Wednesday, September 15, 2010

निर्मल और मैं....



निर्मल और मैं...
निर्मल- देखो इस बार मैं खुद ही चला आया बिना तुम्हारे बुलाए।
मैं- आपका इंतज़ार था मुझे।
निर्मल- तो इन दिनों क्या चल रहा है।
मैं- नाटकों का मौसम है.. सो नाटक कर रहा हूँ।
निर्मल- क्या पढ़ रहे हो?
मैं- बिलकुल नहीं के बराबर पढ़ाई है... अभी अगला नाटक पूरा नहीं किया है।
निर्मल- बीच में तुम कहानियों की तरफ मुड़े थे उसका क्या हुआ?
मैं- कुछ समय तक सीधे चल रहा हूँ.... जल्द फिर मुड़ जाऊंगा।
निर्मल- कहानी लिखने का अगर एक बार स्वाद चढ़ जाए तो फिर वह उतरता नहीं है। नाटकों में फिर भी बहुत से बाहरी तत्व काम करते हैं.. जो उसकी शुद्धता को दूषित करते रहते हैं... पर कहानी शुद्ध कला है... वह पतंगबाज़ी जैसी है... तुम्हारे म्मताज़भाई जैसी।
मैं- मेरे म्मताज़ भाई तो आप ही हैं..। मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ.. बहुत समय से इस नाटकों के वातावरण से अजीब सी दुर्गंध आने लगी है। शायद इसका कारण मैं ही हूँ... बहुत दिनों तक मैं एक जैसा जी भी नहीं सकता। मुझे लगता है कि मुझे नाटक बीच-बीच में करना चाहिए.. लगातार नहीं।
निर्मल- तुम्हारे लगने से अगर सब कुछ होता तो तुम इस वक़्त प्राग में बैठे होते।
मैं- हा....हा....हा....।
निर्मल- जो हो रहा है उसपर ध्यान दो, जो हो सकता है उसकी बात काल्पनिक दुनिया जैसी बात है, जो बहुत ही खतरनाक है। काल्पनिक दुनिया बाज़ार के लिए है उससे लोग अपना पेट.. घर.. अंह्म भरते है... उससे दूर ही रहो।
मैं- पर जो रियालिटी है वह कितनी उबाऊ है?
निर्मल- हाँ वह तो है ही.. कल्पना असल में रियालिटी का सेलिब्रेशन है... जैसे अकेलेपन का सेलिब्रेशन एक खूबसूरत आर्ट होता है।
मैं- आप चाय पीएगें?
निर्मल- बिलकुल पियूंगा।
मैं- इस बीच मेरा लिखे हुए ने मुझे बहुत ही संतुष्ट किया निर्मल जी।
निर्मल- अच्छा है।
मैं- पढ़ने को बहुत कुछ बचा है।
निर्मल- इन दो नाटकों के बाद पहाड़ चले जाना.. बहुत दिनों से तुम पहाड़ भी नहीं गए हो।
मैं- हाँ इस बार इच्छा है कि कहीं दो तीन महीने के लिए जाया जाए... किसी गांव में.. किसी छोटी सी जगह में सारा वक़्त बिता दिया जाए।
निर्मल- हाँ अच्छा है। यात्राएं बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि कई बार जीवन में भूमिकाए ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है मुख्य कहानी से... उन भूमिकाओं को झाड़ते रहने के लिए... और कहानी पर बने रहने के लिए ज़रुरी है कि यात्राएं जीवन में बनी रहे।
मैं- आपको लगता है कि मेरे जीवन में भूमिकाए बढ़ती जा रही हैं?
निर्मल- उद्धाहरणार्थ है भाई यह...
मैं- नहीं पर आपने कहा भूमिका...
निर्मल- छोड़ो उसे लाओ चाय दो।
मैं- आपने अपने ख़त में वह अकेलेपन की बहुत ही सुंदर बात कही कि हम लोग अपना अकेलापन चुनते है.. और इस बात के लिए हमें कोई भी माफ नहीं करता।
निर्मल- हं.. west में अकेलापन एक स्थिती है.. हम लोगों के लिए नहीं।
मैं- मैं भी हर कुछ समय में असहज हो जाता हूँ।
निर्मल- सहजता कला है.. उसका रियाज़ ज़रुरी है... वह इतनी आसानी से नहीं आती।
मैं- बाद में मैं खुद को बहुत कोसता हूँ। पर तब तक देर हो चुकी होती है।
निर्मल- तुम्हारी नई कहानी कैसी चल रही है।
मैं- कल रात ही कुछ आगे बढ़ी है।
निर्मल- व्यक्ति जो लिखता है और जो उसे सहता है... इसमें अंतर है... और अंतर जितना बड़ा होता है.. कला उतनी ही अच्छी होती है।... किसी ने कहा है।
मैं- हाँ मैं जानता हूँ।
निर्मल- अभी जानते हो.. अब इसे समझो भी.... चलता हूँ।
मैं- जल्द मुलाकात होगी।
निर्मल- आशा करता हूँ।

Sunday, September 12, 2010

मेरे प्रिय दोस्त... (माफी नामा)


मेरे प्रिय दोस्त,
एक माफी नामे के साथ इस ख़त की शुरुआत करना ठीक होगा। पीछे कुछ दिनों सन्नाटे से वाक़िफ हुआ... मौन में बात कहना सीख चुका था.. पर सन्नाटे की परिभाषा कुछ गलत पता थी। उस सन्नाटे के भीतर जब सांस लेना कठिन हो रहा था तब मैंने ब्लॉग पर एक पोस्ट लिख दी...”मैं अब थियेटर छोड़ना चाहता हूँ”। यक़ीन कर सके दोस्त तो उस स्थिति में अपनी ईमानदारी से जो भी शब्द मुँह से निकले उन्हें मैंने चिपका दिया। सन्नाटे के अर्थ बूझते-बूझते जब घबराहट थोड़ी ठंड़ी पड़ी तो उस पोस्ट पर बहुत से साथियों के कमेंट्स देखे। खुद पर बहुत गुस्सा आया.. पर मौन में बात में मैंने तय कि था कि अपनी पूरी ईमानदारी से जो भी लिख सकता हूँ वह लिखूंगा... सो भीतर की छटपटाहट को छुपा ना सका। वह बाहर आ गई। अभी यह माफी नामा सा है उन सभी से जो उस पोस्ट के बाद कुछ चिंता में आ गए थे।
मैं अपने साथ लिखने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता हूँ। मैं लेखन को उसके पूरे संसार के साथ स्वीकार करता हूँ। उस संसार में अगर आर्थिक परेशानियाँ है तो उनका मुझे शुरु से ही पता था.... माफी चाहता हूँ थोड़ा विचलित होने के लिए।
अभी भी अपनी कहानी “म्मताज़ भाई पतंग वाले” का नाट्य रुपांतरण किया है। जो बेहद सुखद अनुभव था। २२,२३ और २४ अक्टूबर को पृथ्वी थियेटर में उसका प्रयोग है.. सो रिहर्सल में व्यस्त हो चुका हूँ। अपने छोटे से बनाए हुए संसार में हूँ.... जो बहुत सुखद है। सन्नाटे का अर्थ अभी भी बूझ ही रहा हूँ... भवानी भाई की कविता में वह कहानी स्वरुप में है.. पर उसकी प्रतिध्वनी बहुत विशाल और असहज कर देने वाली है। मौन और सन्नाटे में अंतर भी बहुत विशाल है...। शायद उस अंतर को अपने लेखन में कहीं पा सकूं। माफी नामें का यहाँ अंत करता हूँ एक और माफी के साथ।
अब बात आगे की...... दोस्त कुछ दिन पूरी तरह नाटक खत्म करने में बीत गए...। फिर एक अजीब घटना हुई... कुछ लोग मेरे घर गणपति का चंदा मागने आए। मैं इस चीखते चिल्लाते धर्म का यूं भी काफ़ी विरोधी रहा हूँ... पर पचास रुपये देकर जान छुड़ानी चाही...। उन्होने पचास रुपये लेने से साफ मना कर दिया, कहाँ नियम है.. एक सो इंक्यावन नक़द चाहिए...। मैं अब अपना निहलिस्ट होना छुपा ना सका... मैंने मना कर दिया। लाल गुस्साई आँखे मेरे ऊपर तन गई। उन्होंने कहाँ बाद में दे दीजिएगा। मैंने सो चलो अभी तो बात टली... बाद में वह लोग फिर आ धमके.. इस बार कुछ देर रात आए थे। कुछ लोगों के मुँह से मदिरा बुरी तरह महक रही थी... मैंने फिर पचास रुपये देने की सिफारिश की... वह फिर अपनी बात पर अड़े रहे...। इस बार बग़ल वाले ने कहाँ कि हम तेरे ब्रोकर को भी जानते है जिसने यह मकान तुझे दिलाया है और तेरे मकान मालिक को भी.. अब यह सीधी-सीधी धमकी थी। मैं कुछ संकोच में आ गया...। वह लोग मुझे धूरते रहे...। मुझे यह तो समझ में आ गया कि अगर मुझे इस वनराई नाम की छोटी सी दुनियाँ में रहना है तो.... इन मगरमच्छों से बेर लेने से कोई फायदा नहीं है.. और फिर इसका अंत क्या है? अगर मैं सच में मनुष्य की आज़ादी नाम की बातों पर लड़ना चाहता हूँ तो मुझे सब कुछ छोड़कर इसमें कूदना पड़ेगा...। मैं शायद अपनी तरह से अपने लिखे में यह काम कर ही रहा हूँ...।
वह लोग मेरे सामने खड़े, नशे में मुझे घूर रहे थे... अचानक मुझे लगने लगा कि मैं थियेटर में एक छिछोरी फिल्म देखने गया हूँ और मुझे यह लोग कह रहे हैं कि “ऎ भाई... जण-गण-मन.. शुरु हो गया.. चलो खड़े हो जाओ...” और मैं वहाँ भी चुपचाप खड़ा हो जाता हूँ। फिर लगने लगा कि यह कह रहे हैं कि तुम तो भोसड़ी के कश्मीरी हो... वहाँ कुछ नहीं कर पाए.. अब यहाँ हमें सिखा रहे हो...”मनुष्य की आज़ादी?”
मुझे लगने लगा कि सच है..मैं कहीं पर भी कुछ नहीं कर पाया। क्योंकि मुझे कोई भी समस्या, मेरी समस्या लगती ही नहीं है। मुझे लगता है कि यह दुनिया एक तरीके से चलती है.. मैं इसमें कुछ इस तरह से हूँ कि इसका पूरी तरह हिस्सा हूँ...। इसके एक-एक दिन का... एक-एक क्षण का...। जब कश्मीर में कोई मरता है तो मैं ही मरता हूँ और उसे मारने वाला भी मैं ही हूँ... तब कुछ भी बचा नहीं रहता जिसके खिलाफ मुझे, सब कुछ छोड़-छाड़कर कूद जाना चाहिए।
सो मेरे प्रिय दोस्त.. उन दो नशेड़ों के सामने मैंने चुप-चाप एक सौ इंक्यावन रुपये नक़द रख दिये। दरवाज़ा बंद करके मैं अपने दड़बे में बहुत देर तक सोचता रहा... आज़ादी जो मिली है मैं उसका क्या करता हूँ????
आशा करता हूँ... हम सब स्वस्थ होगें...
बाक़ी अगले विचार पर....
मानव...

Saturday, August 21, 2010

मेरे प्रिय दोस्त... (3..)


प्रिय दोस्त,
देर रात तुम्हें यह ख़त लिख रहा हूँ...। मैं हमेशा ऎसी अंधेरी घनी रातों में मौन हो जाता हूँ... या किताबों का सहारा ले लेता हूँ, पर किताबें कब तक हमारे उन बोझिल एकांतों का सहारा बनेगीं जिनसे हम लगातार लुका-छिपी का खेल खेलते रहते हैं। मैं उनका सामना भी नहीं करना चाहता हूँ... इस बीच तुम्हारा ख्याल आ गया सो लगा तुमसे ही बात कर ली जाए...।
आज दिन में मैं निर्मल वर्मा के पत्र पढ़ रहा था, उसमें उन्होंने एक बहुत ही सुंदर बात कही... “तीसरी दुनिया के लेखक का ’अकेलापन’ पश्चिमी मनुष्य के अकेलेपन से बहुत अलग है, वहाँ यह एक स्थिति है; यहाँ अकेलेपन को ’चुनना’ पड़ता है, जानबूझ कर आपको दूसरों से अलग होना पड़ता है, जिसके लिये ’दूसरे’ आपको कभी माफ़ नहीं करते; अकेलापन अहं जान पड़ता है, और अन्त तक एक stigma की तरह आदमी पर दग़ा रहता है।“
फिर कुछ karel chapek की कहानियाँ भी पढ़ी जो बहुत ही खूबसूरता लगीं।
एक भाग मेरा कहानियाँ लिखना चाहता है तो दूसरा नाटक के अधूरेपन से चिंताग्रस्त है और मैं एक अजीब से बदलाव का इंतज़ार कर रहा हूँ। मैं उस बदलाव को सूंघ सकता हूँ, वह बहुत आस-पास ही कहीं है। मैंने हमेशा, एक समय बिता लेने के बाद, कुछ चीज़ों को छोड़ा है। मुझे नहीं पता इस बहाव में क्या बह जाए और क्या रुका रहे।
दिन भर शरीर कुछ अजीब से आलस्य में उलझा रहा। शाम होने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा... पर शाम होते ही घर में नीरसता सी छा गई। सो बाहर निकल गया... बाहर बिना बात के समय काटता रहा, सोचा जब रात घर में पहुंच जाएगी तो मैं घर जाऊंगा। शाम ने रात होते-होते मुझे थका दिया। जब घर में घुसा तो घर अपनी नाराज़गी लिए हुए था। मैंने बत्तियाँ जलाकर, पंखा चालू करके उसे मनाने की कोशिश की पर वह नहीं माना... फिर एक चाय की बात पर कुछ बात बनी...।
शायद यह मेरे विचारों की उथल-पुथल ही है जो एक confusion का दायरा अपने चारों तरफ बनाए हुए है। इसमें कोई भी विचार अपने विराम तक नहीं पहुंच रहा है। बीच में कहानी भी वापिस शुरु करने की कोशिश की पर सारे पात्र इतने सारे प्रश्न लिए मेरे पास आते हैं कि उनके जवाब मैं इस मन:स्थिति में नहीं दे सकता हूँ। वह मुझे बेचारा समझते हैं और मैं उनसे माफी मांगे बिना विदा ले लेता हूँ।
अभी-अभी ELFRIEDE JELINEK का उपन्यास piano teacher शुरु किया है जो बहुत सुंदर है।
मेरे घर बहुत से पौधे आए हैं... सुबह उठा था तो एक गमले में फूल भी खिला हुआ था। मैंने आज तक कभी अपना कोई फूल नहीं देखा है... उसके सामने खड़े होकर इतना सुख मिला कि दोस्त बयान नहीं कर सकता। दोपहर होते-होते दूसरे गमले में भी कुछ छोटे फूल नज़र आए... और यह सब इस घर का हिस्सा हैं.. यह एहसास बहुत सुखद है।
आज बहुत दिनों बाद एक कविता भी लिखी है... इसी के साथ तुम्हें भेज रहा हूँ, आशा है पसंद आएगी।
बीच में कुछ नाटक देखे जिनका अनुभव बहुत सुखद नहीं था।
इस गढ़-मढ़ से खत के लिए माफी चाहता हूँ... पर इस घने-अंधकार में कुछ शब्दों का निकल जाना एक तरह की खाली जगह बनाता है... जिसमें ’नींद’ शायद आसानी से प्रवेश कर सकती है... वरना नींद की जगह शब्द होते हैं... शब्दों के अपने चित्र होते है... और उन चित्रों की अपनी पहेली.. जिनके जवाब न दे पाने पीड़ा आपको जगाए रखती हैं।
आशा है तुम स्वस्थ होगे।
बाक़ी अगले विचार पर....
मानव...

Tuesday, August 17, 2010

मेरे प्रिय दोस्त... (दो..)



प्रिय दोस्त,
हर कुछ समय में हम सब एक ऎसी स्थिति में पहुंच जाते है कि हमें दुनियाँ का अर्थ बूझे नहीं बूझता है। सारे जवाब GOOGLE भगवान के पास मौजूद होने के बावजूद।
मैं इस संबंध मे कई दिनों से विचार कर रहा था कि इतनी सारी information का हम क्या कर सकते हैं? इतिहास मेरा प्रिय विषय होने के बावजूद मुझे कभी सन याद नहीं रहते थे। मुझे किसी के जन्म दिन याद नहीं रहते। मेरा अपना मोबाईल नम्बर याद करने में मुझे बहुत परेशानी होती है।
मैं जब new York के म्युज़ियम में धूम रहा था तो यह बात मुझे सबसे ज़्यादा अखरती थी। इतनी सारी information ... मुझे पता था कि मैं म्युज़ियम से बाहर निकलते ही यह सब भूल जाऊंगा फिर मैं क्यों यह सब सुन रहा हूँ।... फिर मुझे लगने लगा कि यह सारी information मुझसे चख़ने का हक़ छीन रही है। मैं किसी भी चीज़ का स्वाद ही नहीं ले पा रहा हूँ। मैं सारी information’s को दरकिनार करके वापिस म्युज़ियम घुसा... ओह!!!
Information एक तरीके से मेरे लिए हर चीज़ को मृत कर देती है। “यह था.....इस वक़्त.. ऎसे... “ – जैसे वाक़्य कला को मेरे लिए बिल्कुल ही निर्जीव चीज़ बना देते थे। मेरा उससे संबंध बनाए नहीं बनता।
प्रिय दोस्त, सीधे शब्दों में, मुझे हमेशा लगता है कि मेरे पहले एक दुनियाँ थी... जो चली आ रही थी लगातार... कुछ उसकी सूचना “Bill Bryson की खूबसूरत किताब- a short History of nearly everything से मिली... मेरा इसमें प्रवेश 1974 में हुआ.. उसके बाद से मैं दुनियाँ को, जैसी वह मेरे सामने आती है, जीना शरु कर दिया।
यह आसान नहीं है... इस जीने की प्रक्रिया के बहुत से नियम है जो एक सामाजिक ढ़ांचे के रुप में हमारे पुराने लोगों ने बनाए है... जिससे हम इस दुनियाँ में एक क़ायदे से जी सके। उन नियमों को जानने समझने और फिर अमल करने में (नियमों का उलंघन करने में भी...) आप खुद को एक ऎसी जगह पाते है जहाँ से आप एक तरीके की दुनियाँ देख रहे होते है (आपका point of view जैसा कुछ..)। फिर जिस दुनियाँ के इतिहास को आपने जीते-जी बटोरा था वह इतिहास और आपकी जगह से देखी जा रही दुनियाँ, आपस में मेल नहीं खाती। तब आप अपने तरीके से इस दुनियां को interpret करना शरु करते हैं.. जिससे कला, धर्म, अतंकवाद, नकसलवाद... आदि आदि शुरु होते हैं।
पर जब पहली बार आपको वह जगह मिली थी जिसे आप अपनी ज़मीन कह सकते थे... जहाँ से आप एक अलग तरीक़े की दुनियाँ देख रहे थे... तब आप अकेले थे...। उस वक़्त की खुजली कि- मैं बता दूं कि जो दुनियाँ मैं यहाँ से खड़े होकर देख रहा हूँ वह अलग है... ने सारा संधर्ष शुरु किया। जबकि सब अपनी अलग जगह से दुनियाँ देख रहे थे... और सभी अपनी-अपनी जगह बिलकुल अकेले हैं। इसमें हिंसा वहाँ शुरु होती है जब आप अपनी दुनियाँ को पूर्ण सत्य के रुप में स्थापित करना चाहते हो...। इसमें कुछ लोग आपके साथ हो जाते है जिनको अपनी ही जी हुई दुनियाँ पर थोड़ा कम भरोसा था। अब चूंकि वह अपनी ज़मीन और जहाँ से वह अपनी अलग दुनियाँ देख रहे थे, खो चुके होते है तो उन लोगों में हिंसक प्रवृति ज़्यादा होती है।
अब इसमें इतिहास इतना सारा और अनंत है कि वह काल्पनिक मौखिक उपन्यास जैसा हो जाता है। (जैसे war and peace लिखित न होकर एक मौखिक कथा हो।) अनंत इतिहास के कारण शब्दों पर भी विश्वास करने से डर लगता है। जैसे एक शब्द ’मन...’ है... बचपन से ’मन..’ से संबंधित मैंने इतना कुछ पढ़ा और सुना है कि वह एक व्यक्ति सा जान पड़त है जिसे मैं जानता था... जबकि मन कहीं नहीं है... भगवान भी मन के बहुत करीब आता है। खेर मेरे प्रिय दोस्त शब्दों को लेकर मेरी अपनी एक अलग कहानी है जिसका ज़िक्र मैं अभी नहीं करना चाहता हूँ।
प्रिय दोस्त यह सब शायद मैं अपनी ज़मीन पर खड़े होकर देख रहा हूँ, यह मेरी सुविधा की ज़मीन है जिससे मुझे थोड़ा जीने में आसानी सी लगती है। इस पूरी उथल-पुथल में मैं अपना मतलब निकाल कर किनारा नही कर रहा हूँ बल्कि अपने मतलबों को थोड़ा उल्टा-पल्टाकर देख रहा हूँ। दोस्त यह बात तुमसे कहते हुए भी मैंने ना जाने कितने वाक्य काटे और कितने वापिस जोड़ दिये... इस ख़त को लिखने में ही मेरे भीतर मानों कुछ सफाई सी हो गई... या कुछ कचरा स्थाई हो गया कौन जाने।
तुमसे संवाद करके अच्छा लगा। आशा है तुम्हें भी प्रसन्नता हुई होगी।
आपना ख्याल रखना।
बाक़ी अगले विचार पर...
तुम्हारा..
मानव

Monday, August 16, 2010

मेरे प्रिय दोस्त...


प्रिय दोस्त,
आज सुबह एक अजीब बोझ लिए उठा...। उठते ही कुछ हल्का होने के लिए मैं Ruskin Bond पढ़ने लगा। अजीब था कि Ruskin bond के बगल में van gogh की किताब रखी हुई थी। कुछ कहानियाँ खत्म करने के बाद मैंने सीधा van gogh उठा लिया।
कल मैंने Gandhi और godfather एक साथ देखी थी।
कल ही एक दोस्त ने मुझसे पूछा था कि ’अमर होने का क्या मतलब है?’
मेरे प्रिय दोस्त जब मैं उसे इस बात का जवाब सा दे रहा था तो खुद भीतर अजीब सी उलझन महसूस कर रहा था। मुझे कुछ बहुत से चित्र याद आए.... जैसे एक बच्चा पेड़ पर अपना नाम गोद रहा है। किसी मंदिर में एक सेठ का शिलालेख लगा हुआ है। फिर कुछ वह लोग याद आए जो ऎसे जीते है मानो इन्वेस्ट कर रहे हो। उन लोगों के बीच बैठे हुए किसी ने मरने की बात छेड़ दी तो लगभग सब लोगों का जवाब था कि ’अरे ऎसे कैसे मर सकते हैं... भाई इतना किया है... अभी इसे भोगना तो बचा ही है। बिना भोगे थोड़ी मरेगें।’
फिर कुछ और लोग याद आए जो किसी मकसद से जीते है... जो ओर भी असहनीय है। यह....हम यूं ही पैदा नहीं हुए हैं से लेकर हम यूं ही नहीं जी रहे है... इस की लड़ाई है। बचपन की इच्छा कि मैं अब बच्चा नहीं हूँ... लोग मुझे गंभीता से ले... के बड़े रुप हम सब देखते रहते हैं।
अब इसमें अमर होने की इच्छा मुझे बहुत ही सहज बहती हुई दिखती है।
मेरे प्रीय दोस्त मेरी उलझन वहाँ शुरु हुई जब इन सारी बातों के बीच मैं खुद अपना उद्धाहरण पेश करने लगा। जिसका मुख्य बिंदु ’निरंतरता’ था।
मैंने शुरु किया था कि जब मैंने अपना पहला नाटक प्रस्तुत किया था... उसकी मुझे जो याद है वह है नाटक के बाद मिली वाह वाही... मुझे तो कुछ संवाद अभी भी याद है जो लोगों ने नाटक देखने के बाद मुझसे कहे थे।
मेरे प्रिय दोस्त तभी मैंने अपने दोस्त से पूछा कि फिर उसके बाद मैंने इतने और नाटक क्यों लिखे? क्यों किये?... जवाब बहुत से थे पर उस वक्त जो जवाब मैंने कहा था वह था... शायद यह उस वाह वाही की याद थी जो मैं फिर से बार-बार जीना चाहता था। उस एक बात की निरंतरता मैं बनाए रखना चाहता था... ।
विचार एक अजीब सी निरंतरता की प्रक्रिया है। बिना विचार का कोई क्षण नहीं होता है। silent mind जैसी कोई चीज़ नहीं होती है। यह विचार अपने आश्चर्यों की निरंतरता बनाए रखना चाहते हैं। हमें हर आश्चर्य जीते ही सामान्य लगने लगते हैं... हम उन आश्चर्यों को तुरंत अपने जीने का हिस्सा बना लेते हैं..। पर उस आश्चर्य को जीते हुए जो अनुभव हुए थे उसकी निरंतरता की भूख कभी खत्म नहीं होती। जिसकी वजह से हम ईंट पर ईंट रखते जाते हैं... इसका कोई अंत नहीं है।
इन सब बातों के बीच में ही कहीं मैं चुप हो गया था। फिर बहुत लंबी ख़ामोशी के बाद हमने बातें बदलने की बहुत कोशिश की पर हम असफल रहे।
बहुत समय से मेरी इच्छा बढ़ती चली जा रही है कि मैं किसी पाहड़ पर एक गांव में चला जाऊं... जहाँ कुछ चार-पाँच अभिनेताओ की एक रेपेट्री खोल दूं। वहीं एक छोटा सा थियेटर बनाऊं.. और वहीं रहकर नए किस्म के प्रयोग करुं...। यह इच्छा दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही चली जा रही है। मुझे हमेशा से लगता रहा है कि नए प्रयोग... या नाटक की नई भाषा की शुरुआत कुछ इसी तरह की जा सकती है।
अभी तो नए नाटक के गुणा-भाग में लगा हूँ... “हाथ का आया?...शून्य” यह नाटक का नाम है।
प्रिय दोस्त इस नए नाटक को लेकर मैं काफी उत्साहित हूँ... आशा करता हूँ जो सोच रहा हूँ उसके अगल-बगल कहीं पहुंच जाऊंगा।
आशा है तुम अच्छे होगे...
बाक़ी नए विचार पर....
तुम्हारा
मानव

Thursday, August 5, 2010

New york, New york...


न्युयार्क के महीने भर के मेरे प्रवास की जितनी बातें मुझे अभी याद हैं उसका ब्यौरा कुछ इस प्रकार है।
मैं जब न्युयार्क से वापिस लौटा और पहली बार Jet lag जैसी चीज़ का शिक़ार हुआ तो अपने ही नाटक का एक वाक्य याद आ गया कि “दुनियाँ बहुत बड़ी है, बहुत बड़ी, उड़ते-उड़ते वाट लग गई।“
जब मुझे कुछ दिन न्युयार्क में हो गए तो एक शाम मैं अपने दोस्त Aris के साथ हडसन नदी के किनारे बीयर पी रहा था, हम दोनों अपने-अपने देश के थियेटर के बारे में बातें कर रहे थे... तभी कुछ असहज सी चुप्पी के बीच मैंने Aris से कहा कि ’मैं असल में एक बहुत ही छोटे से गांव में पला बढ़ा हूँ।’ मुझे नहीं पता कि मैंने ऎसा क्यों कहा और उसने इसका क्या अर्थ समझा होगा... पर वह मुझे देखकर मुस्कुरा दिया, हम काफी देर तक उसी असहज सी चुप्पी के बीच शांत बैठे रहे।
यह बहुत ही सहज था कि गैर-अंग्रेज़ी देशों के लोग आपस में काफी अच्छे दोस्त बन गए...। मेरे कुछ करीबी दोस्तों में Orly Rabinyan (Israel) , Aris Troupakis (Athens, Greece), Xavier Gallais (France), Laura Caparrotti (Italy) थे। इन कुछ लोगों की ख़ास बात यह भी थी कि यह उस किस्म का थियेटर ज़्यादा पसंद करते थे जिसकी तरफ मैं शुरु के आकर्षित रहा हूँ।
न्युयार्क शहर बहुत ही खुबसूरत और अतिव्यवस्थित शहर है। उस सामजिक ढ़ाजे के नियमों का लोग बहुत ही अनुशासन से पालन करते है और यही बात उनकी कला में भी नज़र आती है। उनके नाटक (जो मैंने देखे और समझ पाया...) एक बने बनाए मनोरंजन के नियमों का पालन करते हैं, इसलिए हमसे बहुत दूर दिखते है। म्युज़िकल नाटक का हर गीत.. कहीं सुना हुआ गाना लगता है। कुछ broadway के नाटक देखने के बाद मैं कुछ निराश सा हो गया। फिर मैंने एक 0ff broadway नाटक देखा OUR TOWN (Thornton Wilder) जो मुझॆ बहुत पसंद आया।
Lincoln Center Directors lab में तीन हफ़्ते बहुत ही उम्दा बीते। ’शक्कर के पाँच दाने’ (अंग्रेज़ी मे) के दो Presentations हुए, पहला जो मैंने present कीया और दूसरा presentation एक अमेरिकन director, Andrew ने किया जो बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। कुल सत्तर निर्देशक सारी दुनियाँ से आए थे, लगभग सबका काम करने का तरीका और काम देखना बहोत ही रोमांचक अनुभव रहा। इस बार लेब का विषय “धर्म..” था... सो एक तरीके की बहस हर बात-चीत में छिड़ जाती... सबके अपने सिद्धांत थे, अलग-अलग आस्थाएं थी.... इन बहसों से मेरी थोड़ी दूरी रहती थी क्योंकि हमारे देश के चीख़ते चिल्लाते धर्म की थकान मेरे भीतर इतनी है कि मैं ऎसी बहसों में मौन ही रहता हूँ। इन सारी बहसों के करण कुछ लोगों की आपस में दूरीयाँ बढ़ गई और कुछ करीब आ गए। तीसरे हफ्ते अलग-अलग समूह साफ नज़र आने लगे थे। सभी लोगों ने अपने तरीक़े के लोग ढ़ूढ़ निकाले थे। धार्मिक बहसों के बीच मौन के कारण मैं लगभग हर समूह में भटकता रहा। जिन भी लोगों के साथ थोड़ी गहराई से जुड़ा उसका कारण सिर्फ थियेटर था.... धर्म नहीं।
इसके अलावा वह क्षण जिनका गहरा असर मेरे ऊपर अभी भी है वह हैं... JEAN-PAUL SARTRE और ALBERT CAMUS के PORTRAITS के सामने मंत्र मुग्ध सा खड़े रहना( CARTIER BRESSON की प्रदर्शनी में), VAN GOGH की पेंटिंग CYPRESSES AND STARS को घंटो अपलक ताकना, Aris के साथ थियेटर की बहसों में राते धुंआ करना, Orly के साथ बिताए कुछ पल... निम्रत के साथ पैदल न्युयार्क नापना.. और जो क्षण बुरी तरह याद है वह है उस अथाह शहर मैं धंटों अकेले धूमना... जहां आप किसीको नहीं जानते और आपको कोई नहीं जानता... कोई आपकी परवाह नहीं करता और आप किसी की परवाह नहीं करते और यह बात एक अजीब सी मुक्ति से आपको भर देती है। उस मुक्ति के क्षण में आप एक सच कहना चाहते हो, उसे लिख देना चाहते हो पर ऎसा नहीं करते और ‘ऎसा नहीं’ करना आपको खुशी से भर देता है... जिस खुशी के क्षण मैंने वहां खूब बटोरे हैं।
एक बड़ी समस्या अमरीकी थियेटर की है कि वहाँ जवान दर्शक नहीं है। सारे बूढ़े श्वेत अमीर अमेरीकन… महगें टिकिट खरीदकर नाटक देखते हैं और पूरा broadway थियेटर उनकी NOSTALGIA की भूख मिटाता है। वहां नाटको की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी है कि ’प्रयोग..’ जैसे शब्द की वहां कोई जगह नहीं है। पर off broadway और off off broadway में कुछ प्रयोग धर्मी नज़र आते हैं। अभिनेताओं और playwrights की बहुत इज़्ज़त है , जो जायज़ भी है, पर मेरे हिसाब से playwrights को थोड़ा ज़्यादा महत्व मिलता है... सो “Copy Left...” पर मैंने लिंकन सेन्टर में बात की जो सभी लोगों ने बड़े उत्साह से सुनी क्योंकि उन लोगों के लिए यह पहली बार सुना गया शब्द था।
एक भूखे बच्चे सा कोतुहल पूरे समय था कि सारा खाना खा जाऊं और फिर बाद में गाय जैसा सालों तक जुगाली करता रहूं..। मेरे एक अमेरिकन मित्र MARK जब मुझसे विदा ले रहा था तो उसने पूछा था कि ’इतना खूबसूरत समय.. इतने सारे लोग.. पता नहीं ज़िन्दग़ी में फिर इनसे कभी मुलाक़ात होगी भी कि नहीं...?’ मैंने कहां कि ’पता नहीं...’ बाद में मैंने जोड़ा ’वैसे... किसी बहुत खूबसूरत किताब को पढ़ने लेने के बाद हम कितनी बार उस किताब पर वापिस जाते हैं?’
अभी मैं कई लोगों के नाम भूल चुका हूँ, शायद कुछ समय में सब के चहरे भी खो जाए!! कुछ सालों बाद शहर याद रहे पर गलियाँ भूल जाऊं। बात याद रहे पर किसने कहीं थी यह भूल जाऊं। क्या छूट गया याद रहे पर क्या पाया था यह भूल जाऊं... मुझे नहीं पता। मेरे हिसाब से इन सबका मेरे अवचेतन पर जो असर हुआ है उसके निशान बहुत समय तक मेरे नाटको में नज़र आते रहेगें।

Sunday, June 6, 2010

शंख और सीपियां...


शंख और सीपियां...

24th,may, 2010


अतृप्त, बैचेन, छल, नींद, समझ.....

और फिर हम सुखी रहने लगे। कहते थे कि हम किसी भी तरह से गुज़र जाएगें, धीरे-धीरे ही सही पर हम गुज़र ही जाएगें।

फिर बहुत समय बाद......

’उदासी’ का कोई संबंध ’उदासीनता’ से नहीं है... या है...?

छोटी-छोटी खुशियाँ जो किनारे बहती हुई चली आती वह उन्हें बटोरकर घर सजा लेती... घर में सीपियों और शंखों की अपार भीड़ थी। मैं कभी-कभी छोटे शंख बजा लेता तो वह मना कर देती कहती अपशकुन होता है। वह विश्वास करती थी... मैं विश्वास और अविश्वास के झूले में झूलता रहता था। शंख हम बचपन में पल्ली पार जाकर बजाते थे... वहाँ बहुत रेत थी... ढ़ेरों शंख मिलते थे... उन्हें उग्लीयों के बीच में फसाकर खूब बजाते। मैंने उससे कहा कि
‘यह मेरे बचपन का खेल था...’
तो वह नाराज़ हो गई।
‘अब तुम बड़े हो चुके हो... बचपन बीत गया... अब घर बनाना है।‘
घर नहीं बन रहा था... वह बार बार मेरे पास आती और पूछती कि
‘घर क्यों नहीं बन रहा है?’
मैंने उससे कहा कि
‘मैं बचपन में घर-घर खेलता था, वहाँ मैंने बहुत घर बनाए हैं.. मुझे घर बनाने की आदत है.. मुझे आता है घर बनाना।‘
पर मैं अभी भी खेल रहा था.... मैं अभी-भी वहीं, खेल वाला घर बनाता हूँ रोज़।
उसने सारे शंख और सीपियाँ बाहर फेंक दिये।
मैं डर गया... कितना सारा शरीर से निचुड़कर निकल जाता है एक घर बनाने में...।
मैं अपने सीपियों और शंखों के चले जाने की तकलीफ ही बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। वह बाहर कहीं खुले में पड़े होगें... कोई कार.. कोई तांगा.. कोई स्कूटर उनके ऊपर से अभी तक गुज़र भी चुका होगा। अब कमरे में शंख, सीपियों की जगह खाली थी। मैंने वहाँ एक पानी से भरा खाली कटोरा रख दिया। ‘खाली जगह खुद अपने सामान तलाश लेती है...’- वह कहती थी, ‘घर ऎसे ही तो बनता है, बस एक खाली जगह मिल जाए जो अपनी हो, घर वह जगह खुद बन जाएगी।‘
खाली जगह की तलाश में मैं कई बार नदी किनारे गया। यहाँ काफी खाली जगह है... पर यह खाली जगह खाली नहीं है यहाँ शंख है सीपियाँ है... रेत है..., कुछ सांप है जो टहलते हुए इस तरफ चले आते हैं, गुबरेले कीड़े हैं.. झाड़ है, मछलियों के बाहर आकर तड़पने के निशान हैं। मैंने उससे कहा कि…
‘एक जहग मुझे मिलि है नदी किनारे.. पर वह खाली नहीं है वह बहुत सी चीज़ो से भरी पड़ी है, क्या उन सबके बीच तुम रह पाओगी?’
उसने कहा कि....
‘वह उन्हें खाली कर देगी बस उसे चार दीवार चाहिए।‘
अरे, यह शंख और सीपियों की जगह है, उन्हे उन्हीं की जहग से कैसे खाली किया जा सकता है?
चर्र... चट... चर्र... पट...

मैं पहाड़ों की तरफ चला गया। पहाड़ों में खाली जगह की कमी लगी। पहाड़ों में पहाड़ी गांव थे... या पहाड़ थे.. जहाँ भी खाली जगह थी वहाँ खेत थे, खेत खत्म होते ही पहाड़ शुरु हो जाता था। कुछ खाली जगह दिखी तो लोगों ने कहाँ कि यह जंगल है... । मैंने कहाँ जंगल तो थे...? तो उन्होने कहाँ कि
‘अगर यह जगह चाहिए तो इनके कटने का इंतज़ार करो.....’
पर मैं आगे बढ़ गया। बहुत से पहाड़ खत्म होने पर मुझे पहाड़ी गांव के कुछ चरवाहे मिले, मैंने उनसे कहा कि
’देखो मैं एक आदमी हूँ, एक औरत के साथ मैं रहता हूँ एक कमरे में... अब हमें लगता है कि हमारे पास एक घर होना चाहिए..।’
कुछ चरवाहे थे और उनके पास कुछ भेडें थी... भेड़ों ने सिर हिला दिया। मुझे लगा वह भेड़े हाँ और ना साथ में कह रही हैं...। मैं भेड़ों की भाषा समझने उनके कुछ करीब चला गया..
’हे...? हे...?’
मैं हे.. हे....करके उनसे वापिस पूछने लगा। तभी चरवाहों को लगा कि मैं शायद भेड़ों की भाषा जानता हूँ... सो उन्होने बीच में टोकते हुए कहा कि...
’सुनों तुम ठीक सोचते हो.....।’
सभी चरवाहे ’हाँ..’ में सिर हिला रहे थे...। वह मेरी बात समझ रहे थे। उस बात से वह इत्तेफाक भी रखते थे, सो मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि...
’तो अब हमें एक खाली जगह चाहिए...।’
इस बात पर सभी चरवाहे चुप थे... ’खाली जगह?’- के प्रश्नचिन्ह उनकी आँखों में मैं देख सकता था। मैंने सोचा थोड़ा विस्तार में बता दूँ...
’देखों खाली जगह चाहिए, वह कहती है कि घर खुद-ब-खुद बन जाएगा।’
यह विस्तार उनके लिए बहुत बड़ा विस्तार था शायद... वह थोड़ा पीछे हट गए। मैं कुछ कदम उनके पास गया... वह कुछ कदम और पीछे हट गए। मुझे लगा विस्तार को खत्म करके सीधे बात पर आता हूँ...
’घर बनाना है... जगह चाहिए।’
सभी चरवाहे दूर पहाड़ों की तरफ देखने लगे। सारी भेड़ों ने इशारा जान उस और चलना शुरु कर दिया। भेड़ों को चलता देख सभी चरवाहे उनके साथ हो लिए.. और मैं उनके पीछे-पीछे। मैं भेड़ नहीं था... मैं चरवाहा नहीं था। भेड़ चाल मुझे थकाए जा रही थी। पर मैं उनके साथ बना रहा। घर बनाने के लिए भेड़-चाल ज़रुरी है। मैं बीच-बीच में रुक कर चीख़ता..
’खाली जगह... खाली जगह...।’
कभी भेडें तो कभी चरवाहे रुक कर देखते... फिर आगे को चलने लगते। इस तरह की बेइज़्ज़ती के बाद मेरा उनके साथ रहना मुश्किल था.. पर मैं बना रहा। घर बनाना है तो जो कर रहे हो उसे करते चलो... लगातार।
शाम होते-होते सभी भेड़े छितरने लगी। सारी भेड़ों ने अपनी-अपनी खाली जगह देखी और पसर गई। चरवाहों ने अपनी खाली जगह चुनकर आग जला ली। मैं दूर बैठा रहा। आग जलते ही चरवाहों की जगह घर लगने लगी... लगा उसने घर में चूल्हा जला लिया है। मैं भागकर चरवाहों के पास पहुँचा पर अगर यह घर है तो मुझे दरवाज़ा खटखटाकर भीतर जाना चाहिए... पर दरवाज़ा तो नहीं था.. मैं भीतर कैसे जाऊँ? ’भीतर’ कहाँ से शुरु होता है? क्या मैं अभी बाहर हूँ?
मैं कुछ देर भीतर-बाहर की टेक में लगा रहा। फिर एक आसान सा रास्ता अपना लिया। जहाँ तक उनके आग की रोशनी का दायरा है वहाँ तक उनका घर है। मैंने एक लकड़ी उठा ली और आग के दायरे के बाहर खड़ा होकर उस लकड़ी को ज़मीर पर खटखटाया..। चरवाहे मेरी तरफ देखने लगे...
’क्या मैं भीतर आ सकता हूँ?’
मैंने उनके जवाब की प्रतिक्षा की बजाए सीधा आग के उजाले में घुस गया।
’घर के लिए चूल्हा ज़रुरी है? हे ना?’
’हम्म!!!’
’दीवारे तो मानी जा सकती है?’
’हम्म!!!’
आग की लपट ने चरवाहो के चहरों पर अजीब से रंग की पुताई कर रखी थी। उनके जवाबों में रहस्यों की लपट थी।
’छत का क्या करोगे?’
एक बूढ़े चरवहे की आवाज़ बीच में से आई। वह कहाँ है? मुझे दिख नहीं रहा था।
’छत मानी नहीं जा सकती है।’- बूढ़े ने फिर कहा..मैंने उसे अबकी बार देख लिया था।
’बिना दीवारों के छत टिकेगी नहीं।’- मैंने कहा..
’दरवाज़ों के बिना दीवारों का कोई मतलब नहीं है।’ -इस बार यह बात एक जवान चरवाहे ने कही।
’दरवाज़े के बिना, अगर भीतर हो तो भीतर ही रह जाओगे और अगर बाहर हो तो बाहर ही रह जाओगे।’-एक बच्चे चरवाहे ने चुहल करते हुए कहा।’
मैंने हथियार डाल दिये थे.. मैंने हार कर कहा
’तो क्या सिर्फ आग जलाना काफी नहीं होगा?’
बूढ़ा चरवाहा खड़ हो गया वह मेरे पास आया और उसने कहा..
’एक ताला खरीद लो... घर खुद-ब-खुद बन जाएगा।’
अगले दिन मैं वहाँ से वापिस चला आया।
....
मैं ताला लिए उसके सामने खड़ा था।
’यह क्या है?’
’ताला!!!’
’क्या करें इसका?’
’यह घर बनने की शुरुआत है।’
’मतलब?’
’यह घोषणा है कि इस ताले के इस तरफ आना मना है, यहाँ हम रहते है।’
’लेकिन ताला लगाओगे कहाँ?’
’दरवाज़े पर।’
’दरवाज़ा कहाँ है?’
और मैं दरवाज़े की खोज में निकल गया।

“विचलित तन, विचलित मन, विचलित कुछ- सबकुछ।
कम ऊर्जा, कम बुद्धि, कम हम- श्रम।
रक्त बांह, रक्त थाह, रक्तिम ज़मी- हम।
रम अर्थ, रम कल्पना, रम विधी- शक्ति।
सार कम, सार श्रम, सार शून्य- थम।
थम चित्त, थम नित, थम हम- तुम।
प्रेम पीड़ा, प्रेम राग, प्रेम चंचल- मन।
घर कब्र, घर मंज़िल, घर चर- अचर।“

सहारे के लिए हमेशा की तरह मैंने खुद को नदी के पास पाया। नदी सहारा देती है... यह सिद्ध सत्य है। मैंने नदी से बात करनी चाही पर अंत में खुद को, अपने से ही बड़बड़ाते हुए पाया। कुछ देर की चुप्पी के बाद एक मल्लाह अपने डोंगे (छोटी नाव..) पर सवार मेरे सामने आ गया।
’पल्ली पार जाना है?’
मुझे अपनी शंख और सीपियाँ याद हो आई.. उस पार बहुत मिलती है। मैं डोंगे पर बैठ गया।
डोंगा चलाते हुए मल्लाह बार-बार मेरी तरफ देख लेता। मैं उससे नज़रे चुराते हुए यहाँ-वहाँ झांक रहा था। तभी उसने कहना शुरु किया..
’एक बार एक छोटी मछली उछलकर मेरे डोंगे में आ गई और तड़पने लगी। मैं कुछ देर उसे देखता रहा.. जब उसका तड़पना कुछ कम हुआ तो मैंने उसे उठाकर वापिस पानी में फेंक दिया.. वह बच गई।’
मैं उसे सुन रहा था पर नहीं सुनने की इच्छा में पानी से खेल रहा था। वह चुप हो गया। मुझे इस बात का कोई ओर-छोर समझ में नहीं आया... पर मैंने पानी से खेलना बंद कर दिया, शायद वह कुछ बोलेगा, इस आशा से मैं उसकी ओर देखने लगा।
’कुछ दिनों बाद यह घटना फिर से हुई। मैंने फिर से उस मछली को पानी में फेंक दिया... पर मेरे फेंकते ही वह वापिस उछलकर डोंगे में आ गई। मैंने फिर फेंका.. वह फिर आ गई।’
वह इस घटना को करके बता रहा था.. डोंगा बुरी तरह हिलने लगा.. मैं डर गया।
’फिर मैंने उसे वापिस नहीं फेंका... बहुत देर तक तड़पने के बाद वह मर गई।’
और वह चुप हो गया। वापिस वह अपना चप्पू उठाकर चलाने लगा। मैं बहती नदी के पानी में अपना मुँह धोने लगा...
’क्या वह मछली आत्महत्या कर रही थी?’- उसने कहा..
’हें...?’
आत्म हत्या शब्द मछली के साथ जाता नहीं है... मैंने सुना है कि पक्षि आत्महत्या करते हैं... पर मछली !!!
’क्या आपको लगता है कि उसने आत्महत्या कर ली थी?’- उसने फिर पूछा
किनारा अभी दूर था.. मैं जवाब टाल नहीं सकता था।
’मछलियाँ आत्महत्या नहीं करती।’- मैंने कहा...
किनारे पर आते ही उसने डोंगे को नदी के बाहर खींच लिया... ।
’आप मेरे साथ उस मछली के घर पर चलेगें?’ – उसने इच्छा व्यक्त की...
’मछली का घर?’
’हाँ मैंने उसके लिए एक घर बनाया है।’
’मछली के लिए..? घर क्यों बनाया? वह तो मर चुकी है ना?’
’हमारे यहाँ कहते हैं कि मरने पर जब आदमी अंतिम, गहरी नींद सो रहा हो तो उसे एक घर देना चाहिए, दरग़ाह जैसा कुछ...जिसमें वह बिना किसी तक़लीफ के चेन से सो सके।’
’तो क्या वह मछली इसीलिए तुम्हारे डोंगे में आकर मरी थी कि तुम उसे घर दे सको?’
’शायद....’
’तुमने उसके घर में ताला लगाया है?’
’क्या???’
मैं अपना सवाल दोहराना चाह रहा था, पर तब तक मछली का घर आ गया। एक छोटी सी दरग़ाह उसने मछली के लिए बना रखी थी... पीपल का पेड़ ऊपर था... एक कटोरा पानी उसके बगल में रखा था। मल्लाह ने पानी फेंक कर ताज़ा पानी नदी से भरकर उस कटोरे में रख दिया।
’क्या यह अपने घर से बाहर निकलती होगी?’
’हाँ तभी तो पानी रखा है।’
’पर तुमने घर में दरवाज़ा तो बनाया ही नहीं?’
’उसकी ज़रुरत नहीं है।’
मल्लाह मेरे सवालों से थोड़ा चिढ़ने लगा था। सो मैंने पूछना बंद कर दिया।
कुछ देर बाद मैं नदी किनारे शंख और सीपियां खोजने लगा...। इच्छा थी कि मल्लाह से दरवाज़े के बारे में पूछू पर हिम्मत नहीं हुई।


मैं बहुत से शंख और सींपियों को लिए वापिस उसके पास आ गया। वह मेरा इंतज़ार नहीं कर रही थी। मैंने चुप-चाप शंख और सीपियां उसी जगह पर रख दी जिस जगह पर शंख और सीपियां पहले रखी हुई थी। कटोरा भर पानी जो उसकी जगह मैंने रख दिया था उसे मैंने दूसरे कोने में रख दिया... सोचा जब दोबारा मछली के घर में जाऊंगा तो वहाँ रख आऊंगा।
जीतेजी खाली जगह का मिलना, दीवारे बनाना, दरवाज़ा में ताला लगाना जैसे काम असंभव लगा। असंभव नहीं है... संभव है.. पर मेरे भीतर मछली जितना साहस नहीं है... कि मैं उछलकर अपने पानी से बाहर आऊं और घर के लिए किसी के डोंगे में तडपता फिरु...। ना ही मुझमें चरवाहों जितनी शक्ति है कि जहाँ आग जलाऊं वहीं घर हो जाए...। मैंने घर के आगे समर्पण कर दिया और कमरे में अपना ताला लगाने लगा। वह नाराज़ रही फिर कहने लगी कि मैं अपना घर खुद बनाऊंगी ... मुझे एक खाली जगह मिली है...। कुछ सालों बाद वह अपनी खाली जगह पर चली गई... अपना घर बनाने.....।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल