Friday, May 4, 2012

त्रासदी... (भाग-दो)

’कंपते थे दोनों पांव बंधु...’ (कहानी त्रासदी का भाग-दूसरा यह रहा....) उसने सौलवें में कदम ही रखा था। देर रात चलने वाली कृष्ण लीला उसने कबीट का फल खाकर देखी... घर में आते ही एक थाली उठाकर उसे अपनी उंगली पर घुमाने की प्रक्टिस करने लगा। कृष्ण उसे भा गए थे... अपने दोस्तों में कृष्ण और गोपियों की लीला के किससे वासना में ढूबे हुए होने लगे... फिर किस्सों में कृष्ण हट गए और झूठे सेक्स के अनुभव सारे दोस्त एक दूसरे को सुनाने लगे...। वह अपनी जांघों के बीच हलचल महसूस करने लगा। इन सब बातों का अंत यूं हुआ कि उसने तय किया कि वह बासुरी बजाना सीखेगा। अशुतोष भाई के यहा वह गणित की ट्युशन पर जाता था... उसे याद था कि उनके कमरे में उसने हार्मोनियम रखा हुआ देखा था। आशुतोष भाई स्वभाव से ही गुस्से वाले आदमी थे....। एक दिन जब उसने आशुतोष भाई का मूढ़ थोड़ा ठीक देखा तो उसने उनसे कहा कि ’मैं संगीत सीखना चाहता हूँ... आप मार्गदर्शन करेंगें?’ आशुतोष भाई ने तुरंत अपना हार्मोनियम उठाया और कुछ बिना शब्द के आलाप जैसे चिल्लाने लगे... गणित की ट्युशन धरी की धरी रह गई और उसके कान सुन्न हो गए सो अलग। एक रविवार की दोपहर अचानक आशुतोष भाई घर आए.आपनी साईकल पर... उन्होंने उसे आवाज़ लगाई... बंटी..(उसके घर का नाम बंटी था।) वह भागा हुआ बाहर पहूंचा तो उन्होंने कहा कि चल तुझे अपने गुरु से मिलवाता हूँ...। उसने चप्पल पहनी और अपनी एटलस गोल्डलाईन सुपर लेकर आशुतोष भाई के पीछे हो लिया। वह शहर के पीछे की तरफ एक मुस्लिम बस्ती में पहुंचे.. वहां एक गली में आशुतोष भाई आकर रुके.. उन्होंने अपनी साईकल को स्टेंड पर लगाया.. उसमे ताला लगाया...। बंटी ने भी उनके ठीक पीछे अपनी साईकल लगाई.. उसमें ताला लगाया...। आशुतोष भाई ने इशारे से बंटी को घर दिखाया... बाहर बोर्ड लगा हुआ था... “संगीत...” और एक वीणा बनी हुई थी... वह बोर्ड लगता था कि किसी आदिम खुदाई में निकला है... हर तरफ से उसका रंग झड़ चुका था... वह बोर्ड खुद बड़ी सहजता से दीवार का हिस्सा लगने लगा था। भीतर छोटे से कमरे में अशुतोष भाई ने एक बहुत बूढ़े आदमी के पैर पड़े... उसने भी उस बूढ़े के पैर पड़े.... ’ददा.. यह बंटी है... तबला सीखना चाहता है।“ धोखा... कृष्ण.. गोपियां... अचानक बंटी के पैर ढ़ीले पड़ गए। उससे रहा नहीं गया और उसने कहा कि... ’नहीं... ददा मैं बासूरी सीखना चाहता हूँ।’ आशुतोष भाई ने धूरकर बंटी की तरफ देखा.. बंटी ने अपना सिर नीचे कर लिया...। वह बंटी के पास आए और उसके कान में उन्होंने कहा... ’तू ददा का मज़ाक उड़ा रह है...।’ बंटी ने तुरंत ना में सिर हिलाया... ’ददा के मुंह में दांत नहीं हैं.. शरीर में हवा खतम है... कैसे सिखाएगें तेरेको वह बासुरी...?’ अंत में बंटी के हाथ तबला लगा। ’धा.. धिन.. धिन.. धा...’ से संगीत शुरु हुआ। ददा थोड़ा बताकर सो जाते.. वह तबला पीटता रहता। तभी टी वी पर उसने उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का ’वाह! ताज...’ वाला एडवरटाईज़मेंट देखा... उसके कृष्ण का बुखार काफूर हो गया और वह ’धा.. धिन.. धिन.. धा..’ की बजाए सीधा ’तिरकिट धा.. तिरकिट धा..’ बजाने लगा। ददा तिरकिट् पर नाराज़ हो जाते... ’यह क्या कुटुर-कुटुर करता है.. पहले सीधा तो बजा..’ इस बात पर पारुल को बड़ी हंसी आ जाती..। उसकी हंसी में संगीत होता... वह उसे सुनता और तुरंत तिरकिट धा.. तिरकित धा.. कर देता। पारुल गाति थी... वह उसकी संगत में तबला बजाता था। पारुल सुंदर सलवार-कमीज़ पहती थी...। एक दिन बंटी संगत करने उसके सामने बैठा था... तभी ददा को ख़ासी आ गई। आई (ददा की पत्नी) बाहर सब्ज़ी लेने गई हुई थी...। पारुल भीतर जाकर पानी ले आई.. वह भी खड़ा हो गया.. और ददा की पीठ पर हाथ फैरने लगा...। परुल ददा को झुककर पानी पिला रही थी.. तभी परुल की कमीज़ से उसने उसके वक्ष की एक झलक देखी..। कहीं से अचानक बंटी को मंद-मंद राग भोपाली सुनाई देने लगा... तभी उसे उस्ताद ज़ाकिर हुसैन दिखे... वह कृष्ण बनकर बासुरी पर राग भोपाली बजा रहे थे। सब कुछ थम गया... उसकी पलके भारी होने लगी... वह पूरा ज़ोर लगाकर उन्हें खुला रखना चाहता था.... पर वह बंद होना चाहती थीं....। वह इस दृश्य को भीतर गहरे में कहीं सजो लेना चाहती थी.. पर मन इस दृश्य को चखना चाहता था... खाना चाहता था... चबाना चाहता था। तभी अचानक पारुल ने अपना हाथ छाती पर रखकर अपने वक्ष को ढ़ांक लिया। बांसुरी बेसुरी हो गई... ज़ाकिर हुसैन गायब हो गए... वह जहां था वहीं बैठ गया। उस घटना के बाद कुछ भी सामान्य नहीं रहा.. उसकी निगाह पूरे वक़्त पारुल के वक्ष ही टटोलती रह्ती... वह उस दृश्य के पर पहुचने की कल्पना करने लगा। जब-जब उसकी निगाह पारुल से मिलती एक टीस उठती... असहनीय टीस.. मानों किसी ने हृदय पर एक धूंसा जड़ दिया हो...। दिन साईकिल के पहिये हो गए थे... जो बिना किसी हलचल के चलते रहते... दिन की साईकल अचानक संगीत क्लास में आकर रुक जाती.... और उसे लगता कि बस यही एक घंटे के लिए पूरा दिन होता है..सुबह होती है, शाम होती है, रात होती है.... इस एक घंटे दिन की साईकल रुक जाती है.... इसके खत्म होते ही... दिन की साईकल एक गोल चक्कर लगाती है.. जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है.... और वपिस यहीं इसी गली में रुक जाती है। कृष्ण लीला अब उसे बहोत पसंद नहीं आती.. कृष्ण आस-पास बहुत सी गोपियां होती.. ना.. यह ठीक नहीं है वह अपने दोस्तों से कहता... राधा और कृष्ण वाली बात उसे अच्छी लगती। जब भी वह पारुल के बारे में सोचता उसके जांधों के बीच वह हलचल महसूस करने लगता। एक दिन दिन संगीत क्लास के बाद उसने अपनी एटलस गोल्डलाईन सुपर... साईकल उठाई और घर की तरफ जाने लगा... पीछे से पारुल की आवाज़ आई... ’सुनो... रुको... साथ चलते है... तुम रोज़ भाग क्यों जाते हो..?’ वह रुक गया..। उसे पता था कि वह सिर्फ गली के अंत तक ही साथ चल सकते हैं.. उसके बाद वह दूसरी तरफ निकल जाएगी। ’कहाँ रहते हो तुम...?’ उसने चलते हुए पूछा... ’कसेरा बाज़ार में....’ ’कसेरे में कहां...?’ ’बाज़ार में...।’ उसने सहजता से जवाब दिया...। ’मैं भी आज उसी तरफ जा रही हूँ... मुझे महिला वस्तु भंडार जाना है...।’ तब पहली बार उसके पैर कपे थे...। उन दोनों के बीच में साईकल थी। वह कैसे पारुल को मना करे...। उसका घर बीच बाज़ार में है... लड़की के साथ चलते हुए सब लोग उसे देखेंगे...। वह महिला वस्तु भंडार के बगल में रहता है...। बंटी, छोटी, रग्धू, ठोंठा... बिक्की... सारे दोस्तों के चहरे उसके सामने धूमने लगे। उसके पैरों की कपकपी बढ़ गई। ’मेरा घर महिला वस्तु भंडार के पास ही है... मतलब बगल में है।’ ’अरे वाह! तो चलो तुम्हारा घर भी देख लेंगें...।’ और उसे अचानक अपना घर पहली बार गरीब लगने लगा। उसे अपने घर की दरारें याद हो आई...। ’तुम बहुत अच्छा तबला बजाते हो।’ ’अच्छा...।’ वह संवाद को कम से कम रखना चाहता था। उन दोनों ने अभी अभी बाज़ार में प्रवेश किया था। वह जितना हो सकता था उतना पारुल से दूर चल रहा था... उसने साईकल को भी बहुत अजीब ढ़ंग से पकड़ा हुआ था। कंधे कड़क थे... चहरे पर हवाईयां उड़ी हुई थी। लगभग हर आदमी उसे पहचान रहा था... धूर रहा था। उसने अपना सिर नीचे कर लिया...। बस वह महिला वस्तु भंडार के पास पहुंच ही गए थे कि तभी.... बंटी, छोटी, रग्धू, ठोंठा, बिक्की नहीं... उनसे भी खतरनाक चोटी... सामने से आता हुआ दिखा..। उसे मोहल्ले में ’चोटी पेपर’ कहते थे.. वह पूरे गांव की खबर रखता था.. और सारी खबरे... मसाला मारकर सबमें बांटता था...। ’ठीक है तो फिर कल मिलते हैं.. मेरा घर आ गया...।’ बंटी ने अचानक रुक कर कहा.. पारुल कुछ आगे निकल गई थी। चोटी.. उन्हें देखते ही सामने पान की दुकान पर रुक गया। ’अरे!! कौन सा घर है...?’ वह अपने घर के सामने खड़ा था पर उसने इशारा मुल्ला जी के घर की तरफ किया... जो उसके घर के ठीक सामने बना था। तीन मंज़िला.. मुल्ला जी ने यह घर अभी अभी बनवाया था। वह महिला वस्तु भंडार की तरफ बढ़ गई.. पर भीतर नहीं घुसी... वह पलटकर बंटी को देखने लगी। बंटी की एक निग़ाह चोटी पर भी थी जो पान की टपरी से हर एक हरकत नोट कर रहा था...। बंटी धीरे-धीरे मुल्ला जी के घर की तरफ बढ़ने लगा... उसने मुल्लाजी की घर के सामने अपनी साईकल खड़ी की... कुछ देर रुका.. देखा पारुल अभी भी महिला वस्तु भंडार के बाहर ही खड़ी है। चोटी समझ गया.. वह पान की टपरी से निकलकर थोड़ा बाहर की तरफ खड़ा हो गया.... वह एक नज़र पारुल पर डालता और एक बंटी पर...। बंटी, मुल्लाजी के घर की सीढ़ी चढ़ने लगा.. तभी उसके घर से उसकी मौसी बाहर निकल आई और उन्होंने चिल्लाया... ’बंटी बेटा कहां जा रहा है...?’ ’मौसे... वह...’ घबराहट में उसके मुंह से मौसी निकला...। सब खेल बिगड़ गया.. वह अपनी शर्मिंदगी छुपा नहीं पाया... और भागता हुआ अपने घर की तरफ बढ़ गया। मौसी की कुछ समझ में नहीं आया.... ’अरे साईकल वहां क्यों खड़ी कर दी...’ मौसी ने कहा पर तब तक बंटी दौड़ लगाता हुआ सीधा घर में घुस गया। चोटी हंसने लगा... पारुल महिला वस्तु भंडार नहीं गई.. वह वापिस अपने घर की तरफ चल दी...। चोटी उसे गली के अंत तक घूरता रहा। अकेले रहने की चाह पहली बार बंटी के भीतर उगी थी। वह कई दिनों तक संगीत क्लास नहीं गया, दोस्तों से नहीं मिला। वह पारुल के बारे में सोचता रहता... उसके वक्ष की तस्वीर उसके दिमाग़ में छप गई थी.. जब-जब पारुल के वक्ष दिखते उसके पैर कांपने लगते। एक दौपहर उसके कमरे का दरवाज़ा उसकी मौसी ने खटखटाया... आवाज़ आई कि कोई लड़की तुमसे मिलने आई है...। बंटी धबरहट के मारे सीधा बाथरुम में धुस गया... उसने जल्दी-जल्दी अपने बालों में पानी मारा, कंगी से बाल चिपाए और बाहर आ गया..। पारुल बाहर के कमरे में सोफे पर बैठी थी... बगल में मौसा जी एटलस लिए बैठे थे। मौसा जी को बड़ी आदत थी कि यह बताने की कि वह दुनिया के किस-किस देश में रहे हैं... वह भी उनके बगल में आकर बैठ गया..। पारुल ने उसकी तरफ यूं देखा मानों वह असल में मौसा जी से ही मिलने आई हो...। मौसा जी ने अपनी विदेश यात्राऒं में बंटी को भी शामिल कर लिया... बंटी यह बातें बचपन से सुनता आ रहा है सो वह कुछ खीजने लगा... पर चुप था..। उसके चहरे पर उस दिन के झूठ की शर्मिंदगी अभी भी थी। तभी भीतर से मौसी आईं और उन्होंने मौसाजी को किसी काम से बज़ार भेज दिया...। कुछ देर में मौसी भी चिल्लाती हुई चली गई कि मैं वर्षा की माँ से मिलकर आती हूँ। अचानक वह दोनों अकेले हो गए.. तब लगा कि असल में उनके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है.. बंटी पारुल को देखकर एक दो बार मुस्कुराया..पर पारुल गंभीर बनी रही... फिर अंत में पारुल ने कहा... ’तुम इतने दिनों से संगीत की क्लास में क्यों नहीं आए..?’ ’मैं कल से आऊंगा..’ फिर चुप्पी... ’अच्छा घर है तुम्हारा...।’ और वह चुप हो गया..। बंटी को रोना आने लगा.. अपनी गलती पर... वह उठा और अपने कमरे में चला गया। पारुल कुछ देर बाहर बैठी रही.. उसने बंटी को आवाज़ भी दी.... तीसरी आवाज़ पर बंटी का, रुंधे हुए स्वर में जवाब आया... ’आ रहा हूँ...।’ पारुल उठकर उसके कमरे में गई.... वह बाथरुम में था...। ’बंटी क्या हुआ...।’ ’मुझे माफ कर दो उस दिन मैंने झूठ कहा था घर के बारे में...’ ’अरे जाने दो... तुम बाहर तो आओ..’ ’मुझे माफ कर दो.. बस..’ ’अरे कर दिया माफ.. मुझे तो लगा शायद तुम्हारी तबीयत खराब है.. इसलिए पूछने आई.. ददा भी परेशान थे कि तुम अचानक नहीं आ रहे हो?’ उसने बाथरुम का दरवाज़ा खोल दिया..। बाहर आया तो वह पसीने-पसीने था। पारुल ने अपनी चुनरी से उसका चहरा पौंछा...। ’बच्चे हो तुम बिलकुल...’ अचानक बंटी ने उसके वक्ष को अपने बहुत करीब पाया..। उसके पैर बुरी तरह कांपने लगे..। पैर उसके शरीर का बोझ उठाने में असमर्थ थे... वह लड़खड़ाने लगा...। पारुल ने उसे पकड़ लिया..। जैसे-कैसे पारुल उसे पंलग तक ले गई। बैठते ही उसने अपने दोनों हाथ अपने घुटनों पर रख दिये.. पर घुटनों का कंपन बंद होने का नाम नहीं ले रहा था। पारुल को यह बहुत अजीब लगा.. उसने उसके घुटनों को छुआ.. छुते ही उसे गुदगुदी महसूस हुई वह हंसने लगी। उसने अपने दोनों हाथों से उसके घुटनों को रोकने की कोशिश की पर वह कंपे जा रहे थे...। उसकी हंसी में बंटी भी थोड़ा सहज हुआ... वह भी अपने घुटनों के इस तरह कांपने पर हंसने लगा। पारुल अचानक नीचे बैठ गई और उसने अपने दोनों हाथों से कस कर घुटने को जकड़ लिया... कंपना अब रह रह कर हो रहा था.. मानों उसका दिल उतरकर घुटने में आ गया हो... उसके घुटने धड़कने लगे थे। पारुल की हंसी अचानक रुक गई...। वह धीरे से उसके बगल में बैठ गई...। बंटी ने कांपते हाथों से उसकी कलाई को पकड़ा.. वह चुप रही.. उसने कलाई से अपने हाथ को धीरे धीरे खिसका कर उसके चहरे की तरफ ले गया...। ’यह क्या कर रहे हो बंटी..?’ यह क्या कर रहे हो बंटी सुनते ही उसके घुटनो का कंपन्न बंद हो गया और उसने अपनी जांघों के बीच हलचल महसूस की...। पारुल के दोनों हाथ मृत पड़े थे... ’बंटी यह ठीक नहीं है...’ यह सुनते ही अजीब सा ज्वर बंटी ने महसूस किया...। उसने पारुल को अपने बिस्तर पर लिटा दिया... और उसके ऊपर चढ़ गया। पारुल ने अपनी आँखे बंद कर ली... बंटी उसे बुरी तरह चूमने लगा...। कुछ देर बाद उसे पारुल के वक्ष याद आए... उसने चुनरी को खींचकर अलग कर दिया। चुनरी हटते ही वह क्या करे उसकी समझ में नहीं आया...। तभी पारुल की सांसे रुकने लगी... वह असहज हो गई.. वह अपने हाथों के ज़ोर से बंटी को अलग कर देना चाहती थी... पर बंटी पर पागलपन सवार था..। तभी उसे ध्यान आया कि घर के सारे दरवाज़े खुले हुए हैं...। वह दरवाज़ा बंद करने के लिए उठा तभी उसे मौसा जी भीतर आते हुए दिखाई दिये और सब खत्म हो गया। वह भागता हुआ, डर के मारे कमरे से बाहर निकल आया... उसने पारुल को वहीं... वैसा का वैसा छोड़ दिया। मौसा जी उसे सामने दिखे... उसे समझ में नहीं आया कि वह क्या कर तो वह सीधा किचिन में चला गया। मौसा जी वहीं खड़े रहे... पारुल उसके कमरे से निकली और सीधे घर के बाहर निकल गई। मौसा जी सन्न खड़े रहे... उनकी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हुआ? बहुत दिनों के बाद एक शाम मौसा जी ने बंटी से माफी मांगी थी। बंटी को पहली बार महसूस हुआ कि खुद के भीतर एक भरा पूरा संसार है। उसका संसार नदी की तरह है। जब गोता लगाओ तो पता लगता है.. बहुत गहरे सब कुछ हरा है.. और उस हरेपन के भी परे सब अंधेरा है...। वह भीतर जाता जा रहा था... भीतर अंधेरे के करीब उसे अपनी ही दो आँखे दिखती थी.. खुद उसको देखती हुई...। वह डर जाता... पर उसे रहस्य में सुख दिखने लगा था...। उसे दो आँखों के अगल-बगल पारुल के वक्ष भी दिखाई देते हैं.. पर उनके दिखने से उसके पैर नहीं कांपते..। पारुल का सामना करना खुद अंधेरे में अपनी आँखों का सामना करन जैसा था... वह डरता था.. सो बहुत दिनों तक वह संगीत क्लास नहीं गया। एक दौपहर वह संगीत क्लास के सामने खड़ा था। भीतर से पारुल के गाने की आवाज़ आ रही थी। तीन-ताल... वह इस उसकी इस राग पर तीन ताल बजाता था... तीन ताल बज रहा था। उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी जगह किसने ले ली... वह भीतर पहुंचा तो आशुतोष भाई तीन ताल बजा रहे थे। वह एक कोने में जाकर बैठ गया। पारुल ने गाते हुए उसको कुछ युं देखा जैसे जानती ही ना हो... आशुतोष भाई ने उसकी उपस्थिति भी दर्ज नहीं की। बंटी को लगा कि उसका आना किसी को ठीक नहीं लगा... राग खत्म होने पर आशुतोष भाई ने पारुल की तारीफ की... ददा ने उसक हाल पूछा... पारुल चुप रही...। कुछ देर में पारुल उठी, उसने ददा के पैर छुए.. और बाहर निकल गई... वह भी उठा.. उसने ददा के पैर छुए और जाने को हुआ... ’सुनों बंटी तुम रुको.. तुमसे बात करनी है...।’ पारुल बाहर उसके चलने का इंतज़ार कर रही थी..। वह दहलीज़ पर खड़ा रहा.. उसने पारुल को देखा... पारुल समझ गई..। वह मुस्कुराई और अकेली जाने लगी। बंटी की इच्छा हुई कि वह तबला उठाकर आशुतोष भाई के सिर पर मार दे और पारुल के साथ चला जाए.... पर नहीं.. अच्छे लड़के ऎसा नहीं करते.. वह डरते हैं.. वह डरपोक होते हैं.. वह भी अच्छे लड़के होने की लाईन में था... पूरा बचपन इसी संघर्ष में बीता था... और उसे पता था कि वह ऎसा ही बीतेगा। वह एक अच्छे लड़के की तरह दहलीज़ के इस तरफ ही रहा.... उसने दहलीज़ पार नहीं की...। आशुतोष भाई ने ददा के पैर छुए और बंटी को अपने साथ चलने का इशारा किया। बंटी आदेशानुसार उनके पीछे हो लिया.... गली में उनकी बात चीत... ’तो कैसा चल रहा है संगीत?’ आशुतोष भाई बोले... ’सही... ठीक.. अच्छा।’ हकलाते हुए उसने कहा... ’पारुल अच्छी लड़की है।’ ’हें!!!’ ’क्यों तुम्हें अच्छी नहीं लगती?’ ’हाँ.. मेरा मतलब है कि.. अच्छा गाती है।’ ’अच्छा तुम्हें उसका गाना अच्छा लगता है?’ ’ठीक गाती है आशुतोष भाई...।’ ’क्यों तुम अच्छा बजा लेते हो?’ ’हें!!!’ ’उसे संगत देते हो ना!! ददा बोल रहे थे खुद को ज़ाकिर हुसैन समझते हो तुम।’ ’मैं??? नहीं भईया।’ ’पारुल के बाप के बारे में जानते हो?... डॉक्टर है वह.... अंग्रेज़ी कुत्ते हैं उनके घर में... पारुल अपने कुत्तों से भी अंग्रेज़ी में बात करती है..। तुम्हें माय नेम इज बंटी के अलावा कुछ और कहना आता है?’ बंटी समझ गया था कि यह बात कहां जा रही है... वह अपनी शर्ट के तीसरे बटन को देखने लगा... और मौन हो गया...। वह अब पश्चाताप कर रहा था... काश वह पहले ही तबला उठाकर आशुतोष भाई के सिर पे दे मारता तो अभी इन सारे सवालों का उसे सामना नहीं करना पड़ता। ’हें....!!! क्या हुआ!! जवाब दो!! कितनी अंग्रेज़ी आती है तुम्हें...। कहीं पारुल के कुत्तों को घुमाना पड़ा तो माय नेम इज बंटी से काम नहीं चलेगा... क्या? पारुल के कुत्ते घुमाना चाहते हो?’ ’मैं क्यों घुमाऊंगा उसके कुत्तों को... भाईया?’ ’अच्छा तो उसे घुमाना चाहते हो?..... हें??? क्या कह रहा हूँ.. सुन रहे हो?’ आशुतोष भाई की आवाज़ में गुस्सा भर गया था। बंटी की ठुड्डी कांपने लगी थी... आँखें पाने फेंकने लगी थी। ’उस बेचारे बूढ़े आदमी के सामने.. जिसे दिखता भी कम है.. तुम यह सब घटिया काम कर रहे हो? हें? क्या उम्र है तुम्हारी...? तबला सीखने निकले थे जनाब पर सीख कुछ ओर ही गए... क्या करें?’ बस इस बात पर बंटी आपने आंसूओ को रोक नहीं पाया... वह ज़ार-ज़ार रोने लगा। आशुतोष भाई अब चुप हो गए थे... उन्होंने बंटी को उसके घर तक छोड़ा... घर के सामने रुककर उन्होंने बंटी के सिर पर हांथ फैरा और कहा... ’वह सामने मुल्ला जी का घर है... तुम्हारा घर यह है.. पता है ना तुम्हें?... कल से सुबह का समय करा लो... और तबला बजाने पे ध्यान दो...।’ बंटी अच्छे लड़के की तरह चुपचाप आशुतोष भाई की बातें सुनता रहा...। कुछ देर में सिर नीचा करके वह घर में घुस गया। उसे लगा कि इस पूरे गांव में वह सबसे पापी लड़का है..। वह इस बात का पश्चाताप करना चाहता था। उसने मौसा जी से पाप के प्राश्चित के संबंध में बातें की... मौसा जी ने के कहा कि काले महादेव पर जाओ और सच्चे मन से यदी माफी मांगोगे तो वह माफ कर देंगें...। मौसा जी के कहने पर वह हर दौपहर काले महादेव पर जाकर बैठ जाता.... घंटों माफी मांगता.. पर पारुल के वक्ष हर कुछ देर में उसे अपनी आँखों से सामने दिखने लगते... वह खुद का सिर पीटता... फिर काले महादेव से माफी मांगता कि देखो आपके पास भी मैं वही सब सोच रहा हूँ.. कितना बड़ा पापी हूँ मैं....। उसे लगा कि इस पाप से शायद छुटकारा नहीं है... उसे कुछ ओर करना पड़ेगा..। उसका खाना पीना सब गड़मड़ हो गया था... आँखों के नीचे गहरे काले गढ़ढ़े उभर आए थे.... पर वह रोज़ सुबह संगीत क्लास में जाता था... ददा जो कहें वह उसे आँखें नीची करके स्वीकार कर लेता था। उसे ज़ाकिर हुसैन या कृष्ण.... कुछ भी नहीं बनना था... वह गायब हो जाना चाहता था.. अदृश्य... बहुत अधिक गुस्से में वह कल्पना करता कि वह अशुतोष भाई के सिर पर तबले फोड़ रहा है... पर यह भी उसे बहुत गहरे पाप से भर देता... वह फिर इस पाप का प्राश्चित करने काले महादेव पर जाकर बैठ जाता। एक सुबह वह बेमन तबला पीट रहा था कि उसे दरवाज़े पर पारुल खड़ी दिखी..। एक टीस उठी.. मानों किसी ने एक कील उसके हृदय में गाढ़ दी हो...। बंटी का चहरा बिगड़ गया.... पारुल उसके सामने नहीं बल्कि बगल में आकर बैठ गई...। ददा उसे देखकर खुश हो गए...। वह काले महादेव को भूल गया.. अपने सारे दिनों के प्राश्चित भूल गया...। उस दिन जो बंटी के कमरे में घटा था वह अब बंटी और पारुल का राज़ बन गया था... पर वह राज़ भी रहस्य था दोनों के लिए.. उस रहस्य एक तार की तरह दोनों को एक दूसरे की तरफ खींच रहा था। बंटी के पास पारुल को सीधे देखने का साहस नहीं था... पर वह वापिस सांस ले सकता था... उसे भूख लगने लगी थी... उसे लगा कि पता नहीं कितने दिनों से उसने खाना नहीं खाया है...। पारुल ने गाना शुरु किया और वह तबले पर ज़ाकिर हुसैन बन चुका था...। संगीत क्लास के बाद दोनों गली के छोर तक चुप-चाप पहुंच गए। बंटी दांए मुड़ गया और पारुल बांए...। दांए मुड़ते ही बंटी ने एक गहरी सांस बाहर छोड़ी... जैसे वह अभी तक सांस रोके चल रहा था... तभी पारुल ने आवाज़ लगाई...। ’बंटी... मुझे महिला वस्तु भंडार पर कुछ काम है.. मैं तुम्हारे साथ चलूं?’ बंटी ना कहना चाहता था पर उसका सिर हा.. में हिल गया...। पारुल उसके साथ हो ली...। इस बार बंटी को डर नहीं था.. उसके दिमाग़ में उसका एक भी दोस्त नहीं आया... वह मुस्कुरा रहा था...। इसी बीच पारुल ने अपने संगीत के रजिस्टर से निकालकर उसे एक मोर का पंख दिया... ’यह मैं अगले दिन तुम्हारे लिए लाई थी.. पर तुमने तो आना ही बंद कर दिया था.. तो...’ ’बहुत सुंदर है यह...।’ बंटी ने बात काट दी.. और मोर के पंख को निहारता रहा। ’एक चीज़ और है...!!!’ उसने अपने बेग़ से एक छोटी सी डायरी दी...। यह भी तुम्हारे लिये है...। बंटी ने देखा उस डायरी के पहले पन्ने पर कुछ लिखा है जिसे पढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई..। उसने सीधा उस डायरी को जेब में रख लिया। ’एक चीज़ और है...!!!’ उसने बेग़ से एक पेन निकाला। ’बस मैं इतनी सारी चीज़े नहीं ले सकता।’ ’रख लो तुम्हारे ही लिये हैं...।’ बंटी ने पेन भी रख लिया। उस पेन पर किसी दवाई की कंपनी का नाम लिखा था.. फिर उसे याद आया कि उसके पिताजी डॉक्टर हैं... और उसे अचानक आशुतोष भाई की बातें याद हो आईं। ’तुम्हें पता है ना कि मुझे अंग्रेज़ी नहीं आती है?’ ’क्या...?’ ’और मुझे कुत्ते भी बहुत पसंद नहीं हैं।’ पारुल की कुछ समझ में नहीं आया। बंटी घोषणा कर चुका था... सो हल्का होकर मुस्कुरा रहा था.. पारुल हंसने लगी.. वह भी उसके साथ हंसने लगा। महिला वस्तु भंडार पर पारुल कुछ देर चूड़ियों के दाम पूछती रही.. फिर बिंदी का एक पत्ता लेकर वह वापिस हो ली। बंटी नए कपड़े बदलकर अपने घर के दरवाज़े पर खड़ा था। पारुल बंटी को देखकर हंस दी...। बंटी ने भीतर जाते ही पाकेट डायरी खोली.. खोलते ही उसे डर लगा सो उसने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया। पहला पन्ना पलटाया... उसपर लिखा था.. ’तबलची बंटी के लिए...’ और नीचे एक हंसता हुआ चहरा था। उसी पन्ने के आखिरी कोने पर उसने अपना नाम लिखा था.. पारुल...। बंटी रात भर मोर के पंख को अपने सिरहाने रखकर निहारता रहा। उसके दिनों में जैसे किसी ने शक्कर घोल दी हो... हर चीज़ मीठी थी... हर उपस्थिति पूर्ण थी। अगली सुबह वह पारुल के सामने बैठा था..। पारुल ने देखा कि उसका दिया हुआ पेन बंटी ने अपनी शर्ट की जेब में खोसा हुआ है। ददा उसे नई ताल सिखा रहे थे.. पर उसका ध्यान पारुल पर था। तभी आशुतोष भाई दरवाज़े पर प्रगट हुए। कभी-कभी सपने बड़ी बेरहमी से टूटते हैं... उनके टूटने की आवाज़ सालों तक कान में गूंजती रहती है। इसके बाद सब कुछ शांति से निपट गया। आशुतोष भाई ने फिर बंटी के साथ चलते-चलते प्रश्नों की झड़ी लगा दी... बंटी फिर रोया.. फिर पचताया.. इस बार वह आशुतोष भाई के सिर पर तबले के साथ-साथे हारमोनियम भी फोड़ देना चाहता था। अंत में आशुतोष भाई अड़ गए कि वह तुम्हारी गुरु बहन है... अपनी बहन के साथ तुम.... इसके बाद बंटी को कुछ सुनाई नहीं दिया... बंटी ने अंत में कहा कि... ’पारुल बहन है मेरी.. आशुतोष भाई... माफी...’ तब जाकर आशुतोष भाई शांत हुए..। बात काले महादेव के हाथों से छूट चुकी थी... बंटी को लगा कि वह माफी मांगने लायक नहीं है...। इन सब बातों का सिला यह हुआ कि उसने पहली फुर्सत में संगीत को जीवन से अलविदा कहा... और उस वक़्त के फैशन के हिसाब से वह बाज़ार से सलफाज़ की गोलियां खरीदकर ले आया....। कई रात वह उन गोलियों को अपने तकिये के नीचे रखकर सोया... गहन उदासी के लम्हों में वह उन्हें निकालकर देखता... और वापिस रख देता। एक शाम मौसा जी उसके कमरे में आए... बंटी अपने पलंग पर चित्त पड़ा था। मौसा जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा वह हड़बड़ाकर उठा... ’मैं घाट धूमने जा रहा हूँ... तबियत कुछ नासाज़ लग रही है.. तुम चलोगे...?’ बंटी बिना कुछ कहे उनके साथ चल दिया। वह दोनों नदी किनारे बैठे थे.. आरती का समय हो गया था... पीछे मंदिर में आरती और घंटो की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बंटी बहुत शांत था... मौसा जी को रज्जू की दुकान के पेड़े बहुत पसंद थे.. आते वक़्त वह पाव भर खरीद लाए थे...। अपने हिस्से के पेड़े वह खा चुके थे.. बंटी के हिस्से के पेड़े अभी भी वैसे ही पड़े थे। बंटी उन्हें चखकर भूल गया था। ’अरे बंटी... पारुल मिली थी बाज़ार में.. मुझे लगा उसने मुझे पहचाना नहीं... या शायद भूल गई हो...।’ मौसा जी ने ज्यों ही पारुल का नाम लिया बंटी भभक कर रोने लगा। बंटी शर्म के मारे नदी पर चला गया और अपना मुँह धोने लगा। मौसा जी अपने जगह पर ही बैठे रहे। बंटी के हिस्से के पेड़े उन्होंने उठाकर अपने पास रख लिये..। कुछ देर में बंटी वापिस आया... मौसा जी चुप रहे... बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला...। असहजता मौसा जी से बर्दाश्त नहीं हुई सो वह पेड़े खाने लगे..। ’मैं बहुत परेशान हूँ मौसा जी..।’ अंत में बंटी बोला... ’क्या बात है...?’ ’जाने दो...’ ’बड़ी ज़ालिम उम्र में हो.. इस वक़्त बहुत कुछ कर गुज़रने का मन करता है.. प्रेम से लेकर रेवेल्यूशन तक सब कुछ...सब कुच लगता है कि मुठ्ठी में है.. तुम मुठ्ठी खोलोगे और वह सब वहां पड़ा मिलेगा जो भी तुमने सोचा था... और मज़े की बात है कि मिलता भी है... पर हर चीज़ जो मिलती है उसकी एक क़ीमत होती है.. वह क़ीमत चुकानी पड़ती है.... उसका कोई पार नहीं है...। सच कहता हूँ यह ज़िंदग़ी बहुत लंबी है... हद से ज़्यादा लंबी... बहुत टाईम है तुम्हारे पास... इतनी जल्दी मुठ्ठी मत खोलो...।’ इन शब्दों ने बंटी पर बहुत असर छोड़ा...। बंटी खुद को मौसा जी के बहुत करीब महसूस करने लगा। संगीत... कृष्ण... उस्ताद ज़ाकिर हुसैन... वह सब भूल चुका था... पर पारुल उसे याद थी...। उसका दिया हुआ पेन, मोर का पंख और डायरी... सब वह अपने पास रखता था.. संभालके। एक दिन पारुल, महिला वस्तु भड़ार के बहाने बंटी के घर आई...। मौसा जी ने उसे अंदर बुलाया.. चाय पिलाई.. जब उसने बंटी के बारे में पूछा तो.. मौसा जी ने उसे बताया कि वह तो शहर जा चुका है.. उसका एडमिशन बोर्डिंग स्कूल में हमने करा दिया..। पारुल ने चाय वहीं छोड़ दी और वह उठकर चली गई। मौसा जी और बंटी ख़तों से एक दूसरे के संपर्क में रहते थे.. पर मौसा जी ने कभी बंटी को पारुल के आने की बात नहीं बताई..।

त्रासदी... (भाग-एक)

(कहानी शायद पांच भागो में है... सो भाग-एक यह रहा.....) बीमार... सुबह पांच बज रहा होगा। वह बिना आवाज़ किये तीसरी बार बाथरुम जा रहा था। बाथरुम का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं होता था.... दरवाज़े और चौखट की लकड़ी आपस में अटक जाती थी। मौसी ने कहा था कि दरवाज़े में चिटकनी लगाने की ज़रुरत नहीं है बस उड़का दे...। बिना चटकनी लगाए कोई कैसे पैखाना जा सकता है...। तीनों बार उसने ज़ोर लगाकर चटखनी लगा दी। पिछले पचास सालों की आदत का वह क्या कर सकता था...? बिना चटकनी लगाए वह कभी हगा नहीं था.... यूं भी घर में उसके और मौसी के अलावा कोई नहीं था... पर दरवाज़ा तो था... और उसका पूरी तरह बंद होना एक सुरक्षा प्रदान करता है... जब तक वह सुरक्षित महसूस नहीं कर लेता उसका पेट साफ होना असंभव था। तीसरी बार दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था... उसने बहुत ज़ोर लगाया पर वह अटका रहा... सोचा मौसी को आवाज़ लगा दे... उसका अनुमान था कि मौसी दरवाज़े की पहली ही आवाज़ में जाग गई थीं... पर यह महज़ अनुमान ही था। वह रुक गया..। बाथरुम में कपड़े और नहाने का साबुन साथ रखा था.. एक के ऊपर एक। कुछ भीगे हुए कपड़े एक छोटी हरे रंग की बाल्टी में रखे हुए थे। आईना अपने कोनों में ज़ंग खाकर खत्म हो चुका था...पर ठीक बी़च में वह अपना चहरा देख सकता था... उसने अपनी उंग्लियों से आईने के कोनों को छुआ.... खुरदुरे... मटमैले... कत्थई कोने। आईने को अपनी हद कैसे पता है? कैसे उसे पता है कि इस सीमा के बाद चहरा शुरु होता है..? उसने अपने चहरे को ध्यान से देखा... शायद साफ आईना होता तो वह यह ना करता... झुर्रियां...अपने चहरे की झुर्रियां.. आँखों के कोने... माथे की तरफ... पचास साल के गहरे होते निशान। उसने कुछ और कोशिश की... पर दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था। हारकर उसने आवाज़ लगाई...’मौसी... मौसी...’ उस तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई..। शरीर में कमज़ोरी इतनी आ गई थी कि दो आवाज़ में ही पेट गुडगुडाने लगा... उसने दरवाज़े को फिर धक्का मारा और चिटकनी लगा दी...। पर इस बार पहले उल्टी हुई... रात का, सुबह का पिया हुआ सारा पानी बाहर निकल आया... सिर्फ पानी। तभी मौसी ने दरवाज़ा खटखटाया... ’इंदर... इंदर तूने ठीक है...?’ ’मौसी दो मिनट...’ ’अरे चिटकनी लगाने को मना किया था... इंदर... इंदर...।’ इंदर ने चिटकनी खोली...। मौसी बाहर से ऎसे धक्का दे रही थीं मानो दरवाज़ा तोड़ रही हो...। दरवाज़ा खुलते ही इंदर लड़खड़ा गया...। हाथ फिसलकर छोटी हरी बाल्टी में चला गया...। मौसी ने भीतर आकर उसे सहारा दिया...। खड़े होते ही वह थक गया... मानो कई हज़ार सीढ़ियां चढ़ा हो....। वाशबेसिन का सहारा लेकर वह खड़ा हो गया..। मौसी उसके बगल में उसे सहारा दिए खड़ी थीं...। ’क्या हुआ इंदर...?’ तभी इंदर के दिमाग़ में आया मौसी यह सामने ज़ंग खाया आईना कैसे देखती होंगी...? उन्हें अपना चहरा देखने के लिए किसी चीज़ पर चढ़ना पड़ता होगा... किस चीज़ पर? वह अचानक पूरे बाथरुम में वह चीज़ तलाशने लगा.. ’क्या हुआ इंदर कुछ गिर गया क्या?... अरे तेरा तो पूरा शरीर तप रहा है....। तू चल अभी.. अस्पताल चलते हैं... चल...।’ मौसा जी की मृत्यु छह महीने पहले ह्रिदय गति रुक जाने की वजह से हुई थी। वह तब महज़ दो दिनों के लिए आ पाया था। जल्द आने को कह गया था... पर जल्द नहीं आ पाया....। ऑफिस... काम... संबंध... व्यस्तता.. आलस... बोरियत... कमीनापन... और खुद के साथ रहने की थकान... यह सारे कारण मिलाकर भी पूरा कारण नहीं बनता जिसे वह मौसी को कह सके? मौसी ने भी एक बार ही पूछा... वह खिसिया दिया.. मौसी ने बात बदल दी..। वह नहीं आना चाहता था... वह अभी भी नहीं आना चाहता था... वह कुछ नहीं जैसी निर्थकता में कहीं चरता रहना चाहता था...। ऎसी निर्थकता में आदतन सब कुछ हो रहा होता है... वह आदतन जी रहा था... इस आदत में कहीं हज़ारों लोग अचानक मर जाएं... या घर में चूहा आकर नई शर्ट कुतर डाले... दोनों ही पीड़ा का एक छोटा बुलबुला बनाते और वह बुलबुला दृश्य होते-होते फूट पड़ता..। बुलबुले के भीतर से जो दुनिया थोड़ी सी विकृत दिखने लगी थी... कुछ ही देर में सामान्य हो जाती... फिर सब कुछ वैसा का वैसा होने लगता...। मानों कोई देखी-दिखाई फिल्म चल रही हो... जिसके सारे दृश्य पता हो... सारे आश्चर्य अभिनय हों... सब कुछ जिया जा चुका हो... फिर भी रोज़ भूख लगती हो.... और रोज़ वही, एक ही जैसे स्वाद की स्मृति उसे खाने और हगने के चक्र के बीच में खड़ा कर देती हो। वह मौसी के साथ अस्पताल की और चल दिया..। दो गलि छोड़कर एक प्रायवेट अस्पताल था...। कुछ दूर चलते हुए वह रुक गया...। मौसी के हाथ में पानी की बोतल थी.. ’पानी पी ले...’ उसने मना किया और धीरे-धीरे चलने लगा..। पौ फटी थी... चौक पर अख़बार वालों की हलचल थी..। बहुत सी साईकिलों के बीच अख़बार वाले अपने-अपने अख़बार छांट रहे थे... ताज़ा खबरें.. सुर्खियां.. सब ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं..। ट्न..ट्न..ट्न.. की आवाज़ से उसकी निग़ाह पीछे चाय की दुकान पर चली गई... ऎसी सुबहों में उसे चाय पीना बहुत पसंद था... पर अभी चाय की कल्पना भी उसे बाथरुम याद दिला रही थी... उसने वहां से निगाह हटा ली..। उसके सामने एक काले रंग का कुत्ता चला आया... वह उसके साथ-साथ चलने लगा.. उसे कुत्ते बहुत पसंद नहीं थे... उसे ख़ीज होने लगी...। मौसी ने एक पत्थर उठा लिया... कुत्ता दुम नीची करके एक किनारे हो गया... पर कुछ दूरी बनाए वह पीछे-पीछे चला आ रहा था। ’शेखर अस्पताल’ उस बिल्डिंग में कई जगह लिखा था..। सामने लोहे का शटर था.. जो बंद दिख रहा था.. पर कोई ताला नहीं था। भीतर वीराना था.. सिर्फ एक ट्युबलाईट की रोशनी रिसेप्शन से चारों और फैली थी.. पर डेस्क पर कोई नहीं बैठा था। मौसी ने पानी की बोतल को इंदर के हाथों में पकड़ा दिया और खुद ज़ोर लगाकर शटर खोलने की कोशिश की.. पर वह कहीं अटक रहा था। फिर उन्होंने हारकर आवाज़ लगाई..। एक आदमी हाथ में बड़ी सी झाडू लिए चला आया... उसने एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया..। जैसे ही इंदर ने अंदर प्रवेश किया... वही अस्पताल की बू,, उसके पूरे जिस्म में फैल गई..। दवाईया.. पसीने... खून.. पिशाब.. मृत.. ज़िदा.. बीमार बू...। कोमा में अपनी बहन के साथ बिताया समय.. हेपेटाईटिस-बी से लड़ते हुए पिताजी के अंतिम कुछ साल... अपनी पत्नि की टी.बी.... पीलिया की दौड़धूप... बहुत से दोस्तों के मौसी-बाप.. खून देना.. लाश उठाना.. पोस्टमार्टम.. बू.. बू.. बू...। कमरा नंबर एक सौ चार... लिफ्ट काम नहीं कर रही थी.. उसे पहले माले पर सीढ़ी से ही जाना था। वह धीरे-धीरे सीढ़ी चढ़ने लगा..। मौसी उसकी बीमारी के पहले सुस्त थी अब वह बहुत फुर्ती में आ गई थीं... उन्हें एक काम मिल गया था... कुछ लोग होते हैं जिन्हें लोगों की चिंता करने में सुख मिलता है...। मौसी सीढ़ी चढ़ने में भी इंदर की मदद करना चाहती थीं... अपनी पूरी चिंता से... वह कभी इंदर के आगे चलती कभी उसके बगल में चलते हुई उसका हाथ पकड़ लेतीं तो कभी पीछे-पीछे चलने लगतीं..। इंदर रुक गया.. ठीक वैसे ही जैसे वह सुबह कुत्ते के सामने रुका था... उसने मौसी को आगे जाने का इशारा। मौसी जल्दी-जल्दी सीड़ी चढ़ गईं..। वह कमरा नम्बर एक सौ चार के सामने रुकी थीं....। भीतर एक औरत बिस्तर की चद्दर बदल रही थी। वह लेटना चाहता था... उसके पैर जवाब दे रहे थे.. पेट में रह-रह कर मरोड़े उठ रही थीं। उसके कमरे के ठीक सामने कमरा नम्बर एक सौ तीन था... जिसका दरवाज़ा हल्का खुला हुआ था..। बिस्तर पर कोई लेटा था और उसके हाथ आकाश की तरफ उठे हुए थे। उसने थोड़ा ध्यान से देखा वह किसी लड़की के हाथ थे.. पतले... एक हाथ में घड़ी थी.. वह अपनी उंगलियों से हवा में कुछ बना रही थी... या किसी का नाम लिख रही थी... उसकी बहुत इच्छा हुई उसका चहरा देखने की... पर दरवाज़ा बहुत कम खुला हुआ था.. वह हल्का दाईं ओर झुका.. पर उस लड़की की ठुड्डी ही दिखाई दी बस... तभी उसने आकाश में कुछ बनाना रोक दिया... मानों उसे मेरी आँखों की चुभन महसूस हुई हो... उसने झटके से अपना सिर उठाया और सीधा उसकी और देखने लगी...। वह चौंक गया.. पकड़ा गया... ’वह मेरी मौसी को बता देगी...’ वाला गिल्ट उसके भीतर मरोड़ की तरह उठा.. वह सीधा कमरा नम्बर एक सौ चार में घुसा और खुद को बाथरुम में बंद कर लिया। अस्पताल... इसका एक केरेक्टर होता है..। सरकारी अस्पताल अपनी पूरी गंदगी में आपके चहरे पर होते हैं... और प्रायवेट अस्पताल, अस्पताल जैसा ना दिखने की ज़िद्द, आपको डरा देती है। इंदर समर्पण कर चुका था..। उसने अपना बटुआ मौसी को दे दिया था.. जब वह आँखें खोलता मौसी लोगों में उसे पैसे बाटती हुई दिखतीं...। कई बाटल ड्रिप और कई बार हगने के बाद... उसके सामने अंग्रेज़ी से संघर्ष करता हुआ एक डाक्टर आया.. उस डाक्टर के अगल बगल में बहुत से उसके चम्चे जैसे असिस्टेंट थे...। डाक्टर बिल्कुल डाक्टर के जैसा दिख रहा था... जैसे हमारे देश में जो चीज़ जैसी है बिल्कुल वैसी ही दिखती है...। उस डाक्टर की पतली सी काली मूछें... साफ चमकदार शर्ट.. अभी-अभी काले किये हुए बाल.. हल्की तोंद... कस कर बांधा हुआ ढ़ीला पेंट... काले चमकदार जूते.. और शरीर से आती हुई... अमृत जैसी खुशबू...। ’हाउ आर यू फीलिंग सर...?’ डॉक्टर ने बहुत करीब आकर पूछा...। इंदर कुछ कहने को हुआ उसके पहले ही डॉक्टर ने अपने असिस्टेंट से ’खुसुर-पुसुर’ जैसी ध्वनी में तीन बातें कहीं और तेज़ कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ तीन की तरफ निकल गया। कितना सस्ता है सब कुछ... इंदर ने सोचा... मेरा अब तक का जिया हुआ। एक क्षण में यह खुशबूदार आदमी कह सकता है कि अब बहुत मुश्किल है... और सब कुछ झड़ जाएगा... मेरा सारा बिखरा हुआ.. बटा पड़ा इंदर.. एक थड़ की आवाज़ के साथ खत्म हो जाएगा..। शायद कोई आवाज़ भी ना हो... ठीक उस क्षण से मैं अतीत की किसी गुफा में ज़बर्दस्ति घुसेड़ा जाऊंगा... जहां मौसा जी गायब हुए हैं... वहां शायद मुझे वह मिलेंगे.. क्या मैं वहां भी उनसे वही व्यस्तता का अभिनय करुंगा..। अपना सस्ता.. सुस्त.. घटिया अभिनय...। मौसा जी पिछले कुछ सालों में बहुत चुप रहते थे.. मौसी चुप्पी से ठीक उलट थीं... वह महिलाओं के साथ गप्पबाज़ी में अपना मनोरंजन ढ़ूढ़ने लगी थीं...। मौसाजी के ख़त मुझे हर कुछ समय में मिल जाते थे... कुछ अधूरे पढ़े और कुछ अभी तक नहीं खोले हैं। वह सो चुका था..। डॉक्टर के जाते ही उसकी गहरी नींद लग गई थी। मौसा जी सपने में आए थे.. वह बहुत सुस्त लग रहे थे.. वह अपने सारे ख़तों को लेकर उसके पास आए थे... वह व्यस्त है वह कहता रहा पर वह इंतज़ार कर रहे थे..। वह अपने ऑफिस की खिड़की से देखता.. वह बिल्डिंग के नीचे खड़े उसकी राह तक रहे हैं.। इंदर हड़बड़ाकर उठ गया.. उसने उठते ही दो तीन बार अपनी आँखें घिंसी.... क्या हुआ? कितना बजा है? देखा बग़ल के तख़त नुमा पलंग पर मौसी नहीं है.. उस छोटी सी गुफा रुपी कमरे में कोई भी नहीं था..। उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी.. उसे लगा कि यह अतीत की गुफा है, अतीत का कमरा... जिसमें उसे ज़बर्दस्ती ढ़ूंसा जा रहा है... उसने चिल्लाया...। ’नर्स.. नर्स... सिस्टर.. सिस्टर...’ एक वृद्ध महिला आई जिसकी आवाज़ में मौसी सा अधिकार था... ’क्या है?.. आराम करो.. अभी बहुत ड्रिप लगने हैं...।’ ’बाथरुम...’ बस एक यह ही शब्द काम करता था। नर्स ने थोड़ा मुंह बनाया.. उसके हाथ से सिरिंज निकाली... उस सिरिंज को वापिस बोतल में ठूंसा. और एक छोटा सा ढ़क्कन उस सिरिंज की जगह लगा दिया। ’जाओ.. हो जाए तो आवाज़ लगा देना...।’ ’जी....।’ सिस्टर/नर्स तेज़ कदम ताल करती हुई निकल गई। उसे बाथरुम नहीं जाना था.. वह किसी एक इंसान से बात करना चाहता था। इस दुनिया के इंसान से... वह सपने में था जो बहुत ही असल सा था..। वह बहुत कमज़ोरी महसूस कर रहा था...। पीठ में टी शर्ट चिपकी हुई थी... पसीने से... उसने सोचा फ़ेन चालू कर दूं... तभी उसकी निग़ाह कमरा नम्बर एक सौ तीन के दरवाज़े पर गई... वह दरवाज़ा पिछली बार से कुछ ज़्यादा खुला हुआ था। वहां कोई है... कोई ऎसा जो इसका इंतज़ार कर रहा है... जो इसे जानता है.. शायद मौसा जी हों अपने ख़त लेकर.. नहीं.. पर उसने वहां एक एक लड़की का हाथ देखा था... वह अपने कमरे, एक सौ चार, की चौख़ट तक आया...। उस कोरिड़ोर के अंतिम छोर पर कुछ लोग खड़े थे.. सारे एक जैसे कपड़े पहने.. यह इसी अस्पताल का स्टाफ था। वह धीमे कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ तीन के पास पहुंच गया। उसने खुले हुए दरवाज़े से झांककर देखा तो उसे वह लड़की दिखी.. वह सो रही थी... उसने पूरे कमरे में देखा तो उसके बहुत से कपड़े दिखे.. पर बगल वाले पलंग पर कोई नहीं था। नीचे चप्पल रखी हुई थी... उसे चप्पले बहुत छोटी लगीं.. लगा किसी बच्चे की हैं... उसकी इच्छा हुई कि वह उसके पैर देखे.. क्या इन्हीं पैरों की यह चप्पल है? ’पानी.. दे दीजिए।’ वह आवाज़ सुनकर चौंक पड़ा..। वह उसे ही देख रही थी... उसकी आँखें बड़ी थीं.. सीधी नाक़.. बिखरे हुए बाल.. सांवला रंग.. उम्र लगभग... लगभग.. चहरे से उसकी उम्र पता नहीं लग रही थी। ’पानी वहां है...’ सामने वाले पलंग के नीचे पानी रखा हुआ था...। वह गिलास ढूढ़ने लगा... कुछ देर में हारकर उसने उसकी तरफ देखा...। वह उसे जानती है... उसके बारे में सब कुछ... उसे ऎसा लगा। ’गिलास नहीं है..’ उस लड़की ने कहा और बोतल के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। पानी पीने के लिए वह कुछ सीधी होकर बैठ गई। इंदर ने उसके वक्ष देखे.. उभरे हुए... उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी। पानी पीते हुए उसने चद्दर से अपनी छाती ढ़ांक ली। इंदर ने अपनी आँखे नीची कर ली। उसकी उम्र करीब अट्ठाईस-उनतीस साल की होगी.. उसने अनुमान लगाया। फिर वह खुद को कोसने लगा.. नहीं ठीक कोसने नहीं... कोसने के ठीक पहले की स्थिति... उसकी उम्र पचास की थी.. पर किसी भी लड़की को बिना कपड़े के देखने की उसकी इच्छा वह कभी दबा नहीं पाया। उसने उस लड़की के हाथों से बोतल ली पर ज्यों ही वह उसको नीचे रखने के लिए झुका... उसके शरीर ने जवाब दे दिया.. उसे चक्कर आने लगे... वह कांपने लगा। लड़खड़ाता हुआ वह दूसरे बिस्तर पर पसर गया.. उसे ठंड़ लगने लगी... वह सिकुड़ने लगा। वह उसे देख रही थी...जैसे कि वह खुद को देखता हो... वह दयनीय नहीं दिखना चाहता था... वह कुछ संभला.. उसने लेटे-लेटे ही पानी की बोतल उठाई पर सिर्फ दो घूंट पानी पिया.. उसे पेट गुड़गुड़ाने का डर था..। कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा खुला हुआ था.. इंदर ने अपने कमरे की तरफ देखा.. उसे लगा वह एक सौ चार में अभी भी पड़ा हुआ है.. उसे ड्रिप लगी हुई है.. और वह कमरा नम्बर एक सौ तीन के बारे में सोच रहा है। क्या वह सच में यहां है...? उसकी इच्छा हुई कि वह कमरा नम्बर एक सौ चार में जाए और खुद को देखकर आए कि वह वहां है कि नहीं....। ’अभी मत जाईये...।’ ’जी...’ ’दौपहर को कोई नहीं आता है यहां... मैं बोर हो जाती हूँ... आप कुछ देर और बैठ जाईये।’ ’मैं कुछ देर बैठके ही जाऊंगा... मैं अभी जाने की हालत में भी नहीं हूँ।’ वह यहीं था... कमरा नम्बर एक सौ तीन में..। कमरा नम्बर एक सौ चार ख़ाली था... उसका बंबई का घर भी खाली था.. उसके ऑफिस की कुर्सी भी ख़ाली थी... वह यहां था..। कमरा नम्बर एक सौ चार यहां से गुफा की तरह दिख रहा था उसे...। उसने कमरा नम्बर एक सौ तीन का कमरा नम्बर एक सौ चार से तुलनात्मक अध्ययन किया... इस कमरे में दो खिड़कियां है... जबकि उसके कमरे में सिर्फ एक खिड़की है.. दूसरी खिड़की है पर उसमें एसी लगा हुआ है.. सो वह बंद कर दी गई है... यहां एसी नहीं है...। उसे एसी की ज़रुरत नहीं है.. उसे उजाला चाहिए.. उसे धूप चाहिए.. उसे गुफा में नहीं जाना। वह थक गया। ’मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगी...’ लड़की ने यह खुद से ही कहा....। ’ठीक होने के बाद तुम क्या करोगी?... मतलब इस अस्पताल से निकलने के ठीक बाद तुम पहली चीज़ क्या करना चाहती हो?’ ’गोलगप्पे खाऊंगी... वह नीचे देखो.. उस पेड़ के नीचे वह रोज़ शाम को बैठता है... बहुत भीड़ होती है उसके पास.. बस वहीं जाऊंगीं...।’ उस गोलगप्पे वाले के पेड़ को देखने के लिए उसे उसके पलंग के पास आना पड़ा। उसने उस पेड़ को देखा और मुस्कुरा दिया। ’और आप क्या करोगे?’ ’मैं... पहली फ्लाईट पकड़कर सीधा बंबई.. बहुत काम पड़ा है... मुझे तो अपने ऑफिस की डेस्क दिख रही हैं.. और कुछ भी नहीं।’ झूठ था यह..। यह बोलते ही उसने अपने दोनों हाथों से पलग के छोर को दबाया.. उसके कंधों मे खिचाव आया.. उसकी गर्दन दोनों कंधों बीच झूल गई... फिर झूठ.. झूठ क्यों? सच यह है कि वह इस अस्पताल से छूटते ही सुरुचि के पास जाएगा... वह सिर्फ एक बार ही उसके साथ सोया है। फिर उसे नग्न देखने की चाह रह रहकर वह अपने भीतर महसूस करता है...। और एक तकलीफ भी...पज़ेसिवनेस। इस शब्द से हमेशा से वह भागता रहा है.. पर इस शब्द ने हमेशा उसे हर अकेली रातों में धर दबोचा है...। सुरुचि बदला था किसी और लड़की से... पर वह बदला, हमेशा बदला लेने वाले से बड़ा हो जाता था... असल में वह किससे बदला ले रहा था उसे कुछ समय बाद इस बात का कोई पता भी नहीं रहता। जलन.. तीख़ी जलन... सुरुचि इस वक़्त कहां होगी... किसके साथ.. वह अपने सुंदर शरीर को लेकर शायद किसी के बहुत करीब... सटी हुई खड़ी होगी...कोई और उसे छूएगा.. चिपकेगा... कोई उसके... ऊफ...!!! यह पज़ेसिवनेस नहीं है इंसिक्योरिटी है... इस तरह की इंसिक्योरिटी उम्र के साथ-साथ बढ़ती जाती है ’आप क्या काम करते हैं?’ कुछ देर के मौन के बाद उसने पूछा...। वह थोड़ा ऊपर होकर बैठ गई थी.. सिर के पीछे उसने तकिया लगा लिया था... उसने चद्दर सिर्फ कमर तक ही रखी थी.. उसके वक्ष वह देख सकता था... पर उसकी निग़ाह उसकी आँखों से नहीं हट रही थीं... उस लड़की की आँखों में कुछ था... वह उसे जानती थी... उसके बारे में सब कुछ फिर भी बहाना कर रही थी पूछने का... यह शायद सपना है.. उसे लगा.. सपने में ही आप ऎसे पात्रों से मिलते हो जो कहानी के पात्र जैसे लगते हैं... जिनके सामने समर्पण करने को जी चाहता है..। ’मैं सामान बेचने में मदद करता हूँ... एक ऎसी कंपनी में काम करता हूँ जो इश्तेहार बनाती है... जिससे आप जाकर उसे खरीदें... मैं सालों से यह काम कर रहा हूँ.. लोग कहते हैं कि मैं अपने काम में बहुत तेज़ हूँ... पर मैं वह नहीं हूँ.. मैं इंदर नहीं हूँ.. मैं खुद एक प्रोडक्ट जैसा हूँ... जिसे रोज़ नए-नए तरीके से मैं बेचने की कोशिश करता हूँ...। मैंने अपने चारो तरफ ’मैं बहुत अलग हूँ... मैं जीवन को उसकी मुक्तता में जीता हूँ.. मैं यायावर हूँ...’ जैसे वाक्यों का एक ओरा बनाया हुआ है... उसे रोज़ चमका के रखता हूँ... असल में मैं एक कमीज़ हूँ.... जो रंग बदलती है... मैंने बस उस कमीज़ की धुलाई सफाई की है... उसे चमकाया है.. उसे बाज़ार में हर बदलते मौसम में आज़माया है.. वह हमेशा काम करती है... मैं हमेशा काम करता हूँ...। मेरे लिए सबसे कठिन काम है अपने साथ रहना... अपने खुद के साथ.. खुद के पूरे झूठ के साथ लगतार रहना...। मेरे भीतर एक खालीपन है... जिसके लिए बस में दूसरों क उपयोग करता हूँ.. वह आते है और कुछ समय के लिए इसे भर देते हैं.. पर वह जाते ही मुझे एक कड़वाहट महसूस होती है.. अपने से.. खुद से.. उनके कुछ देर मेरे साथ होने से.. सब से.. और मैं बाहर निकल जाता हूँ.. फिर किसी को खोजता.. ढूढ़ता हुआ। मुझे असल में माफा मांगना चाहता हूँ... कहीं किसी गिरजे में कोई बूढ़ा फादर होगा जो कह देगा कि... जाओ....भगवान ने तुम्हें माफ किया...।’ इसके बाद शांति छा गई। वह कमज़ोरी महसूस करने लगा। वह कुछ नहीं बोली... चुप बनी रही...। इंदर से यह शांति सहन नहीं हो रही थी। उसने अपने माथे पर पसीने की एक बूद को सरकते हुए महसूस किया... वह बालों से निकलकर उसकी भौं की तरफ सफर कर रही थी। वह हलके से उठा... दो कदम चलकर उसने कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा पकड़ लिया..। कुछ गहरी सांसे ली... उस लड़की की आवाज़ उसे आई... ’मेरा नाम रोशनी है...’ इंदर ने मानों उसका नाम सुना ही नहीं...। वह धीमे कदमों से चलता हुआ कमरा नम्बर एक सौ चार की तरफ बढ़ने लगा... जो बिल्कुल एक गुफा की तरह दिख रहा था...। वह जल्दी से उस गुफा में गुम जाना चाहता था... वह चाहता था कि वह सो जाए... गहरी नींद.. और जब उठे तो सब कुछ मिट जाए.. उसका कमरा नम्बर एक सौ तीन में जाना.. उसका इस शहर में आना... मौसा जी की मौत.. उनके ख़त.. सुरुची.. उसके ऑफिस की डेस्क... और उसका नाम.. सब कुछ.. मिट जाए..। वह कमरा नम्बर एक सौ चार में ऎसे घुस रहा था जैसे कोई अपनी नींद में प्रवेश करता है...। - - ¬- नींद एक धोखा है... बिखरी हुई ज़िदगी के बीच जब भी एक गहरी नींद मिलती है तो लगता है कि सब सही हो गया है... मानों बिखरा हुआ घर उठते ही वापिस, खुद-ब-खुद सलीके से जम गया। हमेशा लगता है कि एक बार सब सही हो जाए.. फिर नए सिरे से शुरुआत करेंगें... पर वह नया कौन होगा जो शुरु करेगा? वह खुद पचास साल पुराना है... झूठे बहानों से लदा हुआ... वह कैसे एक दम नई शुरुआत कर सकता है...? नींद एक अच्छा धोखा है.. नींद खुलते ही एक क्षणिक सुख प्रदान करता है... कि यह खेल की नई शुरुआत है... पर कुछ ही समय में सब कुछ वैसा का वैसा बिखर जाता है। इच्छा होती है कि वापिस नींद की शरण में चले जाओ.. बस सोते रहो... पर नींद दुत्कारके भगा देती है... बिस्तर पर देर तक उलट-पलट की कलाबाज़ी थका देती है...। वह उठ गया था...। मौसी बगल में बैठी उसके लिए सेब काट रही थीं...। बिमारी कितना आश्रित कर देती है... उसे अचानक वह दिन याद आ गया जब बचपन में वह बरामदे में कंचे खेल रहा था और मौसी राजमा-चावल लिये उसके पीछे-पीछे धूंम रहीं थीं.. हर कुछ देर में एक कोर उसे खिला देती...। खेलते-खेलते मैं ज़्यादा खाना खा लेता हूँ ऎसा मौसी को लगता था। मौसी की उंग्लियों की नंसे दिख रही थी.. उभरी हुई... हरी नंसे..। मौसा जी के जाने के बाद वह कितनी अकेली हो गई होंगी... उन्होंने उसे फोन किया था... ’बेटा कुछ दिनों के लिए आ जाता तो अच्छा लगता।’ बस एक छोटा आग्रह.. विनती जैसा... वह कोई बहाना नहीं कर सका..। वह अभी तक वापिस चला गया होता अगर वह बीमार नहीं पड़ा होता। ’मौसी आप मेरे साथ बंबई चलो.. वहीं रहना मेरे साथ..’ बीमार भर्राई आवाज़ में बहुत हलके से उसने कहा...। मौसी ने कटे हुए सेब उसकी तरफ बढ़ा दिये... ’अभी बीमार है इसलिए ऎसा कह रहा है...।’ ’नहीं मौसी.. आप सच में मेरे साथ रहो...।’ मौसी मुस्कुरा दी..। वह भी चुप हो गया। अचानक बचपन के ख़्याल से वह शायद भावुक हो गया होगा.. उसने सोचा..। ’मेरा मोबाईल आप लाईं हैं?’ ’अरे कहां.. वह तो मिला ही नहीं.. मैं ढूढ़ रही थी.. फोन भी लगाया.. पर कहीं कोई आवाज़ ही नहीं आई...।’ ’वह साईलेंट पर रखा है... बेग़ में है.. अंदर की पाकेट में.. अभी जाएं तो ले आना...।’ तभी वह बूढ़ी सिस्टर आई और उसने एक पर्ची मौसी के हाथों में थमा दी..। ’यह दवाईंया ले आईये...।’ यह कहकर वह चल दी..। ’पैसे हैं ना आपके पास..।’ ’हाँ हैं.. मैं अभी आई..।’ कभी-कभी उसकी इच्छा होती थी कि वह मौसी से बैठकर बात करे... या शाम को अपनी लंबी वाक पर उन्हें साथ ले जाए। ऎसे कुछ क्षणों में वह मौसी से अपने बचपन के किससे सुनना चाहता था... उन मुक्त दिनों की बातें जब वह खेलने और खाने के बीच दौड़ लगा रहा होता था। कमरा नम्बर एक सौ तीन का दरवाज़ा बंद था... उसे लगा कि वह कमरा उसके कमरे से थोड़ा दूर हो गया है। जब वह वहां नहीं गया था तब वह कमरा उसे पास लगता था... उसके मिलते ही कमरा नम्बर एक सौ तीन, कमरा नम्बर एक सौ चार से थोड़ा दूर हो गया... जैसे बाक़ी सारे गृह पृथ्वी से दूर होते जा रहे हैं.. जैसे... धरती भी धीरे-धीरे फैलती जा रही है.. जैसे उसका जीवन जीते-जीते बिखरता जा रहा है... जो संबंध पहले एक हाथ की दूरी पर थे.. अब उनसे मिलना असंभव हो गया है। समय किसी एक कोने में कितना धीमा हो जाता है। उसकी गति इतनी धीमी होती है कि बीता हूआ सारा कचरा उस ओर धीरे-धीरे सरक कर जमा होने लगता है...। अपनी गलतियां.... क्या उन्हें कभी सुधारा जा सकता है?

Thursday, April 26, 2012

दूसरा छोर....

चाय.. सिगरेट... और पीछे बहुत सी चिड़ियाओं का कलरव..। KEITH JARRETT का.. The Melody at night.. with you.. नाम का PIANO ALBUM…. जो पिछले कुछ महीनों से लगातार मेरे कंप्यूटर पर बजता रहता है..। कभी-कभी पूरा दिन गुज़र जाता है और मैं पियानों को सुन नहीं पाता जबकि वह लगातार बज रहा होता है.. तो कभी अचानक पियानों के तीन नोट कुछ इस तरह सुनाई देते हैं कि मानों मैंने अभी-अभी बजाएं हो... उन तीन नोट पर मैं अपने तीन कदम, बिना सोचे कुछ इस तरह बढ़ा लेता हूँ मानों कोई बहुत अपना तीन कदमों के बाद मिलने वाला हो... और वह मिलता है... दूसरा छोर... बहुत समय से रुकी हुई कहानी का दूसरा सिरा... कांपता सा। पियानों सुनना फिर बंद हो जाता है... बहुत हलके से उस कंपते हुए सिरे के बिखरे पड़े धागे संभालता हूँ...। उन धागों को छूते ही... पेरों की आहट सुनाई देती है... कोई दरवाज़े पर है ऎसा लगता है... किसी ने अभी-अभी मेरा नाम पुकारा... कोई मेरे कंधे के पीछे खड़ा मेरे मुड़ने की प्रतिक्षा कर रहा है... और मैं एक लंबे टहलने निकल जाता हूँ...। लगातार चले आ रहे इंतज़ार में... उसका मिलना प्रसन्नता से भर देता है। फिर टहलना, टहलना नहीं रह जाता.. वह एक संवाद में बदल जाता है..। उस वक्त मैं उन धोर निराशा के क्षणों का उससे हिसाब मांगता हूँ... बहुत समय तक बिगड़ा-उखड़ा रहता हूँ... मान जाने के लिए आतुर मैं सवालों का ढ़ेर लगा देता हूँ। वह दूसरा छोर... डरा हुआ मेरे साथ चलता है... और तभी पेड़ों के पीछे से कहीं एक खिड़की खुलती है.. उस खिड़की से मुझे आसमान दिखाई देता है...। आसमान.. नीला आसमान... सफेद रुई जैसे बादलों से भरा... मैं सोचने लगता हूँ कि सच में मुझे आसमान कितना पसंद है... नीले आसमान में मैं बचपन में घंटो चील को उड़ते हुए देखता था। मुझे वह हरी कांच की खिड़की भी याद है... बूढ़ी चील..। तभी पियानों के तीन नोट ओर सुनाई देते हैं...। दूसरा छोर कहीं गायब हो जाता है... मैं टहलकर वापिस आ चुका हूँ... नशे में हूँ... सन्न हूँ...। मैं अपनी रुकी हुई कहानी निकालता हूँ... पर लिखता कुछ नहीं... मुझे पहला शब्द पता है... उससे जो वाक़्य फूटेगा वह भी उसी शब्द के आस-पास कूद रहा है... पर
मैं कुछ नहीं लिखता। मैं तारीख़ के बारे में सोचने लगता हूँ जब आखरी बार मैं इस कहानी पर था... करीब चार महीने... चार महीने...। मैं उस पहले शब्द से पूछता हूँ... ’चार महीने?’ ... जबकि मैंने अभी उस शब्द को लिखा भी नहीं है... मैं पहले जवाब चाहता था। इतना लंबा खालीपन... मुझे अचानक वह दिन याद आने लगते हैं... जिसमें मैं घंटों इस कहानी के सामने बैठा था... जो भी लिखता उसे फाड़ देता... कोरे पन्नों को ताकते-ताकते मेरी आँखें थक जाती.. पर कहीं से कोई आशा नहीं बंधती... मुझे हिसाब चाहिए था.. मैं यूं ही इस शब्द को नहीं लिख सकता.. इस शब्द को जवाब देना होगा....। मैं कहानी से उठकर दूर हो जाता हूँ....। मुझे पियानों के पांच नोट सुनाई देते हैं... नाटकीय पांच नोट...। मैं अधूरी पड़ी कहानी को दूर से देखता हूँ.... मैं जानता हूँ..जो शब्द मुझे लिखना है वह भी इस कहानी के आस-पास ही कहीं मंड़रा रहा होगा... पर मैं दूर हूँ.... मैं दूर से खड़े रहकर बदला लेना चाहता हूँ... कहानी से.. उस घोर निराशा से जो मैंने इन चार महीनों में महसूस की है... उस शब्द से जो मुझे मिलते-मिलते नहीं मिलता था...। मैं अब कहानी आगे लिख सकता हूँ पर मैं नहीं लिखता हूँ....। मैं चाय चढ़ाने लगता हूँ... कुछ देर सिगरेट खोजता हूँ... वह बहुत देर बाद मिलती है.. उसे जलाते ही मुझे चिडियाओं की आवाज़े सुनाई देती हैं... मैं बाहर बालकनी में चला जाता हूँ... एक लंबा कश सिगरेट का खींचता हूँ... मेरे चहरे पर एक मुस्कुराहट आ जाती है। चार महीने का लंबा खालीपन खत्म होने पर था...। मुझे उन कुछ किताबों की याद हो आई.. जब वह खत्म होने पर होती हैं... तब मैं उनका पढ़ना लगभग बंद कर देता हूँ... उस किताब के अंतिम पृष्ठ पर पहुंचने से पहले उसी किताब के सामने दूसरी किताब पढ़ना शुरु कर देता हूँ... ज़बरदस्ती...। अभी मुझे अपनी इन हरकतों पर हंसी आती है.... पर इस वक़्त मैं जो अपनी कहानी के साथ कर रहा हूँ वह मुझे बिलकुल वाजिब लगता है...। अपनी चाय खत्म करके... सिगरेट फूंककर मैं वापिस अपनी कहानी पर जाता हूँ... पर उसके ठीक बगल में रखे कोरे पन्ने को उठाता हूँ.... और उसपर पहला शब्द लिखता हूँ.... चाय...। यह अंतिम बदला है... रुकी हुई कहानी के ठीक बगल में बैठकर कुछ और लिखना...जैसे अपनी ही प्रेमिका के सामने किसी दूसरी लड़की से फ्लर्ट करना...। बस अब बहुत हुआ....। अब मुझे ही बुरा लग रहा है...। मैं कहानी पर वापिस जाता हूँ।

Wednesday, January 18, 2012

दुबेजी...



(DUBEYJI TRIBUTE "DHAMAAL" 8th Jan.. 2012)
“मैं दुबेजी को सबसे ज़्यादा जानता हूँ... मैं उनके सबसे करीब था... मेरे और उनके संबंध बहुत निजी थे।“ यह वाक़्य सबसे मन में था... सारे लोग जो धमाल (दुबेजी की याद में आयोजित किया गया सेलिब्रेशन...) में बतौर अभिनेता हिस्सा ले रहे थे और जो दर्शकों में बैठे हुए थे.. सभी। ’पंडित सत्य देव दुबे...’ जिन्होंने ना जाने कितने लोगों को निजी तौर पर छुआ है। दुबेजी से सभी के मतभेद उतने ही थे जितना सभी उनसे प्रेम करते थे। पिछले चालीस सालों जाने कितने हिंदी, मराठी, गुजराती और अंग्रेज़ी नाटक वालों के ऊपर दुबेजी का असर रहा है... और सभी के पास उनके असंख्य किससे है। इसलिए यह बात सुनील शानबाग़ ने धमाल शुरु होते ही कही कि हम दुबेजी का जश्न मनाना चाहते हैं... जैसा कि दुबेजी भी पसंद करते.. सो कोई भी अपने निजी संस्मरण ना सुनाए (क्योंकि उसके लिए कुछ दिन भी कम पड़ जाते...)। सभी को लगभग पांच मिनिट दिये गए थे.. और सबने खूब जम कर उसे भोगा। इस थियेटर के जश्न में... सभी कुछ हुआ.. कविताए पढ़ी गई... नाटक के दृश्य मंचित किये गए... गाने गाए गए... नृत्य हुआ... याने नाटक की विद्या से जुड़ी लगभग सभी चीज़ देखने को मिली।
पर हम सब एक ख़ालीपन में थे...। हम सभी के भीतर दुबेजी के ना होने की एक ख़ाली जगह थी... इस ख़ाली जगह को देखने के बाद पता चलता है कि असल में दुबेजी कितनी जगह घेरे हुए बैठे थे... हम सबके भीतर उन्होंने अपनी एक जगह बनाई हुई थी। मुंबई थियॆटर को यह जगह भरने में पता नहीं कितना वक़्त लगेगा।
मैंने ’सुख का दुख..’ भवानी प्रसाद मिश्र की कविता सुनाई थी.. और मुझे लगा कि मैं कोई ऎसी बात कह रहा हूँ जो सारे दर्शकों ने रट रखी है...। मैं ही नहीं लगभग सारी प्रस्तुती में यह भाव था कि वह सबको रटा हुआ है... क्योंकि सभी दुबेजी के रिफरेंस में चीज़े सुन रहे थे... कह रहे थे.. जो उस थियेटर में बैठे हर व्यक्ति को व्यक्तिगत तौर पर छू रही थी। हर प्रफार्मेंस में लोग खुलकर हंसते... तालीयाँ बजाते... कभी चुप शांति छा जाती... मेरे ख्याल उस दिन बहुत खूबसूरत नाटक हुआ था... वह नाटक जिसका सभी हिस्सा थे...। नसीर ने कहा कि दुबेजी ने अपने जीवन में इतना काम किया है कि उन्हें एक नींद की ज़रुरत थी जो उन्होंने अपनी मृत्यु के पहले ली... तीन महीने वह सोते रहे... ऊपर बड़े नाटक में हिस्सा लेने से पहले शायद यह उनकी तैयारी थी। हमें जिस तरह दुबेजी को याद करना चाहिए यह धमाल उसका एक बैहतरीन उदाहरण था...। दुबेजी कहते थे (सुनील शानबाग़) कि अगर थियेटर को बचाना है तो हमें दो छोटे थियेटर और चाहिए इस शहर में... जिसमें 200 रुपये से ज़्यादा का टिकिट ना हो... थियेटर खुद बच जाएगा। अभी यह बात हम सबके दिमाग़ में है कि काश हमें प्रयोग करने की एक और जगह मिल जाये...।
वह बहुत अच्छे टीचर थे... डांट कर, चिल्लाकर, प्रेम से वह आपके भीतर से वह उस इंसान को बाहन निकालने में कामियाब हो जाते थे जो बरसों बरस डरा हुआ भीतर बैठा था... यह अलग बात है कि हम अपने डर को जीत जाते थे लेकिन दुबेजी से डरना शुरु कर देते थे। डर के बाद का बदलाव दोस्ती का होता था... हम सब उनके दोस्त हो गए थे। इसलिए शायद उनकी बातों पर जो कभी कभी बचकानी लगती थी, उनकी मृत्यु के बाद भी, उन बातों पर इतनी ज़ोर से हंस सकते थे। वह एक तरीके से कुम्हार थे... जिन्होंने हम सबकी गीली मिट्टी से एक मूर्ति बनने की यात्रा में अपने समझ के हाथ का साथ दिया था।
धमाल में उनकी पसंदीदा चीज़ो को प्रस्तुत किया गया था.. और आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे कि किस कदर की अलग-अलग चीज़े उन्हें पसंद थी.... स्वानंद किरकिरे ने ’बावरा मन...’ गाना सुनाया, कुमुद ने ’सुदामा के चावल..’ (उनका निर्देशित नाटक) का अंश प्रस्तुत किया, पूर्वा नरेश ने अपने नाटक अफसाने का एक नृत्य प्रस्तुत किया, नीना कुल्कर्णी ने ‘Educating Rita..’, नमित और शुब्रो ने कुछ उनके पसंदीदा फिल्मी गाने गाए, नसीर ने फैज़ की एक नज़्म पढ़ी... और इसी तरह लोगों ने उत्सव मनाया... उनके हमारे बीच होने का। मुझे पता नहीं क्यों चेतन दातार की बहुत याद आई...चेतन ने एक बार दुबेजी के ऊपर एक छोटा सा नाटक प्रस्तुत किया था बहुत पहले पृथ्वी थियेटर में... मैं उसे कभी भी नहीं भूल पाता हूँ...। मैने चेतन से कहा था कि दुबे पर ऎसा नाटक आप ही लिख सकते हो... मुझे उस वक़्त चेतन से बहुत ईर्ष्या हुई थी।
धमाल का अंत फिल्मी गाने से हुआ.. ’ज़रा हट के, ज़रा बच के यह है बाम्बे मेरी जान...’। सारे लोगों ने एक साथ मिलकर उस गाने को गाया...। जब धमाल खत्म होकर हम सब बाहर आए... तो एक अजीब से किस्सों का सिलसिला शुरु हो गया... हर आदमी के पास बहुत कुछ था कहने को... सभी लोग अपने अनुभव एक दूसरे को सुनाना चाहते थे। मैंने अलग-अलग गुटों में खड़े होकर करीब बीस नए किस्से सुने..... कुछ देर में मुझे लगा कि दुबेजी बहुत जल्द ’विचित्र किंतु सत्य...’ जैसे कोई व्यक्तित्व हो जाएंगे... जिन्हें हमें उनके किस्सों में पकड़ना पड़ेगा। फिर मैं किस्सों से थोड़ा थक कर अकेला खड़ा हो गया... सिग्रेट मुंह को लगाई थी कि.... तभी मुझे एक रिक्शा आता हुआ दिखा... मुझे लगा अभी इस रिक्शे से दुबेजी उतरेगें और पूछेगें... ’क्या मानव, क्या हो रहा है यहां?’ तब मुझे अचानक यह बात बहुत ही डरावनी जान पड़ी कि अब दुबेजी कभी भी यहां नहीं आएंगें...। तब शायद मैंने पहली बार उनका ना होना महसूस किया था... मैंने एक गहरी सांस भीतर ली.... मेरे दिमाग़ में एवम्‍ इंद्रजीत नाटक धूमने लगा.. फिर इंशा अल्लाह के कुछ दृश्य... फिर मुझे धर्मवीर भारती की बात याद हो आई... ’ईर्ष्या कुछ नहीं मुझे यद्यपि मैं ही वसंत का अग्रदूत- निराला।’ उनके हिसाब से दुबेजी पर यह पंक्ति पूरी तरह लागू होती थी। फिर मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की वह कविता याद हो आई जो मैंने कुछ महिनों पहले दुबेजी को सुनाई थी... “आराम से भाई ज़िदग़ी ज़रा आराम से... तेज़ी तुम्हारे प्यार की बर्दाश्त नहीं होती अब...” दुबेजी को यह कविता बहुत पसंद आई थी... उन्होंने कहा था कि ’यह मुझे लिख कर दे दो...।’ मैं उन्हें यह कविता दे नहीं पाया था। फिर अकेले खड़े रहने की हिम्मत नहीं हुई... मैं वापिस सारे लोगों के बीच शामिल हो गया.... जो अभी भी दुबेजी के किस्से में जी रहे थे... जो सभी उनके दोस्त थे।

PLAYWRIGHT...


If someone came up to me wanting to know what it takes to be a playwright ….I’m almost sure of finding myself with very little to say. Before anything else, I’ll ask myself why it is that I write? Is it my love for theatre, my passion ,the madness….? All but a farce…..because after so many years perhaps all this should have begun to lose its shine. My reasons lie elsewhere. The truth is , that writing a play or writing itself, for that matter, is seamlessly woven into the fabric of my being. There is never the need for any effort towards wanting to write…. I find myself thinking about writing almost all day…in gatherings…around friends….anywhere , it lingers in my thoughts like a lover. Kafka eloquently phrased that , ‘To write I need death like silence’. Now that brings me to my very next question, which is, how important is it to write for me? To answer which I quote Rilke , who once said to a young poet that ‘Ask yourself in the quietest hour of the night, is writing a primary necessity? The answer must be a ‘yes’ if you’re living all alone and apart from yourself, can turn to no one.’
The journey of a writer, having lived all this silence and solitude, begins not with his first play…but with his second. Because that is where, comes in the dilution of the expectations of his audience. The juncture where he finds himself having to walk the line between what it is that he wants to write vis-à-vis that which he should.
In my limited experience, I have seen that a writer who tends to create anything with his audience in mind is more often than not lost. He ends up in a space where whatever he churns out is projected outwards rather than inward. The real graph or the complete circle of the life of a writer comes alive only when he can’t and doesn’t repeat his work irrespective of the consequences. And in that circle what matters most is how entertained he remains with the constant surprise element in his work for him.
Does a play change the world, a society, a country ? No. It’s a momentary form of art that caters to a niche audience lasting not more than a couple of hours. Its like life itself , where what you experience for that time in space is nothing more than a memory right after its lived. Which is what brings so much beauty to theatre and to the eyes that witness it. “Literature doesn’t give one water , all it gives is a realisaion of an unquenchable thirst. When in a dream you drink water, on waking you realise how thirsty you actually were. “ I find that Nirmal Verma’s words beautifully sum up the taste of living around theatre for me.

Tuesday, January 3, 2012

खिड़्कियाँ....


इस तरह की अकेली दौपहरें... ना जाने कितनी खिड़कियों के साथ मैंने काटी हैं..। मेरा सबसे सुंदर वक़्त इन खिड़कियों से झांकते हुए ही बीता है...।
एक खिड़की मुझे याद आती है... शायद जीवन की पहली खिड़की... बारामुला, खोजाबाग़ (कश्मीर...)... जहाँ से मुझे अपने आंगन में उगे हुए पौधीना के पौधे दिखते थे...उनकी खुश्बू...। बर्फ गिरने पर बुखारी की गर्मी में रजाई में लिपटा हुआ मैं खिड़की से उन बर्फ के गोलों को देखता जिन्हें मेरे और मेरे भाई ने मिलकर बनाए थे..। एक बार वहां से मैंने अपने आंगन की दीवार पर से एक चोर को भी भागते हुए देखा था...। वह चोर दौपहर में बाहर सूख रहे कपड़े चोरी करता था। एक दिवार से दूसरी दीवार पर छलांग मारते वक़्त वह लड़खड़ा गया था... और तब उसने मेरी तरफ देखा था। मैं अपनी खिड़की में बैठा था... हम दोनों की आंखे कुछ देर के लिए फसी थी.. फिर वह भाग गया था। बरसों तक मैं उस चोर की शक्ल नहीं भूल पाया था...। वह भागते हुए बहुत बेचारा दिख रहा था... मुझे उस वक़्त तक पता था कि चोर खूंखार होते हैं.. पर वह बहुत बैचारा था.. दयनीय.. भूखा..। बाद में पता चला कि वह पकड़ा गया है...। मुझे उसके पकड़े जाने पर बहुत पचतावा हुआ था...। उस खिड़की से कुछ दूरी पर पहाड़ भी दिखता था... मैंने बड़े सपने देखे थे कि एक दिन उन पहाड़ों पर जाऊंगा पर हमें खोजाबाग़ छोड़ना पड़ा...। वहां के कौए मुझे बहुत याद आते हैं... एक कौओं का परिवार था... पापा कहते थे कि यह मेरे जासूस कौए हैं.. यह मुझे सारी रिपोर्ट देते हैं तुम्हारे बारे में...। आज भी कौओं को देखकर मैं सचेत हो जाता हूँ।
दूसरी खिड़की..... श्रीनगर की खड़की दूसरी मंज़िल पर थी... मैंने वहाँ से चीलों को देखा है...। कई लम्बीं दौपहरों में जब मैं शहतूत के पेड़ पर नहीं छुपा होता था तो मैं खिड़की से चीलों को देखा करता था। कुछ चींलो को मैं पहचानने भी लगा था। उसमें एक बूढ़ी चील थी... जिसके परों को झड़ते हुए मैंने देखा था... (मैं उस देयनीय चोर के बार में कभी नहीं लिख पाया.. पर बूढ़ी चील को मैं लिख चुका हूँ)। मैं वह दिन कभी भी भूल नहीं पाया हूँ.... आज भी जब कभी मैं चीलों को देखता हूँ तो मुझे श्रीनगर की वह खिड़की याद आती है..।... और याद आता है सुंदर नीला आकाश... सफेद रुई जैसे बादलों से सजा हुआ। चील की उड़ान में..उसके किसी पेड़ पर आकर बैठने में संगीत है.. मैं चील को देखते हुए कभी बोर नहीं हो सकता हूँ।
फिर चहल पहल से भरी हुई खिड़की जीवन में आई... होशंगाबाद की खिड़की...। यही वह जगह थीं जहां मुझे पहली बार चीलों-पहाड़ों से अलग... लोगों के मैले में मज़ा आने लगा...। मेरे घर की खिड़की से एक कुंआ दिखता था, जिसमें मेरी जाने कितनी गेंदें गुम चुकी हैं...। उस कुंए के ठीक बग़ल में मुझे मोहन का टप दिखता था... आह!!... गोली बिस्किट... खटाई, पोंगापंड़ित.. और जाने क्या-क्या उसकी छोटी सी दुकान में होता था। मैं अपने पैसे अपने जेब में नहीं.. बल्कि मुंह में लिए हुए घूमता था... एक दौपहर... दौपहर महत्वपूर्ण है क्योंकि दौपहर में ही उसकी दुकान पर बहुत कम लोग होते थे... सो एक दौपहर मैं उसकी दुकान में गटागट लेने गया.... जब मैंने उसे अपने मुंह से पैसे निकालकर दिये तो उसने मुझे गटागट की गोली देने से इंकार कर दिया... मैंने वह पचास पैसे का सिक्का उसके सामने अपनी शर्ट से साफ किया... पर ना!!! बाजू के नल से उसे धोया-सुखाया... पर वही.. ना!!! इतनी बड़ी बेईज़ती उस छोटी सी उम्र में मेरे बर्दाश्त के बाहर थी...। सो मैंने कसम खाई कि मैं कभी इसकी दुकान से कुछ भी नहीं खरीदूंगा.. और इसे बर्बाद करके दम लूंगा। बर्बाद कैसे किया जाता है.. उसका कोई भी सिर-पैर मुझे नहीं पता था... बस गुस्सा बहुत था...। अब आप ही बताओ कि... गटागट के लिए मुंह पानी से भरा था, जेब में पैसे थे.. पर गटागट नहीं मिली... ऊफ!!! कोई भी इस तक़लीफ को अब कैसे समझ सकता है? खैर मोहन को बर्बाद करना है इस बंदोबस्त में मैं लग गया.... सो मैं उसका पीछा करने लगा...। पीछा करते-करते मैंने जान लिया कि वह अपना सामान कहां से लाता है... सो एक दिन मैं उस थोक की दुकान पर गया... और पूरे तीस रुपये का माल वहां से उठा लिया... (मुझे आज तक नहीं पता कि वह तीस रुपये मेरे पास कहां से आए...।) अब मेरी खिड़की... जिसके ठीक सामने मोहन की दुकान थी... उसी खड़्की में मैंने मोहन के विरुद्ध गोली-बिस्कुट की दुकान खोल ली थी...। मैंने लगभग छ: महीने वह दुकान चलाई... मुझे याद नहीं कि मैंने कभी अपनी दुकान में गटागट खाई थी..। मैंने शायद उसके बाद कभी भी गटागट की गोली नहीं खाई...। अपनी दुकान चलाने की व्यस्तता में... मोहन से बदला लेने वाली बात भी मैं भूल गया..। उन छ: महिनों में मेरा पूरा मोह गोली-बिस्कुट से उठ चुका था.. मैं उन छ: महिने में बड़ा हो गया था.. शायद।
यह उस खिड़की की कहानी थी...। इसके अलावा मैने उस खिड़की से... अजीब-अजीब लोगों को देखा.. मृत्यु देखी.. जीवन देखा... और जो सबसे खूबसूरत चीज़ देखी.. जिसके प्रेम में मैं आज तक हूँ.. वह थी बारिश...। बादलों का धीरे-धीरे नमी भरे माहौल में आना.. तेज़ हवाओं का चलना.. और झर-झर... बारिश.. मिट्टी की खुश्बू... आह!!! पहली बारिश में भीगना अच्छा होता है.... (पता नहीं कहां यह बात सुनी थी।) हर पहली बारिश में मैं ज़ार-ज़ार भीगा हूँ...। मैंने देर रात भी बारिश देखी है... बल्ब की रोशनी खिड़की के आकार में बाहर पड़ जाती थी... उसमें मेरे होने की परछाई के अलावा... बाक़ी जगह में पानी का बहना देखना.. मुझे जादुई लगता था। मेरी बहुत इच्छा होती कि इस बहते पानी के पीछे-पीछे मैं उसके अंत तक जाऊं... उसका अंत देखूं... कहां जाकर यह पानी ठहर जाता है..?
मेरे बचपन की यह तीन खिड़कियां... मुझे सपनों के बायस्कोप जैसी लगती हैं..। पहली खिड़की से मैंने बर्फ देखी.. दूसरी से कश्मीर का नीला आसमान... तीसरी खिड़की से बरसात। इस उम्र तक आते-आते मैंने जाने कितने घर बदले हैं.. पर हर घर में घुसते ही मैं सबसे पहले उस घर की खिड़की देखता हूँ...। अगर वह एक नए मौसम की तरफ खुलती है तो मैं झट से उस घर में रहने लगता हूँ। इन्हीं खिड़कियों के कारण मुझे अकेली लंबी दौपहरे बहुत पसंद है... और मैं कभी इनसे बोर नहीं होता।

Sunday, January 1, 2012

आजकल मैं लड़ रहा हूँ....


(एक नाटक लिखने के ठीक पहले.....)
’आजकल मैं लड़ रहा हूँ.... मैं अभी भी लड़ रहा हूँ... पिछले कई दिनों से मैं लड़ रहा हूँ...’
एक झटके में सन्नाटा छा जाता है... चुप... दूर कहीं कुछ खोजता सा एक आदमी दिखता है...। क्या पूर्ण है? किसे जी लेने से शांति मिल जाएगी? कौन से शब्द इस हड़बड़ी को चुप कर देंगें? वह शब्दों की तलाश में हर कोने कुछ देर रह लेना चाहता है...। रह लेने दें... ऎसे कोने अब घर में नहीं बचे है.. हर कोना अपनी बैचेनी लिए कब से उसका इंतज़ार कर रहा था। वह उस अटपटेपन में फिर घर में गोल-गोल चक्कर काटने लगता है। बहुत सारा कुछ कह लेने की कुलबुलाहट से वह एक खाली पन्ना तलाशता है... ख़ाली कोरे पन्ने बहुत ज़िम्मेदारी लिए आते हैं..। हर शब्द.. हर वाक़्य एक कहानी का दरवाज़ा खोल देता है... कोई एक बैचेनी जिसे कह कर उस बैचेनी को छूट जाना होता है...। हर बैचेनी अपने किस्से के साथ उसकी कलम की नोक पर बैठ जाती है। कलम की नोक़ के भारीपन में वह अपनी कलम में काली सियाही भर लेता है। पहली बात लिखने के पहले ही उसके कोरे पन्ने पर बहुत से चहरे घूमने लगते हैं.... किसे लिख कर आज़ाद कर दे? पर उसकी खुद की आज़ादी का क्या? वह कब आज़ाद होगा? उसकी अपनी तड़प कब शांत होगी...? उसने सोचा कि कुछ ऎसा लिख दूं कि हर कोने की बैचेनी ख़ाली हो जाए...। उसने लिखा ’आजकल मैं लड़ रहा हूँ.... मैं अभी भी लड़ रहा हूँ... पिछले कई दिनों से मैं लड़ रहा हूँ...’ वह यह लिखकर चुप दीवारों को ताक़ता रहा... कहीं कोई भी हलचल नहीं थी...। उसने कुछ कोनों की तरफ नज़र दौड़ाई... वहां बस एक चुप अजनबीपन था.. बैचेनी से चिपका हुआ। यह क्या लिख दिया? इसका क्या संबंध है उस किसी भी तड़प से जिससे वह छुटकारा पाना चाहता है? उसे हंसी आ गई... यह लेखक का कमीनापन है... जब कोई एक बात अपनी पूरी छटपटाहट पर होती है तो वह ठीक उसके उलट बात लिखना शुरु कर देता है... इस तरह वह बदला लेता है... पर किससे? क्या उन छोटी बातों से जो कभी किसी सन्नाटे में उसने ही पैदा की थीं... जिन्हें वह घर के किसी कोने में रख कर भूल गया था? पर वह अचानक बहुत हल्का महसूस करने लगा था। यह बदला उसने घर के हर कोने की बैचेनी से लिया था... उसकी क़लम हल्की हो गई...। कोरे कागज़ पर उभरे सारे चहरों पर से उनके नाम पिघल कर टपकने लगे। वह आदमी इस सुख को छिपा ना सका... उसकी हंसी में बदला था... अपने ही, बीच में छूटे हुए, अनकहे सत्य से बदला..। एक फांस गड़ने की तकलीफ को कम करने के लिए दूसरी बड़ी फांस को अपने भीतर गड़ा लेना... वह खुश था..। उसे भी पता था कि इस पीड़ा से हास्य उभरेगा... वह हास्य लिखेगा...।
यह कई साल पुरानी बात है...। आज वह नाटक कई जगह खेला जा रहा है... पर आज भी जब कभी वह अपने नाटक के कुछ वाक़्य सुनता है तो उसे उस सघन शांम की याद हो आती है.. जब एक झटके में सन्नाटा छा गया था। ऎसे दिनों में जब भी वह घर वापिस जाता है तो घर में घुसते ही वह एक छोटा लाल रंग का लेंप जलाता है...। पूरे घर में बिखरा उजाला उससे सहन नहीं होता...। वह घर के कोनों को अंधेरे में ही रहने देता है..। उन कोनों की बैचेनी अभी भी उसका उसी शिद्दत से इंतज़ार कर रही हैं.... पर वह बदला लेने जैसे वाक्य के बिना किसी भी खाली पन्ने के करीब नहीं जाना चाहता है...। उसकी व्यस्तता उसका हथियार है... दिन में सूरज की रोशनी में जब सब कुछ साफ दिखता है तब वह बहुत से कामों का सिलसिला अपने आस पास उगाए रखता है...। वह सारे कामों के सिलसिले शाम तक पेड़ बन जाते हैं जिनमें कोई भी फल नहीं उगता...। बस उसकी समस्या शाम से शुरु होती है.. जब बिना फल के पेड़ उसकी भूख को चिढ़ाने लगते हैं...। तब ऎसे कई क्षणों में वह अपने लिखे हुए हास्य पर बात करने लगता है...बिना रुके.. बड़बड़ाता हुआ सा... तेज़ गवार हसी हंसता हुआ...।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल