Friday, May 4, 2012
त्रासदी... (भाग-एक)
(कहानी शायद पांच भागो में है... सो भाग-एक यह रहा.....)
बीमार...
सुबह पांच बज रहा होगा। वह बिना आवाज़ किये तीसरी बार बाथरुम जा रहा था। बाथरुम का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं होता था.... दरवाज़े और चौखट की लकड़ी आपस में अटक जाती थी। मौसी ने कहा था कि दरवाज़े में चिटकनी लगाने की ज़रुरत नहीं है बस उड़का दे...। बिना चटकनी लगाए कोई कैसे पैखाना जा सकता है...। तीनों बार उसने ज़ोर लगाकर चटखनी लगा दी। पिछले पचास सालों की आदत का वह क्या कर सकता था...? बिना चटकनी लगाए वह कभी हगा नहीं था.... यूं भी घर में उसके और मौसी के अलावा कोई नहीं था... पर दरवाज़ा तो था... और उसका पूरी तरह बंद होना एक सुरक्षा प्रदान करता है... जब तक वह सुरक्षित महसूस नहीं कर लेता उसका पेट साफ होना असंभव था। तीसरी बार दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था... उसने बहुत ज़ोर लगाया पर वह अटका रहा... सोचा मौसी को आवाज़ लगा दे... उसका अनुमान था कि मौसी दरवाज़े की पहली ही आवाज़ में जाग गई थीं... पर यह महज़ अनुमान ही था। वह रुक गया..। बाथरुम में कपड़े और नहाने का साबुन साथ रखा था.. एक के ऊपर एक। कुछ भीगे हुए कपड़े एक छोटी हरे रंग की बाल्टी में रखे हुए थे। आईना अपने कोनों में ज़ंग खाकर खत्म हो चुका था...पर ठीक बी़च में वह अपना चहरा देख सकता था... उसने अपनी उंग्लियों से आईने के कोनों को छुआ.... खुरदुरे... मटमैले... कत्थई कोने। आईने को अपनी हद कैसे पता है? कैसे उसे पता है कि इस सीमा के बाद चहरा शुरु होता है..? उसने अपने चहरे को ध्यान से देखा... शायद साफ आईना होता तो वह यह ना करता... झुर्रियां...अपने चहरे की झुर्रियां.. आँखों के कोने... माथे की तरफ... पचास साल के गहरे होते निशान।
उसने कुछ और कोशिश की... पर दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था। हारकर उसने आवाज़ लगाई...’मौसी... मौसी...’ उस तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई..। शरीर में कमज़ोरी इतनी आ गई थी कि दो आवाज़ में ही पेट गुडगुडाने लगा... उसने दरवाज़े को फिर धक्का मारा और चिटकनी लगा दी...। पर इस बार पहले उल्टी हुई... रात का, सुबह का पिया हुआ सारा पानी बाहर निकल आया... सिर्फ पानी। तभी मौसी ने दरवाज़ा खटखटाया...
’इंदर... इंदर तूने ठीक है...?’
’मौसी दो मिनट...’
’अरे चिटकनी लगाने को मना किया था... इंदर... इंदर...।’
इंदर ने चिटकनी खोली...। मौसी बाहर से ऎसे धक्का दे रही थीं मानो दरवाज़ा तोड़ रही हो...। दरवाज़ा खुलते ही इंदर लड़खड़ा गया...। हाथ फिसलकर छोटी हरी बाल्टी में चला गया...। मौसी ने भीतर आकर उसे सहारा दिया...। खड़े होते ही वह थक गया... मानो कई हज़ार सीढ़ियां चढ़ा हो....। वाशबेसिन का सहारा लेकर वह खड़ा हो गया..। मौसी उसके बगल में उसे सहारा दिए खड़ी थीं...।
’क्या हुआ इंदर...?’
तभी इंदर के दिमाग़ में आया मौसी यह सामने ज़ंग खाया आईना कैसे देखती होंगी...? उन्हें अपना चहरा देखने के लिए किसी चीज़ पर चढ़ना पड़ता होगा... किस चीज़ पर? वह अचानक पूरे बाथरुम में वह चीज़ तलाशने लगा..
’क्या हुआ इंदर कुछ गिर गया क्या?... अरे तेरा तो पूरा शरीर तप रहा है....। तू चल अभी.. अस्पताल चलते हैं... चल...।’
मौसा जी की मृत्यु छह महीने पहले ह्रिदय गति रुक जाने की वजह से हुई थी। वह तब महज़ दो दिनों के लिए आ पाया था। जल्द आने को कह गया था... पर जल्द नहीं आ पाया....। ऑफिस... काम... संबंध... व्यस्तता.. आलस... बोरियत... कमीनापन... और खुद के साथ रहने की थकान... यह सारे कारण मिलाकर भी पूरा कारण नहीं बनता जिसे वह मौसी को कह सके? मौसी ने भी एक बार ही पूछा... वह खिसिया दिया.. मौसी ने बात बदल दी..। वह नहीं आना चाहता था... वह अभी भी नहीं आना चाहता था... वह कुछ नहीं जैसी निर्थकता में कहीं चरता रहना चाहता था...। ऎसी निर्थकता में आदतन सब कुछ हो रहा होता है... वह आदतन जी रहा था... इस आदत में कहीं हज़ारों लोग अचानक मर जाएं... या घर में चूहा आकर नई शर्ट कुतर डाले... दोनों ही पीड़ा का एक छोटा बुलबुला बनाते और वह बुलबुला दृश्य होते-होते फूट पड़ता..। बुलबुले के भीतर से जो दुनिया थोड़ी सी विकृत दिखने लगी थी... कुछ ही देर में सामान्य हो जाती... फिर सब कुछ वैसा का वैसा होने लगता...। मानों कोई देखी-दिखाई फिल्म चल रही हो... जिसके सारे दृश्य पता हो... सारे आश्चर्य अभिनय हों... सब कुछ जिया जा चुका हो... फिर भी रोज़ भूख लगती हो.... और रोज़ वही, एक ही जैसे स्वाद की स्मृति उसे खाने और हगने के चक्र के बीच में खड़ा कर देती हो।
वह मौसी के साथ अस्पताल की और चल दिया..। दो गलि छोड़कर एक प्रायवेट अस्पताल था...। कुछ दूर चलते हुए वह रुक गया...। मौसी के हाथ में पानी की बोतल थी..
’पानी पी ले...’
उसने मना किया और धीरे-धीरे चलने लगा..। पौ फटी थी... चौक पर अख़बार वालों की हलचल थी..। बहुत सी साईकिलों के बीच अख़बार वाले अपने-अपने अख़बार छांट रहे थे... ताज़ा खबरें.. सुर्खियां.. सब ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं..। ट्न..ट्न..ट्न.. की आवाज़ से उसकी निग़ाह पीछे चाय की दुकान पर चली गई... ऎसी सुबहों में उसे चाय पीना बहुत पसंद था... पर अभी चाय की कल्पना भी उसे बाथरुम याद दिला रही थी... उसने वहां से निगाह हटा ली..। उसके सामने एक काले रंग का कुत्ता चला आया... वह उसके साथ-साथ चलने लगा.. उसे कुत्ते बहुत पसंद नहीं थे... उसे ख़ीज होने लगी...। मौसी ने एक पत्थर उठा लिया... कुत्ता दुम नीची करके एक किनारे हो गया... पर कुछ दूरी बनाए वह पीछे-पीछे चला आ रहा था।
’शेखर अस्पताल’ उस बिल्डिंग में कई जगह लिखा था..। सामने लोहे का शटर था.. जो बंद दिख रहा था.. पर कोई ताला नहीं था। भीतर वीराना था.. सिर्फ एक ट्युबलाईट की रोशनी रिसेप्शन से चारों और फैली थी.. पर डेस्क पर कोई नहीं बैठा था। मौसी ने पानी की बोतल को इंदर के हाथों में पकड़ा दिया और खुद ज़ोर लगाकर शटर खोलने की कोशिश की.. पर वह कहीं अटक रहा था। फिर उन्होंने हारकर आवाज़ लगाई..। एक आदमी हाथ में बड़ी सी झाडू लिए चला आया... उसने एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया..। जैसे ही इंदर ने अंदर प्रवेश किया... वही अस्पताल की बू,, उसके पूरे जिस्म में फैल गई..। दवाईया.. पसीने... खून.. पिशाब.. मृत.. ज़िदा.. बीमार बू...। कोमा में अपनी बहन के साथ बिताया समय.. हेपेटाईटिस-बी से लड़ते हुए पिताजी के अंतिम कुछ साल... अपनी पत्नि की टी.बी.... पीलिया की दौड़धूप... बहुत से दोस्तों के मौसी-बाप.. खून देना.. लाश उठाना.. पोस्टमार्टम.. बू.. बू.. बू...।
कमरा नंबर एक सौ चार... लिफ्ट काम नहीं कर रही थी.. उसे पहले माले पर सीढ़ी से ही जाना था। वह धीरे-धीरे सीढ़ी चढ़ने लगा..। मौसी उसकी बीमारी के पहले सुस्त थी अब वह बहुत फुर्ती में आ गई थीं... उन्हें एक काम मिल गया था... कुछ लोग होते हैं जिन्हें लोगों की चिंता करने में सुख मिलता है...। मौसी सीढ़ी चढ़ने में भी इंदर की मदद करना चाहती थीं... अपनी पूरी चिंता से... वह कभी इंदर के आगे चलती कभी उसके बगल में चलते हुई उसका हाथ पकड़ लेतीं तो कभी पीछे-पीछे चलने लगतीं..। इंदर रुक गया.. ठीक वैसे ही जैसे वह सुबह कुत्ते के सामने रुका था... उसने मौसी को आगे जाने का इशारा। मौसी जल्दी-जल्दी सीड़ी चढ़ गईं..। वह कमरा नम्बर एक सौ चार के सामने रुकी थीं....। भीतर एक औरत बिस्तर की चद्दर बदल रही थी। वह लेटना चाहता था... उसके पैर जवाब दे रहे थे.. पेट में रह-रह कर मरोड़े उठ रही थीं। उसके कमरे के ठीक सामने कमरा नम्बर एक सौ तीन था... जिसका दरवाज़ा हल्का खुला हुआ था..। बिस्तर पर कोई लेटा था और उसके हाथ आकाश की तरफ उठे हुए थे। उसने थोड़ा ध्यान से देखा वह किसी लड़की के हाथ थे.. पतले... एक हाथ में घड़ी थी.. वह अपनी उंगलियों से हवा में कुछ बना रही थी... या किसी का नाम लिख रही थी... उसकी बहुत इच्छा हुई उसका चहरा देखने की... पर दरवाज़ा बहुत कम खुला हुआ था.. वह हल्का दाईं ओर झुका.. पर उस लड़की की ठुड्डी ही दिखाई दी बस... तभी उसने आकाश में कुछ बनाना रोक दिया... मानों उसे मेरी आँखों की चुभन महसूस हुई हो... उसने झटके से अपना सिर उठाया और सीधा उसकी और देखने लगी...। वह चौंक गया.. पकड़ा गया... ’वह मेरी मौसी को बता देगी...’ वाला गिल्ट उसके भीतर मरोड़ की तरह उठा.. वह सीधा कमरा नम्बर एक सौ चार में घुसा और खुद को बाथरुम में बंद कर लिया।
अस्पताल... इसका एक केरेक्टर होता है..। सरकारी अस्पताल अपनी पूरी गंदगी में आपके चहरे पर होते हैं... और प्रायवेट अस्पताल, अस्पताल जैसा ना दिखने की ज़िद्द, आपको डरा देती है। इंदर समर्पण कर चुका था..। उसने अपना बटुआ मौसी को दे दिया था.. जब वह आँखें खोलता मौसी लोगों में उसे पैसे बाटती हुई दिखतीं...। कई बाटल ड्रिप और कई बार हगने के बाद... उसके सामने अंग्रेज़ी से संघर्ष करता हुआ एक डाक्टर आया.. उस डाक्टर के अगल बगल में बहुत से उसके चम्चे जैसे असिस्टेंट थे...। डाक्टर बिल्कुल डाक्टर के जैसा दिख रहा था... जैसे हमारे देश में जो चीज़ जैसी है बिल्कुल वैसी ही दिखती है...। उस डाक्टर की पतली सी काली मूछें... साफ चमकदार शर्ट.. अभी-अभी काले किये हुए बाल.. हल्की तोंद... कस कर बांधा हुआ ढ़ीला पेंट... काले चमकदार जूते.. और शरीर से आती हुई... अमृत जैसी खुशबू...।
’हाउ आर यू फीलिंग सर...?’
डॉक्टर ने बहुत करीब आकर पूछा...। इंदर कुछ कहने को हुआ उसके पहले ही डॉक्टर ने अपने असिस्टेंट से ’खुसुर-पुसुर’ जैसी ध्वनी में तीन बातें कहीं और तेज़ कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ तीन की तरफ निकल गया।
कितना सस्ता है सब कुछ... इंदर ने सोचा... मेरा अब तक का जिया हुआ। एक क्षण में यह खुशबूदार आदमी कह सकता है कि अब बहुत मुश्किल है... और सब कुछ झड़ जाएगा... मेरा सारा बिखरा हुआ.. बटा पड़ा इंदर.. एक थड़ की आवाज़ के साथ खत्म हो जाएगा..। शायद कोई आवाज़ भी ना हो... ठीक उस क्षण से मैं अतीत की किसी गुफा में ज़बर्दस्ति घुसेड़ा जाऊंगा... जहां मौसा जी गायब हुए हैं... वहां शायद मुझे वह मिलेंगे.. क्या मैं वहां भी उनसे वही व्यस्तता का अभिनय करुंगा..। अपना सस्ता.. सुस्त.. घटिया अभिनय...। मौसा जी पिछले कुछ सालों में बहुत चुप रहते थे.. मौसी चुप्पी से ठीक उलट थीं... वह महिलाओं के साथ गप्पबाज़ी में अपना मनोरंजन ढ़ूढ़ने लगी थीं...। मौसाजी के ख़त मुझे हर कुछ समय में मिल जाते थे... कुछ अधूरे पढ़े और कुछ अभी तक नहीं खोले हैं।
वह सो चुका था..। डॉक्टर के जाते ही उसकी गहरी नींद लग गई थी। मौसा जी सपने में आए थे.. वह बहुत सुस्त लग रहे थे.. वह अपने सारे ख़तों को लेकर उसके पास आए थे... वह व्यस्त है वह कहता रहा पर वह इंतज़ार कर रहे थे..। वह अपने ऑफिस की खिड़की से देखता.. वह बिल्डिंग के नीचे खड़े उसकी राह तक रहे हैं.। इंदर हड़बड़ाकर उठ गया.. उसने उठते ही दो तीन बार अपनी आँखें घिंसी.... क्या हुआ? कितना बजा है? देखा बग़ल के तख़त नुमा पलंग पर मौसी नहीं है.. उस छोटी सी गुफा रुपी कमरे में कोई भी नहीं था..। उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी.. उसे लगा कि यह अतीत की गुफा है, अतीत का कमरा... जिसमें उसे ज़बर्दस्ती ढ़ूंसा जा रहा है... उसने चिल्लाया...।
’नर्स.. नर्स... सिस्टर.. सिस्टर...’
एक वृद्ध महिला आई जिसकी आवाज़ में मौसी सा अधिकार था...
’क्या है?.. आराम करो.. अभी बहुत ड्रिप लगने हैं...।’
’बाथरुम...’
बस एक यह ही शब्द काम करता था। नर्स ने थोड़ा मुंह बनाया.. उसके हाथ से सिरिंज निकाली... उस सिरिंज को वापिस बोतल में ठूंसा. और एक छोटा सा ढ़क्कन उस सिरिंज की जगह लगा दिया।
’जाओ.. हो जाए तो आवाज़ लगा देना...।’
’जी....।’
सिस्टर/नर्स तेज़ कदम ताल करती हुई निकल गई। उसे बाथरुम नहीं जाना था.. वह किसी एक इंसान से बात करना चाहता था। इस दुनिया के इंसान से... वह सपने में था जो बहुत ही असल सा था..। वह बहुत कमज़ोरी महसूस कर रहा था...। पीठ में टी शर्ट चिपकी हुई थी... पसीने से... उसने सोचा फ़ेन चालू कर दूं... तभी उसकी निग़ाह कमरा नम्बर एक सौ तीन के दरवाज़े पर गई... वह दरवाज़ा पिछली बार से कुछ ज़्यादा खुला हुआ था। वहां कोई है... कोई ऎसा जो इसका इंतज़ार कर रहा है... जो इसे जानता है.. शायद मौसा जी हों अपने ख़त लेकर.. नहीं.. पर उसने वहां एक एक लड़की का हाथ देखा था... वह अपने कमरे, एक सौ चार, की चौख़ट तक आया...। उस कोरिड़ोर के अंतिम छोर पर कुछ लोग खड़े थे.. सारे एक जैसे कपड़े पहने.. यह इसी अस्पताल का स्टाफ था। वह धीमे कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ तीन के पास पहुंच गया। उसने खुले हुए दरवाज़े से झांककर देखा तो उसे वह लड़की दिखी.. वह सो रही थी... उसने पूरे कमरे में देखा तो उसके बहुत से कपड़े दिखे.. पर बगल वाले पलंग पर कोई नहीं था। नीचे चप्पल रखी हुई थी... उसे चप्पले बहुत छोटी लगीं.. लगा किसी बच्चे की हैं... उसकी इच्छा हुई कि वह उसके पैर देखे.. क्या इन्हीं पैरों की यह चप्पल है?
’पानी.. दे दीजिए।’
वह आवाज़ सुनकर चौंक पड़ा..। वह उसे ही देख रही थी... उसकी आँखें बड़ी थीं.. सीधी नाक़.. बिखरे हुए बाल.. सांवला रंग.. उम्र लगभग... लगभग.. चहरे से उसकी उम्र पता नहीं लग रही थी।
’पानी वहां है...’
सामने वाले पलंग के नीचे पानी रखा हुआ था...। वह गिलास ढूढ़ने लगा... कुछ देर में हारकर उसने उसकी तरफ देखा...। वह उसे जानती है... उसके बारे में सब कुछ... उसे ऎसा लगा।
’गिलास नहीं है..’
उस लड़की ने कहा और बोतल के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। पानी पीने के लिए वह कुछ सीधी होकर बैठ गई। इंदर ने उसके वक्ष देखे.. उभरे हुए... उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी। पानी पीते हुए उसने चद्दर से अपनी छाती ढ़ांक ली। इंदर ने अपनी आँखे नीची कर ली। उसकी उम्र करीब अट्ठाईस-उनतीस साल की होगी.. उसने अनुमान लगाया। फिर वह खुद को कोसने लगा.. नहीं ठीक कोसने नहीं... कोसने के ठीक पहले की स्थिति... उसकी उम्र पचास की थी.. पर किसी भी लड़की को बिना कपड़े के देखने की उसकी इच्छा वह कभी दबा नहीं पाया। उसने उस लड़की के हाथों से बोतल ली पर ज्यों ही वह उसको नीचे रखने के लिए झुका... उसके शरीर ने जवाब दे दिया.. उसे चक्कर आने लगे... वह कांपने लगा। लड़खड़ाता हुआ वह दूसरे बिस्तर पर पसर गया.. उसे ठंड़ लगने लगी... वह सिकुड़ने लगा। वह उसे देख रही थी...जैसे कि वह खुद को देखता हो... वह दयनीय नहीं दिखना चाहता था... वह कुछ संभला.. उसने लेटे-लेटे ही पानी की बोतल उठाई पर सिर्फ दो घूंट पानी पिया.. उसे पेट गुड़गुड़ाने का डर था..। कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा खुला हुआ था.. इंदर ने अपने कमरे की तरफ देखा.. उसे लगा वह एक सौ चार में अभी भी पड़ा हुआ है.. उसे ड्रिप लगी हुई है.. और वह कमरा नम्बर एक सौ तीन के बारे में सोच रहा है। क्या वह सच में यहां है...? उसकी इच्छा हुई कि वह कमरा नम्बर एक सौ चार में जाए और खुद को देखकर आए कि वह वहां है कि नहीं....।
’अभी मत जाईये...।’
’जी...’
’दौपहर को कोई नहीं आता है यहां... मैं बोर हो जाती हूँ... आप कुछ देर और बैठ जाईये।’
’मैं कुछ देर बैठके ही जाऊंगा... मैं अभी जाने की हालत में भी नहीं हूँ।’
वह यहीं था... कमरा नम्बर एक सौ तीन में..। कमरा नम्बर एक सौ चार ख़ाली था... उसका बंबई का घर भी खाली था.. उसके ऑफिस की कुर्सी भी ख़ाली थी... वह यहां था..। कमरा नम्बर एक सौ चार यहां से गुफा की तरह दिख रहा था उसे...। उसने कमरा नम्बर एक सौ तीन का कमरा नम्बर एक सौ चार से तुलनात्मक अध्ययन किया... इस कमरे में दो खिड़कियां है... जबकि उसके कमरे में सिर्फ एक खिड़की है.. दूसरी खिड़की है पर उसमें एसी लगा हुआ है.. सो वह बंद कर दी गई है... यहां एसी नहीं है...। उसे एसी की ज़रुरत नहीं है.. उसे उजाला चाहिए.. उसे धूप चाहिए.. उसे गुफा में नहीं जाना। वह थक गया।
’मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगी...’
लड़की ने यह खुद से ही कहा....।
’ठीक होने के बाद तुम क्या करोगी?... मतलब इस अस्पताल से निकलने के ठीक बाद तुम पहली चीज़ क्या करना चाहती हो?’
’गोलगप्पे खाऊंगी... वह नीचे देखो.. उस पेड़ के नीचे वह रोज़ शाम को बैठता है... बहुत भीड़ होती है उसके पास.. बस वहीं जाऊंगीं...।’
उस गोलगप्पे वाले के पेड़ को देखने के लिए उसे उसके पलंग के पास आना पड़ा। उसने उस पेड़ को देखा और मुस्कुरा दिया।
’और आप क्या करोगे?’
’मैं... पहली फ्लाईट पकड़कर सीधा बंबई.. बहुत काम पड़ा है... मुझे तो अपने ऑफिस की डेस्क दिख रही हैं.. और कुछ भी नहीं।’
झूठ था यह..। यह बोलते ही उसने अपने दोनों हाथों से पलग के छोर को दबाया.. उसके कंधों मे खिचाव आया.. उसकी गर्दन दोनों कंधों बीच झूल गई... फिर झूठ.. झूठ क्यों? सच यह है कि वह इस अस्पताल से छूटते ही सुरुचि के पास जाएगा... वह सिर्फ एक बार ही उसके साथ सोया है। फिर उसे नग्न देखने की चाह रह रहकर वह अपने भीतर महसूस करता है...। और एक तकलीफ भी...पज़ेसिवनेस। इस शब्द से हमेशा से वह भागता रहा है.. पर इस शब्द ने हमेशा उसे हर अकेली रातों में धर दबोचा है...। सुरुचि बदला था किसी और लड़की से... पर वह बदला, हमेशा बदला लेने वाले से बड़ा हो जाता था... असल में वह किससे बदला ले रहा था उसे कुछ समय बाद इस बात का कोई पता भी नहीं रहता। जलन.. तीख़ी जलन... सुरुचि इस वक़्त कहां होगी... किसके साथ.. वह अपने सुंदर शरीर को लेकर शायद किसी के बहुत करीब... सटी हुई खड़ी होगी...कोई और उसे छूएगा.. चिपकेगा... कोई उसके... ऊफ...!!! यह पज़ेसिवनेस नहीं है इंसिक्योरिटी है... इस तरह की इंसिक्योरिटी उम्र के साथ-साथ बढ़ती जाती है
’आप क्या काम करते हैं?’
कुछ देर के मौन के बाद उसने पूछा...। वह थोड़ा ऊपर होकर बैठ गई थी.. सिर के पीछे उसने तकिया लगा लिया था... उसने चद्दर सिर्फ कमर तक ही रखी थी.. उसके वक्ष वह देख सकता था... पर उसकी निग़ाह उसकी आँखों से नहीं हट रही थीं... उस लड़की की आँखों में कुछ था... वह उसे जानती थी... उसके बारे में सब कुछ फिर भी बहाना कर रही थी पूछने का... यह शायद सपना है.. उसे लगा.. सपने में ही आप ऎसे पात्रों से मिलते हो जो कहानी के पात्र जैसे लगते हैं... जिनके सामने समर्पण करने को जी चाहता है..।
’मैं सामान बेचने में मदद करता हूँ... एक ऎसी कंपनी में काम करता हूँ जो इश्तेहार बनाती है... जिससे आप जाकर उसे खरीदें... मैं सालों से यह काम कर रहा हूँ.. लोग कहते हैं कि मैं अपने काम में बहुत तेज़ हूँ... पर मैं वह नहीं हूँ.. मैं इंदर नहीं हूँ.. मैं खुद एक प्रोडक्ट जैसा हूँ... जिसे रोज़ नए-नए तरीके से मैं बेचने की कोशिश करता हूँ...। मैंने अपने चारो तरफ ’मैं बहुत अलग हूँ... मैं जीवन को उसकी मुक्तता में जीता हूँ.. मैं यायावर हूँ...’ जैसे वाक्यों का एक ओरा बनाया हुआ है... उसे रोज़ चमका के रखता हूँ... असल में मैं एक कमीज़ हूँ.... जो रंग बदलती है... मैंने बस उस कमीज़ की धुलाई सफाई की है... उसे चमकाया है.. उसे बाज़ार में हर बदलते मौसम में आज़माया है.. वह हमेशा काम करती है... मैं हमेशा काम करता हूँ...। मेरे लिए सबसे कठिन काम है अपने साथ रहना... अपने खुद के साथ.. खुद के पूरे झूठ के साथ लगतार रहना...। मेरे भीतर एक खालीपन है... जिसके लिए बस में दूसरों क उपयोग करता हूँ.. वह आते है और कुछ समय के लिए इसे भर देते हैं.. पर वह जाते ही मुझे एक कड़वाहट महसूस होती है.. अपने से.. खुद से.. उनके कुछ देर मेरे साथ होने से.. सब से.. और मैं बाहर निकल जाता हूँ.. फिर किसी को खोजता.. ढूढ़ता हुआ। मुझे असल में माफा मांगना चाहता हूँ... कहीं किसी गिरजे में कोई बूढ़ा फादर होगा जो कह देगा कि... जाओ....भगवान ने तुम्हें माफ किया...।’
इसके बाद शांति छा गई। वह कमज़ोरी महसूस करने लगा। वह कुछ नहीं बोली... चुप बनी रही...। इंदर से यह शांति सहन नहीं हो रही थी। उसने अपने माथे पर पसीने की एक बूद को सरकते हुए महसूस किया... वह बालों से निकलकर उसकी भौं की तरफ सफर कर रही थी। वह हलके से उठा... दो कदम चलकर उसने कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा पकड़ लिया..। कुछ गहरी सांसे ली... उस लड़की की आवाज़ उसे आई...
’मेरा नाम रोशनी है...’
इंदर ने मानों उसका नाम सुना ही नहीं...। वह धीमे कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ चार की तरफ बढ़ने लगा... जो बिल्कुल एक गुफा की तरह दिख रहा था...। वह जल्दी से उस गुफा में गुम जाना चाहता था... वह चाहता था कि वह सो जाए... गहरी नींद.. और जब उठे तो सब कुछ मिट जाए.. उसका कमरा नम्बर एक सौ तीन में जाना.. उसका इस शहर में आना... मौसा जी की मौत.. उनके ख़त.. सुरुची.. उसके ऑफिस की डेस्क... और उसका नाम.. सब कुछ.. मिट जाए..। वह कमरा नम्बर एक सौ चार में ऎसे घुस रहा था जैसे कोई अपनी नींद में प्रवेश करता है...।
- - ¬-
नींद एक धोखा है... बिखरी हुई ज़िदगी के बीच जब भी एक गहरी नींद मिलती है तो लगता है कि सब सही हो गया है... मानों बिखरा हुआ घर उठते ही वापिस, खुद-ब-खुद सलीके से जम गया। हमेशा लगता है कि एक बार सब सही हो जाए.. फिर नए सिरे से शुरुआत करेंगें... पर वह नया कौन होगा जो शुरु करेगा? वह खुद पचास साल पुराना है... झूठे बहानों से लदा हुआ... वह कैसे एक दम नई शुरुआत कर सकता है...? नींद एक अच्छा धोखा है.. नींद खुलते ही एक क्षणिक सुख प्रदान करता है... कि यह खेल की नई शुरुआत है... पर कुछ ही समय में सब कुछ वैसा का वैसा बिखर जाता है। इच्छा होती है कि वापिस नींद की शरण में चले जाओ.. बस सोते रहो... पर नींद दुत्कारके भगा देती है... बिस्तर पर देर तक उलट-पलट की कलाबाज़ी थका देती है...।
वह उठ गया था...। मौसी बगल में बैठी उसके लिए सेब काट रही थीं...। बिमारी कितना आश्रित कर देती है... उसे अचानक वह दिन याद आ गया जब बचपन में वह बरामदे में कंचे खेल रहा था और मौसी राजमा-चावल लिये उसके पीछे-पीछे धूंम रहीं थीं.. हर कुछ देर में एक कोर उसे खिला देती...। खेलते-खेलते मैं ज़्यादा खाना खा लेता हूँ ऎसा मौसी को लगता था। मौसी की उंग्लियों की नंसे दिख रही थी.. उभरी हुई... हरी नंसे..। मौसा जी के जाने के बाद वह कितनी अकेली हो गई होंगी... उन्होंने उसे फोन किया था... ’बेटा कुछ दिनों के लिए आ जाता तो अच्छा लगता।’ बस एक छोटा आग्रह.. विनती जैसा... वह कोई बहाना नहीं कर सका..। वह अभी तक वापिस चला गया होता अगर वह बीमार नहीं पड़ा होता।
’मौसी आप मेरे साथ बंबई चलो.. वहीं रहना मेरे साथ..’
बीमार भर्राई आवाज़ में बहुत हलके से उसने कहा...। मौसी ने कटे हुए सेब उसकी तरफ बढ़ा दिये...
’अभी बीमार है इसलिए ऎसा कह रहा है...।’
’नहीं मौसी.. आप सच में मेरे साथ रहो...।’
मौसी मुस्कुरा दी..। वह भी चुप हो गया। अचानक बचपन के ख़्याल से वह शायद भावुक हो गया होगा.. उसने सोचा..।
’मेरा मोबाईल आप लाईं हैं?’
’अरे कहां.. वह तो मिला ही नहीं.. मैं ढूढ़ रही थी.. फोन भी लगाया.. पर कहीं कोई आवाज़ ही नहीं आई...।’
’वह साईलेंट पर रखा है... बेग़ में है.. अंदर की पाकेट में.. अभी जाएं तो ले आना...।’
तभी वह बूढ़ी सिस्टर आई और उसने एक पर्ची मौसी के हाथों में थमा दी..।
’यह दवाईंया ले आईये...।’
यह कहकर वह चल दी..।
’पैसे हैं ना आपके पास..।’
’हाँ हैं.. मैं अभी आई..।’
कभी-कभी उसकी इच्छा होती थी कि वह मौसी से बैठकर बात करे... या शाम को अपनी लंबी वाक पर उन्हें साथ ले जाए। ऎसे कुछ क्षणों में वह मौसी से अपने बचपन के किससे सुनना चाहता था... उन मुक्त दिनों की बातें जब वह खेलने और खाने के बीच दौड़ लगा रहा होता था। कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा बंद था... उसे लगा कि वह कमरा उसके कमरे से थोड़ा दूर हो गया है। जब वह वहां नहीं गया था तब वह कमरा उसे पास लगता था... उसके मिलते ही कमरा नम्बर एक सौ तीन, कमरा नम्बर एक सौ चार से थोड़ा दूर हो गया... जैसे बाक़ी सारे गृह पृथ्वी से दूर होते जा रहे हैं.. जैसे... धरती भी धीरे-धीरे फैलती जा रही है.. जैसे उसका जीवन जीते-जीते बिखरता जा रहा है... जो संबंध पहले एक हाथ की दूरी पर थे.. अब उनसे मिलना असंभव हो गया है। समय किसी एक कोने में कितना धीमा हो जाता है। उसकी गति इतनी धीमी होती है कि बीता हूआ सारा कचरा उस ओर धीरे-धीरे सरक कर जमा होने लगता है...। अपनी गलतियां.... क्या उन्हें कभी सुधारा जा सकता है?
Thursday, April 26, 2012
दूसरा छोर....
चाय.. सिगरेट... और पीछे बहुत सी चिड़ियाओं का कलरव..। KEITH JARRETT का.. The Melody at night.. with you.. नाम का PIANO ALBUM…. जो पिछले कुछ महीनों से लगातार मेरे कंप्यूटर पर बजता रहता है..। कभी-कभी पूरा दिन गुज़र जाता है और मैं पियानों को सुन नहीं पाता जबकि वह लगातार बज रहा होता है.. तो कभी अचानक पियानों के तीन नोट कुछ इस तरह सुनाई देते हैं कि मानों मैंने अभी-अभी बजाएं हो... उन तीन नोट पर मैं अपने तीन कदम, बिना सोचे कुछ इस तरह बढ़ा लेता हूँ मानों कोई बहुत अपना तीन कदमों के बाद मिलने वाला हो... और वह मिलता है... दूसरा छोर... बहुत समय से रुकी हुई कहानी का दूसरा सिरा... कांपता सा। पियानों सुनना फिर बंद हो जाता है... बहुत हलके से उस कंपते हुए सिरे के बिखरे पड़े धागे संभालता हूँ...। उन धागों को छूते ही... पेरों की आहट सुनाई देती है... कोई दरवाज़े पर है ऎसा लगता है... किसी ने अभी-अभी मेरा नाम पुकारा... कोई मेरे कंधे के पीछे खड़ा मेरे मुड़ने की प्रतिक्षा कर रहा है... और मैं एक लंबे टहलने निकल जाता हूँ...।
लगातार चले आ रहे इंतज़ार में... उसका मिलना प्रसन्नता से भर देता है। फिर टहलना, टहलना नहीं रह जाता.. वह एक संवाद में बदल जाता है..। उस वक्त मैं उन धोर निराशा के क्षणों का उससे हिसाब मांगता हूँ... बहुत समय तक बिगड़ा-उखड़ा रहता हूँ... मान जाने के लिए आतुर मैं सवालों का ढ़ेर लगा देता हूँ। वह दूसरा छोर... डरा हुआ मेरे साथ चलता है... और तभी पेड़ों के पीछे से कहीं एक खिड़की खुलती है.. उस खिड़की से मुझे आसमान दिखाई देता है...। आसमान.. नीला आसमान... सफेद रुई जैसे बादलों से भरा... मैं सोचने लगता हूँ कि सच में मुझे आसमान कितना पसंद है... नीले आसमान में मैं बचपन में घंटो चील को उड़ते हुए देखता था। मुझे वह हरी कांच की खिड़की भी याद है... बूढ़ी चील..।
तभी पियानों के तीन नोट ओर सुनाई देते हैं...। दूसरा छोर कहीं गायब हो जाता है... मैं टहलकर वापिस आ चुका हूँ... नशे में हूँ... सन्न हूँ...। मैं अपनी रुकी हुई कहानी निकालता हूँ... पर लिखता कुछ नहीं... मुझे पहला शब्द पता है... उससे जो वाक़्य फूटेगा वह भी उसी शब्द के आस-पास कूद रहा है... पर
मैं कुछ नहीं लिखता। मैं तारीख़ के बारे में सोचने लगता हूँ जब आखरी बार मैं इस कहानी पर था... करीब चार महीने... चार महीने...। मैं उस पहले शब्द से पूछता हूँ... ’चार महीने?’ ... जबकि मैंने अभी उस शब्द को लिखा भी नहीं है... मैं पहले जवाब चाहता था। इतना लंबा खालीपन... मुझे अचानक वह दिन याद आने लगते हैं... जिसमें मैं घंटों इस कहानी के सामने बैठा था... जो भी लिखता उसे फाड़ देता... कोरे पन्नों को ताकते-ताकते मेरी आँखें थक जाती.. पर कहीं से कोई आशा नहीं बंधती... मुझे हिसाब चाहिए था.. मैं यूं ही इस शब्द को नहीं लिख सकता.. इस शब्द को जवाब देना होगा....।
मैं कहानी से उठकर दूर हो जाता हूँ....। मुझे पियानों के पांच नोट सुनाई देते हैं... नाटकीय पांच नोट...। मैं अधूरी पड़ी कहानी को दूर से देखता हूँ.... मैं जानता हूँ..जो शब्द मुझे लिखना है वह भी इस कहानी के आस-पास ही कहीं मंड़रा रहा होगा... पर मैं दूर हूँ.... मैं दूर से खड़े रहकर बदला लेना चाहता हूँ... कहानी से.. उस घोर निराशा से जो मैंने इन चार महीनों में महसूस की है... उस शब्द से जो मुझे मिलते-मिलते नहीं मिलता था...। मैं अब कहानी आगे लिख सकता हूँ पर मैं नहीं लिखता हूँ....। मैं चाय चढ़ाने लगता हूँ... कुछ देर सिगरेट खोजता हूँ... वह बहुत देर बाद मिलती है.. उसे जलाते ही मुझे चिडियाओं की आवाज़े सुनाई देती हैं... मैं बाहर बालकनी में चला जाता हूँ... एक लंबा कश सिगरेट का खींचता हूँ... मेरे चहरे पर एक मुस्कुराहट आ जाती है। चार महीने का लंबा खालीपन खत्म होने पर था...। मुझे उन कुछ किताबों की याद हो आई.. जब वह खत्म होने पर होती हैं... तब मैं उनका पढ़ना लगभग बंद कर देता हूँ... उस किताब के अंतिम पृष्ठ पर पहुंचने से पहले उसी किताब के सामने दूसरी किताब पढ़ना शुरु कर देता हूँ... ज़बरदस्ती...। अभी मुझे अपनी इन हरकतों पर हंसी आती है.... पर इस वक़्त मैं जो अपनी कहानी के साथ कर रहा हूँ वह मुझे बिलकुल वाजिब लगता है...।
अपनी चाय खत्म करके... सिगरेट फूंककर मैं वापिस अपनी कहानी पर जाता हूँ... पर उसके ठीक बगल में रखे कोरे पन्ने को उठाता हूँ.... और उसपर पहला शब्द लिखता हूँ.... चाय...। यह अंतिम बदला है... रुकी हुई कहानी के ठीक बगल में बैठकर कुछ और लिखना...जैसे अपनी ही प्रेमिका के सामने किसी दूसरी लड़की से फ्लर्ट करना...।
बस अब बहुत हुआ....। अब मुझे ही बुरा लग रहा है...।
मैं कहानी पर वापिस जाता हूँ।
Wednesday, January 18, 2012
दुबेजी...

(DUBEYJI TRIBUTE "DHAMAAL" 8th Jan.. 2012)
“मैं दुबेजी को सबसे ज़्यादा जानता हूँ... मैं उनके सबसे करीब था... मेरे और उनके संबंध बहुत निजी थे।“ यह वाक़्य सबसे मन में था... सारे लोग जो धमाल (दुबेजी की याद में आयोजित किया गया सेलिब्रेशन...) में बतौर अभिनेता हिस्सा ले रहे थे और जो दर्शकों में बैठे हुए थे.. सभी। ’पंडित सत्य देव दुबे...’ जिन्होंने ना जाने कितने लोगों को निजी तौर पर छुआ है। दुबेजी से सभी के मतभेद उतने ही थे जितना सभी उनसे प्रेम करते थे। पिछले चालीस सालों जाने कितने हिंदी, मराठी, गुजराती और अंग्रेज़ी नाटक वालों के ऊपर दुबेजी का असर रहा है... और सभी के पास उनके असंख्य किससे है। इसलिए यह बात सुनील शानबाग़ ने धमाल शुरु होते ही कही कि हम दुबेजी का जश्न मनाना चाहते हैं... जैसा कि दुबेजी भी पसंद करते.. सो कोई भी अपने निजी संस्मरण ना सुनाए (क्योंकि उसके लिए कुछ दिन भी कम पड़ जाते...)। सभी को लगभग पांच मिनिट दिये गए थे.. और सबने खूब जम कर उसे भोगा। इस थियेटर के जश्न में... सभी कुछ हुआ.. कविताए पढ़ी गई... नाटक के दृश्य मंचित किये गए... गाने गाए गए... नृत्य हुआ... याने नाटक की विद्या से जुड़ी लगभग सभी चीज़ देखने को मिली।
पर हम सब एक ख़ालीपन में थे...। हम सभी के भीतर दुबेजी के ना होने की एक ख़ाली जगह थी... इस ख़ाली जगह को देखने के बाद पता चलता है कि असल में दुबेजी कितनी जगह घेरे हुए बैठे थे... हम सबके भीतर उन्होंने अपनी एक जगह बनाई हुई थी। मुंबई थियॆटर को यह जगह भरने में पता नहीं कितना वक़्त लगेगा।
मैंने ’सुख का दुख..’ भवानी प्रसाद मिश्र की कविता सुनाई थी.. और मुझे लगा कि मैं कोई ऎसी बात कह रहा हूँ जो सारे दर्शकों ने रट रखी है...। मैं ही नहीं लगभग सारी प्रस्तुती में यह भाव था कि वह सबको रटा हुआ है... क्योंकि सभी दुबेजी के रिफरेंस में चीज़े सुन रहे थे... कह रहे थे.. जो उस थियेटर में बैठे हर व्यक्ति को व्यक्तिगत तौर पर छू रही थी। हर प्रफार्मेंस में लोग खुलकर हंसते... तालीयाँ बजाते... कभी चुप शांति छा जाती... मेरे ख्याल उस दिन बहुत खूबसूरत नाटक हुआ था... वह नाटक जिसका सभी हिस्सा थे...। नसीर ने कहा कि दुबेजी ने अपने जीवन में इतना काम किया है कि उन्हें एक नींद की ज़रुरत थी जो उन्होंने अपनी मृत्यु के पहले ली... तीन महीने वह सोते रहे... ऊपर बड़े नाटक में हिस्सा लेने से पहले शायद यह उनकी तैयारी थी। हमें जिस तरह दुबेजी को याद करना चाहिए यह धमाल उसका एक बैहतरीन उदाहरण था...। दुबेजी कहते थे (सुनील शानबाग़) कि अगर थियेटर को बचाना है तो हमें दो छोटे थियेटर और चाहिए इस शहर में... जिसमें 200 रुपये से ज़्यादा का टिकिट ना हो... थियेटर खुद बच जाएगा। अभी यह बात हम सबके दिमाग़ में है कि काश हमें प्रयोग करने की एक और जगह मिल जाये...।
वह बहुत अच्छे टीचर थे... डांट कर, चिल्लाकर, प्रेम से वह आपके भीतर से वह उस इंसान को बाहन निकालने में कामियाब हो जाते थे जो बरसों बरस डरा हुआ भीतर बैठा था... यह अलग बात है कि हम अपने डर को जीत जाते थे लेकिन दुबेजी से डरना शुरु कर देते थे। डर के बाद का बदलाव दोस्ती का होता था... हम सब उनके दोस्त हो गए थे। इसलिए शायद उनकी बातों पर जो कभी कभी बचकानी लगती थी, उनकी मृत्यु के बाद भी, उन बातों पर इतनी ज़ोर से हंस सकते थे। वह एक तरीके से कुम्हार थे... जिन्होंने हम सबकी गीली मिट्टी से एक मूर्ति बनने की यात्रा में अपने समझ के हाथ का साथ दिया था।
धमाल में उनकी पसंदीदा चीज़ो को प्रस्तुत किया गया था.. और आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे कि किस कदर की अलग-अलग चीज़े उन्हें पसंद थी.... स्वानंद किरकिरे ने ’बावरा मन...’ गाना सुनाया, कुमुद ने ’सुदामा के चावल..’ (उनका निर्देशित नाटक) का अंश प्रस्तुत किया, पूर्वा नरेश ने अपने नाटक अफसाने का एक नृत्य प्रस्तुत किया, नीना कुल्कर्णी ने ‘Educating Rita..’, नमित और शुब्रो ने कुछ उनके पसंदीदा फिल्मी गाने गाए, नसीर ने फैज़ की एक नज़्म पढ़ी... और इसी तरह लोगों ने उत्सव मनाया... उनके हमारे बीच होने का। मुझे पता नहीं क्यों चेतन दातार की बहुत याद आई...चेतन ने एक बार दुबेजी के ऊपर एक छोटा सा नाटक प्रस्तुत किया था बहुत पहले पृथ्वी थियेटर में... मैं उसे कभी भी नहीं भूल पाता हूँ...। मैने चेतन से कहा था कि दुबे पर ऎसा नाटक आप ही लिख सकते हो... मुझे उस वक़्त चेतन से बहुत ईर्ष्या हुई थी।
धमाल का अंत फिल्मी गाने से हुआ.. ’ज़रा हट के, ज़रा बच के यह है बाम्बे मेरी जान...’। सारे लोगों ने एक साथ मिलकर उस गाने को गाया...। जब धमाल खत्म होकर हम सब बाहर आए... तो एक अजीब से किस्सों का सिलसिला शुरु हो गया... हर आदमी के पास बहुत कुछ था कहने को... सभी लोग अपने अनुभव एक दूसरे को सुनाना चाहते थे। मैंने अलग-अलग गुटों में खड़े होकर करीब बीस नए किस्से सुने..... कुछ देर में मुझे लगा कि दुबेजी बहुत जल्द ’विचित्र किंतु सत्य...’ जैसे कोई व्यक्तित्व हो जाएंगे... जिन्हें हमें उनके किस्सों में पकड़ना पड़ेगा। फिर मैं किस्सों से थोड़ा थक कर अकेला खड़ा हो गया... सिग्रेट मुंह को लगाई थी कि.... तभी मुझे एक रिक्शा आता हुआ दिखा... मुझे लगा अभी इस रिक्शे से दुबेजी उतरेगें और पूछेगें... ’क्या मानव, क्या हो रहा है यहां?’ तब मुझे अचानक यह बात बहुत ही डरावनी जान पड़ी कि अब दुबेजी कभी भी यहां नहीं आएंगें...। तब शायद मैंने पहली बार उनका ना होना महसूस किया था... मैंने एक गहरी सांस भीतर ली.... मेरे दिमाग़ में एवम् इंद्रजीत नाटक धूमने लगा.. फिर इंशा अल्लाह के कुछ दृश्य... फिर मुझे धर्मवीर भारती की बात याद हो आई... ’ईर्ष्या कुछ नहीं मुझे यद्यपि मैं ही वसंत का अग्रदूत- निराला।’ उनके हिसाब से दुबेजी पर यह पंक्ति पूरी तरह लागू होती थी। फिर मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की वह कविता याद हो आई जो मैंने कुछ महिनों पहले दुबेजी को सुनाई थी... “आराम से भाई ज़िदग़ी ज़रा आराम से... तेज़ी तुम्हारे प्यार की बर्दाश्त नहीं होती अब...” दुबेजी को यह कविता बहुत पसंद आई थी... उन्होंने कहा था कि ’यह मुझे लिख कर दे दो...।’ मैं उन्हें यह कविता दे नहीं पाया था। फिर अकेले खड़े रहने की हिम्मत नहीं हुई... मैं वापिस सारे लोगों के बीच शामिल हो गया.... जो अभी भी दुबेजी के किस्से में जी रहे थे... जो सभी उनके दोस्त थे।
PLAYWRIGHT...

If someone came up to me wanting to know what it takes to be a playwright ….I’m almost sure of finding myself with very little to say. Before anything else, I’ll ask myself why it is that I write? Is it my love for theatre, my passion ,the madness….? All but a farce…..because after so many years perhaps all this should have begun to lose its shine. My reasons lie elsewhere. The truth is , that writing a play or writing itself, for that matter, is seamlessly woven into the fabric of my being. There is never the need for any effort towards wanting to write…. I find myself thinking about writing almost all day…in gatherings…around friends….anywhere , it lingers in my thoughts like a lover. Kafka eloquently phrased that , ‘To write I need death like silence’. Now that brings me to my very next question, which is, how important is it to write for me? To answer which I quote Rilke , who once said to a young poet that ‘Ask yourself in the quietest hour of the night, is writing a primary necessity? The answer must be a ‘yes’ if you’re living all alone and apart from yourself, can turn to no one.’
The journey of a writer, having lived all this silence and solitude, begins not with his first play…but with his second. Because that is where, comes in the dilution of the expectations of his audience. The juncture where he finds himself having to walk the line between what it is that he wants to write vis-à-vis that which he should.
In my limited experience, I have seen that a writer who tends to create anything with his audience in mind is more often than not lost. He ends up in a space where whatever he churns out is projected outwards rather than inward. The real graph or the complete circle of the life of a writer comes alive only when he can’t and doesn’t repeat his work irrespective of the consequences. And in that circle what matters most is how entertained he remains with the constant surprise element in his work for him.
Does a play change the world, a society, a country ? No. It’s a momentary form of art that caters to a niche audience lasting not more than a couple of hours. Its like life itself , where what you experience for that time in space is nothing more than a memory right after its lived. Which is what brings so much beauty to theatre and to the eyes that witness it. “Literature doesn’t give one water , all it gives is a realisaion of an unquenchable thirst. When in a dream you drink water, on waking you realise how thirsty you actually were. “ I find that Nirmal Verma’s words beautifully sum up the taste of living around theatre for me.
Tuesday, January 3, 2012
खिड़्कियाँ....

इस तरह की अकेली दौपहरें... ना जाने कितनी खिड़कियों के साथ मैंने काटी हैं..। मेरा सबसे सुंदर वक़्त इन खिड़कियों से झांकते हुए ही बीता है...।
एक खिड़की मुझे याद आती है... शायद जीवन की पहली खिड़की... बारामुला, खोजाबाग़ (कश्मीर...)... जहाँ से मुझे अपने आंगन में उगे हुए पौधीना के पौधे दिखते थे...उनकी खुश्बू...। बर्फ गिरने पर बुखारी की गर्मी में रजाई में लिपटा हुआ मैं खिड़की से उन बर्फ के गोलों को देखता जिन्हें मेरे और मेरे भाई ने मिलकर बनाए थे..। एक बार वहां से मैंने अपने आंगन की दीवार पर से एक चोर को भी भागते हुए देखा था...। वह चोर दौपहर में बाहर सूख रहे कपड़े चोरी करता था। एक दिवार से दूसरी दीवार पर छलांग मारते वक़्त वह लड़खड़ा गया था... और तब उसने मेरी तरफ देखा था। मैं अपनी खिड़की में बैठा था... हम दोनों की आंखे कुछ देर के लिए फसी थी.. फिर वह भाग गया था। बरसों तक मैं उस चोर की शक्ल नहीं भूल पाया था...। वह भागते हुए बहुत बेचारा दिख रहा था... मुझे उस वक़्त तक पता था कि चोर खूंखार होते हैं.. पर वह बहुत बैचारा था.. दयनीय.. भूखा..। बाद में पता चला कि वह पकड़ा गया है...। मुझे उसके पकड़े जाने पर बहुत पचतावा हुआ था...। उस खिड़की से कुछ दूरी पर पहाड़ भी दिखता था... मैंने बड़े सपने देखे थे कि एक दिन उन पहाड़ों पर जाऊंगा पर हमें खोजाबाग़ छोड़ना पड़ा...। वहां के कौए मुझे बहुत याद आते हैं... एक कौओं का परिवार था... पापा कहते थे कि यह मेरे जासूस कौए हैं.. यह मुझे सारी रिपोर्ट देते हैं तुम्हारे बारे में...। आज भी कौओं को देखकर मैं सचेत हो जाता हूँ।
दूसरी खिड़की..... श्रीनगर की खड़की दूसरी मंज़िल पर थी... मैंने वहाँ से चीलों को देखा है...। कई लम्बीं दौपहरों में जब मैं शहतूत के पेड़ पर नहीं छुपा होता था तो मैं खिड़की से चीलों को देखा करता था। कुछ चींलो को मैं पहचानने भी लगा था। उसमें एक बूढ़ी चील थी... जिसके परों को झड़ते हुए मैंने देखा था... (मैं उस देयनीय चोर के बार में कभी नहीं लिख पाया.. पर बूढ़ी चील को मैं लिख चुका हूँ)। मैं वह दिन कभी भी भूल नहीं पाया हूँ.... आज भी जब कभी मैं चीलों को देखता हूँ तो मुझे श्रीनगर की वह खिड़की याद आती है..।... और याद आता है सुंदर नीला आकाश... सफेद रुई जैसे बादलों से सजा हुआ। चील की उड़ान में..उसके किसी पेड़ पर आकर बैठने में संगीत है.. मैं चील को देखते हुए कभी बोर नहीं हो सकता हूँ।
फिर चहल पहल से भरी हुई खिड़की जीवन में आई... होशंगाबाद की खिड़की...। यही वह जगह थीं जहां मुझे पहली बार चीलों-पहाड़ों से अलग... लोगों के मैले में मज़ा आने लगा...। मेरे घर की खिड़की से एक कुंआ दिखता था, जिसमें मेरी जाने कितनी गेंदें गुम चुकी हैं...। उस कुंए के ठीक बग़ल में मुझे मोहन का टप दिखता था... आह!!... गोली बिस्किट... खटाई, पोंगापंड़ित.. और जाने क्या-क्या उसकी छोटी सी दुकान में होता था। मैं अपने पैसे अपने जेब में नहीं.. बल्कि मुंह में लिए हुए घूमता था... एक दौपहर... दौपहर महत्वपूर्ण है क्योंकि दौपहर में ही उसकी दुकान पर बहुत कम लोग होते थे... सो एक दौपहर मैं उसकी दुकान में गटागट लेने गया.... जब मैंने उसे अपने मुंह से पैसे निकालकर दिये तो उसने मुझे गटागट की गोली देने से इंकार कर दिया... मैंने वह पचास पैसे का सिक्का उसके सामने अपनी शर्ट से साफ किया... पर ना!!! बाजू के नल से उसे धोया-सुखाया... पर वही.. ना!!! इतनी बड़ी बेईज़ती उस छोटी सी उम्र में मेरे बर्दाश्त के बाहर थी...। सो मैंने कसम खाई कि मैं कभी इसकी दुकान से कुछ भी नहीं खरीदूंगा.. और इसे बर्बाद करके दम लूंगा। बर्बाद कैसे किया जाता है.. उसका कोई भी सिर-पैर मुझे नहीं पता था... बस गुस्सा बहुत था...। अब आप ही बताओ कि... गटागट के लिए मुंह पानी से भरा था, जेब में पैसे थे.. पर गटागट नहीं मिली... ऊफ!!! कोई भी इस तक़लीफ को अब कैसे समझ सकता है? खैर मोहन को बर्बाद करना है इस बंदोबस्त में मैं लग गया.... सो मैं उसका पीछा करने लगा...। पीछा करते-करते मैंने जान लिया कि वह अपना सामान कहां से लाता है... सो एक दिन मैं उस थोक की दुकान पर गया... और पूरे तीस रुपये का माल वहां से उठा लिया... (मुझे आज तक नहीं पता कि वह तीस रुपये मेरे पास कहां से आए...।) अब मेरी खिड़की... जिसके ठीक सामने मोहन की दुकान थी... उसी खड़्की में मैंने मोहन के विरुद्ध गोली-बिस्कुट की दुकान खोल ली थी...। मैंने लगभग छ: महीने वह दुकान चलाई... मुझे याद नहीं कि मैंने कभी अपनी दुकान में गटागट खाई थी..। मैंने शायद उसके बाद कभी भी गटागट की गोली नहीं खाई...। अपनी दुकान चलाने की व्यस्तता में... मोहन से बदला लेने वाली बात भी मैं भूल गया..। उन छ: महिनों में मेरा पूरा मोह गोली-बिस्कुट से उठ चुका था.. मैं उन छ: महिने में बड़ा हो गया था.. शायद।
यह उस खिड़की की कहानी थी...। इसके अलावा मैने उस खिड़की से... अजीब-अजीब लोगों को देखा.. मृत्यु देखी.. जीवन देखा... और जो सबसे खूबसूरत चीज़ देखी.. जिसके प्रेम में मैं आज तक हूँ.. वह थी बारिश...। बादलों का धीरे-धीरे नमी भरे माहौल में आना.. तेज़ हवाओं का चलना.. और झर-झर... बारिश.. मिट्टी की खुश्बू... आह!!! पहली बारिश में भीगना अच्छा होता है.... (पता नहीं कहां यह बात सुनी थी।) हर पहली बारिश में मैं ज़ार-ज़ार भीगा हूँ...। मैंने देर रात भी बारिश देखी है... बल्ब की रोशनी खिड़की के आकार में बाहर पड़ जाती थी... उसमें मेरे होने की परछाई के अलावा... बाक़ी जगह में पानी का बहना देखना.. मुझे जादुई लगता था। मेरी बहुत इच्छा होती कि इस बहते पानी के पीछे-पीछे मैं उसके अंत तक जाऊं... उसका अंत देखूं... कहां जाकर यह पानी ठहर जाता है..?
मेरे बचपन की यह तीन खिड़कियां... मुझे सपनों के बायस्कोप जैसी लगती हैं..। पहली खिड़की से मैंने बर्फ देखी.. दूसरी से कश्मीर का नीला आसमान... तीसरी खिड़की से बरसात। इस उम्र तक आते-आते मैंने जाने कितने घर बदले हैं.. पर हर घर में घुसते ही मैं सबसे पहले उस घर की खिड़की देखता हूँ...। अगर वह एक नए मौसम की तरफ खुलती है तो मैं झट से उस घर में रहने लगता हूँ। इन्हीं खिड़कियों के कारण मुझे अकेली लंबी दौपहरे बहुत पसंद है... और मैं कभी इनसे बोर नहीं होता।
Sunday, January 1, 2012
आजकल मैं लड़ रहा हूँ....
(एक नाटक लिखने के ठीक पहले.....)
’आजकल मैं लड़ रहा हूँ.... मैं अभी भी लड़ रहा हूँ... पिछले कई दिनों से मैं लड़ रहा हूँ...’
एक झटके में सन्नाटा छा जाता है... चुप... दूर कहीं कुछ खोजता सा एक आदमी दिखता है...। क्या पूर्ण है? किसे जी लेने से शांति मिल जाएगी? कौन से शब्द इस हड़बड़ी को चुप कर देंगें? वह शब्दों की तलाश में हर कोने कुछ देर रह लेना चाहता है...। रह लेने दें... ऎसे कोने अब घर में नहीं बचे है.. हर कोना अपनी बैचेनी लिए कब से उसका इंतज़ार कर रहा था। वह उस अटपटेपन में फिर घर में गोल-गोल चक्कर काटने लगता है। बहुत सारा कुछ कह लेने की कुलबुलाहट से वह एक खाली पन्ना तलाशता है... ख़ाली कोरे पन्ने बहुत ज़िम्मेदारी लिए आते हैं..। हर शब्द.. हर वाक़्य एक कहानी का दरवाज़ा खोल देता है... कोई एक बैचेनी जिसे कह कर उस बैचेनी को छूट जाना होता है...। हर बैचेनी अपने किस्से के साथ उसकी कलम की नोक पर बैठ जाती है। कलम की नोक़ के भारीपन में वह अपनी कलम में काली सियाही भर लेता है। पहली बात लिखने के पहले ही उसके कोरे पन्ने पर बहुत से चहरे घूमने लगते हैं.... किसे लिख कर आज़ाद कर दे? पर उसकी खुद की आज़ादी का क्या? वह कब आज़ाद होगा? उसकी अपनी तड़प कब शांत होगी...? उसने सोचा कि कुछ ऎसा लिख दूं कि हर कोने की बैचेनी ख़ाली हो जाए...। उसने लिखा ’आजकल मैं लड़ रहा हूँ.... मैं अभी भी लड़ रहा हूँ... पिछले कई दिनों से मैं लड़ रहा हूँ...’ वह यह लिखकर चुप दीवारों को ताक़ता रहा... कहीं कोई भी हलचल नहीं थी...। उसने कुछ कोनों की तरफ नज़र दौड़ाई... वहां बस एक चुप अजनबीपन था.. बैचेनी से चिपका हुआ। यह क्या लिख दिया? इसका क्या संबंध है उस किसी भी तड़प से जिससे वह छुटकारा पाना चाहता है? उसे हंसी आ गई... यह लेखक का कमीनापन है... जब कोई एक बात अपनी पूरी छटपटाहट पर होती है तो वह ठीक उसके उलट बात लिखना शुरु कर देता है... इस तरह वह बदला लेता है... पर किससे? क्या उन छोटी बातों से जो कभी किसी सन्नाटे में उसने ही पैदा की थीं... जिन्हें वह घर के किसी कोने में रख कर भूल गया था? पर वह अचानक बहुत हल्का महसूस करने लगा था। यह बदला उसने घर के हर कोने की बैचेनी से लिया था... उसकी क़लम हल्की हो गई...। कोरे कागज़ पर उभरे सारे चहरों पर से उनके नाम पिघल कर टपकने लगे। वह आदमी इस सुख को छिपा ना सका... उसकी हंसी में बदला था... अपने ही, बीच में छूटे हुए, अनकहे सत्य से बदला..। एक फांस गड़ने की तकलीफ को कम करने के लिए दूसरी बड़ी फांस को अपने भीतर गड़ा लेना... वह खुश था..। उसे भी पता था कि इस पीड़ा से हास्य उभरेगा... वह हास्य लिखेगा...।
यह कई साल पुरानी बात है...। आज वह नाटक कई जगह खेला जा रहा है... पर आज भी जब कभी वह अपने नाटक के कुछ वाक़्य सुनता है तो उसे उस सघन शांम की याद हो आती है.. जब एक झटके में सन्नाटा छा गया था। ऎसे दिनों में जब भी वह घर वापिस जाता है तो घर में घुसते ही वह एक छोटा लाल रंग का लेंप जलाता है...। पूरे घर में बिखरा उजाला उससे सहन नहीं होता...। वह घर के कोनों को अंधेरे में ही रहने देता है..। उन कोनों की बैचेनी अभी भी उसका उसी शिद्दत से इंतज़ार कर रही हैं.... पर वह बदला लेने जैसे वाक्य के बिना किसी भी खाली पन्ने के करीब नहीं जाना चाहता है...। उसकी व्यस्तता उसका हथियार है... दिन में सूरज की रोशनी में जब सब कुछ साफ दिखता है तब वह बहुत से कामों का सिलसिला अपने आस पास उगाए रखता है...। वह सारे कामों के सिलसिले शाम तक पेड़ बन जाते हैं जिनमें कोई भी फल नहीं उगता...। बस उसकी समस्या शाम से शुरु होती है.. जब बिना फल के पेड़ उसकी भूख को चिढ़ाने लगते हैं...। तब ऎसे कई क्षणों में वह अपने लिखे हुए हास्य पर बात करने लगता है...बिना रुके.. बड़बड़ाता हुआ सा... तेज़ गवार हसी हंसता हुआ...।
Thursday, December 15, 2011
सपना....

बहुत पहले मैं एक लड़की को जानता था जो चिड़िया हो जाने का सपना देखा करती थी।
हम अकसर एक दूसरे से अपने सपनों की बात करते थे... बात हम सीधी करते थे पर मुझे वह सारी बातें सपनों सी लगती थीं। मैं उससे जब भी कहता कि मुझे मेरे सपने कभी याद नहीं रहते... तो वह हंस देती थी...। वह कहती थी कि यह कोई रटने वाली चीज़ थोड़ी है जिसे याद रखना होता है!!! उसे सब याद था...। उसके सपनों का दायरा बहुत बड़ा था... वह बचपन की घटनाए भी सपनों की तरह सुनाती थी।
एक चिड़िया का घोंसला उसके घर के ऊपर था... जब भी वह टूटे हुए अंड़ों को देखती तो उदास हो जाती... कभी-कभी उसे चिड़िया के छोटे बच्चे भी नीचे पड़े हुए दिखते जिन्हें वह बिना हाथ लगाए वापिस धोंसलों तक पहुंचा देती। उसके बचपन की कई दोपहरे चिड़िया के धोंसले की पहरेदारी में बीतती थी। एक दिन उसने सपना देखा था कि वह एक चिड़िया के धोंसले में पड़ी हुई है...दूसरे चिड़िया के बच्चों के साथ। वह अपने परों को निकलता हुआ देख सकती थी...। धीरे-धीरे उसकी उम्र के बच्चे.. अपने परों को झटके के साथ खोलकर धोंसले से कूदने लगे थे.... और ऊपर आसमान में उड़ने लगे... वह अकेली रह गई थी.. डरी हुई। अब उसकी बारी थी। उसने उड़ने की तैयारी की.. अपने परों को झाड़ा... फैलाया..। वह धोंसले के कोने तक आई.... और ऊपर आसमान को देखने लगी...। वह कूदने ही वाली थी कि उसे नीचे एक भूखी बिल्ली दिखी जो उसका इंतज़ार कर रही थी...। उसने एक गहरी सांस भीतर खींची और अपने परों को चौड़ा करके धोंसले से कूद गई.... कूदते वक़्त उसने अपनी आंखें बहुत कस कर बंद कर ली थीं। तभी उसकी नींद खुल गई..।
हम लोग नदी किनारे धूम रहे थे जब उसने मुझे यह सपना सुनाया था। उसके सपने हमेशा बीच में कहीं खत्म हो जाते थे... हमेशा अंत होने के पहले उसकी आँखें खुल जाती थी। ’फिर क्या हुआ?’ जैसे प्रश्नों की मैं झड़ी लगा देता... जवाब में वह सिर्फ यही कहती की ’बस मैंने इतना ही देखा था।’ वह कहती थी कि हमें हमेशा अधूरे सपने याद रहते हैं... बीच की ख़ाली जगह... आधे कहे हुए संवाद... चुप्पी...। मुझे सपने याद नहीं रहते थे... मेरे सपने अपना अंत लेकर आते थे शायद... मुझे यूं भी अंत की हमेशा चिंता रहती थी...। किसी भी कहानी को पढ़ते हुए मैं उसके अंत का बोझ अपने कंधे पर लिए हुए उसे पढ़ता... अगर अंत अच्छा होता तो मुझे कहानी पसंद आती वरना मैं चिढ़ जाता। एक दिन उसने मुझसे कहा कि ’तुम पहले कहानी का अंत पढ़ लिया करो... फिर तुम कम से कम कहानी का मज़ा तो ले पाओगे।’ मैं उसकी बात समझता था... पर मैं उसके जैसा नहीं सोच सकता था... मैंने अपना पूरा जीवन भविष्य को देखते हुए जीया था... पर वह कभी भी भविष्य के बारे में बात नहीं करती थी। हम दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर सपनों का ही था। उसे अधूरेपन की आदत थी... और मैं अपने देखे हर सपने को उसकी नीयती तक पहुंचाना चाहता था।
मुझे वह अभी भी याद है। क्योंकि वह बीच में ही वापिस मुड़ गई थी... जबकि मैं आगे चलता रहा। मुझे लगा वह किसी अगले मौड़ पर मुझसे ज़रुर टकराएगी और हम वापिस साथ चलना शुरु कर देंगें... पर ऎसा नहीं हुआ..। वह जिस दिन मुड़ी थी तब से मुझे सपने याद रहने लगे। उसके अधूरे सपनों का अंत मैं अपने सपनों में देखने लगा... उसके जाने के बाद।
काम की तलाश वाली उम्र में मैं उससे मिला था। मुझे लगता था कि यह उन लड़्कियों जैसी है जो सपनों में जीती है। मैं उसे बार-बार खींचकर यथार्थ पर लाता था पर वह हर बार मुझसे छूटकर कहीं चली जाती थी। वह कहती थी कि ”मैं जल्दी से पैंतिस की होना चाहती हूँ.. मुझे यह उम्र बहुत बकवास लगती है। मैं बस पैंतिस होने तक का समय काट रही हूँ।’ वह मेरे हद के बाहर की लड़की थी.. वह जो कहती थी वही जीती थी.. शायद इसीलिए मैं उसकी तरफ इतना आकर्षित हुआ था। मैं उससे अकसर पूछा करता था कि ’हम दोनों एक साथ क्या कर रहे हैं?’ तो वह तपाक से जवाब देती कि ’हम दोनों एक साथ नहीं है..।’ मैंने उसके साथ अपने भविष्य के सपने देखने लगा था... भविष्य के सपने देखना मेरा स्वभाव था... मैं ऎसा ही था... मुझे दुकानों-दुकानों धूमना अच्छा लगता था। हर दुकान के सामने मैं बहुत देर तक खड़ा रहता था... और सपने देखता था.. जब मेरा घर होगा तो मैं यह रंग के पर्दे लगाऊंगा.. इस तरीक़े का फर्नीचर होगा..। मेरे सपने वहीं पर खत्म नहीं होते थे.. मैं उन्हें अपनी डायरी में नोट भी कर लेता था.. उनके दाम के साथ... फिर उसे ज़बर्दस्ति उन दुकानों पर ले जाता और उसकी राय पूछता..। उसे मेरी यह आदत बहुत बचकानी लगती थी.. पर वह हर बार मेरे साथ हो लेती... मुझपर हंसने के लिए.. और मुझे उसका हंसना बहुत सुंदर लगता। मैं हर बार उसे हंसाना चाहता था.. इसलिए अपनी बचकानी आदतों को उसके सामने दौहराता रहता।
एक दिन मैंने उसे एक झूठा सपना सुनाया...। मुझे ऎसा कोई सपना नहीं आया था पर मैंने उससे झूठ कहा कि मैंने कल रात तुम्हारा सपना देखा था कि तुम मेरे साथ पहाड़ों में धूम रही हो..। हमारी शादी हो चुकी है और तुम उड रही हो... मैंने तुम्हें अपने सपने में उड़ते हुए देखा था। इस सपने का उसपर बहुत गहरा असर हुआ था... मैं जानता था वह चिड़िया हो जाने का सपना देखती है। उसने मेरे झूठे सपने में अपनी आँखें बंद कर ली.. और मैं अपने झूठे सपने की उड़ान को रोक नहीं पाया..। मुझे उस झूठ के असर को देखकर चुप हो जाना चाहिए था पर मैं चुप नहीं हुआ... मैं अपने सपने गढ़ने लगा..। हर कुछ दिनों में मैं उसे एक सपना सुना देता... और वह हर बार अपनी आँखें बंद कर लेती। मैंने कभी उसे अपने इतना करीब महसूस नहीं किया था... वह मेरे पास थी... बहुत पास। इन्हीं सपनों के बीच कहीं हमने साथ रहने का फैसला कर लिए...। यह उसका फैसला नहीं था... जब उसकी आँखें बंद थी मैं उसे अपने घर ले जा चुका था। वह मेरे झूठे सपने में थी और मैं उसे सच में अपना बना चुका था। उसने मुझसे शादी नहीं की थी... पर हम साथ रहने लगे थे। मैंने अपने घर को अपने सारे बचकाने सपनों से सजा दिया था... वही पर्दे.. वही फर्नीचर जिसे देखकर वह खूब हंसी थी..। अब वह उन सबके बीच में रहने लगी थी। मुझे लगा था कि वह बहुत हंसेगी पर वह चुप होती गई थी।
उसकी एक आदत थी जिससे मैं बहुत चिढ़ता था... वह अपना हर जॉब कुछ ही महीनों में छोड़ देती थी। वह अपने भविष्य की कुछ भी संभावना देखते ही बिदक जाती थी... तुरंत छोड़ देती... प्रमोशन के लेटर पर वह अपना इस्तिफ़ा कंपनी में दे आती..। मैंने अपनी काम तलाशने की उम्र से जो जॉब पकड़ा था मैं आज भी उसी ऑफिस में था... मैं बार-बार उसे अपना उदाहरण देता कि देखो आज मैं कितना सफल हूँ। वह कभी बहस में नहीं पड़ती थी.. ऎसी बातों में वह हर बार पहाड़ों पर चलने की बात कहती और मैं हर बार बात टाल जाता।
मैंने उसे अपने साथ लगातार धरेलू होते देखा था..। मैं जब भी उसे अपने घर में काम करता हुआ देखता था तो मुझे अजीब सी जीत का अहसाह होता था। जैसे मैंने कोई जंगली जानवर को पालतू बना दिया हो। जैसे...हाथी का दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करना हमें बहुत अच्छा लगता है... शेर हंटर की टाप पर कुर्सी पर बैठ जाए तो हम ताली बजा देते हैं... आसमान में उड़ते हुए पक्षी हो अपने घर के पिंजरे में अपना नाम पुकारते हुए सुनना कितना सुख देता है... मैं उसी सुख में था।
फिर वह दिन आ गया.....
वह रविवार का दिन था। छुट्टी थी... और वह किचिन में आटा गूंद रही थी। मैंने पूछा
’क्या कर रही हो”
तो वह कहने लगी कि..
’मैं पूरियां बना रही हूँ।’
’पूरियां क्यों? आज कोई त्यौहार है क्या?’
’ना... इस महीने मैं पैंतिस की हो जाऊंगी।’
’इस महीने मतलब... तुम्हारा जन्म दिन कब है?’
’जन्म दिन का पता नहीं है... पर इसी महीने कभी है। मैं खुद को पैंतिस महसूस कर रही हूँ...। मैं अपने परों को बड़ा होते देख सकती हूँ।’
’मैं पैंतिस की हो जाऊगीं...’ के बाद मुझे नहीं पता कि वह क्या कह रही थी..। मैं बार-बार उसका उड़ना सुन रहा था... मैं डर गया। मुझे उसका सपना याद था.. वह चिड़िया होना चाहती थी हमेशा से...। वह बस पैंतिस होने का इंतज़ार कर रही थी।
’तो अब तुम क्या करने वाली हो?’
’पूरियां बनाऊगीं और पतली आलू टमाटर की सब्ज़ी।’
’नहीं मेरा मतलब है.. पैंतिस होते ही क्या करोगी?’
’उड़ जाऊंगी।’
वह अपनी बातों में एकदम सहज थी..। मैं डर गया..। इस बार मैंने उससे कहा..
’सुनों मैं एक हफ्ते की छुट्टी ले रहा हूँ ऑफिस से... चलो कहीं पहाड़ों पर चलते हैं।’
’ना... मेरी इच्छा नहीं है..।’
’अरे तुम ही कहा करती थीं... पहाड़ों पर जाना है.. अब क्या हुआ?’
’बस... इच्छा नहीं है...।’
वह बहुत खुश दिख रही थी..। उसकी आँखों में जंगलीपन वापिस दिखने लगा था..। वह मेरे साथ रहकर.. या मुझे सहकर सिर्फ पैंतिस होने तक का वक़्त काट रही थी। वह पैंतिस होते ही उड़ जाएगी...। मुझे लगा मैं किसी पिंजरे में बंद शेर के पास खड़ा हूँ.... जिसे पता है कि वह जब चाहे तब पिंजरा तौड़कर भाग सकता है.. इसलिए वह उस पिंजरे में खुश है... शांत है.. पूरियां बना रहा है। मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मै क्या करुं.. इसे पालतु बनाना मेरा भ्रम था.. यह कभी भी मेरा बनाया हुआ पिंजरा तोड़कर चली जाएगी। मेरे सपने... उनका क्या..? झूठे ही सही... पर मैंने उन्हें अपनी पूरी शिद्दत से देखा था... उन्हें मैं उनकी नीयती तक पहुंचाना चाहता था। मुझे कुछ हो रहा था.. मैं ऊपर से नीचे तक कांपने लगा।
’सुनों मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।’
मैंने कुछ ऎसे कहा मानों मैं कह रहा हूँ कि मैं तुम्हें उड़ने नहीं दूंगा।
’क्या कह रहे हो तुम?’
’मैं तुम्हें उड़ने नहीं दूंगा।’
इस बार मेरे मुँह से उड़ना ही निकला.. पर मैं रोक नहीं पाया...। मैंने उसे बहुत कसकर पकड़ लिया...।
’अरे क्या कर रहे हो तुम... तेल गर्म है... जाओ यहाँ से...। अरे मुझे लग रही है। तुम... दूर रहो..।’
उसने मुझे धक्का दिया मैं फर्श पर आकर गिर गया। मुझे सब कुछ छूटता हुआ दिख रहा था.. मेरा सपना.. मेरा भविष्य...। मेरी आँखों में अजीब सी जलन हो रही थी जिसकी वजह से मेरी आँखों से लगातार पानी आ गिर रहा था। वह डर रही थी... वह डर के मारे सोफे के ऊपर चढ़ गई.. मैं अभी भी फर्श पर था। मुझे लगा कि वह सोफे के ऊपर से छलांग लगाएगी और उड़ जाएगी... मैं भूख़ी बिल्ली की तरह बस उसके फर्श पर गिर जाने का इंतज़ार करुंगा..। मैं अपनी पूरी ताकत से उठा और उसकी और झपट्टा मारा..। मैं उसे रोकना चाहता था। वह कुछ बड़बड़ाए जा रही थी पर मुझे बार-बार उसके उड़ जाने का डर था.. सो मैं बस उसके परों को ज़ख़्मी कर देना चाहता था। वह इस तरह मुझे छोड़कर नहीं जा सकती थी। कुछ देर की हथापाई में मैंने अपने सिर पर किसी कठोर चीज़ का प्रहार सा महसूस किया... शायद वह कुकर था... या कढ़ाई.... पता नहीं पर मैं बेहोश हो चुका था।
जब नींद खुली तो मैं अपने घर में अकेला था... वह कहीं भी नहीं थी। मैंने उसे बहुत ढ़ूढ़ने की कोशिश की पर वह उसके बाद मुझे कभी नहीं मिली...। मैंने अपने झूठे सपनों में उसे कुछ सालों तक फसाए रखा था... बस... या शायद वह मेरे झूठे सपनों के बारे में जानती थी पर उसे पैंतिस होने तक का वक़्त काटना था... सो वह मेरे झूठ के साथ बनी रही। मैं हमेशा भ्रम में ही था... कि वह मेरे प्रेम में धरेलू हो चुकी है... वह अपने सपनों से बाहर आ चुकी है.. और मेरे यथार्थ में जीने लगी है...। पर ऎसा नहीं था... वह हमेशा सपने में ही थी..। उसने एक बार कहा था कि ... ’जो सपना देखता है... वह कभी भी उड सकता है...।’ वह उड़ चुकी थी..।
यह बहुत पुरानी बात है..। आज रात सच में मैंने उसका सपना देखा था कि वह पहाड़ों में देवदार के एक वृक्ष पर बैठी मुझे देख रही है... जब तक मैं उसका नाम पुकारता वह उड़ चुकी थी... दूर पहाड़ों की ओर...।
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मानव
परिचय
- मानव
- मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल

