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Sunday, May 2, 2010

इति और उदय..


इति और उदय...

वह फिर वहीं बैठी थी... उसी पार्क की उसी बेंच पे। उसका हाथ उदय के हाथ में था। होंठ कभी तन जाते, तो कभी ढ़ीले पड़ जाते। आँखों के निचले हिस्से में पानी भर आया था। बाक़ी आँखें सूखी पड़ीं थीं। इस अजीब स्थिति के कारण उसका बार-बार पलक झपकने का मन करता... पर पानी छलकने के डर से वो उन्हें झपक नहीं पा रही थी। सो पलकों का सारा तनाव, उसके आँखों के नीचे पड़े गहरे, काले गढ्ढ़ों से सरकता हुआ होंठों तक आ गया था। सो होंठ कभी तन जाते कभी ढ़ीले पड़ जाते। चहरे के इतने तनाव में होने के बावजूद, कान असामान्य रुप से शांत थे, क्योंकि वो उदय की गोल-मोल बातों के आदी हो चुके थे। बाक़ी पूरा शरीर छूट के भाग जाने की ज़िद्द पर अड़ा था.. सो असामान्य रुप से ढ़ीला पड़ा हुआ था।
इति की निग़ाह अचानक उदय के हाथों पर पड़ी... इन सब में उदय की एक चीज़ जो इति को शुरु से अच्छी लगती है, वो हैं उदय के हाथ, जो आज भी वैसे-के-वैसे ही हैं, उसकी वो नर्म-गर्म लंबी उंगलियाँ, मखमली हथेली। इति के साथ इन सालों की यात्रा में उदय के हाथ वहीं के थे.... उन्हीं पुराने सालों के, जिन सालों में इति, इस संबंध को जीने के कारणों को बटोरा करती थी। कारण आज भी पूरे नहीं पड़ते...। ये संबंध पहले भी अमान्य था, आज भी अमान्य है। अब, इतने साल गुज़र जाने के बाद, इसमें संबंध जैसा भी कुछ नहीं रहा है। यह एक बीमारी हो गया है, जिसका इलाज इति, हर उदय की मुलाक़ात के बाद ढूँढ़ने में लग जाती है।
उदय के साथ सोये हुए भी इति को अब साल होने को आया है। ’यहाँ, उदय अब हम इसी पार्क में मिला करेंगें।’ इस बात की घोषणा इति ने ही की थी। इति को इस लंबी चली आ रही बीमारी में यह हल्की सी राहत देती थी।
’मैं लेखक हूँ।’ ये उदय शुरु से मानता रहा है। वो कभी भी अपना construction का काम छोड़कर सालों से अधूरा पड़ा उपन्यास लिखना शुरु कर देगा। इति ने तो अब उपन्यास का ज़िक्र करना भी बंद कर दिया है। पहले वह उदय को डरपोक, compromising वगैरह बोलती थी, पर अब वह बस उदय की तरफ एक बार देखती है और उदय बात पलट चुका होता है।
’मिली तुम्हारे बारे में पूछ रही थी? एक दिन घर मिलने आ जाओ...।’
अपनी बहुत सारी बातों के बीच में ही कहीं उदय ने अचानक अपनी बेटी का ज़िक्र छेड़ दिया।
’... और जिया..?’
इति ने सीधे उदय की आँखों में देखते हुए पूछा था। जिया, उदय की पत्नि है।
’उसे अपने टी.वी. सीरियल से फूर्सत ही कहाँ मिलती है।’
उदय ने ऎसे कहाँ, जैसे वो मौसम की बात कर रहा हो। इति को ये सब एकदम हास्यास्पद लगने लगा, वो सोचने लगी ’अब ये कैसे संवाद हैं, क्या है ये सब... इनसे कोई छुटकारा नहीं है।हर बार क्यों मुझे धूम फिर कर इन्हीं संवादों का सामना करना पड़ता है।“जिया कैसी है..?”,”मिली तुमसे मिलने की ज़िद कर रही थी”, यह क्या है, जिया उदय की पत्नि है और मैं उदय की कीप जैसी, नहीं... कीप जैसी क्यों, कीप कहने में मुझे अब क्या शर्म महसूस हो रही है। मैं कीप हूँ... रख़ैल।’
इति की निगाह उदय के चहरे पर गई... फिर होठों पे आकर ठहर गई... उदय के होठ किसी निरंतरता से बराबर हिल रहे थे, अपना कोई किस्सा सुनाने में व्यस्त। उसका एक हाथ, जो इति के हाथ में नहीं था, बीच में थोड़ा बहुत हिल जाता... शब्द कुछ अजीब फुसफुसाहट से मुहँ से निकल रहे थे।अगर यहीं इसी पार्क में इति, उदय के साथ दो दिन बैठी रहे, तो उदय दो दिन तक लगातार बोलने की क्षमता रखता है।पहले इति उदय की फुसफुसाती हुई बातों में पूरी तरह गुम हो जाती थी... ये बातें एक अजीब तरह का घेरा बनाती थी, जिसमें इति गोल-गोल धूमती रहती थी।अब उदय बोलता रहता है और इति, अपनी ही किसी गुफा में, उस इति को तलाश कर रही होती है जो बहुत पहले फिसल कर गुम गई थी।
’हम खर्च हो गये.. उदय।’-
पता नहीं इस बीच कब ये वाक्य इति के मूहँ से निकल गया।
’क्या...?’-
उदय अपनी बातों में शायद बहुत आगे जा चुका था.. कुछ देर बाद वापिस आकर उसने पूछा।
’तुमने कुछ कहाँ..?’
’नहीं..।’
इति ’नहीं’ भी नहीं कहना चाहती थी, वो सिर्फ सिर हिलाना चाहती थी, पर इस बार भी ये शब्द इति की इजाज़त लिए बगैर ही उसके मूहँ से निकल गया।
’इति, मैं तुम्हारे घर चलने की सोच रहा था, तुम्हारी माँ से मिले भी बहुत समय हो गया। वहाँ आराम से बैठके बात करते हैं।यहाँ पार्क में मुझे अजीब सा परायापन लगता है... मानों मैं तुम्हें जानता ही ना होऊं।’
ये उदय का पुराना गिड़्गिड़ाना है, जिसके तय स्वर हैं।घर में मिलो तो सेक्स के लिए, बाहर मिलों तो घर में मिलने के लिए, और अगर नहीं मिलो तो एक बार मिलने के लिए।इति भी पिछले एक साल से एक ही तय स्वर पर टिकी रहती थी-’ना कहना।’ उदय की लगभग हर गिड़गिड़ाहट पर वो यह ही सुर लगाती थी।
तभी बहुत धीमी गति से, डोलता हुआ एक सूखा पत्ता, पेड़ से नीचे गिर रहा था। इस पूरी स्थिरता इति उस पत्ते की आखिरी उड़ान देख रही थी... वह डोलता हुआ बहुत से पत्तों के बीच गिर गया। वह शायद गिरते ही उस पतझड़ में शामिल हो जाना चाहता था, जिसमें बाक़ी सारे पत्ते शामिल थे...। वह बाक़ी सारे पत्तों के बीच में था, लगभग उसी पतझड़ में था, फिर भी अलग था। उसे इति ने रोक रखा था.. इति की आँखों ने, जो उस पर आकर अटक गयी थी। वह कभी इस तरफ उड़ता कभी उस तरफ, पर इति की निग़ाह उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी।
अचानक इति को लगने लगा कि, उदय वो पत्ता है... जिसे वो उसकी पतझड़ में शामिल होने से रोके हुए है...। इस तरह, कभी-कभार उनका मिलना, उदय को अटकाए हुए है।
’फिर मैं क्या हूँ...’ इति सोचने लगी ’शायद मेरी भी कहीं अपनी पतझड़ है, यह मेरी सारी छटपटाहट शायद उस पतझड़ में गुम हो जाने का डर है, इसी डर से मैं बार बार उदय की निग़ाह ढ़ूढ़ती हूँ, कि वह रोक ले मुझे, इन पतझड़ के पत्तों में पूरी तरह गुम हो जाने से..।’
इति ने धीरे से अपना हाथ उदय के हाथ से अलग कर दिया।उदय चुप था। यह शायद उसकी बात खत्म होने के बाद की चुप्पी थी या नई बात शुरु करने के पहले की। इति ने उदय के हाथ से अपना हाथ तब हटाया जब उदय शांत था, सो उदय एक प्रश्नवाचक दृष्टि से इति को देखने लगा। ’हाथ क्यों हटाया?’ इसका क्या जवाब इति देती..? इति उन सारी बातों से बहुत पहले ही थक गई थी, जिनके जवाब कभी किसी के पास नहीं होते थे। उसके बदले बहुत सारे बहाने होते थे... दोनों मिलकर ढेरों बहाने पहले इकट्टठा करते थे.. फिर उन सारे बहानों का एक काग़ज़ का हवाई जहाज़ बनाते थे..फिर उसे उड़ाने के खेल में दोनों मसरुफ़ हो जाते।
-’उदय भूख लगी है.. कुछ लाओगे खाने को..।’
-’चलो कहीं चलकर खाते हैं।’
उदय खड़ा हो गया था।
-’एक समोसा बस.. और हाँ पानी भी लाना प्लीज़।’
इति के आग्रह में आदेश जैसी कठोरता थी, सो उदय थोड़े संकोच के बाद ’ठीक है’ कहकर चला गया।
उसके जाते ही इति ने एक गहरी साँस ली। उदय का होना उसके लिए इतना भारी था कि उसके जाते ही उसे लगा जैसे वो पहाड़ चढ़ते-चढ़ते अचानक समतल मैदान में चलने लगी है।उसकी इच्छा हुई कि वो इसी बेंच पर थोड़ी देर लेट जाए... पर वो इस समतल मैदान में चलना चाहती थी..।
इति बेंच से दूर, पार्क के दूसरी तरफ चली गई। यहाँ वो पहले कभी नहीं आई थी। उसे बच्चों के झूले दिखे... ये झूले उसे बेंच से नहीं दिखते थे। उस बेंच और झूलों के बीच, वो घना पेड़ था, जिसके पत्ते पतझड़ में शामिल हो रहे थे।इति को एक बच्ची की हँसी सुनाई दी, जो झूला झूल रही थी। उसने देखा एक लड़का... जो शायद उसका भाई था, वो उसे झूला झुला रहा था। उसकी हँसी में डर का कंपन था, गिर जाने के डर का कंपन। वो लड़का, अपनी पूरी ताकत से झूले को धक्का दे रहा था। इति उस लड़के को रोकना चाहती थी।तभी उस लड़की की हँसी में से डर का कंपन गायब हो गया। हर झूले की उछाल पर, उस लड़की की हँसी और तेज़ होने लगी।उस लड़के ने अचानक झूला झुलाना बंद कर दिया। झूला धीमा पड़ने लगा... और धीमा होते-होते वो रुक गया। लड़का भागता हुआ,दूसरे झूले पर बैठ गया। लड़की उसे मनाने भागी, उसे झूला झूलने में मज़ा आने लगा था... शायद वो और झूलना चाहती थी।लड़के की दिलचस्पी उसे झूला झुलाने में तभी तक थी जब तक वो डर रही थी... पर लड़की उसकी मनऊवल में लगी हुई थी... चिड़ के, डाँटकर, रो कर। पर वो नहीं माना। वो लड़की धीमी चाल से चलती हुई वापिस उस झूले में आकर बैठ गई। वो कुछ देर चुपचाप बैठी रही।इति के होंठ फिर तनने लगे,आँखों में जलन सी शुरु हो गई।उसने तय किया कि वो उसे झूला झुलाएगी।वो आगे बढ़ी पर उसके पैर नहीं उठे... वो वहीं खड़ी रही।उसे ये किसी नाटक का बहुत धीमी गति से चलने वाला एक दृश्य लगा... जिसे वो सिर्फ दर्शक बनकर देख सकती है।वहाँ मंच पर जाकर जी नहीं सकती। तभी उस लड़की ने ज़मीन पर पैर मारना शुरु किया। धीरे-धीरे झूले की रफ़्तार तेज़ होने लगी। लड़की की हँसी इति के कानों में बजने लगी।इस बार भी उस लड़की की हँसी में डर था, पर वो डर, हँसी के घर में दरवाज़े जैसा था, जिसे उस लड़की ने खोल रखा था। झूला झूलते हुए, उस घर में हँसी एक हवा की तरह प्रवेश करती और डर का दरवाज़ा काँपने लगता।
वो लड़का भी, लड़की की हँसी की आवाज़ सुनकर, उसके झूले के पास आकर खड़ा हो गया था। पर उस लड़की को अब किसी की परवाह नहीं थी, हर बार ज़मीन पर पैर मारने से झूले की उछाल और बढ़ती जाती... वो झूले जा रही थी..तेज़.. और तेज़..और तेज़।
-’अरे, तुम यहाँ हो, मैं तुम्हें पूरे पार्क में ढूँढ़ रहा था।’
इति को लगा, जैसे वो झूला झूलते-झूलते गिर पड़ी।
-’तुम पानी लाए?’
उदय ने इति को पानी दिया और उसने लगभग एक बार में पूरी बोतल खाली कर दी।दोनों वापिस बेंच की तरफ चलने लगे।इति की साँस थोड़ी तेज़ चल रही थी मानो वो कहीं से भाग कर वापिस आई हो।
-’उदय तुम्हें याद है ना मुझे रोस्कोलनिकोव बहुत पसंद था।’(crime and punishment-Dostoevsky)
-’हाँ।’
उदय हाथ में समोसों की थैली लिए था।इति ने पानी की बाँटल कचरे के डिब्बे में फेंक दी, पर वो अभी भी झूले में ही बैठी थी।
-’कहाँ जा रही हो, बैठोगी नहीं?’
इति आगे निकल चुकी थी... वो वहाँ नहीं बैठना चाहती थी, जहाँ वो पहले बैठे थे।
-’वहाँ आगे वाली बेंच पर बैठते हैं।’
इति कुछ और चाहती थी। घटे हुए से अलग... कुछ दूसरा... जो उसके भीतर कहीं घट रहा था।
-’तुम्हें अचानक दोस्तोवस्की कैसे याद आ गया?’
उदय ने बैठते हुए पूछा। वो समोसा निकालकर इति को देने लगा, इति ने मना कर दिया।
-’एक हत्या के बाद, जिसे उस हत्या करने के पहले, बहुत से कारण देकर हम सही सिद्ध कर चुके होते हैं, उस हत्या के बाद, हम ना जाने और कितनी हत्याएँ ओर करते हैं।हे ना।’
ये इति उदय से कहना चाहते थी, पर उसने ’ऎसे ही..’ कहकर बात टाल दी।दोनों बेंच पर बैठ गए थे... यहाँ से इति को वो बच्चों के झूले साफ दिख रहे थे।पर वो लड़की वहाँ नहीं थी... बस खाली झूले लटके पड़े थे।
इति उदय से उस लड़की के बारे में पूछना चाहती थी... ’कहाँ चली गई वो?’, ’क्या वो वहाँ थी भी या मैं ही उसे देख रही थी?’। उसने उदय को देखा...उदय अपने किसी किस्से में, कहीं ओर ही जा चुका था... इति की निगाह फिर उसके होठों पर गई, वह अपनी निरंतरता से हिल रहे थे।
एक लम्बें समय तक साथ रहने के बाद... हमारे किसी भी संबंधो में शब्द खत्म हो जाते हैं... शब्द, संगीत हो जाते है। शब्दों का महत्व ख़त्म हो जाता है। शायद यह वह संगीत ही है जो इति को कहीं ओर ले जाता है...। अचानक इति को उस पत्ते की याद हो आई, जो पतझड़ में शामिल नहीं हो पा रहा था। वह उसे कहीं नहीं दिखा, वह शायद अपनी पतझड़ में शामिल हो चुका था।इति के चहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई,वह अभी भी उस रुके हुए झूले में बैठी थी, वो पूरे पार्क को देखने लगी... इस, चारों तरफ फैले कांक्रीट के जंगल में, एक हरा टापू...। उसने पहली बार कब इस पार्क को देखा था। उसे ठीक से याद नहीं... हाँ शायद उसकी नौकरी का पहला दिन... उस दिन उसने उदय के साथ, इसी पार्क के गेट के सामने चाय पी थी।तब तक इति और उदय महज़ अच्छे दोस्त थे... अच्छे दोस्त की सीमाओं को उन्होने, इति की पहली तनख्वाह मिलने के दिन ही लंगना शुरु किया था। उस दिन इति, उदय को dinner पर ले गई थी...786 नम्बर का एक सौ रुपये का नोट इति को,अपनी तनख्वाह के नोटों के बीच दिखा था।उदय ने वो नोट इति से लिया और उसे चूम लिया.. कहाँ ’ये एक नई शुरुआत की निशानी है, इसे संभालकर रखना।’आज भी इति के पर्स की चोर जेब में वो नोट उसने संभालकर रखा है।
इति ने अपना पर्स खोला और उस नोट को देखा... वो वहीं था... वैसा का वैसा...।
-’उदय, मैं तुम्हें dinner पे ले जाना चाहती हूँ... चलोगे?’
उदय को इति के इन छोटे-छोटे excitement’s की आदत थी.... उसने कभी इन उत्तेजनाओं के पीछे की कहानी नहीं जाननी चाही...। पर इस बात से वो खुश था।
-’ठीक है... पर मैं तुम्हें लेकर चलूगाँ...।’
-’नहीं... ये मेरी तरफ से है.. और हम उसी होटल में जाएगें जहाँ मैंने तुम्हें पहली बार डिनर कराया था... हम वहीं बैठेगें... उसी टेबिल पर, वो ही सब कुछ आडर करेगें... जो हमने उस दिन खाया था।... मैं वेटर को सौ रुपये टिप देना चाहती हूँ।’
-‘वेटर को सौ रुपये टिप?’
-’जब हमने पहली बार वहाँ डिनर किया था, तभी मुझे उसे सौ रुपये की टिप देनी चाहिए थी... नहीं दे पाई..। वह मैं उसे अब दे दूगीं।’
इति ने जब-जब इस 786 वाले नोट को याद किया है, उसे हमेशा ’हम खर्च हो गए’ वाली बात याद आई है।उदय शायद उस सौ रुपये को बहुत पहले ही भुला चुका होगा। उसने उस दिन की मोटी-मोटी बातें छेड़ दी जब वह दोनों पहली बार वहाँ dinner पर गए थे, बातों ही बातों में उदय तुरंत, दोनों के साथ सोने वाली बात पर पहुँच गया। इति के लिए उदय का संगीत फिर शुरु हो गया। अचानक इति को लगा कि...उसने ज़मीन पे एक पैर मारा है... उसका झूला... चीं... चूं... की आवाज़ करता हुआ हिलने लगा है।... उसे उदय का संगीत सुनते हुए लगा जैसे एक तेज़ हवा का झोका आया.. और उसने पूरे पत्तों को हवा में उड़ा दिया। यह सब इति के साथ पहली बार हो रहा था। फिर उसने देखा कि वो.. तेज़ भागती हुई कहीं से आई और उन उड़ते हुए पत्तों के बीच उसने नाचना शुरु कर दिया, धीमा... बहुत धीमी गति से चलने वाला कोई नाच, उसने नाचते-नाचते हँसना शुरु कर दिया। वो खुद को नाचते हुए देख रही थी, और झूले में तेज़... बहुत तेज़ झूलती हुई हँसे जा रही थी...।

Thursday, October 9, 2008

डरपोक़....


काफ़ी समय से चाय पीता हुआ मैं... इन छोटे-छोटे आश्चर्यों को देख रहा था जो मेरी आँखों के सामने घट रहे थे.... मैं पहाड़ के एक गाँव में बैठा, चाय पी रहा था...। सामने अचानक बादल घिर आए थे... और बूंदाबांदी शुरु हो गई थी.... पर पीछे के दो पहाड़ो पर अभी भी धूप थी...। तेज़ सुनहरा रंग चारो तरफ बिखर गया था।मैं जिस दुकान में चाय पी रहा था वह एक बुज़ुर्ग दम्पत्ति की दुकान है... शायद इस गाँव के तीन किलोमीटर के इलाके में एक यही दुकान है...। दोनों अकेले रहते हैं... नीचे गाँव में उनकी खेती है जो दो बच्चे मिलकर चलाते है.... दो बेटीयों की शादी हो चुकी है... और एक बेटा दिल्ली में कहीं पढ़ता है जिसके बारे में वह बड़े फ़क्र से बता रहे थे। चुकी आस पास कोई दुकान नहीं है इसलिए .. यह चाय कि दुकान, चाय और किराने की दुकान हो गई थी। करीब तीन चाय के बाद अचानक मेरी निगाह उन छोटे पहाड़ों पर पड़ी जिनके पीछे से निकलकर बहुत सारी धुंध हमारी तरफ बढ़ी चली आ रही थी...। वह दोनों पति-पत्नि अपने काम में व्यस्त थे... मैने चिल्लाकर कहाँ -’वह देखो... धुंध कितनी अच्छी लग रही है।’
दोनों ने एक बार निग़ाह उठाकर देखा और फिर अपने काम में व्यस्त हो गए। मैं जल्दी-जल्दी कुछ तस्वीरे लेने लगा...। केमरे के लेन्स में से मुझे एक छोटा सा सफेद धब्बा जैसा कुछ दिखा... मैंने लेन्स पर से आँखें हटाकर देखा तो.. एक बूढ़ा आदमी नीचे किसी गाँव से हमारी तरफ चला आ रहा है... उसकी चाल उसकी उम्र के हिसाब से काफ़ी तेज़ थी...। वह कुछ ही देर में दुकान पर पहुँच चुका था। वह आते ही चाय वाले के साथ बातचीत में व्यस्त हो गया.... वह अपनी बोली में बात कर रहे थे...सो मैं वापिस पहाड़ो को देखने लगा। मुझे लगा कि उस छोटे से पहाड़ के पीछे किसी ने बहुत सारी आग जला रखी है, जिसका धुआ वहाँ से निकलकर हमारी तरफ बढ़ता आ रहा है। कुछ ही देर में उस पूरी धुंध के भीतर अब हम थे...और यह चाय की दुकान थी और यह पूरा गाँव था....। वह चाय वाला कहने लगा कि ’धुंध की अपनी एक खुश्बू होती है....।’ मैंने पूछा कि ’कैसी होती है?’ वह कहने लगा कि ’आप जब यहाँ ज़्यादा रहेगें तो आपको पता चल जाएगा।’
यह सुनते ही मुझे ध्यान आया कि पाँच बज चुके है और मुझे अभी करीब आठ-नौ किलोमीटर का फासला पैदल तेय करना है... अपने गेस्ट हाऊस पहुचने के लिए... और जैसा डरपोक मैं हूँ... रात को अकेले इस जंगल में चलना... इस विचार से ही मेरी रुह काँप गई थी। पता नहीं कैसे... वह चाय वाले ने मेरा डर सूंध लिया... और उन्होने कहा कि आप इनके साथ वहाँ तक जा सकते है... यह उसी गाँव में रहते है जहाँ आपका गेस्ट हॉऊस है...। मैंने तुरंत हाँ कह दिया, बेग़ अपने कंधे पर टांगा और इंतज़ार करने लगा कि वह बुढ़ा आदमी उठेगा.. पर वह वहीं बैठा रहा। उसने एक चाय मांगी... मैंने घड़ी की तरफ एक बार देखा। मैंने महसूस किया कि उसने मेरी तरफ बस एक बार, सरसरी निग़ाह से देखा था, वह भी जब वह इस चाय की दुकान में आया था... उसके बाद से या तो वह उस चाय वाले से बात कर रहा है या वह शून्य में कहीं देख रहा है। एक पर्यटक होने के नाते, यह हमेशा अपेक्षित रहता है कि लोग लगातार अपको देखें, आपसे बात करने के बहाने ढूढें...और बहुत जल्द आपको इसकी आदत भी पड़ जाती है.... पर यह बुज़ुर्गवार है कि इस चाय की दुकान में मेरा होना ही मानो टाल गए हैं। मुझे हल्का सा गुस्सा आने लगा... यह बिलकुल वैसा ही गुस्सा था जैसा गुस्सा मैंने पहली बार शेर को देखते हुए महसूस किया था... वह पिंजरे में था और मैं उसके एकदम सामने खड़ा था... पर उसका व्यवहार कुछ ऎसा था कि मानों मैं वहाँ नहीं हूँ या मैं पारदर्शी हूँ...! मैं उस शेर के सामने चिल्लाने लगा... अजीब सी हरक़ते करने लगा पर उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगी...। मेरे दोस्त कहते हैं कि उस वक़्त मैं शेर के सामने बंदर जैसा लग रहा था।
जब वह बुज़ुर्गवार चाय पीने लगे तो मैंने अपना बेग़ उतारकर रख दिया... थोड़ा से गुस्से में रखा कि उन्हें पता चले कि मैं उनका इंतज़ार कर रहा हूँ...मैंने ज़्यादा गुस्सा नहीं किया, क्योंकि यहाँ मैं बंदर होने से बचना चाह रहा था। मैंने एक चाय और मांग ली...जिसपर उस दुकान की मालकिन ने मुझे ज़्यादा चाय ना पीने पर एक लेक्चर सुना दिया...। मैं उठकर उस चाय की दुकान के बाहर आ गया...। चाय खत्म की और अपने और उन महाश्य के चाय के पैसे दिये... इस बात पर उन्होने सिर्फ मुझे एक बार देखा, मुस्कुराए भी नहीं तो धन्यवाद देना तो दूर की बात है।
खैर करीब आधे घंटे बाद हम दोनों वहाँ से निकले.. साड़े पाँच बज चुका था।.... सुरज का दिखना बंद हो चुका था... वह बुज़ुर्गवार आगे चल रहे थे और मैं उनके पीछे था। इस बीच मैंने उनका नाम पूछा... करीब तीन बार...... पर उन्होने कोई जवाब नहीं दिया तो मैं चुपचाप चलता रहा। थोड़ी ही देर में अंधेरा बढ़ने लगा था मैंने अपनी टॉर्च अपने बेग़ से निकाली...। कुछ देर उसे हाथ में रही रखा... फिर धीरे से जलाकर देखा कि ठीक से काम कर रही है कि नहीं...। मेरी टार्च जलाते ही वह बोले... ’टॉर्च वापिस अंदर रख दो..।’ मैंने कहाँ ’अंधेरा बहुत है रास्ता नहीं देखेगा?’ वह चुप रहे...। मैं टॉर्च तो बंद कर चुका था पर कोई जवाब ना मिलने के कारण मैंने उसे अपने बेग़ में नहीं डाला, उसे अपने हाथों में ही दबाए रखा। फिर वह धीरे से बोले-’यहाँ टॉर्च की ज़रुरत नहीं पड़ती, उसे अंदर रख लो...। वह हाथ में रहेगी तो जलाने का लॉलच बना रहेगा।’ उनकी आवाज़ रात होने के साथ-साथ भारी होती जा रही थी। एक आश्चर्य की बात लगी कि उनकी हिन्दी कतई पहाड़ीपन लिए हुए नहीं थी... वह एकदम साफ हिन्दी बोल रहे थे। मैंने टॉर्च अंदर रख दी... सोचा अगर अकेले चल रहा होता तो टॉर्च के बाद भी यह अंधेरा सहन नहीं होता... इनके साथ चलने में कम से कम डर तो कम ही लगेगा।
दिन में यही जंगल, जो मुझे इतना खूबसूरत लगता कि मैं घंटो यहाँ अकेला टहल सकता हूँ वही जंगल, रात होते ही मानों एक भयानक भूत या पता नहीं किसमें तबदील हो जाता है..। ओह हो! मैं यह सब सोच ही क्यों रहा हूँ.... मैं अपने आपको कोसने लगा। तभी ऊपर पहाड़ पे किसी की आहट हुई.... मेरी ऊपर की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई... मैंने दो तीन कदम तेज़ रखे और उन बुज़ुर्गवार के ठीक बग़ल में चलने लगा... लगभग चिपके हुए..। मैं कुछ कहना नहीं चाह रहा था पर एक अजीब से सुर में मेरे मुँह से निकला..’कितनी देर लगेगी गाँव तक पहुचने में...?’
रात अचानक हो गई... मानों किसी ने बटन दबाकर बल्ब बंद कर दिया हो। सच कहूँ ठीक इस वक्त मुझे किसी से भी डर नहीं लग रहा था... ना ही इस जंगल से... ना रात से... ना अगल बगल में आ रही अजीब सी आवाज़ो से... मुझे इस वक्त डर लग रहा था तो सिर्फ, इन बुज़ुर्गवार से जो मेरी बातों का जवाब ही नहीं दे रहे थे...। अरे! कह देते उस चाय की दुकान पर ही कि हम रास्ते में कोई बात नहीं करेगें... तो मैं भी समझ जाता कि भाई, इन्हें चलते हुए बात करना ठीक नहीं लगता है। पर उनकी यह चुप्पी मुझे बुरी तरह डराए जा रही थी.... मैं थोड़ा उनसे दूर होके चलने लगा... एक निग़ाह, पूरा अंधेरा छान रही थी... तो दूसरी निग़ाह उनपे लगी हुई थी। उनकी चुप्पी इस रात में एक ऎसा डरावना सन्नाटा पैदा कर रही थी कि वह बर्दाश्त नहीं हो रहा था...। मुझे इतना डर लगने लगा कि मैं अजीब-अजीब सी कल्पना करने लगा... कि मानो यह बुज़ुर्गवार अभी पलटकर मुझसे कहेगें कि बस मैं तो इसी पेड़ पर रहता हूँ अब तुम अकेले जाओ... और अचानक उछल के पेड़ पर चले जाए.... या अजीब सी आवाज़ में हसँना शुरु कर दें... मेरा दम दो सेकेन्ड में निकल जाएगा। मैंने धीरे से उनके पैर देखे..... खुशी हुई कि वह सीधे है। हाँ मैं जानता हूँ यह सब बहुत बचकाना है.... पर ठीक इस वक्त अगर मेरी जगह कोई भी होता और वह भी मेरी तरह डरपोक... तो वह भी यही सब सोच रहा होता। बहुत दूर एक बल्ब की रोशनी थी जो मोडों पर ग़ायब हो जाती थी और फिर कुछ देर में वापिस आ जाती थी... पर उस बल्ब की रोशनी की दूरी कम नहीं हो रही थी... अचानक मुझे लगने लगा कि यह आदमी मुझे यहीं गोल-गोल धुमा रहा है... रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था.... दिन में मुझे इतना वक़्त तो नहीं लगा था..???... मैंने हिम्मत करके फिर पूछा....’कितनी दूरी और है?’ इस सन्नाटे में मुझे मेरी ही आवाज़ इतनी ज़्यादा लगी कि आधा वाक्य मैं डर के मारे अपने मुँह में ही बोल गया। आप यक़ीन नहीं करेगें वह तब भी चुप ही रहे। एक भीतर से इच्छा हुई कि अभी दौड़ लगाना शुरु कर दू...पर मैं चुपचाप उनके पीछे-पीछे चलता रहा... अब मेरी निग़ाह पूरी तरह उनके ऊपर थी...अगल-बगल के अंधेरे से अब मुझे कोई मतलब नहीं था।
मैंने इस बार गला साफ करके, अपने पूरे डरे हुए आत्म विश्वास को समेटते हुए पूछा... ’अरे! साहब कितना समय और लगेगा।’ इस बार उन्होंने मेरी तरफ एक बार देखा...। शायद मेरे प्राण-पखेरु के अभी पंख नहीं निकले थे... वरना वह अभी, इसी वक़्त उड़ चुके होते। मैंने खुद डर के मारे अपनी निग़ाह हटा ली..... वापिस पलटकर देखा तो वह अपनी गति से चल रहे है... आगे, अधेरे में शून्य की तरफ देखते हुए....। मेरी अब जॉन ही सूखती जा रही थी.... या तो वह कुछ बोले या मैं अभी इसी वक़्त अपने प्राण त्याग दूगां। उनके हाथ में एक डंडा था... पर वह उसे टिकाकर नहीं चल रहे थे... वह बस उनके हाथ में था.... चाल भी ऎसी कि चलने की आहट भी नहीं हो रही थी...। भीतेर एक इच्छा तीव्रता पर उठने लगी कि उनका डंडा छीनकर उन्हीं के सिर पर दे मारु और दौड़ लगा दूं....।
तभी एक आवाज़ आई... यह उन्हीं की आवाज़ थी....-’तुम कुछ सुन रहे हो....?’ मैं समझ ही नहीं पाया....!!! ’जी..?’ बस मेरे मुँह से बस इतना ही शब्द निकला...., वह भी इसिलिए कि कहीं वह यह बोलकर फिर चुप न हो जाए। ’यह छोटी-छोटी आवाज़े...यह लय...? तुम्हें सुनाई नहीं दे रही... इसी को रात का होना कहते हैं।’ मैं चुप था.... उनके बोलने में एक अजीब सा संगीत था...। ’गाँव बस आने ही वाला है....।’ वह धीरे से बोले... और थोड़ी दूर तक शांत रहे..। मेरे पीछे से जैसे कोई मेरे डर को खींचे जा रहा था...’गाँव बस आने ही वाला है।’ यह वाक्य सांत्वना पुरुस्कार की तरह काम कर गया, मेरा आधा डर जाता रहा...। मैं उनके बारे में अब बहुत बुरा भी नहीं सोच रहा था....। तभी वह रुक गये... बिना मुझे कुछ बताए सड़क से नीचे की तरफ उतर गए... मुझे फिर लगने लगा कि यह एक पेड़ के ऊपर चढ़ने वाले हैं। मैं सड़क पर, अधेरे में एक दम अकेला खड़ा था... मैंने धीरे से आवाज़ लगाई..’अरे साहब.... कहाँ चल दिये... सुनिये...।’ कुछ और भी संबोधन जैसे शब्दों को जोड़कर, कुछ टूटे-फूटे वाक्य बोलने के बाद, मैं चुप हो गया....। मेरा आधा डर जो पीछे कहीं छूट गया था वह वापिस मुझसे आ चिपका...। मैं अपने चारों तरफ देखने लगा... धीरे से बेग़ में हाथ गया और मैंने टटोलकर अपनी टॉर्च निकाल ली.... मैं उसे जलाने ही वाला था कि मुझे उनकी पेशाब करने की आवाज़ आने लगी...। मैंने टॉर्च नहीं जलाई... मैं थोड़ उनकी और जाकर खड़ा हो गया...। पेशाब की आवाज़ आना बंद हो गई.. पर वह ऊपर नहीं आए.. मैंने थोड़ा निग़ाह गड़ाकर देखने की कोशिश की... जिस तरफ वह गए थे... पर मुझे कोई नहीं दिखा..। मैंने अपनी टॉर्च जला ली और नीचे की तरफ देखा पर वह कहीं भी दिखाई नहीं दिये। टॉर्च की रोशनी में इस अधेरे को और भी भयानक बना रही थी...। मैंने आवाज़ लगाई....’ददा... दाजू... भाई साहब... आप ठीक तो हैं।’ तभी सड़क के आग से आवाज़ आई... ’चलो.. वहाँ क्यों खड़े हो...?’ अरे! वह आगे कब निकल गए? मैंने उनपर टॉर्च मारी... तो अजीब सा महसूस होने लगा... वह दूर खड़ए टॉर्च की रोशनी में और भी भयानक लग रहे थे, मेरी उनके पास जाने की हिम्मत नहीं हुए...। मैंने टॉर्च को बंद कर दिया... तेज़ कदमों से उनकी तरफ चलने लगा...। वह मुझे देखे जा रहे थे..., जैसे-जैसे मैं उनके पास पहुच रहा था... मुझे लगा मानों वह कुछ करने वाले हैं... पता नहीं पर उनकी आँखों में मुझे एक शेर की तैयारी दिखी... जब वह शिकार करने के पहले एक आखरी बार अपने शिकार को पेनी निग़ाह से देखता है...। मैं चलते-चलते कांप रहा था....सो मैंने दौड़ना शुरु कर दिया...। सीधे उनकी ही तरफ... वह सामने से हटे नहीं, मैंने भागते हुए उन्हें ज़ोर से टक्कर मारी... वह बुज़ुर्गवार नीचे गिर गए...। मैंने दौड़ना बंद नहीं किया... मैं भागता रहा.... जब तक कि मेरा गेस्ट हॉऊस नहीं आ गया। यह सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि मैं जब अपने कमरे में सोने की तैयारी करने लगा तब मुझे अचानक उन बुज़ुर्गवार की चिता होने लगी...। रात काफ़ी देर तक जगता रहा पर रुम से निकलने की हिम्मत नहीं हुई, सोचा सुबह उठते ही पता करुगाँ।
सुबह उठते ही मैं सीधा उस जगह पहुचा... मैं वहाँ पहुचते ही अपने आपको कोसने लगा... इस खूबसूरती से मैं गई रात डर रहा था? लानत है मुझ पर। उन्हें ढूढंने की कोशिश की पर वह कहीं भी नहीं दिखे फिर वापिस मैं गाँव लोट आया। अंदर गेस्ट हॉऊस में जाने की इच्छा नहीं थी सो बाहर ही एक चाय की दुकान पर बैठा चाय पीने लगा....। अभी मुझे यहाँ करीब दस दिन और रहना है...। मैंने पेपर पढ़ने लगा। तभी मेरे सामने से एक आदमी, छोटे से बच्चे को साथ में लिए गुज़र रहा था... और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, यह तो वह ही बुज़ुर्गवार हैं...। उन्होंने मेरी तरफ देखा... और थोड़ी ही देर में निग़ाह फेरते हुए सीधे जाने लगे... मैं उनसे माफ़ी मॉगना चाह रहा था....। मैंने उन्हें आवाज़ लगाई एक बार... दो बार पर वह नहीं मुड़े...। अलबत्ता, उनके साथ चल रहे बच्चे ने एक बार पलटकर मेरी तरफ देख लिया। तभी चाय वाले ने मुझे बताया... वह द्येउनदा हैं। मैं द्येउनदा के नाम से चिल्लाने लगा... तो उस चाय वाले ने मुझे टोकते हुए कहाँ कि वह तो बहरे हैं... उन्हें सुनाई नहीं देता। पर... मैंने चाय वाले से कहाँ कि रात में तो वह मेरे साथ थे... मुझे नहीं लगा कि वह नहीं सुन सकते हैं। मैंने उस बहस में ज़्यादा समय नहीं बर्बाद किया... मैं एक बहुत बड़े गिल्ट से मरा जा रहा था... मैंने अपनी चाय वहीं छोड़ी और मैं भागता हुआ उनके पास पहुँचा..। जब मैं उनके सामने जाकर खड़ा हुआ,तो वह रुक गए...। मैंने इशारे से उनसे माफ़ी माँगी... पर वह मुझे आश्चर्य से देखते रहे.. जैसे उन्हें कुछ भी याद नहीं हो। मैंने उनके पैर पड़ लिए... और बगल की दुक़ान से बहुत सारी टॉफ़ियाँ खरीदकर, उस बच्चे के हाथ में भर दी..और वापिस उनके सामने खड़ा हो गया... मैं उनके सामने से हटा नहीं...मैं माफ़ी चाह रहा था.. तभी, पहले उनकी आँखें, फिर उनके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई.. मानों उतनी देर में उन्होंने, बीती हुई रात, मेरी आँखों में पढ़ ली। उनके मुस्कुराते ही मैंने एक गहरी सॉस ली... और उनके सामने से हट गया। वह उस बच्चे के साथ आगे चल दिये...।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल