Saturday, July 27, 2013

Colour Blind...2

कल पहला दिन था जब शुरु के सीन के साथ फ्लौर पर खेलेना शुरु किया था...। बार-बार लगता है कि हम किसी के बारे में बात कर रहे हैं जो वहां मौजूद है और कुछ कह नहीं रहा। पिछले कुछ महीनों से इतनी टेगोर पर बात हो चुकी है कि लगता है कि पहाड़ के किसी एक बड़े से घर में वह अकेले रहते हैं.. और मैं अपनी नोटबुक लेकर उनसे लगातार मिलने जाता हूँ। वह अपने जीवन के अंशों के बारे में कुछ इस तरह बात करते हैं जैसे वह अपनी कविताओं की व्याख्या कर रहे हो। मैं कुछ चीज़े नोट करता हूँ और कुछ जाने देता हूँ। जो जाने देता हूँ वह मेरे साथ रिहर्सल स्पेस में चला आता है और जो भी कुछ मैं नोट करता हूँ वह बेमानी लगता है। मुझे अधिक्तर अपनी नानी याद आती हैं... मैं जब भी उनके कमरे में उनसे मिलने जाया करता था तो महसूस होता था कि वह मुझसे कुछ कहना चाहती हैं.. हम बात करते और वह बीच बात में मेरा हाथ कसकर पकड़ लेती... मैं चुप हो जाता... वह मौन में मुझे ताकती रहती... और कुछ घटता। मैं अभी तक उस घटे हुए को पकड़ नहीं पाया हूँ... ठीक ऎसा ही मुझे महसूस होता है टेगोर के साथ... बीच बात में कोई जैसे मुझे चुप कर देता है... कुछ घटता है... और मैं चूक जाता हूँ। क्या घटता है मौन में...? क्यों चूक जाता हूँ? क्या मैं इस चूक को नाटक में शामिल कर सकता हूँ? बने बनाए तरीके से एक कहानी दिखने लगती है... जो सीधी है...। उसपर विश्वास भी किया जा सकता है...। पर मेरा ध्यान बार बार मेरी नानी के बूढ़े हाथों पर जाता है... मैं नहीं रोक पाता खुद को...। एक त्रुटी है... इन सब बातों के बीच... जिसे मैं किन्हीं अच्छे क्षणों में देख भी लेता हूँ... पर पकड़ नहीं पाता हूँ। मैं इस त्रुटी का निर्देशन करना चाहता हूँ.... मैं अपनी नानी के हाथ को ... बीच में आए मौन को... टेगोर और हमारे बीच घट रहे ’कुछ..’ को मंचित होते देखना चाहता हूँ। एक सवाल भी उठता है बार-बार कि इन सबमें टेगोर कहां है? टेगोर जिसे सब जानते हैं..। क्या मैं कभी भी सबकी कल्पना के टेगोर को मंच पर दिखा सकता हूँ? क्या मैं कभी भी टेगोर को दिखा सकता हूँ? थोड़ा सा भी? शायद नहीं। मैंने टेगोर को बीच बातचीत में कहीं देखा है... उनके बहुत सारे लिखे के बीच कहीं एक झलक उनकी देखी है... कहीं महसूस किया है कि ठीक किसी वक़्त मैं बिल्कुल ऎसा ही सोच रहा था...। सो अंत में उस एक झलक को अगर मैं मंच पर ठीक से देख सकूं तो कह सकता हूँ कि कहीं एक बात में इंमानदारी है...। खुद को अलग कर पाना असंभव है इस प्रक्रिया में....। मेरा खाना.. पीना.. उठना.. बैठना... बैठे रहना... पीड़ा ... घाव.. असंतुलन.. मौन.. सब कुछ इस नाटक में शामिल होते मैं देख सकता हूँ। उत्साह और डर के बीच का कोई आदमी है इस वक़्त मेरे साथ.. जिसके साथ मैं चाय पी रहा हूँ। फिर चाय... मृत्यु!!! “कोपलें फिर फूट आई है शाख़ों पर... उससे कहना...” कल यह वाक़्य पढ़ा और इसी में गुम हूँ।

Colour Blind....1

हमें कोई पेंटिग क्यों पसंद आती है? मैंने कहीं यह पढ़ा था.. कि जब हम अपने जीवन के अंश उन रंगों में कहीं देख लेते है तो वह रंगो का समूह हमसे बात करता दिखता है... हम कहते हैं यह पेंटिग मुझे बहुत पसंद है। टेगोर अब मुझे रंगो में दिखते हैं... एक विशाल केनवास पर सघन रंगों के बड़े-छोटे स्ट्रोस..। थोड़ा दूर हटके उस पेंटिग को देखों तो जगहें नज़र आने लगती हैं... कुछ लोगों के चहरे दिखने लगते हैं। मैं जगह को पकड़ता हूँ... उसमें कुछ चहरों को मिलाकर पेंटिंग के करीब पहुंचता हूँ... तो वहा सिर्फ एक कत्थई रंग का ब्रश स्ट्रोक नज़र आता है... जैसे किसी कोरे कागज़ पर महज़ ’क...’ लिखा हो...। मैं इन सारी गड़मड़ आकृतियों से बात करने लगता हूँ... रंगों के गहरे स्ट्रोक्स को जब छूने जाता हूँ तो वह अभी भी गीले लगते हैं। कुछ रंग कम हैं... यह समझ में आता है... पर कमी और भी कहीं है...। असल में कमी ठीक शब्द नहीं है... ख़ाली है कुछ ऎसा लगता है। मानों एक कुर्सी पूरी ज़िदग़ी खाली रखी है कि वहां कोई आकर बैठेगा। यह ख़्याल आते ही मुझे यह पेंटिंग अपनी लगने लगती है। अभी-अभी टेगोर नाटक का अपना हिस्सा ख़त्म करके चाय पी रहा हूँ। इस तरह से लेखन मैंने पहले कभी नहीं किया... एक व्यक्ति का लिखा हुआ और उसके जीवन के अंशो को दिमाग़ में रखकर संवाद लिखते जाना। मुझे कहीं बीच में लगा कि मैं बहुत असंभव से बिख़राव को एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ....। यह एक तरह की लघु कथा है... जिसमें हर जगह टेगोर है और असल में कहीं भी नहीं है...। लिखना खत्म करते ही लगा कि जैसे घर में से कुछ सामान निकल गया है...। कमरा ख़ाली लगने लगा। मैं गाना गुनगुना रहा था मुझे लगा कि वह गूंज रहा है... दीवारों से टकराकर सारा संगीत वापिस मेरे पास चला आ रहा है... कितना ख़राब गाता हूँ मैं.... मैं चुप हो गया। यह चुप्पी भी कितनी हल्की है... मैं चल रहा हूँ तो लग रहा है कि कपड़े नहीं पहने हैं...। एक सहारा चाय है जो बहुत अच्छी बनी है... अदरक़ गले को सहला रही है।

Saturday, May 25, 2013

वक़्त बजता है...

दिन बीतते हैं.. समय, दिन बीतने की गति में कभी कभी बहुत धीमा सुनाई पड़ता है। फिर एक वक़्त आता है जो कभी कटता नहीं है... समय कान में बजता है। अगले ही पल लगता है कि कुछ दिन यूं ही सोते हुए बीत गए हैं.. आज की तारीख़ देखने पर अचरज होता है, हिसाब लगाने बैठो तो पुराने दिन धुंध में ढूबे हुए लगते हैं.. कुछ पकड़ में आता है कुछ छूटा रहता है हमेशा के लिए..। क्या सच में कुछ छूट जाता है हमेशा के लिए.? क्या इस जनम में उससे फिर वास्ता नहीं पड़ेगा? इन सबके बीच में हृदय अपनी एक धड़कन खो देता है.... चलते-चलते हाथ माथा सहलाने लगता है... अगर रुके हो तो चल देने का मन करता है... चल रहे हो तो वहीं बैठ जाने की इच्छा सताती है... गहरी सांसा लेने से आँखों के किनारे पानी नज़र आता है... ऎसा तब होता है जब कभी तुम्हारा नाम कहीं दबे हुए के बीच में से छूट जाता है... मेरी कविता...। अपनी कहानीयों और नाटकों के बीच कहीं मैंने तुम्हें भीतर दबा रखा है... छुपाया नहीं है। आहट है.. दरवाज़े पर अचानक खट होती है.. मुझे मेरे पुराने दरवाज़े याद हो आते हैं... वह तुम्हारा खूबसूरत चहरा हर आहट पर...। मैं तुम्हें अब नहीं लिख सकता... तुम्हारे साथ खरीदे मेरे जूते अब मुझे काटते हैं.. उनमें रहकर बहुत दूर चला नहीं जाता..। यह जूते तब भी काटते थे मुझे... पर लगता था वह जूता ही क्या जो हर चाल में अपनी उपस्थिति दर्ज ना कराए...। अब अनुपस्थित है मेरा पुराना घर.. इस नए घर में...। हम किस तरह जीना सीख़ रहे होते हैं??? किसी की कमी की टीस जब भी होती है हम उसे अपनी जीने की आदत में शुमार कर लेना चाहते हैं...। इस वक़्त भी लिखते हुआ तीव्र इच्छा हो रही है कि अभी पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों को उठाऊं और एक कविता लिख डालूं... मैं उसे महसूस कर सकता... सूंघ सकता हूँ... मुझे पता है दरवाज़े के दूसरी तरफ कोई है... बिना आहट के वह सिरझुकाए वह मेरे कोरे पन्ने की तरफ बढ़ने का इंतज़ार कर रही है....। कविता से बिछड़ने के आखरी दिन मुझे याद हैं..। वह लंबी शामें.. गहरी रातें... नीरस दौपहरें.... मैंने उन कोरे पन्नों के सामने बिताई हैं...। कितनी क्रूरता थी... जब अचानक उसने आना बंद कर दिया था...। दूसरे जब कविता सुनाते थे तो मुझॆ लगता था कि यह मेरी ही कविता है जो उसके साथ रहने लगी है। मैं अपने पुराने लिखे में उसके होने को सहता था। अब फिर से उस कोरे पन्ने के पास जाने की इच्छा मैं दबा देना चाहता हूँ। कुचलना चाहता हूँ उसे क्योंकि मुझे पता है कि वह फिर चली जाएगी... और शायद इस बार मैं उसका जाना बर्दाश्त नहीं कर सकता...। मैं अपनी कहानियों में.... अपने नाटकों में उसे पा लेता हूँ... हम कुछ देर बैठकर बातें करते हैं... साथ चाय पीते हैं... और मैं उसे कुछ देर में चले जाने के लिए कहता हूँ..। वह बुरा नहीं मानती है और मुझे बहुत दुख नहीं होता है...। वह जानती है कि पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों में अभी भी उसकी जगह है... पर वह अपनी जगह खोजती नहीं है... मैं उन कोरे पन्नों का ख़ालीपन उस सामने आने नहीं देता। कोई सीढ़ीयां चढ रहा है...। हल्के कदमों की आहट सुनाई दे रही है... वह दरवाज़े के बाहर खड़ी है... मैं उसकी सांसे महसूस कर सकता हूँ...। मैं जानता हूँ वह दरवाज़ा नहीं खटखटाएगी... पर वह है वहीं...। मेरी भी चाय पीने की इच्छा है... मैं भी दो बातें सुनना चाहता हूँ...। मैं दरवाज़ा खोलने जाता हूँ......।

Sunday, March 3, 2013

ख़त...

जैसे ठंड के दिनों में सुबह टांगे पर बैठकर स्कूल जाना... परिक्षा के दिनों में खेलने के आधे घंटे का सुख चुरा लेना... अपने घर के अंधेरे कोने में तकिये लगाकर अपना एक अलग घर बनाना... ज़रुरी काम के बहाने से बार-बार टाल पर मिट्टी खाने जाना... लंबी दौपहरों में देर तक म्मताज़ भाई की पतंग की दुकान पर बैठे रहना... कबीट ख़ाते हुए ताड़का वद्ध देखना... नदी में लंबे गोते लगाकर दस पैसे ढूंढ लेना.. एक कचौड़ी और थोड़ी सी जलेबी के लिए कई दिन इंतज़ार करना... पड़े हुए पैसे मिल जाने के ख़्वाब देखना... और फिर देर तक कल्पना में जीना कि कैसे खर्च करुंगा उन्हें... मज़ार पर जाकर अपने भगवान की बुराई करना... बहुत चालाक हो जाने की इच्छा रखना... बारिश में भीगना... बेंजो सीख़ना पर दिल में तबला बजाने की इच्छा रखना... बाहर जाना और वापिस घर कभी ना आने की ज़िद्द पालना... घर में पड़े रहना और पड़े-पड़े बाहर होने का डर पाल लेना.... लंबे समय तक धूप में चलना... पीपल, ईमली को छोड़ना और बरगद की छाया तलाशना... माँ के होने में माँ को खोजना... घर से निकलना और बार-बार घर वापिस आना...। इन सबमें कहीं कविता है... पर कविता यह नहीं है। एक वाक़्य से दूसरे वाक्य पर कूदते हुए बीच के बिंदुओं में कहीं कविता ताकती है। मैं महसूस करता हूँ... मिलने और नहीं मिलने के बीच का अंश... किसी गलती को करने की इच्छा और उस गलती को ना करने के बीच कहीं है कविता। बचपन के छूटने और बड़े होने के बीच... हम सभी को पता है। कुछ बदलने की प्रक्रिया में है सब कुछ... फिर भी दूर लगता है..। क्योंकि यह सब है सबमें... सबके पास... पर कविता किसके लिए है? यह प्रश्न बहुत बड़ा है...। हमेशा वह किसी के लिए होती है... निजी से निजी चीज़ भी किसी के लिए होती है। शायद कई दिनों बाद खुदी के पढ़ने के लिए भी हो सकती है... पर हमारे अवचेतन को हमेशा पता होता है कि किस लिए है। यह जीवन असल में एक ख़त है... किसी के लिए... पूरा जी लेने के बाद हम चाहते हैं कि बुढ़ापे में एक दिन हम बरामदे में बैठे हुए चाय पी रहे होंगे... हल्की मुलायम धूप होगी और उस दिन, कांपते हाथों से मैं अपना जीवन.... जो कि एक लिफाफे या डायरी में होगा... खोलूंगा और उसे वह ख़त पढकर सुनाऊंगा... उस पढ़्ने की फिर एक कहानी होगी...। जिसे जंगल में चलते हुए कह दूंगा... कहानी कहते हुए मैं उसके सारे झूठ जी लूंगा...।

Sunday, February 24, 2013

प्यादा...

दीवार पर हम चिपक जाते हैं...। किसी तरह से बस दृश्य से गायब हो जाए... दूर चांद पर दीवार दिखती है.. उस दीवार पर मौसम नहीं बदलते हैं। नीचे मौसम के शिक़ार हम हैं... इन दिनों भीग रहे हैं देर तक अकेले...। फिर वह सपने सा धुंधला दृश्य दिखता है जिसमें पहली बार सभी मैदान में खड़े दिखते हैं... मैं इनमें से कुछ लोगों को पसंद करता हूँ और कुछ को नापसंद.. पर सभी एक दूसरे में इतने घुले-मिले हैं कि किसी को भी अलग से देखना असंभव है। मैं छांटना चाहता हूँ... क्या हम हमेशा इसी प्रयास में नहीं लगे रहते हैं? छांट दे... अलग कर दे अच्छे बुरे को.. प्रिय को अप्रिय से.. कहानी को नाटक से... कविता को शायरी से... पर सब एक दूसरे में फसे हुए हैं..। फिर मैं पहले दिन के बारे में सोचने लगता हूँ... पहले दिन जब यह सब शुरु हुआ था। वह एक तरीक़े का शतरंज का खेल जैसा था... मैं दूर था... सभी लोग अपने-अपने काले-सफेद खानों में चुप शांत खड़े थे...। मेरा किसी से भी कोई सीधा संबंध नहीं था... तब शायद हमने पहली ग़लती की थी... मस्ति के लिए... हमने एक छोटे प्यादे को आगे सरका दिया था...। हमें नहीं पता था कि उसका नतीजा यह होगा कि हम किसी एक तरफ हो जाएंगे... अब जीवन में या तो सफेद कदम रखना है या काले... हम यह रंग नहीं लांग सकते अब..। और बहुत समय बाद पता चलता है कि असल में हमने बहुत पहले एक खेल शुरु कर दिया था... हमें लगता है कि हमने चुना था.. पर असल में हम चुन लिये गए थे..। शतरंज के बगल में पड़े हुए कुछ प्यादे.. घोड़े नज़र आते हैं.... हम इस खेल के राजा हैं जिसके हाथ में कुछ नहीं हैं। इस खेल में हम सालों बने रहते हैं... क्यों कि हर चाल में हम सालों गवां देते है... जैसा कि रोज़ उठने पर हम टटोलते हैं कि इस जीवन ने हमारे सामने क्या चाल चली है... जीवन भी धीमा और तेज़ चलता है... कई बार रुक जाता है... बहुत लंबे समय तक..। अंत तो आता ही है... आभी नहीं तो सालों बाद.... हम इस बीच छोटे-बड़े कांप्रोमाईज़ करते चलते हैं... यह सारे कांप्रोमाईज़ समय मांगने जैसा है... हम मांगना चाहते है कि बस हमें बने रहने दो...। हम चिल्लाना चाहते हैं कि हम सफेद नहीं हैं... काले भी नहीं है... हम बस परिस्थिति में फसें हैं.. और अपनी चाल को जितना हो सके टाल रहे हैं...। हमें टालना आ जाता है। बीच में दूसरों को मारने में हमें खुशी मिलती है.... पर वह क्षणिक है... समय बीत रहा होता है... जैसे हम इस खेल में फसें हैं... बाक़ी भी यही है.. हम दिखाते नहीं है... क्योंकि हमें लगता है कि हम एक दिन जीत जांएगें.... असल में हम जीतते कभी भी नहीं है हम अपनी अंतिम हार टाल रहे होते हैं...।

Friday, February 15, 2013

धूप....

(अपनी लिखी जा रही कहानी का एक अंश...) धूप थी बहुत तेज़... आँखें बार-बार बंद हो जाती थीं। वह बादलों जैसे कभी आती तो हम अपने छोटे-छोटे बर्तन इक्कठे करने में लग जाते..। माना कि एक किचिन होगा हमारे भविष्य में... में हम उन छोटे बर्तनों से नाश्ता बनाने लगते... बचपन की जैसी बातों के बीच देर तक चहकते-रहते... ऎसे में पसीने की खुश्बू होती थी... कहीं से हवा चलती ....हवा वो कहती, जो हम इन सारी बातों के बीच नहीं कह पा रहे हो...। शब्द देर तक टटोलने पर अपना मतलब खो देते... मैं उसे बादल कहना चाहता था... पर बादल ज़बान तक आते-आते गीला हो जाता... लगता... यह नहीं है जो वह है... वह ठंडक भी है... वह हवा है.. मैं अब उसे हवा कहना चाहता.. पर हवा चहरे पर पड़ते ही मैं आँखे बंद कर लेता...। मेरे हाथ बार-बार उसके शरीर पर चिपक जाते... जैसे वह कोई चुंबक हो। वह बात बदलने में बार-बार वही बात कह रही होती... जिसे हम दोनों देर तक सुनना चाहते हो..। वह आम के पेड़ के नीचे जाने से डरती थी कहती थी कि ऊपर से लाल चींटिया बरसती हैं.... मैंने उससे कहता कि मुझे आम पसंद नहीं है... हम दोनों बहुत ख़ास है... आम तो बाक़ी लोग है जिन्हें हम दिखते नहीं है। उसे नहीं दिखने की बहुत उत्सुक्ता रहती थी... हम दोनों बार-बार बाहर जाते कि हम लोगों को ना दिखें.. और हम सच में नहीं दिखते थे..। देर तक बिस्तर पर लेटकर एक दूसरे का हाथ टटोलने की हमें आदत थी... वह मेरी भविष्य की रेखा पर अपनी उंग्लियां फैरती थी... मैं उसकी भाग्य रेखा बहुत पसंद करता था.. मेरी हथेली में भाग्य रेखा नहीं थी... यह बात मैंने कभी उसे नहीं बताई..। हम सारी बेमतलब की बातें एक दूसरे के कान में कहते जबकि सारी महत्वपूर्ण बातें मौन रह जाती। वह अच्छा खाना बनाती थी... उसे घर सुंदर रखना पसंद था... मैं उसे बहुत पसंद करता था.. वह मेरी ज़बान थी जो हमेशा उसे देखकर बाहर रह जाती थी... वह बाहर रह जाती थी... मैं भीतर सपने देखा करता था। एक सपना था कि किसी दिन लंबा चलेंगें और भटक जाएगें... हर वह रास्ता लेंगें जो हमारी वापसी को असंभव बना दे...। जब पानी दिखे तो रुक जाएं... और जब पहाड़ दिखे तो सांस ले लें... मैं तुम्हें इमली के पेड़ की कोपल चख़ाऊ...। किस कदर हम हंसेगें... हम कितना साथ हंसते थे... मैं जब भी पुराने दिनों को याद करता हूँ तो एक मुस्कुराहट याद आती हैं.. आँखों में.. होठो का धीरे से सरकना दिखता है... बालों का चहरे पर गिरना फिर संभलना.. सब धीमी गति से सरकता हुआ समय.. जैसे किसी फिल्म का धीमी गति का कोई सीन चल रहा हो। तुम्हारे साथ मैं धीरे-धीरे सरकता था.. बिना किसी प्रयास के... मानों नदी में बह रहे हो... तुम्हारे साथ मुझे कहीं भी पहुंचना नहीं होता था... और हम कहीं भी नहीं पहुंचे। अब इस तेज़ धूप में मैं ठंड़ी हवा की तरह तुम्हें लिखता हूँ... लिखते ही मुझे कश्मीर याद आता है। वह कोमल धूप जिसमें बैठे-बैठे दिन कट जाता था... हमारे बारामुल्ला के घर का आंगन... मुर्गिया नीचे और चील ऊपर... वह दौपहरें तुम्हें लिखते ही याद आ जाती हैं। और भी कुछ दिखता है... खिड़की... खिड़की से बाहर बर्फ ताकना... बुख़ारी का धुंआ.. कांगड़ी की आंच... पता नहीं क्यों हम साथ कश्मीर नहीं गए..। मैं असल में तुम्हें कश्मीर दिखाना चाहता था... खोजाबाग़... जहां मेरे बचपन के खेल.. गलियों में दबे छिपे पड़े हैं..। चलों एक दिन चलते हैं। दूर... बहुत दूर... बहुत दिनों से हमने मिलकर कोई सपना नहीं देखा... तुम्हें याद है ना सारे पुराने सपने... चलों अभी इसी वक़्त एक सपना बनाते हैं... नया... जिसमें खुश्बू हो... जिसमें तुम हो... जिसमें हम हो और एक कहानी... कहानी में हम भटक जांए.. और उसका कोई अंत ना हो... क्या कहती हो? शुरु करें..।

आकार.....

एक आकार दिखता है। कुछ बातों में... मुलाकातों में... जब भी एक अच्छा मनुष्य होने की बातों पर ज़ोर देता हूँ वह दिखने लगता है... आकार!!! मैं बातों में बहक उस आकार की तरफ ख़िच जाता हूँ... आपनी ईमानदारी में मैं कहता हूँ... वह दिख रहा है मुझे फिर से... लोग पूछते हैं क्या है..? मैं कहता हूँ एक आकार है...। बस... फिर मैं खिसियाते हुए आगे जोड़ देता हूँ कि उस आकार के कई प्रकार हो सकते हैं... मैं जब भी यह कहता हूँ... बचकाना सुनाई देता हूँ। बिना आकार के उस निराकार को किस तरह अपना बना लूं... अपना बनाने का संघर्ष उतना नहीं है जितना उस निराकार को अपनी बातों में सिद्ध करने का... कैसे अपनों को अपने इस आकार के बारे में बताऊं जो बिल्कुल भी किसी आकार में बंधा हुआ नहीं दिखता है। मैं सारे काम त्याग देता हूँ और उसे आकार देने में लग जाता हूँ। एक मूर्तिकार की तरह छेनी और हथौड़े के साथ उसके पास पहुंचता हूँ.... उसे पीटता हूँ, जलाता हूँ, छलनी कर देता हूँ.... वह किसी आकार में आता दिखाई देता है... पर कुछ ही देर में वह आकार बिना किसी अर्थ लिए टूटा-फूटा सामने पड़ा दिखता है। मैं उसे समेटकर एक जगह रख देता हूँ.... मेरी परेशानी मेरे माथे के आस-पास सब भांप लेते हैं... कहते हैं मैं परेशान दिखता हूँ आजकल...!!! कैसे कोई बिना किसी आकार के ज़िदा रह सकता है... मैं स्वीकृति चाहता हूँ... अपनों से.. अपने समय से... अपने आस-पास से...। निराकार पूजना सही है... पर बिना आकार के जिये जाना... असंभव जान पड़ता है। मैं खुद को उस आकार/निराकार के साथ बंद कर लेता हूँ...। जब तक मैं उसे एक आकार नहीं दे दूंगा बाहर नहीं जाऊंगा की कसम खाते ही वह आकार धुंधला पड़ने लगता है.... मैं इस तरह उसपर काम नहीं कर सकता... जब तक निराकार ठोस रुप नहीं लेगा तब तक उसे किसी भी आकार में ढ़ालना असंभव है..। वह अपना ठोस रुप मेरे दुनियां में जाने पर लेता है.... मैं जितना सफल लोगों के बीच उठता बैठता हूँ... या भविष्य से डरे लोगों की संगत रखता हूँ उतना मेरा निराकार पकता जाता है... साफ दिखने लगता है...। मैं सभ्य लोगों के बीच पागल दिखता हूँ.... लोग बार बार मेरे आकार के बारे बात छेड़ देते हैं....। जो निराकार मुझे दिखता है उसका आकार लोग मुझमें देख लेते हैं... मैं पूछता हूँ... कैसा है इसका आकार? लोग कहते हैं इसे आकार नहीं कहते हैं... तो मैं कहता हूँ कि यह निराकार है फिर... इसपर सब हंस देते हैं... निराकार भी एक आकार में बंधा होता है जो तुममे दिखता है वह कुछ नहीं है। एक सभ्य समाज के आकार में मैं अपनी पूरी सामर्थ लगा रहा हूँ कि मैं भी अपने आकार को उसमें फसा सकूं... और छुट्टी पाऊं...। मुझे लोग अपने होने वाले उत्सवों में बुलाएं... अपने बच्चे होने में... अपनी सामाजिक उन्नति की पार्टीयों में... अपनी चीख़ती हुई हंसी में मेरी दबी-छुपी खिसियाहट को शामिल कर लें। फिर एक दिन अचानक चीज़े खुल गई। मैंने एक महफिल में अचानक उसे मुझसे छिटककर दूर जाते हुए देख लिया... इसका मतलब वह मैं ही था जो अभी चीख़ती हुई हंसी में छिटका था... मैं तुरंत उस महफिल से उठ गया... मैं एक दूसरा आदमी भीतर पाले हुए हूँ... एक निराकार जो मुझे दिखता नहीं है वह अलग हो जाता है.. दूर फिका जाता है...। अगर मैं इससे निजाद पा लूं तो सभी के बीच मैं बिना किसी परेशानी के रह सकता हूँ...!!! शायद तभी से इसे मार गिराने के औज़ार ढ़ूढ़ रहा हूँ..। कभी दाढ़ी बनाते हुए खून निकल आता है तो डरता हूँ कि कहीं वह भी तो मुझे मार गिराना नहीं चाहता है!!! हमारे भीतर जो सबसे खतरनाक़ बात है वह है हर एक बात की आदत बना देना..। वह निराकार मेरी आदत के कमरे में घुस गया है... और यह कमरा मेरी पहुंच के बाहर है... आदत भीतर नहीं बाहर होती है... जैसे मैं बाहर होता हूँ जब भी वह आकर भीतर काम करता है..। पर मैं एक दिन बिना उसे पता लगे उसे पकड़ लूंगा.. दबोंच लूंगा... और उसे मारने के पहले.. इतने बीत गए सालों का हिसाब मांगूगा... हर अकेली शाम का.. हर नींद से लंबी रातों का.. इस गरीबी का.. और एक त्रासदी का... सबका हिसाब मांगूगा.. एक दिन..।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

मानव

मानव

परिचय

My photo
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल