Monday, September 5, 2011

I AM NATURE.. AS YOU ARE…



बाहर घांस काटने की आवाज़ आ रही थी। एक चिड़िया तार पर बैठकर बहुत देर तक पूंछ हिला-हिलाकर किसी को बुला रही थी। दूर किसी के कपड़े धोने की आवाज़ थी। बीच-बीच में हवा का झोंका तेज़ी से आता और खिड़की के पर्दे उड़ जाते। मेरे बगल में पी हुई कॉफीयों के ख़ाली कप पड़े हुए थे, एक एशट्रे, लाईटर, कुछ आधी-अधूरी पढ़ी हुई किताबें... टेबिल लेंप.. और कुछ कोरे कागज़...। बहुत बुलाने पर भी उस पूंछ हिलाने वाली चिड़िया के पास कोई नहीं आया सो वह उड़ गई....मेरे खिड़की से बाहर देखने के एक मात्र कारण को लेकर...। मैं वापिस अपनी डेस्क पर आ गया। बहुत देर डेस्क की बिखरी हुई चीज़ों को देखा तो थकान से भर गया... फिर मेरी निग़ाह उस पेंटिंग पर गई जो मेरे कमरे में लगी हुई है। कोरे से केनवास पर एक आदमी (काली श्याही से आदमी का आकार) सिर झुकाए सात घांस के टुकड़ों को देख रहा है....और उसपर कुछ कोरियन भाषा में लिखा हुआ है। कल मेरी एक कोरियन मित्र ने मुझे बताया कि उसपर लिखा हुआ है... I AM NATURE…. AS YOU ARE… मुझे यह बात बहुत सुंदर लगी..। तब से जब भी इस पेंटिंग पर निग़ाह जाती है मेरे भीतर कुछ सुलझ जाता है..। मुझे विश्वास करने की इच्छा होती है सब पर... अपने डरे हुए कोनों में दिया जलाकर टहलने की इच्छा होती है। उन जगहों की याद हो आती है जिन जगहों पर जाना मैंने सालों से टाल रखा था। फिर अपने खालीपन में एक घांस का तिनका गिरा पड़ा मिलता है... और तब एक बोझ महसूस होता है...। उस तिनके को अपने जीए हुए लेंडस्केप में फसाने की कोशिश करता हूँ...। वह अपनी अलग कहानी लेकर आया हुआ लगता है...। उसे छूने पर लगता है कि यह सुख है... पर इस सुख को कहां टिकाकर रखूं का कोना कहीं दिखता नहीं है।
अभी रात है... देर रात अपनी बाल्कनी के कोने में खड़े रहने पर लगता है कि अंधकार कुछ खींच रहा है...। कहीं से कुछ रिसने लगता है.. मैं छूटता जाता हूँ... I AM NATURE.. AS YOU ARE…. वाली बात दिमाग़ में एक तिनके की तरह बैठी रहती है... वह सुख है.. पर उसे अपने भीतर टिकाकर रखने का कोना अभी भी खाली नहीं है।

5 comments:

NIMISH G said...

Very nice Chachcha. Keep writing.

प्रवीण पाण्डेय said...

एक प्रकृति के रंग बहुतेरे,
वही तुम्हारे जो हैं मेरे।

ajit gupta said...

प्रकृति में आत्‍मसात होने पर विलक्षण अनुभूति होती है।

दीपक बाबा said...

I AM NATURE…. AS YOU ARE…

हाँ हम सब से मिल कर ही तो बनती है..... प्रकृति..

Pratibha Katiyar said...

हाँ वो सुख है...लेकिन उसे टिकाकर रखने का कोना अभी खाली नहीं....इसी कारन सुख की छुअन के साथ ही अन्दर कुछ रिसता हुआ महसूस होता है. अन्दर के डरे हुए कोने सुख की ओर खींचते हैं और सुख आते ही दुबक कर बैठ जाते हैं...वो सात घास के तिनके कितना कुछ कह रहे हैं...

उम्मीद है आप थोड़ी कोरियन भी सीखकर आयेंगे...

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल