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Sunday, March 2, 2008

अपने से...


यहां दिल्ली में बैठे-बैठे नई इच्छा से भरे नाटक, कहानीयों और कविताओं के बारे में सोच रहा था।जिनके बारे में लगातार सोचते रहना एक तरह से विवाह के बाद के आपके नाजायज़ संबंधो जैसा होता है...आप शादी तो उस जीवन से कर चुके हैं जो जी रहे हैं... पर दिमाग़ लगातार उस जीवन को जी रहा होता है... जिसकी गुदगुदी आप शरीर में यहां वहां महसूस कर रहे होते हैं।कुछ समय के संधर्ष के बाद शादी वाला जीवन एक तरह से आपसे कन्नी सी काटने लगता है... छोटी-छोटी गुदगुदीयों की मनमानी पे हमारा कोई बस नहीं होता, बस जो बचा रह जाता है वो है खालीपन... अकेलापन, जिसे अकेले खुजाते रहने के भी अपने सुख हैं।पर अभी.. अभी क्या?

मुझे कहानी लिखना है, इन कहानियों की तलाश मेरा पूरा शरीर हर वक्त कर रहा होता है....जुगनू जैसी चमक, और उसकी चकाचौंध में रहकर मुझे कहानी नहीं लिखना है।
मुझे अच्छी कहानी भी नहीं लिखना है, अच्छी कहानियाँ मुझे बोर करती हैं।मेरी कहानी की तलाश जुगनू के चमकने में नहीं है, मेरी कहानी की खोज.. जुगनू के उस अंधेरे में है... जिसे वो अपने दो चमकने के बीच में जीता है।

ऎसी कहानी जिसमें कहानी कहने की पीड़ा न हो... उसमें वो आकर्षक शुरुआत... खूबसूरत मध्य.. और आश्चर्यचकित कर देने वाला अंत, लिखने का बोझ न हो।

Thursday, February 28, 2008

अपने से...



आज एक करीब बारह या पंद्रह साल की लड़की को सड़क पार करते हुए देखा, वो अपनी माँ के साथ थी... माँ उसका हाथ पकड़कर उसे सड़क पार करवा रही थी।जिस तरह से वो अपनी माँ के पीछे-पीछे चल रही थी... मुझे लगा शायद वो लड़की विक्लांग है.. पर नहीं वो बस डरी हुई थी।... मैं रिक्शे में था.. सिग्नल पे, काफी देर तक उसे देखता रहा।
मैं अचानक उन सुरक्षाओं के बारे में सोचने लगा... जो लगातार मुझे मिलती रहीं और मैं हमेशा सुरक्षित महसूस करता रहा।माँ के हाथ सी सुरक्षा... माँ की कोख़ सी सुरक्षा... इस पृथ्वी पे रहने की सुरक्षा।
मुझे ये आदत हमेशा एक हिंसक विक्लांगता का रुप लेती सी जान पड़ती है... और हमें विकलंग होने का भ्रम देती सी भी। सुरक्षित होने की दौड़ में हमने हर असुरक्षित चीज़ को खत्म करना चाहा है।एक तरह का युद्ध हम हमेंशा उस डर के खिलाफ लड रहे होते हैं.. जो हमें हमारी सुरक्षित व्यवस्था को बिगाड़ने का भ्रम देता है।
इस सुरक्षित व्यवस्था,जिसमें हम लगातार सुरक्षित महसूस करते रहें, को कायम रखने के लिए शायद हमारे लिए ज़रुरी था कि हम लगातार एक तरह की सोच के लोगों को बनाते रहें।जिसमें हमारे धर्म और हमारी शिक्षा प्रणाली ने भारी योगदान दिया।इसमें किसी भी जीनियस या असामान्य सोच वाले व्यक्ति की जगह ही नहीं बची।
ये मुझे डरी हुई, ओढ़ी हुई सुरक्षित व्यवस्था लगती है,जिसे काय़म रखने की प्रवृत्ती ही हिंसक है,इसीलिए ऎसी किसी भी व्यवस्था ने हमें कभी भी सुरक्षित महसूस नहीं होने दिया।इस हमारी व्यवस्था ने हमेशा हमें एक बैसाख़ी के सहारे चलना सिखाया है।हमें कोई सहारा लगातार चाहिए... जीते रहने के लिए भी।
आदर्श समाज की कल्पना इस माइने में घोर हिंसक है।क्योंकि वो एक तरह के व्यवहार की लगातार अपेक्षा रखती है... जो नामुमकिन है।
इस व्यवस्था में जो चीज़ काम कर रही होती है वो है डर..., असुरक्षित हो जाने का डर।बैसाख़ीयाँ, जो इसी व्यवस्था ने हमें दी है, उनके छिन जाने का डर।लुट जाने का डर... पिट जाने का डर... वगैरा वगैरा।
वो लड़की जब अपनी माँ के साथ सड़क पार कर रही थी तो लगा अगर उसकी माँ नहीं होती तो वो शायद पूरा दिन सड़क के किनारे ही खड़ी... कभी सड़क पार ही नहीं कर पाती। या शायद एक बार हिम्मत करके सड़क पार कर ही लेती... और फिर उसे माँ के सहारे की कभी ज़रुरत ही न पड़ती... क्या पता।
'एक दिन बाढ़ आएगी और हम सब बह जाएगें...' इस डर से हम पूरी ज़िदगी एक नाव बना रहे होते है...खुद की नाव.. हमें बचा ले जाएगी... इक ऎसी आदर्श नाव। उस... एक दिन बाढ़ आएगी के डर से हम पूरी ज़िदगी नाव बनाने के काम में लगे रहते हैं।
यहां नाव बनाने में पूरी ज़िदगी कुछ कर रहें हैं का भ्रम देती हुई कट जाती है और वहां बाढ़ कभी आती नहीं।

Tuesday, February 26, 2008

अपने से...



कल रात नींद आँखो में आ जा रही थी, बाकी बची देह सो चुकी थी। मैं अपने आज के बीते हुए दिन के बारे में सोच रहा था।थोड़ा कहीं बीच में जी लिया, कहीं बीच में रह गया.. कहीं कुछ छूटते-छूटते पकड़ लिया। इस तरह से दिन तमाम हुआ।
इन बहुत सारे ऎसे बीत दिनों में, मुझे कितने दिन याद हैं ???... अगर इसमें सिर्फ जिए हुए को हिस्साब में रखूं... तो हमारी उम्र कितनी कम हुई !!! बहुत कम..। मैं शायद महीना भर पहले ही पैदा हुआ हूँ... नहीं पर मेरे पैदा होने की ' जी हुई याद' किसी और की है.. उसे मैं अपने दिनों में शामिल नहीं कर सकता।सो हमने कब से,कहां से जीना शुरु किया इसका हिसाब बहुत कठिन है , और उम्र कम होने की खुशी भी नहीं हैं।:-)

नींद का एक झोंका आया.. पता नहीं कितनी देर मैं सोया था... फिर आँखे काफी समय तक खुली ही थी,मैं अचानक उन दिनों के बारे में सोचने लगा जो पकड़ में रहते थे।मिट्टी में, धूल में सने हुए दिन...।पलक झपकती थी और बीत जाते थे...। उन्हीं दिनों के ढे़रों छोटे-छोटे मक़सद हुआ करते थे। वो सारे मक़सद उसी दिन शुरु हो्ते और उसी दिन खत्म भी हो जाते। कल आएगा कि नहीं, ये कभी सोचा नहीं। 'कल' को हमारी जितनी चितां थी, उतनी ही हमें कल की। साफ-साफ सा जीते थे.. और खुद पूरे गंदे रहते थे।
अब हमने खुद को पूरा साफ करके रखा है...एकदम चकाचक। सामने गंद्ले से दिन पड़े दिखते है... जिन्हें हम कल्पना के साफ कल में धकेल देते हैं।
'खुद गंदे हो जाएगें' के डर से हम आज जी नहीं पाते... और कल, कल है कि साला कभी आता ही नहीं।:-).

Tuesday, February 12, 2008

अपने से...




'नया जीना है, भीतर से इच्छा काफ़ी तेज़ हैं... पर पुरान कचरा इतना भरा पड़ा है, कि उसे बुहारने में इतना समय खर्च हो जाता है कि जब कमरा साफ़ हो जाता है तो जीना भूल जाता हूँ।'


'सर्दियाँ उन सभी बातों की ठंड़ करीब लाती है, जिन बातों को भुलाने के लिये मैंने पसीने बहाएं हैं।'

'मैं कभी-कभी उस वजह के बारे में सोचता हूँ जिसकी वजह से हम बाहर चले जाते है। अपने से, घर से, शहर से...। शायद हम अपने को ही.. खुद को ही थोडा दूर जाकर देखने की कोशिश कर रहे होते हैं'

अपने से...



उगलियां नहीं चल रहीं हैं।हाथ किसी दोग्लेपन की वज़ह से साथ छोड़ रहे हैं।
जब तबियत खराब जैसी होती हैं-तो पेन और डायरी ढूढ्ने की तलाश- तबियत

ठीक कर देती हैं। दिमाग़ लिख़ने की पीड़ा से भटक जाता हैं।
अब सोचता हूँ.. कि अब नया क्या लिखूँगां... या कैसा लिखूँगा? बहुत सी
images हैं.. पर इच्छा है कि-- मैं तीसरी बात कहूँ.. पर पहली बात पर रहकर ही।जब
नदी- की जैसी बात कर रहा हूँ तो रेगिस्तान में खड़ा हूँ... जब पीड़ा की बात करु तो...
हसतें हसतें आँखों में पानी आ जाएं...।

अब पहला सीन क्या होगा, पहला पाञ, पहली बार मंच पर आकर पहला शब्द क्या कहेगा,

फिर उस शब्द का पहला वाक्य क्या होगा।'नींद... नींद आ रही हैं'...हाँ ये ठीक है..' और फणिश्वर नाथ रेणु पानी लेकर आते हैं'... क्या.. क्या.. shut up.. :-).

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मानव

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परिचय

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल