Friday, September 23, 2011

Toji.... (land...)


प्रार्थना की सी शांति है यहाँ...। अपने आपको कभी इतने अकेले में देखा नहीं था... जिया नहीं था.. ख़ासकर जब भाषा, ख़ाना, लोग सब कुछ अलग हों....। मैंने अकेलेपन की कल्पना की थी.... पर यह शायद उस कल्पना का और सुलझा रुप है। यहाँ Toji, Korea में शांति अपने पूरे सन्नाटे में है... यहाँ कभी कभी लगता है कि आप किसी कटीली तारों के बीच फसे हो.. अगर ज़्यादा तड़पोंगे तो खुद ही ज़ख़्मी होगे... इससे छुटकारा नहीं है... यूं छुटकारे की इच्छा भी नहीं है..। यहाँ हर दिन नया है... कभी एकदम नए विचारों की लहर है तो कभी पुराने बीते दिनों की ठंड़ी हवा... पर कभी एक दिन दूसरे दिन जैसा नहीं गुज़रा...।
एक चीज़ रोज़ तय है .... रात के खाने के बाद सबके साथ एक लम्बी walk पर जाना...। हर walk पर मैं खुद को थोड़ा ज़्यादा बूढ़ा महसूस करता हूँ। इस सारे लेखकों के बीच में मैं सबसे young हूँ.. बाक़ी सबकी उम्र लगभग पैंतालीस पार कर चुकी है...। औरते ज़्यादा हैं.... और चूकि कोरियन संस्कृति भारतीय संस्कृति से बहुत मेल ख़ाती है तो कहना चाहिए कि मेरे पास करीब छ: माँए है.... सभी मेरा इतना ज़्यादा ख़्याल रखती हैं कि कभी-कभी मैं खुद को बहुत बच्चा सा महसूस करता हूँ। हर रोज़ टहलते हुए वह सब चिल्लाते-चहकते हुए बात करते हैं.... मैं चुप्प उस भाषा का संगीत सुनता हुआ चलता हूँ। यदा-कदा कोई टूटा फूटा अंग्रेज़ी का शब्द कहकर मुझे भी बात-चीत में शामिल रखना चाहता है.. पर मेरे जवाब के साथ वह कोशिश भी वहीं खत्म हो जाती है। पहले एक हफ्ते तो सभी मुझसे झेंप रहे थे.... उसका कारण अंग्रेज़ी भाषा था जो मुझे बाद में समझ में आया। पर एक बहुत ही विचित्र बात है.. कि बिना भाषा जाने.. बिना बहुत बात किये मेरा सब लोगों से एक नए तरीक़े का आत्मीय संबंध बन चुका है।
एक poet हैं... MOON-YOUNG HOON जो पिछले पच्चीस सालों से पेरिस में रहते हैं.. वह फ्रेंच और कोरियन में कविताए लिखते हैं। मैंने अपने जीवन में इतना शांत और मुस्कुराता हुआ चहरा कभी नहीं देखा... उनकी शांति और आँखों की उनकी मुस्कान से रंज होता है...। बीच में जब मैं कुछ परेशान था तब एक वह ही थे जो मुझे कुछ इस तरह देखते थे मानों सब समझते हो.. सब जानते हों...। मैं उन्हें बहुत पसंद करने लगा हूँ.... पर बात चीत नामुमकिन है... मैं सिर्फ उनसे दिन और रात के खाने पर ही मिलता हूँ...(वह हमारे साथ लंबी walk पर कभी नहीं आते...) पर उनसे आत्मीयता कुछ इतनी बढ़ गई है कि जब कोई उनकी जगह बैठता है तो मैं मना कर देता हूँ.. ’कि वह उन poet की जगह है...’, जब वह कभी खाने नहीं आते तो मैं थोड़ा विचलित हो जाता हूँ।
यहाँ बहुत से लेखक हैं, कम्पोज़र है और पेंटर... जिनमें से चार महिलाएं सिर्फ बच्चों के उपन्यास लिखती हैं...। उसमें से एक हैं... BAEK-SUNG NAM जिन्होंने एक किताब मुझे gift की जिसका नाम KING OF WOLF है... अब किताब कोरियन भाषा में है... पर वह इतनी ज़्यादा उत्साहित थी मुझे किताब देने में मानों मैं अभी पूरा उपन्यास पढ़ लूंगा... मैंने उनको बहुत बहुत धन्यवाद कहा... (ख़नसा हम निदा...) पर मैंने उनसे विनती की कि कृप्या करके वह इसकी कहानी मुझे बता दें...(किताब सचित्र थी..) जैसे-तैसे अपना पूरा समय लेते हुए.. टूटी फूटी अंग्रेज़ी में कुछ वह बता पाई.. कुछ कहानी मैंने गढ़ ली..। फिर मैंने लगभग सभी किताबों की कहानिया सब से सुनी.. और बहुत सुंदर बात यह लगी कि... बच्चों की कहानियों में मृत्यु थी... परिवार का बिख़रना था... शोक था... खुशी थी....। एक महिला तो बच्चों की संजीदा कहानियाँ ही लिखती हैं....उनका नाम KANG-SOOK TN है... उनके पैर में कुछ समस्या है... अभी-अभी पिछले दो हफ्तों से वह मेरे साथ अंग्रेज़ी में कुछ शब्द.. कुछ छोटे वाक़्य कहने लगी हैं... पर उन्हें पता नहीं क्यों अग्रेज़ी बोलना चुटकुले सुनाने जैसा लगता है... वह एक शब्द भी बोलती है तो बच्चों सी हंसती हैं... एक पूरे वाक़्य में तो मुझे भी हंसी आने लगती है।
इन सारी यात्राओं की बस एक ही त्रासदी है कि जो आत्मीय संबंध आपका यहाँ कुछ लोगों से बन गया है... आप पता नहीं इसके बाद कभी उनसे मिलेगें भी या नहीं....। शायद कभी किसी से भी मिलना ना हो...। यह संबंध यहीं तक है... बस इतना ही...। यह सोचते ही लगता है कि दुनियाँ इतनी दूर-दूर क्यों है..? क्या हम ख़िसकर कुछ और पास नहीं आ सकते...?
लिखने आया था पर संतोषजनक लेखन नहीं हो पाया है...। बहुत सारा लिखना बचा है... पर इस प्रवास में मैं खुद अपने कुछ करीब खिसक आया हूँ... अपने साथ चलते रहने के कुछ मौन इस बार थकान लिए हुए नहीं थे..। मैं इस बार थका नहीं... मैं इस बार चलता रहा...।
इस प्रवास में सबसे अच्छा काम शायद Red Pencil का लिखा जाना है। यह बच्चों का उपन्यास Soo-Hyeon ने लिखा है.. उससे प्रभावित होकर मैं नाटक लिख रहा हूँ। आशा है मैं इसे जाने से पहले पूरा कर लूंगा..। SOO-HYEON की उम्र करीब 42 वर्ष होगी...। उनसे बात करते समय लगता है कि किसी बौद्ध भिक्षु से बात कर रहे हो... उनके भीतर बहुत प्रेम है दूसरों के लिए.. वह लगभग सबकी सहायता यहाँ कुछ इस तरह करती है मानों हम उनके घर में रहने आए हैं। मैं उनके लिए एक lost child जैसा कुछ हूँ... जिसे पता नहीं कि वह कहाँ जा रहा है.. क्या कर रहा है। मैं खुद कभी इसका जवाब नहीं दे पाया कि मैं lost child हूँ कि नहीं हूँ... सो मैं जो भी भूमिका मुझे यहाँ मिलती है मैं बिल्कुल वैसा ही जीने लगता हूँ।
मुझे लगता है कि आप असल में क्या सोचते हैं... अगर उसको हमेशा बता देने का उत्साह अगर हम थोड़ा शांत कर ले.... तो हम बहुत से लोगों को बहुत सारी जगह दे पाएंगे..... अपने पास आने की....।

5 comments:

ajit gupta said...

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति है। हर शब्‍द में भाव है। कोशिश करूंगी कि पढ़ने में निरन्‍तरता बनी रहे। बधाई।

प्रवीण पाण्डेय said...

कितना कुछ बसा है मानव मस्तिष्क में, कहने को, सुनने को। खुला सा जीता हूँ, न जाने कब क्या प्रभावित कर जाये।

Pratibha Katiyar said...

ये खिसककर खुद अपने और करीब आ जाना बहुत है. किसी यात्रा का हासिल अगर ये है तो कम नहीं. मैंने भी अपने भीतर की टूटती लय को अक्सर यात्राओं में ही साधा है. इस पोस्ट को पढ़ते हुए वो सब कहा याद आ रहा जो बच्चो को नौनवर्बल कमुनीकेशन पढ़ाते वक़्त कहना पड़ता था. बच्चों ने कितना सीखा कितना नहीं, ये तो नहीं पता लेकिन मुझे ये अहसास ज़रूर हुआ कि भाषा यकीनन दीवार नहीं, बस उसे पढने का जज्बा ज़रूरी है. लखनऊ में आये एक ज़र्मन नाटक की याद और उनका इंटरव्यू अब तक ज़ेहन में है. भाषा के पार जाकर उनका कहना और मेरा सुनना. आप वहां जो गुन रहे हैं उसे हम ध्यान से सुन रहे हैं...

Sharvari Patankar said...

दुनियाँ इतनी दूर-दूर क्यों है..? क्या हम ख़िसकर कुछ और पास नहीं आ सकते...?

I loved this thought the best!

पर इस प्रवास में मैं खुद अपने कुछ करीब खिसक आया हूँ...
I like this one too!!!

sharvari

अनुपमा पाठक said...

मुझे लगता है कि आप असल में क्या सोचते हैं... अगर उसको हमेशा बता देने का उत्साह अगर हम थोड़ा शांत कर ले.... तो हम बहुत से लोगों को बहुत सारी जगह दे पाएंगे..... अपने पास आने की....।

विचारणीय बात है!सुन्दर वृतांत है...!

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल