Thursday, October 19, 2017

happy diwali.. 19-10-17


आज दिवाली है। मैंने लगभग हर दिवाली पर अपने लिखने का सिलसिला बनाए रखा है। पहले दिवाली पर अकेले रहना अपनी इच्छा से नहीं था... मैं चाहता था कि कोई आए। पर हर बार दीवाली लगभग अकेले ही मनानी पड़ी। अब कुछ दोस्त आ सकते हैं... मैं कहीं जा सकता हूँ... पर मैंने तय किया है कि नहीं अकेले ही रहता हूँ। यह चुनना सब बदल देता है... चुनने से उदासी ख़त्म हो जाती है... चुनने में संगीत प्रवेश करता है और सारा कुछ बहुत सादग़ी लिए हुए होता है। शायद यह उम्र का भी तकाज़ा है... पर आज का दिन मैं बड़े आनंद में हूँ।

दीवाली पहले कितनी महत्वपूर्ण होती थी... स्कूल की लगभग दो महीने की छुट्टी होती थी, कश्मीर में पिताजी बहुत सारे पटाख़े लाते थे.. पड़े पटाखों की आवाज़ से मैं रो रहा होता था। मुझे फुलझड़ी, अनार और साँप बड़े सही लगते थे। बहुत दिनों तक अपने पटाख़े बचाए रखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। फिर होशंगाबाद की राम लीला... हम खुद अपनी राम लीला खेलते थे मोहल्ले में.. दोपहर में.... कोई देखने वाला नहीं होता था। बस हम कुछ चार पांच दोस्त.. राजू और छोटू हमारे पड़ोसी थे.. पंडित.. उन्हें पूरी रामलीला ज़बानी रटी थी तो ज़ाहिर है राम और लक्षमण वही दोनों बनते थे.. मेरा बड़ा भाई भरत और मुझे हमेशा शत्रुघन बना देते थे...। शत्रुघन की कोई भूमिका नहीं होती थी...  मैं बस धनुष बांड लिए... कभी राम के तो कभी भारत के आगे पीछे घूम रहा होता था। फिर हम ग्राऊंड पर कुभकरण वध, रावण वध देखने जाते थे। मुझे सबसे मज़ा आता था अपने दोस्तों को राम की सेना या रावण की वानर सेना में पहचाना। सारे काले बच्चे रावण की सेना में और सारे गोरे बच्चे राम की सेना में होते थे....। उस वक़्त यह बात कभी अख़रती नहीं थी... अभी यह लिखते हुए भी अजीब लग रहा है। अजीब है कि राम की सेना बंदरों की होती थी... गोरे बंदर... जबकि बंदर तो काले भी हो सकते थे। और रावण तो प्रगाड़ पंडित था ... उसकी सेना में गोरे बच्चे ज़्यादा सही लगते... पर बुरा आदमी गोरा कैसे हो सकता है। अजीब था यह सब। मैं कुछ दोस्तों को पहचान लेता तो नाम से चिल्लाता और वह सब अपना मुंह छुपाते फिरते....। रावण की सेना के बच्चों को पूरे साल चिढ़ाया जाता... राम के बंदरों को कोई कुछ नहीं कहता था।

आज कभी-कभी सोचता हूँ वह हेमंत, निखिल, हेमराज, पटवा, राजू, मीनेष, बंटी, विक्की कहाँ होगें... जीवन की किस जद्दोजहद में व्यस्त होंगे? आज सभी दीवली पर नए कपड़ों में होंगे... खुश होंगे।

मुझे अब बहुत ही तकलीफ होती है जब लोग पटाख़े छोड़ते हैं... हमारी संवेदनशीलता कितनी ज़्यादा ख़त्म हुई पड़ी है कि जिन प्राणियों के साथ हम यह धरती पर रहना बांट रहे होते हैं हम उनकी कतई फिक्र नहीं करते हैं। कैसे हम ऎसे हैं... मुझे सच में यक़ीन नहीं होता... सारे पक्षी... जानवर.. उस सबके कान कितने सेंसटिव होते हैं हर एक आवाज़ को सुनने के लिए और हम उनके बग़ल में बम फोड़ देते हैं। मैं इन त्यौहारों से भर पाया। बचपन, बचपन था... अब यह सब उबा देता है... उबा नहीं तक़लीफ से भर देता है।

अभी अभी पूरी बनाई थी.... खूब इच्छा हो रही थी पूरी ख़ाने की...। अब गोल पूरिया नहीं बनती है.. और बहुत दिनों बाद बनाई थी सो वो फूली भी नहीं। पर स्वाद ठीक था। चाय और पूरी... आह!!!

दीवाली पर लिखने का सिलसिला कुछ शुरु हुआ लगता है... आशा है यह चलता रहेगा।

Tuesday, February 7, 2017

चलता फिरता प्रेत... (वेताल.. विलाप)


A man will be imprisoned in a room with a door that’s unlocked and opens inwards; as long as it does not occur to him to pull rather than push.

-Ludwig Wittgenstein



कक्षा आठवीं की परिक्षा अभी-अभी ख़त्म हुई थी। करीब रात के दस बज रहे होंगे... उसे नींद नहीं आ रही थी। सुबह पाँच बजे उसके पिताजी आने वाले थे। वह झेलम एक़्सप्रेस के बारे में देर तक सोच रहा था... उसे लगता कि उसके पिताजी असल में वेताल हैं और झेलम उनका सफेद घोड़ा है जिसपर सवार होकर वह सारे जंगल पार करते हुए उस तक पहुँचेंगे। फिर वह अपने पिताजी के चौड़े कंधो के बारे में सोचने लगा... कैसे वह उनके दोनों कंधों पर चढ़ जाएगा.. और फिर गहरी सांसों से उनके पास से आती हुई खुशबू को ख़ीचेगा भीतर... बहुत भीतर, जब तक कि उसका पेट ना भर जाए..... उसके पेट में कीड़े पड़ गए थे.. जिस वजह से वह हमेशा भूख़ा रहता था।  उसे लगता कि वह खुशबू सिर्फ उसे ही आती है और सिर्फ वह ही इसे सूंध सकता था। उसकी निग़ाह घड़ी पर गई... ग्यारह बजने को थे...   उसका बड़ा भाई गहरी नींद में था, माँ भीतर घर ठीक करने में व्यस्त थी।  जब भी उसके पिताजी आते उसे लगता कि थोड़ी ठंड बढ़ गई है... वह शायद हर बार अपने साथ अपना कश्मीर लेके आते थे। कश्मीर... नीला आसमान, सफेद बादल... उसे अचानक लगा कि असल में पिताजी के पास से कश्मीर की खुशबू आती है... हाँ... कश्मीर!!  उसने करवट बदली तो लगा पेशाब आ रही है... वह नहीं चाहता था कि पिताजी आए और वह बाथरुम में हो... सो वह तुरंत उठने को हुआ... पर वह हिल नहीं पाया... उसने फिर कोशिश की कि पेशाब करने चला जाए पर वह महज़ करवट बदल पाया.. उसने पूरा ज़ोर लगाया... एक चीख़ निकली और सब शांत हो गया।

अचानक उसकी नींद खुल गई... दोपहर का वक़्त था.. वह सीधा बाथरुम चला गया। बाथरुम की खिड़की से दोपहर की तपिश महसूस हो रही थी। वह आईने के सामने खड़ा हो गया... उसके सिर पर बाल नहीं थे... छोटी सी चोटी थी.. उसने अपने बाल दिये थे.. मृत्यु पर।  मृत्यु... ?  वह बाहर आया तो देखा वह पहाड़ो पर था... पूरा जंगल सूख़ा पड़ा था। उसने नज़रे घुमाई तो वह कश्मीर था... वीरान उजड़ा हुआ कश्मीर... आसमान नमी में ढूबा हुआ था.. वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता उसके पैरों के नीचे सूख़े पत्ते चर्मराने लगते।  उसने अपने दूसरी तरफ देखा... वह डल झील के किनारे-किनारे चल रहा था... डल में पानी बहुत कम था और वह काला पड़ चुका था। चार चिनार में चिनार के पेड़ सूख़े पड़े थे। अचानक उसे आवाज़ आई, यह तो उसके पिताजी की आवाज़ थी... वह उसे बुला रहे हैं...। आवाज़ मुगल गार्डन से आ रही थी... वह भागकर मु्गल गार्डन पहुँचा.... देखा पिताजी गार्डन के पानी में खड़े हैं... और उससे कह रहे हैं कि जल्दी आओ... मेरे कंधे पर चढ़ जाओ तस्वीर ख़िचानी है। वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था... पिताजी चिल्लाने लगे कहने लगे कि पानी इतना ठंडा है... मेरे पैर सुन्न हो रहे हैं जल्दी आओ। वह भागकर पानी में कूद गया। उसकी चीख़ निकल आई ... पानी सच में बहुत ठंडा था। वह भागकर अपने पिताजी से चिपक गया। चिपकते ही वह उन्हें सूंघने लगा.. वही खुशबू.... बिल्कुल वही कश्मीर की खुशबू... वह कश्मीर में ही था पर कश्मीर की खुशबू उसे अपने पिता से आ रही थी... तो क्या यह कश्मीर की खुशबू है जो पिताजी से आ रही है या यह पिताजी की खुशबू है जो पूरे कश्मीर में फैली हुई है? उन्होने लाल रंग का क्रोकोडायल की कंपनी का स्वेटर पहना था... सफेद पैजामा, पानी में घुटने-घुटने खड़े रहने के कारण, ऊपर चढ़ा हुआ था। ’चलो जल्दी... चढ़ जाओ कंधे पर मैं ज़्यादा देर रुक नहीं पाऊंगा... चलो...’  पिताजी ने उससे कहा...। उसने देखा सामने उसका भाई हाट-शाट का केमरा लिए खड़ा है... और उससे कह रहा है...’जल्दी कर ना.. देख पिताजी कितनी तकलीफ में हैं।’  वह जल्दी से पिताजी  के कंधे पर चढ़ गया...। तभी उसके भाई ने कहा कि ’अपना स्वेटर ठीक कर ले..’ उसने देखा पिताजी नहीं असल में वह लाल रंग का स्वेटर पहने हुए था... उसने अपने पिताजी को देखा वह सफेद बनियान पहने हुए थे.. और उनका चहरा सूजा हुआ था... होठ काले पड रहे थे..। उसकी निग़ाह पिताजी के पेट पर गई वह फूल चुका था... और कड़क हो रहा था... उनकी टांगे मुड़ने लगी थी... तभी पिताजी ने कहा कि ’जल्दी ख़ीच... जल्दी..’  भाई ने पिताजी के गिरने के ठीक पहले तस्वीर ख़ीची... बहुत तेज़ रोशनी उसकी आँखों के सामने चमकी... और सब गहरा काला हो गया।

उसकी आँखे जलने लगी थी... वह बहुत देर आँखें बंद नहीं रख पाया... उसने आँखे खोली तो वह एक छोटे से कमरे में था। उसके आधे बाल पक चुके थे.. दाढ़ी बढ़ी हुई थी...।  माँ बाल्कनी में सफेद साड़ी पहने हुए खड़ी थीं... और फोन की घंटी लगातार बज रही थी। ’माँ फोन उठाओ..’ उसने कहा.. ’तेरे लिए है...’ माँ ने कहा। उसने फोन उठाया दूसरी तरफ से पिताजी की आवाज़ आई....

’हाऊ आर यू माय सन... तूने फोन ही नहीं किया.. आए वाज़ वेटिंग.. कल मेच था.. बधाई हो इंडिया जीत गई.. धोनी ने सब के छक्के छुड़ा दिए।’ उसके पिताजी एक सांस में सब बोल गए। उसने कहा ’अच्छा...’ । पिताजी कुछ देर चुप रहे... उसने भी कुछ नहीं बोला..।

’अख़बार पढ़ रहा था...’ वह बोले.. ’आज कश्मीर में बर्फ पड़ी है... बहुत से जवान फस गए हैं...’

फिर कुछ देर की चुप्पी रही... पिताजी ने कहा.. ’मैं ठीक हो जाऊं फिर चलेंगें कश्मीर... मैं ले चलूंगा तुम्हें...। और कब आ रहे हो तुम....मैंने सोचा है....’ बीच बात चीत में उसने फोन काट दिया। माँ उसके लिए चाय बनाने लगी। चाय देते हुए माँ ने कहा... ’उनसे बात कर ले अच्छा लगेगा उन्हें वह तेरे फोन का इंतज़ार करते रहते हैं..।’ ’ठीक है कर लूंगा...’ उसने माँ को इगनोर करते हुए बोला...

’कब...?’ माँ ने कहा...।
’जब फ्री हो जाऊंगा..’
’अभी क्या कर रहा है?’
’चाय पी रहा हूँ।’

माँ कुछ देर चुप रही...। चाय ख़त्म होने के बाद माँ बोली...

’अब कर ले...।’
’कर लूंगा।’
माँ उसे देखती रहीं... वह उन्हें देखता रहा... फिर उसने कहा...
’बिज़ी हूँ...’

बिज़ी हूँ कहकर वह बाल्कनी में जाकर ख़ड़ा हो गया। बहुत देर तक बाहर देखता रहा। दो काले कव्वे सामने के पेड़ पर आकर बैठ गए... वह कव्वे पूरे काले थे..। उनके पीछे दो और कव्वे आ गए.. वह भी पूरे के पूरे काले... चारों उसकी तरफ देख रहे थे। उसे यह बहुत अजीब लगा।  तभी पीछे से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई... उसने कहा.. ’माँ देखो कोई है दरवाज़े पर...’। माँ ने कोई जवाब नहीं दिया... दरवाज़ा ख़टखटाने की आवाज़ फिर आई.... वह मुड़ा तो देखा माँ सो रही है...। वह ख़ुद दरवाज़ा खोलने के लिए चला तो पैरों तले चिनार के सूख़े पत्तों के चर्मराने की आवाज़ आ रही थी। उसने उस आवाज़ को अनसुना किया और चलने लगा..। दरवाज़ा इस बार कुछ ज़ोर से ख़टखटाया जा रहा था.... कमरा बहुत छोटा था पर वह दरवाज़े तक नहीं पहुच पा रहा था...। वह भागने लगा... तेज़.. और तेज़... पर दरवाज़ा फिर भी कुछ कदम दूरी पर ही बना रहा...।

तभी उसकी नींद खुली... उसने देखा भाई और माँ दोनों सो रहे हैं और कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है..। उसकी निग़ाह घड़ी पर गई.. सुबह के पाँच बज रहे थे... उसके मुँह से पापा निकला... और वह दरवाज़े की और लपका...। दरवाज़ा खोलते ही उसने देखा कि सामने चलता-फिरता-प्रेत... याने वेताल ख़ड़ा था.. उसके पीछे उसका सफेद घोड़ा झेलम और शेरु कुत्ता बग़ल में थे...। उसने वेताल के पैर पड़े... और झट से गले लग गया। वेताल के पास से कश्मीर की खुशबू आ रही थी... वह उस खुशबू को खाने लगा। वेताल अपने दो बड़े सूटकेस लेकर अंदर आया। वह माँ को उठाने गया पर वेताल ने मना कर दिया।

’दरवाज़ा बंद कर दो.....’ वेताल ने कहा...

वह दरवाज़ा बंद करने गया तो वहाँ झेलम और शेरु कुत्ता नहीं था। पौ फटने को थी। वह उम्र ही कुछ ऎसी थी जिसमें किसी भी चमत्कार पर सवाल नहीं उठाए जाते थे.. सारे चमत्कार उनके होने में हतप्रभ के बुलबुले बनाते.... और वह बुलबुले कुछ ही क्षणों में ख़त्म हो जाते। जब वह मुड़ा तो उसके पिताजी सूटकेस खोले बैठे थे, उनके बगल में माँ बैठी थी.. और भाई उनके कंधो पर झूल रहा था। पिताजी ने उसे एक केटबरी चाकलेट दी, वह उसे लेकर बाहर निकल गया। जैसे ही बाहर निकला एक ठंड़ी हवा का झोंका आया और उसने अपनी आँखें बंद कर दी।

जब उसने आँखे खोली तो वह कश्मीर की एक सरकारी कालोनी में था। चारो तरफ बर्फ थी... पूरी कालोनी खंडहर हो चुकी थी..... वह गली के आख़री मकान की तरफ ख़िचा चला जा रहा था। आख़री मकान के बरामदे में पिताजी बर्फ़ के गोले बना रहे थे... तीन गोले बना चुके थे... चौथे गोले को धकेलते हुए, बाक़ी तीनों के पास रख रहे थे। वह बरामदे की मुडेर पर बैठ गया और अपने पिताजी की थकान देख रहा था। अब चारों गोले एक लाईन में आ चुके थे। उन्होंने जेब से कंचे निकाले सबकी आँखे बनाई।

’कैसा लग रहा है।’ उन्होंने बिना उसकी तरफ देखे उससे पूछा।
’आप मुझसे पूछ रहे है?’ हिचकिचाते हुए उसने कहा।
’और कौन दिख रहा है तुम्हें यहाँ?’
’अच्छा लग रहा है।’

तभी आख़री गोला जो सबसे बड़ा था वह बिख़र गया। उससे यह देखा नहीं गया... वह भाग कर उस गोले की बर्फ़ को वापिस समेटने लगा... वह जितना समेटता उतना ही वह गोला बिख़रता जाता। उसने देखा पिताजी मुड़ेर पर बैठे हैं जहाँ वह बैठा था। उनके बग़ल में चार कव्वे बैठे हैं एकदम काले। अब सिर्फ तीन गोले थे.... जिनमें कंचों से आँखें बनी हुई थी। उस बिख़री हुई बर्फ़ में वह दो कंचे ढ़ूढ़ने लगा...।

’तुमने मुंडन क्यों करा लिया?’

पीछे से पिताजी की आवाज़ आई पर वह बदहवास सा कंचे ढ़ूढ़ रहा था।

’मेरी आँखें खोज रहे हो?’ पिताजी ने पूछा।

और वह रुक गया। उसने पिताजी की तरफ देखा तो वह मुड़ेर पर एक फोन लिये बैठे थे... और नंबर डॉयल कर रहे थे। कुछ देर में घंटी बजी....। जिस फोन की घंटी बज रही थी वह फोन उनके बगल में ही पड़ा था.... वह भागकर मुड़ेर पर अपने पिताजी के बगल में बैठा और उसने फोन उठाया... दूसरी तरफ से उसके पिताजी की आवाज़ आई।

’हेलो....।’
’पापा... गोले तो चार होने चाहिए ना... यह एक गोला बिख़र क्यों गया?... अभी तो नहीं बिख़ना था.. अभी तो बर्फ़ है चारों तरफ... अभी-अभी तो हम सबको तेज़ गर्मी से राहत मिली थी... अभी-अभी तो हम सब एक साथ ख़ुश हुए थे... अभी तो नहीं बिख़रना था।’

वह यह कहकर अपने बग़ल में बैठे पिता को देख रहा था..

’पापा... मैं बीमार हूँ।’

यह सुनते ही पिताजी उसकी तरफ देखने लगे...  दोनों ने फोन कान पर लगाए हुए थे। पिताजी ने फोन काट दिया.. और उससे बोले....

’तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो?’

उसने देखा कि वह बंबई में पीले स्कूटर पर बहुत तेज़ी से चला जा रहा है। उसके आधे बाल पक़ चुके हैं... दाढ़ी बढ़ी हुई है। वह पिताजी को लेने स्टेशन जा रहा था। सुबह का वक़्त है... उसे एक चाय की दुकान दिखती है... वह अपना स्कूटर रोक लेता है। चायवाला उससे बिना पूछे उसके हाथ में चाय  पकड़ा देता है। वह चाय के साथ सिगरेट सुलगाने ही वाला होता है कि चाय वाला उससे कहता है..

’आपको देर तो नहीं हो रही है?’
’नहीं... क्यों? किस बात की देर?’ वह पूछता है।
’आज इक्कतीस जनवरी है... ।’
’हाँ तो....?’
’तो देख लो... मुझे लगा पूछ लेता हूँ कि कहीं देर तो नहीं हो रही है।’

वह आराम से चाय पीता है... पर देर हो जाने की बात उसके दिमाग़ में रह जाती है। वह घड़ी देखता है पर उसने घड़ी नहीं पहन रखी है। वह अपना मोबाईल जेब में टटोलता है... वह भी उसके पास नहीं है। वह चायवाले से पूछता है..

’कितना वक़्त हुआ है?’
’वक़्त बहुत नहीं बचा है..।’

वह चाय रखता है.. जलती हुई सिगरेट फैंक देता है... और बिना चाय वाले को पैसे दिये स्कूटर में किक मारता है। स्कूटर स्टार्ट नहीं होता... वह चाय वाले की तरफ देखता है, उसे याद आता है कि उसने उसे पैसे नहीं दिये। वह पैसे देता है और पीला स्कूटर स्टार्ट हो जाता है।  वह बहुत तेज़ी से स्टेशन की तरफ चल देता है। उसका स्कूटर बहुत तेज़ चलने लगता है.... सड़क पर सुबह की धुंध बढ़ती जाती है... धीरे-धीरे आस-पास का सब कुछ ग़ायब होने लगता है... उसे घने कोहरे में ठंड़ लगने लगती है। तभी रेल की सीटी सुनाई देती है। वह अपने आस-पास कश्मीर सूंधता है। सामने के धुंधलके में एक स्टेशन उभरता है, उस स्टेशन का नाम कश्मीर है। वह अपना स्कूटर खड़ा करता है और स्टेशन के भीतर भागता है। इक्कत्तेस जनवरी की सुबह स्टेशन पर ट्रेन आ नहीं जा रही थी... जा रही थी। उसने पिताजी को लेने में नहीं छोड़ने में देर कर दी। ट्रेन स्टेशन से जा रही थी... उसे ट्रेन की एक ख़िड़की से पिताजी का हाथ दिख़ा... वह उस हाथ में ओम का निशान देख सकता था... वह उससे आख़री बार हाथ हिलाकर विदा ले रहे थे।

तभी पूरा स्टेशन धुंध में गायब हो गया और उसने देखा कि वह बर्फ़ से ढ़के चिनार के जंगल में खड़ा है। उसके हाथ में सिगरेट है और वह धुंध में कुछ तलाश रहा है। तभी एक चिनार के दरख़त के पीछे उसे पिताजी दिखे।

’आप इस तरफ कैसे?’ उसने पूछा...
’अपनी ज़मीन तलाश रहा था... सब तरफ बर्फ़ है... कुछ समझ नहीं आ रहा है।’ पिताजी बोले
’आपकी ज़मीन तो बहुत पहले चली गई थी। अब अगर आप अपनी ज़मीन पर भी खड़े होंगे तो भी अपको पता नहीं चलेगा कि यह आपकी ज़मीन है।’
’मुझे पता चल जाएगा।’
’यहाँ सब बदल गया है।’
’पर मैं नहीं बदला।’

पिताजी बोले और वह अपनी ज़मीन तलाशने लगे। बात करते हुए दोनों के मुँह से धुंआ निकल रहा था। वह पिताजी के करीब आया।

’पापा, आप बहुत जल्दी चले गए। अभी तो बहुत कुछ बाक़ी था।’
’क्या बाक़ी था?’
’आपके हिस्से की कहानी तो मुझे पता ही नहीं है?’

पिताजी मुस्कुरा दिये।

’तुम मेरे हिस्से की कहानी में ही खड़े हो...।’

तभी उसे घोड़े की टाप सुनाई दी। झेलम किसी धुंध में से आकर पिताजे के पास खड़ा हो गया। पिताजी जैसी ही उछलकर झेलम पर बैठे... वह वेताल हो चुके थे... चलता-फिरता-प्रेत।

झेलम की टाप... ट्रेन की आवाज़ सी कहीं दूर से जा चुकी थी। उसने अपना फोन उठाया और अपने पिताजी को फोन मिलाया। बहुत देर तक घंटी बजती रही.. पर दूसरी तरफ कोई नहीं था।

                                                                                                                                  

Monday, November 23, 2015

वह क्षण....

कल शाम ज़ोरों की भूख लगी। मैंने फ्रिज से अंड़े, कुछ बचा हुआ चावल निकाला, एक प्याज़ हरी मिर्च काटी और egg fried rice सा कुछ बनाने लगा। Thailand से कुछ प्रिमिक्स कॉफी लाया था सो बगल में एक कप पानी भी रख दिया। तभी, इस व्यस्तता के बीच वह हुआ... किचिन की खिड़की से सूरज की रोशनी भीतर आ रही थी... सामने के पेड़ पर गिलहरी टकटकी बांधे इसी तरफ देख रही थी.. ऊपर से एक प्लेन जाने की ज़ोर की आवाज़ हुई और सब कुछ अचानक से आनंदमय हो गया... लगा कि यह सब कितना खूबसूरत है। यह अकेली ख़ाली दौपहरें... पीछे रफ़ी के नग़में... दूर से आती हुई बहुत सारी चिड़ियाओं की आवाज़े। अकेले रहने के बड़े सुख हैं... यह बहुत कुछ वैसा ही है जैसे कोई बच्चा जब अपनी शुरु-शुरु की संगीत की कक्षा में वायलन या सितार पर कोई बहुत कठिन राग़ शुरु करता है... अधिकतर सब कुछ असाघ्य और कठिन लगता है.. सारे सुर भी छितरे-छितरे चीख़ते दिखते हैं... पर उन्हीं दिनों में एक दिन वह क्षण अचानक आता है जब एक सटीक सुर लगता है.. और उस बच्चे को वह सुनाई देता है... पहली बार.. वह धुन.. धुंध से उठती हुई सी। वह उसके शरीर के भीतर से ही कहीं उठ रही थी... उसे आश्चर्य होता है कि वह उसके भीतर ही कहीं छुपी बैठी थी... उंगलियां उसके बस में नहीं होती.. उसकी फटी हुई आँखें, सामने तेज़ी से गुज़रे हुए सुर पकड़ रही होती हैं। इस क्षण की मुस्कुराहट सुबह की चाय तक क़ायम है। मुझे लगा इसे लिख लेना चाहिए.. कभी जब फिर सुर भटक रहे होंगे.. जीवन कठिन लम्हों में दिखेगा.. तब इन दौपहरों को फिर से पढ़ लेंगें। फिर एक गहरी सांस लेंगें... फिर प्रयास करेंगें.. सुर भीतर ही है.. वह सटीक सुर वाला क्षण फिर आएगा.... फिर आंखें फटेगीं.. फिर से मुस्कुराहट कई सुबह की चाय को बना देंगीं।

बहुत दिनों बाद....

कुछ तीन बार यह लाईन लिखकर मिटा दी कि बहुत दिनों बाद लिखने बैठा हूँ। अभी लिखने में लग रहा है कि बस कुछ दिनों पहले की ही बात थी कि मैं लगातार लिख रहा था। फिर उस आदमी से थोड़ा बैर हो गया जो लिखता था। मैंने यूं तो कई बार कोशिश की उसे बुला लूं चाय पर और सुलह कर लूं... पर हम दोनों ही बड़े ज़िद्दी हैं। बहुत कोशिश के बाद कुछ उसके कदम मेरी तरफ बहके...कुछ मैंने उसकी ठाह लेने की कोशिश की कि वह ठीक तो है? और ठीक अभी हम एक दूसरे के सामने खड़े मिले...। ’क्या हाल है?’ मैंने पूछा.. वह गंभीर था, लेखक है इतनी नाराज़गी तो बनती है। मैंने अपने कदम किचिन तक बढ़ाए तो उसने कहा कि ’चाय नहीं, मैंने चाय छोड़ दी है।’ मुझे हंसी आई... पर इस वक़्त माहौल इतना गर्म था कि मेरी हंसी से मेरा लेखन मुझे हमेशा के लिए छोड़कर जा सकता था।’चाय कब छोड़ी’, मैंने उसकी संजदगी के अभिनय में पूछा। ’तुम्हें सच में यह जानना है कि मैंने चाय कब छोडी?’ उसने पूछा और हमारी बात वहीं ख़त्म हो गई। हम दोनों बाहर घूमने आ गए। सोचा बाहर कहीं कॉफी पीएगें, खुले में, चाय पर संवाद ठीक नहीं बैठ रहे थे। चलते हुए एक दो बार गलती से हमारे हाथ एक दूसरे से टकराए... कितना पहचाना हुआ है सब कुछ... मुझे लगा अभी भी वह वही है और मैं भी वह ही हूँ..। मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया पर वह खामोश था। कुछ देर में एक कॉफी हाऊस पर हम रुके... मैं आर्डर देने की सोच रहा था पर वह पहले ही कुर्सी पर बैठ गया। मैंने सोचा कुछ देर में वेटर आ ही जाएगा..। अब ख़ामोशी मुमकिन नही थी सो हमने सीधा एक दूसरे का सामना किया... शुरुआत फिर मैंने ही की... ’सच कहना चाहता हूँ, तुम मेरे लिए बहुत प्रिडिक्टेबल हो गए थे, और मुझे लगा कि हमारा संबंध कभी भी ऎसा नहीं था। हमने हमेशा एक दूसरे को चकित किया है... मतलब ख़ासकर तुमने मुझे। पर..... हम अपनी हर बात उन्हीं घिसेपिटे शब्दों से शुरु कर रहे थे... वही सारे वाक़्य हम बार-बार कह रहे थे.. तुम मुझे बार-बार उन जगहों पर घसीटकर ले जा रहे थे जहां मैं रहना नहीं चाहता था।’ वह हंस दिया। मैं बीच में ही कहीं रुक गया। ’क्या हुआ?’ मैंने पूछा। ’तुम झूठ बोल रहे हो... सच कहो।’ वह सीधा मुझे देख रहा था मानों खुद को देख रहा हो। ’मैं सच कह रहा हूँ।’ मेरे वाक़्य टूट गए... हिज्जे में वाक़्य निकला... और मैंने समर्पण कर दिया। ’तुमने खून किया है... तुमने जान बूझकर मुझे ख़त्म करने की कोशिश की है...पर तुम बहुत कायर हो.. तुमसे वह भी नहीं हुआ। तुमने मुझे मारा और फिर ज़ख़्म पर हल्का मलहम लगाते रहे कि मैं ज़िदा रहूं।’ वह सच कह रहा था। मैंने उसे मारने की पूरी कोशिश की थी.... पर क्या हम कभी भी किसी को भी मार सकते हैं। अपना ही चख़ा सारा स्वाद किस तरह अपने शरीर से निकालकर बाहर किया जाए? ’तुम भाग रहे थे... अब भटक गए हो। बहुत दूर भटकने के बाद जब तुम ख़ाली हुए तो लगा - देखे उसे कितना पीछे छोड़ा है... कितना दुख हुआ देखकर कि मैं अभी भी तुम्हारे पास ही था।’ मैं जवाब देने को था कि वेटर आ गया...। मैंने दो कॉफी कहलवा दी.. उसने टेबल साफ किया और दो गिलास पानी रख दिया। हम दोनों एक दूसरे का इंतज़ार कर रहे थे... पहले भी और अब भी... मैं कभी भी अच्छा इंतज़ार करने वाला नहीं रहा हूँ.. मैं असहज हो जाता हूँ... मुझे लगता है कि ख़त्म कर दूं ख़ुद को या इंतज़ार को... सो मैं फिर बोल पड़ा..। ’मैं कुछ कहूँ...?’ मैंने हल्के अपनेपन में कहा। ’तुम्हारे पास कुछ कहने को नहीं है।’ वह उठकर जाने लगा। ’कॉफी???’ मेरे मुँह से निकला और वह रुक गया। कुछ चुभ गया था भीतर... वह वापिस बैठ गया। ’मेरे पास बहुत कुछ है कहने को... इतने समय का नहीं लिखना भी भीतर काफी सारा भरा पड़ा है। मैं भटक गया हूँ क्योंकि मैं भटकना चाहता हूँ। मैं अपने निजी जीवन में खाए धोखों का बदला अपने लिखे से नहीं लेना चाहता था... मैं तुम्हें अपने जीवन की निजी हार-जीत की तुच्छता से दूर रखना चाहता था। पर यह भी पूरा सच नहीं है... इसमें बहुत सारी थकान है, अपने घने अकेलेपन की... इसमें बहुत सारी शामों की हार है... रातों का रोना है... बिना किसी वजह की सुबहें हैं। इसमें हर जगह जाना है और कहीं न पंहुचपाना है... इसमें कड़वाहट है.. और यह भी पूरा सच नहीं है सच और भी चारों तरफ छितरा पड़ा है। फिर यह भी लगता है कि क्यों ना बदल जाऊं... मैं जब भी किसी यात्रा पर होता हूँ तो एक सवाल उन लोगों के लिए उठता है जो आत्महत्या करते हैं। मुझे हमेशा से यह लगता है कि अगर मुझे ख़त्म ही करना है तो मैं जो अभी जी रहा है उसे ख़त्म करुंगा और कहीं भी फिर से, किसी एकदम दूसरे तरीक़े से जीवन शुरु करुंगा। तुमने सच कहा है कि मैंने तुम्हारी हत्या की है... कोशिश नहीं की है... पर किसी के मारने से अगर कोई मर जाता तो बात कितनी सरल होती। मुझमें एक ख़ामी है.. सारा जिया हुआ मेरे पूरे शरीर से चिपक जाता है... फिर धीरे-धीरे पपड़ी दर पपड़ी झड़ता रहता है। मुझॆ लगा था तुम भी झड़ जाओगे एक दिन.. समय रहते... पर...।“ वेटर कॉफी ले आया... वह तुरंत कॉफी पीने में व्यस्त हो गया.. मैं अपने अधूरे वाक़्य पर अभी भी टंगा हुआ था। सारा कुछ बोलकर मुझे लगा मानों मैंने कुछ कहा ही नहीं... मैं उसके सामने सालों से चुप सा बैठा था। उसने कॉफी का आख़री सिप लिया और ख़ाली कप मेरी तरफ बढ़ाया दिखाने के लिए कि मैं कॉफी पी चुका हूँ। वह खड़ा हो गया। ’तुम्हें कुछ नहीं कहना है।’ ’मुझे सिगरेट पीना है... यहां कैफे में नहीं पी सकते हैं..।’ मैं तुरंत खड़ा हुआ भीतर जाकर बिल दिया और उसके साथ हो लिया। हम बहुत से घरों की पिछली गली में निकल आए.. यह पिछवाड़े बड़े अजीब होते हैं.. यहां सारी गैरकानूनी हरकत जायज़ लगती है.. सिगरेट पीना भी...। सिगरेट के पहले गहरे कश के साथ उसने कहा.... ’तुम्हें याद है हमारी पहली कविता... तुमने डरे-डरे अपने दोस्तों को सुनाई थी। अभी उस कविता को पढ़ो तो कितनी ख़राब लगती है वह... कैसे लिखी थी।’ मैं हंस दिया मुझे बिल्कुल याद थी वह कविता। बहुत दिनों के बाद हम दोनों साथ हंस रहे थे। ’पर कितनी महत्वपूर्ण थी वह ख़राब कविता... अगर वह लिखी ना होती और उसे सुनाने की लज्जा ना सही होती तो क्या यहां तक यात्रा कर पाते?’ उसने सवाल जैसा सवाल नहीं किया... यह जवाब वाला सवाल था। मैं चुप रहा। ’यह भटकना भी कुछ वैसा ही है... एक दिन फिर हम किसी पिछवाड़े सिगरेट पीते हुए इस भटकने पर साथ हंसेगें।’ उसके यह कहते ही सब कुछ हल्का हो गया। हम दोनों कितना एक दूसरे को समझते है... कितना संयम है उसमें। मैं कुछ देर में उससे सिगरेट मांगी और दो तीन तेज़ कश ख़ीचे... आह! आनंद। हम फिर साथ थे।

Wednesday, September 24, 2014

’पीले स्कूटर वाला आदमी’

मैंने कहीं पढ़ा था- ’वेस्ट में अकेलापन एक स्थिति है, पर हमारे देश में, हम लोगों को हमारा अकेलापन चुनना पड़ता है, और इस बात के लिए हमें कोई माफ नहीं करता है... ख़ासकर आपके अपने..।’ इस देश में लेखक होने के बहुत कम मुआवज़े मिलते हैं उनमें से एक है कि हम अपने भीतर पड़ी हुई गठानों को अपने हर नए लिखे से खोलते चलते हैं। जैसे बड़े से ब्लैकबोर्ड पर गणित का एक इक्वेशन लिखा हुआ है और हम नीचे उसे चॉक से हल कर रहे होते हैं... डस्टर हमारी बीति हुई ज़िदग़ी को लगातार मिटा रहा होता है.. पर कुछ शब्द, कुछ अधूरे वाक़्य जिसे डस्टर ठीक से मिटा नहीं पाता, हम उन टूटी-फूटी बातों का रिफ्रेंस ले लेकर अपने जीवन की इक्वेशन को हल कर रहे होते हैं लगातार। ’पीले स्कूटर वाला आदमी’ इसी कड़ी का एक प्रयास था। ’शक्कर के पाँच दाने’ के बाद यह मेरा दूसरा नाटक था। उस वक़्त बतौर लेखक कुछ भीतर फूट पड़ा था, इतना सारा कहने को था कि मैं लगातार लिखता ही रहता था... इस बीच मैंने कई कविताएं लिखी... कई कहानियां... और मेरा दूसरा नाटक..। कविताएं मुझे बोर करने लगी थीं... मेरी बात कविता की सघनता में अपने मायने खो देती थी... सो मैंने कविताएं लिखनी बंद कर दी... मुझे नाटकों और कहानियों में अपनी बात कहने में मज़ा आने लगा था। असल में मज़ा सही शब्द नहीं है... सही शब्द है ईमानदारी... मैं कविताओं में खुद को बेईमानी करते पकड़ लेता था... मरी क़लम वहीं रुक जाती थी। ईमानदारी से मेरा कतई मतलब नहीं है कि मैं अपनी निजी बातों को नाटकों में लिखना पसंद करता था... ईमानदारी का यहां अर्थ कुछ भिन्न है.... एक लेखक के सोचने, जीने, महसूस करने और लिखने के बीच कम से कम ख़ाई होनी चाहिए.... हर लेखक (ख़ासकर जिनका लेख़न मुझे बहुत पसंद है) अपने नए लिखे से उस ख़ाई को कुछ ओर कम करने का प्रयास करता है। पीले स्कूटर वाला आदमी एक लेखक की इसी जद्दोजहद की कहानी है... वह कितना ईमानदार है? वह जो लिखना चाहता है और असल में उसे इस वक़्त जो लिखना चाहिए के बीच का तनाव है। मैं उन दिनों काफ़्का और वेनग़ाग के लिखे पत्रों को पढ़ रहा था.. वेनग़ाग की पेंटिग़ Room at Arles ने मुझे बहुत प्रभावित किया था.. पीले स्कूटर वाले आदमी का कमरा भी मैं कुछ इसी तरह देखता था। मेरे लिए वेनग़ाग के स्ट्रोक्स उस कमरे में कहे गए शब्द हैं, पात्र हैं और संगीत है...। अपने लेखन के समय के रतजगों में मैंने हमेशा खुद को संवाद करते हुए सुना है... आप इसे पागलपन भी कह सकते हैं.. पर मेरे लिए यह अकेलेपन के साथी हैं। मेरे अधिक्तर संवाद किसी न किसी लेखक से या किसी कहानी/उपन्यास के पात्रों से होते रहे हैं... मुझे लगता है कि मेरे पढ़े जाने के बाद कुछ लेखक, कुछ पात्र मेरे कमरे में छूट गए हैं। देर रात चाय पीने की आदत में मैं हमेशा दो कप चाय बनाता हूँ.. एक प्याला चाय मुझे जिस तरह का अकेलापन देता है उसे मैं पसंद नहीं करता... दो प्याला चाय का अकेलापन असल में अकेलेपन का महोत्सव मनाने जैसे है...। दूसरे प्याले का पात्र अपनी मौजूदग़ी खुद तय करता है... आप किसी का चयन नहीं करते.. आप बहते है उनके साथ जो आपके साथ हम-प्याला होने आए हैं। यही पीले स्कूटरवाले आदमी का सुर है. और दो चाय के प्यालों के संवाद है।

Monday, January 13, 2014

साथी.....

एक मधुर स्वर वाली चिड़िया बाल्कनी में आई...। वह बहुत शर्मीली है... उसे देखने के लिए सिर घुमाता हूँ तो वह दूसरी बाल्कनी में चली जाती है...। मैं चाय बनाने के बहाने जब दूसरी बाल्कनी के पास गया तो वह दिख गई... गहरी काले रंग की... लाल रंग की नोक अपने माथे पर चढ़ाए हुए...। मेरी सुबह मुस्कुराहट से फैल गई। मैं बहुत हल्के कदमों से बाल्कनी के कोने में खड़ा हो गया... सूरज मेरे चहरे पर सुन्हेरा रंग उड़ेल रहा था। मैं उस चिड़िया को अपना सपना सुनाने लगा... कल रात के कुछ डर मैं उस सपने में छुपाना चाहता था... पर वह सूरज की रोशनी में चीनी में लगी चींटियों की तरह बाहर आने लगे...। आजकल मेरी दोस्ती कूंए में पल रहे कछुए से बहुत बढ़ गई हैं...। उसका नाम मैंने ’साथी’ रखा है... अपने चुप धूमने में मैं जब ’सुपर मिल्क सेंटर’ चाय पीने जाता हूँ तो कुछ आत्मीय संवाद अपने साथी से कर लेता हूँ। मैंने साथी को अपने सपनों के बारे में कभी नहीं बताया... मुझे डर है कि वह एक दिन कुंआ छोड़कर चला जाएगा....। सपनों के सांझी कुछ समय में चले जाते हैं...। मैं उससे दैनिक दिनचर्या कहता हूँ... उसे आश्चर्य होता है कि मैं कितना उसके जैसा जीता हूँ...। मैंने उससे कहा है कि मेरा भी एक कुंआ है... कुछ देर ऊपर रहने पर मैं भी भीतर गोता लगा लेता हूँ और बहुत समय तक किसी को नहीं दिखता...। भीतर हम दोनों क्या करते हैं इस बात की चर्चा हम दोनों एक दूसरे से नहीं करते हैं...। साथी कभी-कभी मेरे कुंए की बात पूछता है... मेरे पास अपने कुंए के बारे में बहुत कुछ कहने को नहीं होता... अकेलपन की बात उससे कहना चाहता हूँ पर उससे अकेलापन कैसे कह सकता हूँ...? सो मैं एक वाचमैन के बारे में बात करता हूँ जो मेरा क्रिकेट दोस्त है... उससे मैं क्रिकेट की बात करता हूँ.... बाहर ’सुपर मिल्क सेंटर’ पर एक लड़का है जो मेरे लिए चाय लाता है... वह अभी-अभी दोस्त हो चला है... पता नहीं क्यों वह मुझसे अंग्रेज़ी में बात करना चाहता है... थेंक्यु और नाट मेनशन वह कहीं भी बीच संवाद में कह देता है...। फिर एक गोलगप्पे वाला भी है जो एक लड़की को पसंद करता है... वह उस लड़की से गोलगप्पे के पैसे नहीं लेता... वह अगर अपनी सहेलियों के साथ आती है तब वह उसकी सहलीयों से भी पैसे नहीं लेता...। जब वह लड़की गोलगप्पे खा रही होती है तो उसकी गोलगप्पे बनाने की सरलता... लड़खड़ा जाती है...। लड़की गोलगप्पे खाते हुए बहुत खिलखिलाकर हंसती है.... जब जाती है तो दूर जाते हुए एक बार पलटकर गोलप्पे वाले लड़के को देख लेती है... वह खुश हो जाता है। साथी बार-बार मुझसे उस गोलगप्पे वाले लड़के के बारे में पूछता है... क्या हुआ उसका उस लड़के के साथ। मैं उससे कहता हूँ कि असल में मैं इसके बाद की कहानी जानना नहीं चाहता हूँ... यह ठीक इस वक़्त तक इतनी खूबसूरत है... कि मैं खुद भीतर गुदगुदी महसूस करता हूँ.. पर ठीक इसके बाद क्या होगा? इसपर मेरे भीतर के डर धूप में चीनी के डब्बे मे पड़ गई चींटियों की तरह बाहर आने लगते हैं...। साथी कहता है कि तुम बहुत डरपोक हो... मैं कहता हूँ... मैं हूँ...। साथी से संवाद ख़त्म करके जब भी मैं सुपर मिल्क सेंटर की तरफ जाता हूँ तो भीतर एक गिजगिचापन महसूस करता हूँ....। मैं अपने इतने सुंदर साथी से भी वही टूटी हुई बिख़री हुई बातें करता हूँ...। फिर तय करता हूँ कि एक किसी नए सुंदर दोस्त से मिलूंगा... उसे उसके बारे में बताऊंगा... ओह! उसे मैंने अपनी बाल्कनी पर आई चिड़िया के बारे में भी नहीं बताया है... अचानक मुझे मेरे अकेलेपन के बहुत सारे छोटे-छोटे दोस्त दिखने लगे... ओह अभी तो ओर भी कितना है... कितना सारा है जिसे मैं कह सकता हूँ...। जैसे बोबो के बारे में...। बोबो की आँखें... उसकी पवित्रता...(पवित्र शब्द कितना दूर लगता है मुझसे.. इस शब्द के लिखने में भी मेरी उंग्लियां लड़खड़ा जाती हैं।) मैं बोबो के बारे में साथी से कहूंगा.... कहूंगा कि वह बोबो है जो मुझे मेरे छुपे में तलाश लेता है...। आज की सुबह बहुत पवित्र लग रही है... आज की सुबह...

Friday, August 30, 2013

नाम “गुड्डू” निकला... (पिछली पोस्ट से जुड़ा हुआ....)

आह!!! उस चाय वाले का
मेरे पूरे शरीर ने उसका नाम सुनते ही ‘नहीं ई ई...’ चीख़ा। इसलिए शायद लेखक जिसके बारे में भी लिखना चाहते हैं... उसका नाम वह खुद ही रखते थे। किसी के होने से ही उसकी कहानी घट रही होती है...। सुबह की लंबी walk समुद्र पर रुकी....। सुबह छ: बजे समुद्र उफान पर था.... पानी की आवाज़ भीतर घट रहे संसार को संगीत दे रही थीं... मैं शांत बैठा रहा। दूर एक अकेली लड़ी बैठी हुई थी..... सिर पर चुनरी ओढ़े.... अपनी गुलाबी चप्पलों को बगल में रखे हुए वह अपना सिर घुटनों में दबाए हुई थी। बीच-बीच में वह समुद्र की तरफ देख लेती.. मैं उसकी चुनरी में से उसका चहरा देखने की कोशिश कर रहा था... चहरे के बिना कैसे कहानी जानी जा सकती है....। सुबह छ: बजे मेरे अलावा वह ही थी उस Beach पर.... सो मेरी जिज्ञासा, हर उसके सिर उठाने पर उसके सामने कूद जाना चाहती थी। मैंने सोचा मैं अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हूँ.... कुछ गाकर... ख़ांसकर... अचानक हंसकर... या इन पत्थरों पर गिरने का अभिनय करके...। मैंने कुछ नहीं किया...। असल में इस सुबह में बहुत शांति है... सिर्फ पानी की आवाज़ है.. मैं उस पवित्रता में और कुछ भी नहीं हिंसक नहीं देख सकता था। मैंने उस लड़की की तरह पीठ मोड़ ली..... हम दोनों अपने अपने-अपने एकांत के साथ पूरे संसार के सामने बैठे थे...। एक बारको मुझे लगा कि मैं असल में पृथ्वी के ऊपर बैठा हूँ..... और पूरे ब्रंम्हांड को अपने सामने देख रहा हूँ... और दूसरे तरफ वह गुलाबी चप्पल वाली लड़की है जो मेरी ही तरफ पृथ्वी के ऊपर बैठी है पर वह ब्र्ह्मांड नहीं वह धरती के गर्भ में कहीं झांकने की कोशिश कर रही थी...। अचानक मुझे उसका धरती का मूल टटोलना मेरे ब्रह्मांड बांचने से ज़्यादा सुखद लगने लगा...। मैंने उसकी तरफ पलटा... और चौंक पड़ा वह मुझे देख रही थी.... और सब बिख़र गया... वह भी “गुड्डू...” निकली...। उसके हाथ में मोबाईल था वह गाने और मेसेज़ कर रही थी..... उसके देखने में एक दूसरी कहानी थी... जो इस सुबह की मेरी कहानी में दर्ज नहीं हो पा रही थी। मैं उठा और वहां से तुरंत चल दिया...। हमेशा दिमाग़ में इस तरह एक अजान लड़की को देखकर लगता है कि आज मैं पहली बार जीवन में किसी ऎसी लड़की से मिलूंगा जिसका मैं बरसों से इतंज़ार कर रहा था....। जो घटक की फिल्म से सीधा निकलकर आई हो... जो इतने सालों टेगोर की कहानी कविता में भटकर रही थी ... आज सुबह छ: बजे मैंने Beach पर उसे देख लिया है....। बस ठीक उसे वक़त मुझे वहां से निकल जाना चाहिए था... और अपनी डॆस्क पर बैठकर एक कहानी लिख देनी थी.... ’सुबह के घटने में उसका होना....’। पर मैंने ऎसा नहीं किया.... मुझे उत्सुक्ता थी...कुछ दूसरा देखने की.... कहीं कुछ छिपा बैठा है उसे ढूंढ़ निकालने की... कुछ नया आश्चर्य वगैहरा-वगैहरा। “जो मुझसे नहीं हुआ... वह मेरा संसार नहीं....” (कहीं पढ़ा था... याद आ गया।) वापसी में लगभग अलग-अलग टपरियों पर चाप पी.... गुरुद्वारे भी मथ्था टेक लिया वहां भी चाय मिल गई। वापिस आकर पहली बार मैंने ’सुबह’ Coetzee का लेटर पढ़ा..... मातृभाषा पर... उसमें Derrida की किताब का ज़िक्र है... Monolingualisam of the Other – 1996… यह किताब बहुत इंट्रस्टिंग लग रही है..। एक बार किसी ने शमशेर से मातृभाषा के ऊपर कुछ पूछा था... तो उनका जवाब था कि इस दुनियां में बोली जाने वाली सारी भाषांए हमारी मातृभाषा हैं। मुझे यह जवाब बहुत सुंदर लगा था... और कुछ इसी तरीक़े की पर पेचीदगी के साथ Derrida की किताब होगी जिसे पढ़ने में मज़ा आएगा.. क्यों कि वह बहुत सारी भाषा के जानकार थे। इसके बाद अचानक मेरी निग़ाह एक पुरानी ख़रीदी हुई किताब पर पड़ी जिसे जल्द पढूंगा की अलमीरा में रखा हुआ था... THE MASATER OF GO-YASUNARI KAWABATA… अभी इसे शुरु किया है...। “IT IS EASY TO ENTER THEE WORLD OF THE BUDDHA, IT IS HARD TO ENTEER THEE WORLD OF THE DEVIL.”

सुबह...

पिछले कुछ दिनों से PAUL AUSTER AND J.M. COETZEE बीच में हुए पत्राचार पढ़ रहा हूँ। साथ में कुछ दूसरी किताबों में दूधनाथ सिंह की ’लौट आ ओ धार..’ पता नहीं कहां से फिर छोले में साथ हो ली है। मुझे यह नाम बहुत पसंद है... HERE AND NOW… दो बड़े लेखक... खेल, लेखन, अर्थशास्त्र, दोस्ती... बूढ़ा होना... हर विषय पर कितनी सरलता से लिख रहे हैं। मैं इस किताब को रोज़ लगभग ऎसे पढ़ता हूँ कि एक ख़त मुझे भी आया है आज...। सुबह मैं PAUL का जवाब/ ख़त... पढ़ता हूँ और शाम का इंतज़ार करते हुए अपनी बाल्कनी में शाम की चाय के साथ Coetzee को। मैंने शाम Coetzee को क्यों पढ़ता हूँ मुझे नहीं पता...। मैंने कभी Paul के ख़त शाम को नहीं पढ़े...। कैसे लेखक संगीत की तरह हैं... जिस संगीत को सुनकर हम सुबह उठना पसंद करते हैं... उस संगीत को हम अपनी शाम के होने में शामिल नहीं करना चाहते....। बहरहाल...मैं इन दोनों के बीच डॉकिया जैसा कुछ हो गया हूँ..... नहीं डॉकिया नहीं... लेटर बाक्स...। ठीक इस वक़्त रात के तीन बज रहे हैं...। बाहर अभी ज़ोरों की बारिश शुरु हुई... मैं ’लेटर बाक्स’ शब्द लिखकर मुस्कुराया.... इस शब्द पर भी और बारिश के बुलावे पर भी...तुरंत बाल्कनी में भागा...। फिर याद आया कि चाय का कप तो टेबल पर ही छूट गया है। वापिस आया और चाय का कप लेकर बाल्कनी में बैठ गया। बहुत हल्की बारिश की फुहारें चहरे पर पड़ रही थी.... पूरी कालोनी में सन्नाटा था...। मैं बची-कुची आवाज़ों पर ध्यान देने लगा..। आंवले का पेड़ अपनी पत्तीयां छोड़ रहा है.... बाल्कनी के नीचे मानों पीला कालीन बिछ गया है। मैं वापिस भीतर आया मानों मुझे कुछ याद आया हो और मैंने वान गॉग के कुछ पत्र पढ़ ढ़ाले... “मुझ पर भरोसा रखना....”। हर बार एक अजीब आदत सी पड़ी है कि खुद को समेट लो...। झाड़ू लगाकर सारे बिखरे हुए को एक तरफ कर दो...। दो बजकर पैंतिस मिनट पर नींद खुली थी... मैं फिर सो जाता तो समेट लेता खुद को.... मैं उठ बैठा... लिखना, चाय, बारिश और चुप्पी....। अभी कुछ देर में मैं नीचे जाऊंगा... सुबह होने को देखने... कालोनी के गेट पर एक चाय वाला है जो सुबह.... पांच बजे दुकान खोल देता है। पीले बल्ब की रोशनी में जब वह मुझे सुबह-सुबह आता हुआ देखता है तो मुस्कुरा देता है...। शुरु कुछ दिनों में मुझे लगता था कि वह मेरे ऊपर हंस रहा है.... (इस शहर में आप अपने अकेलेपन पर झेंपना शुरु कर देते हो....) पर मैं ग़लत था... वह स्वभाव का अति उत्साही व्यक्ति है। सुबह मुझे जैसे आदमी को देखकर वह प्रसन्न हो जाता है। बारिश अभी रुक चुकी है...। “जो नहीं है... जैसे कि ’सुरुचि’ उसका ग़म क्या... वह नहीं है..” शमशेर का लिखा पढ़ा। कुछ देर तक उनकी बाक़ी लिखी चीज़े भी गूंजती रहेगीं। मैंने फिर खुद को समेटा... बाहर बाल्कनी में पहुंचा तो कुछ घरों से ख़ांसने बुहारने की आवाज़े आने लगी थी...। यह शहर ज़िदा हो रहा है.... हम सब यक़ीन से सोए थे कि सुबह उठ बैठेगें.... और सुबह हो रही थी। मैं आज उस चाय वाले का नाम पूछूंगा.... बस... नाम...।

Sunday, August 18, 2013

A very easy Death.....

A very easy Death…. Simone de Beauvoir …. “WHETHER YOU THINK OF IT AS HEAVENLY OR EARTHLY, IF YOU LOVE LIFE IMMORTALITY IS NO CONSOLATION FOR DEATH.” मृत्यु... कितना गहरा असर है इस किताब का...। बचपन की बहुत छोटी-छोटी चीज़ों का असर हम अपने पूरे जीवन देख सकते हैं...। माँ ऎसा शब्द है जो घर की तरह काम करता है....। दो बहने... Poupette और Simone …. और उनके उनकी माँ से संबंध... Complex, sometimes shocking …। हस्पताल में हर एक दिन का धीरे-धीरे गुज़रना...। माँ के चहरे के बदलते रंगों में, उनके सपनों में, उनके दिखने और नहीं दिखने में दिन का सरकना। मृत्यु को अपनी माँ के अगल बगल देखना और कुछ ना कर पाना... माँ की पीड़ा जिसमें उन्हें मृत्यु जल्दी आ जाए बिना तड़पे... यह प्रार्थना करना और फिर उस प्रार्थना की गलानी। एक बूढ़ी माँ का मरना बहुत स्वाभाविक है... पर सिमोन ने जिस तरह बहुत स्वाभाविक ढ़ंग से उनके अंतिम दिनों का ब्यौरा लिखा है... हम पर उनकी मृत्यु असर करने लगती है... और फिर वह बीच में उनकी बहन और उनके माँ से संबंध के बारे में लिखती है तो हमें पता चलता है कि वह माँ जो बिस्तर पर लेटी हुई है उनका कितना गहरा प्रभाव है दोनों बहनों पर.... कुछ ही देर में आप सिमोन की आँखों से सोमवार.. मंगलवार... का गुज़रना जीने लगते हैं। “When someone you love dies you pay for the sin of outliving her with a thousand piercing regrets.” आख़री पन्नों में…. जब मृत्यु के बाद माँ चीज़ों में बट जाती है...। सिमोन की बहन उनका रिबिन रखना चाहती थी... पर उससे क्या होगा? जब उन्हें शमशान ले जाया जा रहा था तो सिमोन की बहन ने कहा.... “THE ONLY COMFORT I HAVE IS THAT IT WILL HAPPEN TO ME TOO… OTHERWISE IT WOULD BE TOO UNFAIR.” हम किस तरह किसी के चले जाने की खाली जगह को भर सकते हैं? हमें हर बार लगता है कि वह गुण हमें आता है... पर हम हर बार हारे हुए उन ख़ाली जगहों में अपनी ही आवाज़ को गूंजता हुआ सुनते हैं। किसी अपने के चले जाने को पूरी ज़िदग़ी ढ़ोते रहते हैं.... फिर-फिर बार-बार वह अलग-अलग अर्थों में अलग-अलग कमरों में हमसे टकराता है पर हम उसे कभी देख नहीं पाते। जब मेरी नानी की मृत्यु हो रही थी तब मैं उनके बगल में बैठा था... ठंड थी... हम सब उनके शरीर से प्राण निकल जाने का इंतज़ार कर रहे थे... वह उल्टी सांसे लेने लगी थी। तब मैंने उनकी देह को बहुत करीब से देखा था... सूख़ी सी देह... मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था कि इसी शरीर ने मेरी माँ को जन्म दिया है....। तभी मुझे उनकी तनी हुई नसें दिखी थी... पता नहीं कितने सालों का संघर्ष... उन नसों में सूखकर जम गया था। मैं आज तक उस रात को नहीं भूला हूँ...। जब सिमोन अपने माँ के खुले हुए मुँह की बात कर रही थीं तब मैं अपनी नानी के चहरे को देख सकता था साफ...। इस किताब ने भीतर पल रहे पता नहीं कितने छोटे-छोटे हिस्सों को ज़िदा कर दिया है। हम सबने अपने माँ बाप की मृत्यु की कल्पना की है... पर हम कभी भी उसके लिए खुद को तैयार नहीं कर सकते...। सिमोंन जितनी बार हस्पताल का कमरा नम्बर 114 लिखती हैं किताब में... मैं उस कमरे के बाहर उनका खड़ा रहना देख सकता हूँ... धीरे-धीरे उनका रेंगते हुए उस दरवाज़े का खोलना.. धीरे-धीरे मृत्यु के करीब आने को लिखना। मैं जब दुबे जी (पं. सत्यदेव दुबे) को देखने हस्पताल गया था... वह कोमा में थे... उनकी मृत्यु के कुछ दिन पहले की बात है.... मैंने उनके पास खड़े रहकर पता नहीं क्यों उनके माथे पर हाथ रख दिया था... (जब वह ज़िंदा थे मेरी कभी हिम्मत नहीं थी कि उनका माथ छू दूं...)। शायद मुझे लगा था कि वह कोमा में कुछ बुरा सपना देख रहे हैं... उनकी देह बार-बार कांप जाती थी। उनके माथे पर हाथ रखते ही पता नहीं क्या हुआ मैं ज़ार-ज़ार रोने लगा... मैं खुद को संभाल नहीं पाया.... पता नहीं... आज यह किताब पढ़ते वक़्त मुझे बार-बार मेरा दुबे जी का माथा छूना याद आ रहा था... पता नहीं...मैं अपने रोने को लेकर इतना झेंप क्यों रहा था...... “THERE IS NO SUCH THING AS A NATURAL DEATH: NOTHING THAT HAPPENS TO A MAN IS EVER NATURAL, SINCE HIS PRESENCE CALLS THE WORLD INTO QUESTION. ALL MEN MUST DIE: BUT FOR EVERY MAN HIS DEATH IS AN ACCIDENT AND, EVEN IF HE KNOWS IT AND CONSENTS TO IT, AN UNJUSTIFIABLE VIOLATION.”- Simone ….

Friday, August 16, 2013

Colour Blind...5

कितना महत्वपूर्ण होता है जीवन का दिख जाना। ज़िंदा होते हुए शब्द... जो बहुत समय तक कागज़ पर मृत अक्षरों की तरह पड़े हुए थे...। नाटक को सांस लेते हुए देखना....। इन्हीं बहुत छोटी पहली सांसों के लिए नाटक करते रहने का सुख है...। कोई जब मुझसे यह छिछला सवाल पूछता है कि नाटक और फिल्मों में क्या अंतर है...? तो शायद उसका जवाब भी मुझे अब मिला है.... इस नाटक के जन्म में....। किसी चीज़ का जन्म होते हुए देखना... आपके खुद के मृत अतीत पर मरहम का काम करता है। और यह मज़ा सिर्फ नाटक में ही मिलता है क्योंकि नाटक का जन्म एक दिन नहीं होता... वह लगातार.. हर दिन.. हर तालीम (मराठी में रिहर्सल को तालीम कहते हैं.. जो मुझे बहुत पसंद है) में होता है। मैं अपना पूरा दिन बिना किसी काम के पड़े-पड़े बिता देता हूँ इस इंतज़ार में कि शाम होगी और आज की तालीम में मैं फिर कुछ पैदा होते देखूंगा। एक मूर्तिकार जब गीली मिट्टी से खेलता है.... और धीरे-धीरे पानी की मदद से वह उस मिट्टी को एक दिशा में धुमाना शुरु करता है तो अचानक एक संरचना दिखने लगती है। मेरे नाटक बनाने में थोड़ा अंतर है... मैं गीली मिट्टी के सामने घंटो बैठा रहता हूँ....। बहुत लंबे संयम के बाद मिट्टी अपने छोटे-छोटे हिस्सों में बात करने लगती है...। उस क्षण को मैं कभी पकड़ नहीं पाया जब मेरे हाथ खुद ब खुद उठकर खेलने लगते हैं। तब एक लुका-छिपी का खेल शुरु होता है.... इस खेल में मिट्टी अपनी संरचना पर खुद आती हैं.... चूकि मैं मूर्तिकार हूँ.... इसलिए मेरे हाथ उस मिट्टी की मदद करते हैं...। मैं उसे नहीं वह मुझे बनाती है...। मैं पूरी तरह खाली होकर मिट्टी के पास जाता हूँ... रोज़। बिना सोचे-जाने... इसमें हम दोनों एक दूसरे को तुरंत अपना लेते हैं... मैं अपने बंधे-बंधाए सिद्धांत उसपर थोपता नहीं हूँ.. और वह भी अपने संवाद में सूखती नहीं है। मिट्टी अपनाने में अपना समय लेती है... पर जब अपनेपन के खेल शुरु होते हैं तो मुझे मेरा बचपन का सा सुख दिखने लगता है। अभी नाटक किसी बचपन के खेल में मुक्त है। अभी वह पीपल और इमली के पेड़ के नीचे बैठकर सांस ले रहा है।

Monday, August 12, 2013

Colour Blind...4

एक पर्दा दिखता है। मेरे और टेगोर के बीच..। मैं कभी भी उन्हें पूरी तरह देख नहीं पाता हूँ। तभी एक व्यक्ति पर्दा हटाकर सामने आता है...। ना यह टेगोर नहीं है... इसने तो जींस और टी-शर्ट पहनी हुई है.. तभी वह कहता है कि वह टेगोर होने का अभिनय कर सकता है...। मैं अभिनय शब्द नहीं सुनता हूँ और उसके भीतर टेगोर का होना टटोलने लगता हूँ। मैं उसे गाने के लिए कहता हूँ... वह कविता कहता है... मैं उसे बैठने के लिए कहता हूँ... वह नाचने लगता है... उसकी चुप्पी में मुझॆ शब्द दिखते हैं... और उसके बोलते ही सब कुछ फिर से धुंधला हो जाता है। सच में किस तरह से दिख सकता है वह जिसे मैं टेगोर समझे बैठा हूँ। फिर प्रश्न यह भी है कि क्या मैं सच में महज़ टेगोर देखना चाहता हूँ...? या मैं टेगोर के बहाने खुद का उलझा हुआ कुछ सुलझा रहा हूँ। मैं हमेशा अपने सबसे उलझे हुए समय में.... अपने किसी नाटक की आड़ में छुप गया होता हूँ...। नाटक की उलझनों के सामने जीवन की पीड़ा बहुत टुच्ची दिखती है। हर बार रिहर्सल के बाद जब मैं... एक चाय और सिगरेट... के साथ होता हूँ... एक आश्चर्य मानों... बगल जैसी किसी जगह आकर बैठ जाता है। मैं अपनी सांस रोक लेता हूँ... यह तितली का आपके कंधे पर बैठने जैसा अनुभव है... मैं देर तक महसूस करता हूँ उसका बैठना पर उसे देख नहीं सकता हूँ। मेरे हिलते ही वह नदारद होगी। फिर अचानक लगता है कि मैं टेगोर भी नहीं देख सकता... मुझे नहीं पता कि मैं टेगोर देख पा रहा हूँ कि नहीं...। अपने आश्चर्यों और टेगोर के बीच अचानक मुझे एक तितली सांस लेती हूँ महसूस होती है। मैं बस इन तितली के रंगों के बीच color blind सा कुछ तलाश रहा हूँ। मुझे जो देखता है... और जो मेरे देखते ही नदारद हो जाएगा के बीच.... यह नाटक पल रहा है....। मेरे आश्चर्यों में आज मुझे बचपन में देखा टमाटर का छोटा सा पेड़ याद आया (कश्मीर में...)। मुझे हमेशा लगता था कि टमाटर बज़ार में मिलते हैं.. कोई इन्हें बनाता है शायद... पर उसे उगते हुए एक पेड़ पर देखना... यह मेरे लिए अदभुत था... मैं हंसता हूँ.... चाय के कुछ घूंट खीचकर ... सिगरेट बुझाता हूँ....। ठीक अभी कुछ सुलझा सा लगने लगा है.... यह सोचकर ... खुद से वर्जीनिया वुल्फ की लाईन कहता हूँ.... let’s take a walk….. |

Saturday, August 10, 2013

चिड़िया के नहीं दिखने में उसके दिख जाने की प्रसन्नता छुपी है...

बाहर आजकल एक छोटी चिड़िया देर तक आंवले के पेड़ पर सुबह खेलती दिखती है। बाहर देखने का पेड़ बदल चुका है। यहां इस नए घर के आस-पास बहुत पेड़ हैं.... बहुत पेड़ों ने आसमान घेर रखा है..... इसलिए आजकल चील कम दिख़ती है... बाहर जाता हूँ और कभी चील जाए तो पुराने घरों की याद आने लगती है... उन यादों का सिलसिला फिर टूटे नहीं टूटता। सो मैं आसमान में चीलों को अब नहीं खोजता हूँ। जैसे कुछ देर के अभिनय के बाद सच में हंसी आने लगती है, ऎसे ही कुछ देर के अभिनय के बाद सच में प्रसन्नता आंवले के पेड़ पर खेलती दिखती है। एक जोड़ा गिलहरियों का सारे पेड़ों पर दौड़ लगाता है...। छोटी लाल चींटियां.... मालगाड़ी की तरह घर के एक कोन से दूसरे कोने में खों जाती हैं। मैं अपनी अधूरी लिखी कहानियों के बारे में सोचने लगता हूँ.... जिन्हें फिर-फिर खोलने पर भी मैं उनके आगे एक शब्द भी नहीं जोड़ पाता...। शायद कुछ कहानियां कभी पूरी नहीं होंगी... हम हमेशा उन क्षणॊं को कोसते रहेगें जिन क्षणॊं में हमने आख़री वाक़्य उन कहानियों में लिखे थे.... और अपनी डेस्क पर से उठ गए थे। काश हम उन्हें पूरा कर लेते... उस वक़्त...। नई कहानियां अधूरी कहानियों के बोझ तले शुरु नहीं होती... वह कुछ वाक्यों के बाद ही दम तोड़ देती हैं। शायद वह नई कहानियां... अधूरी कहानियों की पीड़ा सूंघ लेती हैं... और छूट जाती है। इसलिए शायद मैंने नई कहानियों को लिखने की जद्दोजहद त्याग दी है... अब मैं उस छोटी चिड़िया का इंतज़ार करता हूँ जो हर सुबह आंवले के पेड़ पर खेलने आती है। जितनी जल्दी दिखती है उतनी ही जल्दी ओझल हो जाती है.... वह फिर आएगी के इंतज़ार में गिलहरी सामने से भाग लेती है... चींटियां अपना पथ बदल लेती हैं... और जब मैं उस छोटी सी चिड़िया को खोजना छोड़ देता हूँ वह अचानक दिख जाती है... यही अचानक खुशी का आना है...। प्रसन्नता फिर आंवले पर बैठी दिखती है। कितनी छोटी है और कितना कुछ दे जाती है। मैं ठीक उसे देखते हुए सब भूल जाता हूँ... भूल जाता हूँ कि इस पेड़ के घने छप्पर के पीछे जो आसमान है... वहां चील अभी भी उड़ रही होगी... उस चील की अधूरी कहानी अभी भी मेरे कमरे की डेस्क पर मेरा इंतज़ार कर रही होगी। मैं सब भूलकर हाथ बढ़ाता हूँ और एक आंवला पेड़ से तोड़ लेता हूँ। मेरी ड़ेस्क पर बैठे हुए मैं उस छोटी सी चिड़िया की कलरव सुन सकता हूँ। आखिर में बाहर क्या है.... बाहर वह है जो मेरी खिड़की से मूझे दिखता है... पर जब सच में बाहर कदम रखता हूँ तो उसका कोई अंत नज़र नहीं आता। तभी ख़्याल आता है कि चिड़िया के नहीं दिखने में उसके दिख जाने की प्रसन्नता छुपी है...। अधूरी कहानियों की आड़ में कहीं एक नई कहानी जन्म लेती है... वह अचानक मुझे एक दिन दिख जाएगी जब मैं उसे खोजना बंद कर दूंगा।

Friday, August 2, 2013

Colour Blind...3

टेगोर... क्या है इस नाम में...? मैं क्यों आकर्षित हो रहा हूँ उस बच्चे से... उसकी चुप्पी से... उसके अकेले खेलते रहने से.... टेगोर। एक विशाल से मैदान में एक बच्चा पालकी में बैठे हुए अपना छोटा संसार जीने लगता है। चॉक से बने गोले के बीच... पानी में सिर घुसा देने की सज़ा पाता है। किसी दूसरे की बनाई हुई फिल्म की तरह अपने ही बाप का जीवन देखता है। इस संसार में मुझे कोई कमी नहीं लगती है... इस संसार की सुंदरता टेगोर को भी उसके बड़े होने के बाद समझ में आई..। उसके बचपन के अकेलेपन में बहुत सारे खेल शुमार थे। बड़े होने में एक प्रतिक्षा थी... किसीकी... कोई था जो आ नहीं रहा था... कोई था जो चला गया था..। या वह असल में रतन थे.. (पोस्टमास्टर कहानी की लड़की) जो पीछे छूट गए थे। जो पूरा जीवन पोस्ट ऑफिस के चक्कर काटते रहे। किस जगह मैं टेगोर को पकड़ सकता हूँ? कैसे उनके लिखे में उनकी मन:स्थिति तक पहुंचा जा सकता है। उनका प्रेम बिना पीड़ा के नहीं दिखता... पीड़ा ढ़ूंढ़ने जाओ तो प्रेम पा लिया ऎसा लगता है। बचपन में ’मैं भी हूँ...’ की लड़ाई शुरु हुई... अपने होने को सिद्ध करने में जब अपने घर का दरवाज़ा खोला तो पूरा बंगाल था... जब बंगाल का दरवाज़ा खोला तो पूरा देश था... फिर विदेश... लड़ते-लड़ते अचानक पूरे ब्रह्मांड में उन्होंने खुद को सबसे छोटा पाया...। फिर सब धुल गया.... देश.. विदेश... सब कुछ... फिर वापिस वह अपनी पुरानी प्रतिक्षा पर लोट आए... किसी की... किसी एक की... वह वापिस पोस्ट-ऑफिस के चक्कर काटने लगे... कोई एक मिले जो बस सब सुन ले। फिर एक तरह से बहुत स्वार्थी भी दिखे... जिसने अपने लिखे को दूसरे के जिए में बटोरा... कभी भी किसी भी कहानी को उसके नेचुरल अंत तक नहीं पहुंचने दिया...। पर नेचुरल शब्द टेगोर पर जाता भी नहीं है जितना उन्होंने अपने जीवन में काम किया वह नेचुरल नहीं है। मैं कई बार उनसे संवाद करना चाहता हूँ जिसमें एक प्रश्न बार-बार दिमाग़ में आता है कि इतना सारा क्यों लिख रहे थे वह? मैं इस बात के मूल में पहुंचना चाहता हूँ इस नाटक के द्वारा... कि काम का इतना सारा बोझ.. जिसके अंत में वह टैगोन नहीं होना चाहते थे। सामान्य उनके जीवन में कुछ भी नहीं था...। आज सुबह उठा तो लगा टैगोर ने मेरी तरफ मुड़कर देखा... मेरी बहुत से सवालों का वह जवाब देने ही वाले थे कि सपना टूट गया। एलार्म चीख़ रहा था... मैं भागकर अलार्म बंद करके फिर लेट गया ज़ोर से आँख बंद की और टैगोर की आख़री झलक याद करने लगा...। व्यर्थ था सब कुछ..। करवटें... करवटें और फिर कुछ करवटें... मैंने बिस्तर त्याग दिया। बहुत देर तक किचिन में खड़ा रहा... चाय का पानी चढ़ा दिया था पर गैस चालू नहीं की... मैं खड़ा रहा... सपने का सिर पैर मेरी समझ से परे था। मेरी टैगोर से मुलाक़ात (सपने में...) उनके Switzerland प्रवास के दौरान हुई... जब वह तीन महीने के लिए Switzerland / Italy में विक्टोरिया का इंतज़ार कर रहे थे और वह नहीं आई। हमारी बातचीत में मैं कहे जा रहा था और वह चुप थे... बीच-बीच में एक गहरी सांस की आवाज़ आती और सब चुप... मेरे सारे सवाल व्यर्थ थे मानों वह सुन ही नहीं रहे हों... फिर पता चला कि मैं असल में एक स्क्रीन के सामने खड़ा हूँ जिसपर उनके इंतज़ार का लाईव टेलिकास्ट चल रहा है। जबकि मैं भी Switzerland में ही था... मैं उसी विला में था जिसमें वह थे पर मैं उन्हें स्क्रीप पर देख रहा था। सपना बिना किसी संवाद के खत्म हो चुका था। कुछ देर बाद मैंने गैस चालू की... चाय बनने की प्रक्रिया शुरु हो गई थी पर मैं वहां नहीं था। मुझे बैचेनी महसूस हो रही थी.. टैगोर की छवी मेरे दिमाग़ में बहुत सुंदर सी थी... फिर अचानक यह इंतज़ार वाली बात ने पता नहीं उस छवी के साथ क्या छेड़-छाड़ की कि लगा मैं इस बारे में उनसे बात करना चाहता हूँ.... पर कर नहीं पा रहा हूँ क्योंकि मैं उन्हें स्क्रीन पर देख रहा हूँ... सामने नहीं। मैं समझता हूँ उनकी मन: स्थिति को.... इस घटना के बाद वह ओर भी करीब थे... एक सीधे साधे इंसानी रुप में... जिसे ज़रुरत थी उस वक़्त किसी की..। मुझे लगा मैं उन्हें पकड़ सकता हूँ उनकी कहानीयों में... उनकी कविताओं में... पर वह हर बार छूट जाते थे... अब अचानक लगा कि वह मेरे सामने हैं... हम आँखो में आँखे डालकर एक दूसरे को देख ही रहे थे कि सपना टूट गया। बहुत कमज़ोर क्षणों में हम अचानक अपनी सारी कमान छोड़ देते हैं... फिर ऎसा करना है और ऎसा नहीं कर सकते के बीच की सारी की सारी उठापटक अपना मानी ख़ो देती है। ठीक ऎसे वक़्त शायद हम खुद को पहली बार देख लेते हैं... बिना आईने.. बिना कपड़ों के...। जैसे का तैसा सा सब कुछ सामने पड़ा होता है और हमें यक़ीन नहीं होता कि यह क्या हो रहा है...? असहायता.... यह शब्द मुझे टेगोर से जोड़ती हैं...। मैं इस नाटक में कुछ इस शब्द की कविता खोज रहा हूँ।

Saturday, July 27, 2013

Colour Blind...2

कल पहला दिन था जब शुरु के सीन के साथ फ्लौर पर खेलेना शुरु किया था...। बार-बार लगता है कि हम किसी के बारे में बात कर रहे हैं जो वहां मौजूद है और कुछ कह नहीं रहा। पिछले कुछ महीनों से इतनी टेगोर पर बात हो चुकी है कि लगता है कि पहाड़ के किसी एक बड़े से घर में वह अकेले रहते हैं.. और मैं अपनी नोटबुक लेकर उनसे लगातार मिलने जाता हूँ। वह अपने जीवन के अंशों के बारे में कुछ इस तरह बात करते हैं जैसे वह अपनी कविताओं की व्याख्या कर रहे हो। मैं कुछ चीज़े नोट करता हूँ और कुछ जाने देता हूँ। जो जाने देता हूँ वह मेरे साथ रिहर्सल स्पेस में चला आता है और जो भी कुछ मैं नोट करता हूँ वह बेमानी लगता है। मुझे अधिक्तर अपनी नानी याद आती हैं... मैं जब भी उनके कमरे में उनसे मिलने जाया करता था तो महसूस होता था कि वह मुझसे कुछ कहना चाहती हैं.. हम बात करते और वह बीच बात में मेरा हाथ कसकर पकड़ लेती... मैं चुप हो जाता... वह मौन में मुझे ताकती रहती... और कुछ घटता। मैं अभी तक उस घटे हुए को पकड़ नहीं पाया हूँ... ठीक ऎसा ही मुझे महसूस होता है टेगोर के साथ... बीच बात में कोई जैसे मुझे चुप कर देता है... कुछ घटता है... और मैं चूक जाता हूँ। क्या घटता है मौन में...? क्यों चूक जाता हूँ? क्या मैं इस चूक को नाटक में शामिल कर सकता हूँ? बने बनाए तरीके से एक कहानी दिखने लगती है... जो सीधी है...। उसपर विश्वास भी किया जा सकता है...। पर मेरा ध्यान बार बार मेरी नानी के बूढ़े हाथों पर जाता है... मैं नहीं रोक पाता खुद को...। एक त्रुटी है... इन सब बातों के बीच... जिसे मैं किन्हीं अच्छे क्षणों में देख भी लेता हूँ... पर पकड़ नहीं पाता हूँ। मैं इस त्रुटी का निर्देशन करना चाहता हूँ.... मैं अपनी नानी के हाथ को ... बीच में आए मौन को... टेगोर और हमारे बीच घट रहे ’कुछ..’ को मंचित होते देखना चाहता हूँ। एक सवाल भी उठता है बार-बार कि इन सबमें टेगोर कहां है? टेगोर जिसे सब जानते हैं..। क्या मैं कभी भी सबकी कल्पना के टेगोर को मंच पर दिखा सकता हूँ? क्या मैं कभी भी टेगोर को दिखा सकता हूँ? थोड़ा सा भी? शायद नहीं। मैंने टेगोर को बीच बातचीत में कहीं देखा है... उनके बहुत सारे लिखे के बीच कहीं एक झलक उनकी देखी है... कहीं महसूस किया है कि ठीक किसी वक़्त मैं बिल्कुल ऎसा ही सोच रहा था...। सो अंत में उस एक झलक को अगर मैं मंच पर ठीक से देख सकूं तो कह सकता हूँ कि कहीं एक बात में इंमानदारी है...। खुद को अलग कर पाना असंभव है इस प्रक्रिया में....। मेरा खाना.. पीना.. उठना.. बैठना... बैठे रहना... पीड़ा ... घाव.. असंतुलन.. मौन.. सब कुछ इस नाटक में शामिल होते मैं देख सकता हूँ। उत्साह और डर के बीच का कोई आदमी है इस वक़्त मेरे साथ.. जिसके साथ मैं चाय पी रहा हूँ। फिर चाय... मृत्यु!!! “कोपलें फिर फूट आई है शाख़ों पर... उससे कहना...” कल यह वाक़्य पढ़ा और इसी में गुम हूँ।

Colour Blind....1

हमें कोई पेंटिग क्यों पसंद आती है? मैंने कहीं यह पढ़ा था.. कि जब हम अपने जीवन के अंश उन रंगों में कहीं देख लेते है तो वह रंगो का समूह हमसे बात करता दिखता है... हम कहते हैं यह पेंटिग मुझे बहुत पसंद है। टेगोर अब मुझे रंगो में दिखते हैं... एक विशाल केनवास पर सघन रंगों के बड़े-छोटे स्ट्रोस..। थोड़ा दूर हटके उस पेंटिग को देखों तो जगहें नज़र आने लगती हैं... कुछ लोगों के चहरे दिखने लगते हैं। मैं जगह को पकड़ता हूँ... उसमें कुछ चहरों को मिलाकर पेंटिंग के करीब पहुंचता हूँ... तो वहा सिर्फ एक कत्थई रंग का ब्रश स्ट्रोक नज़र आता है... जैसे किसी कोरे कागज़ पर महज़ ’क...’ लिखा हो...। मैं इन सारी गड़मड़ आकृतियों से बात करने लगता हूँ... रंगों के गहरे स्ट्रोक्स को जब छूने जाता हूँ तो वह अभी भी गीले लगते हैं। कुछ रंग कम हैं... यह समझ में आता है... पर कमी और भी कहीं है...। असल में कमी ठीक शब्द नहीं है... ख़ाली है कुछ ऎसा लगता है। मानों एक कुर्सी पूरी ज़िदग़ी खाली रखी है कि वहां कोई आकर बैठेगा। यह ख़्याल आते ही मुझे यह पेंटिंग अपनी लगने लगती है। अभी-अभी टेगोर नाटक का अपना हिस्सा ख़त्म करके चाय पी रहा हूँ। इस तरह से लेखन मैंने पहले कभी नहीं किया... एक व्यक्ति का लिखा हुआ और उसके जीवन के अंशो को दिमाग़ में रखकर संवाद लिखते जाना। मुझे कहीं बीच में लगा कि मैं बहुत असंभव से बिख़राव को एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ....। यह एक तरह की लघु कथा है... जिसमें हर जगह टेगोर है और असल में कहीं भी नहीं है...। लिखना खत्म करते ही लगा कि जैसे घर में से कुछ सामान निकल गया है...। कमरा ख़ाली लगने लगा। मैं गाना गुनगुना रहा था मुझे लगा कि वह गूंज रहा है... दीवारों से टकराकर सारा संगीत वापिस मेरे पास चला आ रहा है... कितना ख़राब गाता हूँ मैं.... मैं चुप हो गया। यह चुप्पी भी कितनी हल्की है... मैं चल रहा हूँ तो लग रहा है कि कपड़े नहीं पहने हैं...। एक सहारा चाय है जो बहुत अच्छी बनी है... अदरक़ गले को सहला रही है।

Saturday, May 25, 2013

वक़्त बजता है...

दिन बीतते हैं.. समय, दिन बीतने की गति में कभी कभी बहुत धीमा सुनाई पड़ता है। फिर एक वक़्त आता है जो कभी कटता नहीं है... समय कान में बजता है। अगले ही पल लगता है कि कुछ दिन यूं ही सोते हुए बीत गए हैं.. आज की तारीख़ देखने पर अचरज होता है, हिसाब लगाने बैठो तो पुराने दिन धुंध में ढूबे हुए लगते हैं.. कुछ पकड़ में आता है कुछ छूटा रहता है हमेशा के लिए..। क्या सच में कुछ छूट जाता है हमेशा के लिए.? क्या इस जनम में उससे फिर वास्ता नहीं पड़ेगा? इन सबके बीच में हृदय अपनी एक धड़कन खो देता है.... चलते-चलते हाथ माथा सहलाने लगता है... अगर रुके हो तो चल देने का मन करता है... चल रहे हो तो वहीं बैठ जाने की इच्छा सताती है... गहरी सांसा लेने से आँखों के किनारे पानी नज़र आता है... ऎसा तब होता है जब कभी तुम्हारा नाम कहीं दबे हुए के बीच में से छूट जाता है... मेरी कविता...। अपनी कहानीयों और नाटकों के बीच कहीं मैंने तुम्हें भीतर दबा रखा है... छुपाया नहीं है। आहट है.. दरवाज़े पर अचानक खट होती है.. मुझे मेरे पुराने दरवाज़े याद हो आते हैं... वह तुम्हारा खूबसूरत चहरा हर आहट पर...। मैं तुम्हें अब नहीं लिख सकता... तुम्हारे साथ खरीदे मेरे जूते अब मुझे काटते हैं.. उनमें रहकर बहुत दूर चला नहीं जाता..। यह जूते तब भी काटते थे मुझे... पर लगता था वह जूता ही क्या जो हर चाल में अपनी उपस्थिति दर्ज ना कराए...। अब अनुपस्थित है मेरा पुराना घर.. इस नए घर में...। हम किस तरह जीना सीख़ रहे होते हैं??? किसी की कमी की टीस जब भी होती है हम उसे अपनी जीने की आदत में शुमार कर लेना चाहते हैं...। इस वक़्त भी लिखते हुआ तीव्र इच्छा हो रही है कि अभी पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों को उठाऊं और एक कविता लिख डालूं... मैं उसे महसूस कर सकता... सूंघ सकता हूँ... मुझे पता है दरवाज़े के दूसरी तरफ कोई है... बिना आहट के वह सिरझुकाए वह मेरे कोरे पन्ने की तरफ बढ़ने का इंतज़ार कर रही है....। कविता से बिछड़ने के आखरी दिन मुझे याद हैं..। वह लंबी शामें.. गहरी रातें... नीरस दौपहरें.... मैंने उन कोरे पन्नों के सामने बिताई हैं...। कितनी क्रूरता थी... जब अचानक उसने आना बंद कर दिया था...। दूसरे जब कविता सुनाते थे तो मुझॆ लगता था कि यह मेरी ही कविता है जो उसके साथ रहने लगी है। मैं अपने पुराने लिखे में उसके होने को सहता था। अब फिर से उस कोरे पन्ने के पास जाने की इच्छा मैं दबा देना चाहता हूँ। कुचलना चाहता हूँ उसे क्योंकि मुझे पता है कि वह फिर चली जाएगी... और शायद इस बार मैं उसका जाना बर्दाश्त नहीं कर सकता...। मैं अपनी कहानियों में.... अपने नाटकों में उसे पा लेता हूँ... हम कुछ देर बैठकर बातें करते हैं... साथ चाय पीते हैं... और मैं उसे कुछ देर में चले जाने के लिए कहता हूँ..। वह बुरा नहीं मानती है और मुझे बहुत दुख नहीं होता है...। वह जानती है कि पीछॆ पड़े हुए कोरे पन्नों में अभी भी उसकी जगह है... पर वह अपनी जगह खोजती नहीं है... मैं उन कोरे पन्नों का ख़ालीपन उस सामने आने नहीं देता। कोई सीढ़ीयां चढ रहा है...। हल्के कदमों की आहट सुनाई दे रही है... वह दरवाज़े के बाहर खड़ी है... मैं उसकी सांसे महसूस कर सकता हूँ...। मैं जानता हूँ वह दरवाज़ा नहीं खटखटाएगी... पर वह है वहीं...। मेरी भी चाय पीने की इच्छा है... मैं भी दो बातें सुनना चाहता हूँ...। मैं दरवाज़ा खोलने जाता हूँ......।

Sunday, March 3, 2013

ख़त...

जैसे ठंड के दिनों में सुबह टांगे पर बैठकर स्कूल जाना... परिक्षा के दिनों में खेलने के आधे घंटे का सुख चुरा लेना... अपने घर के अंधेरे कोने में तकिये लगाकर अपना एक अलग घर बनाना... ज़रुरी काम के बहाने से बार-बार टाल पर मिट्टी खाने जाना... लंबी दौपहरों में देर तक म्मताज़ भाई की पतंग की दुकान पर बैठे रहना... कबीट ख़ाते हुए ताड़का वद्ध देखना... नदी में लंबे गोते लगाकर दस पैसे ढूंढ लेना.. एक कचौड़ी और थोड़ी सी जलेबी के लिए कई दिन इंतज़ार करना... पड़े हुए पैसे मिल जाने के ख़्वाब देखना... और फिर देर तक कल्पना में जीना कि कैसे खर्च करुंगा उन्हें... मज़ार पर जाकर अपने भगवान की बुराई करना... बहुत चालाक हो जाने की इच्छा रखना... बारिश में भीगना... बेंजो सीख़ना पर दिल में तबला बजाने की इच्छा रखना... बाहर जाना और वापिस घर कभी ना आने की ज़िद्द पालना... घर में पड़े रहना और पड़े-पड़े बाहर होने का डर पाल लेना.... लंबे समय तक धूप में चलना... पीपल, ईमली को छोड़ना और बरगद की छाया तलाशना... माँ के होने में माँ को खोजना... घर से निकलना और बार-बार घर वापिस आना...। इन सबमें कहीं कविता है... पर कविता यह नहीं है। एक वाक़्य से दूसरे वाक्य पर कूदते हुए बीच के बिंदुओं में कहीं कविता ताकती है। मैं महसूस करता हूँ... मिलने और नहीं मिलने के बीच का अंश... किसी गलती को करने की इच्छा और उस गलती को ना करने के बीच कहीं है कविता। बचपन के छूटने और बड़े होने के बीच... हम सभी को पता है। कुछ बदलने की प्रक्रिया में है सब कुछ... फिर भी दूर लगता है..। क्योंकि यह सब है सबमें... सबके पास... पर कविता किसके लिए है? यह प्रश्न बहुत बड़ा है...। हमेशा वह किसी के लिए होती है... निजी से निजी चीज़ भी किसी के लिए होती है। शायद कई दिनों बाद खुदी के पढ़ने के लिए भी हो सकती है... पर हमारे अवचेतन को हमेशा पता होता है कि किस लिए है। यह जीवन असल में एक ख़त है... किसी के लिए... पूरा जी लेने के बाद हम चाहते हैं कि बुढ़ापे में एक दिन हम बरामदे में बैठे हुए चाय पी रहे होंगे... हल्की मुलायम धूप होगी और उस दिन, कांपते हाथों से मैं अपना जीवन.... जो कि एक लिफाफे या डायरी में होगा... खोलूंगा और उसे वह ख़त पढकर सुनाऊंगा... उस पढ़्ने की फिर एक कहानी होगी...। जिसे जंगल में चलते हुए कह दूंगा... कहानी कहते हुए मैं उसके सारे झूठ जी लूंगा...।

Sunday, February 24, 2013

प्यादा...

दीवार पर हम चिपक जाते हैं...। किसी तरह से बस दृश्य से गायब हो जाए... दूर चांद पर दीवार दिखती है.. उस दीवार पर मौसम नहीं बदलते हैं। नीचे मौसम के शिक़ार हम हैं... इन दिनों भीग रहे हैं देर तक अकेले...। फिर वह सपने सा धुंधला दृश्य दिखता है जिसमें पहली बार सभी मैदान में खड़े दिखते हैं... मैं इनमें से कुछ लोगों को पसंद करता हूँ और कुछ को नापसंद.. पर सभी एक दूसरे में इतने घुले-मिले हैं कि किसी को भी अलग से देखना असंभव है। मैं छांटना चाहता हूँ... क्या हम हमेशा इसी प्रयास में नहीं लगे रहते हैं? छांट दे... अलग कर दे अच्छे बुरे को.. प्रिय को अप्रिय से.. कहानी को नाटक से... कविता को शायरी से... पर सब एक दूसरे में फसे हुए हैं..। फिर मैं पहले दिन के बारे में सोचने लगता हूँ... पहले दिन जब यह सब शुरु हुआ था। वह एक तरीक़े का शतरंज का खेल जैसा था... मैं दूर था... सभी लोग अपने-अपने काले-सफेद खानों में चुप शांत खड़े थे...। मेरा किसी से भी कोई सीधा संबंध नहीं था... तब शायद हमने पहली ग़लती की थी... मस्ति के लिए... हमने एक छोटे प्यादे को आगे सरका दिया था...। हमें नहीं पता था कि उसका नतीजा यह होगा कि हम किसी एक तरफ हो जाएंगे... अब जीवन में या तो सफेद कदम रखना है या काले... हम यह रंग नहीं लांग सकते अब..। और बहुत समय बाद पता चलता है कि असल में हमने बहुत पहले एक खेल शुरु कर दिया था... हमें लगता है कि हमने चुना था.. पर असल में हम चुन लिये गए थे..। शतरंज के बगल में पड़े हुए कुछ प्यादे.. घोड़े नज़र आते हैं.... हम इस खेल के राजा हैं जिसके हाथ में कुछ नहीं हैं। इस खेल में हम सालों बने रहते हैं... क्यों कि हर चाल में हम सालों गवां देते है... जैसा कि रोज़ उठने पर हम टटोलते हैं कि इस जीवन ने हमारे सामने क्या चाल चली है... जीवन भी धीमा और तेज़ चलता है... कई बार रुक जाता है... बहुत लंबे समय तक..। अंत तो आता ही है... आभी नहीं तो सालों बाद.... हम इस बीच छोटे-बड़े कांप्रोमाईज़ करते चलते हैं... यह सारे कांप्रोमाईज़ समय मांगने जैसा है... हम मांगना चाहते है कि बस हमें बने रहने दो...। हम चिल्लाना चाहते हैं कि हम सफेद नहीं हैं... काले भी नहीं है... हम बस परिस्थिति में फसें हैं.. और अपनी चाल को जितना हो सके टाल रहे हैं...। हमें टालना आ जाता है। बीच में दूसरों को मारने में हमें खुशी मिलती है.... पर वह क्षणिक है... समय बीत रहा होता है... जैसे हम इस खेल में फसें हैं... बाक़ी भी यही है.. हम दिखाते नहीं है... क्योंकि हमें लगता है कि हम एक दिन जीत जांएगें.... असल में हम जीतते कभी भी नहीं है हम अपनी अंतिम हार टाल रहे होते हैं...।

Friday, February 15, 2013

धूप....

(अपनी लिखी जा रही कहानी का एक अंश...) धूप थी बहुत तेज़... आँखें बार-बार बंद हो जाती थीं। वह बादलों जैसे कभी आती तो हम अपने छोटे-छोटे बर्तन इक्कठे करने में लग जाते..। माना कि एक किचिन होगा हमारे भविष्य में... में हम उन छोटे बर्तनों से नाश्ता बनाने लगते... बचपन की जैसी बातों के बीच देर तक चहकते-रहते... ऎसे में पसीने की खुश्बू होती थी... कहीं से हवा चलती ....हवा वो कहती, जो हम इन सारी बातों के बीच नहीं कह पा रहे हो...। शब्द देर तक टटोलने पर अपना मतलब खो देते... मैं उसे बादल कहना चाहता था... पर बादल ज़बान तक आते-आते गीला हो जाता... लगता... यह नहीं है जो वह है... वह ठंडक भी है... वह हवा है.. मैं अब उसे हवा कहना चाहता.. पर हवा चहरे पर पड़ते ही मैं आँखे बंद कर लेता...। मेरे हाथ बार-बार उसके शरीर पर चिपक जाते... जैसे वह कोई चुंबक हो। वह बात बदलने में बार-बार वही बात कह रही होती... जिसे हम दोनों देर तक सुनना चाहते हो..। वह आम के पेड़ के नीचे जाने से डरती थी कहती थी कि ऊपर से लाल चींटिया बरसती हैं.... मैंने उससे कहता कि मुझे आम पसंद नहीं है... हम दोनों बहुत ख़ास है... आम तो बाक़ी लोग है जिन्हें हम दिखते नहीं है। उसे नहीं दिखने की बहुत उत्सुक्ता रहती थी... हम दोनों बार-बार बाहर जाते कि हम लोगों को ना दिखें.. और हम सच में नहीं दिखते थे..। देर तक बिस्तर पर लेटकर एक दूसरे का हाथ टटोलने की हमें आदत थी... वह मेरी भविष्य की रेखा पर अपनी उंग्लियां फैरती थी... मैं उसकी भाग्य रेखा बहुत पसंद करता था.. मेरी हथेली में भाग्य रेखा नहीं थी... यह बात मैंने कभी उसे नहीं बताई..। हम सारी बेमतलब की बातें एक दूसरे के कान में कहते जबकि सारी महत्वपूर्ण बातें मौन रह जाती। वह अच्छा खाना बनाती थी... उसे घर सुंदर रखना पसंद था... मैं उसे बहुत पसंद करता था.. वह मेरी ज़बान थी जो हमेशा उसे देखकर बाहर रह जाती थी... वह बाहर रह जाती थी... मैं भीतर सपने देखा करता था। एक सपना था कि किसी दिन लंबा चलेंगें और भटक जाएगें... हर वह रास्ता लेंगें जो हमारी वापसी को असंभव बना दे...। जब पानी दिखे तो रुक जाएं... और जब पहाड़ दिखे तो सांस ले लें... मैं तुम्हें इमली के पेड़ की कोपल चख़ाऊ...। किस कदर हम हंसेगें... हम कितना साथ हंसते थे... मैं जब भी पुराने दिनों को याद करता हूँ तो एक मुस्कुराहट याद आती हैं.. आँखों में.. होठो का धीरे से सरकना दिखता है... बालों का चहरे पर गिरना फिर संभलना.. सब धीमी गति से सरकता हुआ समय.. जैसे किसी फिल्म का धीमी गति का कोई सीन चल रहा हो। तुम्हारे साथ मैं धीरे-धीरे सरकता था.. बिना किसी प्रयास के... मानों नदी में बह रहे हो... तुम्हारे साथ मुझे कहीं भी पहुंचना नहीं होता था... और हम कहीं भी नहीं पहुंचे। अब इस तेज़ धूप में मैं ठंड़ी हवा की तरह तुम्हें लिखता हूँ... लिखते ही मुझे कश्मीर याद आता है। वह कोमल धूप जिसमें बैठे-बैठे दिन कट जाता था... हमारे बारामुल्ला के घर का आंगन... मुर्गिया नीचे और चील ऊपर... वह दौपहरें तुम्हें लिखते ही याद आ जाती हैं। और भी कुछ दिखता है... खिड़की... खिड़की से बाहर बर्फ ताकना... बुख़ारी का धुंआ.. कांगड़ी की आंच... पता नहीं क्यों हम साथ कश्मीर नहीं गए..। मैं असल में तुम्हें कश्मीर दिखाना चाहता था... खोजाबाग़... जहां मेरे बचपन के खेल.. गलियों में दबे छिपे पड़े हैं..। चलों एक दिन चलते हैं। दूर... बहुत दूर... बहुत दिनों से हमने मिलकर कोई सपना नहीं देखा... तुम्हें याद है ना सारे पुराने सपने... चलों अभी इसी वक़्त एक सपना बनाते हैं... नया... जिसमें खुश्बू हो... जिसमें तुम हो... जिसमें हम हो और एक कहानी... कहानी में हम भटक जांए.. और उसका कोई अंत ना हो... क्या कहती हो? शुरु करें..।

आकार.....

एक आकार दिखता है। कुछ बातों में... मुलाकातों में... जब भी एक अच्छा मनुष्य होने की बातों पर ज़ोर देता हूँ वह दिखने लगता है... आकार!!! मैं बातों में बहक उस आकार की तरफ ख़िच जाता हूँ... आपनी ईमानदारी में मैं कहता हूँ... वह दिख रहा है मुझे फिर से... लोग पूछते हैं क्या है..? मैं कहता हूँ एक आकार है...। बस... फिर मैं खिसियाते हुए आगे जोड़ देता हूँ कि उस आकार के कई प्रकार हो सकते हैं... मैं जब भी यह कहता हूँ... बचकाना सुनाई देता हूँ। बिना आकार के उस निराकार को किस तरह अपना बना लूं... अपना बनाने का संघर्ष उतना नहीं है जितना उस निराकार को अपनी बातों में सिद्ध करने का... कैसे अपनों को अपने इस आकार के बारे में बताऊं जो बिल्कुल भी किसी आकार में बंधा हुआ नहीं दिखता है। मैं सारे काम त्याग देता हूँ और उसे आकार देने में लग जाता हूँ। एक मूर्तिकार की तरह छेनी और हथौड़े के साथ उसके पास पहुंचता हूँ.... उसे पीटता हूँ, जलाता हूँ, छलनी कर देता हूँ.... वह किसी आकार में आता दिखाई देता है... पर कुछ ही देर में वह आकार बिना किसी अर्थ लिए टूटा-फूटा सामने पड़ा दिखता है। मैं उसे समेटकर एक जगह रख देता हूँ.... मेरी परेशानी मेरे माथे के आस-पास सब भांप लेते हैं... कहते हैं मैं परेशान दिखता हूँ आजकल...!!! कैसे कोई बिना किसी आकार के ज़िदा रह सकता है... मैं स्वीकृति चाहता हूँ... अपनों से.. अपने समय से... अपने आस-पास से...। निराकार पूजना सही है... पर बिना आकार के जिये जाना... असंभव जान पड़ता है। मैं खुद को उस आकार/निराकार के साथ बंद कर लेता हूँ...। जब तक मैं उसे एक आकार नहीं दे दूंगा बाहर नहीं जाऊंगा की कसम खाते ही वह आकार धुंधला पड़ने लगता है.... मैं इस तरह उसपर काम नहीं कर सकता... जब तक निराकार ठोस रुप नहीं लेगा तब तक उसे किसी भी आकार में ढ़ालना असंभव है..। वह अपना ठोस रुप मेरे दुनियां में जाने पर लेता है.... मैं जितना सफल लोगों के बीच उठता बैठता हूँ... या भविष्य से डरे लोगों की संगत रखता हूँ उतना मेरा निराकार पकता जाता है... साफ दिखने लगता है...। मैं सभ्य लोगों के बीच पागल दिखता हूँ.... लोग बार बार मेरे आकार के बारे बात छेड़ देते हैं....। जो निराकार मुझे दिखता है उसका आकार लोग मुझमें देख लेते हैं... मैं पूछता हूँ... कैसा है इसका आकार? लोग कहते हैं इसे आकार नहीं कहते हैं... तो मैं कहता हूँ कि यह निराकार है फिर... इसपर सब हंस देते हैं... निराकार भी एक आकार में बंधा होता है जो तुममे दिखता है वह कुछ नहीं है। एक सभ्य समाज के आकार में मैं अपनी पूरी सामर्थ लगा रहा हूँ कि मैं भी अपने आकार को उसमें फसा सकूं... और छुट्टी पाऊं...। मुझे लोग अपने होने वाले उत्सवों में बुलाएं... अपने बच्चे होने में... अपनी सामाजिक उन्नति की पार्टीयों में... अपनी चीख़ती हुई हंसी में मेरी दबी-छुपी खिसियाहट को शामिल कर लें। फिर एक दिन अचानक चीज़े खुल गई। मैंने एक महफिल में अचानक उसे मुझसे छिटककर दूर जाते हुए देख लिया... इसका मतलब वह मैं ही था जो अभी चीख़ती हुई हंसी में छिटका था... मैं तुरंत उस महफिल से उठ गया... मैं एक दूसरा आदमी भीतर पाले हुए हूँ... एक निराकार जो मुझे दिखता नहीं है वह अलग हो जाता है.. दूर फिका जाता है...। अगर मैं इससे निजाद पा लूं तो सभी के बीच मैं बिना किसी परेशानी के रह सकता हूँ...!!! शायद तभी से इसे मार गिराने के औज़ार ढ़ूढ़ रहा हूँ..। कभी दाढ़ी बनाते हुए खून निकल आता है तो डरता हूँ कि कहीं वह भी तो मुझे मार गिराना नहीं चाहता है!!! हमारे भीतर जो सबसे खतरनाक़ बात है वह है हर एक बात की आदत बना देना..। वह निराकार मेरी आदत के कमरे में घुस गया है... और यह कमरा मेरी पहुंच के बाहर है... आदत भीतर नहीं बाहर होती है... जैसे मैं बाहर होता हूँ जब भी वह आकर भीतर काम करता है..। पर मैं एक दिन बिना उसे पता लगे उसे पकड़ लूंगा.. दबोंच लूंगा... और उसे मारने के पहले.. इतने बीत गए सालों का हिसाब मांगूगा... हर अकेली शाम का.. हर नींद से लंबी रातों का.. इस गरीबी का.. और एक त्रासदी का... सबका हिसाब मांगूगा.. एक दिन..।

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मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। प्रत्येक 'तुम्हारे' के लिए, हर 'उसकी' सेवा करता। मैं हूँ जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाक्स लटका। -विपिन कुमार अग्रवाल