Sunday, April 18, 2010

दूसरा आदमी....


दूसरा आदमी...

मैं खाना बनाने की तैयारी करने लगा। पीछे से माँ ज़िद्द करने लगी ‘नहीं खाना मैं बनाऊंगी’। इस युद्ध में जीत माँ की ही होनी थी... पर मैं ज़िद्द करके टमाटर, प्याज़, हरि मिर्च काटने लगा।
’आप इतनी दूर से सफर करके आई हो। खान आप ही बनाना, मैं बस तैयारी कर देता हूँ।’
माँ चुपचाप बालकनी पर जाकर खड़ी हो गई। उन्हें मुझे इस तरह देखने की आदत नहीं है। कई साल पहले जब वह मुझसे मिलने आती थीं तो अनु साथ होती थी... तब मैं शादी-शुदा था। माँ, अनु को बहुत पसंद करती थीं....। शायद इतने साल माँ इसलिए मुझसे मिलने नहीं आई...
’घर बहुत छोटा है... पर सुंदर है।’
माँ ने कहाँ...मैं चुप रहा। सब काट लेने के बाद मैं भी बालकनी में जाकर खड़ा हो गया। पीछे जंगल था.. हरियाली दिखती थी। माँ कुछ और तलाश रही थी... उनकी निग़ाहें कहीं दूर किसी हरे कोने से जिरह कर रही थी। मैं बगल में आकर खड़ा हो गया, इसकी उन्हें सुध भी नहीं लगी। माँ बहुत छोटी थी... मेरे कंधे के भी नीचे कहीं उनका सिर आता था। मेरा भाई और मैं मज़ाक में कहाँ करते थे कि ’अच्छा हुआ हमारी हाईट माँ पर नहीं गई, नहीं तो हम बोनज़ाई humans लगते।’ माँ की आँखों के नीचे कालापन बहुत बढ़ गया था... वह बहुत बूढ़ी लग रही थी। क्या मैं रोक सकता हूँ कुछ..? उनका बूढ़ा होना ना सही पर उनके आँखों के नीचे का कालापन वह?... पता नहीं कितनी सारी चीज़े है जिनका हम कुछ भी नहीं कर सकते है.. बस मूक दर्शक बन देख सकते हैं.. सब होता हुआ... सब घटता हुआ, धीरे-धीरे। मेरी इच्छा हो रही थी माँ के गालों पर हाथ फेर दूं... उनकी झूल चुकी त्वचा को सहला दूं... कह दूं कि ’मुझसे नहीं हो सका माँ... कुछ भी नहीं’। पर इस पूरी प्रक्रिया में वह रो देती.. और मैं यह कतई नहीं चाहता था। पिछले कुछ सालों में मैंने माँ के साथ अपने सारे संवादों में ’मैं खुश हूँ..’ की चाशनी घोली है...। उन्हें मेरे अकेलेपन, खालीपन की भनक भी नहीं लगने दी.. जिसकी अब मुझे आदत हो गई है... अब लगता है कि इस खालीपन, अकेलेपन के बिना मैं जी ही नहीं सकता हूँ...
’इस बालकनी में तुम कुछ गमले क्यों नहीं लगा लेते?’
इस बीच माँ की आवाज़ कहाँ से आई मुझे पता ही नहीं चला...उनके बूढ़े झुर्रियों वाले गाल बस हलके से हिले थे। वह अभी भी मुझे नहीं देख रही थी।
’इच्छा तो मेरी भी है.. पर यह किराय का घर है, पता नहीं कब बदलना पड़े... और यूं भी मेरा भरोसा कहाँ है.. कभी ज़्यादा दिन के लिए कहीं चला गया तो....।’
माँ मेरे आधे वाक्य में भीतर चली गई....। मेरे शब्द टूटे... झड़ने लगे.. गिर पड़े और मैं चुप हो गया। माँ ने खुद को खाना बनाने में व्यस्त कर लिया।
मेरे और माँ के बीच संवाद बहुत कम होते गए थे। पहले ऎसा नहीं था, पहले हम दोनों के बीच ठीक-ठीक बात चीत हो जाती थी... और विषय भी एक ही था हमारे पास-अनु। पर अब उन्हें लगता है कि मैं अनु की बात करके इसे दुखी कर दूगीं... अगर गलती से मैं अनु की बात निकाल लेता तो वह कुछ ही देर में विषय बदल देती। इन बीते सालों में.... माँ खूब सारी बातों का रटा-रटाया सा पुलिंदा लिए मुझसे फोन पर बात करती थी... फिर बीच में बातों के तार टूट जाते या पुलिंदा खाली हो जाता तो हम दोनों चुप हो जाते.... बात खत्म नहीं हुई है मैं जानता था, वह कुछ ओर पूछना चाहती हैं.. कहना चाहती हैं... कुछ देर मैं उनकी सांसे सुनता.. और वह धीरे से बिना कुछ कहे फोन काट देती। धीरे-धीरे हमारा फोन पर बात करना बंद हो गया। मैं कभी फोन करता तो वह जल्दी-जल्दी बात करती मानों बहुत व्यस्त हो। इस बीच वह मुझे ख़त लिखने लगी थी। शुरु में जब ख़त मिलते तो मैं डर जाता... पता नहीं क्या लिखा होगा इनमें? पर अजीब बात थी कि वह सारे ख़त मेरे बचपन के किस्सों से भरे हुए थे... कुछ किस्से इतने छोटे कि उनके कुछ मानी ही ना हो। उन ख़तों के जवाब मैंने कभी भी नहीं दिए। मैंने बहुत कोशिश की पर जब भी पेन उठाता तो मुझे सब कुछ इतना बनावटी लगने लगता कि मैं पेन वापिस रख देता। मैं अधिक्तर खतों में भटक जाता था.. या कभी-कभी कुछ इतनी गंभीर बात लिख देता था कि उसे संभालने में ही पूरा का पूरा ख़त भर जाता। वह ख़तों में मेरे बचपन के आगे नहीं बढ़ती थी...। बचपन के बाद जवानी थी जिसमें मैं अकेला नहीं था, वहाँ अनु मेरे साथ थी... इसलिए वह ख़त कभी लिखे नहीं गए।
खाना खाते वक्त हम दोनों चुप थे। माँ ने टमाटर की चटनी बनाई थी जो मुझे बहुत पसंद थी। जब भी माँ खाना खाती है तो उनके मुँह से खाना चबाने की आवाज़ आती है.. करच-करच। मुझे शरु से यह आवाज़ बहुत पसंद थी... मैंने कई बार माँ की तरह खाने की कोशिश की पर वह आवाज़ मेरे पास से कभी नहीं आई।
’क्या हुआ? मुस्कुरा क्यों रहे हो?’
वह मुझे देख रही थीं मुझे पता ही नहीं चला...मैं उस आवाज़ के बारे में उनसे कहना चाहता था पर यह मैं पहले भी उनसे कह चुका हूँ सो चुप रहा।
खाना खाने के बाद मेरे दोस्त रिषभ का फोन आया...मैं उसके साथ कॉफी पीने चला गया। रिषभ जानता था माँ आ रही है। हमारे दोस्तों के बीच यह बहुत प्रचलित था... जब रिषभ के माँ-बाप शहर आए हुए थे तो हमारी ज़िम्मेदारी होती थी उसे घर से बाहर निकालने की । वह बाहर आते ही लंबी गहरी सांस लेता और कहता ’ओह.. मैं तो मर ही जाता अगर तुम्हारा फोन नहीं आता तो।’
coffee shop में जैसे ही रिषभ ने मुझे देखा वह हंसने लगा...
’बचा लिया.. बच्चू...।’
मैं खिसिया दिया। उसने कॉफी आर्डर की और मेरे सामने आकर बैठ गया।
’क्या? बचा लिया... तुझे?’
इस बार उसने प्रश्न पूछा। क्या जवाब हो सकता है इसका। मैं फिर मुस्कुरा दिया और सोचने लगा किससे बचा लिया... माँ से? उनके मौन से? उन बातों से जो माँ से आँखे मिलते ही हम दोनों के भीतर रिसने लगती थी? या फिर खुद से....?
’मैंने मेघा को भी बुला लिया.. वह भी आती होगी।’
’क्यों? मेघा को क्यों बुला लिया?’
’अरे यूं ही... उसका फोन आया था वह तेरे बारे में पूछ रही थी।’
’मैं ज़्यादा देर रुक नहीं पाऊंगा... माँ अकेली है।’
माँ अकेली है कहने के बाद ही मुझे लगा... हाँ माँ बहुत अकेली है। इच्छा हुई कि अभी इसी वक़्त वापिस चला जाऊं... पर मैं बैठा रहा।
’उसने कहाँ... उसने तुझे फोन किया था पर तूने उठाया नहीं...?’
’हाँ मैं व्यस्त था।’
’कैसी है माँ?’
’अच्छी हैं...।’
’यार सुन.. चली जाएगीं माँ कुछ दिनों में इतना परेशान होने की ज़रुरत नहीं है।’
’नहीं, मैं परेशान नहीं हूँ... सब ठीक है... थेंक गॉड तूने फोन कर दिया...अभी अच्छा लग रहा है।’
यह सुनते ही रिषभ खुश हो गया। जो वह सुनना चाहता था मैंने कह दिया था। तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा.. मैं उसकी तरफ मुड़ा ही था कि वह मेरे गले लग गई... कुछ इस तरह कि ’मैं तुम्हारा दुख समझती हूँ।’ मैं समझ गया यह मेघा ही है। वह कुछ देर तक मेरे गले लगी रही, मैं थोड़ा असहज होने लगा था। तभी वह मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगी... मुझे ऎसी सांत्वनाओं से हमेशा घृणा रही है। मैंने तुरंत मेघा को अलग कर दिया। वह मेरे बगल में बैठ गई और बैठते ही उसने भरे-गले से पूछा...
’कैसे हो....?’
मेरी इच्छा हुई कि अभी इसी वक्त यहाँ से भाग जाऊं...।
’कॉफी पियोगी...?’
यह कहते ही मैं उठने लगा। तभी रिषभ The Matchmaker बोला...
’तुम लोग बैठों... मैं लेकर आता हूँ कॉफी...।’
रिषभ के जाते ही मेघा ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया।
’मैंने तुम्हें फोन किया था।’
’हाँ.. sorry मैं बिज़ी था।’
’yaa.. I understand..’
‘मैं यहाँ ज़्यादा रुक नहीं पाऊंगा.. माँ घर में अकेली होगी...।’
’तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ आ सकती हूँ।’
’no thank you…’
मुझे पता है रिषभ कॉफी लेकर जल्दी नहीं आएगा। वह हम दोनों को “अकेले” समय देना चाहता है। मेघा बहुत अच्छी लड़की है पर उसमें मातृत्व इतना भरा हुआ है कि वह मुझे असहज कर देती है। रिषभ के हिसाब से वह मेरा ख्याल रखती है, जबकि मेरे हिसाब से वह उन महिलाओं में से है जो दूसरों के दुख की साथी होती हैं... उन्हें इस काम में बड़ा मज़ा आता है... दूसरों के दुखों में एक सच्चे दोस्त की हैसियत से भागिदारी निभाना। मेघा जब भी मुझे देखती है मुझे लगता है कि वह मेरे चहरे में दुख की लक़ीरे तलाश कर रही है। उसके साथ थोड़ी देर रहने के बाद मैं सच में दुखी हो जाता हूँ। रिषभ के कॉफी लाते ही मैं उठ गया। रिषभ मना करता रहा पर मैं नहीं माना... जाते-जाते मेघा ने बहुत गंभीर आवाज़ में मुझसे कहाँ कि ‘you know i am just a phone call away... ‘ मैंने हाँ में सिर हिलाया और लगभग भागता हुआ अपने घर चला गया।
मेरी कभी-कभी इच्छा होती थी कि मैं झंझोड़ दूं या पुरानी घड़ी की तरह, माँ और मेरे बीच के संबंध को नीचे ज़मीन पर दे मारु और यह संबंध फिर से पहले जैसा काम करना शुरु कर दे। बीच में बीते हुए सालों को रबर लेकर मिटा दूं.. घिस दूं.. कोई भी निशान ना रहे। मैं सब भूलना चाहता हूँ पर माँ भूलने नहीं देती, शायद माँ भी सब भूलना चाहती हैं पर मेरे अगल-बगल के रिक्त स्थान में उसे बार-बार अनु का ना होना दिख जाता होगा।
अनु यहीं है इसी शहर में..., अगर वह किसी दूसरे शहर में होती.. या दिल्ली में, अपनी माँ के पास चली जाती तो शायद सबकुछ थोड़ा सरल होता। माँ अभी-भी आशा रखती हैं कि सबकुछ पहले जैसा हो सकता है। जीवन कितने तेज़ी से आगे बढ़ जाता है... पता ही नहीं चलत। माँ बहुत पुराना जी रही हैं... नया उन्हें कुछ भी नहीं पता। उन्हें नहीं पता कि अनु अब किसी ओर के साथ रहने लगी है। वह उससे जल्द शादी करने वाली है। हमारा लिखित, कानूनन तलाक़ हो चुका है। जिसके पेपर मैंने ना जाने क्यों अपने ज़रुरी काग़ज़ातों के बीच संभालकर रखे हैं। मैं कभी-कभी उसे अकेले में खोलकर पढ़ लिया करता था.. पूरा, शुरु के आखीर तक... हमेशा मुझे आश्चर्य होता था कि एक निजी संबंध को अलग करने में कितने सरकारी मरे हुए शब्दों का प्रयोग किया जाता है। मुझे हमेशा वह petition एक कहानी की तरह लगता था।
मैंने दरवाज़ा खोला तो माँ सतर्क हो गई। मैंने देखा उनके हाथ में मेरी डायरी है। कुछ सालों से मेरी डायरी लिखने की आदत सी लग गई थी। उसमें मैं दुख, पीड़ा, दिन-भर की गतिविधी नहीं लिखता था.. उसमें मैं आश्चर्यों को लिखता था। छोटे आश्चर्य.. जैसे आज एक लाल गर्दन वाली चिड़ियाँ बालकनी में आई... मैंने उसके ठीक पास जाकर खड़ा हो गया पर वह उड़ी नहीं वह मुझे बहुत देर तक देखती रही... या आज चाय में मैंने शक्कर की जगह नमक डाल दिया। माँ ने मुझे देखते ही वह डायरी फ्रिज के ऊपर ऎसे रख दी मानों सफाई करते हुए उन्हें वह नीचे पड़ी मिली हो।
’रात को क्या खाओगे?’
माँ ने तुरंत बात बदल दी। मैंने डायरी को अलमिरा के भीतर, अपने कपड़ों के नीचे दबा दिया।
’आज कहीं बाहर चलकर डिनर करें?’
’कहाँ जाएगें?’
’बहुत सी जगह हैं। चलिए ना... मैंने भी बहुत दिनों से बाहर खाना नहीं खाया है।’
’ठीक है।’
माँ को बाहर होटल में खाने में बहुत मज़ा आता था। जब भी वह बहुत खुश होती थी तो कहती थी ’चलो आज बाहर खाना खाते हैं।’ एक बार अनु और मैं उन्हें सिज़लर खिलाने ले गए थे.. उन्हें सिज़लर खाते हुए देखना... हम दोनों की हंसी रुक ही नहीं रही थी।
हम दोनों एक साऊथ इंडियन रेस्टोरेंट में जाकर बैठ गए। मैंने स्पेशल थाली आर्डर की और माँ ने रेग्युलर। मुझे बहुत भूख लग रही थी सो मैं थाली आते ही खाने पर टूट पड़ा। माँ बहुत धीरे-धीरे खा रहीं थी। कुछ देर में उन्हेंने खान बंद कर दिया।
’खाना ठीक नहीं लगा क्या?’
मैंने खाते हुए पूछा।
’मन खट्टा है... स्वाद कहाँ से आएगा।’
मेरा भी खाना बंद हो गया। जिन बातो के ज़ख़्म हमने घर में दबा के रखे थे... मुझे लगा वह यहाँ फूट पडेगें। ’क्या हुआ?’ मैं पूछना चाहता था पर मैं चुप रहा। माँ पानी पीने लगी। मेरी भूख अभी खत्म नहीं हुई थी... पर एक भी निवाला और खाना मेरे बस में नहीं था।
’भाई कैसा है?’
माँ ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। मेरे भाई और मेरी बातचीत बहुत पहले बंद हो चुकी है। मेरे अकेले रह जाने का ज़िम्मेदार वह मुझे ही मानता है। माँ उसी के साथ रहती हैं। उसने माँ को भी मना कर रखा था मुझसे मिलने के लिए। अब शायद उसका गुस्सा भी शांत हो गया होगा और उसने माँ से कहाँ होगा कि ’जाओ देख आओ आपने लाड़ले को..’ और माँ भागती हुई सब ठीक करने चली आई।
’अजीब सा बनाया है आपने यह... कोई स्वाद ही नहीं है।’
मैंने वेटर को बुलाके फटकारा... वह दोनों थाली उठाकर ले गया।
’माँ चलो आस्क्रीम खाते है...।’
’मुझे कुछ भी नहीं खाना है... कुछ भी नहीं... चल घर चलते हैं।’
मैंने बिल चुकाया और हम दोनों घर वापिस आ गए।
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और वह मुझे लेकर बालकनी में चली आई...। वह हमेशा ऎसा ही करती थी... जब भी कोई ज़रुरी बात हो वह हाथ पकड़कर, अलग लेजाकर बात कहती थी। पर यहाँ तो कोई भी नहीं था... शायद बात ज़ाया ज़रुरी होगी।
’अब तू क्या करेगा?’
’कुछ भी नहीं माँ... मैं क्या कर सकता हूँ।’
’तू एक बार उसे फोन तो कर लेता...?’
’नहीं... उसने मना किया है।’
’क्या? क्यों? तू उसका पति है... तू फोन भी नहीं कर सकता है क्या?’
माँ की आवाज़ थोड़ी ऊंची हो गई... मैं चुप ही रहा।
’तू बहुत ज़िद्दी है। यह ठीक नहीं है... कभी-कभी तुझे जो अच्छा ना लगे वह भी तुझे करना चाहिए.. कभी तो अपने अलावा किसी ओर के बारे में सोच... तू हमेशा, हर जगह महत्वपूर्ण नहीं है।’
’माँ इस संबंध को अब नहीं बचाया जा सकता है।’
’अगर तू चाहे तो सब हो सकता है।’
’अब वह समय निकल चुका है... यूं मेरे हाथ में कुछ था भी नहीं...।’
’क्या मतलब समय निकल चुका है?’
’जैसे आप यह सब होता हुआ देख रही है वैसे ही मैं भी यह सब होता हुआ देख ही रहा हूँ।’
’तू सीधे-सीधे क्यों नहीं बात करता है?’
क्या सीधे-सीधे बात की जा सकती थी? शायद मैं सीधे-सीधे बात कर सकता, पर उन सीधी बातों के शब्द इतने नुकीले थे कि वह मेरे कंठ में कहीं अटक जाते, चुभने लगते..| मैं सब कुछ सीधा ही कहना चाहता पर उस चुभन के कारण बाहर अर्थ बदल जाते... मैं अब सीधी बात नहीं कह सकता हूँ। मैं बालकनी से निकलकर भीतर चला आया...। माँ वहीं खड़ी रही... मैं जानता हूँ इस वक्त माँ मेरी बातों के ताने-बाने से अर्थ निकालने में जुटी होगीं.. फिर उन अर्थ के बहुत से सवाल होगें... और उन सवालों के जवाब फिर मेरे कंठ में चुभेगें और इस बार मैं चुप रहूंगा।
क्या हुआ था मेरे और अनु के बीच..?
अब मैं उसके बारे में सोचता हूँ तो मुझे हंसी आ जाती है।
हम दोनों एक लंबी सैर के लिए निकले थे... मैं अपना वालेट घर पर भूल गया। उसने कहाँ ’क्यों चाहिए तुम्हें वालेट? तुम्हारे पास कभी पैसे तो होते नहीं है।’ पर मैं वापिस घर चला गया अपना वालेट लेने..। जब मैं वापिस आया तो वह वहाँ पर नहीं थी... वह चली गई थी। मैंने उसे फोन किया ’कहाँ चली गई?’ उसने कहाँ ’आती हूँ।’ वह बस आने ही वाली थी और मैं इंतज़ार नहीं कर रहा था। जब मैंने इंतज़ार करना शुरु किया, वह वापिस नहीं आई।
माँ बहुत देर बाद वापिस कमरे में आई। मैं दोनों के बिस्तर लगा चुका था। माँ ने हाथ मुँह धोए, अपने बेग से सुंदरकांड की छोटी सी किताब निकाली और उसका पाठ करने लगी। मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। बचपन से ही मुझे माँ के मुँह से सुंदरकांड़ सुनने की आदत है। कुछ देर में मुझे झपकी आने लगी... कब नींद लग गई पता ही नहीं चला। अचानक मुझे आवाज़ आई...
’बेटा...बेटा...।’
मैं थोड़ा हड़बड़ाकर उठा...। माँ मेरे बगल में बैठी थी...।
’क्या हुआ माँ..?’
’तेरी कमर में दर्द रहता है ना... तेरी गरम तेल से मालिश कर देती हूँ।’
मैंने देखा माँ के हाथ में एक कटोरी है..।
’कितना बज रहा है?’
’तू सो जा ना... मैं मालिश करती रहूगीं।’
’माँ मेरी कमर ठीक है बिलकुल... कुछ नहीं हुआ है।’
’मुझे सब पता है तू पलट जा... चल।’
मैं पलट गया और माँ मेरी कमर की मालिश करने लगी। पूरी मालिश के दौरांन मै माँ को कहता रहा ’बस..बस.. हो गया...’ पर माँ नहीं मानी।
मैं उठकर बैठ गया।
’क्या हो गया बेटा...?’
’बाथरुम से आता हूँ...।’
मैं बाथरुम में जाकर थोड़ी देर बैठ गया। माँ मेरी मालिश नहीं कर रही थी वह अपने उस बेटे की छू रही थी जिसे उन्होंने बचपन में अपना दूध पिलाया है, नहलाया-धुलाया है... जिसे उन्होने अपने सामने बड़ा होते देखा था। मैं वह नहीं हूँ। मैं बड़ा होते ही दूसरा आदमी हो चुका हूँ। बचपन मेरे सामने एक खिलोने की तरह आता है... जिससे मैं खेल चुका हूँ। मेरे घर में वह खिलोना अब सजावट की चीज़ भी नहीं बन सकता है।
मैंने मुँह पर कुछ पानी मारा। बाहर आया तो देखा माँ अपने बिस्तर पर लेट चुकी है।
’लाईट बंद कर दूं।’
’हुं...।’
मैंने लाईट बंद कर दी। धीरे से अपने बिस्तर में मैं घुस गया। कुछ करवटों के बाद अचानक माँ की आवाज़ आई।
’बेटा कल मेरा रिज़र्वेशन करा देना।’
’कुछ दिन रुक जाओ।’
’नहीं तेरे भाई ने जल्दी आने को कहाँ था।’
’ठीक है।’
मौन.... सन्नाटा... कुछ करवटों की खरखराहट... फिर मौन... और अंत में नींद।

ऊब से सुलह....



दिनचर्या को खगालने लगा। पड़े-पड़े घर में विचरण.. और क्या कह सकता हूँ इसे मैं? घर के मेरे कई ठिये बन गए हैं, (यूं एक कमरे के घर में बहुत गुंजाइश नहीं होती।) यह विचारबद्ध तय नहीं हुए... यह रहते-रहते आदतन और आलस्य की खिचड़ी से पक के तैयार हुए हैं। सुबह मुझे किचिन की दिवार से टिक के बैठना ठीक लगता है। दोपहर होते ही बालकनी में कुर्सी डाल लेता हूँ, बिस्तरे और कुर्सी के बीच चहलकदमी में शाम हो जाती है। शाम होते ही कुर्सी खुद-ब-खुद भीतर चली आती है। इस सारी दिनचर्या में शाम को नीचे जाकर गोलगप्पे खाना, आजकल शामिल हो गया है। शाम वापसी कुर्सी से चिपकी होती है...। इन सबके बीच चाय का तारतम्य बना रहता है। सूरज ढ़लती चाय मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है... उसे मैं अपनी बालकनी में चिड़ियों से संवाद करते हुए पीता हूँ। इस बीच कुछ चीज़े मैंने बंद कर दी है.. जैसे पंखा ताकते-ताकते दिवास्वपन देखना, टीवी को घूरते रहना, देर तक अखबार पढ़ना, किसी दोस्त के घर यूं ही चले जाना... आदि आदि।
इस सारी मेरी दिनचर्या में जब कभी मेरा फोन बजता है तो मैं उत्साहित हो जाता हूँ। पर फोन पर बात करते ही एक तरह की ऊब मुझे घेर लेती है। तुरंत मैं ’अच्छा फिर... ठीक है.. चलो... ओके... ’ जैसे शब्दों को थूकने लगता हूँ। इस बीच अगर मेरा कोई दोस्त मुझसे कहता है कि ’अगर आप व्यस्त नहीं है तो मैं घर आ जाता हूँ’, तो मैं बड़े उत्साह से जवाब देता हूँ ’अरे.. क्यों नहीं आओ भई... गरमा-गरम चाय पिलाता हूँ।’ फिर मेरी चहल कदमी शरु हो जाती है। मैं इंतज़ार का स्नान कर लेता हूँ, इंतज़ार के कपड़े बदल लेता हूँ, इंतज़ार का घर जमने लग जाता हूँ.... इंतज़ार के बर्तन मांझ देता हूँ...। फिर इसी बीच मेरी बच्चों की सी इच्छा होती है कि कुछ लिख लूं... कुछ ज़रुरी बात, महत्वपूर्ण शब्द, एक वाक्य, आधे संवाद... हाथी, घोड़ा, मानुष, आचार...। मैं तुरंत अपना यंत्र खोलने में लग जाता हूँ... । कुछ देर में दोस्त का आगमन होता है...मैं यंत्र बंद कर देता हूँ...। अगर एक वाक्य भी लिख गया तो मैं बच्चों का सा उछलकर उसका स्वागत करता हूँ। यूं लगने लगता है कि मैंने चोरी की और पकड़ी भी नहीं गई...। मैं चालाक-चालाक सा घर में मंड़राने लगता। मुझे चालाक होना शुरु से पसंद है..। बचपन में मेरे पिता कहते थे... बुद्धु कहीं का चालाक बन.... सो जब भी कोई मुझसे पूछता कि तू बड़ा होकर क्या बनेगा रे.... मैं कह देता मैं बड़ा होकर चालाक बनूगाँ। इस चालाकी से खुश मैं अपने दोस्त के लिए तुरंत चाय चड़ा देता। यहाँ चाय की चुस्की शुरु ही हुई होती कि मैं फिर वही... उसी ऊब का शिकार होने लगता। मैं इस ऊब से छुटकारा पाने के लिए तरह-तरह की बातें करता, छिछोरी निंदाओं पर उतर आता, मायापुरी जैसी बातें करने लगता पर सब कुछ धूम फिर कर वही ऊब में मिल जाता। क्या करें इसका....?
मैं बहानों के पैबंद में उस दोस्त को धीरे से चलता करता। कुछ दोस्त समझ जाते, कुछ समझते हुए भी मेरी सनक मानकर मुस्कुरा देते। उनके जाते ही मैं आत्मग्लानी में घुस जाता। पछताया सा एक ख़राब किताब उठाकर पढ़ना शुरु कर देता... फिर अपना गुस्सा उस झूठे लेखक पर निकालता। किताब को दीवार पर फेंक कर मारता और टहलने लगता।
धीरे-धीरे यह ऊब खिसककर किताबों, कहानियों, कविताओं पर भी छाने लगी है। किताब उठाता हूँ उत्सुकता घिर आती है… पर लेखक की चालें जैसे ही दिखने लगती है ऊब… धीरे से मेरा टेटुआ खुजाने लगती है… मैं खखारता हूँ, फिर पानी ढ़ूढ़्ने उठता हूँ… और वापिस उस किताब पर कभी भी नहीं लौटता। एकांत से बहुत ऊब नहीं होती… या ऊब एकांत का ही हिस्सा है… यह मालूम नहीं।
मैंने एक बार इस ऊब के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया… गहन, घनघोर युद्ध। कई बार उस युद्ध में मैं भीड़ में नाचता गाता पाया गया, कई बार गंदे भद्दे चुटकुलों पर हंसते-हंसते मेरे आंसू निकल आए, एक बार तो भीड़ में किसी छिछली बात पर मेरी आह निकल आई थी। ऊब से युद्ध मेहगा पड़ता जा रहा था। सो मैंने उससे सुलह करनी चाही।
बहुत मान मनऊअल के बाद इस ऊब से सुलह हो गई…… सुलह कुछ यूं है कि…ऊब ने मुझे सुलह का लोन दिया है। मुझे लगातार ऊब को किस्ते चुकानी होती है… लगभग हर रोज़। यह किस्ते गंभीर रुम से निजी है… सो मुँह से उगला नहीं जाएगा। बस इतना ही कह सकता हूँ कि कई सालों बाद आप मुझे जैसा देखियेगा… यह उन किस्तों का ही परिणाम होगा…।
ओह! लो, फिर मैं ऊबने लगा।

Wednesday, April 14, 2010

बेचारा बनना सीखो....


April 14, 2010
मेरे घर के सामने (मैं घर के पीछे वाले हिस्से को घर का सामने वाला हिस्सा मानता हूँ) बहुत से बगुले, छोटी चिड़िया, किंगफिशर आदि आकर पेड़ पर बैठते हैं। इस बात से बिलकुल अंजान कि दुनिया बदल रही है। मैं कभी-कभी इन्हें चिल्लकर कहता हूँ... ’अरे दोस्तों दुनिया बदल रही है।’ पर यह मेरी तरफ देखते तक नहीं है। इन बिचारों को कुछ नहीं पता.... उनको ’बिचारा’ कहकर मैं बड़ी सांत्वना भरी नज़रों से उन्हें देखता हूँ। अरे 2050 तक इस देश में माओवादी राज करेगें... एक किताबी समाज की परिकल्पना साकार करने पर तुले हुए है वह लोग। कुछ बगुले इस बात पर पेड़ से उड़ गए। पर एक चिड़िया आकर मेरी बालकनी की मुड़ेर पर बैठ गई। मुझे लगा चलो इसे तो इस बात में दिलचस्पी है कि दुनिया बदल रही है। मैंने धीरे से उससे कहाँ कि ’सुनों और अपने साथियों को भी बता देना कि सिर्फ धमाकों की आवाज़ भर से तुरंत उड़ जाने वाली कला अब तुम लोगों के लिए काफी नहीं होगी। तुम्हें और भी गुण सीखने होगें...। पहले तो मेरे जैसे बहुत कम लोग है जो तुम्हें बेचारा समझते हैं... तुम्हें यूं इठलाते हुए उड़ने की बजाए.. बेचारा दिखने का अभ्यास करना होगा। अगर मनुष्य को तुमपर दया नहीं आई तो तुम लोगों का जीवित रहना एक सभ्य समाज में नामुम्किन है।’ तभी वह चिड़िया मुड़कर दूसरी तरफ देखने लगी...मुझे लगा नाराज़ हो गई है। मैंने होले से कहा कि ’तुम्हें शायद पता नहीं है... कि मनुष्य ने तुम सब लोगों और तुम्हारे जैसे जितने भी इस पृथ्वी पर मौजूद हो.... की छान बीन कर चुका है। अब अगर तुम अपने आपको लुप्तप्राय प्रजाती में शामिल कर लोगे तो मनुष्य तुम्हारी मदद करेगा।’ इस बात पर वह उड़ गई... मैं अपने कंधों को उचकाया और सोचा... मरेगीं यह भी...। तभी मैंने देखा कि मेरी बालकनी की मुड़ेर पर दो चिड़िया आकर बैठ गई। शायद यह पहली चिड़िया को लगा होगा कि मैं कोई महत्वपूर्ण बात कह रहा हूँ जो उसकी समझ में नहीं आ रही है सो वह अपने बीच की एक समझदार चिड़िया को साथ लेकर आ गई है। मुझे ऎसा लगा...मैं ठीक-ठीक कुछ भी नहीं कह सकता। ’मैं ठीक-ठीक कुछ भी नहीं कह सकता हूँ” मुझे यह वाक्य बहुत अच्छा लगा.. सो उन चिड़ियाओं से बातचीत मैंने यहीं से शुरु की.... मैंने कहा.... ’देखों मनुष्य कभी भी ठीक-ठीक कुछ भी नहीं कह सकता है। पर वह ऎसा मानता है कि दुनिया जो चल रही है वह ग़लत है... जिस दुनिया की कल्पना उनके दिमाग़ में है वह बहुत उमदा है... एक विचित्र आदमी हुआ था उसने एक आदर्श दुनिया को किताब में भी उतार दिया था। कुछ लोगों का तो यह भी मानना था कि देखों किताब पर कितनी सुंदर लगती है.. तो सच में भी यह इतनी ही सुंदर होगी... फिर इन मानने वालों ने सबको मनवाने के लिए... सारे प्रयत्न किये.. । अब कुछ लोग इस काल्पनिक दुनिया को जल्द से जल्द व्यवहार में लाना चाहते है... इसके लिए उन्होंने उन सब लोगों को मारने की ठान ली है जो उनकी दुनिया का हिस्सा नहीं होना चाहते हैं।’ मैंन देखा दोनों चिड़ियाओं ने मेरे सामने shit कर दिया... एक बार मुझे देखा और उड़ गई। मैं पीछे से चिल्लने लगा... ’अच्छा तुम्हें यह सब मज़ाक लगता है... दुनिया सच में बदल रही है.... यह तो मैंने सिर्फ एक बात कहीं है ऎसे कई समुह है... यह दुनिया नहीं रहेगी कहे देता हूँ... या तो हिंदु राष्ट्र होगा... या इस्लाम सब को निग़ल जाएगा.... या तो माओवादी आदर्श समाज बनेगा... या तो ईसा मसीह सबको अपनी ओर कर लेगें और अपने पापों के प्राश्चित के लिए चर्च में बंद करके सबको खूब रुलाएगें....’ भाई सब कुछ होगा... पर यह दुनिया वैसी नहीं रहेगी जैसी यह दिख रही है सो मेरे प्यारे पक्षियों तैयारी कर लो... कुछ ओर होने की...। इस बदलाव की आंधी में ’बेचारे’ ही बचेगें... ’बेचारा’ बनना सीखों... ।

Tuesday, April 13, 2010

बेमतलब के खर्च....


देर रात,
इन दिनों की क्या कहें? यूं पड़े-पड़े गुज़र रहे हैं मानों बेमतलब के खर्चे। शाम के वक़्त कुछ चिल्लर बची रह जाती है जिन्हें घर में चारों तरफ बिखेर देता हूँ। फिर देर रात तक उनसे लुका-छिपी का खेल खेलता हूँ। जब तक अंतिम सिक्के पर पहुंचता हूँ नींद आ जाती है। पर आज रतजगा है... क्योंकि अंतिम सिक्का अभी भी मिला नहीं है। सारे सिक्कों को कई बार गिन लेने के बाद भी कुछ कमी है... एक अंश गायब है... की टीस भीतर है। कैसे इस टीस के साथ सोया जाता है? यह हुनर बहुत समय बाद ही आता है शायद। हर बार घड़ियाल पर निग़ाह जाते ही मैं खुद को कोसने लगता हूँ... क्यों नहीं खर्च कर देता मैं इन सिक्कों को भी? क्यों हर बार बचा लाता हूँ इन्हें? किस तरह का मनोरंजन है यह?
पिताजी की याद हो आई... वह इस वक़्त हस्पताल में हैं...। वह अपनी चोर जेब में सिक्के छुपा के रखा करते थे। जब भी बहुत लाड़ करता, उनके गालों को चूम-चूम कर गीला कर देता तो वह दो रुपये का एक सिक्का मुझे दे देते। मैं भाग खड़ा होता। मैं उन्हें कभी भी स्वार्थी नहीं लगा... पर मैं स्वार्थी हूँ। आज भी मैं आपना दो रुपये का सिक्का मुँह में दबाए यहाँ बैठा हूँ... जबकि वह वहाँ हैं।
’बेमतलब के खर्चे’ अपनी विचित्र दुनियाँ इख़्तियार कर चुके हैं। इसमें किसी के आने के इंतज़ार की गुदगुदी उसके आने को नीरस कर देती है। इसमें कहीं चला जाऊगाँ की उछाल बिस्तर के आस पास ही कहीं होती है। इसमें ’कुछ हो रहा है’ की उम्मीद... बिल्ली है जो ’कुछ नहीं हो रहा है’ के चूहों को मारते चलती है। इसमें रात हमेशा घर को बड़ा कर देती है... जबकि दिन में घर वापिस एक कमरे की गुफा हो जाता है। इसमें शहद का एक छत्ता बुन्ने की त्तृप्ते है पर शहद हमेशा दूसरों ही चखते हैं की हताशा भी है। इसमें नींद पर तब तक बस है जब तक दिन भर के बेमतब के खर्च हो जाने पर रात को अंतिम सिक्का हाथ लग जाता है। इसमें सब कुछ है और इसमें कुछ भी नहीं है।

Wednesday, April 7, 2010

निर्मल और मैं....


04/03/10….CALCUTTA…
निर्मल और मैं...
निर्मल- बड़े दिनों बाद लिखने बैठे हो?
मैं- बहुत पीड़ा में था। आपको बहुत याद किया।
निर्मल- तो अब कैसी हालत है?
मैं- ठीक है... पर बहुत अच्छी नहीं।
निर्मल- हम अपने कमीनेपन को उस वक़्त कभी याद नहीं करते जब हम पीड़ा में बहते हैं।
मैं- मैंने बहुत याद किया था... पर मुझे लगता है जो आपको जीना है वह जीना ही है... उसका कुछ भी नहीं किया जा सकता। चाहे वह पीड़ा हो... प्राश्चित हो... या पाप हो... उससे कुछ भी छुटकारा नहीं है। सारी की सारी किताबें, फलसफे, बातें धरी की धरी रह जाती हैं।
निर्मल- फलसफे, किताबें... इन ओछी समस्याओं के लिए नहीं है।
मैं- यह निर्मल जी... यह बात भी उस वक़्त काम नहीं आती।
निर्मल- तो अंत में क्या काम आया।
मैं- उसे उसकी पूरी निर्ममता के साथ जीना.... बस यह.., और कुछ भी नहीं।
निर्मल- अभी अगर उसे ही जी रहे हो तो मैं चलता हूँ? क्यों कि मैं तो आया था कि तुम बहुत दिनों बाद कुछ लिखने लगे हो... सो उसपर कुछ बात की जाए।
मैं- बैठिये... मैं भी बात ही करना चाहता हूँ।
निर्मल- मुझे अपना डॉक्टर मत समझने लगना... कि सब कुछ कह दूंगा और अच्छा लगने लगेगा... मैं तुमसे पहले भी कह चुका हूँ कि मेरा तुम्हारा संबंध सिर्फ लेखन का है... उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं।
मैं- आपको हर बार यह बात इतनी ही क्रुरता से क्यों कहनी होती है।
निर्मल- मुख्य बातें जितनी कड़वी होती है वह उतनी ही ज़्यादा अच्छे से याद रहती हैं।... तो बताओ क्या लिखा?
मैं- एक कहानी ’नक़ल नवीस’ और दूसरी आधी है ’मुमताज़ भाई पतंगवाले...’ आपके आने के ठीक पहले नए नाटक पर भी कुछ काम कर रहा था... पर कविता आ ही नहीं रही है।
निर्मल- अच्छा है... ज़बर्दस्ती की कविताए झूठा संसार पैदा करती है...। पर.... मैं खुद नहीं जानता कि तुम वह एकांत कब पाओगे जिसमें तुम जो लिखते हो वह देख सको... उसे छू सको... उसे चख़ सको। तुम समझ रहे हो.... तुम अभी अपने आपको वेस्ट कर रहे हो।
मैं- मैं जानता हूँ... मैं उन शब्दों तक पहुंच भी जाता हूँ कभी-कभी उन्हें छू भी लेता हूँ पर चख़ने के ठीक पहले विचार कहीं ओर भागने लगते हैं... कुछ छिछली बातें दिमाग़ में घर कर जाती है और मुझे उठ जाना पड़ता है। कैसे मैं उस सन्नाटे को उगल डालू जिसे मैं जानता हूँ... जिसे मैंने भीतर कई बार महसूस किया है। मैं जानता हूँ उपन्यास लिखने के लिए अभी मैं तैयार नहीं हूँ...। लंबी यात्राओं का एक डर है मेरे अंदर... वह समय रहते ही जाएगा... पर छोटी यात्राएँ... कहानिया...वह... उन्हें तो मैं अपनी पूरी इंमानदारी से छूना चाहता हूँ... वह मेरे साथ क्यों लुका-छिपि का खेल खेलती रहती हैं?
निर्मल- खेल तो किसी भी एकांत में खत्म नहीं होगा.... वह तो रहेगा ही... पर तुम्हें वह खेल तब तक खेलते रहना पड़ेगा जब तक तुम थककर ढूढ़ना बंद ना कर दो... फिर वह कहानी खुद तुम्हारी पूरी थकान में तुमसे मिलने आएगी... पर जब तक खेल रहे हो एक भी शब्द मत लिखो।
मैं- आज फिर आपको पढ़ रहा था... अच्छा लगा। बहुत सी किताबें भी खरीदी... धीरे-धीरे पूरा करुगाँ... बहुत छोटी बातों की लंबी यात्राए मुझे बहुत पसंद हैं.... मैं तैयारी करना चाहता हूँ...। यह पूरा महीना मेरे पास है हो सकेगा तो इस महीने बहुत कुछ लिख पाऊगाँ।
निर्मल- मुझे तुम्हारी चिंता लगी रहती है.... तुम बहुत बच्चे हो इस संसार के लिए जिसे तुमने चुना है। पर मैं क्या कहुं... अब इसे छोड़ना तुम्हारे हाथ में भी नहीं है। कैसे करोगे?
मैं- जैसे तैसे कर लूगां।
निर्मल- मृत्यु के बारे में फिर कभी मत सोचना... वह तुम्हारी तरफ खुद आएगी जब उसे आना होगा... उसके पास कूदकर जाना... या उसके बारे में सोचना भी कायरता है... फिर नहीं...। दुख है... तक़लीफ है... तो वह रहेगी... हमेशा... जो नहीं है उसके बारे में सोचकर खुदको वेस्ट मत करो... वह करो जिसके लिए तुम पैदा हुए हो। अच्छा हुआ तुम कलकत्ते आ गए... तुम्हें भी अच्छा लग रहा होगा?
मैं- हाँ... आज मैं बहुत शांत था। Indian coffee house गया... बहुत अच्छा लगा...।
निर्मल- चलो चलता हूँ... सुनकर अच्छा लगा कि तुम अब ठीक हो... जल्द मिलना होगा.... !!!!

red sparrow... (play...)



30th jan 2010...
सही-सही और स्पष्ट-स्पष्ट कह देना भाई....:-)
Red sparrow के shows खत्म हुए...नाटक बहुत से लोगों को समझ में नहीं आया... नाटक के बाद बहुत से लोगों से बात हुई... सभी लोगों ने अपनी-अपनी समस्याए बताना चालू की... मैं शांत था... मुझे लगा कि मेरा शायद कुछ भी कहाँ गया बहाना लगेगा। सो मैं लगभग समर्थन में सिर हिलाता रहा…. जो पीड़ा था। खैर इसके अलावा बहुत कुछ कर सकने की वहाँ जगह भी नहीं थी। मेरे हिसाब से नाटक celebration जैसा कुछ है... बहुत सी चीज़ो का.. और उसे उसी गति से direct भी किया गया है... जितना दिखता है उससे बाहर उसका कोई अस्तित्व नहीं है। लोग कह रहे थे कि ’जो तुम कहना चाहते हो वह हम समझ नहीं पाए’। अरे भाई मैं कुछ भी नहीं कहना चाह रहा था... यह सब fun की तरह पिरोया और प्रस्तुत किया गया था। यह बात अलग है कि इसमें बहुत से छोटे-छोटे connections हैं, जिनका स्वाद मैंने लिखते और direct करते हुए चख़ा है। जिन्हें वह समझ में आएगें वह बहुत ही प्रसन्न होगें और जिन्हें नहीं... उनसे भी कोई समस्या नहीं है क्योंकि नाटक का निर्देशन कुछ इस तरह किया गया है कि... उसके परे भी आपको जो कुछ नज़र आता रहे....उसके अपने साफ सुथरे सत्य हैं। मैं समझ सकता हूँ कि कितने लोगों ने Charles bukowski को google किया होगा... नाटक के बाद.. हा..हा...हा। फिर कुछ इस तरह के लोग भी आए जिन्हें नाटक बहुत पसंद आया... पर उन्हें हमारे चहरे पर बहुत से शक़ दिखे सो वह सभी बहुत आगे बढ़ बढ़ के तारीफ करने लगे जिसे हमने सहर्ष ग्रहण किया। इस नाटक में हम जितने भी writers के नाम लेते है... उन नामों के कारण एक तरह का गमभीर वातावण तैयार हो जाता है.. खासकर उन लेखकों के कारण जिनका नाम लोगों ने सुना ही नहीं है... उस वजह से वह इस नाटक को कुछ और समझते हैं जो वह है नहीं...शायद।
कहीं तो मैंने पढ़ा था कि ’आप वह ही दुनियाँ बनाते हो जिसमें आप रहते हो...।’ मैं इस बात को थोड़ा सा आगे बढ़ाना चाहता हूँ कि... ’मैंने एक दुनियाँ बनाई है... मैं उसी में रहता हूँ और जो भी करीब आता है वह वही देखता है जो यहाँ इस दुनियाँ में बचा पड़ा है। जो मैं लिखता हूँ वही मैं हूँ उसके बाहर मेरा कोई अस्तित्व नहीं है।’ कहानी ना कहने का एक प्रयोग जिसका मैं बहुत समय से प्रयास कर रहा था... वह ’पार्क’ और ’red sparrow’ में पूरा होता सा दिखा है।

Saturday, February 27, 2010

नक़ल नवीस...

चलते-चलते पिंड़लीयों में दर्द होने लगता है... कहीं रुक जाने पर, सो जाने पर भी जब वह दर्द नहीं गया तो मैंने पैरों को मरोड़ना-तोड़ना शुरु कर दिया...कुछ आह और कराह के बाद दर्द का मीठापन भी फीका लगने लगा..., फिर मैंने राह चलते किसी आदमी से सहायता की गुहार लगाई... ’दबा दे इस दर्द को कि खत्म हो जाए यह अभी यहीं इसी वक़्त.।’.. वह दबाता है, मैं कराहता हूँ... ’आह अच्छा लग रहा है’ जैसे वाक़्य खुद-बा-खुद मुँह से टपकने लगते हैं, वह आदमी थकता है और पैर दबाना बंद कर देता है... मुझे हल्की झपकी आ जाती है...वह चल देता है। कुछ आराम सा महसूस करने पर.. मेरे चहरे पर एक मुस्कान आती है, मेरी अचानक इच्छा होती है कि उस राहगीर को एक कप चाय पिला दी जाए... पर तब तक वह चला गया होता है। मैं उठकर चाय बनाने की कोशिश करता हूँ, कुछ कदम चलते ही एक आह के साथ मेरे पैर अपनी पुरानी स्थिति में वापिस चले आते हैं..। मुझे अचानक लगने लगता है कि दर्द असल में पैरों में नहीं है वह तो दिमाग़ में है... मैं दिमाग़ी दर्द का शिकार हूँ...। मैं यहाँ वहाँ नज़रे दौड़ाता हूँ, पर कोई राहग़ीर... मेरी राह पर चलता नहीं दिखता है। क्या फिर मुझे उसी राहग़ीर की ही प्रतिक्षा करनी पड़ेगी जो पैर दबाकर चलता बना था? क्या वह इसी राह पर वापिस लोटेगा? मैं जानता हूँ कि इस राह पर लोटना मुश्किल है। गर वह वापिस आ भी गया तो मैं क्या कहूगा उससे कि मेरे पैरों में असल में दर्द था ही नहीं... दर्द तो दि़माग़ का है उसे दबा दो। आश्चर्य नहीं कि वह भड़क जाए और मुझे मारने लगे।
कितना अजीब है कि दर्द दिमाग़ में है पर पीड़ा पिड़लियों में हो रही है। तो क्या जब पिड़लियों में दर्द होगा तो पीड़ा दिमाग़ में महसूस होगी? शरीर, आत्मा से बड़ा है... शरीर वह सब है जो मैं हूँ... या जैसा मैं सोचता हूँ कि मैं हूँ। मेरे चलने में जितने भी घुमाव हैं.. जितने भी उतार चढ़ाव हैं, मेरा पूरा का पूरा शरीर उसी का बना है। मैंने आज तक चलने के अलावा कुछ भी नहीं किया है... दृश्यों को पीछे छोड़ा है... कि कुछ नए दृश्य दिखेगें... नए दृश्य कुछ ही समय में थकान से भर देते हैं.. मैं उस थकान से बचने के लिए आगे चलने लगता हूँ। मैं कभी भागा नहीं... ना.. भागूगाँ नहीं, इसकी समझ मुझमें बहुत पहले आ गई थी। मेरा पूरा जीवन उस दृश्य की तलाश में नीहित है जिस दृश्य में पहुचते ही वह चित्र पूरा हो जाएगा, जिस चित्र को पूरा करने के लिए मैं बना हूँ। यह मैं शुरु से जानता हूँ... सो भागना मैंने बहुत पहले स्थगित कर दिया था, और यू भी मैं पर्यटकों से बहुत चिढ़ता हूँ... किसी भी किस्म के पर्यटक.. जो जल्दी जल्दी सब कुछ देख लेना चाहते है और भागकर अपने दड़बों में छिप जाते हैं। कई सालों के चलने की वजह से ही तो कहीं मेरे पैरों में दर्द शरु नहीं हो गया है? मैं अभी तक उस दृश्य पर नहीं पहुचा हूँ जिससे मेरा चित्र पूरा हो जाए... तो क्या करुँ? रुक जाऊँ? नहीं... इंतज़ार करता हूँ... या तो वह राहगीर वापिस आएगा या फिर दर्द खुद बा खुद खत्म हो जाएगा।
मेरी एक दोस्त है..सुमन...बगल के एक गांव में महिला बैंक खुला है सुमन वहीं काम करती है। बैंक की नौकरी के कारण उसे हमेशा साड़ीयाँ पहनना पड़ता है... हरी, नीली, कत्त्थाई... वह साड़ियों में बहुत सुंदर दिखती है। छुट्टी के दिन जब भी मैं उसे सूट पहने देखता हूँ तो लगता है कि उसकी छोटी बहन मुझसे मिलने आई है... मैं सिर्फ पहनावे की बात नहीं कर रहा हूँ उसके विचारों पर भी इसका असर मैंने देखा है... जैसे वह साड़ी में मुझसे हमेशा बड़ी-बड़ी बातें करती है.. देश की, समाज की, मेरे थके हुए जीवन की, क्रांति की... और सूट में वह तुरंत सब्जी-भाजी.. किराने की या ज़्यादा से ज़्यादा फिल्म देखने की बात कहती है। वह मुझसे प्रेम करती है। प्रेम को वह एक अलग व्यक्ति समझती है जो हम दोनों के साथ रहता है... मैं उससे हर बार कहता हूँ कि इस प्रेम की वजह से मैं कभी तुम्हारे साथ अकेला नहीं रह पाता हूँ। वह पहले मेरी ऎसी बातों पर हंस देती थी पर अब वह नाराज़ हो जाती है। एक दिन वह मेरे कमरे में आई और उसने आते ही कहाँ कि तुम्हारे कमरे में आक्सीजन कितनी कम है, तभी उसने कमरे के सारे खिड़की दरवाज़े खोल दिये... अचानक उसकी निगाह मेरे चहरे पर पड़ी, उसने कहा कि तुम्हारा चहरा पीला क्यों पड़ता जा रहा है। मैंने कहा शायद इसकी वजह आक्सीजन की कमी ही होगा... पर वह नहीं मानी... वह मुझे बाहर घुमाने की ज़िद्द करने लगी। मैंने मना कर दिया तो वह नाराज़ होकर चली गई। उसके जाते ही मैंने सारे खिड़की और दरवाज़े वापिस बंद कर दिये। वापिस अपने बिस्तर पर बैठकर लंबी-लंबी सांसे लेने लगा, आक्सीजन मुझे ठीक लग रही थी। चहरे के पीलेपन की वजह मेरी समझ में नहीं आई।
मेरे कमरे में तीन खिड़कियाँ है...पहली खिड़की के दो पलड़े है, एक मेरी माँ और दूसरा मेरे बाप के कमरे में खुलता है। दूसरी खिड़की मेरी बहन के कमरे में खुलती है और तीसरी खिड़की एक घने पेड़ के पत्तों के बीच खुलती है जिसे मैं कभी भी बंद नहीं करता हूँ। पहली खिड़की का एक पलड़ा जो मेरी माँ के कमरे में खुलता है उसे मैं कभी-कभी खोल देता हूँ... पर बाप वाला पलड़ा और बहन की खिड़की मैं हमेशा बंद रखता हूँ। इसके बाद एक दरवाज़ा बचता है, जिसे बंद किये बिना मेरा काम ही नहीं चलता...। उसके खुला रहने से मुझे अजीब सा नंगापन महसूस होता है जिसे मैं बहुत देर बर्दाश्त नहीं कर पाता हूँ। मैं सुबह बहुत जल्दी उठ जाता हूँ... ठीक उस वक्त जब सुर्योदय होने ही वाला होता है, यही वह वक्त होता है जब मैं अपने घर का दरवाज़ा पूरी तरह खोल देता हूँ... सुर्योदय होते ही वह बंद हो जाता है। सामाजिक खट-खट पर ही उसका खुलना मैंने तय किया हुआ है। दरसल सुर्योदय मुझे बहुत बोर करते है लेकिन सुर्योदय के ठीक पहले का समय मुझे बहुत सुंदर लगता है... रोज़ अलग.. यह किसी नाटक की शुरुआत लगती है.. fade in होता है और रोज़ एक नए तरीक़े की शुरुआत होती है... आसमान का रंग रोज़ अलग होता है, कभी धुंध होती है तो कभी सब कुछ एकदम साफ होता है। पर सुर्योदय होते ही सब कुछ वैसा का वैसा हो जाता है... रोज़ एक जैसा... सपाट।
सामाजिक खट-खट का दिन भर की खट-पट से ज़्यादा ताल्लुक नहीं है... बाहर की जितनी भी आवाज़े हैं वह मुझे भीतर की ही आवाज़े लगती हैं। उसमें माँ का चिल्लाना ’खाना तैयार है..।’ असल में भीतर मेरे साथ रह रही मेरी माँ का धीरे से मेरे से कहना है कि ’खाना तैयार है बेटा।’ बाहर केले वाले का.. आवाज़ लगाते हुए गुज़र जाना मेरे कमरे में भीतर आकर उसका सुसताना है। यहाँ इस कमरे में सब कुछ है जो भी बाहर है... ध्वनीश:। इसमें मैं जब भी घर से बाहर जाता हूँ तो भीतर के कमरे को साथ लिए जाता हूँ। यह कमरा अपनी पूरी की पूरी ध्वनीयों, सामानों... कोनों के साथ मेरे साथ रहता है। वह, मेरे बाहर जाते ही एक झोले सा हो जाता है जिसमें उसे जो दिखता है उसे अपने अंदर रख लेता है... मानों खरीदी करने निकला हो।
आजकल बाहर घूमते हुए मैं आईने तलाशता रहता हूँ....जब से सुमन ने मेरे चहरे के पीलेपन की बात कहीं है मुझे हर आईने में झाकने की आदत सी हो गई है...। कुछ आईनों में मैं साफ दिखता हूँ... परंतु कुछ में मेरा पीलापन मुझे नज़र आने लगता है। यह पीलापन माथे की तरफ कुछ ज़्यादा है, चहरे पर उतना समझ में नहीं आता है। कहीं इसका मेरे दिमाग़ के दर्द से तो कोई ताल्लुक नहीं है... या मेरी पिड़लियों की पीड़ा से?
मैं शाम के समय टहलता हुआ गोलगप्पे खाने निकल पड़ा। हफ्ते में मैं दो बार शाम को गोलगप्पे ज़रुर खाता था, यही सरोज के ठेले पर...। घंटों उससे बतियाता रहता... वह ठेला शाम पाँच बजे से लगाता था। ठेला सजा लेने के बाद वह अपनी शेर्ट उतारता, ठेले के किनारे टांग देता और बनियाईन में वह काम करना शुरु कर देता। उसकी बनियाईन जगह-जगह से फटी हुई थी। ’आज बड़े दिनों बाद दिखाई दिये?’ यह वह हमेशा कहता था, उसके लिए बड़े दिन, एक दिन भी हो सकता था और कई दिन भी।
’मेरे दिमाग़ में दर्द है लेकिन पीड़ा पिड़लियों में महसूस हो रही है।’ मैंने सरोज से यह बात कह दी...
’गोलगप्पे खा लो...’ उसने जवाब दिया।
’क्या तुम्हें मेरा चहरा पीला लगता है।’
’आज आलू नहीं है, चना चलेगा।’
’जब तुम कहते हो ’आज बड़े दिनों बाद दिखाई दिये’ तो क्या बड़े दिनों से तुम मेरा इंतज़ार कर रहे थे?’
’इमली ज़्यादा पड़ गई है आज पानी में...।’ यह कहते ही उसने मेरे हाथ में एक छोटी सी प्लेट पकड़ा दी।
गोलगप्पे खाते ही मैं घर वापिस आ गया। सरोज क्या सचमुच मेरा इंतज़ार करता होगा? अगर मैं कई दिनों तक, महीनों तक, सालों तक उसके पास नहीं जाऊ... तो क्या वह मेरे घर पर आकर पूछेगा कि ’ क्या भाई, बड़े दिनों से दिखाई नहीं दिये?’ जिस रास्ते मैं उसके पास गोलगप्पे खाने जाता हूँ वह शायद एक दो बार उस रास्ते की तरफ मुड़कर देख लेगा... शायद।
इंतज़ार। मैं पिछले दस दिनों से काम पर नहीं गया हूँ। दरवाज़े पर सामाजिक खट-खट के होते ही... दरवाज़े की तरफ मुड़ने के ठीक पहले मेरे भीतर यह इंतज़ार का भाव आता है, किसका पता नहीं... पर किसी ओर का... कोई ऎसा जिसे मैं जानता नहीं... या जिसे मैं जानना चाहता हूँ। सामाजिक खट-खट को छोड़के भी, मैं घर में बैठा हुआ प्रतिक्षा करता हूँ? सुमन आ जाती है तो मैं खुश हो जाता हूँ, पर मैं उसका इंतज़ार नहीं करता हूँ। मैंने सुमन से कभी नहीं कहाँ कि ’बड़े दिनों बाद दिखाई दीं?’ चाहे वह बड़े दिनों बाद ही क्यों ना आई हो।... यह वाक्य मैं किससे कहना चाहता हूँ? मैं जब भी दरवाज़े खिड़की बंद करके... घर में टहता फिरता हूँ तो कोई तो होता है जिसकी मैं राह देखता हूँ। कौन? मैं इंतज़ार करता हूँ किसीका... जिसके बारे में मुझे ही नहीं पता। मेरे दिमाग़ में यह बुरी तरह फस गया था। सोचा सुमन से पूछूगाँ, पर वह क्या बता पाएगी? जब मुझे ही नहीं पता कि मैं किसका इंतज़ार करता हूँ तो उसे कैसे पता होगा?
पिडंलियों में दर्द अचानक बढ़ गया। मुझे आज गोलगप्पे खाने नहीं जाना चाहिए था। मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। कल से काम पर भी जाना है।
मैं एक नकल करने वाली दुकान में काम करता हूँ। मैं अच्छी नकल करने वाला हूँ... किताबों की, चित्रों की, पेंटिंग की, आदमीयों की। यूं ज़्यादा काम मुझे आदमीयों की शक्ल बनाने का मिलता है। मैं अच्छे पोट्रेट बना लेता हूँ। लोग अधिक्तर अपने बूढ़े माँ-बाप के पास्पोर्ट साईज़ चित्र लेकर आते है और कहते है कि इसे रंगीन बना दो... हू-ब-हू नकल के अलावा मैं black and white फोटो का रंगीन पोट्रेट बना देता हूँ। पर जब कोई कहता है कि मेरी माँ फोटो में बहुत गुस्से में है क्या आप इन्हें मुस्कुराता हुआ बना देगें तो मैं बहुत गुस्सा हो जाता हूँ... क्यों, मैं क्यों ज़बर्दस्ति किसी के चहरे पर मुस्कुराहट चिपका दूं.. नहीं मैं यह नहीं करता हूँ।
पर अभी कुछ दिन पहले एक अजीब घटना हुई जिसकी वजह से मुझे दस दिन की छुट्टी लेनी पड़ी। यह वही समय था जब मेरी पिंड़लियों में दर्द बढ़ना शुरु हुआ था। एक लड़की मेरे पास आई कि मेरे पति का पोट्रेट बना दो... मैंने पूछा कि क्या वह मर चुके हैं, तो वह गुस्सा हो गई। अधिक्तर लोग उन्हीं लोगों के पोट्रेट बनवाते है जो अब इस दुनियाँ में नहीं रहे, मैंने अपनी सफाई में कहा। अंत में उसने अपने पति की तस्वीर निकालकर दिखाई.. एक मुस्कुराता हुआ खुशमिजाज़ आदमी था। मैंने कहा कि आप अगले हफ्ते पोट्रेट ले जाईयेगा, बात 2500 रुपये में तय हुई। जब अगले हफ्ते वह आई तो पोट्रेट देखकर नाराज़ हो गई। बात मालिक तक पहुच गई, मालिक को नकल पसंद आई। फिर उस औरत ने कहा कि ’आप इनका चहरा ध्यान से देखिए आपको नहीं लगता कि इनकी मुस्कुराहट के पीछे कोई पीड़ा है, दर्द है.... इनके माथे की तरफ देखिए तो..।’ ठीक उसी वक्त मुझे बुलवाया गया और मालिक ने पूछा कि ’इस तस्वीर को देखो, इन्हें कहा दर्द है?’ और मेरे मुँह से निकला कि ’इनकी पिड़लियों में दर्द है।’ वह औरत पोट्रेट वहीं छोड़के चली गई... और मुझे कहा गया कि जब तक पिड़ियों का दर्द ठीक ना हो जाए.. छुट्टी ले लो। मुझे 1700 रुपये अपने मालिक को लोटाने हैं सो अलग।
मैं दस दिन की छुट्टी ले चुका हूँ... 900 रुपये अब तक मालिक के पास पहुचा चुका हूँ। पिड़िलियों का दर्द अभी भी जस का तस है, यह बात अलग है कि अब मुझे पता लग चुका है कि वह पिंड़ली का नहीं दिमाग़ का दर्द है।
एक कलाकार ही हैसियत से मेरे कुछ प्रश्न बनते थे, इस पोट्रेट की घटना पर... सो बीच में जब मैं मालिक को पैसे लोटाने गया तो मैंने उनसे कहा कि...
’मालिक, दर्द मेरी पिड़लियों में था ठीक है... उस आदमी की शक्ल पूरी मुस्कुराहट लिए हुए थी ठीक है... फिर भी कहीं पीड़ा है यह पता चल रहा था है ना.... तो क्या वह पोट्रेट उस तस्वीर से ज़्यादा जीवंत नहीं हुआ?’
’नहीं..’ मालिक ने सीधे जवाब दिया।
’कैसे.. तस्वीर ख़ीचने और पोट्रेट बनाने में कुछ तो अंतर होना चाहिए ना?
’नहीं.. अगर तुम अपनी व्यक्तिगत परेशानियों को काम में लाओगे तो अंतर होगा, अपनी व्यक्तिगत परेशानियों को घर रखकर आओ... अंतर नहीं होगा।’
’पर मैं तो....’
’कला और कलाकार की बात मत करो तुम्हें 1700 रुपये वापिस देने है... पहले वह लोटाओ।’
पैसे पर बात खत्म हो गई।
समुन को जब मैंने यह घटना सुनाई तो वह बिदक गई...
’तुम्हारा मालिक बेवकूफ है.. उस्से तुम्हारी कद्र नहीं है... छोड़ दो यह नौकरी.. तुम कलाकार हो.. वगैराह-वगैराह।’
मैं कुछ देर चुप रहा फिर धीरे से कहा...
’नहीं मैं ऎसा नहीं कर सकता हूँ...।’
सुमन चुप हो गई... मैं टहलने लगा।
’मैं अच्छी नकल करता हूँ और यह मेरे मालिक भी जनते हैं... इसीलिए उन्होने मुझे नौकरी से नहीं निकाला। और... और... मैं क्या करुं शुरु से मुझे नकल करना ही सिखाया गया है... इसकी नकल करो, उसकी नकल करों...अमिताभ बच्चन कैसे गुस्सा होता है दिखाओ?.. हाथी बनाओ.. शेर बनाओ.. और मैं बनाता गया.. मैं अभी भी वही करता हूँ...।’
सुमन नहीं मानी... सुमन हमेशा जो मैं हूँ उससे कुछ अलग मानती आई है। मैं कुछ ओर नहीं हूँ मैं कहता रहता हूँ पर वह नहीं सुनती...। इसका कारण भी है... एक बार मैंने अपने घर में बैठे-बैठे कुछ चित्र बनाए थे... सुमन के। मैंने सुमन को हमेशा अपने पेड़ के पास वाली खिड़की से जाते-आते देखा है... सो पत्तियों के बीच मैने कई साड़ियाँ फसा दी। दरसल मैंने बहुत सी, अलग-अलग रंग की साड़ियों के चित्र बनाए थे, पत्तियों के बीच... सुमन उन्हें देखकर बहुत खुश हुई... मैंने उससे कहा कि यह भी असल में नकल ही है, नकल उन क्षणों की जिन्हें मैंने अपनी खड़की में खड़े-खड़े जिया था, पर वह नहीं मानी। मैंने वह सारी पेंटिग्स सुमन को दे दी। तब से उसे लगता है कि मैं असल में कुछ और हूँ वह नहीं जो मैं असल में हूँ... मतलब नकल-नवीस।
एक दिन मैंने गोलगप्पे वाले से कहा था... सुनो सरोज ’मैं एकदम वही आदमी हूँ जैसा मैं दिखता हूँ।’ सरोज थोड़ी देर खामोश रहा फिर उसने कहाँ ’नया मटका लेना पड़ेगा इसमें पानी बहुत देर तक ठंड़ा नहीं रहता।’
अपने पिड़िलियों के दर्द को छुपाते हुए मैं अपनी नौकरी पर पहुचा। दस दिन की छुट्टी की वजह से काम काफी था। मैं मालिक से नज़रे चुराता हुआ सीधे गोडाउन में घुस गया। मेरे जैसे मालिक के पास काफी लोग थे पर कुछ काम थे जो सिर्फ मैं ही कर सकता था। सो मैं अपने काम में जुट गया। पिड़लियों का दर्द जिसे अब मैं दिमाग़ का दर्द समझ चुका था दिन रात बढ़ता जा रहा था। करीब हफ्ते भर में सारे पुराने काम मैंने निपटा दिये... इतवार आ चुका था। इतवार सुमन के नाम होता था। हम इतवार को किसी मंदिर में जाकर बैठते थे। मैं किसी भी भगवान में विश्वास नहीं करता था... पर मंदिरो की ठंडक मुझे बहुत अच्छी लगती थी। खासकर काले महादेव का मंदिर जो नदी किनारे था... उसके फर्श दोपहर में भी ठंडक लिए होते थे। मैं और सुमन घंटो वहा बैठे रहते थे।
यूं इतवार को सुमन हमेशा सूट पहनकर आती थी पर आज उसने साड़ी पहने हुई थी सो उसकी बातचीत में ज़्यादा गंभीरता थी। कुछ देर की चुप्पी के बाद अचानक मेरे मुँह से पिड़लियों के दर्द की बात निकल आई। मैं कहना नहीं चाहता था पर... वह अचानक उस क्षण मेरे मुँह से खुद ब खुद निकल आई। सुमन कुछ देर चुप रही फिर उसने पैर दबाने की बात कहीं... तब मैंने कहा कि ’पैर नहीं... असल में दर्द दिमाग़ में है पर पीड़ा पिड़लियों में हो रही है।’
’तुम्हें पीलिया तो नहीं हो गया।’
सुमन ने मेरे माथे पर आए हुए बालों को हटाते हुए बोला। मैंने उसे अपने नाखून दिखाए। पीलिया नहीं था।
’तुम्हारा चहरा दिन ब दिन पीला पड़ता जा रहा है।’ सुमन के वाक्य में चिंता घुली हुई थी।
मैं खुद इस की वजह अपने दिमाग़ का दर्द समझता था पर सुमन से कह नहीं पाया। कुछ देर में उसने साड़ी से एक नारीयल निकाला.. क्योंकि लड़कियों का काले महादेव के मंदिर में जाना मना था सो नारियल मुझे ही चढ़ाना पड़ा। नारियल चढ़ाकर हम काले महादेव के सात चक्कर लगाने लगे। सुमन ने घुंघट ओड़ रखा था और वह मन ही मन कुछ बुदबुदाती हुई चल रही थी। पता नहीं काले महादेव से क्या कह रही है जहाँ इसको जाने की भी इजाज़त नहीं है। फिर हम घाट का एक चक्कर लगाते हुए घर वापिस आ गए।
इतवार की रात को सोने के पहले मैं सुमन के बारे में सोचता रहा। जाने कितने रविवार हमने काले महादेव पर बिताए हैं। कभी वह साड़ी पहनकर आती तो कभी सूट। काले महादेव का पुजारी हम दोनों को पहचानने लगा था उसे लगता था कि हमारी शादी हो चुकी है। वह कभी-कभी हमें चाय दे जाता। एक दिन पुजारी सुमन के पास आया... एकदम पास और उसके सिर पर हाथ रखकर कहा कि ’बेटा चिन्ता की बात नहीं है तुम्हें बच्चा होगा... बहुत जल्द... काले बाबा सबकी सुनते है।’ मैं चुप रहा पर सुमन बाबा का हाथ पकड़कर रोने लगी, जैसे वह काले महादेव से यही मांगती आ रही थी। मैंने बहुत बार सुमन से पूछना चाहा कि ’तुम रो क्यों दी थी?’.. पर मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई। वैसे सुमन को भविष्य की बातें करना बहुत पसंद था... जब वह सूट पहने होती तो भविष्य बहुत हराभरा और बहुत सी संभावना लिए हुए होता... सूट में वह भविष्य की बातें कुछ इस तरह करती थी कि मानों वह किसी bones zone में है और उसके पास बस एक मिनिट है वह जितने चाहे उतने points बटोर सकती है। पर जब वह साड़ी में होती है तो भविष्य एक पहाड़ सा दिखता... कटीला पहाड़ जिसपर हर कदम फूंक-फूंक के रखना पड़ता है। ज़रा सी लापरवाही से मौत निश्चित है। मैं कभी भी नहीं समझ पाया मौत किसकी?... भविष्य के सपने की? .. हमारे संबंध की?... मेरी?.. उसकी? किसकी?.. पर मुझे भविष्य की बातें सुनना बहुत अच्छा लगता था।
अगले दिन मैं फिर काम पर पहुचा तो सीधा मालिक का बुलावा आ गया। कुछ देर बाद पता चला कि मेरी पूरे हफ्ते की महनत बेकार हो गई। मेरे हर चित्र में दर्द मौजूद था। मेरे सारे पोट्रेट लाकर मुझे दिखाए गए। लगभग हर पोट्रेट में दर्द माथे की तरफ कहीं था। एक और अजीब बात थी... उस हफ्ते के लगभग सारे पोट्रेट में पीला रंग हावी था और कुछ चित्रों में तो मैं सिर्फ पीला ही रंग इस्तेमाल किया था। मालिक ने इस बार कोई कारण नहीं पूछा, मुझे कलाकार, पेंटर नाम की गाली दी और मुझे चलता किया... जाते-जाते एक पर्ची मेरे हाथ में थमा दी... उसमें वह रकम लिखी हुई थी जो मुझे अब मालिक को लौटानी थी... सत्रह हज़ार रुपये। पर्ची देखते ही मेरी पिंड़लियों का दर्द अचानक बढ़ गया। मैं धीरे-धीरे रेंगता हुआ सा वहाँ से निकला पड़ा।
नकल करने के अलावा मुझे ओर कुछ भी नहीं आता है। घर पर बैठे हुए मैं ओर नकल करने वाली चीज़ों के बारे में बहुत समय तक सोचता रहा.....मैं और क्या कर सकता हूँ। बहुत कम चीज़े मेरे हाथ लगी। सत्रह हज़ार रुपये वापिस देना है यह विचार ही मुझे थका देता है। बात पिंड़लियों के दर्द से शुरु हुई थी, दिमाग़ के दर्द पर पहुच गई थी। फिर यह चहरे का पीलापन...। एक दिन मैं अकेला काले महादेव पर जाकर बैठ गया। नदी अपनी गति में वहीं थी। कालेमहादेव बहुत से नारियलों के साथ वहीं पड़े हुए थे। पुजारी जी मेरे करीब से दो तीन बार गुज़रे पर चूकि मैं अकेला था सो उन्होने मुझे पहचानने से भी इनकार कर दिया। मुझे लगा सुमन के बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है यहाँ।
काले महादेव पर बैठे हुए अचानक मेरी तीव्र इच्छा हुई नकल करने की... सबकी नकल.. काले महादेव की, अपनी खिड़की से जिये हुए अकेले क्षणों की, बंद खिड़कियों की, सुमन की, मालिक की, गोलगप्पे वाले की... और सबकी... सभी चीज़ो की। मैं बहुत सारे रंग और कैनवास खरीद कर अपने कमरे में पहुचा.... और दरवाज़ा भीतर से बंद कर दिया।
मेरा जीवन उस दृश्य की तलाश में नहीं नीहित है जिसमें पहुचकर वह चित्र पूरा हो जाएगा.... बल्कि .... असल में मेरा पूरा चलना....एक चित्र का बनना है... जिसका कोई अंत नहीं है.. जैसे इस चित्र की कोई शुरुआत नहीं थी। सो मेरा चित्र जिस दिन खत्म होगा, उसे देखने के लिए मैं वहाँ नहीं होऊगाँ।... यह मुझे बहुत बाद में पता चला।
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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल