Thursday, October 9, 2008

डरपोक़....


काफ़ी समय से चाय पीता हुआ मैं... इन छोटे-छोटे आश्चर्यों को देख रहा था जो मेरी आँखों के सामने घट रहे थे.... मैं पहाड़ के एक गाँव में बैठा, चाय पी रहा था...। सामने अचानक बादल घिर आए थे... और बूंदाबांदी शुरु हो गई थी.... पर पीछे के दो पहाड़ो पर अभी भी धूप थी...। तेज़ सुनहरा रंग चारो तरफ बिखर गया था।मैं जिस दुकान में चाय पी रहा था वह एक बुज़ुर्ग दम्पत्ति की दुकान है... शायद इस गाँव के तीन किलोमीटर के इलाके में एक यही दुकान है...। दोनों अकेले रहते हैं... नीचे गाँव में उनकी खेती है जो दो बच्चे मिलकर चलाते है.... दो बेटीयों की शादी हो चुकी है... और एक बेटा दिल्ली में कहीं पढ़ता है जिसके बारे में वह बड़े फ़क्र से बता रहे थे। चुकी आस पास कोई दुकान नहीं है इसलिए .. यह चाय कि दुकान, चाय और किराने की दुकान हो गई थी। करीब तीन चाय के बाद अचानक मेरी निगाह उन छोटे पहाड़ों पर पड़ी जिनके पीछे से निकलकर बहुत सारी धुंध हमारी तरफ बढ़ी चली आ रही थी...। वह दोनों पति-पत्नि अपने काम में व्यस्त थे... मैने चिल्लाकर कहाँ -’वह देखो... धुंध कितनी अच्छी लग रही है।’
दोनों ने एक बार निग़ाह उठाकर देखा और फिर अपने काम में व्यस्त हो गए। मैं जल्दी-जल्दी कुछ तस्वीरे लेने लगा...। केमरे के लेन्स में से मुझे एक छोटा सा सफेद धब्बा जैसा कुछ दिखा... मैंने लेन्स पर से आँखें हटाकर देखा तो.. एक बूढ़ा आदमी नीचे किसी गाँव से हमारी तरफ चला आ रहा है... उसकी चाल उसकी उम्र के हिसाब से काफ़ी तेज़ थी...। वह कुछ ही देर में दुकान पर पहुँच चुका था। वह आते ही चाय वाले के साथ बातचीत में व्यस्त हो गया.... वह अपनी बोली में बात कर रहे थे...सो मैं वापिस पहाड़ो को देखने लगा। मुझे लगा कि उस छोटे से पहाड़ के पीछे किसी ने बहुत सारी आग जला रखी है, जिसका धुआ वहाँ से निकलकर हमारी तरफ बढ़ता आ रहा है। कुछ ही देर में उस पूरी धुंध के भीतर अब हम थे...और यह चाय की दुकान थी और यह पूरा गाँव था....। वह चाय वाला कहने लगा कि ’धुंध की अपनी एक खुश्बू होती है....।’ मैंने पूछा कि ’कैसी होती है?’ वह कहने लगा कि ’आप जब यहाँ ज़्यादा रहेगें तो आपको पता चल जाएगा।’
यह सुनते ही मुझे ध्यान आया कि पाँच बज चुके है और मुझे अभी करीब आठ-नौ किलोमीटर का फासला पैदल तेय करना है... अपने गेस्ट हाऊस पहुचने के लिए... और जैसा डरपोक मैं हूँ... रात को अकेले इस जंगल में चलना... इस विचार से ही मेरी रुह काँप गई थी। पता नहीं कैसे... वह चाय वाले ने मेरा डर सूंध लिया... और उन्होने कहा कि आप इनके साथ वहाँ तक जा सकते है... यह उसी गाँव में रहते है जहाँ आपका गेस्ट हॉऊस है...। मैंने तुरंत हाँ कह दिया, बेग़ अपने कंधे पर टांगा और इंतज़ार करने लगा कि वह बुढ़ा आदमी उठेगा.. पर वह वहीं बैठा रहा। उसने एक चाय मांगी... मैंने घड़ी की तरफ एक बार देखा। मैंने महसूस किया कि उसने मेरी तरफ बस एक बार, सरसरी निग़ाह से देखा था, वह भी जब वह इस चाय की दुकान में आया था... उसके बाद से या तो वह उस चाय वाले से बात कर रहा है या वह शून्य में कहीं देख रहा है। एक पर्यटक होने के नाते, यह हमेशा अपेक्षित रहता है कि लोग लगातार अपको देखें, आपसे बात करने के बहाने ढूढें...और बहुत जल्द आपको इसकी आदत भी पड़ जाती है.... पर यह बुज़ुर्गवार है कि इस चाय की दुकान में मेरा होना ही मानो टाल गए हैं। मुझे हल्का सा गुस्सा आने लगा... यह बिलकुल वैसा ही गुस्सा था जैसा गुस्सा मैंने पहली बार शेर को देखते हुए महसूस किया था... वह पिंजरे में था और मैं उसके एकदम सामने खड़ा था... पर उसका व्यवहार कुछ ऎसा था कि मानों मैं वहाँ नहीं हूँ या मैं पारदर्शी हूँ...! मैं उस शेर के सामने चिल्लाने लगा... अजीब सी हरक़ते करने लगा पर उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगी...। मेरे दोस्त कहते हैं कि उस वक़्त मैं शेर के सामने बंदर जैसा लग रहा था।
जब वह बुज़ुर्गवार चाय पीने लगे तो मैंने अपना बेग़ उतारकर रख दिया... थोड़ा से गुस्से में रखा कि उन्हें पता चले कि मैं उनका इंतज़ार कर रहा हूँ...मैंने ज़्यादा गुस्सा नहीं किया, क्योंकि यहाँ मैं बंदर होने से बचना चाह रहा था। मैंने एक चाय और मांग ली...जिसपर उस दुकान की मालकिन ने मुझे ज़्यादा चाय ना पीने पर एक लेक्चर सुना दिया...। मैं उठकर उस चाय की दुकान के बाहर आ गया...। चाय खत्म की और अपने और उन महाश्य के चाय के पैसे दिये... इस बात पर उन्होने सिर्फ मुझे एक बार देखा, मुस्कुराए भी नहीं तो धन्यवाद देना तो दूर की बात है।
खैर करीब आधे घंटे बाद हम दोनों वहाँ से निकले.. साड़े पाँच बज चुका था।.... सुरज का दिखना बंद हो चुका था... वह बुज़ुर्गवार आगे चल रहे थे और मैं उनके पीछे था। इस बीच मैंने उनका नाम पूछा... करीब तीन बार...... पर उन्होने कोई जवाब नहीं दिया तो मैं चुपचाप चलता रहा। थोड़ी ही देर में अंधेरा बढ़ने लगा था मैंने अपनी टॉर्च अपने बेग़ से निकाली...। कुछ देर उसे हाथ में रही रखा... फिर धीरे से जलाकर देखा कि ठीक से काम कर रही है कि नहीं...। मेरी टार्च जलाते ही वह बोले... ’टॉर्च वापिस अंदर रख दो..।’ मैंने कहाँ ’अंधेरा बहुत है रास्ता नहीं देखेगा?’ वह चुप रहे...। मैं टॉर्च तो बंद कर चुका था पर कोई जवाब ना मिलने के कारण मैंने उसे अपने बेग़ में नहीं डाला, उसे अपने हाथों में ही दबाए रखा। फिर वह धीरे से बोले-’यहाँ टॉर्च की ज़रुरत नहीं पड़ती, उसे अंदर रख लो...। वह हाथ में रहेगी तो जलाने का लॉलच बना रहेगा।’ उनकी आवाज़ रात होने के साथ-साथ भारी होती जा रही थी। एक आश्चर्य की बात लगी कि उनकी हिन्दी कतई पहाड़ीपन लिए हुए नहीं थी... वह एकदम साफ हिन्दी बोल रहे थे। मैंने टॉर्च अंदर रख दी... सोचा अगर अकेले चल रहा होता तो टॉर्च के बाद भी यह अंधेरा सहन नहीं होता... इनके साथ चलने में कम से कम डर तो कम ही लगेगा।
दिन में यही जंगल, जो मुझे इतना खूबसूरत लगता कि मैं घंटो यहाँ अकेला टहल सकता हूँ वही जंगल, रात होते ही मानों एक भयानक भूत या पता नहीं किसमें तबदील हो जाता है..। ओह हो! मैं यह सब सोच ही क्यों रहा हूँ.... मैं अपने आपको कोसने लगा। तभी ऊपर पहाड़ पे किसी की आहट हुई.... मेरी ऊपर की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई... मैंने दो तीन कदम तेज़ रखे और उन बुज़ुर्गवार के ठीक बग़ल में चलने लगा... लगभग चिपके हुए..। मैं कुछ कहना नहीं चाह रहा था पर एक अजीब से सुर में मेरे मुँह से निकला..’कितनी देर लगेगी गाँव तक पहुचने में...?’
रात अचानक हो गई... मानों किसी ने बटन दबाकर बल्ब बंद कर दिया हो। सच कहूँ ठीक इस वक्त मुझे किसी से भी डर नहीं लग रहा था... ना ही इस जंगल से... ना रात से... ना अगल बगल में आ रही अजीब सी आवाज़ो से... मुझे इस वक्त डर लग रहा था तो सिर्फ, इन बुज़ुर्गवार से जो मेरी बातों का जवाब ही नहीं दे रहे थे...। अरे! कह देते उस चाय की दुकान पर ही कि हम रास्ते में कोई बात नहीं करेगें... तो मैं भी समझ जाता कि भाई, इन्हें चलते हुए बात करना ठीक नहीं लगता है। पर उनकी यह चुप्पी मुझे बुरी तरह डराए जा रही थी.... मैं थोड़ा उनसे दूर होके चलने लगा... एक निग़ाह, पूरा अंधेरा छान रही थी... तो दूसरी निग़ाह उनपे लगी हुई थी। उनकी चुप्पी इस रात में एक ऎसा डरावना सन्नाटा पैदा कर रही थी कि वह बर्दाश्त नहीं हो रहा था...। मुझे इतना डर लगने लगा कि मैं अजीब-अजीब सी कल्पना करने लगा... कि मानो यह बुज़ुर्गवार अभी पलटकर मुझसे कहेगें कि बस मैं तो इसी पेड़ पर रहता हूँ अब तुम अकेले जाओ... और अचानक उछल के पेड़ पर चले जाए.... या अजीब सी आवाज़ में हसँना शुरु कर दें... मेरा दम दो सेकेन्ड में निकल जाएगा। मैंने धीरे से उनके पैर देखे..... खुशी हुई कि वह सीधे है। हाँ मैं जानता हूँ यह सब बहुत बचकाना है.... पर ठीक इस वक्त अगर मेरी जगह कोई भी होता और वह भी मेरी तरह डरपोक... तो वह भी यही सब सोच रहा होता। बहुत दूर एक बल्ब की रोशनी थी जो मोडों पर ग़ायब हो जाती थी और फिर कुछ देर में वापिस आ जाती थी... पर उस बल्ब की रोशनी की दूरी कम नहीं हो रही थी... अचानक मुझे लगने लगा कि यह आदमी मुझे यहीं गोल-गोल धुमा रहा है... रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था.... दिन में मुझे इतना वक़्त तो नहीं लगा था..???... मैंने हिम्मत करके फिर पूछा....’कितनी दूरी और है?’ इस सन्नाटे में मुझे मेरी ही आवाज़ इतनी ज़्यादा लगी कि आधा वाक्य मैं डर के मारे अपने मुँह में ही बोल गया। आप यक़ीन नहीं करेगें वह तब भी चुप ही रहे। एक भीतर से इच्छा हुई कि अभी दौड़ लगाना शुरु कर दू...पर मैं चुपचाप उनके पीछे-पीछे चलता रहा... अब मेरी निग़ाह पूरी तरह उनके ऊपर थी...अगल-बगल के अंधेरे से अब मुझे कोई मतलब नहीं था।
मैंने इस बार गला साफ करके, अपने पूरे डरे हुए आत्म विश्वास को समेटते हुए पूछा... ’अरे! साहब कितना समय और लगेगा।’ इस बार उन्होंने मेरी तरफ एक बार देखा...। शायद मेरे प्राण-पखेरु के अभी पंख नहीं निकले थे... वरना वह अभी, इसी वक़्त उड़ चुके होते। मैंने खुद डर के मारे अपनी निग़ाह हटा ली..... वापिस पलटकर देखा तो वह अपनी गति से चल रहे है... आगे, अधेरे में शून्य की तरफ देखते हुए....। मेरी अब जॉन ही सूखती जा रही थी.... या तो वह कुछ बोले या मैं अभी इसी वक़्त अपने प्राण त्याग दूगां। उनके हाथ में एक डंडा था... पर वह उसे टिकाकर नहीं चल रहे थे... वह बस उनके हाथ में था.... चाल भी ऎसी कि चलने की आहट भी नहीं हो रही थी...। भीतेर एक इच्छा तीव्रता पर उठने लगी कि उनका डंडा छीनकर उन्हीं के सिर पर दे मारु और दौड़ लगा दूं....।
तभी एक आवाज़ आई... यह उन्हीं की आवाज़ थी....-’तुम कुछ सुन रहे हो....?’ मैं समझ ही नहीं पाया....!!! ’जी..?’ बस मेरे मुँह से बस इतना ही शब्द निकला...., वह भी इसिलिए कि कहीं वह यह बोलकर फिर चुप न हो जाए। ’यह छोटी-छोटी आवाज़े...यह लय...? तुम्हें सुनाई नहीं दे रही... इसी को रात का होना कहते हैं।’ मैं चुप था.... उनके बोलने में एक अजीब सा संगीत था...। ’गाँव बस आने ही वाला है....।’ वह धीरे से बोले... और थोड़ी दूर तक शांत रहे..। मेरे पीछे से जैसे कोई मेरे डर को खींचे जा रहा था...’गाँव बस आने ही वाला है।’ यह वाक्य सांत्वना पुरुस्कार की तरह काम कर गया, मेरा आधा डर जाता रहा...। मैं उनके बारे में अब बहुत बुरा भी नहीं सोच रहा था....। तभी वह रुक गये... बिना मुझे कुछ बताए सड़क से नीचे की तरफ उतर गए... मुझे फिर लगने लगा कि यह एक पेड़ के ऊपर चढ़ने वाले हैं। मैं सड़क पर, अधेरे में एक दम अकेला खड़ा था... मैंने धीरे से आवाज़ लगाई..’अरे साहब.... कहाँ चल दिये... सुनिये...।’ कुछ और भी संबोधन जैसे शब्दों को जोड़कर, कुछ टूटे-फूटे वाक्य बोलने के बाद, मैं चुप हो गया....। मेरा आधा डर जो पीछे कहीं छूट गया था वह वापिस मुझसे आ चिपका...। मैं अपने चारों तरफ देखने लगा... धीरे से बेग़ में हाथ गया और मैंने टटोलकर अपनी टॉर्च निकाल ली.... मैं उसे जलाने ही वाला था कि मुझे उनकी पेशाब करने की आवाज़ आने लगी...। मैंने टॉर्च नहीं जलाई... मैं थोड़ उनकी और जाकर खड़ा हो गया...। पेशाब की आवाज़ आना बंद हो गई.. पर वह ऊपर नहीं आए.. मैंने थोड़ा निग़ाह गड़ाकर देखने की कोशिश की... जिस तरफ वह गए थे... पर मुझे कोई नहीं दिखा..। मैंने अपनी टॉर्च जला ली और नीचे की तरफ देखा पर वह कहीं भी दिखाई नहीं दिये। टॉर्च की रोशनी में इस अधेरे को और भी भयानक बना रही थी...। मैंने आवाज़ लगाई....’ददा... दाजू... भाई साहब... आप ठीक तो हैं।’ तभी सड़क के आग से आवाज़ आई... ’चलो.. वहाँ क्यों खड़े हो...?’ अरे! वह आगे कब निकल गए? मैंने उनपर टॉर्च मारी... तो अजीब सा महसूस होने लगा... वह दूर खड़ए टॉर्च की रोशनी में और भी भयानक लग रहे थे, मेरी उनके पास जाने की हिम्मत नहीं हुए...। मैंने टॉर्च को बंद कर दिया... तेज़ कदमों से उनकी तरफ चलने लगा...। वह मुझे देखे जा रहे थे..., जैसे-जैसे मैं उनके पास पहुच रहा था... मुझे लगा मानों वह कुछ करने वाले हैं... पता नहीं पर उनकी आँखों में मुझे एक शेर की तैयारी दिखी... जब वह शिकार करने के पहले एक आखरी बार अपने शिकार को पेनी निग़ाह से देखता है...। मैं चलते-चलते कांप रहा था....सो मैंने दौड़ना शुरु कर दिया...। सीधे उनकी ही तरफ... वह सामने से हटे नहीं, मैंने भागते हुए उन्हें ज़ोर से टक्कर मारी... वह बुज़ुर्गवार नीचे गिर गए...। मैंने दौड़ना बंद नहीं किया... मैं भागता रहा.... जब तक कि मेरा गेस्ट हॉऊस नहीं आ गया। यह सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि मैं जब अपने कमरे में सोने की तैयारी करने लगा तब मुझे अचानक उन बुज़ुर्गवार की चिता होने लगी...। रात काफ़ी देर तक जगता रहा पर रुम से निकलने की हिम्मत नहीं हुई, सोचा सुबह उठते ही पता करुगाँ।
सुबह उठते ही मैं सीधा उस जगह पहुचा... मैं वहाँ पहुचते ही अपने आपको कोसने लगा... इस खूबसूरती से मैं गई रात डर रहा था? लानत है मुझ पर। उन्हें ढूढंने की कोशिश की पर वह कहीं भी नहीं दिखे फिर वापिस मैं गाँव लोट आया। अंदर गेस्ट हॉऊस में जाने की इच्छा नहीं थी सो बाहर ही एक चाय की दुकान पर बैठा चाय पीने लगा....। अभी मुझे यहाँ करीब दस दिन और रहना है...। मैंने पेपर पढ़ने लगा। तभी मेरे सामने से एक आदमी, छोटे से बच्चे को साथ में लिए गुज़र रहा था... और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, यह तो वह ही बुज़ुर्गवार हैं...। उन्होंने मेरी तरफ देखा... और थोड़ी ही देर में निग़ाह फेरते हुए सीधे जाने लगे... मैं उनसे माफ़ी मॉगना चाह रहा था....। मैंने उन्हें आवाज़ लगाई एक बार... दो बार पर वह नहीं मुड़े...। अलबत्ता, उनके साथ चल रहे बच्चे ने एक बार पलटकर मेरी तरफ देख लिया। तभी चाय वाले ने मुझे बताया... वह द्येउनदा हैं। मैं द्येउनदा के नाम से चिल्लाने लगा... तो उस चाय वाले ने मुझे टोकते हुए कहाँ कि वह तो बहरे हैं... उन्हें सुनाई नहीं देता। पर... मैंने चाय वाले से कहाँ कि रात में तो वह मेरे साथ थे... मुझे नहीं लगा कि वह नहीं सुन सकते हैं। मैंने उस बहस में ज़्यादा समय नहीं बर्बाद किया... मैं एक बहुत बड़े गिल्ट से मरा जा रहा था... मैंने अपनी चाय वहीं छोड़ी और मैं भागता हुआ उनके पास पहुँचा..। जब मैं उनके सामने जाकर खड़ा हुआ,तो वह रुक गए...। मैंने इशारे से उनसे माफ़ी माँगी... पर वह मुझे आश्चर्य से देखते रहे.. जैसे उन्हें कुछ भी याद नहीं हो। मैंने उनके पैर पड़ लिए... और बगल की दुक़ान से बहुत सारी टॉफ़ियाँ खरीदकर, उस बच्चे के हाथ में भर दी..और वापिस उनके सामने खड़ा हो गया... मैं उनके सामने से हटा नहीं...मैं माफ़ी चाह रहा था.. तभी, पहले उनकी आँखें, फिर उनके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई.. मानों उतनी देर में उन्होंने, बीती हुई रात, मेरी आँखों में पढ़ ली। उनके मुस्कुराते ही मैंने एक गहरी सॉस ली... और उनके सामने से हट गया। वह उस बच्चे के साथ आगे चल दिये...।

1 comment:

विनय said...

संवेदन शील रचना! धन्यवाद!

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल