Thursday, July 28, 2011

life is good....


जीवन बहुत सुंदर है। यह बात लिख लेना होता है। पर उसे अपने लिखे में मैं दर्ज करना भूल गया था। आज दर्ज कर रहा हूँ। जिसकी वजह एक बूढ़ा ब्रिटिश आदमी है... जो मुझे न्युयार्क की मेट्रो ट्रेन में मिला था। उसके हाथ में डायरी थी, वह कुछ लिख रहा था। मैं हर बार की तरह अपना रास्ता भटक गया था और किसी गलत मेट्रों में चढ़ चुका था। जाना कहीं ओर था और कहीं ओर ही चल पड़ा था। उस बूढ़े ब्रिटीशर ने अपना लिखना बंद करके मुझे विस्तार से समझाया कि कहाँ उतरना और कौन सी मेट्रो किस स्टेशन से पकड़ना। बाद में उसने जोड़ा कि "फिर तुम उस रास्ते पर चलने लगोगे जहाँ तुम्हें जाना है” मैंने हस कर उसकी इस बात का स्वागत किया... उसे धन्यवाद दिया और उसके लेखन में बाधा पहुंचाने के लिए माफी मांगी। मैं उसके बगल में बैठ गया। गलत रास्ते पर चलने की असहजता पूरे शरीर में थी सो मैं ठीक से बैठ नहीं पा रहा था। उसने धीरे से पूछा क्या करते हो? यूं मैं लेखक हूँ कहने से कतराता हूँ पर चूंकि वह कुछ लिख रहा था इस बात से मुझे बल मिला और मैं बड़े अभिमान से कहा कि मै लेखक हूँ। फिर उसने पूछा कि ’How is life?’ मैं बिना झिझक जवाब दिया कि ’life is good.. very good.’ मेरी बात पर वह खुश हो गया और उसने कहा कि क्या मैंने यह बात लिखी है? मैंने पूछा कौन सी बात? उसने कहा कि ’life is good’ वाली बात। मैंने ना में सिर हिला दिया। वह कहने लगा कि... ”मैं जब भी अपनी पुरानी डायरीज़ पढ़ता हूँ तो मुझे सिर्फ पीड़ा, अवसाद और ग्लानी के पन्नों से भरी हुई वह दिखतीं हैं। फिर मुझे याद आया कि जब भी जीवन में मैं किसी भी प्रकार के डिप्रेशन से गुज़र रहा होता था तो मुझे अपनी डायरी याद आती थी और मैं उसके पन्ने के पन्ने गूद डालता था। अब इस उम्र में आकर जब अपनी डायरी पढ़ता हूँ तो लगता कि कितना पीड़ित जीवन जीया है मैंने... जबकि यह सही नहीं है.. मैं उन क्षणों को दर्ज़ करना ही भूल गया था जब मैं कहा था कि ’life is good.’ इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि इस बात को अभी इसी वक़्त लिख डालों...।”
Life is good… मैंने मेट्रो से उतरा और, उसके कहे अनुसार, दूसरी वाली मेट्रो में बैठ गया जो मुझे वहाँ ले जा रही थी जहाँ मुझे जाना था। कितने ही तरह के लोगों से घिरा हुआ था मैं... सभी अपनी किताबों, अपने संगीत और अपनी निजता में व्यस्त थे। कोई सीधे किसी से भी आँखें नहीं मिलाना चाहता था। मैंने अपनी डायरी निकाली और लिखा.. life is good… पर उस पर भी मुझे उस वाक़्य की संपूर्णता का एहसास नहीं हुआ... मैंने कुछ बड़े अक्षरों में लिखा .... LIFE IS GOOD… तब भी कुछ अधूरापन था। तभी मैंने धीरे से, खुद से, खुद के लिए फुसफुसाया life is good… और मुझे अच्छा लगा। जब मेरा स्टेशन आने वाला था। मैंने अपनी डायरी को वापिस बेंग़ में रखा... और खड़े होकर एक अंग्ड़ाई लेकर चिल्ला दिया.. LIFE IS GOOD. अगल बगल बैठे सभी लोग अपनी निजता से निकलकर मेरी तरफ देखने लगे... मैं हल्की झेंप के साथ मुस्कुरा दिया... सभी मुझे देखकर मुस्कुराने लगे।

Thursday, May 19, 2011

"मौन में बात..."





कुछ आहट हुई.. मेरी आँख खुल गई। हड़बड़ाहट-घबराहट। पहले झटके के बाद, मैं ’कोई है!’ के विचार पर मैं स्तब्ध था। बिना हिले-डुले मैं एक टिड्डे सा रुका रहा... लगा मेरे हिलने से वह आहट कहीं दब ना जाए। ’कोई है!’... ’कोई है!’.....”कोई है!”..... कुछ देर बाद मैंने हथियार डाल दिये...कोई नहीं है। मैं वापिस बिस्तर पर पसर गया। चादर खींच कर मुँह पर डाल दी। क्या मैं वापिस सो चुका था? मानों बीच में कुछ हुआ ही ना हो... कोई आहट ना हो, मेरे ’कोई है!’ का इंतज़ार सब झूठा हो।
एक सन्नाटा है मेरे अगल-बगल... इस सन्नाटे के ढ़ेरों शोर हैं... मैं अपने अकेलेपन में अलग-अलग शोर चुनता हूँ.. सुनता हूँ। पर मेरे अकेलेपन में एक आहट है जो हमेशा बनी रहती है कि बाहर कोई है.... कोई आने वाला है। मुझे असल में हमेशा किसी-न-किसी का इंतज़ार रहता... ना..ना..ना... किसी-न-किसी का नहीं... किसी का। कोई है जिसे मैं नहीं जानता हूँ... या जानता हूँ.. पर मिला नहीं हूँ। या मिलना चाहता हूँ बेसब्री से.. ऎसा कोई आने ही वाला है। अचानक दरवाज़े पर आहट होगी और मेरे दरवाज़ा खोलते ही मुझे वह दिख जाएगा... वह जिसका मैं सालों से... या शायद जबसे मुझे याद है तब से, इंतज़ार करता आ रहा हूँ। मुझे हमेशा से लगता था कि मैं अकेला रह रहा हूँ... जबकि मैं कतई अकेला नहीं रह रहा हूँ। मैं हमेशा इंतज़ार में हूँ उस एक के जो बस आने को है... इसका मतलब मैं हमेशा से उस एक के साथ रह रहा हूँ... और रहता रहूँगा जो कभी भी नहीं आएगा !!!!!!!
“सिमोन से मिलने जाना है।“
ओफ !!! अब सोया नहीं जाएगा। मैंने आँखों से चादर हटा ली...। टकटकी बांधे दीवार को देखता रहा। बहुत पहले... किसी चुप रात में मैंने उस दीवार पर पेन से, लेटे हुए... एक रोता हुआ चहरा बनाया था। हमेशा ऎसे कुछ हज़ार क्षणों में मैं कसम खाता हूँ कि उठते ही इसे मिटा दूंगा। पर कभी मिटा नहीं पाया... उठते ही भूल जाता हूँ। मैंने करवट बदल ली, उस रोते हुए चहरे की बजाए मैंने चलते हुए पंखें को देखना ज़्यादा बहतर समझा। कम से कम वह दीवार से तो बहतर ही है... वह चल रहा है... कहीं पहुच नहीं रहा है यह अलग बात है मगर कुछ कर्म में तो लीन है ना..। उसका कर्म है हवा देना... वह चल रहा है सालों से लगातार और हवा फेंकता आ रहा है।
मुझे खुद पे, कुछ बातों को लेकर अटूट विश्वास है। जैसे सालों से मुझे पूरा विश्वास है कि मैं रोज़ उठूगां और उठते ही भूल जाऊंगा कि मुझे दीवार पर बने उस रोते हुए चहरे को मिटा देना है.. हमेशा के लिए.. मैं उसे कभी भी नहीं मिटा पाऊंगा... और अभी, ठीक इसी वक़्त मैं सो नहीं सकता, मैं अभी कुछ ही देर में उठुंगा और एक बार दरवाज़ा खोलकर ज़रुर देखूंगा कि शायद पंद्रह मिनिट पहले जो मुझे लगा था कि आहट है.. वह अगर सच में आहट है तो वह अभी भी उस आहट के बाद वहीं, दरवाज़े के बाहर प्रतिक्षा में खड़ा होगा। अभी जितनी भी देर मैं बिस्तर में उलट-पलट रहा हूँ यह सब...दरवाज़ा ना खोलने के विरुद्ध मेरी कार्यवाही हैं... और कुछ भी नहीं।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। मैं सकबका गया... ओह! तो सच में कोई बाहर खड़ा है। मैं दरवाज़े की तरफ लपका। दरवाज़ा खोलते ही सामने मुझे एक आदमी खड़ा दिखा...
’बिल...?’
’हें...!’
’अखबार का बिल...?’
’हाँ...’
मैंने उसके हाथ से पर्ची ली और भीतर आ गया। मुझे लगा उसने मुझे पकड़ लिया है। उसे पता चल गया है कि मैं... ओह!!!
मैंने सरसरी निग़ाह से बिल देखा। कुछ देर अपना पर्स तलाशा... जब मिला तो उसमें मात्र बत्तिस रुपये थे। अख़बार वाला किसी बुरी ख़बर की तरह काफी देर से बाहर खड़ा था। मैं उसके पास गया।
’दोस्त, अभी पैसे तो.. नहीं हैं।’
’ठीक है कल आता हूँ।’
वह बड़बड़ाता हुआ चला गया। मेरे पास कभी भी पूरे पैसे नहीं रहते... नहीं मैं कभी भी थोड़े से नहीं चूकता हूँ। मेरे पास थोड़े होते हैं... और बहुत सारा, उस वक़्त की ज़रुरत का पैसा, मेरे पास कभी भी नहीं होता।
उसके चले जाने के बाद मैंने दरवाज़ा बंद किया... और उसके बिल की ओर घूरकर देखने लगा। एक सौ बावन रुपये...। अरे!!! यह तो मुझे ठग रहा है। इसने बीच में करीब दस दिन मुझे अख़बार नहीं दिया था। उसके पैसे इसने काटे ही नहीं जबकि मैंने इससे कहा था। वह मुझे ठग रहा है... वह मुझे ठग रहा है... और इस बात से मुझे खुशी हुई। मुझे असल में मेरा ठगा जाना हमेशा से अच्छा लगता आया है। जब मेरा कोई दोस्त मुझसे पैसे उधार लेता है और समय रहते लौटाता नहीं है तो मुझे उसके बाद से हमेशा उससे मिलने में खुशी मिलती है...। मैं कभी उससे पैसों का ज़िक्र नहीं करता... वह खुद कभी भी बात नहीं उठाता... पर मैं खुश हो रहा होता हूँ। मुझे मेरा लगातार ठगे जाना खुशी देता है।
कभी-कभी मैं इसके विरुद्ध खड़ा होना चाहता हूँ... चिल्लाना चाहता हूँ कि बस अब से मैं कसम खाता हूँ कि मैं कभी भी ठगा नहीं जाऊंगा। इस कसम के खत्म होते ही पता चलता है कि संधर्ष कितना बड़ा है... वह संधर्ष आलू-प्याज़ से लेकर पूरे बज़ार में, और पूरे बाज़ार से लेकर खुद मुझ तक फैला हुआ है...। मैं भी लगातार खुद को ठगता रहता हूँ.... अब इस ठगने में... कौन ठग है और कौन ठगा जा रहा है???
यूं जब दस दिन अख़बार नहीं आया था तो मुझे एक तरह की खुशी हुई थी। रोज़ सुबह ख़बर का एक जत्त्था मेरे घर में ’धम्म..’ से गिर जाता है। जब तक मैं उसे पुराने अख़बारों के ढ़ेर के ऊपर नहीं फैंक देता मुझे लगता है कि एक ज़िम्मेदारी है, ’यह पूरा अख़बार पढ़ने की...’ जिसे मैं रोज़ सिर्फ चित्र देखकर पूरी कर लेता हूँ। मुझे ज़िम्मेदारीयों से बहुत कोफ़्त होती है। किसी भी किस्म की ज़िम्मेदारी। मुझॆ ख़बरों से भी बहुत कोफ़्त होती है। मैं क्या कर लूंगा बहुत सारी समस्याओं को सुनकर सुबह-सुबह?
“सिमोन से मिलने जाना है।“
मैं आजकल अपने पुराने पड़ गए, छूटे हुए कपड़ों को पहनता हूँ। मैं कई सालों से बदला नहीं हूँ सो सालों पुरानी चीज़े वैसी-की-वैसी मुझसे चिपक जाती हैं मानों मैं बस उन्हें छोड़कर शाम को धूमने निकला था... अब मैं घर वापिस आ गया हूँ। यह पुरानी चीज़े मुझसे कोई शिक़ायत नहीं करती हैं... क्योंकि यह सालों से मेरे साथ है... इन्होंने धीरे-धीरे मुझसे अपनी सारी अपेक्षाओं को घिस डाला है। मेरी पुरानी चीज़े मुझे कोई ज़िम्मेदारी नहीं देती। लंबी उपेक्षाओं के बाद कोई सवाल नहीं करतीं। चुप मेरे शरीर से वह चिपक जाती हैं। सफेद शर्ट, जिसपर किसी लाल टी-शर्ट का रंग छूटा हुआ है और फटा-पुराना नीला जींस... उसे पहनकर मैं आईने के सामने खड़ा हुआ... उफ!! शेव कर लेता हूँ... सो मैंने झट-पट शेव कर डाली। हाँ.. अभी ठीक था।
’सिमोन से मिलने जाना है।’.....’सिमोन से मिलने जाना है।’..... ’सिमोन से मिलने जाना है।’
खुद को आईने में देखता हुआ मैं ’सिमोन से मिलने जाना है’ की रट लगाए था....। सिमोन के कई बार फोन करने पर भी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई। वह बुलाती रहीं पर मेरे जाने का साहस ही नहीं हुआ। मैं उनसे मिलने के लिए घर से निकला था... कई बार... पर जब भी घर के बाहर कदम रखा... एकटक भागती-दौड़ती गाड़ियों को.. लोगों को ताकता रहा...। मुझे पता था सिमोन कुछ परेशान हैं.. मेरा उनके पास इस वक़्त जाना भी बहुत ज़रुरी था... पर मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। हाँ... हिम्मत चाहिए दूसरी तरफ जाने में...। मेरा इतनी देर तक खुद को आईने में ताकते रहना एक तरह से हिम्मत बटोरना ही है। सिमोन मेरे जीवन में का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं...। करीब-करीब दस बारह साल से हम एक दूसरे को जानते हैं.... पिछली बार मैं उनसे उनके बयालीसवे जन्मदिन पर मिला था...। हम दोनों ही थे बस उनके घर पर... हमने केक काटा... Wine पी... और देर तक लंबी चुप्पी में... अपने-अपने एकांत में बैठे रहे। सिमोन confession box है मेरे लिए... जहाँ जाकर मुझे बस कुछ देर बैठना होता है... कुछ भी confess करने की ज़रुरत नहीं होती...।
मैंने झटपर घर में ताला लगाया और अपनी शर्ट के तीसरे बटन को देखता हुआ... दूसरी तरफ कूद गया। कुछ देर में मैं सिमोन के घर में.. सिमोन के सामने बैठा था।
उनके बालों के किनारे सफेद हो चले थे। आँखों के नीचे हल्का काला रंग बह निकला था... उसे काला नहीं कत्थई कहा जा सकता है। लंबी गर्दन... तीख़ी नाक़... आँखे किताबों के पन्नों में कुछ अर्थ टटोलती सी...। घर की सूती सफेद साड़ी पहने हुए थी...जिसमें बेंगनी रंग के छोटे फूल बने हुए थे।
’कुछ लिख रहे हो आजकल...?’
किताबों में कुछ टटोलते हुए उन्होंने पूछा।
’नहीं... घर में ही था..।’
’कोई महिला मित्र...?’
मैं खिसिया दिया...
’नहीं.... ना महिला, ना ही मित्र।’
’बहुत समय लगा दिया आने में....’
मैं चुप रहा... उन्होंने भी आगे कुछ नहीं कहा...। मैं क्या कहता कि “पता नहीं किससे डरा हुआ घर में दुबका बैठा हूँ.... कुछ देर के लिए बाहर निकलता हूँ तो घबरा जाता हूँ। लोगों के बीच बैठे हुए उनकी बातें मुझे जिबरिश लगती हैं... एक दूसरे का मनोरंजन करने की थकाने वाली कोशिश.. मुझे बाहर सांस लेने में दिक्कत होती है सो घर में बैठा हूँ... चुप्पी साधे..” क्या मतलब निकलता इन बातों का.. सो मैं चुप ही रहा।
’क्या हम लोग एक दूसरे को इतना भी नहीं जानते कि एक दूसरे के दुख सूंघ सके?”
यह कहकर वह भीतर चली गई। सामने खाली कुर्सी थी... जिसकी लकड़ी पर उनके सालों बैठे रहने के पीले निशान पड़ चुके थे। मुझे उन निशानों को छूना बहुत पसंद था... मैं हल्के से अपनी उंगलिया उस कुर्सी की चिकनी देह पर फेर लेता... और लगता कि किसी की सालों की तपस्या का मैं भी एक छोटा हिस्सा हूँ। सामने टेबल पर तीन किताबें पड़ी हुई थीं... जो आधी पढ़ी हुई, ओंधी पड़ी थी... एक अंग्रेज़ी की और दो हिंदी की। वह कभी भी एक बार में एक किताब नहीं पढ़ती थी। उनमें एक बात को एक बार में ही खत्म करने की धीरता नहीं थी। उनका घर उनकी मन:स्थिति की गवाही दे रहा था। चीज़े बिख़री हुई पड़ी थी। कल रात के खाने के निशान भी टेबल पर मौजूद थे... झाडू कुछ दिनों से नहीं लगी थी।
वह भीतर अपनी कही हुई बात को दफ़्न करने गई हैं...। जब वह उसे पूरी तरह दफ़्न कर देंगी तो एक मुस्कुराहट के साथ बाहर आ जाएगीं... जैसे वह मुझसे अभी-अभी मिली हों। वह मुझसे बहुत नाराज़ थी, पिछले कुछ हफ्तों की व्यस्तता के चलते मैं उनसे बिलकुल भी नहीं मिल पाया था।
’सिमोन... सिमोन...”
मैने उन्हें आवाज़ दी पर भीतर से कोई जवाब नहीं आया। मैं कुछ देर में उठकर टहलने लगा... वह अपना पूरा समय लेगीं मैं जानता हूँ। सुबह, सूरज की रोशनी खिड़की से सीधे उनकी दीवर पर पड़ती थी, फिर धीरे-धीरे रेंगते हुए एक उजले प्रेत की तरह घर छोड़कर चली जाती। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि ’क्या मैं इस रोशनी को अपने घर में रोक सकती हूँ...? घर का दरवाज़ा खिड़की सब बंद करके इसे क़ैद कर लूं? जैसे अपने घर में मैं क़ैद हूँ।’ उनके घर में घुसते ही लगता है कि आप उनके भीतर चले आए हैं। मैं उन्हें उनके घर से अलग करके कभी भी देख नहीं पाता। जब हम कभी बाहर घूमने निकलते थे तो वह एक छोटी बच्ची सी हरकते करने लगती थी... जो अपने माँ-बाप की छत्र-छाया से बहुत दिनों बाद भाग निकला हो। वह बिना अपने घर के नग्न सी जान पड़ती थी। मैंने कभी उन्हें नग्न दिखने वाली बात नहीं बताई...।
’यह देखो आज दार्जलिंग वाली चाय तुम्हारे लिए। मुझे पता था आज तुम ज़रुर आओगे.. सो मैंने कल शाम को तुम्हारे लिए यह चाय लेकर आई।’
इसके पहले मानों कुछ हुआ ही ना हो। हमारी बहस, मेरी लाचारी में झुकी हुई आँखें, उनका गुस्सा... सब कुछ जैसे कई महिनों पुरानी बात हो जिसे हम दोनों ने दफ़्न कर दिया हो। वह दफ़्न करके आ चुकी थी पर मैं अभी भी जल रहा था।
उन्होंने चाय के दोनों कप टेबल पर रखे और खुद अपनी कुर्सी पर बैठ गई... मैं अभी भी टहल रहा था।
’तुम बिस्कुट भी लोगे?’
’ना...।’
मैंने अपना कप उठाया और वापिस टहलने लगा। उन्हें पता था कि मेरे लिए कुछ भी दफ़्न करना इतना आसान नहीं है...। सिमोन अपनी चाय पर सहजता से बैठी रहीं... मेरा टहलना मुझे ही खटकने लगा।
’हमें ऎसा क्यों लगता है कि जो खेल हम खेल नहीं पाए... उसे अगर हम खेल लेते तो आज जीत चुके होते?’
पता नहीं यह बात मेरे मुंह से क्यों निकली...। शायद मैं उनके भीतर टहल रहा था... उनकी गोद में कहीं मेरे पांव पड़ रहे थे.. उनकी बाहों में मेरी ऎड़ियाँ गड़ रही थी सो मैं यह कह गया...। उन्हें यह ना लगे कि उनके गुस्से की वजह से मैं परेशान हूँ। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मैं परेशान हूँ... अपने व्यक्तिगत कारणों की वजह से...। वह अपनी चाय पर बनी रही। मैं कितना भी झूठ क्यों ना कहना चाहू.. पर सिमोन के सामने मेरे मुँह से हमेशा मेरे बहुत निजी सत्य ही निकल रहे होते हैं....। मैं सच में, गए कुछ समय से जीवन के उन खेलों के बारे में सोचता रहा हूँ जिनमें से मैंने बीच में ही कहीं exit ले ली। दुख यह भी है कि वह खेल अभी भी, मेरी गैरमौजूदगी में भी चल रहे हैं.. कहीं....।
’अगर उन खेलों के बारे में ज़्यादा सोचोगे तो मेरे तरह के लेखक बन जाओगे।’
यह कहते ही सिमोन हसने लगी। ज़ोर-ज़ोर से....। मैं अपना टहलना बंद करके उनके सामने आकर बैठ गया। उस हंसी में कमरे की हवा बहुत हल्की हो गई थी। यह सिमोन का घर था, इस घर में सांस लेने के लिए हवा कितनी ठोस हो यह सिमोन ही तय कर सकती थी। इतने सालों के हमारे संबंध में मैं आज भी उंगली रखकर नहीं बता सकता कि यह असली सिमोन है... वह हमेशा अलग होती है। जब मैं शुरु-शुरु के दिनों में सिमोन से मिलने आता था तो ’सिमोन जी’ कहकर उन्हें संबोधित करता था। मुलाकातों की शुरु की जिझक खत्म होते ही उन्होंने मुझे झिड़क दिया... ’जी’ हट गया और हम एक दूसरे के गहरे दोस्त हो गए। ’गहरा’ शब्द भी मैं सिर्फ अपने लिए ही इस्तेमाल कर सकता हूँ...। मेरे एकांत में वह गहरे बैठी है... और उनका एकांत मेरे लिए वह जगह है जहाँ मैं कभी ज़्यादा ठहर नहीं पाया।
’तुम्हें मनोज याद है?’
’हाँ जो मुझे बहुत पसंद नहीं करता था।’
’हाँ वही.... उसका ख़त आया था... पहले मैं इस ख़त को लेकर बहुत हंसी थी फिर मुझे तकलीफ होने लगी...।’
यह कहते ही उन्हेंने एक किताब अपने हाथों में रख ली। उसके कुछ पन्ने पलटे... और एक किसी पन्ने पर आकर वह रुक गई। जैसे कोई बच्चा अपना रटा-रटाया पाठ भूल जाता हो और फिर आगे की बात किताब में टटोलने लगता हो।
’यह कहानीया शायद तुम्हें याद हो...?’
’कौन सी...?’
’जो अभी अभी छपी हैं... जिसपर हमारी बहस हुई थी...।’
’हाँ मैंने कहा था कि यह प्रेम कहानीया है.... और आपने इसे ’मौंन में बात’ जैसा टाईटल दिया था।’
उन्होंने वह किताब मेरे हाथों में थमा दी..। टेबिल-क्लाथ के नीचे से एक ख़त निकाला और मुस्कुराने लगी।
’हम कितना fiction में जीते है? जीना बहुत क्षणिक होता है... कभी-कभी हम किसी आश्चर्य को जी लेते है...। उसके पहले और बाद में हम fiction में ही रहते हैं। तुम मुझे इस वक़्त सुन रहे हो... तुम्हारे हाथों में मेरी कहानियों की किताब है और मेरे हाथों में मनोज का ख़त... यह बात शायद तुम्हारी गढ़ी हुई कहानी हो...इसका मुझसे कोई संबंध ना हो? कई सालों बाद क्या यह घटना तुम्हारे जीए हुए के हिस्से में शामिल हो सकती है?’
यह सवाल नहीं था, मैंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। सिमोन का अंगूठा ख़त के कोने से खेल रहा था। वह कुछ ओर कहना चाहती थीं पर उस बात का दरवाज़ा उन्हें नहीं मिल रहा था... वह इस वक़्त दीवारे टटोल रही थीं।
’मैंने बहुत सघन प्रेम महसूस किया था जब मनोज मेरे साथ रह रहा था। तुम्हें आश्चर्य होगा पर मैं मनोज के साथ बहुत कम रही हूँ। मैंने कहानी गढ़ना शुरु कर दिया था... वह कोई ओर मनोज था जो मेरे साथ रह रहा था। कभी-कभी उस मनोज की शक़्ल इस मनोज से मिल जाया करती थी... आवाज़ भी एक सी थी... पर दोनों की सांस एकदम जुदा। मैं मनोज के होठों के ठीक पास... बहुत देर तक रुकी रहती थी... उसकी आँखें, उसकी गालों की उभरी हड़्डिया ताकती सी... मैं वहाँ रुककर उसकी सांसे चबा रही होती थी।’
उन्होंने ख़त को हलका मरोड़ा..
’...और यह मनोज इन कहानियों को पढ़कर वह मुझसे वापिस मिलना चाहता है। इस ख़त में यही लिखा है। पहले मुझे हंसी आई फिर तकलीफ होने लगी।’
’तकलीफ किस बात की...?’
’हमारे पास शब्द ही तो हैं... शब्दों को एक तरीके से जमाने पर कुछ भाव उत्पन्न होते हैं...। वह भाव किसके हैं? जिसने शब्द कहे है उसके यह जो वह शब्द सुन रहा है उसके?’
यह मेरी बात का जवाब नहीं था। मैं जवाब चाहता भी नहीं था। सिमोन ने धीरे से ख़त फाड़ दिया। ख़त के फटते ही मेरी ख़त में दिलचस्पी बढ़ गई... ठीक-ठीक क्या लिखा होगा उसमें... कौन सी बातें? ख़त फाड़कर उन्होंने उसे अपनी मुठठी में जकड़ लिया... उस ख़त के शब्द अभी भी उनके भीतर रिस रहे थे। मेरी इच्छा हुई कि मैं उस फटे हुए ख़त को उनके हाथों से छीन लूं.. फिर उसका कतरा-कतरा बड़ी तरतीब से जमाऊं....उसका एक-एक शब्द चबा लूं...और फिर वापिस सिमोन के सामने बैठकर यह दृश्य फिर से जीना शुरु कर दूं।
’यह एक बहुत बड़ी प्रदर्शनी है। मेरी बाल्कनी में वही कपड़े सूख रहे हैं जैसा लोग मुझे देखना-सुनना चाहते हैं। मैं भी लगातार उन्हीं कपड़ों को धोती-सुखाती हूँ... जिन कपड़ों में लोग मुझे देखना चाहते हैं। तुम्हें पता है यह हिंसा है... हमारी खुद पर। और इसीलिए शायद हम उन खेलों के बारे में बार-बार सोचते है... जिन्हें खेलना हमने बहुत पहले छोड़ दिया था... जिन्हें अगर खेल लेते तो शायद हम आज जीत जाते।’
सिमोन कुछ देर में उठी और डस्टबिन तलाशती हुई भीतर चली गईं। ख़त डस्टबिन में डालकर वापिस आई और घर की सफाई में लग गई। वह अपने एकांत में जा चुकी थी... मेरी मौजूदगी अब उनके लिए कोई माने नहीं रखती थी... पर मैं वहाँ मौजूद रहा..। इतने दिनों तक ना आ पाने का गिल्ट मेरे बीतर था। मैं उन्हें पूरा वक़्त देना चाहता था कि वह वापिस अपनी कुर्सी पर आ सकें और एक लय में अपनी बात कह सकें...। पर वह नहीं आई...।
कुछ देर मैं एक पेड़ के नीचे रिक्शे का इंतज़ार करता रहा। फिर पैदल घर की ओर चल पड़ा। मैं बहुत जल्दी किसी चीज़ को दफ़्न नहीं कर पाता हूँ... इस मामले में शायद मैं हिंदू हूँ। मैं चीज़ो को जलाना पसंद करता हूँ... पूरे संस्कारों के साथ, उन्हें कंधे पर कई दिनों तक ढ़ोता हूँ.... जलने के बाद उनकी गर्म राख से कई दिनों तक अपने हाथ सेकता रहता हूँ... फिर राख से जली हुई हड़्डीयों को बीनकर उन्हें नदी में सिराने जाता हूँ.. इस सब में कई बार सालों लग जाते हैं।
अधूरी बातों संख्या उम्र के साथ-साथ बढ़ती रहती है। मैं कितनी भी कोशिश क्यों ना करुं बात पूरी तरह पूरी करने की तब भी कहने को बहुत कुछ हमेशा बचा रह जाता है। फिर लगने लगता है कि यह बचा हुआ... कल्पना के संवाद जैसा है.. इस दुनिया के जिए हुए दृश्यों में यह संवाद हो ही नहीं सकते है। इन संवादो की फिर जगह कहाँ है? क्या यह वह सच हैं जिनकी बुनियाद पर हम बाक़ी बातें करते फिरते हैं.... या यह बिल्कुल झूठी बातें है... जिनका संबंध उस दूसरी दुनिया से है जो इस दुनिया का प्रतिबिंब है.. जिसे हम जी रहे हैं... या बात बिलकुल उल्टी है... यह दुनिया प्रतिबिंब है उस दुनिया का जिसकी बातें हम बार-बार कहने से चूक जाते हैं।
मैं किसी रिक्शे के आने का इंतज़ार नहीं कर रहा था...। मैं चल रहा था...। यह सड़क जानी पहचानी थी... हाँ मेरे जीवन का बहुत सा समय यहीं गुज़रा था... मैं अपने घर के सामने खड़ा था... नहीं वह घर नहीं जिसमें मैं रहता हूँ... वह कमरा है...। घर आपका हमेशा वहीं होता है जहाँ आप बड़े होते हैं। यह वह जगह है जिसे मैं अपना घर कहता हूँ... जहाँ अब सिर्फ मेरा बाप अकेले रहता है। मैं कब से इस तरफ नहीं आया। नीला दरवाज़ा सफेद दीवारें....
मुझे मेरे बाप और मेरे देश में बड़ी समानता लगती है। मेरा पूरा बचपन मेरे बाप की महानता में गुज़रा था। वह मेरे पेदा होने के पहले भी था, उसकी किससे कहानियाँ लोरी की तरह सुनते हुए मेरा बचपन बीता.... वह मेरा हीरो था। वह मेरे सारे सवालों का जवाब था। फिर जैसे-जैसे मैंने होश संभाला मुझे लगने लगा कि इस देश ने मेरे साथ धोखा किया है... यह कमज़ोर है... इसका भी पहले कोई बाप था... इसकी भी अपनी बहुत सी कमियाँ हैं। मुझे मेरे देश पर दया आने लगी। जब तक मैं मेरे धोखे की बात लेकर बाप के पास जाता... वह मुझे लेकर चुप हो चुका था। मैं वह नहीं हो पाया जिसका उन्होंने सपना देखा था... मैं वास्तविकता से भागने जैसा कोई आदमी हो चुका था.. जो अपने बाप जैसा दिखता था। वह अभी भी मुझमें अपना सपना ढ़ूढ़ते थे। मेरे जवाबों में जब उन्हें निराशा हाथ लगती तो वह चुप हो जाते। मेरा बाप मेरे देश की तरह था... जो मेरे सारे संवादों पर चुप्पी मारे बैठा था। माँ जब ज़िंदा थी तो हमारे बीच खूब लड़ाईया होती थी... माँ के बहाने से हम आपस में बात भी कर लिया करते थे। पर माँ के चले जाने के बाद अपने बाप के साथ रहना असहनीय हो गया था। सो मैंने उनको अकेला छोड़ दिया। एक किराय का कमरा लेकर रहने लगा।
कुछ देर सांकल बजाने के बाद भीतर से आवाज़ आई।
’अरे भाई कुछ नहीं चाहिए...।’
’पापा मैं हूँ...।’
कुछ देर की शांति के बाद दरवाज़ा खुल गया। बाप बहुत देर मुझे आश्चर्य से देखता रहा। फिर भीतर किचिन की तरफ चला गया। मैं घर में टहलने लगा। घर की एक सुंदर ठंडक है.. जिसकी कमी मैं अपने कमरे में सबसे ज़्यादा महसूस करता हूँ... मंदिरों-चर्च जैसी ठंड़क। शायद घर में बहुत सारा मृत दीवार से चिपके हुए तैरता रहता है... पुराना जीया, बीते हुए लोग और बहुत से रहस्य... जिसका सत्य अब घर अपनी दरारों में छुपाए खड़ा है। मैं पहले अपने कमरे में गया... वह अभी तक वैसा ही जमा हुआ था मानों मैं अभी भी यहाँ रह रहा हूँ। तभी मेरी निग़ाह उस शेल्फ पर पड़ी जिसके पीछे मैं, अपने बाप की मार के डर से, छिप जाया करता था। उस शल्फ के कोने से मैं सबको देख सकता था लेकिम मुझे कोई भी देख नहीं पाता था। एक अजीब सी इच्छा भीतर जाग गई उस शेल्फ के पीछे छिपने की... मैंने अपना बेग़ नीचे रखा और शेल्फ के पीछे घुसने की कोशिश की... मैं अब बड़ा हो गया था। मेरा वहाँ घुसना नामुमकिन था फिर भी मैं कोशिश करता रहा... मैं खीजने सा लगा... और एक अजीब आवाज़ के साथ मेरे आंसू गिरने लगे। मैं अपने आपको अपने बचपन में ज़बरदस्ती घुसाना चाह रहा था।
’क्या कर रहे हो?’
मेरा बाप दरवाज़े पर चाय का प्याला लिए खड़ा था। मैं बाहर निकला। बाप ने चाय के प्याले को टेबल पर रखा और मेरे कपड़े झाड़ने लगा, जिसपर चूना लग गया था। मैं उनसे मना करता रहा पर वह नहीं माने... शायद इससे पहले उन्होंने मुझे मेरी माँ की मृत्यु पर रोते देखा था। मेरा रोना रुक नहीं रहा था सो मैं कुछ देर के लिए बाथरुम चला गया।
हम दोनों चाय की टेबल पर आमने सामने बैठे थे।
’आप चाय नहीं पीएगें?’
’डॉक्टर ने मना किया है।’
’अरे! क्या हुआ है आपको?’
’बुढ़ापा है बिमारियाँ तो अब लगी रहेगीं।’
’बिमारी?’
’शुगर है... जिसकी वजह से परहेज़ करना पड़ रहा है।’
देश की व्यवस्था संभालने वाला एक सरकारी मुलाज़िम मेरा बाप था। सारी व्यवस्था में बेईमानी के बावजूद मेरे बाप को लगता था कि देश चंद ईमानदार लोगों की वजह से चल रहा है, जिसमें वह भी एक है। मेरे लिए देश भागा करता था क्योंकि मुझे लगता था कि मेरा बाप देश का बहुत सारा बोझ अपने कंधो पर लिए भाग रहा है। मेरा देश मेरे सामने बैठा था... बीमार... और मैं कुछ भी नहीं कर सकता था।
तभी मेरी निग़ाह मेरे पिताजी के हाथों पर पड़ी....। वह कितने बूढ़े हो चुके हैं। उनकी चमड़ी लटक गई है। कंधे झुके हुए हैं। वह कोई ओर था जिसे मैं अपना बाप माने बैठा था... मेरा बाप तो मेरे सामने बैठ है जिसे शायद मैं पहली बार देख रहा हूँ। अचानक मुझे उनकी उम्र बहुत ज़्यादा लगने लगी। उनके हाथों के ऊपर उगे हुए बाल भी सफेद हो चुके थे। क्या उम्र होगी इनकी.... मुझे मेरे बाप की उम्र नहीं पता है।
’आपकी उम्र क्या होगी?’
’क्या?’
’कुछ नहीं।’
फिर मैंने कुछ नहीं पूछा। हम दोनों को ही अब मेरी चाय खत्म होने का इंतज़ार था। उनकी निग़ाहे कुछ देर मुझपर रुकी थी जब हम बात कर रहे थे... अब वह दीवारों पर टंगी तस्वीरों को टटोल रही थीं।
’सिमोन कैसी है?’
जैसे किसी तस्वीर को देखकर उनको यह बात याद आई हो।
’ठीक है।’
’अभी भी मिलते हो उससे?’
’उन्हीं के घर से चला आ रहा हूँ।’
इस बात पर मेरा बाप उठकर अपने कमरे में चला गया। मैंने चाय का कप उठा और उसे किचिन में रख दिया। किचिन काफी बिखरा पड़ा था। सो मैं उसे साफ करने लगा। कुछ सुबह के बर्तन पड़े थे वह मांज दिये। जाने से पहले कुछ देर पिताजे के कमरे के बाहर खड़ा रहा.... वह अखबार में अपना सिर गडाए बैठे थे। मैंने सालों से पिताजी के कमरे की चौखट नहीं लांगीं...। मैं जाने को हुआ... तभी उनकी आवाज़ आई...
’मैं अगले महीने बहत्तर का हो जाऊंगा।’

रिक्शा, भीड़, पसीना, डर...
अंत में मैं अपने कमरे में पहुँचा। एक रजिस्टर्ड लेटर पैरों में पड़ा मिला... मेरी स्कालरशिप स्वीकार कर ली गई। तीन साल की रिसर्च पर मुझे विदेश जाने का मौका मिला है, जिसका मैं बहुत लंबे समय से इंतज़ार कर रहा था। तभी दरवाज़े पर आहट हुई... मैंने लेटर को फ्रिज के ऊपर रखा और दरवाज़ा खोला.... सामने सिमोन खड़ी थी।
’तुमसे बात पूरी नहीं हुई तो सोचा तुम्हारे घर आ जाती हूँ, इसी बहाने तुम्हारा घर भी देख लूंगी।’
’आईये... अंदर आ जाईये।’
घर में कोई कुर्सी नहीं थी और ना ही कुर्सी जैसी कोई जगह....। कुछ देर सिमोन बैठने की जगह खोजती रही, फिर कुछ हिचकिचाहट के बाद वह पलंग पर बैठ गईं। यह बहुत अजीब था... मैं जब सिमोन के यहाँ जाता हूँ तो जैसा मेरी उपस्थिति में सिमोन अपने घर में व्यवहार करती है.... मैं उसी व्यवहार की नकल, अपने घर में उसके सामने कर रहा था। मैंने अपने आपको घर के छोटे-छिछले कामों में व्यस्त कर लिया था। वह मेरे शेल्फ में रखी किताबें टटोलने लगी। लगभग किताबें उन्हीं ने मुझे दी थी।
‘कुछ दिनों पहले मैं तुम्हारे पिताजी से मिलने उनके घर गई थी।’
यह बात सुनते ही मेरे सारे छोटे-छिछले काम हाथ से छूट गए। मैं सीधे उन्हें देख रहा था और वह मेरी ओर......।
’मुझे पता था तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा... पर मैंने यह अपनी ख़ातिर किया है। शायद बहुत समय बाद मैंने कुछ अपनी ख़ातिर किया है।’
’पिताजी आपके बारे में अच्छी राय नहीं रखते हैं... उन्हें लगता है कि मेरे घर छोड़ने का कारण आप हैं।’
’उनसे मिलने के बाद मुझे भी लगने लगा कि शायद मैं ही हूँ वह कारण।’
’नहीं कतई नहीं... ।’
वह अपने हाथ में रखी किताब के पन्ने पलटने लगी....
’यह बहुत अच्छी किताब है...।’
’यह तीन साल पहले आप ही ने मुझे दी थी.... सॉरी मैं लौटा नहीं पाया...।’
’इतने सालों में मुझे नहीं लगता है कि तुमने कोई भी किताब मुझे लौटाई है।’
’पर मेरी नीयत थी....’
वह कामू के The Outsider के पन्ने पलट रहीं थीं। किसी एक पन्ने पर देर तक रुकी रहीं.... फिर किताब बंद करके वापिस शेल्फ में रख दी। मुझे उनकी दी हुई किताबें पढ़ने में बहुत मज़ा आता था... क्योंकि उनकी किताबों में उनके पढ़े हुए के निशान, नोट्स हर तरफ गुदे हुए होते थे। मुझे लगता है कि मैंने सिमोन को... किताबों में लगे पेंसिल के निशानों में कहीं पहचाना है। व्यक्तिगत तौर पर हमारे संवाद ABSURD रहे हैं।
’तुम्हारे पिताजी ने मुझसे एक अजीब बात कही थी...’
’क्या?’
’उन्होंने कहा था कि तुमने मेरे जवान बेटे को अपने चंगुल में फसा रखा है।’
’आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए था।’
’मैंने उन्हें कहा कि मैं एक शादि-शुदा औरत हूँ। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कहा कि पर रहती तो अकेली ही होना ना।’
’आपको लेकर मेरे और मेरे बाप के बीच कई बार कहा-सुनी हुई है...’
तभी सिमोन पलंग से उठी और मेरी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। मैं कमरे में ही बना रहा। मुझे सिमोन के ऎसे मौन की आदत है जो बीच संवाद में अचानक चले आते हैं। मुझे हमेशा लगता है कि सिमोन, जिन्हें मैं जानता हूँ वह इन मौन में है.... हमारी बातचीत महज़ वह पगड़्ड़ी है जिसपर चलकर वह उस मौन में बार-बार चली जाती है। उनकी दी हुई किताबों में मैं उन हिस्सों को बार-बार पढ़ता हूँ जिन्हें वह पेंसिल से मार्क करके रखती हैं... वह हिस्से बिलकुल इन मौन जैसे हैं... जो अभी मैं महसूस कर रहा हूँ। मैंने कभी सिमोन को नहीं कहा कि मैं उन पेंसिल से गुदे हुए हिस्सों को उस किताब का मौन कहता हूँ।
’अरे देखो... सामने पेड़ पर किंफिशर आई है।’
बालकनी से सिमोन की आवाज़ आई।
’हाँ वह इस वक़्त रोज़ आती है। मैंने उसका नाम भी रखा है।’
’क्या नाम है?’
’शुभचिंतक...’
सिमोन हंस दी... फिर उसने कई बार उस किंगफिशर को शुभचिंतक नाम से पुकारा....। शुभचिंतक कुछ देर में गर्दन इधर-उधर घुमाकर उड़ गया। हम दोनों बालकनी में खड़े शुभचिंतक का काफी देर तक इंतज़ार करते रहे पर वह नहीं आया।
’मैं सोचती हूँ कि मनोज के पास चली जाऊं।’
’मनोज के पास... बेंग्लौर?...’
’हाँ....’
’यूं... आचानक !!’
’हाँ अचानक, मुझे लगा यही ठीक रहेगा।’
’पर आपने तो उसका ख़त फाड़ दिया था, और आप....’
’मुझे जाना चाहिए. और शायद यह सही भी है।’
’आप कबसे सही काम करने लगी... और सही किसके लिए है?’
’तुम्हारे लिए... मेरे लिए... तुम्हारे पिताजी के लिए... मनोज के लिए...।’
मेरे पिताजी ने एक बार तुनक-कर मुझसे कहा था कि ’उस औरत के चक्कर में रहोगे तो बर्बाद हो जाओगे।’ यूं उनकी कही हुई बातें मुझपर ज़्यादा असर नहीं करती थीं... पर पता नहीं इस वाक़्य में किस अजीब तरीके का सम्मोहन था कि मेरी बहुत कोशिशों के बाद भी मैं इस बर्बाद हो जाने वाले हिस्से को भूल नहीं पाया। यह उस दिन के बाद से कुछ ऎसा मेरे शरीर से चिपका कि मैं इसे अलग नहीं कर पाया। मैं बर्बाद होना चाहता था। मैं चाहता था कि मैं सड़कों पर आ जाऊं... भीख़ मांगता हुआ अपने बाप को दिखूं...। मैंने अपना जॉब छोड़ दिया.. घर से बिना पैसे लिए पूरा शहर पैदल छानता रहता... जब सबकुछ बहुत असह हो जाता तो सिमोन के मौन में छुपकर बैठ जाता। सिमोन खाना खिला देती, मैं चुपचाप बिना किसी प्रतिक्रिया के उनका लिखा हुआ सुनता रहता। मेरे लिखे की प्रतिलिपी मैं सिमोन की टेबल पर जाने से पहले रख देता... बहुत समय बाद वह किसी एक कहानी का ज़िक्र करके कहती की वह बहुत अच्छी थी...। मैं घर जाता और उस कहानी को फाड़ देता। जिन कहानियों का ज़िक्र सिमोन ने कभी नहीं किया वह कहानिया अभी भी मेरी मेज़ की दराज़ में दुबकी पड़ी हैं। इसी बीच कहीं सिमोन ने मेरी कुछ कहानियों का एक संकलन छपवा दिया....। ’मौन में बात’ उसका उसने शीर्षक रखा.... हम बहुत समय तक इस बात पर हंसते रहे कि इस शीर्षक के साथ कौन इन कहानियों को पढ़ने की कोशिश करेगा। पर सिमोन का कहना था कि इससे बहतर उसे कुछ भी नहीं सूझा...। मुझे नहीं पता मैं इन कहानियों के छपने से खुश था या नाखुश...। इन कहानियों में कहानी जैसा कुछ भी नहीं था... ’मौन में बात’ सही शीर्षक था... सारी कहानियां अपनी चुप्पी लिए हुए थी...। अधिकतर कहानिया मेरे और मेरे बाप के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती-फिरती थी।

जो रजिस्टर्ड लेटर मैंने फ्रिज पर रखा था वह मैंने उठाकर सिमोन को दे दिया...। सिमोन ने उसे पढ़ा और मुझे गले लगा लिया, मानो मैं नहीं वह बरसों से इस लेटर का इंतज़ार कर रही हो।

किसी एक समय में बहुत सघनता से महसूस किये गए संबंध का स्वाद अचानक फीक़ा पड़ गया। सिमोन के संबंध में ऎसा ही हुआ। अचानक सब-कुछ फीक़ा सा लगने लगा। उस स्पेस में मुझे लगा मेरी ज़रुरत नहीं है। मैंने बहुत अभिनय की कोशिश की कि उस सघनता को मैं वापिस महसूस करने लगूं पर ऎसा हुआ नहीं। मैं सिमोन के साथ रहते हुए अपने आपको बहुत असहज महसूस करने लगा। सिमोन मनोज के पास नहीं गई और मैं अभी भी विदेश जाने के बारे में सोच ही रहा था। अब जो संबंध अपनी पहले जैसी सघनता लिए हुए था वह था मेरे और मेरे बाप के बीच का संबंध...। मैंने जब अपने बाप को वह लेटर दिखाया तो वह खुश नहीं हुए... ना ही कोई दुख उनके माथे पर उभरा। उन्होंने पूरा लेटर बड़ी तल्लीनता के साथ पड़ा... उसे बड़े ऎतियात के साथ वापिस लिफाफे में रखा और मुझे स-सम्मान वापिस लौटा दिया। ना तो मैंने उनसे कोई प्रश्न किया, ना ही उन्होंने कोई भी प्रतिक्रिया दिखाई। कुछ देर में वह उठकर अपने कमरे में चले गए। शायद इतने सालों में पहली बार मुझे उनपर दया आई थी। वह इस बात से खुश थे कि चलों मैंने कुछ करने के लिए कोई कदम तो उठाया... पर वह मेरे तीन सालों के लिए चले जाने पर बहुत उदास थे...। इतने सालों के हमारे शीत युद्ध के कारण मैं अपने बाप को इतना तो जान गया था कि वह कब धीरे से उठकर अपने कमरे में चले जाते हैं।
कुछ देर में मैं किचिन में गया... वह बहुत ही बिखरा पड़ा था, सिंक बर्तनों से भरा पड़ा था... शायद काम वाली बाई आ नहीं रही होगी.. या मेरे बाप ही उनसे लड़ गया होगा। मैंने पूरा किचिन साफ किया... हम दोनों के लिए चाय बनाई... उनकी चाय में शुगर फ्री डाली और उनके कमरे के दरवाज़े पर, दोनों कप लिए खड़ा हो गया। वह अपनी आराम कुर्सी पर बैठे हुए किसी किताब के पन्ने पलट रह थे। मैंने दरवाज़ा खट-खटाया... उन्होंने तुरंत किताब कोने में रख दी... मैंने (कई सालों बाद..) अपने बाप के कमरे में प्रवेश किया....
’अरे मुझे लगा तुम चले गए हो। चलो बाहर ही बैठते हैं...’
तब तक मैं चाय की ट्रे खिड़की के पास रख चुका था...। वह खड़े हुए और वापिस बैठ गए। हम दोनों अपनी-अपनी चाय पर थे। कुछ देर में उन्होंने वह किताब उठाकर मुझे दी जो वह पढ़ रहे थे। ’मौन में बात’ मैंने शीर्षक पढ़ा... सिमोन ने उन्हें यह किताब दी होगी...। किताब के बीच में कहीं बुकमार्क झांक रहा था...। पहली बार मैंने खुद को अपने बाप के सामने नग्न पाया। मैंने किताब किनारे रख दी। हम दोनों खिड़की से बाहर एक बच्ची को देख रहे थे जिसके पैरों में एक बड़ा सा कागज़ चिपक गया था... वह उसे निकालती तो दूसरे पांव पर चिपक जाता... फिर उसने हाथ से भी निकालने की कोशिश की, वह कागज़ पैर से निकलकर उस बच्ची के हाथ में चिपक गया...। उसे देखते हुए पहले मेरे और मेरे बाप के चहरे पर एक मुस्कुराहट सी आई पर बाद में वह मुस्कुराहट झुंझलाहट में बदल गई। वह कागज़ उस लड़की के शरीर से निकल ही नहीं रहा था.. तो गुस्से में आकर उस लड़की ने उस कागज़ को फाडना शुरु किया... कुछ टुकड़े छूट गए पर कुछ दूसरी जगह चिपक गए... वह उन्हें छुड़ाते-छुड़ाते ख़ीज चुकी थी फिर वह खीज रोने में तबदील हो गई। जब उसने रोना शुरु किया तो वह हार चुकी थी... वह रोते हुए अपने घर की ओर चली गई।
’यह बहुत अच्छा चांस तुम्हें मिला... अच्छा होगा कि तुम विदेश चले जाओ।’
मैं चुप-चाप अपने बाप को देखता रहा जो दूर उस बच्ची के चले जाने के बाद की खाली जगह में कुछ ढूंढ रहे थे।

मेरे घर में पंखा अपनी रफतार पर था। मैं निढ़ाल सा अपने बिस्तर पर पसरा पड़ा था। मेरी छाती पर वह लेटर था जिसमें मेरा भविष्य छिपा हुआ था। मैंने करवट बदली तो मेरी निग़ाह उस रोते हुए चहरे पर पड़ी जिसे मिटाना मैं फिर भूल चुका था। मैं जल्दी से उठा, एक कपड़े में हल्का सा साबुन लगाकर लाया और उस चहरे को ऊपर घिसने लगा। कुछ ही देर में वह चहरा गायब हो चुका था। पर वहाँ मेरी झल्लाहट का एक निशान रह गया था.. जो बहुत ही भद्दा लग रहा था।
जब शुरु-शुरु में मैं सिमोन से मिला था तो प्रेम में पड़ चुका था। पैंतिस साल उस वक़्त उन्होंने अपनी उम्र बताई थी। उनका कहानी संग्रह पढ़ने के बाद मैंने उनसे मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी। जीवन को जिस सहजता से अकेले रहकर जीना उन्हें आता है वह शायद मैं कभी भी नहीं हासिल कर पाऊंगा...। मनोज उन दिनों उनके घर कुछ-कुछ दिनों के लिए आया करता था। वह मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था। क्योंकि उन दिनो सिमोन और मैं काफी समय एक साथ बिताया करते थे। किस कदर मैं उनको छू लेना चाहता था...। जब कभी किताब, चाय का प्याला, पेन देते-लेते वक़्त उनकी उंग्लियों छू जाया करती थीं तो मैं किसी दूसरी दुनिया में पहुच जाया करता था... जहाँ मैं अपनी सारी तकलीफ लिए सिमोन के सिरहाने बैठा हुआ होता और वह अपने जीवन के छोटे बड़े किस्से मुझे सुनाती... पीला और लाल रंग चारो तरफ बिखरा होता... हरे रंग के कुछ छीटे दीवारो-चादरों पर दिखाई देते... कहीं से पानी बहने की आवाज़ आती... हम दोनों ही ठंड में ठिठुर रहे होते पर शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं होता... हल्के पीले रंग वह ओढ़े होती और हल्का लाल रंग मेरे शरीर से बाहर कहीं पड़ा होता।
मनोज के उनके जीवन से चले जाने के काफी समय के बाद तक मेरी इच्छा होती रही कि कभी मैं उन्हें अपने मन की बात बताऊंगा... पर हिम्मत नहीं होती। उन्होंने सही पहचाना था... लगभग मेरी किये हुए सारे कामों में उन्हें इंप्रेस कर देना ही मेरा लक्ष्य हुआ करता था। फिर अचानक क्या हुआ कि संबंध एक अलग ही दिशा में चला गया। मैं बस उस अवस्था में बहता रहा... मैं कभी उनके मौन का हिस्सा था और वह कभी-कभी मेरे मौन में टहल के निकल जाता करती थीं। लाल, पीला और हरा रंग धीरे-धीरे धुंधला पड़ चुका था... कुछ कत्थाई और नीले रंग का संबंध अब बचा हुआ था... जिसे मैं बचाए रखना चाहता था।
कुछ देर में मैंने वह लेटर जिसमें मेरा भविष्य पड़ा हुआ था वह फाड़ दिया....। इसकी वजह सिमोन नहीं थी .. इसकी वजह मेरा बाप था... तीन साल, इस उम्र में उनसे तीन साल दूर रहने की मुझमे हिम्मत नहीं थी। कुछ देर में मैंने काग़ज़ और पेन उठाया और एक कहानी लिखने बैठ गया... शीर्षक दिया.... “सिमोन....”।


Friday, April 8, 2011

निर्मल और मैं....


मैं पहले घर से निकलकर दूसरे घर में आया हूँ।
पर दूसरे घर में जाता हूँ तो खुद को पहले घर के कमरों में बैठा पाता हूँ। पहला घर, जहाँ से मैं आया हूँ....पीछा नहीं छोड़ता है। आँखें जल्दी-जल्दी झपकाता हूँ, सिर को एक दो झटके देता हूँ तो दूसरे घर के रंग नज़र आने लगते हैं। कमरे में तीन खिड़कियाँ है... गहरे रंग के पर्दे हैं। सामने चाय पड़ी हुई है जिसे मैं पहले घर में बैठा हुआ पी रहा था। मैं तुरंत कप उठा लेता हूँ। अभी मैं वापिस दूसरे घर में आ चुका हूँ। चाय का स्वाद जाना पहचाना है। चाय शब्द के दिमाग़ में जाते ही शायद मेरी स्वादेन्द्री... अपने चाय के स्वाद के खजाने से कुछ स्वादों को बाहर निकाल लेती है। चाय का एक घूंट लेते ही मुझे किसी एक स्वाद को चुन लेना होता है। मैंने अपने जीवन में इतने किस्मों की चाय पी है कि मुझमें चाय पीने का अंतर खत्म हो गया है। शायद इस चाय का स्वाद अलग हो लेकिन मैं उस स्वाद को कभी पता ही नहीं कर पाऊंगा..। चाय के स्वाद को लेकर मेरी स्वादेन्द्री सिर्फ कुछ ही option मुझे देती है जिसमें से मुझे किसी एक को चुनना पड़ता है.... और मुझे पता लग जाता है कि मैं चाय पी रहा हूँ। ठीक-ठीक स्वाद मुझे कभी पता नहीं चलेगा।
निर्मल मेरे सामने बैठें हैं। मैं इन्हें सालों से जानता हूँ। मेरी उम्र और इनकी उम्र में बहुत अंतर है। जब जीवन में बहुत सी उठापटक हो जाती है, और वह मेरे संभाले नहीं संभलती तो मैं इनके पास चला आता हूँ। इनके घर की बालकनी को मैं अपना confession box कहता हूँ। अधिक्तर मैंनें अपनी सारी ग्लानी, पीड़ा इन्हें वही कह दी है। जब मैं अपनी पूरी बात कह देता हूँ... तो एक लंबे सन्नाटे के बाद निर्मल कहते हैं...’चलो चाय पीते हैं।’ और मैं ठीक महसूस करने लगता हूँ।
आज वातावरण कुछ दूसरा है। हवा उल्टी बह रही है। आज निर्मल का फोन मुझे आया और बड़ी हिचकिचाई-भर्राई आवाज़ में उन्होने कहा... अगर व्यस्त नहीं हो तो आ जाओ। और मैं आ गया।
मैं- जी कहें..?
निर्मल- क्यों चाय ठीक नहीं है क्या?
मैं- अरे! अच्छी है। मैं पूछ रहा था... सब ठीक तो है ना?
निर्मल- हाँ।
मैं- फोन पर आपकी आवाज़ कुछ ठीक नहीं लग रही थी।
निर्मल- हाँ... मैं सोच रहा था कुछ बदल दूं।
मैं- क्या बदलना चाहते हैं?
निर्मल- बदलने की शुरुआत करना चाह रहा था। बहुत समय से सब कुछ वैसा का वैसा ही लग रहा था।
मैं- तो?
निर्मल- तो क्या?
मैं- तो कुछ बदला?
निर्मल- हाँ शुरुआत घर से की...।
मैं- घर से..?
निर्मल- हाँ... तुम्हें कुछ बदला हुआ नहीं लग रहा है?
मैं- मुझे बहुत बदलाव नज़र तो नहीं आ रहा।
निर्मल- तुम बहुत दिनों बाद आए हो इसीलिए... देखों तुम पहले इस तरफ बैठते थे... वह दीवान यहाँ रखा हुआ था। कुर्सीयाँ सारी मैंने भीतर के कमरे में रख दी हैं।
मैं- हाँ यह कमरा काफी खाली लग रहा है। पर कुर्सीयाँ तो ठीक थीं...।
निर्मल- बहुत सी खाली कुर्सीयाँ दिन भर आँखों के सामने पड़े-पड़े खालीपन को बढ़ा देती हैं। ख़ाली कुर्सीयाँ नहीं होगी तो कोई आएगा की प्रतिक्षा भी मर जाएगी।
मैं- आप किसी का इंतज़ार कर रहे थे क्या?
निर्मल- हम सब किसी ना किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं... हमेशा।
मैं- इस बदलाव के बाद कैसा लग रहा है?
निर्मल- बाहरी बदलाव बहुत ज़रुरी है। बाहरी चीज़ों की परछाईयाँ ही भीतर के अंधेरे में काम करती है।
मैं- उस हिसाब से तो यह बहुत छोटा बदलाव है।
निर्मल- शुरुआत कहीं से करना था।
मैं- तो अभी कैसा लग रहा है।
निर्मल- तुम्हारे आने के पहले तक ठीक लग रहा था।
मैं- अरे!.. मैंने क्या किया?
निर्मल- सोचा था इस बदलाव का तुम्हारे ऊपर भी कुछ असर होगा.. पर तुम्हारे सारे सवाल वहीं है... भले ही दीवान यहाँ होता.. या वहाँ.. चाहे कुर्सीयाँ यहाँ होती या भीतर... तुमपर कुछ असर नहीं होता।
मैं- आप तो नाराज़ हो गए!!!
निर्मल- नाराज़ नहीं... अगर कुर्सीयाँ यहाँ होती तो मैं नाराज़ होता.. पर कुर्सीयाँ भीतर है... इस बात की मुझे खुशी है...। अब भीतर जाना भी अच्छा लगता है.. और यहाँ बैठना भी। तुमने चाय ख़त्म कर ली।
मैं- जी।
निर्मल- चलो मेरे भीतर जाने का समय हो गया।

और मैं वहाँ से चला आया। फिर पहले घर की तरफ... जो मेरा अपना है... जिसे में दूसरे घरों में अपने साथ लिये घूमता हूँ। पहले घर की तरफ चलते-चलते ’बदलाव’ शब्द बुरी तरह भीतर हरकत कर रहा था।

निर्मल और मैं....

मैं पहले घर से निकलकर दूसरे घर में आया हूँ।
पर दूसरे घर में जाता हूँ तो खुद को पहले घर के कमरों में बैठा पाता हूँ। पहला घर, जहाँ से मैं आया हूँ....पीछा नहीं छोड़ता है। आँखें जल्दी-जल्दी झपकाता हूँ, सिर को एक दो झटके देता हूँ तो दूसरे घर के रंग नज़र आने लगते हैं। कमरे में तीन खिड़कियाँ है... गहरे रंग के पर्दे हैं। सामने चाय पड़ी हुई है जिसे मैं पहले घर में बैठा हुआ पी रहा था। मैं तुरंत कप उठा लेता हूँ। अभी मैं वापिस दूसरे घर में आ चुका हूँ। चाय का स्वाद जाना पहचाना है। चाय शब्द के दिमाग़ में जाते ही शायद मेरी स्वादेन्द्री... अपने चाय के स्वाद के खजाने से कुछ स्वादों को बाहर निकाल लेती है। चाय का एक घूंट लेते ही मुझे किसी एक स्वाद को चुन लेना होता है। मैंने अपने जीवन में इतने किस्मों की चाय पी है कि मुझमें चाय पीने का अंतर खत्म हो गया है। शायद इस चाय का स्वाद अलग हो लेकिन मैं उस स्वाद को कभी पता ही नहीं कर पाऊंगा..। चाय के स्वाद को लेकर मेरी स्वादेन्द्री सिर्फ कुछ ही option मुझे देती है जिसमें से मुझे किसी एक को चुनना पड़ता है.... और मुझे पता लग जाता है कि मैं चाय पी रहा हूँ। ठीक-ठीक स्वाद मुझे कभी पता नहीं चलेगा।
निर्मल मेरे सामने बैठें हैं। मैं इन्हें सालों से जानता हूँ। मेरी उम्र और इनकी उम्र में बहुत अंतर है। जब जीवन में बहुत सी उठापटक हो जाती है, और वह मेरे संभाले नहीं संभलती तो मैं इनके पास चला आता हूँ। इनके घर की बालकनी को मैं अपना confession box कहता हूँ। अधिक्तर मैंनें अपनी सारी ग्लानी, पीड़ा इन्हें वही कह दी है। जब मैं अपनी पूरी बात कह देता हूँ... तो एक लंबे सन्नाटे के बाद निर्मल कहते हैं...’चलो चाय पीते हैं।’ और मैं ठीक महसूस करने लगता हूँ।
आज वातावरण कुछ दूसरा है। हवा उल्टी बह रही है। आज निर्मल का फोन मुझे आया और बड़ी हिचकिचाई-भर्राई आवाज़ में उन्होने कहा... अगर व्यस्त नहीं हो तो आ जाओ। और मैं आ गया।
मैं- जी कहें..?
निर्मल- क्यों चाय ठीक नहीं है क्या?
मैं- अरे! अच्छी है। मैं पूछ रहा था... सब ठीक तो है ना?
निर्मल- हाँ।
मैं- फोन पर आपकी आवाज़ कुछ ठीक नहीं लग रही थी।
निर्मल- हाँ... मैं सोच रहा था कुछ बदल दूं।
मैं- क्या बदलना चाहते हैं?
निर्मल- बदलने की शुरुआत करना चाह रहा था। बहुत समय से सब कुछ वैसा का वैसा ही लग रहा था।
मैं- तो?
निर्मल- तो क्या?
मैं- तो कुछ बदला?
निर्मल- हाँ शुरुआत घर से की...।
मैं- घर से..?
निर्मल- हाँ... तुम्हें कुछ बदला हुआ नहीं लग रहा है?
मैं- मुझे बहुत बदलाव नज़र तो नहीं आ रहा।
निर्मल- तुम बहुत दिनों बाद आए हो इसीलिए... देखों तुम पहले इस तरफ बैठते थे... वह दीवान यहाँ रखा हुआ था। कुर्सीयाँ सारी मैंने भीतर के कमरे में रख दी हैं।
मैं- हाँ यह कमरा काफी खाली लग रहा है। पर कुर्सीयाँ तो ठीक थीं...।
निर्मल- बहुत सी खाली कुर्सीयाँ दिन भर आँखों के सामने पड़े-पड़े खालीपन को बढ़ा देती हैं। ख़ाली कुर्सीयाँ नहीं होगी तो कोई आएगा की प्रतिक्षा भी मर जाएगी।
मैं- आप किसी का इंतज़ार कर रहे थे क्या?
निर्मल- हम सब किसी ना किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं... हमेशा।
मैं- इस बदलाव के बाद कैसा लग रहा है?
निर्मल- बाहरी बदलाव बहुत ज़रुरी है। बाहरी चीज़ों की परछाईयाँ ही भीतर के अंधेरे में काम करती है।
मैं- उस हिसाब से तो यह बहुत छोटा बदलाव है।
निर्मल- शुरुआत कहीं से करना था।
मैं- तो अभी कैसा लग रहा है।
निर्मल- तुम्हारे आने के पहले तक ठीक लग रहा था।
मैं- अरे!.. मैंने क्या किया?
निर्मल- सोचा था इस बदलाव का तुम्हारे ऊपर भी कुछ असर होगा.. पर तुम्हारे सारे सवाल वहीं है... भले ही दीवान यहाँ होता.. या वहाँ.. चाहे कुर्सीयाँ यहाँ होती या भीतर... तुमपर कुछ असर नहीं होता।
मैं- आप तो नाराज़ हो गए!!!
निर्मल- नाराज़ नहीं... अगर कुर्सीयाँ यहाँ होती तो मैं नाराज़ होता.. पर कुर्सीयाँ भीतर है... इस बात की मुझे खुशी है...। अब भीतर जाना भी अच्छा लगता है.. और यहाँ बैठना भी। तुमने चाय ख़त्म कर ली।
मैं- जी।
निर्मल- चलो मेरे भीतर जाने का समय हो गया।

और मैं वहाँ से चला आया। फिर पहले घर की तरफ... जो मेरा अपना है... जिसे में दूसरे घरों में अपने साथ लिये घूमता हूँ। पहले घर की तरफ चलते-चलते ’बदलाव’ शब्द बुरी तरह भीतर हरकत कर रहा था।

Wednesday, February 23, 2011

ख़त जैसा कुछ...

किससे कहूं अपने डरों और अंधेरे कोनों की बातें.. इसलिए तुम्हारे पास वापिस आया हूँ, बहुत दिनों के बाद। डरों और अंधेरे कोनों में ‘मुझे कुछ भी नहीं आता’ जैसी बातें छिपि है... कुछ समर्पण हैं... और बहुत से confessions....। इन सारी चीज़ों की एक टीस है जो हर कुछ समय में भीतर उठती रहती है।
अपनी बहुत सी बचकानी इच्छाओं को जबसे थोड़ा गंभीरता से देखना शुरु किया है तो लगता है, ग़लती कर दी... यह वह जगह नहीं है, या यह वह समय नहीं है... यहां इन बातों की किसी को ज़रुरत नहीं है, यह एक तरह से रेगिस्तान में नांव खींचने जैसी बात है। फिर कुछ ही पलों में खुद को खपा देने का.. या... खो जाने का भय नहीं.... मन करता है। दिन में बहुत देर तक अपनी बालकनी से आकाश ताकता रहता हूँ... वहीं कहीं कुछ छुपा है यह रात में लेटे-लेटे सोचता हूँ। सपने, डर नहीं रहस्य लिए हुए आते हैं... सुबह उठकर कभी उस रहस्य में कुछ खोज लेता हूँ या कभी कुछ खो देता हूँ। सुबह चाय बनाना सपने के रहस्य का ही हिस्सा लगता है... लगभग पूरी सुबह रात का स्पर्ष लिए हुए होती है। दिन का रंगीन जाल बहुत देर बाद अपना असर दिखाना शुरु करता है। किताबें देर रात की करवटों की तरह दिन में काम करती हैं। एक किताब पर बहुत देर तक रहा नहीं जाता। फिर बहुत करवटों के बाद किस किताब के किस पन्ने पर बहुत सुंदर नींद आ जाती है पता नहीं चलता। थका हूँ.... घिसट-घिसटकर कहीं पहुंच जाऊं कि वह दिखें... और मैं अपना सारा लिखा बहा सकूं.... और मुक्त हो जाऊं.... चुप-शांति की अग्नि के बगल में स्नान कर सकूं देर तक...। सिर घुटा लूं... कि तिलांजली देकर अपने सरल-सहज पद्चिन्हों को फिर से ढूंढ़ सकूं.... उन पर चल सकूं..। अपनी बचकानी इच्छाओं को गंभीरता से ना देखूं... उनसे उन्हीं की भाषा में खेल सकूं.....।
किससे कहूं अपने डरों और अंधेरे कोनों की बातें.. इसलिए तुम्हारे पास वापिस आया हूँ, बहुत दिनों के बाद। डरों और अंधेरे कोनों में ‘मुझे कुछ भी नहीं आता’ जैसी बातें छिपि है... कुछ समर्पण हैं... और बहुत से confessions....। इन सारी चीज़ों की एक टीस है जो हर कुछ समय में भीतर उठती रहती है।
अपनी बहुत सी बचकानी इच्छाओं को जबसे थोड़ा गंभीरता से देखना शुरु किया है तो लगता है, ग़लती कर दी... यह वह जगह नहीं है, या यह वह समय नहीं है... यहां इन बातों की किसी को ज़रुरत नहीं है, यह एक तरह से रेगिस्तान में नांव खींचने जैसी बात है। फिर कुछ ही पलों में खुद को खपा देने का.. या... खो जाने का भय नहीं.... मन करता है। दिन में बहुत देर तक अपनी बालकनी से आकाश ताकता रहता हूँ... वहीं कहीं कुछ छुपा है यह रात में लेटे-लेटे सोचता हूँ। सपने, डर नहीं रहस्य लिए हुए आते हैं... सुबह उठकर कभी उस रहस्य में कुछ खोज लेता हूँ या कभी कुछ खो देता हूँ। सुबह चाय बनाना सपने के रहस्य का ही हिस्सा लगता है... लगभग पूरी सुबह रात का स्पर्ष लिए हुए होती है। दिन का रंगीन जाल बहुत देर बाद अपना असर दिखाना शुरु करता है। किताबें देर रात की करवटों की तरह दिन में काम करती हैं। एक किताब पर बहुत देर तक रहा नहीं जाता। फिर बहुत करवटों के बाद किस किताब के किस पन्ने पर बहुत सुंदर नींद आ जाती है पता नहीं चलता। थका हूँ.... घिसट-घिसटकर कहीं पहुंच जाऊं कि वह दिखें... और मैं अपना सारा लिखा बहा सकूं.... और मुक्त हो जाऊं.... चुप-शांति की अग्नि के बगल में स्नान कर सकूं देर तक...। सिर घुटा लूं... कि तिलांजली देकर अपने सरल-सहज पद्चिन्हों को फिर से ढूंढ़ सकूं.... उन पर चल सकूं..। अपनी बचकानी इच्छाओं को गंभीरता से ना देखूं... उनसे उन्हीं की भाषा में खेल सकूं.....।

Sunday, February 6, 2011

शब्द और उनके चित्र....



मैं तुम्हारा नाम लिखना चाहता था पर मैंने लिखा ’आशा’... फिर तुम्हें ढ़ूढना शुरु किया...। तुम्हारा चित्र ’आशा’ के भीतर ही कहीं था। ’आशा’ मैंने धीरे से कहा..कहा नहीं, अपना लिखा हुआ पढ़ा....’आशा’
दूर कथई रंग के कपड़ो में मुझे तुम आती हुई दिखाई दी...। पास आते-आते उस कथई कपड़े में सूरजमुखी के बड़े-बड़े फूल उग आए थे... कुछ मुर्झाए कुछ खिले हुए। पूरा लेंडस्केप भी पीलापन लिए था। तुम्हारा आना किसी चीज़ का उड़ जाना सा लग रहा था... तुम चल नहीं रही थी.. तुम भाग रही थी। वह उड़ना चाहती है पर ज़मीन में कहीं फंसी हुई है। मैंने फिर एक शब्द कहा..”तितली” और तुम मेरे करीब आ गई।
’कहा गई थी?’ मैंने पूछा
’पानी खोजने।’ तुमने पसीना पोंछते हुए जवाब दिया...
’पानी?’
’हाँ... पानी।’
’तो कहाँ है पानी?’
’मैंने पी लिया।’ तुमने सहजता से कहा और आगे बढ़ गई।
मैं नहीं जानता कि उसे पता है कि नहीं... कि मैं उसका इंतज़ार कर रहा था? मैं पीछे हो लिया। कुछ देर चलने के बाद मैंने फिर एक शब्द कहा..’निर्मल’ और वह रुक गई। मैं भी प्यासा हूँ यह कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। सो मैंने पूछा...
’कहाँ जा रही हो?’
’सामने पहाड़ों की तरफ...’
और मुझे रेगिस्तान का छोर दिखने लगा। रेगिस्तान के छोर से पहाड़ों का विस्तार फैला हुआ था।
’तो पानी ढूढ़ने तुम इस तरफ क्यों नहीं चली आई?’
’यह दिशा अलग है।’
’हाँ पर जब तुम्हें यहाँ आना ही था तो इस तरफ ही चलतीं....।’
’यह दिशा अलग है।’
मैंने दिशा कभी भी नहीं बदली थी। मेरे लिए बस एक दिशा थी जिसमें चलना था... उसी चाल में जो भी आता गया मैं बटोरता रहा। प्यास और पानी की अलग-अलग दिशाएं कैसे हो सकती हैं? क्यों हो? मेरी कभी समझ में नहीं आया। प्यास की दिशा का रेगिस्तान से क्या संबंध है?
तुम चुप मेरे सामने खड़ी थी। तुम शायद पढ़ रही थी मेरा द्वंद...। मैं प्यासा था... मेरा कंठ सूख चुका था... मेरे सवाल नुकीले थे.. मैं चुप रहा। उसकी आँखों में किसी एक शब्द की अपेक्षा थी। प्रश्नवाचक चिन्ह लिए कोई भी शब्द का निकलना असंभव था सो मैंने एक शब्द कहा...’पहाड़’ और हम मुक्तेश्वर के आस-पास कहीं पहुंच गए। वह किसी की तलाश में पहाड़ के पहाड़ चढ़े जा रही थी। मैं पीछे रह गया था। जब मेरे हाफ़ने की आवाज़ पहाड़ों की शांति भंग करने लगी तो वह किसी देवदार के नीचे बैठ गई....। मैं रेंगता हुआ जैसे-तैसे उस तक पहुंचा और पसर गया। वह हंसी। नहीं, यह उसकी हंसी नहीं थी, यह पहाड़ों की हंसी थी... शायद यह देवदार हंस रहा था। मैंने पलटकर उसे देखा... उसके होठों से हंसी गायब थी... पर हंसी मैं अभी भी सुन सकता था। मेरे आश्चर्य पर उसने कहाँ ’पहाड़ो में आवाज़ गूंजती है... आपका कहा.. बार-बार पलटकर आपके पास आता है।’ मैंने देखा उसने क़ाजल लगाया हुआ है... क़ाजल के अंधेरे में हंसी के छोटे-छोटे टुकड़े खेल रहे थे। मैंने फिर एक शब्द कहा....’चंचल’...
तभी उसे कुछ याद आया...। उसने बताया कि यहीं इन्हीं पहाड़ों के आस-पास उसका स्कूल था। स्कूल में एक बार वृक्षा-रोपण का कार्यक्रम हुआ। सभी बच्चों को पेड़ लगाने थे... जब तक उसका मौंका आया सारे पेड़ खत्म हो चुके थे। बहुत देर ख़ोजने के बाद उसे कोने में पड़ा एक देवदार का छोटा पौधा दिखा। वह देवदार को लिए जगह तलाशती रही... जगह कहीं नहीं बची थी। स्कूल के प्रांगण की सारी जगह छोटे-छोटे पेड़ों ने ले ली थी। टीचर ने उसे बताया कि देवदार बहुत धीरे उगता है... पंद्रह-बीस सालों में वह तुम्हारे जितना बड़ा होगा। उसने कहा कि उसे यही बात देवदार की बहुत सुंदर लगती है कि वह अपना पूरा समय लेता है। जब जहग नहीं मिली तो वह देवदार को लिए अपने घर की ओर चल दी। बीच जंगल में पहाड़ों के एक छोर पर उसे एक जगह दिखी... अगल-बगल कोई पेड़ नहीं था। उसने वह देवदार वहाँ लगा दिया।
वह शायद अपना देवदार खोजने आई थी।
उसने कहा...
’मुझे देवदार पिता जैसे लगते हैं... उनके पास बैठकर मैं वापिस बच्ची हो जाती हूँ। कोई भी शिक़ायत मन में नहीं रहती।’
’हाँ तुमने यह बात मुझे बताई थी।’
’कब?’
’जब हम तुम्हारी नीली खिड़की पर बैठे चाय पी रहे थे। उस खिड़की में पीले रंग के पर्दे बार-बार बाहर की तरफ उड़ जाया करते थे।’
’मुझे बिलकुल याद नहीं है।’
वह सच कह रही है.. उसे बिलकुल याद नहीं है। क्योंकि ऎसा हुआ ही नहीं था....हमने कभी उस नीली खिड़की और पीले पर्दों के बीच चाय नहीं पी थी। नीली खिड़की और पीले पर्दों के बीच मैं हमेशा से उसके साथ बैठना चाहता था... लंबे समय तक... निढ़ाल सा। मेरा देवदार नीला था... पीले पत्ते लिए.. जिसके नीचे बैठकर मैं वापिस बच्चा हो सकता था.. बिना किसी भी शिक़ायत के...।
हम दोनॊं अब कुछ भी खोज नहीं रहे थे। जिस देवदार के नीचे हम बैठे थे, उसे उसने उसका और मैंने अपना देवदार मान लिया था। वह वहाँ बैठे हुए सारा कुछ बीता हुआ चुग रही थी। हाँ वह चुग रही थी... हर कुछ समय में वह अपनी चोंच से मेरी पीठ पर वार कर रही थी। मैं उन कच्चे रंगों के बारे में सोच रहा था जिन्हें बटोरना अब मेरा शौक़ था। बने-बनाए पके हुए रंग मुजे बोर करते थे। मैं उससे सटा हुआ बैठा था फिर भी हमारे बीच कुछ जगह खाली थी। उसके चोंच के वार और अपने कच्चे रंगों के बारे में सोचते हुए, उस खाली जगह में मैंने पहली बार ईश्वर को महसूस किया।
’तुम्हारी पीठ में एक छेद है।’
अपनी चोंच से एक ओर वार करते हुए उसने कहा...। ’घोंसले बनाने का संसकार मेरे खून में है।’ मैंने उससे नहीं कहा...। वह अपने अगले वार ले लिए तैयार थी तभी मैंने एक शब्द कहा ’ईश्वर’.....
और हम एक यात्रा पर निकल लिए।
बहुत सारी भीड़ के जनरल कम्पार्टमेंट में हम ट्रेन के दरवाज़े पर खड़े थे। जब भी लोग बाथरुम जाते पिशाब की बदबू का एक भपका वहाँ से पूरी गाड़ी में भर जाता। वह अपना मुँह सिकोड़ लेती, नाक पर रुमाल रख लेती। वह धीरे से मेरे करीब आ गई... कमर से उसने मेरे स्वेटर को पकड़ा हुआ था। मैं बाहर भागते हुए दृश्य को देख लेता। वह शायद खड़े-खड़े थक चुकी थी...
’कितनी दूर है अब?’
’अभी समय है।’
अभी बहुत समय था.... कुछ लोगों ने उसे बैठने की जगह दी पर उसने मना कर दिया। एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी...। हम लगभग हर स्टेशन पर उतर जाते थे। वह स्टेशन पर उतरते ही किसी बेंच पर बैठ जाती। थकान उसके पूरे शरीर से बह रही थी। ट्रेन अपने समय से कुछ ज़्यादा देर तक यहाँ खड़ी रही।
’कौन सा स्टेशन है।’
उसने कुछ विस्मय से पूछा।
’बुधनी लिखा है। तुम कभी यहाँ आई हो?’
’ना, मैंने तो पहली बार यह नाम सुना है।.. तुम...’
’मैने नाम सुना है...। यहाँ जंगल है... शायद सतपुड़ा के जंगल.. जिसपर भवानी भाई ने कविता भी लिखी है।’
’भवानी भाई को तुम जानते हो?’
’वह कवी हैं। मैंने उन्हें पढ़ा है। सो जानता ही हूँ।’
’तुमने ’भाई’ तो उनके आगे ऎसे लगाया जैसे तुम सालों उनके साथ रहे हो...।’
’तुम्हें बुधनी नाम कैसा लगा?’
’कैसा लगेगा? अजीब है।’
’तुम्हें इस नाम में रहस्य नहीं लगता?’
’शायद जंगल के पास है इसीलिए।’
’तुम्हें लगता है कि तुम यहाँ कभी आओगी?’
’पता नहीं, ऎसी बहुत सी जगह है जहाँ शायद मैं कभी भी जा नहीं पाऊंगी...।’
’कुछ देर में ट्रेन चल देगी.. हम बुधनी को बहुत पीछे छोड़ देगें... शायद मैं सोचूगां कि उस रहस्य में कूदा जा सकता था.. हम उस रहस्य में एक साथ कूद सकते थे?’
तभी उसने एक शब्द कहा... ’काश...’
और हम दोनों, बुधनी के... तेंदुपत्ते के जंगल में पैदल भटक लगे। दूर ऊपर पहाड़ पर एक मंदिर दिख रहा था। हम दोनों उस ओर चलने लगे।
’तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला?’
उसने पूछा।
’किस बारे में..?’
मैं चलते-चलते सचेत हो गया।
’नीली खिड़की और पीले पर्दों के बारे में...?’
’अच्छा वो... नीली खिड़की और पीले पर्दे ’काश...’ शब्द के चित्र हैं।’
’उनके बीच मैं भी ’काश...’ थी?’
’नहीं... तुम उनके बीच नहीं थीं।’
’तब मैं कहाँ थी?’
’तुम भीतर कमरे में थीं... और मैं भी वहाँ नहीं था... मैं नीचे सड़क पर खड़े हुए... तीसरे माले की तुम्हारी खिड़की को देख रहा था। जो नीले रंग की थी और उसमें पीले पर्दे उड़ रहे थे.. बाहर की ओर...।’
’यह कब की बात है?’
’यह भविष्य है.. जिसकी मैंने कल्पना की थी।’
’उसमें क्या होता है?’
’वह हमारी आखिरी मुलाकात की कल्पना है.... रुको मैं एक कहानी की तरह सुनाता हूँ.. शुरु से....’
हम दोनों चलते-चलते पहाड़ पर पहुँच चुके थे...। एक छोटा सा मंदिर था जिसे हमने नीचे से देखा था। मंदिर में कोई भी नहीं था...। एक छोटी सी शिव की मूर्ती रखी हुई थी। उसने चुनरी अपने सिर पर ओढ़ी और प्रणाम किया... मैं मंदिर की दीवार से टिक्कर बैठ गया...। कुछ देर में वह भी मेरे बग़ल में आकर बैठ गई।
’हाँ सुनाओ...?’
और तब मैंने एक शब्द कहा... ’पीड़ा’.... और वह पीड़ा सुनने लगी..... मैंने किस्सा शुरु से शुरु किया, मानों मैं किस्सा पढ़ रहा हूँ-कह नहीं रहा.....
बहुत भीड़ भरे बाज़ार से जब भी वह गुज़रता था तो शांत हो जाता था। ऎसे क्षणों में वह हमेशा प्रेम के बारे में सोचा करता था। संबंधों के बारे में... लड़कियों से। ख़ासकर उन लड़कियों के बारे में सोचता था जिन लड़कियों से ’संबंध बचाया जा सकता था’ का दर्द भी अब मिट चुका है। अब सिर्फ धुंधले चहरे बचे है, और बची है झुरझुरी उनके साथ बिताए कुछ खूबसूरत पलों की। इन संबंधों के बारे में सोचकर वह हमेशा मुस्कुरा दिया करता था.. ठीक मुस्कुराहट के बाद एक टीस उठती थी.. पुराने संबंधों में अब सब कुछ इतना धुंधला पड़ चुका था कि वहाँ पर टीस अपने मानी खो चुकी थी...पर यह टीस उन संबंधों की थी जो अभी पूरी तरह बुझे नहीं थे। वह रुक जाता और उसकी चाय पीने की इच्छा करती।
चाय के साथ उसका अजीब संबंध था। जब वह पैदा हुआ था तो बहुत गोरा था। घर में सबको लगा कि यह बहुत विशेष चीज़ हमारे घर आई है। सो उस विशेष चीज़, याने उसका बहुत ख़्याल रखा जाता। चाय पीने की आदत उसे बचपन से ही थी... उसकी वजह थी चाय का ना मिलना। उसका बाप चाय का शौक़ीन आदमी था। कई दिनों रोने गिड़्गिडाने के बाद बाप ने उसके लिए हर रोज़ चार बजे एक कप चाय मुक्कर्र कर दी। सुबह उठते ही वह चार बजे का इंतज़ार करना शुरु कर देता। ठीक चार बजे उसे चाय मिलती। चाय की आखिरी चुस्की लेते ही वह अगले दिन की चाय इंतज़ार शुरु कर देता।
वह चाय की टपरी में जाकर बैठ गया।
’एक कट चाय देना।’
उसे यह पूरा रिचुअल बहुत पसंद था, चाय की फर्माइश करने के बाद से चाय का उसके सामने आ जाने तक का। यह प्रक्रिया उसे चाय पीने से भी ज़्यादा पसंद थी।
’किसी का आपको प्रेम करना...’ being loved कितनी सुंदर अवस्था होती है। चाहे वह कुछ क्षणों के लिये ही क्यों ना हो। वह ऎसे समय मूर्छित सा पड़ा रहता... अपनी पीड़ाओं के बारे में सोचता हुआ सा। उन क्षणों में वह गिड़गिड़ाना चाहता कि मैं कभी भी विशेष नहीं था।
भीड़ एक अजीब सा चित्र ख़ीचती है जिसमें वह खुद को इस तरह से सहज महसूस करता था मानों वीराने में टहल रहा हो। तभी उसे उसका ख़्याल हो आया जिसके साथ उसने बहुत से वीराने जीये थे। यह वह लड़की थी जिसके साथ ’संबंध बचाया जा सकता है’ की गरमाहट अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई थी।
वह चाय की दुकान से घर की ओर चलने लगा। कुछ ही दूरी पर उसने अपना घर का रास्ता छोड़ दिया और दाए मुड गया। दाए मुड़ जाना उसे बहुत देर से भीतर छील रहा था...। चाय की दुकान में भी दाए मुड़ जाने के ख्याल- उबाल मार रहे थे। दाए क्या है? दाए कुछ बचा नहीं है, बस हल्की गरमाहट थी ओर कुछ भी नहीं... घाव भी अब भर चुके हैं... पर उस सूखे से खुरदुरे में हल्की खुजली हमेशा बनी रहती है। बहुत दिनों से उसने उस घाव को खुजलाया नहीं था... आज वह खुजलाने दांए मुड़ गया।
कुछ दूर चलने पर उस लड़की का घर आ गया। वह तीसरी मंज़िल पर रहती थी। हरी खिड़की पर पीले पर्दे, बाहर सूखा गमला। वह घर को बहुत सुंदर रखती थी, फिर यह गमला कैसे सूख गया? वह बिल्डिंग के भीतर घुसा पर सीड़ियों पर रुक गया.... उसके पास उसके घर जाने का कोई कारण नहीं था। बहुत देर की खोज के बाद वह सीड़ी चढ़ने लगा। इससे पहले कि उसके विचार उसे वापिस जाने के लिए मजबूर कर दें उसने जल्दी-जल्दी सीड़ियां चढ़कर घंटी बजा दी। दरवाज़ा उसकी बाई ने खोला। बाई शायद खाना बना रही थी, उसके हाथ में कड़ची थी।
’रुको मैं बेबी को पूछती हूँ?’
पहले बाई उसका स्वागत कर देती थी पर अब उसे बाहर ही इंतज़ार करना होगा। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था और वह बाहर खड़ा था। उसने सोचा कि जूते उतार दूं पर उसे यक़ीन नहीं था कि वह क्या कहेगी। वह फिर कारणों को टटोलने लगा। बहुत देर तक ना तो बाई दिखी न वह बाहर आई। वह दरवाज़े से टिककर खड़ा हो गया जिससे दरवाज़ा थोड़ा ज़्यादा खुल गया... पर कहीं अटक गया... शायद दरवाज़े के पीछे बहुत से जूते-चप्पल रखे होगें।
तभी वह बाहर आई।
उसने बालों को पेंसिल से फसा रखा था, सफेद आदमीयों की बुशर्ट पहने हुए थी। नीचे पेजामा जैसा कुछ था लाल रंग का। शर्ट बहुत ही बेतरतीबी से जल्दबाज़ी में पहनी हुई लग रही थी। पैरों में अंगूठी नुमा बिछिये पहने हुए थे। एक पैर में दो और दूसरे पैर में एक, और वह एक पैर को दूसरे के ऊपर चढ़ाए हुए खड़ी थी। दाहिने हाथ को पीछे रखे हुए थी जिससे शायद वह अपने पीछे की दीवार पकड़े हुए थी।
वह उसे चूमना चाहता था। उसे इस बेपरवाही-बेतरतीबी से प्रेम था। शायद दाए मुड़ जाने का बड़ा कारण यही था।
’क्यों आए हो?’
इसका कोई जवाब नहीं था उसके पास...। कारणों की फेहरिस्त इस बेपरवाही के सामने बचकानी थी। वह चुप ही रहा।
’क्यों आए हो?’
‘तुम्हारे साथ एक चाय पीने की इच्छा थी।’
बेपरवाही के अभिनय में उसने जवाब दिया।
’मेरी इच्छा नहीं है.....’
कुछ खामोशी के बाद उसने आगे जोड़ा...
’”तुम्हारे” साथ चाय पीने की...’
वह दो टूक बात करके चुप हो गई। अब इसकी बारी थी जो बारी से हमेशा बचता रहा था। ऎसा नहीं था कि ’बारी’ से बचना उसने बड़े होने पर सीख़ा था। ज़िम्मेदारीयों से बचना वह बचपन से जानता था। लुका-छिपी के खेल में वह कभी अकेले जगह ढ़ूढ़कर नहीं छुपता था वह किसी अच्छे छुपने वाले के पीछे छुप जाता था जिससे कभी वह अच्छा छुपने वाला लड़का पकड़ा भी जाए तो पहले वह पकड़ाए। दाम उसपर न आए। वह बच जाए। उसे बचना पता था। वह अभी तक बचता आया था। बचपन के खेल महज़ खेल नहीं होते हैं... आपकी बचपन के खेलों में भागीदारी, जीवन में आपकी भागीदारी तय करती है।
’अगर कुछ कहने को नहीं है तो तुम जा सकते हो।’
आखिर लड़की ने ही शांति भंग की।
’मैं कुछ कहने ही आया था...’
पर वह कुछ भी कहने नहीं आया था।
‘तो बोलो?’
कुछ शांति के बाद उसे पता नहीं क्या हुआ और उसके मुँह से निकल गया।
’मैं जो हूँ उसकी भूमिका बचपन में हैं.... जो मैंने नहीं लिखी..। वह जैसी मुझे मिली मैंने उसे उसकी पूरी इंमानदारी से जीता गया।’
एक बोझ की तरह उसने इस वाक्य को अपने भीतर से जाने दिया। पर यह किसी अपने की मृत्यु की बात नहीं थी... जिसे कह देने से आप हल्का महसूस करें...। शायद यह वासना थी जो वह उस लड़की के प्रति अभी महसूस कर रहा था जिसकी वजह से वह यह कह पाया।
’बहुत देर हो चुकी है तुम्हें यह सब कहने की अब कोई ज़रुरत नहीं है...।’
उसके पास और कुछ भी कहने को नहीं था। उसने कुछ देर बातचीत के सिरे को हवा में पकड़ने की कोशिश की... पर वह इतनी ठंड़ी-सीधी बातों पर थी कि वह एक सिरे से दूसरे सिरे को मिलाने में छिछलापन महसूस करने लगा। उस लड़की का कुछ बोलने का इरादा नहीं दिख रहा था। यह आखिरी वाक्य कह चुका था, जिस वाक्य के कारण वह खुद आश्चर्य में था, इसके बाद कुछ भी कहने की गुंजाईश नहीं थी। वह पलट गया और सीड़ियाँ उतरने लगा... दूसरे मंज़िल की सीड़ियों पर पहुचते ही उसे दरवाज़ा बंद करने की आवाज़ आई। ठीक इस वक़्त से उसे वह पीड़ा भीतर महसूस होने लगी जिसके लिए वह तीन मंज़िल सीड़ी चढ़ा था। किसी के हमेशा के लिए छूट जाने की पीड़ा… अब संबंध को ना बचाए जा सकने की पीड़ा… बहुत तेज़ी से भीतर रिस रही थी।
वह तेज़ कदमों से चलता हुआ उस बिल्डिंग के बाहर निकला… गली के कोने पर, मुड़ने से ठीक पहले उसने पलटकर देखा... वह अपनी खिड़की पर नहीं खड़ी थी। हरी खिड़की से पीला पर्दा बाहर की ओर उड़ रहा था… नीचे सूखा हुआ गमला उसे बहुत सुंदर जान पड़ा और वह मुड़ गया।
ज़िदा हूँ -के प्रमाण की तरह वह पीड़ा थी... यह नशा था... नशे की पुनर्रावृत्ति जीवित हूँ के रहस्यों का ताना-बाना बुनती है। जिसमें कुछ भी ठोस टिकता नहीं है। उस ताने-बाने में अकेलेपन का एक जाल बिछा होता है... पीड़ा के छोटे-छोटे कीड़ों को अपने में फसाए हुए। अकेलेपन का जाल पिंजरे की तरह काम करता था, जिसमें पीड़ा के कीड़े पल रहे होते हैं।
उसे मकड़ीयों से बहुत डर लगता था। अपने कमरे में घुसने के पहले उसकी सारी सतर्कता मड़की से बचने का भय होती। अगर मकड़ी दिख जाती तो चीख़ता हुआ अपनी बहन के पास जाता...। बहन झाड़ू से मकड़ी को मार देती। उसकी बहन उस मकड़ी की लाश उसे दिखाती तब जाकर वह अपने कमरे में प्रवेश करता।
इस बार उसने मकड़ी के बारे में नहीं सोचा। उसने एक मार्कर पेन निकाला और सफेद फ्रिज के ऊपर लिख दिया....
“मैं जो हूँ उसकी भूमिका बचपन में हैं.... जो मैंने नहीं लिखी..।“

’बस... बस... ’
उसने मुझे चुप करा दिया.... वह खड़ी हो गई...। मैं वहीं बैठा रहा, मंदिर के पास... वह बुधनी के तेंदुपत्ते के जंगलों में कुछ देर अकेली टहलने लगी। मैं उसे यहाँ से देख सकता था। कथई रंग, पेड़ों के बीच कभी छुपता कभी दिख जाता... सुरजमुखी के लगभग सारे फूल यहाँ से मुर्झाए हुए लग रहे थे। मैं उससे प्रेम करता था.. इतना कि उसे छोड़ना चाहता था। उससे दूर रहकर उससे प्रेम की आंच अपने भीतर महसूस करना चाहता था। अभी सब कुछ बाहर था.. वह बाहर थी, मेरा प्रेम सूरजमुखी के फूल की तरह कभी मुर्झाया तो कभी खिला हुआ उससे चिपका दिखता था। मैं इन सबको अपने भीतर कहीं, नाभी के पास, बो देना चाहता था।
कुछ देर में वह वापिस आई... मेरे सामने खड़े होकर उसने एक शब्द कहा... ’वापसी...’
वह अपनी बालकनी में खड़ी थी। शाम का समय बगुलों के वापिस आने का समय होता था। सामने के पेड़ पर बगुलों का घर था। यह समय, शाम होने के ठीक पहले का समय था जो नीरस समय था... उसे पता था सामने दिखने वाला पेड़ कुछ ही देर में सफेद बल्ब जैसे बगुलों से भर जाएगा। यह शायद उसका समय था। समय के इस हिस्से का वह उत्सव मनाती थी जिसमें किसी दूसरे की शिरकत की गुंजाईश नहीं थी। तभी दरवाज़े की घंटी बजी और मैं अपनी पूरी थकान के साथ उसके सामने खड़ा था। उसने मुझे अंदर आने को नहीं कहा, ना ही उसने दरवाज़ा बंद किया। वह मुझे देखते ही पलट गई मानों मुझे जानती ही ना हो, या इतना ज़्यादा जानती हो कि अब कुछ भी फर्क नहीं पड़ता।
उसके और मेरे बीच एक पूरी व्यवस्था थी। हम दोनों ने संबंध के शुरुआती दौर में कुछ अलिखित नियम से बनाए थे। उन नियमों की वजह से, संबंध में रहते हुए भी, हमारी व्यक्तिगत जगह में हम अकेले थे। इस अकेलेपन की वजह के दो टापू उग आए थे... हम दोनों का ज़्यादतर समय अपने-अपने बनाए हुए टापूओं पर ही गुज़रता था। अब संबंध को सिर्फ दूर से ही देखा जा सकता था।
वह बालकनी पर खड़ी थी, अपने टापू पर...। मैं पीछे, तैरता हुआ उसके टापू पर पहुंचना चाह रहा था जो हमारे बनाए नियमों के बिलकुल खिलाफ था।
’तुम खाना खा लो भीतर रखा है तुम्हारे लिए।’
उसने बिना मेरी तरफ देखे यह बात कहीं...। मैं वापिस अपने टापू पर आ चुका था, मेरा सारा तैरना व्यर्थ गया। मैं फिर पानी में कूदा....
’नहीं मुझे भूख नहीं है।“
कहकर मैं भी बालकनी में उसके बगल में आकर खड़ा हो गया। नहीं यह उसका टापू नहीं था। मैं उससे बहुत दूर था। मुझे लगा मैं तैरते-तैरते उससे दूर ही जाता जा रहा हूँ। वह अपनी शांति में बगुले गिन रही थी। लगभग पेड़ बगुलों से भर चुका था। तभी मेरी निग़ाह नीचे सड़क पर पड़ी और मैंने खुद को सड़क पर खड़ा पाया...। मैं सड़क पर खड़े हुए उसकी तरफ बालकनी में देख रहा था। मैं तुरंत भीतर कमरे में आ गया।
कुछ देर में वह भीतर आई... और उसने मेरे पास आकर एक शब्द कहा.... ’अंत...।’
और मुझे इस कहानी की शुरुआत दिखाई देने लगी।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

मानव

मानव

परिचय

My photo
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल