Saturday, August 10, 2013

चिड़िया के नहीं दिखने में उसके दिख जाने की प्रसन्नता छुपी है...

बाहर आजकल एक छोटी चिड़िया देर तक आंवले के पेड़ पर सुबह खेलती दिखती है। बाहर देखने का पेड़ बदल चुका है। यहां इस नए घर के आस-पास बहुत पेड़ हैं.... बहुत पेड़ों ने आसमान घेर रखा है..... इसलिए आजकल चील कम दिख़ती है... बाहर जाता हूँ और कभी चील जाए तो पुराने घरों की याद आने लगती है... उन यादों का सिलसिला फिर टूटे नहीं टूटता। सो मैं आसमान में चीलों को अब नहीं खोजता हूँ। जैसे कुछ देर के अभिनय के बाद सच में हंसी आने लगती है, ऎसे ही कुछ देर के अभिनय के बाद सच में प्रसन्नता आंवले के पेड़ पर खेलती दिखती है। एक जोड़ा गिलहरियों का सारे पेड़ों पर दौड़ लगाता है...। छोटी लाल चींटियां.... मालगाड़ी की तरह घर के एक कोन से दूसरे कोने में खों जाती हैं। मैं अपनी अधूरी लिखी कहानियों के बारे में सोचने लगता हूँ.... जिन्हें फिर-फिर खोलने पर भी मैं उनके आगे एक शब्द भी नहीं जोड़ पाता...। शायद कुछ कहानियां कभी पूरी नहीं होंगी... हम हमेशा उन क्षणॊं को कोसते रहेगें जिन क्षणॊं में हमने आख़री वाक़्य उन कहानियों में लिखे थे.... और अपनी डेस्क पर से उठ गए थे। काश हम उन्हें पूरा कर लेते... उस वक़्त...। नई कहानियां अधूरी कहानियों के बोझ तले शुरु नहीं होती... वह कुछ वाक्यों के बाद ही दम तोड़ देती हैं। शायद वह नई कहानियां... अधूरी कहानियों की पीड़ा सूंघ लेती हैं... और छूट जाती है। इसलिए शायद मैंने नई कहानियों को लिखने की जद्दोजहद त्याग दी है... अब मैं उस छोटी चिड़िया का इंतज़ार करता हूँ जो हर सुबह आंवले के पेड़ पर खेलने आती है। जितनी जल्दी दिखती है उतनी ही जल्दी ओझल हो जाती है.... वह फिर आएगी के इंतज़ार में गिलहरी सामने से भाग लेती है... चींटियां अपना पथ बदल लेती हैं... और जब मैं उस छोटी सी चिड़िया को खोजना छोड़ देता हूँ वह अचानक दिख जाती है... यही अचानक खुशी का आना है...। प्रसन्नता फिर आंवले पर बैठी दिखती है। कितनी छोटी है और कितना कुछ दे जाती है। मैं ठीक उसे देखते हुए सब भूल जाता हूँ... भूल जाता हूँ कि इस पेड़ के घने छप्पर के पीछे जो आसमान है... वहां चील अभी भी उड़ रही होगी... उस चील की अधूरी कहानी अभी भी मेरे कमरे की डेस्क पर मेरा इंतज़ार कर रही होगी। मैं सब भूलकर हाथ बढ़ाता हूँ और एक आंवला पेड़ से तोड़ लेता हूँ। मेरी ड़ेस्क पर बैठे हुए मैं उस छोटी सी चिड़िया की कलरव सुन सकता हूँ। आखिर में बाहर क्या है.... बाहर वह है जो मेरी खिड़की से मूझे दिखता है... पर जब सच में बाहर कदम रखता हूँ तो उसका कोई अंत नज़र नहीं आता। तभी ख़्याल आता है कि चिड़िया के नहीं दिखने में उसके दिख जाने की प्रसन्नता छुपी है...। अधूरी कहानियों की आड़ में कहीं एक नई कहानी जन्म लेती है... वह अचानक मुझे एक दिन दिख जाएगी जब मैं उसे खोजना बंद कर दूंगा।

Friday, August 2, 2013

Colour Blind...3

टेगोर... क्या है इस नाम में...? मैं क्यों आकर्षित हो रहा हूँ उस बच्चे से... उसकी चुप्पी से... उसके अकेले खेलते रहने से.... टेगोर। एक विशाल से मैदान में एक बच्चा पालकी में बैठे हुए अपना छोटा संसार जीने लगता है। चॉक से बने गोले के बीच... पानी में सिर घुसा देने की सज़ा पाता है। किसी दूसरे की बनाई हुई फिल्म की तरह अपने ही बाप का जीवन देखता है। इस संसार में मुझे कोई कमी नहीं लगती है... इस संसार की सुंदरता टेगोर को भी उसके बड़े होने के बाद समझ में आई..। उसके बचपन के अकेलेपन में बहुत सारे खेल शुमार थे। बड़े होने में एक प्रतिक्षा थी... किसीकी... कोई था जो आ नहीं रहा था... कोई था जो चला गया था..। या वह असल में रतन थे.. (पोस्टमास्टर कहानी की लड़की) जो पीछे छूट गए थे। जो पूरा जीवन पोस्ट ऑफिस के चक्कर काटते रहे। किस जगह मैं टेगोर को पकड़ सकता हूँ? कैसे उनके लिखे में उनकी मन:स्थिति तक पहुंचा जा सकता है। उनका प्रेम बिना पीड़ा के नहीं दिखता... पीड़ा ढ़ूंढ़ने जाओ तो प्रेम पा लिया ऎसा लगता है। बचपन में ’मैं भी हूँ...’ की लड़ाई शुरु हुई... अपने होने को सिद्ध करने में जब अपने घर का दरवाज़ा खोला तो पूरा बंगाल था... जब बंगाल का दरवाज़ा खोला तो पूरा देश था... फिर विदेश... लड़ते-लड़ते अचानक पूरे ब्रह्मांड में उन्होंने खुद को सबसे छोटा पाया...। फिर सब धुल गया.... देश.. विदेश... सब कुछ... फिर वापिस वह अपनी पुरानी प्रतिक्षा पर लोट आए... किसी की... किसी एक की... वह वापिस पोस्ट-ऑफिस के चक्कर काटने लगे... कोई एक मिले जो बस सब सुन ले। फिर एक तरह से बहुत स्वार्थी भी दिखे... जिसने अपने लिखे को दूसरे के जिए में बटोरा... कभी भी किसी भी कहानी को उसके नेचुरल अंत तक नहीं पहुंचने दिया...। पर नेचुरल शब्द टेगोर पर जाता भी नहीं है जितना उन्होंने अपने जीवन में काम किया वह नेचुरल नहीं है। मैं कई बार उनसे संवाद करना चाहता हूँ जिसमें एक प्रश्न बार-बार दिमाग़ में आता है कि इतना सारा क्यों लिख रहे थे वह? मैं इस बात के मूल में पहुंचना चाहता हूँ इस नाटक के द्वारा... कि काम का इतना सारा बोझ.. जिसके अंत में वह टैगोन नहीं होना चाहते थे। सामान्य उनके जीवन में कुछ भी नहीं था...। आज सुबह उठा तो लगा टैगोर ने मेरी तरफ मुड़कर देखा... मेरी बहुत से सवालों का वह जवाब देने ही वाले थे कि सपना टूट गया। एलार्म चीख़ रहा था... मैं भागकर अलार्म बंद करके फिर लेट गया ज़ोर से आँख बंद की और टैगोर की आख़री झलक याद करने लगा...। व्यर्थ था सब कुछ..। करवटें... करवटें और फिर कुछ करवटें... मैंने बिस्तर त्याग दिया। बहुत देर तक किचिन में खड़ा रहा... चाय का पानी चढ़ा दिया था पर गैस चालू नहीं की... मैं खड़ा रहा... सपने का सिर पैर मेरी समझ से परे था। मेरी टैगोर से मुलाक़ात (सपने में...) उनके Switzerland प्रवास के दौरान हुई... जब वह तीन महीने के लिए Switzerland / Italy में विक्टोरिया का इंतज़ार कर रहे थे और वह नहीं आई। हमारी बातचीत में मैं कहे जा रहा था और वह चुप थे... बीच-बीच में एक गहरी सांस की आवाज़ आती और सब चुप... मेरे सारे सवाल व्यर्थ थे मानों वह सुन ही नहीं रहे हों... फिर पता चला कि मैं असल में एक स्क्रीन के सामने खड़ा हूँ जिसपर उनके इंतज़ार का लाईव टेलिकास्ट चल रहा है। जबकि मैं भी Switzerland में ही था... मैं उसी विला में था जिसमें वह थे पर मैं उन्हें स्क्रीप पर देख रहा था। सपना बिना किसी संवाद के खत्म हो चुका था। कुछ देर बाद मैंने गैस चालू की... चाय बनने की प्रक्रिया शुरु हो गई थी पर मैं वहां नहीं था। मुझे बैचेनी महसूस हो रही थी.. टैगोर की छवी मेरे दिमाग़ में बहुत सुंदर सी थी... फिर अचानक यह इंतज़ार वाली बात ने पता नहीं उस छवी के साथ क्या छेड़-छाड़ की कि लगा मैं इस बारे में उनसे बात करना चाहता हूँ.... पर कर नहीं पा रहा हूँ क्योंकि मैं उन्हें स्क्रीन पर देख रहा हूँ... सामने नहीं। मैं समझता हूँ उनकी मन: स्थिति को.... इस घटना के बाद वह ओर भी करीब थे... एक सीधे साधे इंसानी रुप में... जिसे ज़रुरत थी उस वक़्त किसी की..। मुझे लगा मैं उन्हें पकड़ सकता हूँ उनकी कहानीयों में... उनकी कविताओं में... पर वह हर बार छूट जाते थे... अब अचानक लगा कि वह मेरे सामने हैं... हम आँखो में आँखे डालकर एक दूसरे को देख ही रहे थे कि सपना टूट गया। बहुत कमज़ोर क्षणों में हम अचानक अपनी सारी कमान छोड़ देते हैं... फिर ऎसा करना है और ऎसा नहीं कर सकते के बीच की सारी की सारी उठापटक अपना मानी ख़ो देती है। ठीक ऎसे वक़्त शायद हम खुद को पहली बार देख लेते हैं... बिना आईने.. बिना कपड़ों के...। जैसे का तैसा सा सब कुछ सामने पड़ा होता है और हमें यक़ीन नहीं होता कि यह क्या हो रहा है...? असहायता.... यह शब्द मुझे टेगोर से जोड़ती हैं...। मैं इस नाटक में कुछ इस शब्द की कविता खोज रहा हूँ।

Saturday, July 27, 2013

Colour Blind...2

कल पहला दिन था जब शुरु के सीन के साथ फ्लौर पर खेलेना शुरु किया था...। बार-बार लगता है कि हम किसी के बारे में बात कर रहे हैं जो वहां मौजूद है और कुछ कह नहीं रहा। पिछले कुछ महीनों से इतनी टेगोर पर बात हो चुकी है कि लगता है कि पहाड़ के किसी एक बड़े से घर में वह अकेले रहते हैं.. और मैं अपनी नोटबुक लेकर उनसे लगातार मिलने जाता हूँ। वह अपने जीवन के अंशों के बारे में कुछ इस तरह बात करते हैं जैसे वह अपनी कविताओं की व्याख्या कर रहे हो। मैं कुछ चीज़े नोट करता हूँ और कुछ जाने देता हूँ। जो जाने देता हूँ वह मेरे साथ रिहर्सल स्पेस में चला आता है और जो भी कुछ मैं नोट करता हूँ वह बेमानी लगता है। मुझे अधिक्तर अपनी नानी याद आती हैं... मैं जब भी उनके कमरे में उनसे मिलने जाया करता था तो महसूस होता था कि वह मुझसे कुछ कहना चाहती हैं.. हम बात करते और वह बीच बात में मेरा हाथ कसकर पकड़ लेती... मैं चुप हो जाता... वह मौन में मुझे ताकती रहती... और कुछ घटता। मैं अभी तक उस घटे हुए को पकड़ नहीं पाया हूँ... ठीक ऎसा ही मुझे महसूस होता है टेगोर के साथ... बीच बात में कोई जैसे मुझे चुप कर देता है... कुछ घटता है... और मैं चूक जाता हूँ। क्या घटता है मौन में...? क्यों चूक जाता हूँ? क्या मैं इस चूक को नाटक में शामिल कर सकता हूँ? बने बनाए तरीके से एक कहानी दिखने लगती है... जो सीधी है...। उसपर विश्वास भी किया जा सकता है...। पर मेरा ध्यान बार बार मेरी नानी के बूढ़े हाथों पर जाता है... मैं नहीं रोक पाता खुद को...। एक त्रुटी है... इन सब बातों के बीच... जिसे मैं किन्हीं अच्छे क्षणों में देख भी लेता हूँ... पर पकड़ नहीं पाता हूँ। मैं इस त्रुटी का निर्देशन करना चाहता हूँ.... मैं अपनी नानी के हाथ को ... बीच में आए मौन को... टेगोर और हमारे बीच घट रहे ’कुछ..’ को मंचित होते देखना चाहता हूँ। एक सवाल भी उठता है बार-बार कि इन सबमें टेगोर कहां है? टेगोर जिसे सब जानते हैं..। क्या मैं कभी भी सबकी कल्पना के टेगोर को मंच पर दिखा सकता हूँ? क्या मैं कभी भी टेगोर को दिखा सकता हूँ? थोड़ा सा भी? शायद नहीं। मैंने टेगोर को बीच बातचीत में कहीं देखा है... उनके बहुत सारे लिखे के बीच कहीं एक झलक उनकी देखी है... कहीं महसूस किया है कि ठीक किसी वक़्त मैं बिल्कुल ऎसा ही सोच रहा था...। सो अंत में उस एक झलक को अगर मैं मंच पर ठीक से देख सकूं तो कह सकता हूँ कि कहीं एक बात में इंमानदारी है...। खुद को अलग कर पाना असंभव है इस प्रक्रिया में....। मेरा खाना.. पीना.. उठना.. बैठना... बैठे रहना... पीड़ा ... घाव.. असंतुलन.. मौन.. सब कुछ इस नाटक में शामिल होते मैं देख सकता हूँ। उत्साह और डर के बीच का कोई आदमी है इस वक़्त मेरे साथ.. जिसके साथ मैं चाय पी रहा हूँ। फिर चाय... मृत्यु!!! “कोपलें फिर फूट आई है शाख़ों पर... उससे कहना...” कल यह वाक़्य पढ़ा और इसी में गुम हूँ।

Colour Blind....1

हमें कोई पेंटिग क्यों पसंद आती है? मैंने कहीं यह पढ़ा था.. कि जब हम अपने जीवन के अंश उन रंगों में कहीं देख लेते है तो वह रंगो का समूह हमसे बात करता दिखता है... हम कहते हैं यह पेंटिग मुझे बहुत पसंद है। टेगोर अब मुझे रंगो में दिखते हैं... एक विशाल केनवास पर सघन रंगों के बड़े-छोटे स्ट्रोस..। थोड़ा दूर हटके उस पेंटिग को देखों तो जगहें नज़र आने लगती हैं... कुछ लोगों के चहरे दिखने लगते हैं। मैं जगह को पकड़ता हूँ... उसमें कुछ चहरों को मिलाकर पेंटिंग के करीब पहुंचता हूँ... तो वहा सिर्फ एक कत्थई रंग का ब्रश स्ट्रोक नज़र आता है... जैसे किसी कोरे कागज़ पर महज़ ’क...’ लिखा हो...। मैं इन सारी गड़मड़ आकृतियों से बात करने लगता हूँ... रंगों के गहरे स्ट्रोक्स को जब छूने जाता हूँ तो वह अभी भी गीले लगते हैं। कुछ रंग कम हैं... यह समझ में आता है... पर कमी और भी कहीं है...। असल में कमी ठीक शब्द नहीं है... ख़ाली है कुछ ऎसा लगता है। मानों एक कुर्सी पूरी ज़िदग़ी खाली रखी है कि वहां कोई आकर बैठेगा। यह ख़्याल आते ही मुझे यह पेंटिंग अपनी लगने लगती है। अभी-अभी टेगोर नाटक का अपना हिस्सा ख़त्म करके चाय पी रहा हूँ। इस तरह से लेखन मैंने पहले कभी नहीं किया... एक व्यक्ति का लिखा हुआ और उसके जीवन के अंशो को दिमाग़ में रखकर संवाद लिखते जाना। मुझे कहीं बीच में लगा कि मैं बहुत असंभव से बिख़राव को एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ....। यह एक तरह की लघु कथा है... जिसमें हर जगह टेगोर है और असल में कहीं भी नहीं है...। लिखना खत्म करते ही लगा कि जैसे घर में से कुछ सामान निकल गया है...। कमरा ख़ाली लगने लगा। मैं गाना गुनगुना रहा था मुझे लगा कि वह गूंज रहा है... दीवारों से टकराकर सारा संगीत वापिस मेरे पास चला आ रहा है... कितना ख़राब गाता हूँ मैं.... मैं चुप हो गया। यह चुप्पी भी कितनी हल्की है... मैं चल रहा हूँ तो लग रहा है कि कपड़े नहीं पहने हैं...। एक सहारा चाय है जो बहुत अच्छी बनी है... अदरक़ गले को सहला रही है।

Saturday, May 25, 2013

वक़्त बजता है...

दिन बीतते हैं.. समय, दिन बीतने की गति में कभी कभी बहुत धीमा सुनाई पड़ता है। फिर एक वक़्त आता है जो कभी कटता नहीं है... समय कान में बजता है। अगले ही पल लगता है कि कुछ दिन यूं ही सोते हुए बीत गए हैं.. आज की तारीख़ देखने पर अचरज होता है, हिसाब लगाने बैठो तो पुराने दिन धुंध में ढूबे हुए लगते हैं.. कुछ पकड़ में आता है कुछ छूटा रहता है हमेशा के लिए..। क्या सच में कुछ छूट जाता है हमेशा के लिए.? क्या इस जनम में उससे फिर वास्ता नहीं पड़ेगा? इन सबके बीच में हृदय अपनी एक धड़कन खो देता है.... चलते-चलते हाथ माथा सहलाने लगता है... अगर रुके हो तो चल देने का मन करता है... चल रहे हो तो वहीं बैठ जाने की इच्छा सताती है... गहरी सांसा लेने से आँखों के किनारे पानी नज़र आता है... ऎसा तब होता है जब कभी तुम्हारा नाम कहीं दबे हुए के बीच में से छूट जाता है... मेरी कविता...। अपनी कहानीयों और नाटकों के बीच कहीं मैंने तुम्हें भीतर दबा रखा है... छुपाया नहीं है। आहट है.. दरवाज़े पर अचानक खट होती है.. मुझे मेरे पुराने दरवाज़े याद हो आते हैं... वह तुम्हारा खूबसूरत चहरा हर आहट पर...। मैं तुम्हें अब नहीं लिख सकता... तुम्हारे साथ खरीदे मेरे जूते अब मुझे काटते हैं.. उनमें रहकर बहुत दूर चला नहीं जाता..। यह जूते तब भी काटते थे मुझे... पर लगता था वह जूता ही क्या जो हर चाल में अपनी उपस्थिति दर्ज ना कराए...। अब अनुपस्थित है मेरा पुराना घर.. इस नए घर में...। हम किस तरह जीना सीख़ रहे होते हैं??? किसी की कमी की टीस जब भी होती है हम उसे अपनी जीने की आदत में शुमार कर लेना चाहते हैं...। इस वक़्त भी लिखते हुआ तीव्र इच्छा हो रही है कि अभी पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों को उठाऊं और एक कविता लिख डालूं... मैं उसे महसूस कर सकता... सूंघ सकता हूँ... मुझे पता है दरवाज़े के दूसरी तरफ कोई है... बिना आहट के वह सिरझुकाए वह मेरे कोरे पन्ने की तरफ बढ़ने का इंतज़ार कर रही है....। कविता से बिछड़ने के आखरी दिन मुझे याद हैं..। वह लंबी शामें.. गहरी रातें... नीरस दौपहरें.... मैंने उन कोरे पन्नों के सामने बिताई हैं...। कितनी क्रूरता थी... जब अचानक उसने आना बंद कर दिया था...। दूसरे जब कविता सुनाते थे तो मुझॆ लगता था कि यह मेरी ही कविता है जो उसके साथ रहने लगी है। मैं अपने पुराने लिखे में उसके होने को सहता था। अब फिर से उस कोरे पन्ने के पास जाने की इच्छा मैं दबा देना चाहता हूँ। कुचलना चाहता हूँ उसे क्योंकि मुझे पता है कि वह फिर चली जाएगी... और शायद इस बार मैं उसका जाना बर्दाश्त नहीं कर सकता...। मैं अपनी कहानियों में.... अपने नाटकों में उसे पा लेता हूँ... हम कुछ देर बैठकर बातें करते हैं... साथ चाय पीते हैं... और मैं उसे कुछ देर में चले जाने के लिए कहता हूँ..। वह बुरा नहीं मानती है और मुझे बहुत दुख नहीं होता है...। वह जानती है कि पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों में अभी भी उसकी जगह है... पर वह अपनी जगह खोजती नहीं है... मैं उन कोरे पन्नों का ख़ालीपन उस सामने आने नहीं देता। कोई सीढ़ीयां चढ रहा है...। हल्के कदमों की आहट सुनाई दे रही है... वह दरवाज़े के बाहर खड़ी है... मैं उसकी सांसे महसूस कर सकता हूँ...। मैं जानता हूँ वह दरवाज़ा नहीं खटखटाएगी... पर वह है वहीं...। मेरी भी चाय पीने की इच्छा है... मैं भी दो बातें सुनना चाहता हूँ...। मैं दरवाज़ा खोलने जाता हूँ......।

Sunday, March 3, 2013

ख़त...

जैसे ठंड के दिनों में सुबह टांगे पर बैठकर स्कूल जाना... परिक्षा के दिनों में खेलने के आधे घंटे का सुख चुरा लेना... अपने घर के अंधेरे कोने में तकिये लगाकर अपना एक अलग घर बनाना... ज़रुरी काम के बहाने से बार-बार टाल पर मिट्टी खाने जाना... लंबी दौपहरों में देर तक म्मताज़ भाई की पतंग की दुकान पर बैठे रहना... कबीट ख़ाते हुए ताड़का वद्ध देखना... नदी में लंबे गोते लगाकर दस पैसे ढूंढ लेना.. एक कचौड़ी और थोड़ी सी जलेबी के लिए कई दिन इंतज़ार करना... पड़े हुए पैसे मिल जाने के ख़्वाब देखना... और फिर देर तक कल्पना में जीना कि कैसे खर्च करुंगा उन्हें... मज़ार पर जाकर अपने भगवान की बुराई करना... बहुत चालाक हो जाने की इच्छा रखना... बारिश में भीगना... बेंजो सीख़ना पर दिल में तबला बजाने की इच्छा रखना... बाहर जाना और वापिस घर कभी ना आने की ज़िद्द पालना... घर में पड़े रहना और पड़े-पड़े बाहर होने का डर पाल लेना.... लंबे समय तक धूप में चलना... पीपल, ईमली को छोड़ना और बरगद की छाया तलाशना... माँ के होने में माँ को खोजना... घर से निकलना और बार-बार घर वापिस आना...। इन सबमें कहीं कविता है... पर कविता यह नहीं है। एक वाक़्य से दूसरे वाक्य पर कूदते हुए बीच के बिंदुओं में कहीं कविता ताकती है। मैं महसूस करता हूँ... मिलने और नहीं मिलने के बीच का अंश... किसी गलती को करने की इच्छा और उस गलती को ना करने के बीच कहीं है कविता। बचपन के छूटने और बड़े होने के बीच... हम सभी को पता है। कुछ बदलने की प्रक्रिया में है सब कुछ... फिर भी दूर लगता है..। क्योंकि यह सब है सबमें... सबके पास... पर कविता किसके लिए है? यह प्रश्न बहुत बड़ा है...। हमेशा वह किसी के लिए होती है... निजी से निजी चीज़ भी किसी के लिए होती है। शायद कई दिनों बाद खुदी के पढ़ने के लिए भी हो सकती है... पर हमारे अवचेतन को हमेशा पता होता है कि किस लिए है। यह जीवन असल में एक ख़त है... किसी के लिए... पूरा जी लेने के बाद हम चाहते हैं कि बुढ़ापे में एक दिन हम बरामदे में बैठे हुए चाय पी रहे होंगे... हल्की मुलायम धूप होगी और उस दिन, कांपते हाथों से मैं अपना जीवन.... जो कि एक लिफाफे या डायरी में होगा... खोलूंगा और उसे वह ख़त पढकर सुनाऊंगा... उस पढ़्ने की फिर एक कहानी होगी...। जिसे जंगल में चलते हुए कह दूंगा... कहानी कहते हुए मैं उसके सारे झूठ जी लूंगा...।

Sunday, February 24, 2013

प्यादा...

दीवार पर हम चिपक जाते हैं...। किसी तरह से बस दृश्य से गायब हो जाए... दूर चांद पर दीवार दिखती है.. उस दीवार पर मौसम नहीं बदलते हैं। नीचे मौसम के शिक़ार हम हैं... इन दिनों भीग रहे हैं देर तक अकेले...। फिर वह सपने सा धुंधला दृश्य दिखता है जिसमें पहली बार सभी मैदान में खड़े दिखते हैं... मैं इनमें से कुछ लोगों को पसंद करता हूँ और कुछ को नापसंद.. पर सभी एक दूसरे में इतने घुले-मिले हैं कि किसी को भी अलग से देखना असंभव है। मैं छांटना चाहता हूँ... क्या हम हमेशा इसी प्रयास में नहीं लगे रहते हैं? छांट दे... अलग कर दे अच्छे बुरे को.. प्रिय को अप्रिय से.. कहानी को नाटक से... कविता को शायरी से... पर सब एक दूसरे में फसे हुए हैं..। फिर मैं पहले दिन के बारे में सोचने लगता हूँ... पहले दिन जब यह सब शुरु हुआ था। वह एक तरीक़े का शतरंज का खेल जैसा था... मैं दूर था... सभी लोग अपने-अपने काले-सफेद खानों में चुप शांत खड़े थे...। मेरा किसी से भी कोई सीधा संबंध नहीं था... तब शायद हमने पहली ग़लती की थी... मस्ति के लिए... हमने एक छोटे प्यादे को आगे सरका दिया था...। हमें नहीं पता था कि उसका नतीजा यह होगा कि हम किसी एक तरफ हो जाएंगे... अब जीवन में या तो सफेद कदम रखना है या काले... हम यह रंग नहीं लांग सकते अब..। और बहुत समय बाद पता चलता है कि असल में हमने बहुत पहले एक खेल शुरु कर दिया था... हमें लगता है कि हमने चुना था.. पर असल में हम चुन लिये गए थे..। शतरंज के बगल में पड़े हुए कुछ प्यादे.. घोड़े नज़र आते हैं.... हम इस खेल के राजा हैं जिसके हाथ में कुछ नहीं हैं। इस खेल में हम सालों बने रहते हैं... क्यों कि हर चाल में हम सालों गवां देते है... जैसा कि रोज़ उठने पर हम टटोलते हैं कि इस जीवन ने हमारे सामने क्या चाल चली है... जीवन भी धीमा और तेज़ चलता है... कई बार रुक जाता है... बहुत लंबे समय तक..। अंत तो आता ही है... आभी नहीं तो सालों बाद.... हम इस बीच छोटे-बड़े कांप्रोमाईज़ करते चलते हैं... यह सारे कांप्रोमाईज़ समय मांगने जैसा है... हम मांगना चाहते है कि बस हमें बने रहने दो...। हम चिल्लाना चाहते हैं कि हम सफेद नहीं हैं... काले भी नहीं है... हम बस परिस्थिति में फसें हैं.. और अपनी चाल को जितना हो सके टाल रहे हैं...। हमें टालना आ जाता है। बीच में दूसरों को मारने में हमें खुशी मिलती है.... पर वह क्षणिक है... समय बीत रहा होता है... जैसे हम इस खेल में फसें हैं... बाक़ी भी यही है.. हम दिखाते नहीं है... क्योंकि हमें लगता है कि हम एक दिन जीत जांएगें.... असल में हम जीतते कभी भी नहीं है हम अपनी अंतिम हार टाल रहे होते हैं...।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

मानव

मानव

परिचय

My photo
मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल