरा कर सकता है।
यह बात शायद उस हिस्से की है जो मैं शुरुआत में लिख चुके था....। मुझे एक लड़का भागता हुआ दिखा.. और बात वहाँ से यहाँ तक पहुंच गई...। और अब हम वापिस वहीं पहुंच गए.....

सुबह बहुत सामान्य थी जब तक उसकी निग़ाह घड़ी पर नहीं गई... उसके मुँह से आह! निकली.. और वह भागा........
वह भाग रहा था... जूतों के लेस खुल चुके थे... पर उसे गिरने का कोई डर नहीं था। वह बीच में धीमा हुआ... सिर्फ कुछ सांस बटोरने के लिए... एक ..दो... तीन... वह फिर भागने लगा। कहीं वह चले ना गए हो? यह बात उसके दिमाग़ में धूम रही थी। उसे उनके चहरे की झुर्रीयाँ दिख रही थी.... वह उसी को देख रहे थे... अचानक वह उनके चहरे की झुर्रीयाँ गिनने लगा। उसने अपने सिर को एक झटका दिया और सब ग़ायब हो गया... मानों सब कुछ ड्स्ट बिन में चला गया हो। दिमाग़ में एक ड्स्ट बिन होता है जिसे आप सिर के एक झटके से भर सकते हैं... पर अगर ड्स्ट बिन भर गया तो उसे कैसे झटका देते हैं?... दिमाग़ के ड्स्ट बिन को कहाँ ख़ाली करते हैं? उसने फिर दिमाग़ को एक झटका दिया... और भागता रहा....
वह दरवाज़े के सामने काफी देर से खड़ा था...। उसका माथा दरवाज़े से सटा हुआ था। वह बीच में एक गहरी सांस छोड़ते हुए अपना माथा धीरे से दरवाज़े पर पटकता और एक ठ्क की आवाज़ आती। उसने अपना दाहिना हाथ घंटी पर रख रखा था। उसके दो माथे की ठ्क के बीच में घंटी की आवाज़ सुनाई दे जाती...यह एक तरह की रिद्यम में यह चलने लगा था, पर बहुत ही धीरे, इतना धीरे कि अगली ठ्क की आवाज़ शायद ना आए...। उसकी आँखें दरवाज़े पर लगे ताले पर थी... काला पड़ चुका ताला...। घंटी की आवाज़ और ठ्क के बीच अचानक एक वाक़्य भी बजने लगा था... “मैं सुबह चला जाऊगाँ...।“ कुछ देर में वह बैठ गया... सोचा स्टेशन जाऊगाँ पर कोई फायदा नहीं है। वह कहाँ से जाएगें इसका कोई पता नहीं था... या शायद वह गए भी नहीं हो.. वह अभी भी यहीं हो आस पास ही कहीं। छुपकर उसका इस तरह पछताना देख रहे हों। वह खड़ा रहा। उसने दरवाज़े पर एक लात मारी और सीड़ीयों से नीचे उतर गया। अचानक वह पलटा और उसने जिस जगह लात मारी थी वहाँ हाथ से दरवाज़ा पोछ दिया... कहीं वह सच में छुपकर देख रहे हो तो?

यह अंत लिखते ही मुझे लगा इस कहानी का नाम... ’टीस...’ होना चाहिए.. क्या कहते हैं आप????


7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

लम्बी कहानी, फिल्मों सी।

jyoti nishant said...

कमाल है. ऐसी कहानी या कहानी जैसा. द मानव कॉल ही लिख सकते है .कई बार लगता है जैसे पाठक नहीं दर्शक हू सामने नाटक खेला जा रहा है.

Pratibha Katiyar said...

अल्टीमेट!

monali said...

कहानी से जुडने की सच में यही शर्त होती है कि आप उसमें अपनी हक़ीकत या अपने सपने पा सकें... बेहद खूबसूरत कहानी या कहानी जैसा कुछ...

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...
This comment has been removed by the author.
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...
This comment has been removed by the author.
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

कोई सवाल-जवाब नहीं, सिंपली लव्ड इट!

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल