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Friday, February 22, 2008

अंतिमा...

मैंने अपने उपन्यास में कहीं लिखा है..

'बचपन के खेल से लेकर बडे़ होने के दुख तक'

...उपन्यास की reading के दौरांन मैंने ये वाक्य पढा और पता नहीं क्या हुआ, मैं आगे बढ ही नहीं पाया ...मैं रुक गया..मैंने इसे फिर पढा़... और मैं चुप हो गया। कुछ साल पहले लिखे इस वाक्य ने जैसे मुझे झंझोड के रख दिया।फिर मुझे अचानक अपनी लिखी कविता का एक वाक्य याद आ गया...


कुछ चेहरे थे, जो इसीलिये धुंध में ख़ो गये थे, कि हम बडे हो सकें,
और हम बडे होते गये।


मैं काफ़ी देर तक चुप रहा, मुझसे आगे उपन्यास नहीं पढा जा रहा था।
पर मैं पढता गया...

Thursday, February 21, 2008

अन्तिमा

बहुत समय हो गया उपन्यास वहीं पे है... रुका हुआ। 'उपन्यास की अपनी नि्यति है...'- ऎसा कुछ सोच लेता हूँ, 'जब नहीं लिख रहा हूँ'.. का गिल्ट होता है...।वो कोई और है, जो उपन्यास लिखता है...कोई और है, जो नाटक, कविताएँ या कहानी लिख रहा होता है....। जो अभी तक उपन्यास लिख रहा था, वो लिखने के पहाड की चोटी पर नहीं है, इस चोटी पे इस वक्त कहानी लिखने वाला बैठा है.....उपन्यास लिखने वाला नीचे,..पहाड के गहरे अंधेरे में..... अंधेरे की बहती नदी में, अपना चहरा धोने गया है...:-)..

Tuesday, January 29, 2008

अन्तिमा

मैं चाहता हूँ कि मैं अपने उपन्यास (अंतिमा) की यात्रा के दौरांन उसके अनुभवो को यहाँ लिखता चलूं....उसकी कहाँनी को बताए बिना...

एक अजीब सी पीडा, अजीब से अकेलेपन से होकर उपन्यास गुज़रता है। ठीक इस वक्त उपन्यास जिस छोर पर खड़ा है वहां अगर एक शब्द भी फेंको तो वो इतनी देर तक गूजता है कि लगता है जैसे, जल्द ही अगर उसे दूसरे शब्द का सहारा नही दिया गया, तो मेरे कान फट जायेंगे..ये अघिक्तर उन शब्दों के साथ होता है जो झूठे होते हैं, ज़बरदस्ति कहीं फसाए जाते है.. और जिन्हे मैंने अपनी पूरी ईमानदारी या पूरी सच्चाई के साथ नहीं लिखा होता है...। वक़्त उपन्यास को लिखने में उतना नहीं लग रहा है जितना वक़्त इन झूठे शब्दों को मिटाने.. अजीब बात है..:-).

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल